2023

कहां और कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति, जानिए शिवजी से जुड़े ये रहस्य

पौराणिक कथाओं के अनुसार इस ब्रह्मांड के सृष्टि बनने से पहले पृथ्वी एक अंतहीन शक्ति थी। सृष्टि बनने के बाद भगवान विष्णु पैदा हुए और भगवान विष्णु (Lord Vishnu) की नाभि से पैदा हुए भगवान ब्रह्मा। पृथ्वी पर पैदा होने के बाद कई सालों तक इन दोनों में युद्ध होता रहा है। दोनों आपस में एक दूसरे को ज्यादा शक्तिशाली मानते रहे। तभी आकाश में एक चमकता हुआ पत्थर दिखा और आकाशवाणी हुई कि जो इस पत्थर का अंत ढूंढ लेगा, उसे ही ज्यादा शक्तिशाली माना जाएगा। वह पत्थर शिवलिंग था। भगवान शिव को भक्त शिवशंकर, त्रिलोकेश, कपाली, नटराज समेत कई नामों से पुकराते हैं। भगवान शिव की महिमा अपरंपार है। हिंदू धर्म में भगवान शिव की मूर्ति व शिवलिंग दोनों की पूजा का विधान है। कहते हैं कि जो भी भक्त भगवान शिव की सच्ची श्रद्धा से पूजा-अर्चना करता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है। धार्मिक शास्त्रों में शिवलिंग का महत्व बताया गया है. शिवलिंग को इस ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है. तो चलिए पंडित इंद्रमणि घनस्याल से जानते हैं शिवलिंग से जुड़ी कुछ रोचक बातें। मान्यता है कि शिवलिंग की पूजा समस्त ब्रह्मांड की पूजा के बराबर मानी जाती है, क्योंकि शिव ही समस्त जगत के मूल हैं। शिवलिंग के शाब्दिक अर्थ की बात की जाए तो ‘शिव’ का अर्थ है ‘परम कल्याणकारी’ और ‘लिंग’ का अर्थ होता है ‘सृजन’। लिंग का अर्थ संस्कृत में चिंह या प्रतीक होता है। इस तरह शिवलिंग का अर्थ हुआ शिव का प्रतीक। भगवान शिव को देव आदिदेव भी कहा जाता है। जिसका मतलब है कोई रूप ना होना। भगवान शिव अनंत काल और सृजन के प्रतीक हैं। भगवान शिव प्रतीक हैं, आत्मा के जिसके विलय के बाद इंसान परमब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। शिव जी की पूजा ही क्यों होती है लिंग रूप में, जानें अद्भुत रहस्य महार्षि भृगु जी द्वारा रचित ग्रंथ भृगु संहिता जो कि ताम्र पत्रों पर लिखित सुल्तानपुर लोधी में स्थित है। इस प्राचीन ग्रंथ में भगवान शिव जी की शिवलिंग के रूप में ही क्यों पूजा होती है सवाल का ऑथेंटिकेट जवाब लिखा हुआ है। ग्रंथ को पढ़ने वाले महायश वाचक श्री मुकेश पाठक जी ने बताया की भगवान शिव की पूजा भी लिंगाकृति में होती है इसका भी कारण है भृगु जी द्वारा दिया गया श्राप।  त्रिदेवों में से सर्वश्रेष्ठ कौन हैं ? इसकी परीक्षा लेने के लिये भृगु जी महाराज पहले सृष्टि रचियता ब्रह्मा जी के पास गये परन्तु सर्वश्रेष्ठ होने का गुण न पाकर फिर भगवान शंकर के पास कैलाश गये। शिव जी समाधी में लीन थे, उनके गणों ने भृगु जी को मिलने से मना कर दिया। महर्षि होने के कारण किसी भी स्थान पर जाने के लिय कोई रोक टोक नहीं थी। फिर भी महर्षि ने कहा कि, कृपा आप उन्हें मेरे आने का संदेशा अवश्य दें परन्तु शिव जी के गण हरगिज मानने को तैयार ना थे और ऐसा वाद-विवाद हो गया कि गणों ने भृगु जी का अपमान करना आरम्भ कर दिया। उनको मारने के लिये त्रिशूल इत्यादि शस्त्रों को साथ लेकर भृगु जी के पीछे-पीछे भागने लगे। अब भृगु जी ठहरे महर्षि उनके पास कोई अस्त्र-शस्त्र नहीं था। अगर था तो केवल एक कमंडल। भागते-भागते भृगु जी एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां आकर वह ठहर गये और उनको क्रोध आ गया और मन ही मन सोचने लगे कि हे शंकर जी आज मैं आपके पास आया तो किसी और काम से था। आज तो मैंने आपको एक बहुत बड़ी उपाधी से सुशोभित करना था परन्तु आपके गणों ने मेरी यह हालत कर दी।  इस हालात पर क्रोधित होकर महार्षि भृगु जी ने भगवान शंकर जी को श्राप दे दिया कि जाओ आपकी भी कलयुग में पूजा न हो। श्राप मिलते ही भगवान शंकर का तीसरा नेत्र खुल गया और महर्षि के सामने उपस्थित हो गये। कहने लगे, “हे भृगु ! अपना दिया श्राप वापिस लो क्योंकि इस सृष्ठि के निर्माण करने में मेरा भी नाम आता है। अगर मुझे ही इस सृष्टि से बाहर निकाल दोगे तो इस सृष्टि में कुछ नहीं बचेगा। अगर हम सृष्टि बना सकते हैं तो इसका विनाश भी कर सकते हैं। जब भृगु जी ने इस पर गंभीरता से विचार किया तो सोचने लगे कि यह कहते तो ठीक हैं – अगर बना सकते हैं तो बिगाड़ भी सकते हैं।  भृगु जी का भी क्रोध शांत हुआ और शंकर जी को कहा, हे शंकर जी दिया गया श्राप तो वापिस नहीं हो सकता परन्तु इसमें कुछ परिवर्तन किया जा सकता है। शंकर जी श्राप के परिवर्तन के लिये सहमत हो गये। तब महार्षि ने पूछा प्रभु क्या आप अब प्रसन्न हैं, तो शंकर जी ने सहमती जतायी। तब महर्षि भृगु जी बोले कि आपकी कलयुग में पूजा अवश्य होगी परन्तु जो यह शरीरिक आकार लिये हुए हो, इस रूप में पूजा न होकर ब्रह्मांड रूपी लिंग आकृति में होगी। यही भृगु जी का श्राप ही सबसे बडा कारण है कि – भगवान शंकर की पूजा एक लिंग की आकृति में होती है। तब भगवान शंकर जी ने महार्षि भृगु को आर्शीवाद दिया। हे महर्षि! आप जिस कार्य में लगे हुए हैं, आपका वह कार्य पूर्ण हो। धार्मिक ग्रंथों में लिखा गया है कि – संत वचन पलटे नहीं पलट जाये ब्रह्मांड। कैसे हुई शिवलिंग की उत्पत्ति पौराणिक कथा के अनुसार, सृष्टि बनने के बाद भगवान विष्णु और ब्रह्माजी में युद्ध होता रहा। दोनों खुद को सबसे अधिक शक्तिशाली सिद्ध करने में लगे थे। इस दौरान आकाश में एक चमकीला पत्थर दिखा और आकाशवाणी हुई कि इस पत्थर का जो भी अंत ढूंढ लेगा, वह ज्यादा शक्तिशाली माना जाएगा. मान्यता है कि वह पत्थर शिवलिंग ही था। पत्थर का अंत ढूंढने के लिए भगवान विष्णु नीचे तो भगवान ब्रह्मा ऊपर चले गए परंतु दोनों को ही अंत नहीं मिला. तब भगवान विष्णु ने स्वयं हार मान ली. लेकिन ब्रह्मा जी ने सोचा कि अगर मैं भी हार मान लूंगा तो विष्णु को ज्यादा शक्तिशाली समझा जाएगा। इसलिए ब्रह्माजी ने कह दिया कि उनको पत्थर का अंत मिल गया है। इसी बीच फिर आकाशवाणी हुई कि मैं शिवलिंग हूं और मेरा ना कोई अंत है, ना ही शुरुआत और उसी

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भगवान शिव के पाँच डरावने और रहस्यात्मक मंदिर

