July 13, 2024

Raksha Bandhan:राखी क्यों मनाई जाती है? इसके पीछे की कहानी क्या है?

रक्षाबंधन हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा के दिन धूम-धाम से मनाया जाता है, जो इस बार 26 अगस्त को होगा। हर साल बहन अपने भाई की कलाई में विधि अनुसार राखी बांधती है और अपनी रक्षा का वचन मांगती है। रक्षा करने और करवाने के लिए बांधा जाने वाला पवित्र धागा Raksha Bandhan रक्षा बंधन कहलाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की रक्षा के लिए उनके कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं और भाई बहनों को जीवन भर उनकी रक्षा का वचन देते हैं लेकिन क्या आप जानते है कि रक्षाबंधन क्यों बनाया जाता है? चलिए जानते हैं रक्षाबंधन मनाने के पीछे क्या हैं कारण। Raksha Bandhan पहले तुलसी और नीम के पेड़ को राखी बांधी जाती थी सदियों से चली आ रही रीति के मुताबिक, बहन भाई को राखी बांधने से पहले प्रकृति की सुरक्षा के लिए तुलसी और नीम के पेड़ को राखी बांधती है जिसे वृक्ष-रक्षाबंधन भी कहा जाता है। हालांकि आजकल इसका प्रचलन नही है। राखी सिर्फ बहन अपने भाई को ही नहीं बल्कि वो किसी खास दोस्त को भी राखी बांधती है जिसे वो अपना भाई जैसा समझती है और तो और रक्षाबंधन के दिन पत्नी अपने पति को और शिष्य अपने गुरु को भी राखी बांधते है। Raksha Bandhan 2024: कब है रक्षा बंधन? जान लें क्या है राखी बांधने का शुभ मुहूर्त Raksha Bandhan भगवान इंद्र को रक्षाबंधन से मिली थी जीत भविष्यपुराण में ऐसा कहा गया है कि देवाताओं और दैत्यों के बीच एक बार युद्ध छिड़ गया, बलि नाम के असुर ने भगवान इंद्र को हरा दिया और अमरावती पर अपना अधिकार जमा लिया। तब इंद्र की पत्नी सची मदद का आग्रह लेकर भगवान विष्णु के पास पहुंची। भगवान विष्णु ने सची को सूती धागे से एक हाथ में पहने जाने वाला वयल बना कर दिया। भगवान विष्णु ने सची से कहा कि इसे इंद्र की कलाई में बांध देना। सची ने ऐसा ही किया, उन्होंने इंद्र की कलाई में वयल बांध दिया और सुरक्षा व सफलता की कामना की। इसके बाद भगवान इंद्र ने बलि को हरा कर अमरावती पर अपना अधिकार कर लिया। Raksha Bandhan रक्षाबंधन: भाई-बहन के अटूट प्रेम का त्यौहार Raksha Bandhan रक्षाबंधन, भाई-बहन के बीच प्रेम और स्नेह का पवित्र त्यौहार, श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन, बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र (राखी) बांधकर उनके रक्षा का वचन लेती हैं और भाई बदले में अपनी बहन की रक्षा का वचन देते हैं। रक्षाबंधन मनाने के पीछे कई धार्मिक और पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं: Draupadi and Krishna: महाभारत में, जब द्रौपदी को दुर्योधन और उसके भाइयों ने सभा में अपमानित किया, तब भगवान कृष्ण ने उनकी रक्षा का वचन दिया था। इस घटना के प्रतीक के रूप में, द्रौपदी ने अपनी साड़ी का एक टुकड़ा कृष्ण की कलाई पर बांध दिया था। Kunti and Indra: एक कथा के अनुसार, देवी कुंती ने अपने पुत्रों की रक्षा के लिए इंद्रदेव से रक्षाबंधन प्राप्त किया था। Yama and Yamuna: यमराज, मृत्यु के देवता, अपनी बहन यमुना से बहुत प्रेम करते थे। यमुना ने उन्हें रक्षाबंधन मनाने और भाई-बहन के प्रेम का त्यौहार मनाने के लिए राजी किया। रक्षाबंधन का महत्व: भाई-बहन का प्रेम: रक्षाबंधन भाई-बहन के बीच अटूट प्रेम और स्नेह का प्रतीक है। सुरक्षा का वचन: भाई अपनी बहन की रक्षा का वचन देते हैं, चाहे इसके लिए उन्हें कितना भी बलिदान देना पड़े। सामाजिक बंधन: रक्षाबंधन केवल भाई-बहन तक ही सीमित नहीं है, यह दोस्तों, गुरुओं और शिष्यों के बीच भी मनाया जाता है। बुराई पर अच्छाई की जीत: रक्षाबंधन बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी है। रक्षाबंधन कैसे मनाया जाता है: रक्षा सूत्र बांधना: इस दिन, बहनें अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र (राखी) बांधती हैं। मिठाई खिलाना: बहनें अपने भाई को मिठाई खिलाती हैं और उनसे आशीर्वाद लेती हैं। भाई द्वारा उपहार: भाई अपनी बहनों को उपहार देते हैं। भोजन: परिवार के सदस्य एक साथ मिलकर भोजन करते हैं। निष्कर्ष: रक्षाबंधन भाई-बहन के बीच प्रेम, स्नेह और बलिदान का त्यौहार है। यह एक ऐसा अवसर है जब भाई-बहन अपने रिश्ते को मजबूत करते हैं और एक दूसरे के प्रति अपना समर्थन और प्यार व्यक्त करते हैं।

