Navratri Day 8 Maa Mahagauri Puja Vidhi : सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में आश्विन मास के दौरान मनाया जाने वाला शारदीय नवरात्रि का महापर्व देवी शक्ति की उपासना, आत्मिक शुद्धि और अंतःकरण के दिव्य रूपांतरण का सबसे पावन कालखंड माना जाता है। नौ दिनों तक चलने वाले इस आध्यात्मिक अनुष्ठान में मां नवदुर्गा के नौ पावन स्वरूपों की क्रमबद्ध आराधना की जाती है।
प्रथम दिन मां शैलपुत्री की घटस्थापना, द्वितीय दिन मां ब्रह्मचारिणी का कठोर तप, तृतीय दिन मां चंद्रघंटा की शांति व वीरता, चतुर्थ दिन मां कूष्मांडा की मंद मुस्कान से सृष्टि रचना, पंचम दिन मां स्कंदमाता का वात्सल्य, षष्ठम दिन महिषासुरमर्दिनी मां कात्यायनी का प्राकट्य और सप्तम दिन काल की नियंत्रक मां कालरात्रि के संहारक रूप की पूजा के उपरांत, नवरात्रि के आठवें पावन दिन मां दुर्गा के अष्टम स्वरूप Maa Mahagauri की विशेष पूजा-अर्चना, हवन और कन्या पूजन का विधान है।
शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी तिथि शक्ति उपासना की चरम पराकाष्ठा मानी जाती है। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि के आठवें दिन मां महागौरी की पूजा सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को पूरे देश में अपार श्रद्धा, सात्विकता और उल्लास के साथ संपन्न की जाएगी। आज हम देवी के अलौकिक श्वेत स्वरूप, 2026 के पंचांगीय मुहूर्त, संधि पूजा का महत्व, भगवान शिव और मां पार्वती की पावन पौराणिक कथा, षोडशोपचार पूजा विधि, प्रिय भोग (नारियल), कन्या पूजन (कंजक) के संपूर्ण नियम, वैदिक हवन विधि, सिद्ध मंत्र, स्तोत्र, कवच और आरती का सविस्तार विवेचन करेंगे।
मां महागौरी का अलौकिक स्वरूप और दिव्य प्रतीक : The Ethereal Form and Divine Symbols of Goddess Mahagauri
शास्त्रों, शिव पुराण और दुर्गा सप्तशती के अनुसार, Maa Mahagauri का स्वरूप समस्त नवदुर्गाओं में सर्वाधिक शांत, सौम्य, उज्ज्वल, कांतिमय और ममतामयी माना गया है। माता का यह स्वरूप साधक को समस्त प्रकार के पापों, मलों और संतापों से मुक्त कर परम शांति प्रदान करता है
शंख और चंद्र के समान धवल कांति: देवी का वर्ण पूर्णतः श्वेत, दमकता हुआ और शंख, कुंद के पुष्प तथा शरद पूर्णिमा के चंद्रमा के समान उज्ज्वल है। इसी कारण इन्हें ‘महागौरी’ कहा जाता है[28][65]। इनकी आभा आठ वर्ष की कन्या जैसी अत्यंत कोमल और सोलह वर्ष की तपस्विनी जैसी तेजस्वी मानी गई है।
श्वेतांबरधरा और सात्विक वेशभूषा: माता ने विशुद्ध श्वेत (सफेद) रंग के वस्त्र और स्वर्णिम-श्वेत आभूषण धारण किए हुए हैं। यह श्वेत रंग विशुद्ध ‘सत्व गुण’, निष्कलंक चरित्र, पवित्रता और मानसिक संतुलन का प्रतीक है[।
चतुर्भुजा स्वरूप और दिव्यास्त्र: देवी की चार भुजाएं हैं[। दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ भक्तों को समस्त भयों से मुक्ति दिलाने वाली ‘अभय मुद्रा’ में है, जबकि नीचे वाले दाहिने हाथ में देवाधिदेव महादेव का पावन ‘त्रिशूल’ (Trishul) सुशोभित है। बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में नाद ब्रह्म का प्रतीक ‘डमरू’ (Damru) है, और नीचे वाला बायां हाथ भक्तों को मनोवांछित वरदान देने वाली ‘वरद मुद्रा’ में स्थित है।
