भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म में एकादशी व्रत का सर्वोच्च स्थान है। साल भर में आने वाली सभी एकादशियां भगवान विष्णु को समर्पित होती हैं, लेकिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का अपना एक विशिष्ट और अलौकिक महत्व है। इसे हम Amalaki Ekadashi या रंगभरी एकादशी के नाम से जानते हैं।
यह वह दिन है जब सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु और आंवले के वृक्ष की विशेष पूजा की जाती है। पुराणों के अनुसार, यह व्रत न केवल व्यक्ति को समस्त पापों से मुक्त करता है, बल्कि उसे हजारों गायों के दान के बराबर पुण्य भी प्रदान करता है। Amalaki Ekadashi क्या आप जानते हैं कि इस दिन आंवले के वृक्ष को छूने मात्र से ही दोगुना पुण्य मिलता है?
आज के इस विस्तृत ब्लॉग पोस्ट में हम Amalaki Ekadashi की पौराणिक व्रत कथा, इसकी उत्पत्ति का रहस्य, पूजा की विस्तृत विधि और रात्रि जागरण के महत्व पर चर्चा करेंगे। यदि आप मोक्ष और स्वर्ग की कामना रखते हैं, तो यह लेख आपके लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा।
Amalaki Ekadashi: क्या है इसका महत्व और अर्थ ?
‘आमलकी’ का अर्थ है आंवला। शास्त्रों में आंवले को साधारण फल नहीं, बल्कि ‘देव वृक्ष’ माना गया है। भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर को इस व्रत की महिमा बताई थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, Amalaki Ekadashi का व्रत करने से व्यक्ति को विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।
इस व्रत की विशेषता यह है कि इसमें भगवान विष्णु के साथ-साथ आंवले के वृक्ष की पूजा अनिवार्य बताई गई है। ऐसा माना जाता है कि आंवले का वृक्ष सभी वृक्षों में श्रेष्ठ और आदि वृक्ष है। इसके स्मरण मात्र से गोदान (गाय का दान) का फल मिलता है। यदि कोई भक्त इस वृक्ष का स्पर्श करता है, तो उसे दोगुना फल मिलता है और यदि इसके फल का सेवन करता है, तो उसे तिगुना पुण्य प्राप्त होता है।
पौराणिक व्रत कथा : आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति का रहस्य
Amalaki Ekadashi के संदर्भ में एक बहुत ही सुंदर और रहस्यमयी कथा प्रचलित है, जिसका वर्णन राजा मान्धाता और महर्षि वसिष्ठ के संवाद में मिलता है।
एक बार राजा मान्धाता ने गुरु वसिष्ठ से पूछा, “हे ऋषिवर! Amalaki Ekadashi आंवले के वृक्ष की उत्पत्ति कैसे हुई और इसका इतना महत्व क्यों है?”
तब महर्षि वसिष्ठ ने बताया कि जब सृष्टि के आरंभ में भगवान विष्णु के मुख से चंद्रमा के समान एक अत्यंत चमकीला और कांतिमान बिंदु पृथ्वी पर गिरा, तो उसी बिंदु से आंवले के महान वृक्ष की उत्पत्ति हुई। यह वृक्ष भगवान विष्णु का ही स्वरूप माना गया। इसी समय भगवान ब्रह्मा जी भी प्रकट हुए और उन्होंने सृष्टि की रचना शुरू की।
जब देवताओं और ऋषियों ने पृथ्वी पर इस अद्भुत वृक्ष को देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। वे इसे पहचान नहीं पा रहे थे। तब आकाशवाणी हुई। वह आकाशवाणी स्वयं भगवान विष्णु की थी। उन्होंने कहा, “यह आमलकी (आंवला) वृक्ष मुझे अत्यंत प्रिय है। यह सभी पापों का नाश करने वाला और सर्वदेवमय है।”
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इस कथा से स्पष्ट होता है कि Amalaki Ekadashi का व्रत सीधे तौर पर भगवान विष्णु की कृपा से जुड़ा हुआ है।
आंवले के वृक्ष में देवताओं का वास:
इस एकादशी पर आंवले के वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है, इसका उत्तर इसके कण-कण में बसे देवताओं में छिपा है। आकाशवाणी के अनुसार, इस वृक्ष के विभिन्न अंगों में देवताओं का निवास है:
