2025

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Shrikrishna Purushottama Siddhanta Upanishad: श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषत्

Shrikrishna Purushottama Siddhanta Upanishad: श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषत् निरञ्जनो निराख्यातो निर्विकल्पो नमो नमः ।पूर्णानन्दो हरिर्मायारहित पुरुषोत्तमः ॥ अष्टावष्टसहस्रे द्वे स्त्रियो जायन्ते पुरुषोत्तमात् । स्मृतिर्जायतेपुरुषोत्तमात् । षट्च्छास्त्राणि जायन्ते पुरुषोत्तमात् । छन्दोजायते पुरुषोत्तमात् । निगमो जायते पुरुषोत्तमात् । प्रजापतिर्जायतेपुरुषोत्तमात् । शशिरवी जायेते पुरुषोत्तमात् । सकलतीर्थानि जायन्तेपुरुषोत्तमात् । परशिवशक्तिर्जायते पुरुषोत्तमात् । ऋषयोऽनृषयोजायन्ते पुरुषोत्तमात् । इन्द्रो जायते पुरुषोत्तमात् । द्वादशादित्यारुद्राः सर्वा देवता ज्जयन्ते पुरुषोत्तमात् । देवा जायन्ते पुरुषोत्तमात् ।सप्त सागरा जायन्ते पुरुषोत्तमात् । सर्व आत्मा जायते पुरुषोत्तमात् ।मनःसर्वेन्द्रियाणि जायन्ते पुरुषोत्तमात् । अष्टादश ब्रह्माण्डानि जायन्तेपुरुषोत्तमात् । अष्टसिद्धिनवनिधयो जायन्ते पुरुषोत्तमात् । वनभाराअष्टादश जायन्ते पुरुषोत्तमात् । अमृतो जायते पुरुषोत्तमात् । अम्भोजायते पुरुषोत्तमात् ॥ ॐ निगमं शङ्करोऽब्रवीत् । गौः । ग्मा । ज्मा । क्ष्मा । क्षा । क्षमा ।क्षोणिः । क्षितिः । अवनिः । उर्वी । पृथ्वी । मही । रिपः । अदितिः ।इला । जीवामकालाशूता (९) “जीवामकालाशूता जीवः” इत्यारभ्य“पुष्प एवेदं सर्वम्” इत्येतत्पर्यन्तं अतीव विकला मातृकेतिसानुतापं यथास्थितं दीयते ऽजीवः जीवा अस्ताजीव्यामं सर्वमायुजीव्याप्तं (?) ।लोदङ्कञ्चनङ्कांञ्चानु अमृतं न भवति (?) पारमधाराणि (परमधर्माणि) जातवेदाः प्रोवाचैवेदं सर्वम् । शिवशक्तिपशुजीवोब्रह्मा भक्तः पशुवत् (?) । यन्नत्यादेव परं श्रत्को परशिवः अन्याअवतारातेहि व्यासवल्लश्रविठलेहरयस्तथा (?) । ललाटे ऊर्ध्वपुण्ड्रंमध्यच्छिद्रं चन्दनतिलकं शुभं हरिमन्दिरं मध्यपद्मंकण्ठेतुलसी शङ्खचक्रं गदा बाहुगोपीचन्दनचर्चनं परंगतिः जीवोत्तमस्य । ब्रह्मा शक्तिर्महादेवो जन्यते पुरुषोत्तमात् ।ॐ आपोऽमृतमर्त्यस्य मर्त्योऽपश्यत् यस्तु जन्यते पुरुषोत्तमात् ।अमृतात् प्राणाश्चाहो मम जायन्ते पुरुषोत्तमात् । मनसि निषण्णः श्रीप्राणायप्रज्ञानाय स्वराट् पुरुषोत्तमः । श्रीकृष्णभगवान् नारायणः परमात्मापुरुषोत्तमः त्रिगुणरहितः स्वयम् । कथम्? पुरुष एवेदं सर्वम् ॥ (वैष्णव-उपनिषदः) इति श्रीकृष्णपुरुषोत्तमसिद्धान्तोपनिषत् समाप्ता ।

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Daslakshan Parva

Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व : आत्मशुद्धि और धर्म की ओर एक आध्यात्मिक यात्रा

Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे आत्मा की शुद्धि और धर्म के दस मूल लक्षणों को आत्मसात करने के लिए मनाया जाता है। यह पर्व आमतौर पर पर्युषण के तुरंत बाद शुरू होता है और लगातार 10 दिनों तक चलता है। इस दौरान जैन अनुयायी आत्म-नियंत्रण, साधना, और तपस्या के माध्यम से अपने भीतर दिव्यता को जाग्रत करने का प्रयास करते हैं। सुगंध दशै – Sugandh Dashain पर्व सुगंध दशै दिन जिनवर पूजै अति हरषाई,सुगंध देह तीर्थंकर पद की पावै शिव सुखदाई ॥ दिगंबर जैन धर्म में सुगंध दशमी का बहुत महत्‍व है। दसलक्षण पर्व के अंतर्गत भाद्रपद शुक्ल पक्ष में आने वाली दशमी के दिन जैन समाज के सभी लोग सुगंध दशमी पर्व मनाते है। Daslakshan Parva इस व्रत को विधिपूर्वक करने से हमारे अशुभ कर्मों का क्षय होकर हमें पुण्‍यबंध, मोक्ष तथा उत्‍तम शरीर प्राप्ति होगी। सुगंध दशमी के दिन पांच पापों यानी हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का त्‍याग करें। सुगंध दशमी के दिन जैन समाज के भक्त जैन मंदिरों में जाकर चौबीस तीर्थंकरों को धूप अर्पित करते हैं और भगवान से प्रार्थना करते हैं, हे भगवान! मैं आपके नाम का ध्यान धरकर मोक्ष प्राप्ति की कामना करता हूं। इससे वायुमंडल अत्यधिक सुगंधमय व स्‍वच्‍छ हो जाता है। दशमी के दिन खास तौर पर सभी मंदिरों में विशेष साज सज्जा के साथ आकर्षक मंडल विधान सजाएं जाते हैं तथा धर्म के बारे में समझाते हुए झांकियों का निर्माण किया जाता है। रात्रि को मदिरों में सुगंध दशमी कथा का वाचन भी किया जाता है। Daslakshan Parva सुगंध दशै को सुगंध दशमी, धूप दशमी तथा धूप दशै के नाम से भी जाना जाता है। सुगंध दशमी का अर्घ्यसुगंध दशमी को पर्व भादवा शुक्ल में,सब इन्द्रादिक देव आय मधि लोक में ।जिन अकृत्रिम धाम धूप खेवै तहां,हम भी पूजत आह्वान करिकै यहां ॥ क्षमा वाणी दिवस – Kshama Vani Diwas पर्युषण के अंतिम दिन अनंत चतुर्दशी का त्यौहार मनाया जाता है। और उसके अगले दिन सभी व्यक्ति एक दूसरे से क्षमा माँगते हैं, यह दिन क्षमा दिवस के नाम से जाना जाता हैं। इसमें सभी जाने अनजाने होने वाली गलतियों के लिए सभी मनुष्य, जीव-जन्तुओ, पशु-पक्षियों से क्षमा मांगता हैं। क्षमा मांगना एवम करना यह दोनों ही धर्मो में श्रेष्ठ माने जाते हैं। Daslakshan Parva: दशलक्षण पर्व 2025 में लगभग 28 अगस्त से शुरू होकर 6–9 सितंबर तक चलेगा (अंतर हो सकता है परंपरा एवं पंचांग के अनुसार)। कृपया सुनिश्चित जानकारी के लिए अपने स्थानीय जैन मंदिर या पंचांग देखें।” गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि क्षमावाणी सन्देश:करबद्ध हैं नमनमित्र सखा सभी जीवंतहो अगर भूल कोई मुझसेतो क्षमाप्रार्थी हूँ मैं सबसेयह अनमोल भेंट देकर मुझेकृतज्ञ करे इस जीवन मैंउत्तम क्षमा दशलक्षण पर्व के दस धर्म लक्षण :Ten religious characteristics of Daslakshan Parva प्रत्येक दिन एक धर्म लक्षण को समर्पित होता है। Daslakshan Parva ये दस लक्षण आत्मा को निर्मल और पवित्र बनाने में सहायक माने जाते हैं पर्व का महत्व :importance of festival दसलक्षण पर्व का इस तरह होता है समापन Dasalakshan festival ends like this अनंत चतुर्दशी के दिन दसलक्षण पर्व Daslakshan Parva का समापन होता है और इस दिन शाम को मंदिर में सभी भक्त जन एक साथ प्रतिक्रमण करते हुए पूरे साल में किये गए पाप और कटू वचन के लिए क्षमा याचना करते हैं। वह हर किसी से दिल से क्षमा मांगते हैं और एक-दूसरे से हाथ जोड कर व गले मिलकर मिच्छामी दूक्कडम कहते हैं, जिसका अर्थ है सबको क्षमा सबसे क्षमा। Daslakshan Parva यहां तक कि उस समय जो लोग उपस्थित नहीं थे, उनसे भी वह दूसरे दिन क्षमा याचना करते हैं। इस तरह दसलक्षण पर्व की समाप्ति होती है।