वृषभ (बैल) की सवारी: माता का वाहन श्वेत वृषभ (बैल) है, जिसके कारण इन्हें ‘वृषारूढ़ा’ (Vrisharudha) भी कहा जाता है। बैल धर्म, धैर्य, अटूट स्थिरता और असीम शक्ति का प्रतीक है, जो यह संदेश देता है कि आध्यात्मिक पथ पर दृढ़ता और धर्म के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
असीम करुणा और शांति: कालरात्रि के भयानक संहारक रूप के उपरांत महागौरी का प्राकट्य यह स्पष्ट संदेश देता है कि जब संघर्ष और अंधकार का शमन हो जाता है, तब जीवन में ज्ञान, शांति, पवित्रता और नवचेतना का सूर्योदय होता है।
आध्यात्मिक चक्र: सहस्रार चक्र (Crown Chakra) की सर्वोच्च शुद्धि : Spiritual Chakra: The Ultimate Purification of the Sahasrara Chakra (Crown Chakra)
योग दर्शन और कुंडलिनी तंत्र में नवरात्रि का आठवां दिन चेतना की सर्वोच्च ऊंचाई का साक्षात्कार कराता है:
प्रथम से षष्ठम दिन: मूलाधार से आज्ञा चक्र तक क्रमशः पंचतत्वों और विवेक का परिशोधन।
सप्तम दिन: सहस्रार चक्र में प्रवेश और आंतरिक काल व अंधकार का संहार।
अष्टम दिन (परम शुद्धि व मुक्ति): नवरात्रि के आठवें दिन साधक का चित्त सिर के शीर्ष भाग में स्थित ‘सहस्रार चक्र’ (Crown Chakra / सहस्रदल कमल) में पूर्णतः विलीन होकर निर्मल हो जाता है।
जब साधक आठवें दिन एकाग्र होकर देवी की शरण में जाता है, तो उसके भीतर संचित पूर्वजन्मों के समस्त संचित पाप और अज्ञान के संस्कार भस्म हो जाते हैं[23]। मां महागौरी की कृपा से साधक का अंतःकरण गंगाजल के समान पवित्र हो जाता है, जिससे उसे अलौकिक शांति, मोक्ष और आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है।
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वर्ष 2026 में पूजन की तिथि और पंचांगीय मुहूर्त : Date and astrological timing (panchang muhurat) for worship in the year 2026
वैदिक पंचांगीय गणना और ज्योतिषीय सिद्धांतों के अनुसार, वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी तिथि का दुर्लभ संयोग बन रहा है
दुर्गा अष्टमी / महाअष्टमी मुख्य तिथि: सोमवार, 19 अक्टूबर 2026
अष्टमी तिथि का प्रारंभ: रविवार, 18 अक्टूबर 2026 को प्रातःकाल 08:27 AM से
अष्टमी तिथि का समापन: सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को प्रातःकाल 10:51 AM तक
महानवमी तिथि का प्रारंभ: सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को प्रातः 10:51 AM से
उदयातिथि नियम: शास्त्रों के अनुसार जब अष्टमी तिथि सूर्योदय के समय विद्यमान हो, तो उसी दिन महाअष्टमी का मुख्य पर्व मनाया जाता है। 19 अक्टूबर को सूर्योदय के समय आश्विन शुक्ल अष्टमी तिथि होने के कारण महाअष्टमी का व्रत, कन्या पूजन और मां महागौरी की मुख्य पूजा 19 अक्टूबर को ही संपन्न की जाएगी। (कुछ पारिवारिक परंपराओं में जो लोग नवमी को व्रत खोलते हैं या अष्टमी की शुरुआत से व्रत रखते हैं, वे 18 अक्टूबर की शाम से ही पूजा प्रारंभ करते हैं)।
पूजन और संधि पूजा के शुभ मुहूर्त (Auspicious Timings 2026)
ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 04:45 AM से 05:36 AM तक (आराधना व मंत्र साधना हेतु सर्वोत्तम)
प्रातःकालीन शुभ पूजा व कन्या पूजन मुहूर्त: प्रातः 06:27 AM से 10:51 AM तक (अष्टमी तिथि के भीतर)
संधि पूजा का अत्यंत दुर्लभ मुहूर्त (Sandhi Puja Muhurat): प्रातः 10:27 AM से 11:15 AM तक (कुल अवधि: 48 मिनट)
