2025

Budh Pradosh Vrat Katha: बुध प्रदोष व्रत कथा, जानें इस व्रत का क्या है लाभ

Budh Pradosh Vrat Katha In Hindi: हर माह की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष तिथि का व्रत किया जाता है। यह व्रत भगवान शिव को समर्पित है। भगवान शिव की कृपा पाने के लिए इस दिन प्रदोष व्रत की कथा अवश्य सुननी चाहिए। बुध प्रदोष व्रत की कथा सुनने और कहने से हर पाप दूर होता है और जीवन में सब मंगल ही मंगल होता है। बुध प्रदोष व्रत कथा: प्रत्येक माह की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष तिथि का व्रत किया जाता है। अगर यह तिथि बुधवार के दिन पड़ती है, तब इसे बुध प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। जिस तरह एकादशी तिथि भगवान विष्णु को प्रिय है, उसी तरह प्रदोष तिथि का व्रत भगवान शिव को प्रिय है। इस दिन प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करके (Pradosh Vrat Katha) बुध प्रदोष व्रत की कथा सुनने व कहने से धन, समृद्धि और आरोग्य की प्राप्ति होती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है। साथ ही सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। बुध प्रदोष व्रत कथा ( Budh Pradosh Vrat Katha ) बुध प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल की जाती है और पूजा के बाद ही भोजन किया जाता है। इस दिन हरे कपड़े पहनना और हरी चीजों का सेवन करना शुभ माना जाता है। सुबह उठकर नित्य क्रम से निवृत होकर विधि विधान के साथ भगवान शिव की पूजा करें। पौराणिक कथा के अनुसार, एक पुरुष की नई नई शादी हुई थी। गौने के बाद दूसरी बार पत्नी को लाने के लिए ससुराल पहुंचा और सास से कहा कि वह Pradosh Vrat Katha बुधवार के दिन पत्नी को लेकर जाएगा। लेकिन सभी लोगों ने कहा कि बुधवार के दिन मायके से ससुराल लेकर जाना सही नहीं है लेकिन वह नहीं माना। बीच सड़क पर हो गई लड़ाई विवश होकर लड़की को भारी मन से विदा कर दिया। पति-पत्नी दोनों बैलगाड़ी में चल दिए। नगर से बाहर निकलते ही पत्नी को प्यास लगी और पति से पानी के लिए कहा। जब पति पानी लेकर आया तो देखा कि किसी पराए पुरुष के लोटे से पत्नी पानी पी रही है और हंस हंसकर बात कर रही है। Pradosh Vrat Katha वह पराया पुरुष बिल्कुल उसकी पति जैसी शक्ल सूरत का था। यह देखकर पति को गुस्सा आया और लड़ाई करना शुरू कर दी। लड़ाई होते देख, वहां भीड़ इकट्ठा हो गई। भगवान शिव से की प्रार्थना Pradosh Vrat Katha इतने में एक सिपाही आया और महिला से पूछा कि सच सच बताओ कि तेरा पति इनमें से कौन सा है। लेकिन महिला दोनों पुरुषों की एक जैसी शक्ल होने की वजह से अपनी पति को पहचान ही नहीं पाई। महादेव ने उस पुरुष की प्रार्थना स्वीकार कर ली और उसी क्षण वह अन्य पुरुष अचानक से गायब हो गया। भगवान शिव के आशीर्वाद से वह पुरुष अपनी पत्नी के साथ सकुशल अपने घर पहुंच गया। इसके बाद से दोनों पति-पत्नी नियमपूर्वक बुधवार प्रदोष व्रत करने लगे। बोलो भगवान शिव की जय। माता पार्वती की जय। भगवान गणेश की जय, भगवान कार्तिकेय की जय।

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Budha Pradosh Vrat 2025: सावन महीने में कब है बुध प्रदोष व्रत? नोट करें शुभ मुहूर्त

Budha Pradosh Vrat: प्रदोष व्रत के दिन देवों के देव महादेव की पूजा एवं भक्ति करने से साधक की हर एक मनोकामना पूरी होती है। साथ ही जीवन में व्याप्त सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है। इस दिन पूजा करने के बाद दान करने का भी विधान है। माह की त्रयोदशी तिथि का प्रदोष काल मे होना, (Budha Pradosh Vrat) प्रदोष व्रत होने का सही कारण है। प्रदोष का दिन जब साप्ताहिक दिवस सोमवार को होता है उसे सोम प्रदोष कहते हैं, मंगलवार को होने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष तथा शनिवार के दिन प्रदोष को शनि प्रदोष कहते हैं। वैसे तो त्रयोदशी तिथि ही भगवान शिव की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ है। परंतु प्रदोष के समय शिवजी की पूजा करना और भी लाभदायक है। ध्यान देने योग्य तथ्य: प्रदोष व्रत एक ही देश के दो अलग-अलग शहरों के लिए अलग हो सकते हैं। चूँकि प्रदोष व्रत सूर्यास्त के समय, त्रयोदशी के प्रबल होने पर निर्भर करता है। तथा दो शहरों का सूर्यास्त का समय अलग-अलग हो सकता है, इस प्रकार उन दोनो शहरों के प्रदोष व्रत का समय भी अलग-अलग हो सकता है। नातन धर्म में त्रयोदशी तिथि का खास महत्व है। यह दिन महादेव को प्रिय है। कहते हैं कि त्रयोदशी तिथि पर भगवान शिव की पूजा करने वाले साधक को जीवन में किसी चीज की कमी नहीं होती है। साथ ही पृथ्वी लोक पर स्वर्ग समान सुखों की प्राप्ति होती है। साधक श्रद्धा भाव से त्रयोदशी तिथि पर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करते हैं। आइए, बुध प्रदोष व्रत की सही डेट एवं शुभ मुहूर्त जानते हैं- बुध प्रदोष व्रत (Budha Pradosh Vrat 2025 Kab Hai) प्रदोष व्रत का फल दिन अनुसार मिलता है। बुधवार के दिन पड़ने के चलते यह बुध प्रदोष व्रत कहलाता है। Budha Pradosh Vrat बुध प्रदोष व्रत करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही करियर और कारोबार में मनमुताबिक सफलता मिलती है। बुध प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त (Pradosh Vrat Shubh Muhurat) वैदिक पंचांग के अनुसार, सावन माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 06 अगस्त को दोपहर 02 बजकर 08 मिनट पर शुरू होगी। वहीं, 07 अगस्त को त्रयोदशी तिथि दोपहर 02 बजकर 27 मिनट पर समाप्त होगी। प्रदोष व्रत के दिन पूजा का समय शाम 07 बजकर 08 मिनट से लेकर 09 बजकर 16 मिनट तक है। बुध प्रदोष व्रत शुभ योग (Pradosh Vrat Shubh Yog) ज्योतिषियों की मानें तो सावन माह के बुध प्रदोष व्रत पर शिववास योग का संयोग है। इस शुभ अवसर पर देवों के देव महादेव कैलाश पर विराजमान रहेंगे। इसके बाद नंदी की सवारी करेंगे। इस दौरान भगवान शिव की पूजा करने से सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। KARMASU.IN इस लेख में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। 