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Nuakhai

Nuakhai 2025 Date: नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ

Nuakhai 2025 Date:नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव – तिथि, महत्व और परंपराएँ परिचय: नुआखाई (Nuakhai) केवल एक त्योहार नहीं है; यह पश्चिम ओडिशा की आत्मा है, जो कृषि समाज में प्रकृति, कृतज्ञता और एकता का प्रतीक है। ‘नुआ’ का अर्थ है नया और ‘खाई’ का अर्थ है खाना। यह नए चावल का त्योहार है, जहाँ किसान अपनी पहली फसल देवताओं को अर्पित करके आभार व्यक्त करते हैं। यह सिर्फ एक क्षेत्रीय उत्सव नहीं है, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है। नुआखाई का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व: कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि नुआखाई Nuakhai वैदिक युग से जुड़ा हुआ है, जहाँ नए अन्न को अर्पित करने की परंपरा थी। प्राचीन समय में, राजा भी राज्य की एकता और समृद्धि के लिए इस पर्व को मनाते थे, Nuakhai जिससे यह एक बड़े सामाजिक पर्व के रूप में विकसित हुआ। Nuakhai पश्चिम ओडिशा के संबलपुर, बोलंगीर और कालाहांडी जैसे क्षेत्रों में यह एक महत्वपूर्ण सामूहिक उत्सव है। यह भोजन से कहीं बढ़कर, सम्मान और प्रेम का पर्व है, जहाँ मनुष्य प्रकृति और अपनी परंपराओं से जुड़ता है। नुआखाई 2025 की शुभ तिथि और मुहूर्त: नुआखाई के लिए शुभ मुहूर्त का निर्धारण ज्योतिषियों द्वारा किया जाता है। साल 2025 में, माँ समलेश्वरी को नए अन्न की पहली पेशकश के लिए नुआखाई का लग्न 28 अगस्त, गुरुवार को तय किया गया है। • तिथि: भाद्रव शुक्ल पक्ष पंचमी • शुभ मुहूर्त: सुबह 10 बजकर 33 मिनट से 10 बजकर 55 मिनट के बीच। • लग्न: तुला लग्न, मीन राशि में। Nuakhai 2025 Date:नुआखाई 2025: पश्चिम ओडिशा का महान कृषि उत्सव Nuakhai नुआखाई यह मुहूर्त संबलपुर के ब्रह्मपुरा मंदिर परिसर में पंडित मंडली द्वारा निर्धारित किया गया था। निर्धारण के बाद, लग्न पत्र ब्रह्मपुरा मंदिर ट्रस्ट कमेटी के सदस्यों द्वारा मंदिर के पुजारियों को प्रदान किया गया, और फिर माँ समलेश्वरी को अर्पित किया गया। इस लग्न के अनुसार, सबसे पहले माँ समलेश्वरी को नया अन्न अर्पित किया जाएगा, जिसके बाद पूरे पश्चिम ओडिशा में नुआखाई मनाया जाएगा। नुआखाई के मुख्य अनुष्ठान और उत्सव: नुआखाई की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है। घर की साफ-सफाई की जाती है, पारंपरिक व्यंजन जैसे पीठा बनाए जाते हैं, और नए कपड़े खरीदे जाते हैं। 1. पूजा और अन्न अर्पण (नवाखाई अनुकूल मुहूर्त): निर्धारित शुभ मुहूर्त पर, नया अन्न (नवान्न) सबसे पहले देवी समलेश्वरी सहित अन्य देवताओं को अर्पित किया जाता है। यह कृतज्ञता व्यक्त करने का एक पवित्र क्षण होता है, जहाँ यह माना जाता है कि देवता इस शुभ क्षण में प्रसाद स्वीकार करते हैं और वर्ष भर समृद्धि बनी रहती है। 2. परिवार का मिलन: देवताओं को भोग लगाने और प्रार्थना करने के बाद, परिवार के सभी सदस्य एक साथ बैठकर उस प्रसाद को ग्रहण करते हैं। यह परिवार के लिए एकजुट होने और बंधन का एक महत्वपूर्ण क्षण होता है। 3. नुआखाई जोहार (भेदघाट): प्रसाद ग्रहण करने के बाद, त्योहार का सामाजिक पहलू शुरू होता है, जिसे ‘नुआखाई जोहार’ या ‘भेदघाट’ कहा जाता है। लोग एक-दूसरे के घरों में जाते हैं, दोस्तों और पड़ोसियों को शुभकामनाएँ देते हैं। बच्चे और युवा बड़ों के पैर छूकर आशीर्वाद लेते हैं, जो सम्मान और स्नेह का प्रतीक है। ओडिशा से बाहर भी नुआखाई: यह देखकर आश्चर्य होता है कि आज की व्यस्त जीवनशैली में भी, नुआखाई की परंपरा को लोग संजो कर रखे हुए हैं। ओडिशा के बाहर, यहाँ तक कि विदेशों में भी, पश्चिम ओडिशा के लोग इस पर्व को मनाते हैं। भुवनेश्वर, बेंगलुरु, दिल्ली, या दुबई में भी लोग पारंपरिक संबलपुरी पोशाक पहनकर, संबलपुरी गीतों पर नाचकर, और ढोल-निशान बजाकर अपनी मिट्टी की खुशबू महसूस करने की कोशिश करते हैं। भले ही उनके पास धान के खेत न हों, लेकिन एकता, आनंद, और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की भावना ही मुख्य है। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि Nuakhai Kaise Manaya Jata:नुआखाई कैसे मनाया जाता है पश्चिमी ओडिशा की देवी, माँ समलेश्वरी को एक नई फसल या नबन्न का भोग लगाया जाता है। मुख्य पुजारी के आवास पर देवी के लिए प्रसाद तैयार किया जाता है।देवी समलेश्वरी को नबन्न अर्पित करने के बाद, लोगों के बीच भोजन वितरित किया जाता है और वे इसे एक साथ खाते हैं। सभी रस्में पूरी करने के बाद, लोग स्वादिष्ट भोजन तैयार करते हैं और इस त्योहार को बहुत ही धूमधाम से मनाते हैं।अनुष्ठान पहले क्षेत्र के देवता या ग्राम देवता के मंदिर में देखे जाते हैं। बाद में, लोग अपने-अपने घरों में पूजा करते हैं और अपने घरेलू देवता और हिंदू परंपरा में धन की देवी लक्ष्मी को अनुष्ठान करते हैं। इस दिन, परिवार के प्रत्येक सदस्य नए कपड़े पहनते हैं और वे एक दूसरे को बधाई देते हैं, स्नेह दिखाते हैं और परिवार के बुजुर्ग सदस्यों से आशीर्वाद लेते हैं। इस रस्म को Nuakhai नुआखाई जुहार के नाम से जाना जाता है।लोग रसकेली जैसे पारंपरिक संबलपुरी नृत्य गाते और करते हैं, नुआखाई त्योहार संबलपुरी संस्कृति का प्रतीक है और यह ओडिशा के लोगों को किसी के जीवन में कृषि के महत्व की याद दिलाता है। नुआखाई भारतीय राज्य ओडिशा में एक क्षेत्रीय सार्वजनिक अवकाश है। निष्कर्ष: नुआखाई सिर्फ नया चावल खाने का दिन नहीं है। Nuakhai यह वास्तव में बंधन का एक पर्व है – मिट्टी के साथ मनुष्य का बंधन, परिवार और समाज का बंधन, और अतीत के साथ वर्तमान का बंधन। यह कृतज्ञता और जीवन के उत्सव का एक विचारोत्तेजक त्योहार है। यह हमें उन मूल्यों को याद दिलाता है कि कैसे हम अपने लोगों और प्रकृति के साथ जुड़े रह सकते हैं, खासकर आधुनिक जीवन की दौड़-भाग में।