अभिजित मुहूर्त: दोपहर 11:43 AM से 12:29 PM तक
संधि पूजा (Sandhi Puja) का विशेष महत्व: दुर्गा पूजा और नवरात्रि परंपरा में संधि काल को सर्वाधिक शक्तिशाली क्षण माना गया है[7]। जब अष्टमी तिथि समाप्त होने में 24 मिनट शेष हों और नवमी तिथि के प्रारंभिक 24 मिनट शुरू हो रहे हों, उस 48 मिनट के कालखंड को ‘संधिकालीन वेला’ कहा जाता है। 19 अक्टूबर 2026 को यह समय सुबह 10:27 AM से 11:15 AM तक रहेगा। इसी पावन क्षण में मां दुर्गा ने चामुंडा रूप धरकर असुर चंड, मुंड और रक्तबीज का संहार किया था। इस समय 108 दीपक और 108 कमल पुष्प अर्पित करने से जीवन के सभी घोर संकट नष्ट हो जाते हैं।
पौराणिक व्रत कथा: घोर तपस्या, गंगा स्नान और पावन प्राकट्य : Mythological Vrat Katha (Ritual Narrative): Intense Penance, Bathing in the Ganges, and Sacred Manifestation
धार्मिक ग्रंथों, शिव पुराण और मार्कंडेय पुराण में मां महागौरी के अवतरण की अत्यंत मार्मिक और प्रेरणादायी कथा वर्णित है
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, देवी पार्वती ने पूर्वजन्म में सती के रूप में देहत्याग के पश्चात पर्वतराज हिमालय और रानी मैना के घर पार्वती (शैलपुत्री) के रूप में पुनर्जन्म लिया। बाल्यावस्था से ही उनके मन में भगवान देवाधिदेव महादेव को पुनः अपने पति रूप में प्राप्त करने की अनन्य अभिलाषा थी। देवर्षि नारद के उपदेश पर माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय की बीहड़ कंदराओं में हजारों वर्षों तक घोर और अभूतपूर्व तपस्या प्रारंभ की।
तपस्या के दौरान देवी ने ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि तपी, वर्षाकाल में खुले आकाश के नीचे जलधाराएं सही और शीतकाल में बर्फ से ढके पर्वतों पर खड़े होकर निराहार व्रत किए। वर्षों तक केवल सूखे पत्ते (अपर्णा) खाकर और अंत में केवल वायु का आहार करके उन्होंने ध्यान लगाया। इस भीषण तपस्या, धूप, वर्षा, धूल और कड़ाके की ठंड के प्रभाव से देवी का सुकोमल शरीर अत्यंत क्षीण हो गया और उनका वर्ण पूर्णतः काला (कृष्ण वर्ण) पड़ गया।
अंततः देवी पार्वती की अडिग निष्ठा, त्याग और तप से देवाधिदेव भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए[25]। महादेव ने साक्षात प्रकट होकर देवी को पत्नी रूप में स्वीकार करने का वरदान दिया[25][76]। इसके पश्चात भगवान शिव ने अपने कमंडल के पवित्र गंगाजल से माता पार्वती का अभिषेक किया अथवा उन्हें पवित्र मानसरोवर/देवगंगा में स्नान कराया।
जैसे ही गंगा के अमृतमयी जल ने देवी के श्रीअंगों का स्पर्श किया, उनके शरीर से तपस्या की समस्त धूल, कालिमा और मैल धुल गई। उनके भीतर से ‘कौशिकी’ नामक तेजस्विनी शक्ति का प्राकट्य हुआ और माता का शरीर बिजली की भांति दिव्य, करोड़ों सूर्यों के समान चमकदार और अत्यंत गौरवर्ण हो गया। उनके इस अनिंद्य, निष्कलंक और अत्यंत धवल रूप को देखकर स्वयं महादेव मुग्ध हो गए और उन्होंने देवी को Maa Mahagauri के पावन नाम से विभूषित किया।
एक अन्य लोककथा के अनुसार, जब माता पार्वती तपस्या में लीन थीं, तब एक भूखा सिंह उन्हें अपना आहार बनाने की लालसा से वहां आया। किंतु तपस्या में लीन देवी के अलौकिक तेज के प्रभाव से वह वहीं शांत होकर बैठ गया और वर्षों तक माता के उठने की प्रतीक्षा करता रहा। जब देवी की तपस्या पूर्ण हुई, तो उन्होंने देखा कि यह सिंह भी उनके साथ वर्षों तक भूखा-प्यासा रहकर तपस्या का साक्षी बना रहा। माता ने उसकी इस प्रतीक्षा को उसकी तपस्या मानकर उस पर दया की और उसे भी अपने वाहन के रूप में स्वीकार कर लिया।