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Jhulan Yatra 2025 Date: झूलन उत्सव: भक्ति, प्रेम और रास की झलक

Jhulan Yatra: झूलन यात्रा भगवान श्री कृष्ण के अनुयायियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है जो श्रावण के महीने में मनाया जाता है। यह त्योहार जुलाई-अगस्त की अवधि में आता है। यह वैष्णवों का सबसे बड़ा और सबसे लोकप्रिय धार्मिक अवसर है। Jhulan Yatra सजे-धजे झूलों, गीत और नृत्य के शानदार प्रदर्शन के लिए जाना जाने वाला, झूलन भारत में बारिश के मौसम में उत्साह के साथ मिलकर राधा कृष्ण के प्यार का जश्न मनाने वाला एक आनंदमय त्योहार है। झूलन उत्सव श्रावण Jhulan Yatra (अगस्त) माह में शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। यह उत्सव श्रीकृष्ण की अपने मित्रों, नन्हे ग्वाल-बालों के साथ वृक्षों के नीचे झूला झूलने की बाल लीलाओं के स्मरण में मनाया जाता है। झूलन यात्रा 2025, 5 अगस्त से 9 अगस्त तक मनाई जाएगी। यह त्योहार भगवान कृष्ण और भगवान जगन्नाथ को समर्पित है Jhulan Yatra और श्रावण (अगस्त) महीने में शुक्ल पक्ष की एकादशी से पूर्णिमा तक मनाया जाता है। इस दौरान, भगवान की मूर्तियों को झूले में झुलाया जाता है, और मंदिरों और घरों में विशेष पूजा और उत्सव होते हैं। प्रतिदिन  श्री राधा कृष्णचंद्र के विग्रहों को विविध आभूषणों से सुसज्जित किया जाता है और Jhulan Yatra फूलों से सजे झूले पर धीरे-धीरे झुलाया जाता है। मुख्य मंदिर प्रांगण को फूलों और झालरों से सुंदर ढंग से सजाया जाता है। श्री कृष्णचंद्र और श्रीमती राधा रानी के विग्रहों को भव्य रूप से सुसज्जित किया जाता है और उन्हें विभिन्न प्रकार के सुंदर फूलों से सजे झूले में विराजमान किया जाता है। भक्तों द्वारा मधुर कीर्तन के साथ विग्रहों की विशेष आरती की जाती है। Jhulan Yatra आरती के बाद, भक्तों को झूले को झुलाने और अपने स्वामी की प्रत्यक्ष व्यक्तिगत सेवा करने का अवसर मिलता है। झूलन यात्रा का इतिहास:History of Jhulan Yatra झूलन यात्रा की जड़ें वैष्णव धर्म में, विशेषकर भगवान कृष्ण की लीलाओं में गहराई से निहित हैं। वृंदावन में राधा और गोपियों के साथ भगवान कृष्ण की शरारतपूर्ण बातचीत ने इस उत्सव को प्रेरित किया।  हिंदू श्रद्धालु सदियों से इस त्यौहार को मनाते आ रहे हैं और इसका उल्लेख विभिन्न हिंदू धर्मग्रंथों और काव्य रचनाओं में भी मिलता है।  भागवत पुराण, हरिवंश और हरि भक्ति विलास जैसे ग्रंथ, वृंदावन में कृष्ण की दिव्य लीलाओं का वर्णन करते हैं। इन ग्रंथों में वर्णन किया गया है कि किस प्रकार राधा और कृष्ण अपने साथियों के साथ सावन के दौरान झूला झूलने का आनन्द लेते थे। यह त्यौहार कृष्ण के प्रेमपूर्ण आदान-प्रदान और वर्षा ऋतु की सुंदरता का प्रतीक है, जिसने पीढ़ियों से कवियों और संगीतकारों को प्रेरित किया है। संत-कवि जयदेव द्वारा रचित गीत गोविंद में भी राधा के प्रति कृष्ण के प्रेम का सार प्रस्तुत किया गया है, जिसमें प्रायः उनकी दिव्य लीला की तुलना प्रकृति की लय से की गई है, जिसमें मानसूनी हवा का झूमना भी शामिल है। झूलन यात्रा वृंदावन, मथुरा और पुरी जैसे स्थानों में एक महत्वपूर्ण त्योहार बन गया, जहां कृष्ण की पूरी तरह से पूजा की जाती है।  मंदिरों में सदियों से भव्य सजावट, भक्ति गीत या भजन, राधा कृष्ण की आरती के साथ इसे मनाया जाता रहा है। झूलन यात्रा समारोह:Jhulan Yatra Festival यह भारत के कई भागों में मनाया जाता है, विशेषकर मथुरा, वृंदावन, मायापुर, पुरी और विश्व भर के इस्कॉन मंदिरों में। दुनिया भर से हजारों कृष्ण भक्त इस उत्सव में भाग लेने के लिए उत्तर प्रदेश के मथुरा और वृंदावन तथा पश्चिम बंगाल के मायापुर में एकत्रित होते हैं। श्री रूप-सनातन गौड़ीय मठ, बांके बिहारी मंदिर, वृन्दावन में राधा-रमण मंदिर, मथुरा में द्वारकाधीश मंदिर और मायापुर में इस्कॉन मंदिर जैसे मंदिर भव्य आयोजनों की मेजबानी करते हैं। इस दौरान, राधा और कृष्ण की मूर्तियों को वेदी से बाहर निकाला जाता है और सुंदर ढंग से सजाए गए झूलों पर रखा जाता है, जो कभी-कभी सोने या चांदी से भी बने होते हैं। ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ मंदिर और अन्य धार्मिक स्थलों पर झूलन पूर्णिमा मनाई जाती है, Jhulan Yatra जहां भगवान जगन्नाथ की मूर्ति को धीरे से झुलाया जाता है और भक्तजन गाते, नाचते और संगीत वाद्ययंत्र बजाते हैं। यह उत्सव एक सप्ताह तक चलता है, जो पूर्णिमा की रात तक चलता है। दुनिया भर के इस्कॉन मंदिर भी पाँच दिनों तक झूलन यात्रा मनाते हैं, जिसमें मायापुर इस भव्य उत्सव का केंद्र होता है। राधा और कृष्ण की मूर्तियों को फूलों से सजाया जाता है और मंदिर प्रांगण में एक अलंकृत झूले पर रखा जाता है। भक्तगण खुशी-खुशी बारी-बारी से फूलों की रस्सी से देवताओं को झुलाते हैं, भजन गाते हैं और ‘हरे कृष्ण महामंत्र’ का जाप करते हैं। एक विशेष आरती की जाती है, और भक्तगण पूजा के एक भाग के रूप में ‘भोग’ नामक प्रसाद लाते हैं। इस्कॉन के संस्थापक श्रील प्रभुपाद ने श्रद्धालुओं को झूलन यात्रा को भक्ति और आनंद के साथ मनाने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने प्रतिदिन देवताओं के वस्त्र बदलने, प्रसाद (पवित्र भोजन) चढ़ाने, संकीर्तन में भजन गाने और राधा-कृष्ण को धीरे से झुलाने पर जोर दिया। पुष्टिमार्ग वैष्णव परंपरा में, हिंडोला, एक ऐसा ही झूला उत्सव है, जो मानसून के मौसम में पंद्रह दिनों तक मनाया जाता है। प्रत्येक दिन झूलों को अलग-अलग सामग्रियों से सजाया जाता है, जिससे एक अद्वितीय और देखने में अद्भुत दृश्य बनता है। झूलन यात्रा उत्सव न केवल भक्ति का समय है, बल्कि भगवान कृष्ण के साथ प्रेम, आनंद और आध्यात्मिक संबंध का उत्सव भी है।