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Shri Krishnanamashtakam: श्रीकृष्णनामाष्टकम्

Shri Krishnanamashtakam: श्रीकृष्णनामाष्टकम् निखिलश्रुतिमौलिरत्नमाला द्युतिनीराजितपादपङ्कजान्त । अयि मुक्तकुलैरुपास्यमानं परितस्त्वां हरिनाम संश्रयामि ॥ १॥ जय नामधेय मुनिवृन्दगेय हे जनरञ्जनाय परमाक्षराकृते । त्वमनादरादपि मनाग् उदीरितं निखिलोग्रतापपटलीं विलुम्पसि ॥ २॥ यदाभासोऽप्युद्यन् कवलितभवध्वान्तविभवो दृशं तत्त्वान्धानामपि दिशति भक्तिप्रणयिनीम् । जनस्तस्योदात्तं जगति भगवन्नामतरणे कृती ते निर्वक्तुं क इह महिमानं प्रभवति ॥ ३॥ यद् ब्रह्मसाक्षात्कृतिनिष्ठयापि विनाशमायाति विना न भोगैः । अपैति नाम स्फुरणेन तत् ते प्रारब्धकर्मेति विरौति वेदः ॥ ४॥ अघदमनयशोदानन्दनौ नन्दसूनो कमलनयनगोपीचन्द्रवृन्दावनेन्द्राः । प्रणतकरुणकृष्णावित्यनेकस्वरूपे त्वयि मम रतिरुच्चैर्वर्धतां नामधेय ॥ ५॥ वाच्यो वाचकमित्युदेति भवतो नाम स्वरूपद्वयं पूर्वस्मात् परमेव हन्त करुणा तत्रापि जानीमहे । यस्तस्मिन् विहितापराधनिवहः प्राणी समन्ताद् भवेद् आस्येनेदमुपास्य सोऽपि हि सदानन्दाम्बुधौ मज्जति ॥ ६॥ सूदिताश्रितजनार्तिराशये रम्यचिद्घनसुखस्वरूपिणे । नाम गोकुलमहोत्सवाय ते कृष्णपूर्णवपुषे नमो नमः ॥ ७॥ नारदवीणोज्जीवनसुधोर्मिनिर्यासमाधुरीपूर । त्वं कृष्णनाम कामं स्फुर मे रसने रसेन सदा ॥ ८॥ इति श्रीरूपगोस्वामिविरचितस्तवमालायां श्रीनामाष्टकं सम्पूर्णम् ।

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Shri Krishnanamakaranapra Stava: श्रीकृष्णनामकरणप्रस्तवः

