October 10, 2025

Lakshmanakritam

श्रीलक्ष्मीस्तुतिःShri Lakshmistutih

श्रीलक्ष्मीस्तुतिःShri Lakshmistutih जयन्ति जगतां मातुः स्तनकुङ्कुमबिन्दवः ।मुकुन्दाश्लेषसङ्क्रान्तकौस्तुभश्रीविडम्बनः ॥ १॥ पायात्पयोधिदुहितुः कपोलामलचन्द्रमाः ।यत्र सङ्क्रान्तबिम्बेन हरिणा हरिणायितम् ॥ २॥ देवेऽर्पितवरणस्रजि बहुमाये वहति कैटभीरूपम् ।जयति सुरासुरहसिता लज्जाजिह्मेक्षणा लक्ष्मीः ॥ ३॥ तल्पीकृताहिरगणितगरुडो हाराभिहतविधिर्जयति ।फणशतपीतश्वासो रागान्धायाः श्रियः केलिः ॥ ४॥ स्मेराननेन हरिणा सस्पृहमाकारवेदिनाऽऽकलितम् ।जयति पुरुषायितायाः कमलायाः कैटभीध्यानम् ॥ ५॥ कमलासनकमलेक्षणकमलारिकिरीटकमलभृद्वाहैः ।नुतपदकमला कमला करधृतकमला करोतु मे कमलम् ॥ ६॥ किञ्जल्कराजिरिव नीलसरोजलग्नालेखेव काञ्चनमयी निकषोपलस्था ।सौदामिनी जलदमण्डलगामिनीवपायादुरःस्थलगता कमला मुरारेः ॥ ७॥ दन्तैः कोरकिता स्मितैर्विकसिता भ्रूविभ्रमैः पत्रितादोर्भ्यां पल्लविता नखैः कुसुमिता लीलाभिरुद्वेलिता ।उत्तुङ्गस्तनमण्डलेन फलिता भक्ताभिलाषे हिताकाचित्कल्पलता सुरासुरनुता पायात्सुधाब्धेः सुता ॥ ८॥ उत्तुङ्गस्तनमण्डलोपरिलसत्प्रालम्बमुक्तामणेःअन्तर्बिम्बितमिन्द्रनीलनिकरच्छायानुकारिद्युति ।लज्जाव्याजमुपेत्य नम्रवदना स्पष्टं मुरारेर्वपुःपश्यन्ती मुदिता मुदेऽस्तु भवतां लक्ष्मीर्विवाहोत्सवे ॥ ९॥ आख्याते हसितं पितामह इति त्रस्तं कपालीति चव्यावृत्तं गुरुरित्ययं दहन इत्याविष्कृता भीरुता ।पौलोमीपतिरत्यसूयितमथ व्रीडाविनम्रश्रियापायाद्वः पुरुषोत्तमोऽयमिति यो न्यस्तः स पुष्पाञ्जलिः ॥ १०॥ क्रीडाभिन्नहिरण्यशुक्तिकुहरे रक्तात्मनावस्थितान्हारं हारमुदारकुङ्कुमरसानव्याजभव्यान्नखैः ।वीरश्रीकुचकुम्भसीम्नि लिखतो वीरस्य पत्रावलीःतत्कालोचित भावबन्धमधुरं मन्दस्मितं पातु वः ॥ ११॥ पद्मायाः स्तनहेमसद्मनि मणिश्रेणीसमाकर्षकेकिञ्चित्कञ्चुकसन्धिसन्निधिगते शौरेः करे तस्करे ।सद्यो जागृहि जागृहीति वलयध्वानैर्ध्रुवं गर्जताकामेन प्रतिबोधिताः प्रहरिका रोमाङ्कुराः पान्तु वः ॥ १२॥ यादृग्जानासि जाम्बूनदगिरिशिखरे कान्तिरिन्दोः कलानांइत्यौत्सुक्येन पत्यौ स्मितमधुरमुखाम्भोरुहं भाषमाणे ।लीलादोलायमानश्रुतिकमलमिलद्भृङ्गसङ्गीतसाक्षीपायादम्भोधिजायाः कुसुमशरकलानाट्यनान्दीनकारः ॥ १३॥ उत्तिष्ठन्त्या रतान्ते भरमुरगपतौ पाणिनैकेन कृत्वाधृत्वा चान्येन वासो विगलितकबरीभारमंसे वहन्त्याः ।भूयस्तत्कालकान्तद्विगुणितसुरतप्रीतिना शौरिणा वःशय्यामालिङ्ग्य नीतं वपुरलसलसद्बाहु लक्ष्म्याः पुनातु ॥ १४॥ इति श्रीलक्ष्मीस्तुतिः समाप्ता ।