पूरी दुनिया में भगवान शंकर के बहुत सारे मंदिर हैं ज्यादातर मंदिरे हमारे देश भारत में मौजूद हैं भगवान शंकर जितने सरल और सीधे हैं उतने ही वह रहस्य आत्मक भी हैं आज हम आपको भगवान शिव के कुछ मंदिर के विषय में  जानकारी देंगे। स्तंभेश्वर महादेव मंदिर भेश्वर महादेव मंदिर यह मंदिर अरब सागर के तट पर हैं इस मंदिर को लगभग डेढ़ सौ साल पहले खोजा गया था स्तंभेश्वर महादेव मंदिर का वर्णन शिव महापुराण के रूद्र संहिता में किया गया है। इस मंदिर के अंदर जो शिवलिंग है वह 4 फुट ऊंचा और दो व्यास वाला है यह मंदिर इसीलिए रहस्यात्मक है की यह मंदिर दिन में दो बार पल भर के लिए गायब हो जाता है। कुछ ही क्षणों बाद फिर से दिखाई देने लगता है इस मंदिर का दर्शन भक्त लोग तभी कर सकते हैं जब समुद्र की लहरें बहुत कम हो वहां जाने वाले सभी भक्तों को एक विशेष पर्ची दी जाती है। जिसमें वहां के दर्शन से लेकर सावधानी तक सभी प्रकार की सूचनाएं लिखी होती है इस मंदिर को लेकर एक पौराणिक कथा भी है। एक बार राक्षस तारकासुर ने भगवान शंकर को खुश करने के लिए बहुत वर्षों तक तपस्या की तारकासुर की तपस्या से भगवान शिव खुश होकर प्रकट हुए।  भगवान शंकर ने तारकासुर से वरदान मांगने को कहा वरदान में तारकासुर ने शिव से कहा कि मुझे सिर्फ आपका ही पुत्र मार सकेगा वह भी सिर्फ 6 दिन का होना चाहिए दूसरा कोई नहीं मुझे मार न सके। मुझे ऐसा वरदान दीजिए भगवान शंकर ने  वैसा ही वरदान दिया और वही अंतर्ध्यान हो गये जैसे ही भगवान शिव ने तारकासुर को वरदान दिया तो तारकासुर ने तीनों लोकों में सब को परेशान करना शुरू कर दिया। देवताऋषि मुनि डर के मारे भगवान भोलेनाथ के पास हाथ जोड़कर पहुंच गए देवताओं की बात सुनने के पश्चात भगवान भोलेनाथ ने कार्तिकेय को प्रकट किया। सिर्फ 6 दिन में ही कार्तिकेय ने तारकासुर को मार दिया कार्तिकेय को जब पता चला कि तारकासुर भगवान भोलेनाथ का अनन्य भक्त हैं तो उनको बहुत दुख हुआ। तब ब्रह्माजी ने कार्तिकेय को कहा जिस स्थान पर तुमने तारकासुर का वध किया है उसी स्थान पर भगवान भोलेनाथ का मंदिर बना दो तो तुम्हें शांति मिलेगी और तुम्हारा दुःख दूर होगा। तभी भगवान कार्तिकेय ने अपना दुख दूर करने के लिए तारकासुर के स्मरण मैं स्तंभेस्वर मंदिर का निर्माण कराया था। निष्कलंक महादेव मंदिर निष्कलंक महादेव मंदिर यह मंदिर गुजरात में स्थित है इस मंदिर के नाम से ही पता चल रहा है कि यह सभी कलंक को धोने वाला मंदिर है।  यह मंदिर पांचों पांडवों ने बनाया था जब कौरव और पांडवों में महाभारत का युद्ध हुआ युद्ध में पांडवों के हाथों कौरवों की मौत हो गई तब कौरवों को एहसास एहसास हुआ कि हमने तो अपने ही भाइयों का कत्ल किया है।  इस कलंक को मिटाने के लिए भगवान श्री कृष्ण के आदेश के अनुसार पांचो पांडव ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। अचलेश्वर महादेव मंदिर इस नाम से पूरे भारत देश में बहुत सारे मंदिर बने हुए हैं लेकिन प्रमुख मंदिर राजस्थान के धौलपुर में स्थित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी और हैरान कर देने वाली बात यह है कि यह मंदिर में स्थित शिवलिंग एक दिन में तीन  बार अपना रंग बदलती है। सुबह शिवलिंग का रंग लाल और दोपहर में केसरिया और शाम ढलते ढलते इसका रंग सावला हो जाता है अचलेश्वर शिवलिंग की एक और विशेषता है। इस शिवलिंग के छोर को आज तक कोई नहीं जान पाया कि यह कितना बड़ा है बहुत बार शिवलिंग के छोर को जानने के लिए खुदाई भी की गई लेकिन इसका पता न चल सका। लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर लक्ष्मेश्वर महादेव मंदिर यह मंदिर भी बहुत प्राचीन है ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना स्वयं भगवान राम ने जब खर और दूषण को मार दिया उसके पश्चात लक्ष्मण के कहने पर किया था। इस शिवलिंग की यह विशेषता है इस शिव लिंग में एक लाख छेद हे और इन 1 लाख छिद्रों की अलग-अलग विशेषताएं हैं शिवलिंग में एक लाख छेद होने के कारण इस मंदिर का नाम लक्ष्यस्वर महादेव मंदिर पड़ा। बिजली महादेव मंदिर हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्थित बिजली महादेव मंदिर कुल्लू का पूरा इतिहास बिजली से ही जुड़ा हुआ है व्यास और पार्वती नदी के पास एक ऊंचे पर्वत में यह शिवलिंग स्थित है ऐसी मान्यता है कि हर 12 वर्ष में शिवलिंग के ऊपर एक बिजली गिरती है और वह शिवलिंग खंडित हो जाता है वहां के पुजारी मक्खन आदि से उस शिवलिंग को पुनः जोड़ कर यथावत कर देते हैं

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महाकालेश्वर और काल भैरो मंदिर से जुड़े 3 बड़े रहस्य, जानें कैसे पहुंचें और कहां ठहरे