• मूल (जड़): वृक्ष की जड़ में स्वयं भगवान विष्णु विराजमान हैं।
• ऊपर का भाग: वृक्ष के ऊपरी हिस्से में ब्रह्मा जी का वास है।
• स्कंध (तना): तने में भगवान रुद्र (शिव) निवास करते हैं।
• शाखाएं: शाखाओं में मुनियों का वास है।
• टहनियां: छोटी टहनियों में देवता रहते हैं।
• पत्ते: पत्तों में आठों वसुओं का निवास है।
• फूल: फूलों में मरुद्गण बसते हैं।
• फल: फलों में सभी प्रजापति निवास करते हैं।
यही कारण है कि Amalaki Ekadashi के दिन आंवले के वृक्ष के नीचे की गई पूजा से सभी देवी-देवता एक साथ प्रसन्न हो जाते हैं।
Amalaki Ekadashi पूजा विधि: स्नान और संकल्प
इस व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए सही विधि का पालन करना आवश्यक है। शास्त्रों में बताई गई विधि इस प्रकार है:
1. प्रातःकाल की दिनचर्या: एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर सबसे पहले दांतून करना चाहिए। इसके बाद व्रत का संकल्प लें: “हे पुण्डरीकाक्ष! हे अच्युत! मैं आज एकादशी को निराहार रहकर व्रत का पालन करूंगा और कल भोजन ग्रहण करूंगा। आप मुझे अपनी शरण में लें।”
2. मृत्तिका स्नान (मिट्टी का स्नान): इस दिन स्नान का विशेष नियम है। स्नान से पहले शरीर पर पवित्र मिट्टी लगानी चाहिए। मिट्टी लगाते समय इस मंत्र का उच्चारण करें:
“अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे। मृत्तिके हर मे पापं जन्मकोट्यां समर्जितम्।।”
अर्थ: हे वसुन्धरे! तुम्हारे ऊपर अश्व और रथ चलते हैं और भगवान विष्णु ने वामन अवतार में तुम्हें नापा था। हे मृत्तिके! मेरे करोड़ों जन्मों के पापों को हर लो।
3. स्नान मंत्र: मिट्टी लगाने के बाद जल से स्नान करते समय वरुण देव का स्मरण करें और प्रार्थना करें कि यह स्नान सभी तीर्थों के स्नान के समान फलदायी हो।
पूजन का मुख्य भाग: परशुराम और कलश स्थापना
Amalaki Ekadashi की पूजा दोपहर या शाम के समय आंवले के वृक्ष के नीचे की जाती है। इसकी विधि अत्यंत विस्तृत और रोचक है:
1. परशुराम प्रतिमा: विद्वान व्यक्ति को भगवान परशुराम (जो विष्णु के अवतार हैं) की सोने की प्रतिमा बनवानी चाहिए।
2. वृक्ष के नीचे स्थान: घर पर पूजा करने के बाद पूजन सामग्री लेकर आंवले के वृक्ष के पास जाएं। वृक्ष के चारों ओर की जमीन को साफ करें, लीपें और शुद्ध करें।
3. कलश स्थापना: वहां एक नया कलश स्थापित करें। कलश में पंचामृत, सुगंध और जल भरें। उस पर चंदन लगाएं और फूलों की माला पहनाएं।
4. सामग्री: पूजा स्थल पर धूप-दीप जलाएं। एक विशेष बात का ध्यान रखें—पूजा में भगवान के लिए नया छाता, जूता और वस्त्र भी रखने चाहिए।
5. पात्र और प्रतिमा: कलश के ऊपर एक पात्र रखें जिसमें ‘लाजें’ (धान की खीलें) भरी हों। इस पात्र के ऊपर भगवान परशुराम की प्रतिमा स्थापित करें।
अंग पूजा और अर्घ्य का महत्व
भगवान परशुराम की पूजा करते समय उनके शरीर के विभिन्न अंगों का स्मरण करना चाहिए। मंत्रों के साथ उनके चरणों, घुटनों, जांघों, कमर, पेट, छाती, बांहों, गले, मुख, नाक, आंखों और माथे की विधिवत पूजा करें।
इसके बाद आंवले के फल के साथ भगवान को अर्घ्य देना चाहिए। अर्घ्य देते समय इस मंत्र का जाप करें:
“नमस्ते देवदेवेश जामदग्न्य नमोऽस्तु ते। गृहाणार्घ्यमिमं दत्तमामलक्या युतं हरे।।”
अर्थ: हे देवदेवेश्वर! हे जमदग्नि नंदन! श्रीविष्णु स्वरूप परशुरामजी! आपको नमस्कार है। आंवले के फल के साथ दिया हुआ मेरा यह अर्घ्य स्वीकार करें।
यह पूजा विधि Amalaki Ekadashi को अन्य एकादशियों से भिन्न और विशिष्ट बनाती है।