Maa Mahagauri की प्रामाणिक एवं सरल गृह पूजन विधि
नवरात्रि के आठवें दिन घर के मंदिर में पूर्ण विधि-विधान, सात्विकता और श्रद्धा से पूजा संपन्न करने के लिए इन वैदिक चरणों का पालन करें
स्नान व शुद्धि: प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त हों। इस दिन श्वेत (सफेद), क्रीम, गुलाबी या मोरपंखी हरे (Peacock Green) रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थल का पवित्रीकरण: घर के पूजा स्थल और प्रथम दिन स्थापित घटस्थापना कलश के समीप गंगाजल छिड़ककर वेदी को शुद्ध करें।
दीपक प्रज्वलन व संकल्प: मां भगवती और कलश देवता के सम्मुख शुद्ध देसी गाय के घी का अखंड या सामान्य दीपक प्रज्वलित करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर महाअष्टमी व्रत व पूजन का पवित्र संकल्प लें।
गणपति व कलश पूजन: सर्वप्रथम प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश, नवग्रह और कलश में प्रतिष्ठित देवी-देवताओं को रोली, चंदन, अक्षत और ताजे पुष्प अर्पित करें।
देवी का आह्वान व ध्यान: हाथ में श्वेत पुष्प (सफेद चमेली, मोगरा, कुंद) और अक्षत लेकर माता के ध्यान श्लोक (श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः…) का पाठ करते हुए देवी का सादर आह्वान करें[31]।
स्नान व अभिषेक: यदि धातु की मूर्ति हो, तो गंगाजल और पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से स्नान कराएं[89]। तत्पश्चात माता को चंदन, कुमकुम और अक्षत का तिलक लगाएं[78]।
वस्त्र व श्रृंगार अर्पण: माता को श्वेत चुनरी या लाल चुनरी अर्पित करें[31]। इसके साथ ही सुहाग की पिटारी (सिंदूर, बिंदी, चूड़ियां, मेंहदी, आलता) माता के चरणों में समर्पित करें।
पुष्प व अक्षत अर्पण: देवी को सफेद कमल, मोगरा, सफेद कनेर अथवा लाल गुलाब के ताजे पुष्पों की सुंदर माला पहनाएं।
प्रिय भोग (नारियल) अर्पण: मां महागौरी को पानीदार नारियल (श्रीफल) या नारियल से बनी मिठाई, मखाना खीर का नैवेद्य अवश्य अर्पित करें।
मंत्र जप व स्तोत्र पाठ: रुद्राक्ष या स्फटिक की माला से माता के सिद्ध बीज मंत्र अथवा “सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये…” मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें। इसके उपरांत महागौरी स्तोत्र व कवच का पाठ करें।
आरती व क्षमा याचना: कर्पूर और घी के दीप से मां महागौरी की भावपूर्ण आरती करें और हाथ जोड़कर पूजा में अनजाने में हुई भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करें।
माता का प्रिय भोग और शुभ रंग का महत्व : The Significance of the Goddess’s Preferred Offerings and Auspicious Colors
1. प्रिय भोग (Sacred Bhog – नारियल व खीर)
धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, Maa Mahagauri को नारियल (Coconut) सर्वाधिक प्रिय है
नारियल का नैवेद्य: नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर माता को साबुत सूखा गोला या पानी वाला जटादार नारियल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है।