महाकालेश्वर मंदिर को लेकर कई सारी भ्रांतियां हैं। जैसे कई लोगों को लगता है कि महाकालेश्वर का मेन मंदिर ही वो है जहां भगवान को शराब पिलाई जाती है, लेकिन मैं आपको बता दूं कि ये दो अलग-अलग मंदिर हैं। ये मंदिर बहुत दूर नहीं हैं और कहा जाता है कि इस मंदिर के गर्भग्रह में एक गुफा है जो महाकाल मंदिर से जुड़ी हुई है। जहां भैरो बाबा का मंदिर अपने आप में प्रसिद्ध है वहीं महाकाल मंदिर से जुड़े भी कई रहस्य हैं। आज हम आपको महाकाल मंदिर से जुड़े तीन गहरे रहस्यों के बारे में बताने जा रहे हैं। इस लेख में यह भी बताने जा रहे हैं कि कैसे आप महाकालेश्वर मंदिर पहुंच सकते हैं और यहां ठहरने के लिए कुछ बेहतरीन जगहों के बारे में भी बताने जा रहे हैं।  भैरो बाबा के मंदिर में पिलाई जाती है शिव को शराब उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर और काल भैरो के मंदिर के बारे में तो आप जानते ही होंगे। काल भैरो का मंदिर देश का ही नहीं बल्कि दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान शिव को शराब पिलाई जाती है और जहां पूरी दुनिया में मंदिरों के आस-पास शराब आदि की दुकानें हटा दी जाती हैं वहीं दूसरी ओर महाकाल के मंदिर परिसर से लेकर इसके रास्ते तक में बहुत सारी शराब की दुकानें लगवाई गई हैं और यही नहीं यहां प्रसाद बेचने वाले लोग भी शराब अपने पास रखते हैं। 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर का शिवलिंग स्वयंभू (अपने आप प्रकट हुआ) माना जाता है। आज तक ये कोई भी नहीं जानता कि भगवान शिव को मदिरा पिलाने का रिवाज कब से आया और आखिर इतनी शराब जो भगवान शिव पीते हैं वो जाती कहां है। 1. महाकाल के नाम का रहस्य क्योंकि महाकाल में भस्म आरती होती है और ये कहा जाता है कि पहले यहां जलती हुई चिता की राख लाकर पूजा की जाती थी इसलिए माना जाता था कि महाकाल का संबंध मृत्यु से है, पर ये पूरा सच नहीं है। दरअसल, काल का मतलब मृत्यु और समय दोनों होते हैं और ऐसा माना जाता है कि प्राचीन काल में पूरी दुनिया का मनक समय यहीं से निर्धारित होता था इसलिए इसे महाकालेश्वर नाम दे दिया गया।   दूसरा कारण भी काल से ही जुड़ा हुआ था। दरअसल, शिवलिंग तब प्रकट हुआ था जब एक राक्षस को मारना था। भगवान शिव उस राक्षस का काल बनकर आए थे और साथ ही साथ अवंति नगरी (अब उज्जैन) के वासियों के आग्रह पर महाकाल यहीं स्थापित हो गए। ये समय यानि काल के अंत तक यहीं रहेंगे इसलिए भी इन्हें महाकाल कहा जाने लगा। 2. आखिर क्यों रात नहीं गुजारता कोई राजा या मंत्री ऐसा माना जाता है कि विक्रमादित्य के समय से ही इस मंदिर के पास और शहर में कोई राजा या मंत्री रात नहीं गुजारता है। इससे जुड़े कई उदाहरण भी प्रसिद्ध हैं जिनके बारे में आपको जानकर आश्चर्य होगा। दरअसल, लंबे समय तक कांग्रेस और फिर भाजपा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया जो ग्वालियर के राजा भी हैं वो भी आज तक यहां रात को नहीं रुके हैं। इतना ही नहीं, देश के चौथे प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई भी जब मंदिर के दर्शन करने के बाद रात में यहां रुके थे तो उनकी सरकार अगले ही दिन गिर गई थी।   ऐसे ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री वी एस येदियुरप्पा भी जब उज्जैन में रुके थे तो उन्हें कुछ ही दिनों के अंदर इस्तीफा देना पड़ा था। इस रहस्य को कुछ लोग संयोग मानते हैं तो कुछ लोगों के मुताबिक एक लोककथा के अनुसार भगवान महाकाल ही इस शहर के राजा हैं और उनके अलावा कोई और राजा यहां नहीं रह सकता है।  3. भस्म आरती को लेकर भी है एक रहस्य भस्म आरती की कहानी शिवलिंग की स्थापना से ही देखी जाती है। दरअसल प्राचीन काल में राजा चंद्रसेन शिव के बहुत बड़े उपासक माने जाते थे। एक दिन राजा के मुख से मंत्रो का जाप सुन एक किसान का बेटा भी उनके साथ पूजा करने गया, लेकिन सिपाहियों ने उसे दूर भेज दिया। वो जंगल के पास जाकर पूजा करने लगा और वहां उसे अहसास हुआ कि दुश्मन राजा उज्जैन पर आक्रमण करने जा रहे हैं और उसने प्रार्थना के दौरान ही ये बात पुजारी को बता दी। ये खबर आग की तरह फैल गई और उस समय विरोधी राक्षस दूषण का साथ लेकर उज्जैन पर आक्रमण कर रहे थे। दूषण को भगवान ब्रह्मा का वर्दान प्राप्त था कि वो दिखाई नहीं देगा।  उस वक्त पूरी प्रजा ही भगवान शिवकी अराधना में व्यस्त हो गई और अपने भक्तों की ऐसी पुकार सुनकर महाकाल प्रकट हुए। महाकाल ने दूषण का वध किया और उसकी राख से ही अपना श्रृंगार किया। उसके बाद वो यहीं विराजमान हो गए। तब से भस्म आरती का विधान बन गया। ये दिन की सबसे पहली आरती होती है।   शिवपुराण के अनुसार कपिला गाय के गोबर के कंडे के साथ शमी, पीपल, पलाश, बेर के पेड़ की लड़कियां, अमलतास और बरगद के पेड़ की जड़ को एक साथ जलाया जाता है। इसके बाद ही वो राख बनती है जिससे हर सुबह भगवान शिव की भस्म आरती होती है।  महाकालेश्वर मंदिर कैसे पहुंचें- महाकालेश्वर मंदिर पहुंचना बहुत आसान है। यहां आप देश के किसी भी कोने से आसानी से पहुंच सकते हैं।  ट्रेन- दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या चेन्नई जैसे शहर से आप ट्रेन लेकर उज्जैन सीटी जंक्शन या विक्रम नगर रेलवे स्टेशन पहुंचकर यहां से लोकल बस या टैक्सी लेकर महाकालेश्वर मंदिर पहुंचा सकते हैं। दिल्ली से आप 1000 रूपये के आसपास में पहुंच सकते हैं। हवाई सफ़र- अगर आप हवाई सफ़र से पहुंचना चाहते हैं तो महारानी अहिल्या बाई होल्कर एअरपोर्ट उज्जैन का सबसे निकटतम हवाई अड्डा है। यहां से आप लोकल टैक्सी या बस लेकर जा सकते हैं। दिल्ली से हवाई सफ़र लगभग 6 हज़ार पड़ेगा । सड़क मार्ग से-अगर आप बस या निजी वहान से जाना चाहते हैं उज्जैन देश के लगभग हर राज्य से जुडा हुआ है।  महाकालेश्वर मंदिर के आसपास ठहरने की जगह- महाकालेश्वर मंदिर के आसपास ठहरने के लिए ऐसे कई धर्मशाला हैं जहां आप बहुत कम पैसे में ठहर सकते हैं। जैसे-महाकाल धर्मशाला या फिर सूर्य नारायण व्यास धर्मशाला में

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कौन है बाबा खाटू श्यामजी? क्या है उनकी कहानी?