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Putrada Ekadashi 2025: संतान प्राप्ति के लिए करें पुत्रदा एकादशी व्रत…

Putrada Ekadashi 2025:इस साल श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि दो दिन होने के कारण असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि किस दिन पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाएगा। जानें सावन पुत्रदा एकादशी की सही तिथि, मुहूर्त, पारण का समय और महत्व.. Sawan Putrada Ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, हर माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी का व्रत रखा जाता है। ऐसे में ही श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाता है। बता दें कि साल में दो बार पुत्रदा एकादशी का व्रत पड़ता है। पहला श्रावण मास में, तो दूसरा पौष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। सावन मास में पड़ने वाले एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। इस एकादशी को पवित्रोपना एकादशी या पवित्र एकादशी के नाम से भी जानते हैं। इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ शिव जी की पूजा की जाएगी। मान्यता है कि पुत्रदा एकादशी के दिन व्रत रखने के साथ पूजा करने से हर एक दुख-दर्द से निजात मिल जाती है। इसके साथ ही संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है। आइए जानते हैं पुत्रदा एकादशी की सही तिथि, मुहूर्त, धार्मिक महत्व से लेकर व्रत के पारण का समय तक… Putrada Ekadashi 2025 Date: 4 या 5 अगस्त, कब है सावन की पुत्रदा एकादशी? जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त, पारण का समय और महत्व.. पुत्रदा एकादशी 2025 का महत्व (Putrada Ekadashi 2024 Significnace) हिंदू पंचांग के अनुसार, साल में कुल 2 बार पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाता है। पहला श्रावण मास और दूसरा पौष मास। श्रावण मास में पड़ने वाली एकादशी का व्रत अगस्त माह में रखा जा रहा है और पौष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी दिसंबर या फिर जनवरी में रखा जाएगा। श्रावण मास में पड़ने वाली पुत्रदा एकादशी के दिन श्री हरि विष्णु के साथ शिव जी की पूजा करने का विधान है। मान्यता है कि इस व्रत रखने से हर तरह के दुख-दर्द से निजात मिल जाती है। इसके साथ ही संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी हो सकती है। इन राशियों पर होगी विशेष कृपा पौष पुत्रदा एकादशी इस बार विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इस दिन शुक्ल योग बनेगा। ये एकादशी शुक्रवार को आएगी, जिससे मां लक्ष्मी की कृपा कुछ राशियों पर विशेष रूप से पड़ेगी। मेष: मेष राशि वालों के लिए यह एकादशी बेहद शुभ साबित होगी। इस दिन रोजगार में तरक्की के योग बन रहे हैं, और जीवन की सारी समस्याएं, खासकर आर्थिक परेशानियां दूर होंगी। बिजनेस में भी लाभ के अवसर मिलेंगे। कर्क: कर्क राशि वालों के लिए पौष पुत्रदा एकादशी बहुत ही लाभकारी मानी जा रही है। इस दिन वे किसी नए कार्य की शुरुआत कर सकते हैं, जिससे उन्हें लाभ मिलेगा और आर्थिक स्थिति में सुधार होगा। तुला:तुला राशि के लोगों के जीवन में इस एकादशी से खुशियों की शुरुआत होगी। पारिवारिक समस्याएं समाप्त होंगी और सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। यह समय उनके लिए बहुत ही शुभ रहेगा। धनु: धनु राशि वालों को पौष पुत्रदा एकादशी से शुभ सूचनाएं मिल सकती हैं। धन लाभ के साथ आय में वृद्धि के योग बन रहे हैं, जिससे आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। मीन: मीन राशि वाले इस दिन अपने परिवार के साथ अच्छा समय बिताएंगे। उनकी सेहत भी बेहतर रहेगी और आर्थिक लाभ के नए अवसर प्राप्त होंगे। बिजनेस में मेहनत करने से फायदा होगा। श्री विष्णु मंत्र (Vishnu Mantra) ॐ नमो भगवते वासुदेवाय || क्लेश नाशक श्री विष्णु मंत्र:कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः। विष्णु गायत्री मंत्र:नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि ।तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥

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Putrada Ekadashi 2025 Date: 4 या 5 अगस्त, कब है सावन की पुत्रदा एकादशी? जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त, पारण का समय और महत्व..