संतान सुख व दरिद्रता नाश: ऐसा विश्वास है कि अष्टमी के दिन माता को नारियल अर्पित करने और उसे ब्राह्मण या कन्याओं को दान करने से घर की दरिद्रता दूर होती है, सुख-शांति आती है और निःसंतान दंपतियों को सुयोग्य संतान की प्राप्ति होती है।
खीर व हलवा-पूरी: इसके अतिरिक्त माता को गाय के दूध की सात्विक खीर, नारियल के लड्डू और महाअष्टमी के पारंपरिक हलवा, पूरी व काले चने का भोग लगाया जाता है।
2. नवरात्रि के आठवें दिन का शुभ रंग (Auspicious Colors)
परंपरागत रूप से मां महागौरी की पूजा में निम्नलिखित रंगों का विशेष महत्व है:
श्वेत व क्रीम रंग (White / Cream): माता स्वयं श्वेतांबरधरा हैं[17]। सफेद रंग सत्य, पवित्रता, सत्व गुण, शांति और चित्त की एकाग्रता का प्रतीक है।
मोरपंखी हरा रंग (Peacock Green): लोकप्रिय साप्ताहिक रंग कैलेंडर के अनुसार वर्ष 2026 में रविवार/सोमवार की संधि में मोरपंखी हरा रंग भी अत्यंत शुभ माना गया है। यह नवीनता, ताजगी और प्राकृतिक समृद्धि का परिचायक है।
गुलाबी व लाल (Pink & Red): देवी पूजन में लाल चुनरी और गुलाबी पुष्पों का अर्पण सदा मंगलकारी रहता है।
कन्या पूजन (कंजक) की प्रामाणिक विधि और शास्त्रीय नियम : The Authentic Procedure and Scriptural Rules for Kanya Pujan (Kanjak)
नवरात्रि की अष्टमी तिथि पर कन्या पूजन करते समय Maa Mahagauri का ध्यान करने से मां भगवती अत्यंत प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। शास्त्रों के अनुसार दो वर्ष से लेकर दस वर्ष तक की कन्याएं साक्षात नवदुर्गा का स्वरूप होती हैं
कन्याओं की आयु और उनका शास्त्रीय स्वरूप
2 वर्ष (कुमारिका): दुख और दरिद्रता का नाश करने वाली।
3 वर्ष (त्रिमूर्ति): धन, धान्य और वंश की वृद्धि करने वाली।
4 वर्ष (कल्याणी): विद्या, विजय और राजसुख देने वाली।
5 वर्ष (रोहिणी): समस्त रोगों से मुक्ति दिलाने वाली।
6 वर्ष (कालिका): शत्रुओं और भय का नाश करने वाली।
7 वर्ष (चंडिका): ऐश्वर्य और पराक्रम देने वाली।
8 वर्ष (शाम्भवी): वाद-विवाद में विजय और शांति देने वाली।
9 वर्ष (दुर्गा): विघ्नों का नाश और मोक्ष प्रदान करने वाली।
10 वर्ष (सुभद्रा): समस्त मनोरथों को सिद्ध करने वाली।
कन्या पूजन के 7 सरल चरण
सादर निमंत्रण: एक दिन पूर्व अथवा प्रातःकाल 9 कन्याओं और साथ में कम से कम 1 छोटे बालक (बटुक भैरव) को ससम्मान घर पर आमंत्रित करें। भगवान शिव ने आदि शक्ति की रक्षा के लिए भैरव को नियुक्त किया था, अतः बटुक भैरव के बिना पूजा पूर्ण नहीं होती।
पाद प्रक्षालन (पैर धोना): जब कन्याएं घर के मुख्य द्वार पर आएं, तो थाली में स्वच्छ जल व थोड़ा सा दूध डालकर अपने हाथों से उनके चरण धोएं और स्वच्छ तौलिये से पोंछें।
आसन व तिलक: सभी कन्याओं और लांगुरिया (बटुक) को स्वच्छ आसन पर बैठाएं। उनके माथे पर कुमकुम, रोली, चंदन और अक्षत का पावन तिलक लगाएं।
कलावा बांधना: सभी बच्चों के दाहिने हाथ में रक्षा सूत्र (मौली/कलावा) बांधें।
आरती व दीप दर्शन: घी का दीपक जलाकर सभी कन्याओं की आरती उतारें और माता के जयकारे लगाएं।
सात्विक भोजन (प्रसाद): कन्याओं को शुद्ध घी में बने सूजी का हलवा, फूली हुई पूरियां और बिना लहसुन-प्याज के बने काले चने का सात्विक भोजन प्रेमपूर्वक कराएं। साथ में मौसमी फल और नारियल का प्रसाद दें ।