Shri Krishnanamakaranapra Stava: श्रीकृष्णनामकरणप्रस्तवः गोलोकनाथो भगवाञ्छ्रीकृष्णो राधिकापतिः ॥ ४८॥ नारायणो यो वैकुण्ठे कमलाकान्त एव च । श्वेतद्वीपनिवासी यः पिता विष्णुश्च सोऽप्यजः ॥ ४९॥ कपिलोऽन्ये तदंशाश्च नरनारायणावृषी । सर्वेषां तेजसां राशिर्मूर्तिमानागतः किमु ॥ ५०॥ तं वसुं दर्शयित्वा च शिशुरूपो बभूव ह । साम्प्रतं सूतिकागारादाजगाम तवालयम् ॥ ५१॥ अयोनिसम्भवश्चायमाविर्भूतो महीतले । वायुपूर्णं मातृगर्भे कृत्वा च मायया हरिः ॥ ५२॥ आविर्भूय वसुं मूर्तिं दर्शयित्वा जगाम ह । युगे युगे वर्णभेदो नामभेदोऽस्य बल्लव ॥ ९३॥ शुक्लः पीतस्तथा रक्त इदानीं कृष्णतां गतः । शुक्लवर्णः सत्ययुगे सुतीव्रतेजसा वृतः ॥ ५४॥ त्रेतायां रक्तवर्णोऽयं पीतोऽयं द्वापरे विभुः । कृष्णवर्णः कलौ श्रीमांस्तेजसां राशिरेव च ॥ ५५॥ परिपूर्णतमं ब्रह्म तेन कृष्ण इति स्मृतः । ब्रह्मणो वाचकः कोऽयमृकारोऽनन्तवाचकः ॥ ५६॥ शिवस्य वाचकः षश्च नकारो धर्मवाचकः । अकारो विष्णुवचनः श्वेतद्वीपनिवासिनः ॥ ५७॥ नरनारायणार्थस्य विसर्गो वाचकः स्मृतः । सर्वेषां तेजसां राशिः सर्वमूर्तिस्वरूपकः ॥ ५८॥ सर्वाधारः सर्वबीजस्तेन कृष्ण इति स्मृतः । कर्मनिर्मूलवचनः कृषिर्नो दास्यवाचकः ॥ ५९॥ अकारो दातृवचनस्तेन कृष्ण इति स्मृतः । कृषिर्निश्चेष्टवचनो नकारो भक्तिवाचकः ॥ ६०॥ अकारः प्राप्तिवचनस्तेन कृष्ण इति स्मृतः । कृषिर्निर्वाणवचनो नकारो मोक्षवाचकः ॥ ६१॥ अकारो दातृवचनस्तेन कृष्ण इति स्मृतः । नाम्नां भगवतो नन्द कोटीनां स्मरणेन यत् ॥ ६२॥ तत्फलं लभते नूनं कृष्णेति स्मरणे नरः । यद्विधं स्मरणात्पुण्यं वचनाच्छ्रवणात्तथा ॥ ६३॥ कोटिजन्मांहसो नाशो भवेद्यत्स्मरणादिकात् । विष्णोर्नाम्नां च सर्वेषां सारात्सारं परात्परम् ॥ ६४॥ कृष्णेति सुन्दरं नाम मङ्गलं भक्तिदायकम् । ककारोच्चारणाद्भक्तः कैवल्यं मृत्युजन्महम् ॥ ६९॥ ऋकाराद्दास्यमतुलं षकाराद्भक्तिमीप्सिताम् । नकारात्सहवासं च तत्समं कालमेव च ॥ ६६॥ तत्सारूप्यं विसर्गाच्च लभते नात्र संशयः । ककारोच्चारणादेव वेपन्ते यमकिङ्कराः ॥ ६७॥ ऋकारोक्तेर्न तिष्ठन्ति षकारात्पातकानि च । नकारोच्चारणाद्रोगा अकारान्मृत्युरेव च ॥ ६८॥ ध्रुवं सर्वे पलायन्ते नामोच्चारणभीरवः । स्मृत्युक्तिश्रवणोद्योगात्कृष्णनाम्नो व्रजेश्वर ॥ ६९॥ रथं गृहीत्वा धावन्ति गोलोकात्कृष्णकिङ्कराः । पृथिव्या रजसः सङ्ख्यां कर्तुं शक्ता विपश्चितः ॥ ७०॥ नाम्नः प्रभावसङ्ख्यानं सन्तो वक्तुं न च क्षमाः । पुरा शङ्करवक्त्रेण नाम्नोऽस्य महिमा श्रुतः ॥ ७१॥ गुणान्नामप्रभावं च किञ्चिज्जानाति मद्गुरुः । ब्रह्माऽनन्तश्च धर्मश्च सुरर्षिमनुमानवाः ॥ ७२॥ वेदाः सन्तो न जानन्ति महिम्नः षोडशीं कलाम् । इत्येवं कथितो नन्द महिमा च सुतस्य च ॥ ७३॥ यथामति यथाज्ञानं गुरुवक्त्राद्यथा श्रुतम् । कृष्णः पीताम्बरः कंसध्वंसी च विष्टरश्रवाः ॥ ७४॥ देवकीनन्दनः श्रीशो यशोदानन्दनो हरिः । सनातनोऽच्युतोऽनन्तः सर्वेशः सर्वरूपधृक् ॥ ७५॥ सर्वाधारः सर्वगतिः सर्वकारणकारणम् । राधाबन्धू राधिकात्मा राधिकाजीवनं स्वयम् ॥ ७६॥ राधाप्राणो राधिकेशो राधिकारमणः स्वयम् । राधिकासहचारी च राधामानसपूरणः ॥ ७७॥ राधाधनो राधिकाङ्गो राधिकासक्तमानसः । राधिकाचित्तचोरश्च राधाप्राणाधिकः प्रभुः ॥ ७८॥ परिपूर्णतमं ब्रह्म गोविन्दो गरुडध्वजः । नामान्येतानि कृष्णस्य श्रुतानि मन्मुखाद्धृदि ॥ ७९॥ जन्ममृत्युहराण्येव रक्ष नन्द शुभेक्षण । कृतं निरूपणं नाम्नां कनिष्ठस्य यथा श्रुतम् ॥ ८०॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे पूर्वे द्वादशाध्यायान्तर्गतः नामकरणप्रस्तावः समाप्तः । ब्रह्मवैवर्तपुराण । श्रीकृष्णजन्म, पूर्वभाग । अध्याय १३/४८-८०॥

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shrIkRiShNadvAdashama~njarI: श्रीकृष्णद्वादशमञ्जरी