राजस्थान के शेखावाटी के सीकर जिले में स्थित है परमधाम खाटू। यहां विराजित हैं खाटू श्यामजी। खाटू का श्याम मंदिर बहुत ही प्राचीन है। यहां पर प्रतिवर्ष फाल्गुन माह शुक्ल षष्ठी से बारस तक यह मेला लगता है। श्याम बाबा की महिमा का बखान करने वाले भक्त राजस्थान या भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कोने-कोने में मौजूद हैं। आओ जानते हैं कि कौन है बाबा खाटू श्यामजी? क्या है उनकी कहानी। कौन है खाटूश्यामजी खाटू श्यामजी भगवान श्रीकृष्ण के कलयुगी अवतार हैं। महाभारत के भीम के पुत्र घटोत्कच और घटोत्कच के पुत्र बर्बरिक थे। बर्बरीक को ही बाबा खाटू श्याम कहते हैं। इनकी माता का नाम हिडिम्बा है। खाटू श्याम की कहानी  बर्बरीक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। बर्बरीक की इस घोषणा से कृष्ण चिंतित हो गए। भीम के पौत्र बर्बरीक के समक्ष जब अर्जुन तथा भगवान श्रीकृष्ण उसकी वीरता का चमत्कार देखने के लिए उपस्थित हुए तब बर्बरीक ने अपनी वीरता का छोटा-सा नमूना मात्र ही दिखाया। कृष्ण ने कहा कि यह जो वृक्ष है ‍इसके सारे पत्तों को एक ही तीर से छेद दो तो मैं मान जाऊंगा। बर्बरीक ने आज्ञा लेकर तीर को वृक्ष की ओर छोड़ दिया। जब तीर एक-एक कर सारे पत्तों को छेदता जा रहा था उसी दौरान एक पत्ता टूटकर नीचे गिर पड़ा। कृष्ण ने उस पत्ते पर यह सोचकर पैर रखकर उसे छुपा लिया की यह छेद होने से बच जाएगा, लेकिन सभी पत्तों को छेदता हुआ वह तीर कृष्ण के पैरों के पास आकर रुक गया। तब बर्बरीक ने कहा कि प्रभु आपके पैर के नीचे एक पत्ता दबा है कृपया पैर हटा लीजिए, क्योंकि मैंने तीर को सिर्फ पत्तों को छेदने की आज्ञा दे रखी है आपके पैर को छेदने की नहीं। उसके इस चमत्कार को देखकर कृष्ण चिंतित हो गए। भगवान श्रीकृष्ण यह बात जानते थे कि बर्बरीक प्रतिज्ञावश हारने वाले का साथ देगा। यदि कौरव हारते हुए नजर आए तो फिर पांडवों के लिए संकट खड़ा हो जाएगा और यदि जब पांडव बर्बरीक के सामने हारते नजर आए तो फिर वह पांडवों का साथ देगा। इस तरह वह दोनों ओर की सेना को एक ही तीर से खत्म कर देगा। तब भगवान श्रीकृष्ण ब्राह्मण का भेष बनाकर सुबह बर्बरीक के शिविर के द्वार पर पहुंच गए और दान मांगने लगे। बर्बरीक ने कहा- मांगो ब्राह्मण! क्या चाहिए? ब्राह्मणरूपी कृष्ण ने कहा कि तुम दे न सकोगे। लेकिन बर्बरीक कृष्ण के जाल में फंस गए और कृष्ण ने उससे उसका शीश मांग लिया। बर्बरीक द्वारा अपने पितामह पांडवों की विजय हेतु स्वेच्छा के साथ शीशदान कर दिया गया। बर्बरीक के इस बलिदान को देखकर दान के पश्चात श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को कलियुग में स्वयं के नाम से पूजित होने का वर दिया। आज बर्बरीक को खाटू श्याम के नाम से पूजा जाता है। जहां कृष्ण ने उसका शीश रखा था उस स्थान का नाम खाटू है। अनजाने रहस्य :  1. खाटू श्याम अर्थात मां सैव्यम पराजित:। अर्थात जो हारे हुए और निराश लोगों को संबल प्रदान करता है। 2. खाटू श्याम बाबा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं उनसे बड़े सिर्फ श्रीराम ही माने गए हैं। 3. खाटूश्याम जी का जन्मोत्सव हर साल कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी को बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। 4. खाटू का श्याम मंदिर बहुत ही प्राचीन है, लेकिन वर्तमान मं‍दिर की आधारशिला सन 1720 में रखी गई थी। इतिहासकार पंडित झाबरमल्ल शर्मा के मुताबिक सन 1679 में औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। मंदिर की रक्षा के लिए उस समय अनेक राजपूतों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था। 5. खाटू श्‍याम मंदिर परिसर में लगता है बाबा खाटू श्याम का प्रसिद्ध मेला। हिन्दू मास फाल्गुन माह शुक्ल षष्ठी से बारस तक यह मेला चलता है। ग्यारस के दिन मेले का खास दिन रहता है।  6. बर्बरीक देवी के उपासक थे। देवी के वरदान से उसे तीन दिव्य बाण मिले थे जो अपने लक्ष्य को भेदकर वापस उनके पास आ जाते थे। इसकी वजय से बर्बरिक अजेय थे। 7. बर्बरीक अपने पिता घटोत्कच से भी ज्यादा शक्तिशाली और मायावी था।  8. कहते हैं कि जब बर्बरिक से श्रीकृष्ण ने शीश मांगा तो बर्बरिक ने रातभर भजन किया और फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को स्नान करके पूजा की और अपने हाथ से अपना शीश काटकर श्रीकृष्ण को दान कर दिया।  9. शीश दान से पहले बर्बरिक ने महाभारत का युद्ध देखने की इच्‍छा जताई तब श्रीकृष्‍ण ने उनके शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित करके उन्हें अवलोकन की दृष्टि प्रदान की।  10. युद्ध समाप्ति के बाद जब पांडव विजयश्री का श्रेय देने के लिए वाद विवाद कर रहे थे तब श्रीकृष्ण कहा कि इसका निर्णय तो बर्बरिक का शीश ही कर सकता है। तब बर्बरिक ने कहा कि युद्ध में दोनों ओर श्रीकृष्ण का ही सुदर्शन चल रहा था और द्रौपदी महाकाली बन रक्तपान कर रही थी।  10. अंत में श्रीकृष्ण ने वरदान दिया की कलियुग में मेरे नाम से तुम्हें पूजा जाएगा और तुम्हारे स्मरण मात्र से ही भक्तों का कल्याण होगा। 11. स्वप्न दर्शनोंपरांत बाबा श्याम, खाटू धाम में स्थित श्याम कुण्ड से प्रकट हुए थे और श्रीकृष्ण शालिग्राम के रूप में मंदिर में दर्शन देते हैं।

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भगवान विष्णु ने स्थापित किया था गोला में शिव श्रंग

छोटी काशी के सावन मेला पर विशेष: कई पुराणों में है गोकर्ण महात्म्य का वर्णन उज्जैन की तरह मंदिरों की नगरी के रूप में प्रसिद्ध गोला गोकर्णनाथ का पौराणिक शिवलिंग पूरे उत्तर भारत में आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि प्राचीन काल में अत्यंत प्रिय लगने के कारण भोले बाबा ने मृग रूप में यहां विचरण किया था। भगवान विष्णु ने स्वयं यहां शिव का श्रंग स्थापित किया था इसलिए यह नगर गोला गोकर्णनाथ और छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है।वाराह पुराण में वर्णन है कि प्राचीन काल में शिव मृत्युलोक में भ्रमण करते हुए इस वन क्षेत्र में आए और क्षेत्र की रमणीयता पर मुग्ध होकर यहीं ठहर गए। ब्रह्मा, विष्णु और देवराज इंद्र जब उन्हें ढूंढते हुए इस वन प्रांत में पहुंचे तो तीन सींग वाले विशाल अद्भुत मृग रूप धारी शिव को पहचान लिया और दौड़कर उनके श्रंग(सींग)पकड़ लिए। शिवजी अपने मूल स्वरूप में आ गए लेकिन तीन सींग देवताओं के हाथ में रह गए। उनमें से एक सींग भगवान विष्णु ने यहां स्थापित किया जो गोकर्णनाथ नाम से जाना जाता है। शिव पुराण में यहां के शिव का नाम चंद्रभाल कहा गया है। दूसरा श्रंग ब्रह्माजी ने बिहार प्रांत के श्रंगवेश्वर में स्थापित किया। तीसरा देवराज इंद्र ने अपनी अमरावती में स्थापित कर पूजन अर्चन शुरू किया। एक अन्य कथा के अनुसार रावण ने जब इंद्र पर विजय प्राप्त की तो वह शिव श्रंग को कांवड़ में रख कर लंका की ओर चला, लंका जाते समय दक्षिण में समुद्र तट पर गोकर्ण स्थान प्रिय लगने पर शिवजी यहां स्थापित हो गए। छोटी काशी में स्थापित शिव के मनुष्यों के समक्ष प्राकट्य का वर्णन पद्मपुराण में मिलता है। वामन पुराण, कूर्म पुराण और स्कन्द पुराण में यहां जिक्र है।  मुस्लिम राजा ने बनवाया था मंदिर जंगल में बेल वृक्ष के नीचे स्थित शिव श्रंग सबसे पहले कोटद्वार नगर जो अब कोटवारा के नाम से प्रसिद्ध है, के ब्राह्मण सदानंद के समक्ष प्रकट हुआ था। सदानंद ने वहां एक मठिया बनवाकर पूजन शुरू किया। भक्तों की श्रद्धा बढ़ते देखकर बाद में कोटवारा रियासत के मुस्लिम राजा तरवियत हुसेन उर्फ टर्बी राजा ने गोल गुंबद के आकार का मंदिर बनवाकर शिखर पर दूज का चांद स्थापित करवाया जो प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अलीगंज स्थित पुराने हनुमान मंदिर और यहां के अलावा पूरे देश में कहीं भी देखने को नहीं मिलता है। गोकर्ण तीर्थ का भी है विशेष माहात्म्य पद्म पुराण में ब्राह्मण सदानंद द्वारा पंच तीर्थों की स्थापना और माहात्म्य का वर्णन मिलता है। इनमें पहला गोकर्ण तीर्थ प्राचीन शिव मंदिर के समीप, दूसरा कोणार्क तीर्थ भवानीगंज ग्राम में, तीसरा पोनाग्र तीर्थ पुनर्भूग्रंट गांव में, चौथा भद्र तीर्थ नगर के सिनेमा मार्ग के समीप, पांचवां अहमदनगर ग्राम में माण्ड ऋषि की तपस्थली में माण्ड तीर्थ के नाम से विख्यात है। श्रद्धालु पहले इन पंच तीर्थों में होकर पंच कोसीय परिक्रमा व स्नान कर गोकर्णनाथ शिव के दर्शन करते थे। अब यह परिक्रमा काफी पहले समाप्त हो चुकी है। गोकर्ण तीर्थ के बीच में भक्तों ने शिवजी की विशाल प्रतिमा स्थापित कराई है जो आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