Putrada Ekadashi Shubh MUhurat: हर साल दो बार पुत्रदा एकादशी आती है , पहली श्रावण मास में और दूसरी पौष मास में, लेकिन सावन में पड़ने वाली पुत्रदा एकादशी का विशेष महत्व होता है। आइए जानते हैं इस वर्ष पुत्रदा एकादशी की तिथि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व।  Sawan Putrada Ekadashi 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, हर माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु को समर्पित एकादशी का व्रत रखा जाता है। ऐसे में ही श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा जाता है। बता दें कि साल में दो बार पुत्रदा एकादशी का व्रत पड़ता है। पहला श्रावण मास में, तो दूसरा पौष महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। सावन मास में पड़ने वाले एकादशी व्रत का विशेष महत्व है। इस एकादशी को पवित्रोपना एकादशी या पवित्र एकादशी के नाम से भी जानते हैं। Putrada Ekadashi इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ शिव जी की पूजा की जाएगी। मान्यता है कि पुत्रदा एकादशी के दिन व्रत रखने के साथ पूजा करने से हर एक दुख-दर्द से निजात मिल जाती है। इसके साथ ही संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है। आइए जानते हैं पुत्रदा एकादशी की सही तिथि, मुहूर्त, धार्मिक महत्व से लेकर व्रत के पारण का समय तक… हर साल दो बार Putrada Ekadashi पुत्रदा एकादशी आती है ,  पहली श्रावण मास में और दूसरी पौष मास में, लेकिन सावन में पड़ने वाली पुत्रदा एकादशी, जिसे पवित्रोपना एकादशी भी कहा जाता है, का विशेष महत्व होता है। आइए जानते हैं इस वर्ष पुत्रदा एकादशी की तिथि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और व्रत के पारण का सही समय, ताकि आप भी इस पावन व्रत से पूर्ण फल प्राप्त कर सकें। सावन पुत्रदा एकादशी तिथि: Sawan Putrada Ekadashi Tithi श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि आरंभ – 04 अगस्त 2025 , प्रातः  11:41 से श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि समाप्त – 05 अगस्त 2025, दोपहर 01:12 पर उदयातिथि के अनुसार सावन पुत्रदा एकादशी 5 अगस्त 2025 को मानी  जाएगी।  सावन पुत्रदा एकादशी 2025 मुहूर्त: Sawan Putrada Ekadashi 2025 Muhurta पूजन का ब्रह्म मुहूर्त – प्रातः 04:20 से प्रातः 05:02 बजे तकरवि योग – प्रातः 05:45 से प्रातः11:23 बजे तक अभिजित मुहूर्त- दोपहर 12:00 बजे से दोपहर 12:54 बजे तक सायंकाल पूजन मुहूर्त – सायं 07:09 बजे से सायं 07:30 बजे तक श्रावण पुत्रदा एकादशी पारण का समय: Time of Shravan Putrada Ekadashi Paran सावन Putrada Ekadashi पुत्रदा एकादशी के अगले दिन यानी 6 अगस्त को प्रातः  5 : 45 मिनट से 8 : 26 मिनट तक व्रत का पारण कर सकते हैं। पारण के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय दोपहर 02:08 मिनट पर है। पुत्रदा एकादशी का महत्व : Importance of Putrada Ekadashi हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष स्थान है, और जब बात पुत्रदा एकादशी की हो, तो इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। इस व्रत को हर साल दो बार रखा जाता है। पहली बार श्रावण मास में और दूसरी बार पौष मास में। श्रावण महीने में पड़ने वाली पुत्रदा एकादशी का आयोजन इस वर्ष अगस्त में होगा, जबकि पौष मास की पुत्रदा एकादशी दिसंबर या जनवरी में पड़ सकती है। श्रावण की पुत्रदा एकादशी को पवित्रोपना एकादशी भी कहा जाता है और इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा का विधान है। इसके साथ ही इस एकादशी पर भगवान शिव की आराधना करने से भी विशेष पुण्य प्राप्त होता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखते हैं, उन्हें संतान सुख की प्राप्ति, पारिवारिक खुशियाँ और जीवन के कष्टों से मुक्ति मिलती है। यह व्रत विशेष रूप से उन दंपतियों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है जो संतान प्राप्ति की कामना रखते हैं। पुत्रदा एकादशी पर करें इन मंत्रों का जाप :Chant these mantras on Putrada Ekadashi श्री विष्णु मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय || क्लेश नाशक श्री विष्णु मंत्रकृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः | विष्णु गायत्री मंत्रनारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि । तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ॥ डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN नहीं है।

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What Is The Right Way to worship :पूजा करने का सही तरीका क्या है?

What Is The Right Way to worship: अगर आप गलत विधि और नियमों के साथ worship पूजा करते हैं तो इसका बहुत बुरा परिणाम भुगतना पड़ता है। चलिए जानते हैं पूजा करने का सही तरीका क्या है, साथ ही जानिए पूजा खड़े होकर करनी चाहिए या बैठकर। Puja Vidhi Niyam in Hindi: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ का विशेष महत्व होता है। कहा जाता है कि इसमें इतनी शक्ति होती है कि ये सभी मनोकामना पूरी कर सकती है। वहीं वास्तु में भी इसको लेकर कई नियम बताए गए हैं जिनका पालन करना बेहद जरूरी होता है, तभी पूजा संपूर्ण मानी जाती है। हालांकि जाने-अनजाने में कुछ लोग पूजा के दौरान कई तरह की गलतियां कर बैठते हैं। जिसकी वजह से उन्हें पूजा का फल नहीं मिल पाता और पूजा अधूरी रह जाती है। ऐसे में अगर आप गलत विधि और नियमों के साथ पूजा करते हैं तो इसका बहुत बुरा परिणाम भुगतना पड़ता है। चलिए जानते हैं पूजा करने का सही तरीका क्या है, साथ ही जानिए पूजा खड़े होकर करनी चाहिए या बैठकर।  Puja Kaise Karni Chahiye: बैठकर या खड़े होकर, कैसे करें पूजा?  मान्यताओं के अनुसार, घर के मंदिर में कभी भी खड़े होकर worship पूजा नहीं करनी चाहिए। क्योंकि खड़े होकर पूजा करना शुभ नहीं माना जाता है साथ ही कोई लाभ भी नहीं मिलता। इसलिए घर पर पूजा-पाठ के दौरान खड़े होकर पूजा न करें।  इस बात का भी ध्यान रखें कि जब भी आप पूजा-पाठ करें तो पहले फर्श पर आसन जरूर बिछाएं और इस पर बैठकर ही पूजा करें। इस बात का भी ध्यान रखें कि कभी भी बिना सिर ढके पूजा नहीं करनी चाहिए। स्त्री हो या पुरुष पूजा करते समय हमेशा सिर को ढक कर ही रखें।   What is the correct method of worship: क्या है पूजा करने की सही विधि?  वास्तु शास्त्र के अनुसार पूजा के दौरान अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए और अपने दाहिने ओर घंटी, धूप, दीप, अगरबत्ती आदि रखनी चाहिए। इस दिशा में मुख करके पूजा-अर्चना करना श्रेष्ठ माना जाता है। क्योंकि पूर्व दिशा शक्ति व शौर्य की प्रतीक है। इस दिशा में पूजा स्थल होने से घर में रहने वालों को शांति, सुकून, धन, प्रसन्नता और स्वास्थ लाभ मिलता है वास्तु शास्त्र के अनुसार, पूजा के दौरान अपनी बाईं ओर पूजन सामग्री जैसे फल फूल, जल का पात्र और शंख रखना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि इस तरह पूजा करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। इस बात का भी ध्यान रखें कि worship पूजा करते समय अपने माथे पर तिलक जरूर लगाएं।  घर में पूजा स्थल हमेशा उत्तर-पूर्व दिशा में बनाना चाहिए। वास्तु में इस दिशा को शुभ माना जाता है। इस दिशा में पूजा स्थल होने से घर में रहने वालों को शांति, सुकून, धन, घर के भीतर पूजा घर बनवाते समय इस बात का भी ध्यान रखें कि इसके नीचे या ऊपर या फिर अगल-बगल शौचालय नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही भूलकर भी घर की सीढ़ी के नीचे पूजा घर नहीं बनाना चाहिए। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है।) 