shrIkRiShNadvAdashama~njarI: श्रीकृष्णद्वादशमञ्जरी ॥ श्री श्रीधरवेंकटेशार्येण कृता ॥ दुराशान्धो-ऽमुष्मिन्विषय-विसरावर्तजठरेतृणच्छन्ने कूपे तृणकबललुब्धः पशुरिव ।पतित्वा खिद्येऽसावगतिरित उद्धृत्य कलयेःकदा मां कृष्ण त्वत्पदकमललाभेन सुखितम् ॥ १॥ कथंचि-द्यच्चित्ते कमलभव-कामान्तकमुखाःवहन्तो मज्जन्ति स्वय-मनवधौ हर्षजलधौ ।Vक्व तद्दिव्य-श्रीमच्चरणकमलं कृष्ण भवतःक्व चाहं तत्रेहा मम शुन इवा-खण्डलपदे ॥ २॥ दुरापस्त्वं कृष्ण स्मरहर-मुखानां तदपि तेक्षतिः का कारुण्या-दगतिरिति मां लालयसि चेत् ।प्रपश्यन् रथ्यायां शिशु-मगति-मुद्दामरुदितंन सम्राडप्यङ्गे दधदुरुदयस्सान्त्वयति किम् ॥ ३॥ प्रतिश्वासं नेतुं प्रयतनधुरीणः पितृपतिःविपत्तीनां व्यक्तं विहरणमिदं तु प्रतिपदम् ।तथा हेयव्यूहा तनुरियमिहा-थाप्य्भिरमेहतात्मा कृष्णैतां कुमति-मपहन्या मम कदा ॥ ४॥ विधीशाराध्यस्त्वं प्रणय-विनयाभ्यां भजसि यान्प्रियस्ते यत्सेवी विमत इतरस्तेषु तृणधीः ।किमन्य-त्सर्वापि त्वदनभिमतैव स्थितिरहोदुरात्मैवं ते स्यां यदुवर दयार्हाः कथमहम् ॥ ५॥ विनिन्द्यत्वे तुल्याधिक-विरहिता य खलु खलाःतथा भूतं कृत्यं यदपि सह तैरेव वसतिः ।तदेवानुष्ठेयं मम भवति नेहास्त्यरुचिर-प्यहो धिङ्मां कुर्वे किमिव न दया कृष्ण मयि ते ॥ ६॥ त्वदाख्या-भिख्यान त्वदमल-गुणास्वादन भवत्-सपर्यायासक्ता जगति कति वाऽऽनन्दजलधौ ।न खेलन्त्येवं दुर्व्यसन-हुतभुग्गर्भ-पतित-स्त्वहं सीदाम्येको यदुवर दयेथा मम कदा ॥ ७॥ कद वा निर्हेतून्मिषित-करुणालिङ्गितभवत्-कटाक्षालब्धेन व्यसनगहना-न्निर्गत इतः ।हताशेष-ग्लानिन्यमृतरस-निष्यन्दशिशिरेसुखं पादांभोजे यदुवर कदासानि विहरन् ॥ ८॥ अनित्यत्वं जान-न्नतिदृढ-मदर्पस्सविनयःस्वके दोषेऽभिज्ञः परजुषि तु मूढस्सकरुणः ।सतां दासश्शान्त-स्सममति-रजस्रं तव यथाभजेयं पादाब्जं यदुवर दयेथा मम कदा ॥ ९॥ करालं दावाग्निं कबलितवता देव भवतापरित्राता गोपाः परमकृपया किन्न हि पुरा ।मदीयान्तर्वैरिप्रकर-दहनं किं कबलयन्दयासिन्धो गोपीदयित वद गोपायसि न माम् ॥ १०॥ न भीरारुह्यांस नदति शमने नाप्युदयतेजुगुप्सा देहस्याशुचिनिचयभावे स्पुटतरे ।अपि व्रीडा नोदेत्यवमतिशते सत्यनुपदंक्व मे स्यात्तवभक्तिः कथमिव कृपा कृष्ण मयि ते ॥ ११॥ बलीयस्यत्यन्तं मदघपटली तद्यदुपतेपरित्रातुं नो मां प्रभवसि तथा नो दमयितुम् ।अलाभादर्तीनामिदमनुगुणानामदयितेकियद्दौस्थ्यं धिङ्मां त्वयि विमतमात्मद्रुहमिमम् ॥ १२॥ ॥ इति श्री श्रीधरवेङ्कटेशार्येणकृताकृष्णद्वादशमञ्जरी समाप्ता ॥

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ShrIkRiShNajayantI nirNayaH: श्रीकृष्णजयन्ती निर्णयः

ShrIkRiShNajayantI nirNayaH: श्रीकृष्णजयन्ती निर्णयः श्री गुरुभ्यो नमः हरिः ॐ श्रीमदानन्दतीर्थ भगवत्पादाचार्य विरचितः श्रीकृष्णजयन्ती निर्णयः रोहिण्या मध्यरात्रे तु यदा कृष्णाष्टमी भवेत् ।जयन्ती नाम सा प्रोक्ता सर्वपापप्रणाशनी(नं) ॥ १॥ यस्यां जातो हरिः साक्षान्नि शेते भगवानजः ।तस्मात्तद्दिनमत्यर्थं पुण्यं पापहरं शुभपरम् ॥ २॥ तस्मात्सर्वैर्रुपोश्या सा जयन्ती नाम सा(वै) सदा ।द्विजातिभिर्विशेषेण तद्भक्तैश्च विशेषतः ॥ ३॥ यो भुङ्क्ते तद्दिने मोहा(लोभा)त् पूयशोणितमत्ति सः ।तस्मादुपवासेन्नित्य(पुण्य)ं तद्दिने(नं) श्रद्धयान्वितः ॥ ४॥ कृत्वा शौचं यथा न्यायं स्नानं कुर्यादतंद्रितः ।प्रभात काले कुर्वीत यूगायेत्यादिमन्त्रतः ॥ ५॥ नित्याह्निकं प्रकुर्वीत भगवन्तमनुस्मरन् ।मध्याह्न काले च पुमान् सायङ्काले त्वतन्द्रितः ॥ ६॥ स्नायेत पूर्वमन्त्रेण वासुदेवमनुस्मरन् ।ततः पूजां प्रकुर्वेत विधिवत्सुसमाहितः ॥ ७॥ यनायेति च मन्त्रेण श्रद्धाभक्तियुतः पुमान् ।कृष्णं च बलभद्रं च वसुदेवं च देवकीम् ॥ ८॥ नन्दगोपं यशोदाञ्च सुभद्रां तत्र पूजयेत् ।(अर्घ्यं दत्वा समभ्यच्यार्भ्युधिते शशिमण्डले) ।जातः कंसवधार्ताय भूभारोत्थारणाय च ॥ ९॥ कौरवानां विनाशाय दैत्यानां निधनाय च ।पाण्डवानां हितार्थाय धर्मसंस्थापनाय च ॥ १०। गृहाणर्घ्यं मया दत्तं देवक्या सहितो हरिः ।अर्घ्यं दत्वासमभ्यर्च्याभ्युदिते शशिमण्डले ॥ ११॥ क्षीरोदार्णवसम्भूत अत्रिनेत्र समुद्भवः ।गृहाणर्घ्यं मया दत्तं रोहिण्या सहितः शशिम् ॥ १२॥ दत्वार्घ्यं मनुनानेन उपस्थाय विधुं बुधः ।शशिने चन्द्रदेवाय सोमदेवाय छेन्दवे ॥ १३॥ मृगिणे शी(सि)त बिम्बाय लोकदीपाय दीपिणे ।(रोहिणीसक्तचित्ताय कन्यादानप्रदायिने)शीतदीदितिबिम्बाय तारकापतये नमः ॥ १४॥ उपसम्हृत्य तत्सर्वं ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।विश्वायेति च मन्त्रेण ततः स्वापं समाचरेत् ॥ १५॥ ततो नित्यान्हि कं कृत्वा शक्तितो दीयतां धनम् ।सर्वायेति च मन्त्रेण ततः पारणमाचरेत् ।धर्मायेति ततः स्वस्थो मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ १६॥ ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थ भगवत्पादाचार्य विरचितम् ॥ ॥ जयन्ती निर्णयः सम्पूर्णम् ॥ भारतीरमणमुख्यप्राणान्तर्गत श्रीकृष्णार्पणमस्तु

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Devakikritam Shrikrishnastotram or Krishnajanmastutih: देवकीकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रम् कृष्णजन्मस्तुतिः