रात्रि जागरण और परिक्रमा: स्वर्ग प्राप्ति का मार्ग
केवल दिन में पूजा कर लेने से व्रत पूरा नहीं होता। शास्त्रों के अनुसार, इस व्रत में रात्रि जागरण का अत्यधिक महत्व है।
• जागरण: भक्त को रात भर आंवले के वृक्ष के पास ही रहना चाहिए। रात को नृत्य, संगीत, वाद्य यंत्रों और भगवान विष्णु की कथाओं के माध्यम से व्यतीत करना चाहिए। यह जागरण पापों को जलाकर भस्म कर देता है।
• परिक्रमा: अगले दिन यानी द्वादशी की सुबह, भगवान विष्णु के नामों का कीर्तन करते हुए आंवले के वृक्ष की परिक्रमा करनी चाहिए। शास्त्रों में 108 या 25 परिक्रमा करने का विधान बताया गया है।
परिक्रमा के बाद भगवान की आरती करें और ब्राह्मणों को भोजन कराएं। कलश, वस्त्र, जूते और छाता आदि सामग्री किसी योग्य ब्राह्मण को दान कर दें। अंत में स्वयं भोजन ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
पापों से मुक्ति और मोक्ष का वरदान
भगवान विष्णु ने ऋषियों को बताया था कि जो भी व्यक्ति फाल्गुन शुक्ल पक्ष में पुष्य नक्षत्र से युक्त द्वादशी को Amalaki Ekadashi का व्रत करता है, उसे यमराज का भय नहीं रहता।
1. पाखंडियों से दूरी: व्रत वाले दिन दुराचारी, चोर, पाखंडी और मर्यादा तोड़ने वाले लोगों से बातचीत नहीं करनी चाहिए। मन को पूरी तरह ईश्वर में लगाना चाहिए।
2. पुण्य फल: यह व्रत हजारों गायों के दान के बराबर फल देता है। यह सभी व्रतों में उत्तम है और व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करता है।
3. तीर्थों का फल: इस व्रत को करने वाला व्यक्ति घर बैठे ही समस्त तीर्थों के दर्शन का पुण्य प्राप्त कर लेता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
Amalaki Ekadashi केवल एक उपवास नहीं, बल्कि प्रकृति और परमात्मा के मिलन का उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि ईश्वर कण-कण में, यहां तक कि वृक्षों में भी विद्यमान है। आंवले के वृक्ष की पूजा करके हम पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देते हैं और भगवान विष्णु की कृपा भी पाते हैं।
यदि आप अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि चाहते हैं, और मृत्यु के बाद वैकुंठ धाम की कामना रखते हैं, तो इस बार Amalaki Ekadashi का व्रत पूरे विधि-विधान से अवश्य करें। भगवान परशुराम और श्री हरि आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करेंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न 1: Amalaki Ekadashi के दिन किस भगवान की पूजा होती है?
उत्तर: इस दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु, उनके अवतार भगवान परशुराम और आंवले के वृक्ष की पूजा की जाती है।
प्रश्न 2: आंवले के वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है?
उत्तर: क्योंकि आंवले की उत्पत्ति भगवान विष्णु के मुख से गिरे बिंदु से हुई है और इसमें ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित सभी देवताओं का वास माना जाता है।
प्रश्न 3: इस एकादशी पर क्या दान करना चाहिए? उत्तर: पूजा में प्रयोग किए गए कलश, नए वस्त्र, जूते, छाता और आंवले का दान ब्राह्मणों को करना चाहिए।
प्रश्न 4: Amalaki Ekadashi व्रत में क्या खाना चाहिए?
उत्तर: व्रत के दौरान अन्न का त्याग करना चाहिए। आप फलाहार कर सकते हैं, जिसमें आंवले का सेवन विशेष रूप से पुण्यदायी माना जाता है।
प्रश्न 5: व्रत का पारण कब करना चाहिए ?
उत्तर: व्रत का पारण द्वादशी तिथि को सूर्योदय के बाद और ब्राह्मण भोजन व दान-पुण्य करने के पश्चात ही करना चाहिए।