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Shravan Ashtami Vrat 2025 Date: कब है सावन की दुर्गाष्टमी, यहां जानिए मां दुर्गा की पूजा की विधि और शुभ मुहूर्त

Shravan Ashtami Vrat : सावन माह में केवल एक ही दुर्गाष्टमी आती है और इस दिन विधि विधान से मां दुर्गा की पूजा और व्रत करने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं. Sawan Durga Ashtami Date : सावन माह (sawan) में शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को दुर्गाष्टमी (Sawan Durga Ashtami) का व्रत किया जाता है. आपको बता दें कि सावन माह में केवल एक ही दुर्गाष्टमी आती है और इस दिन विधि विधान से मां दुर्गा की पूजा और व्रत करने से समस्त मनोकामनाएं पूरी होती हैं. ऐसे में चलिए जानते हैं कि सावन माह में दुर्गा अष्टमी कब पड़ रही है, साथ ही जानेंगे पूजा (Durga Ashtami puja) का शुभ मुहूर्त और उसकी विधि. हिन्दू पंचांग के अनुसार हर माह शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को दुर्गा अष्टमी का व्रत किया जाता है। इस दिन देवी दुर्गा के भक्त उनकी पूजा करते हैं और पूरे दिन उपवास रखते हैं। हिंदू धर्म में इसका विशेष महत्व है, कहा जाता है कि मां दुर्गा के सभी रूपों की व्यवस्थित तरीके से पूजा करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। मासिक दुर्गाष्टमी को मास दुर्गाष्टमी या Ashtami Vrat मासिक दुर्गाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। आइए जानते हैं इस मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत के महत्व और मान्यताओं के बारे में: Shravan Ashtami Vrat 2025 Date: कब है सावन की दुर्गाष्टमी दुर्गाष्टमी पूजा मुहूर्त जुलाई 2025 – Durgashtami Puja Muhurat July 2025 1 अगस्त 2025, शुक्रवार को अष्टमी तिथि है। यह आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि है, जिसे Ashtami Vrat मासिक दुर्गाष्टमी के रूप में भी जाना जाता है।  1 अगस्त 2025 को, पंचांग के अनुसार, अष्टमी तिथि 31:23 तक रहेगी। मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत का महत्व:Importance of monthly Durga Ashtami fast ऐसे में इस दिन देवी दुर्गा का व्रत करने से जगदंबा माता की कृपा प्राप्त होती है.भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं। घर में सुख-समृद्धि आती है, सुख-समृद्धि आती है, धन-लक्ष्मी आती है। 2025 में पड़ने वाली मासिक दुर्गा अष्टमी तिथियां:Monthly Durga Ashtami dates falling in 2025: शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धालु शारदा दुर्गा की पूजा कर व्रत भी रखते हैं। Ashtami Vrat अष्टमी पूजा आप पूजा के समय के बीच में कभी भी कर सकते हैं। दुर्गा अष्टमी पूजा विधि: Durga Ashtami Puja Method दुर्गा अष्टमी के दिन सुबह उठकर गंगाजल डालकर स्नान करें।लकड़ी का पाठ लें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं।फिर मां दुर्गा के मंत्र का जाप करते हुए उनकी प्रतिमा या फोटो स्थापित करें।लाल या उधल के फूल, सिंदूर, अक्षत, नैवेद्य, सिंदूर, फल, मिठाई आदि से मां दुर्गा के सभी रूपों की पूजा करें।फिर धूप-दीप जलाकर दुर्गा चालीसा का पाठ करें और आरती भी करना न भूलें।इसके बाद हाथ जोड़कर उनके सामने अपनी इच्छाएं रखें।

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Vilakku Puja Date 2025: विलक्कु पूजा विधि, महत्त्व और लाभ

Vilakku Puja: विलक्कु पूजा, भाग्य और समृद्धि की देवी महालक्ष्मी का प्रतीक है। एक समय में बड़ी संख्या में महिलाओं द्वारा सामूहिक रूप से महालक्ष्मी की पूजा दीप जलाकर किया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि आती है और दुनिया में शांति आती है। थिरु विलक्कु पूजा, ज्यादातर शुक्रवार को या तो सुबह या शाम को दीपक जलाकर की जाती है। यह मुख्य रूप से तमिल महीनों, चिथिरई और वैगासी के दौरान की जाती है, और यह पवित्र दीप पूजा अमावस और पूर्णिमा के दिनों में भी की जा सकती है। Vilakku Puja : विलक्कु पूजा विलक्कु पूजा में एक पारंपरिक दीपक (कुथु विलक्कु) को सजाकर, उसमें घी या तिल का तेल भरकर, दीपक जलाया जाता है। यह पूजा घर में या मंदिर में एकल या सामूहिक रूप से की जा सकती है। विशेष अवसरों पर, 108 या 1008 दीपकों के साथ सामूहिक पूजा का आयोजन भी होता है। Vilakku Puja Kya Hota Hai: कुथु विलक्कू क्या होता है? कुथु विलक्कू का मतलब है खड़ा हुआ तेल का दीपक, जो कि अज्ञानता को दूर करने और हमारे भीतर दिव्य प्रकाश के जागरण का प्रतीक है। Vilakku Puja 2025 Dates: विलक्कु पूजा 2025 की तिथियाँ विलक्कु पूजा मुख्यतः शुक्रवार को की जाती है, और 2025 में इसकी प्रमुख तिथियाँ निम्नलिखित हैं:​ 108 पोत्री (स्तुति) विलक्कु पूजा के दौरान 108 पोत्री का पाठ किया जाता है, जिसमें देवी की विभिन्न रूपों में स्तुति की जाती है। यह पाठ श्रद्धा और भक्ति के साथ किया जाना चाहिए। विलक्कु पूजा एक सरल और प्रभावशाली पूजा विधि है जो देवी लक्ष्मी और शक्ति की आराधना के माध्यम से जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाती है। इस पूजा को नियमित रूप से करने से घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति मिलती है। Who performs Vilakku puja?: विलक्कु पूजा कौन करता है? दक्षिण भारत – तमिलनाडु में, अधिकांश गृहिणियां इस तिरुविलक्कू पूजा को 108 जाप के साथ घर पर नियमित रूप से करतीं हैं। दीपक की मंद-मंद चमक मंदिर तथा मंदिर के कमरे को रोशन करती है, जिससे वातावरण शुद्ध और निर्मल रहता है। Why is Vilakku puja performed?: विलक्कु पूजा क्यों की जाती है? दक्षिण भारतीय हिंदुओं के घरों में थिरु-विलक्कू प्रतिदिन जलाया जाता है, क्योंकि थिरु-विलक्कू को माँ महालक्ष्मी का रूप माना जाता है, जो भाग्य और धन की देवी हैं। दिव्य मां लक्ष्मी देवी की कृपा पाने के लिए महिला भक्तों द्वारा थिरुविलक्कू पूजा की जाती है। यह पूजा परिवार के सदस्यों की भलाई के लिए की जाती है और यह प्रत्येक सदस्य के लिए अच्छाई लाती है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग ईमानदारी से मंदिरों में दीया जलाकर थिरु विलक्कू पूजा करते हैं, मां महालक्ष्मी भी उस शुभ कार्यक्रम में उपस्थित होंगी, और वह दीप पूजा में भाग लेने वालों को आशीर्वाद देती हैं। How to perform Vilakku puja?: विलक्कु पूजा कैसे करें? पूजा की विधि 1. पूर्व तैयारी 2. दीपक की स्थापना 3. पूजा की प्रक्रिया प्रदक्षिणा और नमस्कार: दीपक के चारों ओर तीन बार घूमकर नमस्कार करें। दीप प्रज्वलन: दीपक में तेल या घी भरकर बाती जलाएं। मंत्रोच्चार: “ॐ महालक्ष्म्यै नमः” या अन्य देवी मंत्रों का जाप करें। अर्चना: फूल, कुमकुम, चंदन अर्पित करें और 108 पोत्री (स्तुति) का पाठ करें। नैवेद्य अर्पण: देवी को नैवेद्य अर्पित करें। आरती: कपूर जलाकर देवी की आरती करें।