Devakikritam Shrikrishnastotram or Krishnajanmastutih: देवकीकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रम् कृष्णजन्मस्तुतिः देवक्युवाच । रूपं यत्तत्प्राहुरव्यक्तमाद्यं ब्रह्म ज्योतिर्निर्गुणं निर्विकारम् । सत्तामात्रं निर्विशेषं निरीहं स त्वं साक्षाद्विष्णुरध्यात्मदीपः ॥ २४॥ नष्टे लोके द्विपरार्धावसाने महाभूतेष्वादिभूतं गतेषु । व्यक्तेऽव्यक्तं कालवेगेन याते भवानेकः शिष्यते शेषसंज्ञः ॥ २५॥ योऽयं कालस्तस्य तेऽव्यक्तबन्धो चेष्टामाहुश्चेष्टते येन विश्वम् । निमेषादिर्वत्सरान्तो महीयां- स्तं त्वेशानं क्षेमधाम प्रपद्ये ॥ २६॥ मर्त्यो मृत्युव्यालभीतः पलायन् लोकान् सर्वान्निर्भयं नाध्यगच्छत् । त्वत्पादाब्जं प्राप्य यदृच्छयाद्य स्वस्थः शेते मृत्युरस्मादपैति ॥ २७॥ स त्वं घोरादुग्रसेनात्मजान्न- स्त्राहि त्रस्तान् भृत्यवित्रासहासि । रूपं चेदं पौरुषं ध्यानधिष्ण्यं मा प्रत्यक्षं मांसदृशां कृषीष्ठाः ॥ २८॥ जन्म ते मय्यसौ पापो मा विद्यान्मधुसूदन । समुद्विजे भवद्धेतोः कंसादहमधीरधीः ॥ २९॥ उपसंहर विश्वात्मन्नदो रूपमलौकिकम् । शङ्खचक्रगदापद्मश्रिया जुष्टं चतुर्भुजम् ॥ ३०॥ विश्वं यदेतत्स्वतनौ निशान्ते यथावकाशं पुरुषः परो भवान् । बिभर्ति सोऽयं मम गर्भगोऽभू- दहो नृलोकस्य विडम्बनं हि तत् ॥ ३१॥ इति श्रीमद्भागवते दशमस्कन्धे तृतीयाध्यायान्तर्गता देवकीकृता स्तुतिः समाप्ता । इति श्रीमद्भागवतमहापुराणे दशमस्कन्धे पूर्वार्धे तृतीयाध्यायान्तर्गतं देवकीकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रं समाप्तम् । भागवतपुराण । अध्याय १०/३/२४-३१॥

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Krishnachaitanya Dvadashanama Stotram:कृष्णचैतन्यद्वादशनामस्तोत्रम्

Krishnachaitanya Dvadashanama Stotram:कृष्णचैतन्यद्वादशनामस्तोत्रम् चैतन्यः कृष्णचैतन्यो गौराङ्गो द्विजनायकः ।यतीनां दण्डिनां चैव न्यासिनां च शिरोमणिः ॥ १॥ रक्ताम्बरधरः श्रीमान् नवद्वीपसुधाकरः ।प्रेमभक्तिप्रदश्चैव श्रीशचीनन्दनस्तथा ॥ २॥ द्वादशैतानि नामानि त्रीसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।तस्य वाञ्छासुसिद्धिः स्याद्भक्तिः श्रीलपदाम्बुजे ॥ ३॥ इति सार्वभौम भट्टाचार्यविरचितं कृष्णचैतन्यद्वादशनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।

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Ganesh Chaturthi August 2025 : गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि

Ganesh Chaturthi: हिंदू धर्म में, भगवान गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है, जिनकी पूजा हर शुभ कार्य से पहले की जाती है। हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को उनके जन्मोत्सव के रूप में Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन से 10 दिवसीय गणेश महोत्सव का प्रारंभ होता है, जो अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान गणेश की प्रतिमा के विसर्जन के साथ समाप्त होता है। यह पर्व महाराष्ट्र और गुजरात सहित देश के कई राज्यों में बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान गणेश की पूजा करने से भक्तों के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। साथ ही, कुंडली में बुध ग्रह मजबूत होता है और आर्थिक संकट भी दूर होते हैं। भगवान गणेश को रिद्धि-सिद्धि के दाता और सभी मनोकामनाएं पूरी करने वाला माना जाता है। उन्हें विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता भी कहा जाता है, जिससे उनके मंगल प्रवेश से जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं और मंगल ही मंगल होता है। इस साल, गणेश चतुर्थी 27 अगस्त 2025, बुधवार को मनाई जाएगी। गणेश स्थापना भी इसी दिन होगी और गणेश विसर्जन 6 सितंबर 2025, शनिवार को होगा। Ganesh Chaturthi 2025: Auspicious time: गणेश चतुर्थी 2025: शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, गणेश चतुर्थी की तिथि और पूजा के लिए शुभ समय इस प्रकार है: • चतुर्थी तिथि का प्रारंभ: 26 अगस्त 2025 को दोपहर 01 बजकर 54 मिनट पर। • चतुर्थी तिथि का समापन: 27 अगस्त 2025 को दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर। • गणेश चतुर्थी का दिन: सनातन धर्म में उदया तिथि का मान होता है, इसलिए Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी 27 अगस्त 2025 को मनाई जाएगी। Hartalika Teej 2025 Date: 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें गणेश पूजा के लिए चौघड़िया अनुसार शुभ मुहूर्त: • अमृत मुहूर्त: सुबह 07:33 से 09:09 के बीच। • शुभ मुहूर्त: सुबह 10:46 से दोपहर 12:22 के बीच। • शाम की पूजा का शुभ मुहूर्त: शाम 06:48 से 07:55 के बीच। • राहु काल: दोपहर 12:22 से 01:59 के बीच। इस समय स्थापना और पूजा करने से बचना चाहिए।   विशेष नोट: गणेश पूजन के लिए वैसे मध्याह्न मुहूर्त सुबह 11:05:15 से 13:39:46 के बीच है, लेकिन इस बीच राहु काल भी रहेगा, इसलिए चौघड़िया मुहूर्त को प्राथमिकता देना उचित रहेगा। गणेश चतुर्थी 2025 पर बन रहे शुभ योग:Auspicious events are taking place on Ganesh Chaturthi 2025: ज्योतिषियों के अनुसार, Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी 2025 पर कई दुर्लभ शुभ योगों का निर्माण हो रहा है: • शुभ योग: इस योग का संयोग दोपहर तक रहेगा। • शुक्ल योग: यह योग 28 अगस्त को दोपहर 01 बजकर 18 मिनट पर समाप्त होगा। • सर्वार्थ सिद्धि योग: शुक्ल योग के बाद सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग बन रहा है। Ganesh Chaturthi गणेश चतुर्थी तिथि पर यह योग सुबह 06 बजकर 04 मिनट पर निर्मित होगा। • भद्रावास योग: इस योग का समापन दोपहर 03 बजकर 44 मिनट पर होगा। 27 अगस्त 2025 का पंचांग विवरण: • सूर्योदय: सुबह 06 बजकर 28 मिनट पर। • सूर्यास्त: शाम 06 बजकर 14 मिनट पर। • चंद्रोदय: सुबह 08 बजकर 52 मिनट पर। • चंद्रास्त: शाम 08 बजकर 28 मिनट पर। • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 03 बजकर 58 मिनट से 04 बजकर 43 मिनट तक। • विजय मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 58 मिनट से 02 बजकर 49 मिनट तक। • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06 बजकर 14 मिनट से 06 बजकर 36 मिनट तक। • निशिता मुहूर्त: रात 11 बजकर 28 मिनट से 12 बजकर 13 मिनट तक। Auspicious entry and establishment method of Ganpati ji in the house:गणपति जी का घर में मंगल प्रवेश और स्थापना विधि: गणपति बप्पा को प्रसन्न करने और जीवन में मंगल लाने के लिए उनका घर में विधि-विधान से मंगल प्रवेश करवाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। 1. स्थान की तैयारी:     श्री गणेश जी के आगमन से पहले घर-द्वार और मंदिर को अच्छी तरह सजाएं।     जिस स्थान पर गणेश जी को स्थापित करना है, उस जगह की साफ-सफाई करें।     उस स्थान पर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं और हल्दी से चार बिंदियां बनाएं।      एक मुट्ठी अक्षत (चावल) रखें और उस पर एक छोटा बाजोट, चौकी या लकड़ी का पाट रखकर उस पर पीला, लाल या केसरिया वस्त्र बिछाएं।     पूजा और आरती का सारा सामान पहले से ही खरीद कर तैयार रखें। 2. मूर्ति खरीदने के लिए प्रस्थान:      बाजार जाने से पहले नवीन वस्त्र धारण करें, सिर पर टोपी या साफा बांधें और रुमाल भी रखें।      पीतल या तांबे की थाली साथ ले जाएं, या फिर लकड़ी का पाट ले जाएं जिस पर गणेश जी को बैठाकर घर लाना है।      घंटी और मंजीरा भी साथ ले जाएं। 3. गणेश प्रतिमा का चयन:      मूर्ति खरीदते समय ध्यान रखें कि गणेश जी की प्रतिमा बैठी हुई हो।     उनके साथ उनका वाहन चूहा और रिद्धि-सिद्धि भी होनी चाहिए।      प्रतिमा सफेद या सिंदूरी रंग की हो।     सूंड बाईं ओर मुड़ी हुई हो।      गणेश जी पितांबर या लाल परिधान पहने हुए हों और उनके हाथ में लड्डू का थाल हो। इन बातों का ध्यान रखते हुए ही मूर्ति खरीदना उचित रहता है।     बाजार में गणेश जी की जो भी मूर्ति पसंद आए, उसका मोलभाव न करें। उन्हें आगमन के लिए निमंत्रित करके दक्षिणा दे दें। 4. घर में मंगल प्रवेश      गणेश जी की प्रतिमा को धूमधाम से घर के द्वार पर लाएं।     द्वार पर ही उनकी आरती उतारें।      यदि याद हों तो मंगल गीत गाएं या शुभ मंत्रों का उच्चारण करें।   इसके बाद “गणपति बप्पा मोरया!” के नारे लगाते हुए उन्हें घर के अंदर ले आएं और Ganesh Chaturthi प्रसन्नचित्त होकर पहले से तैयार किए गए स्थान पर विराजित कर दें। गणेश चतुर्थी की पूजा विधि:Worship method of Ganesh Chaturthi मंगल प्रवेश के बाद, विधिवत तरीके से भगवान गणेश की पूजा और आरती करें। भक्तजन अपने घरों पर गणपति बप्पा की प्रतिमा स्थापित कर उनकी पूजा एवं आरती करते हैं। पूजा में धूप, दीप, फूल, फल, मोदक या लड्डू आदि अर्पित करें। इस तरह से Ganesh Chaturthi गणेश जी का मंगल प्रवेश और स्थापना करने से जीवन के सभी