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Kawad Yatra 2024: 22 जुलाई से कांवड़ यात्रा शुरू, शिवजी की कृपा पाने के लिए यात्रा के दौरान अपनाएं ये नियम

सावन माह की शुरुआत 22 जुलाई 2024, सोमवार के दिन से हो रही है। ऐसे में Kawad Yatra 2024 कांवड़ यात्रा की शुरुआत भी इसी दिन से होगी, जिसका समापन 02 अगस्त 2024 को सावन शिवरात्रि पर होगा। सनातन परंपरा में श्रावण मास में की जाने वाली Kawad Yatra 2024 कांवड़ यात्रा का विशेष महत्व होता है। हर साल लाखों श्रद्धालु सुख-समृद्धि की कामना लिए इस पावन यात्रा के लिए निकलते हैं। इस साल सावन माह की शुरुआत 22 जुलाई 2024, सोमवार के दिन से हो रही है। ऐसे में कांवड़ यात्रा की शुरुआत भी इसी दिन से होगी, जिसका समापन 02 अगस्त 2024 को सावन शिवरात्रि पर होगा। श्रावण के महीने में कांवड़ लेकर जाने और शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा होती है। शिव भक्त कांवड़ को बांधकर कंधों पर लटकाकर अपने मूल स्थान के शिवालय में लाते हैं और फिर यहां के शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करते हैं। हिंदू धार्मिक मान्यताओं अनुसार सबसे पहले कावड़ यात्रा की शुरुआत भगवान परशुराम ने की थी। कहते हैं भगवान परशुराम गढ़मुक्तेश्वर धाम से गंगाजल लेकर आए थे और फिर इस गंगाजल को उन्होंने यूपी के बागपत के पास स्थित ‘पुरा महादेव’ पर चढ़ाया था। भगवान शिव को समर्पित इस कांवड़ यात्रा में श्रद्धालु पवित्र गंगा जल या फिर किसी नदी विशेष के शुद्ध जल से अपने ईष्ट देव का जलाभिषेक करते हैं। शुचिता, पवित्रता और संकल्प के साथ की गई इस यात्रा से प्रसन्न होकर कल्याण के देवता भगवान शिव अपने भक्तों पर अवश्य कृपा करते हैं और उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। लेकिन ध्यान रहे कांवड़ यात्रा के कुछ नियम भी होते हैं, जिन्हें तोड़ने पर न सिर्फ यह यात्रा अधूरी रह जाती है उसका पूर्ण फल भी नहीं मिलता। सपने में भगवान को देखना मिलता है चौकाने वाला संकेत जानिए क्या है रहस्य ? Kawad Yatra 2024:कांवड़ यात्रा के नियम

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