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Lakshmanakritam

श्रीकनकधारास्तोत्रम्:Shri Kanakadhara Stotra

श्रीकनकधारास्तोत्रम्:Shri Kanakadhara Stotra वन्दे वन्दारुमन्दारमिन्दिरानन्दकन्दलम् ।अमन्दानन्दसन्दोहबन्धुरं सिन्धुराननम् ॥ अङ्गं हरेः पुलकभूषणमाश्रयन्तीभृङ्गाङ्गनेव मुकुलाभरणं तमालम् ।अङ्गीकृताखिलविभूतिरपाङ्गलीलामाङ्गल्यदाऽस्तु मम मङ्गलदेवतायाः ॥ १॥ मुग्धा मुहुर्विदधती वदने मुरारेःप्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि ।माला दृशोर्मधुकरीव महोत्पले यासा मे श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥ २॥ विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षंआनन्दहेतुरधिकं मुरविद्विषोऽपि ।ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्धम्इन्दीवरोदरसहोदरमिन्दिरायाः ॥ ३॥ आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दंआनन्दकन्दमनिमेषमनङ्गतन्त्रम् ।आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रंभूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥ ४॥ बाह्वन्तरे मधुजितः श्रितकौस्तुभे याहारावलीव हरिनीलमयी विभाति ।कामप्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमालाकल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ॥ ५॥ कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेःधाराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव ।मातुस्समस्तजगतां महनीयमूर्तिःभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥ ६॥ प्राप्तं पदं प्रथमतः खलु यत्प्रभावात्माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन ।मय्यापतेत्तदिह मन्थरमीक्षणार्धंमन्दालसं च मकरालयकन्यकायाः ॥ ७॥ दद्याद्दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारांअस्मिन्नकिञ्चनविहङ्गशिशौ विषण्णे ।दुष्कर्मघर्ममपनीय चिराय दूरंनारायणप्रणयिनीनयनाम्बुवाहः ॥ ८॥ इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र-दृष्ट्या त्रिविष्टपपदं सुलभं लभन्ते ।दृष्टिः प्रहृष्टकमलोदरदीप्तिरिष्टांपुष्टिं कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ॥ ९॥ गीर्देवतेति गरुडध्वजसुन्दरीति (गरुडध्वजभामिनीति)शाकम्भरीति शशिशेखरवल्लभेति ।सृष्टिस्थितिप्रलयकेलिषु संस्थितायैतस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरुण्यै ॥ १०॥ श्रुत्यै नमोऽस्तु शुभकर्मफलप्रसूत्यैरत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणार्णवायै ।शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्रनिकेतनायैपुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तमवल्लभायै ॥ ११॥ नमोऽस्तु नालीकनिभाननायैनमोऽस्तु दुग्धोदधिजन्मभूम्यै ।नमोऽस्तु सोमामृतसोदरायैनमोऽस्तु नारायणवल्लभायै ॥ १२॥ सम्पत्कराणि सकलेन्द्रियनन्दनानिसाम्राज्यदानविभवानि सरोरुहाक्षि । (सरोरुहाणि)त्वद्वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि (दुरितोत्तरणोद्यतानि, दुरितोद्धरणोद्यतानि)मामेव मातरनिशं कलयन्तु मान्ये ॥ १३॥ यत्कटाक्षसमुपासनाविधिःसेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।सन्तनोति वचनाङ्गमानसैःत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥ १४॥ सरसिजनिलये सरोजहस्तेधवलतमांशुकगन्धमाल्यशोभे ।भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञेत्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥ १५॥ दिग् हस्तिभिः कनककुम्भमुखावसृष्ट-स्वर्वाहिनीविमलचारुजलप्लुताङ्गीम् ।प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष-लोकाधिनाथगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ॥ १६॥ कमले कमलाक्षवल्लभे त्वंकरुणापूरतरङ्गितैरपाङ्गैः ।अवलोकय मामकिञ्चनानांप्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयायाः ॥ १७॥ स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहंत्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् ।गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनोभवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥ १८॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृत श्री कनकधारास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ नमोऽस्तु हेमाम्बुजपीठिकायैनमोऽस्तु भूमण्डलनायिकायै ।नमोऽस्तु देवादिदयापरायैनमोऽस्तु शार्ङ्गायुधवल्लभायै ॥ १९॥ नमोऽस्तु देव्यै भृगुनन्दनायैनमोऽस्तु विष्णोरुरसि स्थितायै ।नमोऽस्तु लक्ष्म्यै कमलालयायैनमोऽस्तु दामोदरवल्लभायै ॥ २०॥ नमोऽस्तु कान्त्यै कमलेक्षणायैनमोऽस्तु भूत्यै भुवनप्रसूत्यै ।नमोऽस्तु देवादिभिरर्चितायैनमोऽस्तु नन्दात्मजवल्लभायै ॥ २१॥ देवि प्रसीद जगदीश्वरि लोकमातःकल्याणगात्रि कमलेक्षणजीवनाथे ।दारिद्र्यभीतिहृदयं शरणागतं माम्आलोकय प्रतिदिनं सदयैरपाङ्गैः ॥ २२॥ अयं स्तवः स्वामिना शङ्करभगवत्पादेन ब्रह्मव्रतस्थेन कालटिनाम्निस्वग्राम एवाकिञ्चन्यपरिखिन्नाया द्विजगृहिण्या निर्धनत्वमार्जनायनिरमायि । तेन स्तवेन प्रीता लक्ष्मीर्विप्रं विपुलधनदानेनाप्रीणयदितिशङ्करविजयतः समाधिगम्यते, “स मुनिर्मुरजित्कुटुम्बिनींपदचित्रैर्नवनीत कोमलैः ंअधुरैरूपतस्थिवां- स्तवैः”इत्यादिना ॥ एते श्रीमन्मातुरभ्यर्थनया स्तवमेतमतनिषतेतिकालटिग्रामनिकटवर्तिनां विदुषां मतम् । तदारभ्य कर्णाकर्णिकयातथानुश्रुतम् ।