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जानिए काशी विश्वनाथ मंदिर से जुड़ी मान्यताएं और धार्मिक रहस्य

सनातन पंरपरा में द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन का बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व है सनातन पंरपरा में द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन और पूजन का बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व है. देश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक बाबा विश्वनाथ जो कि पूरे जगत के नाथ कहलाते हैं, उनका मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में स्थित है. हिंदू धर्म में प्राचीन सप्तपुरियों में से एक काशी या फिर कहें वारणसी शहर के बारे में मान्यता है कि वह भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी हुई है और प्रलय आने के बाद भी यहीं बनी रहती है. जिस काशी नगरी में बाबा विश्वनाथ विराजते हैं, उसकी महिमा इतनी निराली है कि देश-दुनिया का आदमी यहां हर रोज खिंचा चला आता है. सावन के महीने में बाबा विश्वनाथ के धाम पर भक्तों की भारी भीड़े जुटती है. आइए तीन लोकों से न्यारी माने जाने वाली काशी और वहां विराजने वाले विश्व के नाथ यानि बाबा विश्वनाथ से जुड़ी अनसुनी बातों को विस्तार से जानते हैं. द्वादश ज्योतिर्लिंगों में बाबा विश्वनाथ का नौवां स्थान है. जिनके बारे में मान्यता है कि उनकी स्थापना किसी व्यक्ति या देवता द्वारा नहीं हुई बल्कि यहां पर उनका स्वयं प्राकट्य हुआ है. मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ के मंदिर का निर्माण 11वीं सदी में राजा विक्रमादित्य ने करवाया था. जिसके बाद मुगल शासकों द्वारा कई बार तोड़ने के बाद दोबारा निर्माण करवाया गया. मान्यता है कि वर्तमान में मंदिर का जो स्वरूप है उसे इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने बनवाया था. जिसका हाल ही में विस्तार और सौंदर्यीकरण हुआ है. मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ के इस पावन धाम की रक्षा खुद काल भैरव कहते हैं, जिन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है, जिनके दर्शन के बगैर इस ज्योतिर्लिग की पूजा अधूरी मानी जाती है. हालांकि कुछ लोगों की मान्यता है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन से पहले भगवान भैरव के दर्शन करना चाहिए. मान्यता है कि जहां शिव होते हैं, वहां पर शक्ति भी किसी न किसी रूप में अवश्य निवास करती हैं. बहुत कम लोग जानते हैं कि काशी में न सिर्फ ज्यो​​तिर्लिंग बल्कि शक्त्पिीठ भी स्थित है. बाबा विश्वनाथ के मंदिर के पास में ही मां विशालाक्षी का मंदिर है जो देश के उन 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां पर माता सती के अंग गिरे थे. काशी विश्वनाथ मंंदिर के ​गुंबद में लगे श्रीयंत्र के बारे में मान्यता है कि जो कोई भक्त उस ओर देखकर बाबा विश्वनाथ से प्रार्थना करता है, औढरदानी शिव शीध्र ही उसकी मनोकामना को पूरी करते हैं. काशी विश्वनाथ मंदिर की पूजा के बारे में मान्यता है कि जो कोई शिव भक्त यहां आकर बाबा विश्वनाथ के ज्योतिर्लिंग का स्पर्श, पूजन आदि करता है, उसे राजसूय यज्ञ का पुण्य फल प्राप्त होता है. काशी एक मात्र स्थान है, जहां गंगा उत्तर वाहिनी है. यहां पर गंगा के कई घाट हैं. काशी में होने वाली मां गंगा की आरती और इसके पावन घाट को देखने के लिए देश-दुनिया से लोग प्रतिदिन पहुंचते हैं. देवों के देव महादेव की नगरी काशी के बारे में मान्यता है कि यहां पर प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि काशी में रहने वाले भक्त को भगवान शिव खुद तारक मन्त्र देकर उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं. यही कारण है कि बहुत से लोग जीवन के अंतिम पड़ाव में बाबा विश्वनाथ की नगरी में आकर बसना चाहते हैं. पवित्र और प्राचीन नगरी काशी के बारे में मान्यता है कि यहां पर कण-कण में शिव का वास है. मान्यता यह भी है कि यहां पर 30 करोड़ देवी देवता निवास करते है. यही कारण है कि बनारस को मंदिरों का शहर कहा जाता है, जिसमें अलग-अलग देवी-देवता विराजते हैं.

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क्या है, भगवान श्रीकृष्ण के हृदय का रहस्य