उपहार, दक्षिणा व चरण स्पर्श: भोजन के उपरांत कन्याओं को अपनी सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा (रुपये), शिक्षण सामग्री (कॉपी, पेन), लाल चुनरी या वस्त्र, और बर्तन आदि उपहार में दें। अंत में सभी कन्याओं के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लें और उन्हें विदा करें।
घर पर स्वयं वैदिक हवन करने की 5-स्टेप विधि
अष्टमी और नवमी तिथि पर व्रत की पूर्णता के लिए घर पर सरल वैदिक हवन अवश्य करना चाहिए
हवन सामग्री सूची (Havan Samagri List)
आम की सूखी लकड़ियां (समिधा), देशी कपूर, छोटा तांबे या मिट्टी का हवन कुंड।
शुद्ध गाय का घी, जौ (जवा), काले तिल, साबुत अक्षत, शक्कर/बूरा, गुग्गल, लोबान।
लौंग, छोटी इलायची, बताशे, सूखा गोला (नारियल), पान के पत्ते, सुपारी और कलावा।
हवन के 5 सरल चरण:
वेदी निर्माण व अग्नि प्रज्वलन: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। हवन कुंड में आम की लकड़ियों को चौकोर सजाएं, बीच में कपूर रखकर अग्नि प्रज्वलित करें।
पंच घृत आहुति (घी की प्रारंभिक आहुतियां): अग्नि जलने पर केवल शुद्ध घी से ये आहुतियां दें
- ॐ प्रजापतये स्वाहा। इदं प्रजापतये न मम।
- ॐ इन्द्राय स्वाहा। इदं इन्द्राय न मम।
- ॐ अग्नये स्वाहा। इदं अग्नये न मम।
- ॐ सोमाय स्वाहा। इदं सोमाय न मम।
- ॐ भूः भुवः स्वः स्वाहा।
देवताओं व नवग्रहों की आहुति: हवन सामग्री से आहुतियां दें
- ॐ गं गणपतये नमः स्वाहा।
- ॐ कुलदेवतायै नमः स्वाहा।
- ॐ नवग्रहेभ्यो नमः स्वाहा।
- ॐ हनुमते नमः स्वाहा।
- ॐ भैरवाय नमः स्वाहा।
मुख्य नवार्ण मंत्र आहुति (कम से कम 21 या 108 बार):
“ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे स्वाहा॥”
ॐ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते स्वाहा॥
पूर्णाहुति (Purnahuti): सूखे नारियल के गोले के ऊपरी भाग को काटकर उसमें घी, बताशा, लौंग, सुपारी और बची हुई हवन सामग्री भरें। कलावा लपेटकर खड़े हो जाएं और दोनों हाथों से नारियल पकड़कर मंत्र बोलकर अग्नि में समर्पित करें
“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते स्वाहा॥”
हवन के पश्चात कपूर से आरती करें, हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थना करें और शांत हुई भस्म का तिलक परिवार के सभी सदस्य लगाएं।
सिद्ध ध्यान, स्तुति, स्तोत्र और कवच मंत्र
पूजा और ध्यान के समय इन पवित्र शास्त्रीय मंत्रों का शुद्ध उच्चारण के साथ पाठ करें
1. मुख्य ध्यान श्लोक (Dhyan Shloka):
> श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
भावार्थ: श्वेत वृषभ पर सवार रहने वाली, निष्कलंक श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, परम पवित्र और देवाधिदेव महादेव को आनंद प्रदान करने वाली मां महागौरी हमें समस्त शुभ और मंगलकारी फल प्रदान करें।
2. मुख्य बीज मंत्र (Beej Mantra)
“ॐ देवी महागौर्यै नमः॥ “श्रीं क्लीं ह्रीं वरदायै नमः॥” “ॐ ह्रीं महागौर्ये नमः॥”
3. स्तुति मंत्र (Stuti Mantra):
या देवी सर्वभूतेषु मां महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
4. सर्वमंगल मांगलिक मंत्र (Universal Blessing Mantra):
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
5. आंतरिक शुद्धि प्रार्थना (Inner Peace Prayer):
श्वेतवर्णा महादेवी त्रिनेत्रा शूलधारिणी।वरदाभय हस्ताभ्यां मम शुद्धिं कुरु देवि॥