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Rishi Panchami 2025 Date: कब है ऋषि पंचमी? जानें महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

Rishi Panchami 2025: ऋषि पंचमी व्रत का महत्व हिन्दू धर्म में दोषों से मुक्त होने के लिए किया जाता हैं। यह एक त्यौहार नहीं अपितु एक व्रत हैं, इस व्रत में सप्त-ऋषियों की पूजा-अर्चना की जाती हैं। हिन्दू धर्म में माहवारी के समय, स्त्रियों द्वारा बहुत से नियम नियमों का पालन किया जाता हैं। अगर गलती वश इस समय में कोई चूक हो जाती हैं, तो महिलाओं को दोष मुक्त करने के लिए ऋषि पंचमी का व्रत किया जाता है। ऋषि पंचमी 2025: कब है? जानें महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि:Rishi Panchami 2025: When is it? Know the importance, auspicious time and method of worship हिंदू धर्म में, ऋषि पंचमी (Rishi Panchami) का त्योहार एक विशेष महत्व रखता है, खासकर महिलाओं के लिए। यह पर्व भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। हर साल यह पर्व गणेश चतुर्थी के ठीक अगले दिन पड़ता है। इस साल, ऋषि पंचमी 28 अगस्त 2025, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह व्रत सप्तऋषियों (वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज) के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए रखा जाता है, जिन्होंने वेदों की शिक्षा दी और सनातन धर्म का मार्गदर्शन किया। Significance of Rishi Panchami: Freedom from sins and happy life: ऋषि पंचमी का महत्व: पापों से मुक्ति और सुखमय जीवन Rishi Panchami ऋषि पंचमी का व्रत विशेष रूप से महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से जाने-अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है। शास्त्रों के अनुसार, मासिक धर्म के दौरान यदि किसी महिला से अनजाने या जानबूझकर कोई धार्मिक नियम का उल्लंघन हुआ हो, तो यह व्रत उन दोषों का निवारण करता है और शुद्धता की प्राप्ति होती है। यह व्रत नारी शक्ति के सम्मान और पवित्रता को संजोए रखने का प्रतीक है। इसके अलावा, यह भी माना जाता है कि ऋषि पंचमी Rishi Panchami का व्रत करने से लोगों को संतान प्राप्ति होती है और वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है। साथ ही, घर में तुलसी पूजन करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है, जिससे ऋषियों का आशीर्वाद और पवित्रता प्राप्त होती है। 25 या 26 अगस्त, कब है हरतालिका तीज, जानिए शुभ मुहूर्त और जरूरी बातें ऋषि पंचमी 2025: शुभ मुहूर्त: Rishi Panchami 2025: Auspicious time हिंदू पंचांग के अनुसार, ऋषि पंचमी की पंचमी तिथि और पूजा का शुभ समय इस प्रकार है: • पंचमी तिथि का आरंभ: 27 अगस्त 2025 को दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर। • पंचमी तिथि का समापन: 28 अगस्त 2025 को शाम 5 बजकर 56 मिनट तक। • ऋषि पंचमी का दिन: उदया तिथि के अनुसार, ऋषि पंचमी 28 अगस्त 2025 को ही मनाई जाएगी। • पूजन मुहूर्त: 28 अगस्त 2025 को सुबह 11 बजकर 5 मिनट से लेकर दोपहर 1 बजकर 39 मिनट तक रहेगा। ऋषि पंचमी पूजन विधि: चरण-दर-चरण:Rishi Panchami Puja Method: Step by Step ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों की पूजा-अर्चना करने से सभी दोष दूर होते हैं। यहां जानिए पूजन की संपूर्ण विधि: 1. सुबह स्नान और संकल्प: इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। 2. मंदिर की सफाई: अपने मंदिर की अच्छी तरह सफाई करें, जिससे ग्रंथों की पवित्रता बनी रहे। 3. देवी-देवताओं को स्नान: सभी देवी-देवताओं को गंगाजल से स्नान करवाएं, जिससे उनका स्थान और भी पवित्र हो जाए। 4. सप्तऋषियों की स्थापना: पूजा स्थल पर मिट्टी का चौकोर मंडल बनाकर, उस पर सप्तऋषियों की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। यदि प्रतिमा न हो, तो सात छोटे पात्रों में जल, चावल, पुष्प और अन्य पूजा सामग्री रखकर उनका प्रतीकात्मक रूप से पूजन कर सकते हैं। उनकी तस्वीर के सामने साफ पानी भरा एक कलश रखें। 5. अभिषेक और पूजन: सप्तऋषियों का गंगाजल, दूध, पंचामृत और शुद्ध जल से अभिषेक करें या छींटे लगाएं। 6. तिलक और धूप-दीप: सप्तऋषियों के माथे पर तिलक लगाएं। फिर धूप और दीपक दिखाएं, ताकि वातावरण पवित्र और शांत बना रहे। 7. पुष्प और सामग्री अर्पित करें: पूजा के दौरान पुष्प, जनेऊ, अक्षत, रोली, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। सप्तऋषियों के नाम ध्यान में लेते हुए उन पर पुष्प अर्पित करें। 8. भोग और कथा: पूजा के बाद सप्तऋषियों को मिठाई का भोग लगाएं। 9. व्रत कथा और आरती: अंत में व्रत की कथा सुनें और फिर आरती करें। 10. तुलसी पूजन: इस दिन तुलसी के पौधे के सामने दीप जलाकर उसकी पूजा करें और 108 परिक्रमा करें। ऋषि पंचमी व्रत से प्राप्त होने वाले फल:Results obtained from Rishi Panchami fast ऋषि पंचमी व्रत का पालन करने से जीवन में शुद्धता और सात्विकता की प्राप्ति होती है। जो महिलाएं इस व्रत को करती हैं, उन्हें धार्मिक पवित्रता का लाभ मिलता है और पूर्व जन्मों के दोष भी समाप्त होते हैं। इसके साथ ही, ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है।