 हमारा देश भारत, जो रहस्यों से भरा देश है। हमारे देश की सभ्यता, जितनी पुरानी है। उतने ही  पुराने, हमारे देश के मंदिर भी हैं। हजारों सालों से खड़े मंदिर, कई राज अपने अंदर  समेटे हुए हैं। भारत में मौजूद कोई भी मंदिर ऐसा नहीं है। जिससे जुड़ा कोई भी रहस्य वैज्ञानिकों को या आम आदमी की चर्चा का विषय न हो।       बद्रीनाथ धाम को, जहां जगत के पालनहार भगवान विष्णु का आठवां बैकुंठ लोक माना जाता है। वही जगन्नाथ धाम को धरती का बैकुंठ लोक माना जाता है। उड़ीसा के तटीय शहर, पूरी में स्थित यह विश्व प्रसिद्ध मंदिर, भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को समर्पित है।         पूरी का यह पौराणिक मंदिर, अपने आपमें काफी अलौकिक है। 800 साल से ज्यादा पुराने इस मंदिर में, ऐसे-ऐसे रहस्य छुपे हुए हैं। जो आपको हैरान कर देगें।       भगवान जगन्नाथ मंदिर से जुड़े, ऐसे कई रहस्य हैं। जिस पर पूरी दुनिया के आधुनिक वैज्ञानिकों ने, कई बार शोध किए। लेकिन वह इसके रहस्य को नहीं  सुलझा पाए। आपको भी जाना चाहिए कि भगवान श्री कृष्ण का ह्रदय आज भी जीवित है। भगवान श्री कृष्ण 16 कलाओं से युक्त, ईश्वर के पूर्ण अवतार माने जाते हैं। वैसे तो श्रीकृष्ण सर्वत्र व्याप्त हैं। लेकिन उन्हीं श्री कृष्ण के अवतारी शरीर का हृदय, आज भी जीवित अवस्था मे धड़क रहा है।       कहा जाता है कि जब श्रीकृष्ण ने अपनी देह का त्याग किया। तब उनका अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम संस्कार में श्री कृष्ण की देह, पूरी तरह पंचतत्व में विलीन हो गई। लेकिन उनका ह्रदय वैसा का वैसा ही रहा। अग्निदाह में उनका ह्रदय नष्ट नहीं हुआ। वह एक जीवित व्यक्ति के ह्रदय तरह धड़क रहा था।         कहा जाता है कि श्रीकृष्ण की मृत्यु बाद, जारा सवर नामक एक आदिवासी शिकारी ने, उनके शरीर का अंतिम संस्कार किया। लेकिन श्री कृष्ण का हृदय नहीं जला। परंपरा के अनुसार, पिण्ड को जल में प्रवाहित कर दिया गया। जल शुद्धि के अनुसार, उस पिंड ने एक लठ्ठे का रूप ले लिया।        भगवान जगन्नाथ के भक्त राजा इंद्रदयुम्न को यह लट्ठा मिला। उन्होंने भगवान विश्वकर्मा के द्वारा, इस लट्ठे को भगवान जगन्नाथ की मूर्ति के भीतर स्थापित करवा दिया। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण का ह्रदय आज भी जस का तस है। जो भगवान जगन्नाथ के काठ की मूर्ति के अंदर स्थापित है।        भगवान जगन्नाथ का रहस्य, आज तक कोई भी नहीं जान पाया है। भगवान जगन्नाथ की मूर्ति को हर 12 साल में बदला जाता है। इस दौरान पूरे शहर की रोशनी बंद कर दी जाती है। बिजली बंद करने के बाद, मंदिर के पूरे परिसर को घेर लिया जाता है। सीआरपीएफ व सेना के संरक्षण में आने के बाद, मंदिर में कोई भी प्रवेश नहीं कर सकता।          पुजारी की आंखों पर पट्टी बांधी जाती है। उनके हाथों में मोटे दस्तानें पहनाए जाते हैं। मंदिर के अंदर घोर-घने अंधकार के बीच, पुजारी उस पदार्थ को बाहर निकलता है। फिर उसे नई मूर्ति में स्थापित कर देता है। इसी भगवान श्रीकृष्ण के हृदय को ब्रह्म पदार्थ कहा जाता है। इस ब्रह्म पदार्थ के रहस्य को, आज तक कोई नहीं जान पाया।         सैकड़ों वर्षो से एक मूर्ति से दूसरी मूर्ति में, यह ब्रह्म पदार्थ स्थानांतरित किया जाता रहा है। खास बात यह है कि ब्रह्म पदार्थ को बदलने वाला पुजारी भी, यह नहीं जानता। कि वह किस चीज को हस्तांतरित कर रहा है। क्योंकि उसके हाथों में दस्ताने होते हैं। और आंख में पट्टी बंधी होती है।       हालांकि ब्रह्म पदार्थ को बदलने वाले पुजारी, यह जरूर कहते हैं। कि वह जिस पदार्थ को बदलते हैं। वह किसी खरगोश के जैसे उछलता है। आज जो पुरी के मंदिर के विषय में आश्चर्यजनक बातें सुनते हैं। यह उसी ब्रह्म पदार्थ का ही चमत्कार है। उसके चमत्कारों की व्याख्या अनंत है। ब्रह्म पदार्थ का वैज्ञानिक विश्लेषण ब्रह्म पदार्थ को आधुनिक विज्ञान के दृष्टिकोण से, समझने की कोशिश करते हैं। कि वह क्या हो सकता है। हम सभी को पता है कि मां के गर्भ में, पिता के शुक्राणुओं के अंड निषेचन से, शरीर का निर्माण शुरू हो जाता है। जहां शरीर निर्माण तो जारी रहता है। लेकिन उस शरीर में धड़कन 2 से 3 महीने के बाद ही शुरू होती है।        यहां आधुनिक विज्ञान बिल्कुल खामोश हो जाता है। ऐसा कैसे होता है। आखिर वह कौन-सा तत्व है। जिसके शरीर में प्रवेश होते ही धड़कन शुरू हो जाती है। तो वह कौन सा तत्व है। जिसके शरीर में प्रवेश करते ही, बेजान शरीर धड़कने लगता है। इसके बारे में, विज्ञान आज तक नहीं जान सका।       जबकि हमारे ऋषियों ने, इसे बहुत पहले ही खोज लिया था। जिसे सनातन में, प्राण ऊर्जा के नाम से संबोधित किया गया था। प्राण ऊर्जा ही, वह ऊर्जा है। जो इस  नश्वर शरीर को, जीवंतता प्रदान करती है। जो जड़ शरीर में, चेतना का विस्तार करती है। तो प्राण ऊर्जा मूल है और असीमित भी।       इस ऊर्जा के प्रयोग की क्षमता, उस शरीर पर है। कि वह किस सीमा तक व  कितनी कर पाता है। यह प्राण ऊर्जा सृष्टि की सर्जनात्मक ऊर्जा का ही एक अंश है। इसको ऐसे समझते हैं। अगर हम शरीर को एक ट्रांसफार्मर मान लें और प्राण ऊर्जा को विद्युत। तो यह शरीर के ऊपर है कि वह 220 वोल्ट तक की ऊर्जा ग्रहण कर सकता है। या 21000 वोल्ट तक की।         इस ऊर्जा से शरीर को केवल जीवंतता ही नहीं मिलती। बल्कि आश्चर्यजनक और अचंभित करने वाले परिणाम भी देखने को मिलते हैं। हमारे यहां तो योगियों ने इस ऊर्जा को संकलित करके, जीवित रहते ही शरीर से बाहर निकल जाने की व्यवस्था को खोजा है। फिर अपनी मर्जी से शरीर में पुनः प्रवेश के मार्ग तक को भी। जिसे हम सभी परकाया प्रवेश के नाम से जानते हैं।        ऐसे ही हिमालय की गुफाओं में तपस्यारत योगियों के बारे सुना होगा। जिनकी तपस्या के मार्ग में, यह शरीर कभी  बाधा नहीं रहा। वह इसी प्राण ऊर्जा प पम चमत्कार से संभव है। या फिर उनके द्वारा किसी को आशीर्वाद या श्राप देने पर तुरंत फलित हो जाने के बारे में।

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सत्यवान और सावित्री की कहानी STORY

सावित्री के पतिव्रता धर्म की कथा का सार :- यह है कि एकनिष्ठ पतिपरायणा स्त्रियां अपने पति को सभी दुख और कष्टों से दूर रखने में समर्थ होती है। जिस प्रकार पतिव्रता धर्म के बल से ही सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज के बंधन से छुड़ा लिया था। इतना ही नहीं खोया हुआ राज्य तथा अंधे सास-ससुर की नेत्र ज्योति भी वापस दिला दी। STORY OF SATYAWAN AND SAVITRI सावित्री देवी ने कहा – ” राजन ! तुम मेरे नित्य भक्त हो, अतः मैं तुम्हें कन्या प्रदान करूँगी। मेरी कृपा से तुम्हें सर्वांग सुंदरी कन्या प्राप्त होगी। “ यह कहकर वह देवी आकाश में बिजली की भाँति अदृश्य हो गयी। उस राजा की मालती नाम की पतिव्रता पत्नी थी। समय आने पर उसने सावित्री के समान रूपवाली एक कन्या को जन्म दिया। तब राजा ने ब्राह्मणों से कहा – ” तप के द्वारा आवाहन किये जाने पर माता सावित्री ने इसे मुझे दिया है तथा यह सावित्री के समान रूपवाली है, अतः इसका नाम सावित्री होगा। “ तब उन ब्राह्मणों ने उस कन्या का नाम सावित्री रख दिया। समय बीतने पर जब सावित्री युवती हुई तब सावित्री को वर खोजने के लिये कहा गया तो उसने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पतिरूप में वरण कर लिया। इधर यह बात जब नारदजी को मालूम हुई तो वे राजा अश्वपति के पास आकर बोले कि आपकी कन्या ने वर खोजने में बड़ी भारी भूल की है। सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा अवश्य है, परंतु वह अल्पायु है। एक वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु हो जायेगी। राजकुमारी सावित्री को सत्यवान नाम के एक निर्धन युवक से प्रेम हो गया। नारद मुनि ने उसे समझाया कि वह सत्यवान से विवाह ना करें क्योंकि उसकी मौत जल्दी होना तय है। सावित्री ने नारद की बात नहीं मानी और सत्यवान से विवाह कर लिया। जल्द ही सत्यवान की मृत्यु का दिन आ गया। यमराज स्वयं उसे लेने आए। सावित्री ने उनसे सत्यवान के प्राण ना लेने की विनती की लेकिन यम ने कहा की मृत्यु को कोई नहीं रोक सकता। सावित्री उनके पीछे मिलो मिल चलती गई। उसकी लगन देखकर यम बहुत प्रभावित हुए और बोले, “मैं तुम्हें दो वरदान देता हूं; तुम सत्यवान के प्राणों को छोड़कर कुछ भी मांग लो।” सावित्री ने पहले वरदान में अपने ससुर की कुशलता की मांग की। और दूसरे वरदान में उसने चतुराई दिखाते हुए अपने लिए सौ पुत्रों की मांग कर दी। यम ने बिना सोचे समझे हां कर दी। क्योंकि बिना पति के वह पुत्र कैसे पा सकेगी। यम निरुत्तर हो गए और उन्होंने सावित्री के पति सत्यवान के प्राण लौटा दिए। STORY OF SATYAWAN AND SAVITRI who is savitri what are the first two things savitri asks for from yamraj? savitri satyavan from the mahabharata satyavan from the mahabharata savitri story of savithri and satyavan

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भगवान शिव ने पार्वती जी की मगरमच्छ बनकर क्यों ली परीक्षा, पढ़ें ये पौराणिक कथा