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Vinayak chaturthi 2025 Date: कब है विनायक चतुर्थी? यहां जानें शुभ मुहूर्त और योग

Vinayak chaturthi 2025: किसी भी नए काम की शुरुआत से पूर्व भगवान गणेश की पूजा की जाती है। मान्यता है कि गजानन की उपासना से जीवन की सभी समस्याएं और बाधाएं दूर होती हैं।  Vinayak chaturthi 2025: किसी भी नए काम की शुरुआत से पूर्व भगवान गणेश की पूजा की जाती है। मान्यता है कि गजानन की उपासना से जीवन की सभी समस्याएं और बाधाएं दूर होती हैं। इसके अलावा व्यक्ति को व्यापार में भी लाभ मिलता है। शास्त्रों में गणेश जी को बुद्धि के देवता कहा गया है, इसलिए उनकी कृपा से साधक की बुद्धि का विकास होता है और करियर में अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं। वहीं विनायक चतुर्थी पर उन्हें केवल मोदक का भोग लगाने से वह प्रसन्न होते हैं। बता दें, विनायक चतुर्थी हर माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाई जाती हैं। इस तिथि पर उपवास रखने से संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत व सुख के योग बनते हैं। आषाढ़ माह में 28 जून 2025 को विनायक चतुर्थी का व्रत रखा जा रहा है। इस तिथि पर पुष्य नक्षत्र और हर्षण योग बना हुआ है। ऐसे में आइए इस दिन की पूजा विधि को जानते हैं। कब है विनायक चतुर्थी: Kab Hai: Vinayak chaturthi Vinayak chaturthi हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन विनायक चतुर्थी मनाई जाती है। इस साल 24 जुलाई को हरियाली अमावस्या है। वहीं, हरियाली अमावस्या या सावन अमावस्या के चार दिन बाद विनायक चतुर्थी मनाई जाती है। इस शुभ अवसर पर भगवान गणेश की पूजा की जाती है। विनायक चतुर्थी शुभ मुहूर्त (Vinayaka Chaturthi 2025 Shubh Muhurat) वैदिक पंचांग के अनुसार, 27 जुलाई को देर रात 10 बजकर 41 मिनट पर सावन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी की शुरुआत होगी। वहीं, 28 जुलाई को देर रात 11 बजकर 24 मिनट पर सावन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का समापन होगा। Vinayak chaturthi सनातन धर्म में सूर्योदय से तिथि की गणना की जाती है। इसके लिए 28 जुलाई को विनायक चतुर्थी मनाई जाएगी। विनायक चतुर्थी शुभ योग (Vinayaka Chaturthi 2025 Shubh Yog) सावन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। इन योग में शिव परिवार की पूजा की जाएगी। इस शुभ अवसर पर परिघ, हर्षण और रवि योग का संयोग बन रहा है। हर्षण योग का संयोग रात भर है। वहीं, रवि योग शाम 05 बजकर 35 मिनट तक है। इन योग में भगवान गणेश की पूजा करने से साधक के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होगी। Vinayak chaturthi 2025 Puja vidhi: विनायक चतुर्थी पूजा विधि

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Sawan Amavasya 2025: कब पड़ेगी सावन महीने की अमावस्या? जानें इस दिन किन कामों की है सख्त मनाही