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Govardhan Puja

Govardhan Puja 2025 Date And Time: कब है गोवर्धन और अन्नकूट पूजा? जानिए शुभ मुहूर्त, विधि और पौराणिक कथा

Govardhan Puja 2025 Date And Time: गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव का महत्व हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा (Govardhan Puja 2025) का पर्व अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। इसे अन्नकूट पूजा (Annakut Puja 2025) के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व हर साल कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि पर मनाया जाता है। यह मुख्यतः दिवाली के अगले दिन पड़ता है। यह पर्व मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को घनघोर वर्षा से बचाने के लिए Govardhan Puja गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर धारण किया था। मथुरा, वृंदावन, नंदगांव, गोकुल और बरसाना जैसे स्थानों पर इस पर्व की भव्यता विशेष तौर पर देखने को मिलती है। गोवर्धन पूजा 2025 की सही तिथि और शुभ मुहूर्त (Govardhan Puja Shubh Muhurat 2025) वर्ष 2025 में गोवर्धन पूजा की सही तिथि और शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं: 1. गोवर्धन पूजा की तिथि (Govardhan Puja Date 2025) पंचांग के अनुसार, गोवर्धन पूजा बुधवार, 22 अक्टूबर 2025 को की जाएगी। प्रतिपदा तिथि प्रारम्भ: 21 अक्टूबर 2025 को शाम 05:54 बजे से। प्रतिपदा तिथि समाप्त: 22 अक्टूबर 2025 को रात्रि 08:16 बजे समाप्त। नोट: उदयातिथि के अनुसार, गोवर्धन एवं अन्नकूट पूजा 22 अक्टूबर 2025 को होगी। 2. गोवर्धन पूजा के शुभ मुहूर्त (Govardhan Puja Shubh Muhurat) गोवर्धन पूजा के लिए तीन प्रमुख शुभ मुहूर्त बताए गए हैं: 1. गोवर्धन पूजा प्रातःकाल मुहूर्त: सुबह 6 बजकर 26 मिनट से रात 8 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। 2. गोवर्धन पूजा सायाह्नकाल/संध्या काल मुहूर्त: दोपहर 3 बजकर 29 मिनट से शाम 5 बजकर 44 मिनट तक रहेगा। 3. गोवर्धन पूजा गोधूली मुहूर्त: शाम को 05:44 से 06:10 के बीच रहेगा। क्यों कहा जाता है इसे अन्नकूट पूजा? (Why is it called Annakut Puja?) गोवर्धन पूजा के दिन को अन्नकूट पूजा (Annakut Puja) भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन भक्त तरह-तरह के भोजन तैयार करते हैं। अन्नकूट का अर्थ: अन्नकूट का अर्थ ‘अन्न का ढेर’ या ‘कई प्रकार के अन्न का मिश्रण’ होता है। सजावट: भक्त इन तैयार किए गए भोजनों को गोवर्धन पर्वत के आकार में सजाते हैं। भोग: इस अन्नकूट को भोग के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किया जाता है और इसके बाद प्रसाद के रूप में अन्य लोगों को बांटा