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पितृपक्ष 2025: गीता पाठ कराने से मिलती है पितरों को शांति, जानें 7 अद्भुत लाभ

पितृपक्ष हिन्दू धर्म में एक महत्वपूर्ण समय होता है, जब हम अपने पितरों (पूर्वजों) को याद करते हैं और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं। इस 16-दिन की अवधि में, लोग कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान करते हैं ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले। इन अनुष्ठानों में श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ करवाना सबसे प्रभावी और पुण्यकारी माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गीता पाठ करवाना क्यों इतना महत्वपूर्ण है और इसके क्या-क्या लाभ हैं? यह ब्लॉग पोस्ट आपको बताएगा कि पितृपक्ष में गीता पाठ करवाने से आपके पितरों को कैसे शांति मिलती है और आपके जीवन में इसके क्या-क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ते हैं। गीता पाठ का महत्व: पितृपक्ष में क्यों है खास? श्रीमद्भगवद्गीता केवल एक धार्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने का एक सार है। इसमें भगवान कृष्ण ने अर्जुन को धर्म, कर्म, मोक्ष और जीवन के सत्य का उपदेश दिया है। जब किसी परिवार में पितृपक्ष के दौरान गीता का पाठ होता है, तो इसकी पवित्र ध्वनि और शिक्षाएँ न केवल घर के वातावरण को शुद्ध करती हैं, बल्कि पितरों की आत्मा को भी शांति प्रदान करती हैं। यह माना जाता है कि गीता पाठ से उत्पन्न होने वाली आध्यात्मिक ऊर्जा पितरों की आत्मा को मोक्ष की ओर ले जाती है और उन्हें जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने में मदद करती है। पितृपक्ष में गीता पाठ करवाने के 7 अद्भुत लाभ 1. पितरों को मिलती है शांति और मोक्ष: गीता पाठ का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह पितरों की आत्मा को परम शांति प्रदान करता है। माना जाता है कि इससे उनकी आत्मा को मोक्ष का मार्ग मिलता है, जिससे वे अपने अगले पड़ाव की ओर शांतिपूर्वक बढ़ पाते हैं। 2. पितृदोष से मिलती है मुक्ति: यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में पितृदोष है, तो पितृपक्ष में गीता का पाठ करवाना इस दोष को शांत करने का एक शक्तिशाली उपाय है। यह दोष दूर होने पर जीवन में आने वाली बाधाएँ कम होती हैं और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। 3. घर में आती है सकारात्मकता: जब घर में गीता का पाठ होता है, तो इसकी पवित्र ध्वनि और मंत्रों से एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है और घर में सुख-शांति बनाए रखने में मदद करता है। 4. धन और वैभव की प्राप्ति: जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक पितृपक्ष में गीता का पाठ करवाता है, उसके जीवन में धन, वैभव और समृद्धि की वृद्धि होती है। यह परिवार को आर्थिक संकटों से बचाता है। 5. मानसिक और शारीरिक शांति: गीता के उपदेश हमें जीवन के उतार-चढ़ावों को स्वीकार करने की शक्ति देते हैं। इसका पाठ सुनने से मन को शांति मिलती है, तनाव कम होता है और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर होता है। 6. पारिवारिक संबंधों में सुधार: जब परिवार के सदस्य मिलकर इस पुण्य कार्य में भाग लेते हैं, तो उनके आपसी संबंध मजबूत होते हैं। यह एक साथ आने और एक-दूसरे के प्रति सम्मान की भावना को बढ़ाता है। 7. धर्म और आध्यात्मिकता का विकास: गीता का पाठ करवाने से व्यक्ति में धर्म और आध्यात्मिकता के प्रति रुचि बढ़ती है। यह हमें सही और गलत के बीच अंतर करना सिखाता है और हमें एक बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करता है। निष्कर्ष पितृपक्ष में गीता का पाठ करवाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि पितरों के प्रति सच्ची श्रद्धा और प्रेम व्यक्त करने का एक तरीका है। यह एक ऐसा कार्य है, जिससे पितरों की आत्मा को तो शांति मिलती ही है, साथ ही परिवार के सदस्यों को भी ढेरों लाभ प्राप्त होते हैं। यदि आप इस पितृपक्ष में अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए गीता पाठ करवाना चाहते हैं, तो आप Karmasu वेबसाइट के माध्यम से आसानी से ऑनलाइन बुकिंग कर सकते हैं। +919129388891

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