Sawan Amavasya 2025: श्रावण मास की अमावस्या पर कुंडली और जीवन से जुड़े तमाम तरह के दोषों को दूर करने के लिए पूजा के कौन से उपाय प्रभावी माने गये हैं? इस दिन किस कार्य को करना और किस कार्य को भूलकर भी नहीं करना चाहिए, जानने के लिए पढ़ें ये लेख. Sawan Amavasya 2025 Date: पवित्र श्रावण मास को शिव की साधना के लिए सबसे उत्तम माना गया है. इस मास में तमाम पर्वों के साथ जो अमावस्या पड़ती है, उसे हरियाली अमावस के नाम से जाना जाता है. अमावस्या तिथि को मंत्र सिद्धि, पितृ कार्य और स्नान-दान आदि के लिए फलदायी माना गया है. पंचांग के अनुसार श्रावण मास की अमावस्या तिथि इस साल 24 जुलाई को प्रात:काल 02:28 बजे से प्रारंभ होकर 25 जुलाई 2025 को पूर्वाह्न 12:40 बजे तक रहेगी. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार स्नान-दान और पितृपूजा आदि कार्य के लिए 24 जुलाई 2025 को ही अमावस्या मान्य होगी. आइए जानते हैं कि श्रावण अमावस्या के दिन शुभ फल की प्राप्ति के लिये क्या करना और अशुभ फल से बचने के लिए क्या नहीं करना चाहिए.  Sawan Amavasya 2025: कब पड़ेगी सावन महीने की अमावस्या सावन अमावस्या शुभ योग: Sawan Amavasya Auspicious Yoga Sawan Amavasya 2025: ज्योतिषियों की मानें तो हरियाली अमावस्या पर हर्षण योग समेत कई मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। इनमें गुरु पुष्य योग, अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और शिववास योग प्रमुख हैं। इन योग में देवों के देव महादेव और मां पार्वती की पूजा करने से साधक की हर एक मनोकामना पूरी होगी। साथ ही सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति मिलेगी। श्रावण अमावस्या में क्या न करें: What not to do in Shravan Amavasya सनातन परंपरा में न सिर्फ श्रावण बल्कि अन्य मासों में भी पड़ने वाली अमावस्या को लेकर कुछेक नियम बताए गये है. जैसे अमावस्या के दिन शुभ कार्यों को करने की मनाही है. ऐसे में इस दिन किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य से बचें. इस दिन व्यक्ति लंबे समय से वीरान और बंद पड़े अंधेरे स्थान पर नहीं जाना चाहिए. Sawan Amavasya 2025 इसी प्रकार अमावस्या के दिन किसी का प्रयोग हुआ कपड़े, जूते अथवा अन्य कोई सामान नहीं लेना चाहिए. अमावस्या के दिन व्यक्ति को किसी के साथ वाद-विवाद से बचना चाहिए. शास्त्रों में अमावस्या के दिन केश और नाखून काटने की भी मनाही है.  श्रावण अमावस्या में क्या करें:What to do in Shravan Amavasya Sawan Amavasya 2025 : श्रावण अमावस्या के दिन नदी अथवा सरोवर तीर्थ आदि पर स्नान-ध्यान और दान करना अत्यंत ही पुण्यदायी माना गया है.  श्रावण मास की अमावस्या पर पेड़-पौधे लगाना तथा दान करना अत्यंत ही शुभ माना गया है. ऐसे में इस​ दिन आप अपने पितरों की याद में पौधे लगाकर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं.  यदि आपकी कुंडली में पितृ दोष है तो पितरों के लिए श्राद्ध तथा उनके नाम से जरूरतमंद लोगों को धन और अन्न आदि का दान करना चाहिए.  श्रावण मास की अमावस्या के दिन गाय को चारा खिलाएं तथा उनकी सेवा करें. श्रावण अमावस्या के दिन खराब सामान घर से निकाल कर पूरे घर में दीये आदि से प्रकाश करना चाहिए. इस दिन घर के मुख्य द्वार पर दीया जरूर जलाएं.  कुंडली में कालसर्प दोष के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए श्रावण अमावस्या के दिन विधि-विधान से रुद्राभिषेक करें. 

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Sawan Shivratri 2025

Sawan Shivratri 2025: सावन शिवरात्रि पर भद्रावास योग, जलाभिषेक और पूजा के लिए चार पहर का समय जान लें

Sawan Shivratri 2025: सावन मास की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन जो भोले बाबा पर जल अर्पित करता है, उसकी भोलेबाबा सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।   Sawan Shivrati 2025 Jalabhishek time: सावन मास की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिन जो भोले बाबा पर जल अर्पित करता है, उसकी भोलेबाबा सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। Sawan Shivratri 2025 इस बार सावन शिवरात्रि ग्रहों का उत्तम संयोग रहेगा। इस समय गुरु मिथुन राशि में है, सूर्य कर्क राशि में शनि मीन राशि में हैं और शुक्र कर्क राशि में है। इसके अलावा ग्रहों के कारणइस दिन सर्वार्थ सिद्धि, गजकेसरी, नवपंचम राजयोग बन रहे हैं। इसके अलावा शिवरात्रि पर भद्रावास योग भी रहेगा। सावन शिवरात्रि पर भद्रा का समय सुबह 5:37 बजे से दोपहर 3:31 बजे तक रहेगा। Sawan Shivratri 2025 वैसे तो सावन के पूरे महीने में भगवान शिव की विशेष पूजा अर्चना की जाती है, लेकिन शिवरात्रि परशिवभक्त शिवालयों में जलाभिषेक कर शिव की पूजा अर्चना में करते हैं। Sawan Shivratri 2025: इस साल शिवरात्रि का पर्व 23 जुलाई बुधवार को मनाया जाएगा। इस साल सावन शिवरात्रि की शुरुआत 23 जुलाई को सुबह 4 बजकर 39 मिनट पर होगी। यह तिथि अगले दिन, यानी 24 जुलाई को अर्धरात्रि में 2 बजकर 24 मिनट पर समाप्त होगी।ऐसे में श्रद्धालु शिवरात्रि पर ब्रह्म मुहूर्त में भगवान शिव का जलाभिषेक कर सकते हैं। Sawan Shivratri 2025: सावन शिवरात्रि पर भद्रावास योग Sawan Shivratri 2025 Date: सावन शिवरात्रि की तिथि  सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि आरंभ: 23 जुलाई,  प्रातः  04:39 मिनट परसावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि समाप्त:24 जुलाई,  देर रात 02:28  मिनट पर इस तरह 23 जुलाई को सावन माह की शिवरात्रि मनाई जाएगी। सावन शिवरात्रि का शुभ मुहूर्त:Auspicious time of Sawan Shivratri निशिता काल पूजा समय: 23 जुलाई,  12: 07 मिनट से  12: 48  मिनट तक  भद्रावास योग:  दोपहर 03:31 मिनट तकहर्षण योग: दोपहर 12:35 मिनट से 4 प्रहर का पूजन समय :4 prahar puja time प्रथम प्रहर- सांय  6:59 से रात 9:36 तकद्वितीय प्रहर- रात्रि 9:36 से 12:13 तकतृतीय प्रहर- रात्रि  12:13 से देर रात्रि 2:50 तकचतुर्थ प्रहर-  देर रात्रि  2:50 प्रातः 5:27 तक सावन शिवरात्रि व्रत पारण का समय: Time of breaking of Saavan Shivratri fast सावन शिवरात्रि व्रत पारण : 24 जुलाई 2025, प्रातः 05:27 मिनट से शुरू होगा। सावन शिवरात्रि पर इस विधि से करें पूजा :Worship with this method on Sawan Shivratri सबसे पहले ब्रह्ममुहूर्त में स्नान आदि से निवृत्त होकर मंदिर को स्वच्छ करें।  फिर व्रत का संकल्प लें। अब  गंगाजल, दूध, दही, शहद, घी और शक्कर यानी पंचामृत से शिवलिंग का अभिषेक करें।  इसके उपरांत बेलपत्र, भांग, धतूरा, सफेद फूल, चंदन, फल और धूप-दीप अर्पित करें।  अब भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘महामृत्युंजय मंत्र’ का जाप करें।  संभव हो तो रात्रि जागरण करें।  शिवरात्रि के अगले दिन शुभ मुहूर्त पर व्रत का पारण करें।  शिव प्रार्थना मंत्र:shiva prayer mantra करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं श्रावण वाणंजं वा मानसंवापराधं ।विहितं विहितं वा सर्व मेतत् क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो ॥ शिव नमस्कार मंत्र:Shiva Namaskar Mantra शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शंकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतराय च।।ईशानः सर्वविध्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रम्हाधिपतिमहिर्बम्हणोधपतिर्बम्हा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम।। शिव मूल मंत्र: Shiva Mool Mantra ॐ नमः शिवाय॥ रूद्र मंत्र: Rudra mantra ॐ नमो भगवते रूद्राय । रूद्र गायत्री मंत्र: Rudra Gayatri Mantra ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवायधीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ महामृत्युंजय मंत्र:Mahamrityunjaya Mantra: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए KARMASU.IN उत्तरदायी नहीं है।