जाता है। प्रसाद: कई स्थानों पर इस दिन बाजरे की खिचड़ी या कड़ी बाजरे का भोग लगाकर लोगों में बांटा जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के मंदिरों में विशेष रूप से अन्नकूट का आयोजन किया जाता है। गोवर्धन पूजा और अन्नकूट महोत्सव की पौराणिक कथा (Govardhan Puja Katha) गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा भगवान श्रीकृष्ण और इंद्रदेव से जुड़ी हुई है: इंद्र का मान-मर्दन: द्वापर युग में, ब्रजवासी इंद्र की पूजा करके उन्हें छप्पन भोग अर्पित करते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रथा को बंद करने और गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए कहा, क्योंकि पर्वत, खेत और गाय ही उनका जीवन चला रहे थे। इंद्र का क्रोध: जब ब्रजवासियों ने इंद्र उत्सव मनाना छोड़ दिया, तो इंद्रदेव क्रोधित हो गए और ब्रजमंडल में मूसलधार वर्षा करने लगे। गिरिराज का रक्षण: ब्रजवासियों को इस वर्षा से बचाने के लिए, श्रीकृष्ण ने अपने वाम हस्त की कनिष्ठा (छोटी) अंगुली के नाखून पर गोवर्धन पर्वत को 7 दिन तक उठाकर इंद्र का मान-मर्दन किया था। सभी ग्रामीण, गोप और गोपिकाएं पर्वत की छाया में सुखपूर्वक रहे। इंद्र की क्षमा: सातवें दिन, ब्रह्माजी के कहने पर इंद्रदेव ने श्रीकृष्ण से क्षमा याचना की। उत्सव की शुरुआत: भगवान श्रीकृष्ण ने 7वें दिन गोवर्धन पर्वत को नीचे रखा और प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा करके अन्नकूट उत्सव मनाने की आज्ञा दी। तभी से यह उत्सव ‘अन्नकूट’ के नाम से भी मनाया जाने लगा। बाद में, गोवर्धन के रूप में भगवान श्रीकृष्ण को छप्पन भोग लगाने का प्रचलन हुआ। गोवर्धन पूजा की सरल विधि (Govardhan Puja Vidhi) गोवर्धन पूजा के दिन साधक को धन, संतान और गौ रस में वृद्धि प्राप्त होती है। पूजा विधि इस प्रकार है: 1. गिरिराज महाराज का निर्माण: सबसे पहले गोबर से गिरिराज महाराज (गोवर्धन पर्वत) की आकृति तैयार की जाती है। 2. पूजन सामग्री: इसके बाद धूप, दीप, नैवेद्य, जल, फल, फूल आदि चढ़ाए जाते हैं। 3. नाभि पूजा: गोवर्धन जी की नाभि के स्थान पर मिट्टी का दीपक या कोई अन्य पात्र रखा जाता है। इस पात्र में दूध, दही, गंगाजल, शहद और बताशे डाले जाते हैं। 4. पशुओं की पूजा: इस दिन कृषि के काम में आने वाले पशुओं जैसे गाय और बैल की पूजा का भी विधान है। 5. परिक्रमा और प्रसाद: पूजा समाप्त होने के बाद, गोवर्धन जी की सात बार परिक्रमा की जाती है। नाभि में रखे पात्र की सामग्री को पूजा के बाद प्रसाद के रूप में बांट दिया जाता है।

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Bhai Dooj 2025

Bhai Dooj 2025 Date And Time: किस दिशा में बिठाकर करें भाई का तिलक? जानिए सही तिथि, शुभ मुहूर्त और नियम