हिंदू धर्म में सोमवार के दिन का बेहद महत्व माना जाता है. सोमवार का दिन भगवान भोलेनाथ (Lord Shiva) को समर्पित होता है. जो भी व्यक्ति सोमवार के दिन विधि-विधान से शिवजी का पूजन और आराधना करता है. उसके जीवन के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं. इसके साथ ही जीवन में सुख एवं समृद्धि का वास हो जाता है. भगवान भोलेनाथ को बेहद जल्दी प्रसन्न होने वाला देवता भी माना जाता है. भोलेनाथ का विवाह पार्वती जी के साथ हुआ था. इसके लिए पार्वती जी ने सैंकड़ों वर्षों तक कठिन तप किया था. तप के बाद एक वक्त ऐसा भी आया था जब पार्वती जी को भगवान शिव की परीक्षा का सामना करना पड़ा था. आइए जानते हैं ये पौराणिक कथा.. शिव जी ने ली इस तरह परीक्षा पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए सैकड़ों वर्षों तक कठोर तप किया था. उनकी तपस्या को देखकर देवताओं ने शिवजी से देवी पार्वती की मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना की थी. इसके बाद भोलेनाथ ने सप्तर्षियों को पार्वती जी की परीक्षा लेने के लिए भेजा. इस परीक्षा के दौरान सप्तर्षियों ने शिवजी के ढेरों अवगुणों को बताते हुए माता पार्वती से शिव जी से विवाह न करने का कहा लेकिन पार्वती जी अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुईं.इस पर खुद भोलेनाथ ने माता पार्वती की परीक्षा लेने का निर्णय लिया. माता पार्वती के तप से प्रसन्न होकर शंकर जी उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए. कुछ क्षणों बाद ही एक मगरमच्छ ने एक लड़के को पकड़ लिया और लड़का मदद के लिए पुकारने लगा. बच्चे की आवाज सुनकर पार्वती जी नदी किनारे पहुंची और उनका मन द्रवित हो गया. इस बीच लड़के ने माता पार्वती को देखकर कहा कि मेरी न मां है न बाप, न कोई मित्र ही है..माता आप ही मेरी रक्षा करें. इस पर पार्वती जी ने मगरमच्छ से कहा कि ग्राह इस लड़के को छोड़ दें. इस पर मगरमच्छ ने कहा कि दिन के छठे पहर जो मुझे मिलता है उसे आहार बनाना मेरा नियम है. पार्वती जी के विनती करने पर मगरमच्छ ने लड़के को छोड़ने के बदले में पार्वती जी के तप से प्राप्त वरदान का पुण्य फल मांग लिया. इस पर पार्वती जी तैयार हो गईं. मगरमच्छ ने बालक को छोड़ दिया और तेजस्वी बन गया. अपने तप का फल दान करने के बाद पार्वती जी ने बालक को बचा लिया और एक बार फिर भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए तप करने बैठ गईं. इस पर भोलेनाथ दोबारा प्रकट हुए और पूछा कि तुम अब क्यों तप कर रही हो, मैंने तम्हें पहले ही मनमांगा दान दे दिया है. इस पर पार्वती जी ने अपने तप का फल दान करने की बात कही. इस पर शिवजी प्रसन्न होकर बोले मगरमच्छ और लड़के दोनों के स्वरूप में मैं ही था. मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था कि तुम्हारा चित्त प्राणिमात्र में अपने सुख दुख का अनुभव करता है या नहीं. तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए ही मैंने ये लीला रचाई थी. अनेको रूप में दिखने वाला मैं ही एक सत्य हूं. अनेक शरीरों में नजर आने वाला मैं निर्विकार हूं. इस तरह पार्वती जी शिव जी की परीक्षा में उत्तीर्ण हुई और उनकी अर्धांगिनी बनी पार्वती जी ने कहा- हे ग्राह ! तप तो मैं पुन: कर सकती हूं, किंतु यदि तुम इस लड़के को निगल जाते तो क्या इसका जीवन वापस मिल जाता ? देखते ही देखते वह लड़का अदृश्य हो गया। मगरमच्छ लुप्त हो गया। पार्वती जी ने विचार किया- मैंने तप तो दान कर दिया है। अब पुन: तप आरंभ करती हूं। पार्वती ने फिर से तप करने का संकल्प लिया। भगवान सदाशिव फिर से प्रकट होकर बोले- पार्वती, भला अब क्यों तप कर रही हो? पार्वती जी ने कहा- प्रभु ! मैंने अपने तप का फल दान कर दिया है। आपको पतिरूप में पाने के संकल्प के लिए मैं फिर से वैसा ही घोर तप कर आपको प्रसन्न करुंगी। महादेव बोले- मगरमच्छ और लड़के दोनों रूपों में मैं ही था। तुम्हारा चित्त प्राणिमात्र में अपने सुख-दुख का अनुभव करता है या नहीं, इसकी परीक्षा लेने को मैंने यह लीला रची। अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक ही एक हूं। मैं अनेक शरीरों में, शरीरों से अलग निर्विकार हूं। तुमने अपना तप मुझे ही दिया है इसलिए अब और तप करने की जरूरत नहीं…. देवी ने महादेव को प्रणाम कर प्रसन्न मन से विदा किया।

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भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को क्यों दिया था श्राप पढ़ें यह पौराणिक कथा

लक्ष्मी माता का दिन माता लक्ष्मी  की पूजा के लिए समर्पित है. आज लोग माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कई प्रकार के उपाय करते हैं. जिन पर माता लक्ष्मी की कृपा हो जाती है, वह धन धान्य से परिपूर्ण हो जाता है. हर कोई उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लेना चाहता है. कोई नहीं चाहता कि माता लक्ष्मी उससे नाराज हो जाएं. हालांकि एक बार भगवान विष्णु  माता लक्ष्मी से नाराज हो गए थे और उनको श्राप दे दिया था. आखिर ऐसा क्यों हुआ? पढ़ें यह पौराणिक कथा. पौराणिक कथाओं में जिक्र मिलता है कि एक बार श्री हर‍ि धरती पर भ्रमण के लिए जा रहे थे। तभी देवी लक्ष्‍मी ने उनके साथ चलने की अनुमति मांगी। कई बार कहने पर भगवान विष्‍णु ने कहा कि वह साथ चल सकती हैं लेकिन उन्‍हें एक शर्त माननी होगी। उन्‍होंने कहा कि धरती पर कैसी भी स्थिति आए लेकिन उन्‍हें उत्‍तर द‍िशा की ओर नहीं देखना है। देवी लक्ष्‍मी भी भगवान की शर्त मान लेती हैं और साथ चल देती हैं। इस तरह खुद को रोक न सके भगवान और रो पड़े कथा मिलती है कि जब श्री विष्‍णु और माता लक्ष्‍मी पर भ्रमण कर रहे थे। तभी देवी की नजर उत्‍तर द‍िशा की ओर पड़ी। उस ओर इतनी हरियाली थी कि वह खुद को रोक न सकीं और सामने द‍िख रहे बगीचे में चली गईं। इसके बाद उन्‍होंने उस बाग से एक पुष्‍प तोड़ लिया और भगवान विष्‍णु के पास वापस आईं। उन्‍हें देखते ही श्री हरि रो पड़े। तभी माता लक्ष्‍मी को उनकी शर्त याद आई। तब भगवान विष्‍णु ने कहा कि बिना किसी से पूछे उसकी किसी भी वस्‍तु को छूना अपराध है। जब माता लक्ष्मी को मिला श्राप एक समय की बात है माता लक्ष्मी एक सुंदर अश्व को देखने में इतनी ध्यानमग्न थीं, कि उन्होंने भगवान विष्णु की बातों पर ध्यान नहीं दिया. इससे क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने उनको पृथ्वी लोक पर अश्वी बनने का श्राप दे दिया. इससे माता लक्ष्मी दुखी हो गईं, तो भगवान विष्णु ने कहा कि आपको कुछ समय के लिए अश्व की योनी में रहना होगा. फिर आपको एक पुत्र होगा. उसके बाद ही उस योनी से मुक्ति मिलेगी जब समय आया तो माता लक्ष्मी पृथ्वी पर अश्व की योनी में जीवन व्यतीत करने लगीं. उन्होंने काफी समय तक भगवान शिव की आराधना की. अपने तप से उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न किया. भगवान शिव ने कहा कि आपके पति भगवान विष्णु इस पूरे संसार के पालनहार हैं. एक स्त्री का पति ही उसका भगवान होता है. आपको केवल भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए. इस पर माता लक्ष्मी ने कहा कि आप में और श्रीहरि में कोई भेद नहीं हैं. बस दोनों का स्वरूप अलग अलग है. आप यह दुख दूर कीजिए ताकि वह अश्व की योनी से मुक्त हों. इस पर प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको आशीष दिया और भगवान विष्णु को पृथ्वी लोक पर जाने के बारे में अवगत कराने का वचन दिया. कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने अश्व रुप में अवतार लिया और माता लक्ष्मी के साथ अश्व योनी में समय व्यतीत किया. माता लक्ष्मी ने कुछ समय बाद एकवीर नामक पुत्र को जन्म दिया. उसके फलस्वरूप माता लक्ष्मी श्राप से मुक्त होकर वैकुंठ धाम चली गईं. एकवीर से हैहय वंश की उत्पत्ति हुई