6. महागौरी स्तोत्र (Mahagauri Stotram):
सर्वसङ्कट हन्त्री त्वंहि धन ऐश्वर्य प्रदायनीम्। ज्ञानदा बुद्धिदा गौरि प्रणमाभ्यहम्॥ सुख शान्तिदात्री त्वंहि आद्यशक्ति महेश्वरी। सृष्टि स्थिति प्रलयकर्त्री प्रणमाभ्यहम्॥
7. महागौरी कवच (Mahagauri Kavacham):
ॐकारः पातु शीर्षो मां, ऐं बीजं मां ललाटतः। ह्रीं बीजं पातु नेत्रे च, क्लीं बीजं श्रुतिसंस्थिता॥ सर्वलक्षणसम्पन्ना सर्वकामप्रदायिनी। महागौरी सदा पातु मम हृदयं च पादतः॥
साधना से मिलने वाले अलौकिक आध्यात्मिक व भौतिक लाभ
शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि जो साधक सच्चे हृदय, पवित्र भाव और निष्ठा से Maa Mahagauri की आराधना करते हैं, उन्हें निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं
समस्त पूर्व संचित पापों का क्षालन: माता के दर्शन और पूजन मात्र से साधक के पूर्वजन्मों के संचित पाप, मल और अज्ञान का नाश हो जाता है और आत्मा निर्मल बन जाती है।
दांपत्य जीवन में अपार मधुरता व शीघ्र विवाह: जिन युवक-युवतियों के विवाह में बाधा आ रही हो, उन्हें सुयोग्य जीवनसाथी मिलता है और पति-पत्नी के बीच प्रेम व सामंजस्य बढ़ता है।
अक्षय धन, वैभव और ऐश्वर्य की प्राप्ति: देवी अन्नपूर्णा का स्वरूप होने के कारण इनके साधक के घर में अन्न और धन के भंडार सदा भरे रहते हैं।
सहस्रार चक्र का जागरण व मानसिक शांति: मन के समस्त तनाव, अवसाद, चिंताएं और भय समाप्त होकर चित्त में दिव्य शांति का वास होता है।
असंभव कार्यों की सुगम सिद्धि: महाअष्टमी के दिन की गई आराधना से रुके हुए कठिन कार्य भी चमत्कारिक रूप से पूर्ण हो जाते हैं।
माँ महागौरी की संपूर्ण आरती
जय महागौरी जगत की माया। तुम ही सब पर करो सुहाया॥ शिव शक्ति का रूप तुम्हारा। तुमने ही जग को विस्तारा॥ श्वेत बैल पर चढ़कर आई। चार भुजाओं वाली माई॥ हाथ त्रिशूल डमरू विराजे। वरद अभय मुद्रा शुभ साजे॥ अष्टमी के दिन जो नर ध्यावे। मनवांछित फल सो नर पावे॥ महादेव को तुमने रीझाया। तप कर गौरवर्ण को पाया॥ पाप ताप सब हरने वाली। भक्तों की झोली भरने वाली॥ कन्या पूजन जो जन करता। उसके सब संकट तू हरता॥ आरती जो कोई प्रेम से गावे। महागौरी के पद रज पावे॥ जय महागौरी जगत की माया। तुम ही सब पर करो सुहाया॥
पूजन का संक्षिप्त सारणी विवरण (Summary Table)
| प्रमुख पहलू | शास्त्रीय विवरण |
|---|---|
| देवी का स्वरूप | श्वेतांबरधरा, चतुर्भुजा (त्रिशूल, डमरू, अभय, वरद), वृषभ (बैल) सवारी, चंद्र जैसी कांति |
| पूजा तिथि 2026 | सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 (आश्विन शुक्ल अष्टमी) |
| विशेष पूजा काल | प्रातःकाल (उदयातिथि अष्टमी) एवं संधि पूजा (10:27 AM से 11:15 AM |
| शुभ रंग | श्वेत (White), क्रीम (Cream), मोरपंखी हरा (Peacock Green) एवं गुलाबी |
| प्रिय भोग | नारियल (श्रीफल / Coconut), नारियल की मिठाई, मखाना खीर |
| प्रिय पुष्प | सफेद कमल, मोगरा, चमेली, कुंद और लाल गुलाब |
| मुख्य मंत्र | “श्वेते वृषे समारूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः…” / “ॐ देवी महागौर्यै नमः” |
| प्रमुख अनुष्ठान | कन्या पूजन (9 कन्याएं + 1 बटुक भैरव) एवं दशांश/सामान्य वैदिक हवन |
| आध्यात्मिक चक्र | सहस्रार चक्र (Crown Chakra) — परम शुद्धि, शांति व मोक्ष |

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