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Sawan 2025: जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में होता है ये बड़ा अंतर, जानें पूजा के नियम और महत्त्व

Sawan 2025: श्रावण के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है, जिसे जलाभिषेक कहा जाता है। इसके साथ ही एक अन्य महत्वपूर्ण विधि है रुद्राभिषेक। आइए जानते हैं कि जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में क्या अंतर होता है। Jalabhishek and Rudrabhishek: क्या आप जानते हैं कि जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में क्या फर्क है? जलाभिषेक और रुद्राभिषेक दोनों ही शिवभक्ति के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। Sawan 2025 एक सरल आस्था की अभिव्यक्ति है, तो दूसरा गहराई से जुड़ी वैदिक परंपरा। दोनों का अपना अलग महत्त्व है और शिवजी हर उस श्रद्धा को स्वीकार करते हैं जो सच्चे मन से की जाए। इस लेख में जानिए दोनों पूजाओं की विधि, नियम, महत्व और धार्मिक दृष्टिकोण से इनका महत्व। Sawan 2025 Jalabhishek vs Rudrabhishek: शिवभक्तों के लिए विशेष माने जाने वाले श्रावण मास की शुरुआत इस बार 11 जुलाई 2025 से चुकी है। यह महीना भगवान शिव की पूजा, व्रत, उपवास और कांवड़ यात्रा जैसे अनुष्ठानों के लिए विशेष महत्व रखता है। श्रावण के महीने में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा निभाई जाती है, जिसे जलाभिषेक कहा जाता है। Sawan 2025 इसके साथ ही एक अन्य महत्वपूर्ण विधि है रुद्राभिषेक, जो वैदिक मंत्रों और विशेष सामग्री के साथ किया जाता है। कई बार लोग इन दोनों पूजा विधियों को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों में बड़ा अंतर होता है। आइए जानते हैं कि जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में क्या अंतर होता है Sawan 2025: जलाभिषेक और रुद्राभिषेक में होता है ये बड़ा अंतर क्या होता है जलाभिषेक: What is Jalabhishek? जलाभिषेक का अर्थ है शिवलिंग पर शुद्ध जल अर्पित करना। Sawan 2025 यह सबसे सरल और प्रचलित अभिषेक विधि है, जिसे कोई भी भक्त आसानी से कर सकता है। विशेष रूप से श्रावण मास में भक्तजन सुबह उठकर शिव मंदिर जाते हैं और शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। यह एक सामान्य लेकिन अत्यंत पुण्यदायक पूजा मानी जाती है। जलाभिषेक की विधि: Method of Jalabhishek प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें कांसे या तांबे के लोटे में शुद्ध जल लें “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप करते हुए शिवलिंग पर जल अर्पित करें जल के साथ बेलपत्र, आक, धतूरा और सफेद फूल भी अर्पित करें महत्त्व: importance जलाभिषेक से मन की शुद्धि होती है, पापों का नाश होता है और व्यक्ति में मानसिक शांति आती है। Sawan 2025 यह शिवभक्ति की पहली और सरल सीढ़ी मानी जाती है। क्या होता है रुद्राभिषेक :What is Rudrabhishek? रुद्राभिषेक एक विशेष वैदिक प्रक्रिया है जिसमें ऋग्वेद या यजुर्वेद के रुद्र सूक्त मंत्रों का उच्चारण करते हुए शिवलिंग पर जल, दूध, दही, घी, शहद आदि से अभिषेक किया जाता है। यह पूजा विशेष अवसरों पर ब्राह्मणों द्वारा की जाती है और इसमें मंत्रोच्चारण की विशेष भूमिका होती है। रुद्राभिषेक की विधि: Method of Rudrabhishek शुभ मुहूर्त में पंडित के साथ पूजा आरंभ करें पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से शिवलिंग का अभिषेक करें रुद्र सूक्त, शिवोपासना मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र आदि का उच्चारण करें अंत में आरती, प्रसाद वितरण और शिव चालीसा का पाठ करें महत्त्व: importance रुद्राभिषेक अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। इससे कष्टों का निवारण, ग्रहदोष शांति, स्वास्थ्य लाभ और समृद्धि प्राप्त होती है। विशेष रूप से श्रावण सोमवार, महाशिवरात्रि या जन्मदिन/विवाह के अवसर पर यह करवाना अत्यंत फलदायक होता है। उद्देश्य और प्रक्रिया में महत्वपूर्ण अंतर:Important differences between purpose and process जलाभिषेक और रुद्राभिषेक दोनों ही भगवान शिव की आराधना के प्रभावशाली माध्यम हैं, लेकिन इनकी विधि, उद्देश्य और प्रक्रिया में महत्वपूर्ण अंतर होता है। जलाभिषेक एक सरल प्रक्रिया है जिसमें भक्त केवल शुद्ध जल को शिवलिंग पर अर्पित करता है। यह पूजा कोई भी व्यक्ति बिना पंडित की सहायता के कर सकता है और यह किसी भी दिन की जा सकती है। इसका मुख्य उद्देश्य सरल भक्ति के माध्यम से मन की शुद्धि और शांति प्राप्त करना होता है। वहीं दूसरी ओर, रुद्राभिषेक एक विस्तृत और वैदिक प्रक्रिया है जिसमें विविध पवित्र द्रव्यों जैसे दूध, दही, घी, शहद आदि से शिवलिंग का अभिषेक किया जाता है। इस पूजन में रुद्रसूक्त, महामृत्युंजय मंत्र और अन्य वैदिक मंत्रों का उच्चारण आवश्यक होता है, अतः इसे पंडित की उपस्थिति में ही संपन्न किया जाता है। रुद्राभिषेक विशेष रूप से श्रावण सोमवार, महाशिवरात्रि या किसी विशेष अवसर पर किया जाता है। इसका उद्देश्य विशेष फल की प्राप्ति, ग्रहदोषों की शांति और मानसिक व आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करना होता है।

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