भाई दूज का महत्व (Importance of Bhai Dooj) भाई दूज (Bhai Dooj 2025 Kab Hai?) का पर्व भाई-बहन के पवित्र प्रेम और स्नेह का प्रतीक माना जाता है, जिसे यम द्वितीया या भ्रातृ द्वितीया भी कहा जाता है। यह त्योहार दीपावली के दो दिन बाद, कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाया जाता है। Bhai Dooj 2025 इस शुभ दिन पर, बहनें अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उनकी लंबी आयु, सुख-समृद्धि और सुरक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं। वहीं, भाई अपनी बहन की सदैव रक्षा करने का वचन देते हैं और उन्हें उपहार भेंट करते हैं। भाई दूज 2025 की सही तिथि और शुभ मुहूर्त (Bhai Dooj 2025 Exact Date and Shubh Muhurat) Bhai Dooj: भाई दूज 2025 की सही तारीख जानना हर भाई-बहन के लिए महत्वपूर्ण है। Bhai Dooj ज्योतिषीय दृष्टि से इस वर्ष कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि की शुरुआत 22 अक्टूबर 2025 की रात 08 बजकर 16 मिनट पर होगी। Bhai Dooj 2025 यह तिथि 23 अक्टूबर 2025 की रात 10 बजकर 46 मिनट पर समाप्त होगी। पंचांग और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, भाई दूज का पर्व 23 अक्टूबर 2025 (गुरुवार) को मनाया जाएगा। तिलक करने का शुभ समय (Tilak Shubh Muhurat) तिलक करने का शुभ मुहूर्त (Bhai Dooj 2025 Shubh Muhurat) दोपहर के समय रहेगा। Bhai Dooj 2025 इस समय किया गया तिलक अत्यंत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। तिलक करने का शुभ मुहूर्त: दोपहर 01 बजकर 13 मिनट से 03 बजकर 28 मिनट तक रहेगा। तिलक के दौरान भाई-बहन के बैठने की सही दिशा और नियम (Bhai Dooj 2025 Disha And Niyam) तिलक समारोह के दौरान सही दिशा में बैठना धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। भाई का मुख किस दिशा में हो? (Brother’s Direction) तिलक करते समय भाई का मुख उत्तर (North) या उत्तर-पश्चिम (North-West) दिशा की ओर होना शुभ माना जाता है। उत्तर दिशा को कुबेर की दिशा माना जाता है, जबकि उत्तर-पश्चिम दिशा वायु की दिशा है। इन दिशाओं की ओर मुख करने से भाई के जीवन में स्थिरता और उन्नति आती है। बहन का मुख किस दिशा में हो? (Sister’s Direction) बहन को अपने भाई का तिलक करते समय उत्तर-पूर्व (North-East) या पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए। इस दिशा की ओर मुख करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। भाई दूज Bhai Dooj पर तिलक करने के महत्वपूर्ण नियम (Bhai Dooj 2025 Rituals) भाई दूज के दिन तिलक करते समय कुछ विशेष नियमों का पालन करना अनिवार्य है:It is mandatory to follow some special rules while doing Tilak on the day of Bhai Dooj: 1. आसन का उपयोग: भाई को हमेशा किसी आसन पर बिठाकर ही तिलक करना चाहिए; उन्हें सीधे जमीन पर नहीं बिठाना चाहिए। 2. पूजा की थाली: पूजा की थाली में रोली या कुमकुम, अक्षत (चावल), मिठाई, सुपारी, सूखा नारियल (नारियल का गोला), और एक दीपक अवश्य रखें। 3. शुभ मुहूर्त का पालन: तिलक हमेशा शुभ मुहूर्त और भद्राकाल से बाहर के समय में ही करें, क्योंकि भद्राकाल में किए गए किसी भी शुभ काम का फल नहीं मिलता है। 4. सिर ढकना: तिलक करते समय बहनें अपना सिर चुनरी से और भाई अपना सिर रुमाल से ढककर रखें। Bhai Dooj बिना सिर ढके तिलक नहीं करना चाहिए। 5. सात्विक भोजन: इस दिन भाई और बहन दोनों को सात्विक भोजन ही करना चाहिए। 6. उपहार और भेंट: तिलक करने के बाद बहन भाई को नारियल का गोला या मिठाई अवश्य खिलाएं। Bhai Dooj इसके साथ ही, भाई अपनी बहन को वस्त्र, मिठाई, ड्राई फ्रूट्स, चॉकलेट या पर्सनलाइज्ड गिफ्ट उपहार के रूप में दें।

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