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दीपावली पर प्रचलित है लक्ष्मी जी की यह पौराणिक कथा

हमारी लोक संस्कृति में दीपावली त्योहार और माता लक्ष्मी की बड़ी सौंधी सी कथा प्रचलित है। एक बार कार्तिक मास की अमावस को लक्ष्मीजी भ्रमण पर निकलीं। चारों ओर अंधकार व्याप्त था। वे रास्ता भूल गईं। उन्होंने निश्चय किया कि रात्रि वे मृत्युलोक में गुजार लेंगी और सूर्योदय के पश्चात बैकुंठधाम लौट जाएंगी, किंतु उन्होंने पाया कि सभी लोग अपने-अपने घरों में द्वार बंद कर सो रहे हैं।  तभी अंधकार के उस साम्राज्य में उन्हें एक द्वार खुला दिखा जिसमें एक दीपक की लौ टिमटिमा रही थी। वे उस प्रकाश की ओर चल दीं। वहां उन्होंने एक वृद्ध महिला को चरखा चलाते देखा। रात्रि विश्राम की अनुमति मांग कर वे उस बुढ़िया की कुटिया में रुकीं।  वृ्द्ध महिला लक्ष्मीदेवी को बिस्तर प्रदान कर पुन: अपने कार्य में व्यस्त हो गई। चरखा चलाते-चलाते वृ्‍द्धा की आंख लग गई। दूसरे दिन उठने पर उसने पाया कि अतिथि महिला जा चुकी है किंतु कुटिया के स्थान पर महल खड़ा था। चारों ओर धन-धान्य, रत्न-जेवरात बिखरे हुए थे। कथा की फलश्रुति यह है कि मां लक्ष्मीदेवी जैसी उस वृद्धा पर प्रसन्न हुईं वैसी सब पर हों। और तभी से कार्तिक अमावस की रात को दीप जलाने की प्रथा चल पड़ी। लोग द्वार खोलकर लक्ष्मीदेवी के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे। किंतु मानव समाज यह तथ्य नहीं समझ सका कि मात्र दीप जलाने और द्वार खोलने से महालक्ष्मी घर में प्रवेश नहीं करेंगी। बल्कि सारी रात परिश्रम करने वाली वृद्धा की तरह कर्म करने पर और अंधेरी राहों पर भटक जाने वाले पथिकों के लिए दीपकों का प्रकाश फैलाने पर घरों में लक्ष्मी विश्राम करेंगी। ध्यान दिया जाए कि वे विश्राम करेंगी, निवास नहीं। क्योंकि लक्ष्मी का दूसरा नाम ही चंचला है। अर्थात् अस्थिर रहना उनकी प्रकृति है। इस दीपोत्सव पर कामना करें कि राष्ट्रीय एकता का स्वर्णदीप युगों-युगों तक अखंड बना रहे। हम ग्रहण कर सकें नन्हे-से दीप की कोमल-सी बाती का गहरा-सा संदेश कि बस अंधकार को पराजित करना है और नैतिकता के सौम्य उजास से भर उठना है।  ।। न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो ना शुभामति: भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां सूक्त जापिनाम्।। अर्थात् लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने वाले की क्रोध, मत्सर, लोभ व अन्य अशुभ कर्मों में वृत्ति नहीं रहती। वे सत्कर्मों की ओर प्रेरित होते हैं।

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भगवान श्रीहरि विष्णु के दशावतार की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथाएं

भगवान श्रीहरि विष्‍णु ने धर्म की रक्षा हेतु हर काल में अवतार लिया। वैसे तो भगवान विष्णु के अनेक अवतार हुए हैं लेकिन उनमें 10 अवतार ऐसे हैं, जो प्रमुख रूप से स्थान पाते हैं। यहां पाठकों के लिए प्रस्तुत हैं भगवान श्रीहरि विष्णु के 10 अवतार यानी दशावतार की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथाएं मत्स्य अवतार पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने सृष्टि को प्रलय से बचाने के लिए मत्स्यावतार लिया था। इसकी कथा इस प्रकार है- कृतयुग के आदि में राजा सत्यव्रत हुए। राजा सत्यव्रत एक दिन नदी में स्नान कर जलांजलि दे रहे थे। अचानक उनकी अंजलि में एक छोटी सी मछली आई। उन्होंने देखा तो सोचा वापस सागर में डाल दूं, लेकिन उस मछली ने बोला- आप मुझे सागर में मत डालिए अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे खा जाएंगी। तब राजा सत्यव्रत ने मछली को अपने कमंडल में रख लिया। मछली और बड़ी हो गई तो राजा ने उसे अपने सरोवर में रखा, तब देखते ही देखते मछली और बड़ी हो गई।  राजा को समझ आ गया कि यह कोई साधारण जीव नहीं है। राजा ने मछली से वास्तविक स्वरूप में आने की प्रार्थना की। राजा की प्रार्थना सुन साक्षात चारभुजाधारी भगवान विष्णु प्रकट हो गए और उन्होंने कहा कि ये मेरा मत्स्यावतार है। भगवान ने सत्यव्रत से कहा- सुनो राजा सत्यव्रत! आज से सात दिन बाद प्रलय होगी। तब मेरी प्रेरणा से एक विशाल नाव तुम्हारे पास आएगी। तुम सप्त ऋषियों, औषधियों, बीजों व प्राणियों के सूक्ष्म शरीर को लेकर उसमें बैठ जाना, जब तुम्हारी नाव डगमगाने लगेगी, तब मैं मत्स्य के रूप में तुम्हारे पास आऊंगा। उस समय तुम वासुकि नाग के द्वारा उस नाव को मेरे सींग से बांध देना। उस समय प्रश्न पूछने पर मैं तुम्हें उत्तर दूंगा, जिससे मेरी महिमा जो परब्रह्म नाम से विख्यात है, तुम्हारे ह्रदय में प्रकट हो जाएगी। तब समय आने पर मत्स्यरूपधारी भगवान विष्णु ने राजा सत्यव्रत को तत्वज्ञान का उपदेश दिया, जो मत्स्यपुराण नाम से प्रसिद्ध है। कूर्म अवतार धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लेकर समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। इसकी कथा इस प्रकार है- एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवताओं के राजा इन्द्र को श्राप देकर श्रीहीन कर दिया। इन्द्र जब  भगवान विष्णु के पास गए तो उन्होंने समुद्र मंथन करने के लिए कहा। तब इन्द्र भगवान विष्णु के कहे अनुसार दैत्यों व देवताओं के साथ मिलकर समुद्र मंथन करने के लिए तैयार हो गए। समुद्र मंथन करने के लिए मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागराज वासुकि को नेती बनाया गया। देवताओं और दैत्यों ने अपना मतभेद भुलाकर मंदराचल को उखाड़ा और उसे समुद्र की ओर ले चले, लेकिन वे उसे अधिक दूर तक नहीं ले जा सके। तब भगवान विष्णु ने मंदराचल को समुद्र तट पर रख दिया। देवता और दैत्यों ने मंदराचल को समुद्र में डालकर नागराज वासुकि को नेती बनाया। किंतु मंदराचल के नीचे कोई आधार नहीं होने के कारण वह समुद्र में डूबने लगा। यह देखकर भगवान विष्णु विशाल कूर्म (कछुए) का रूप धारण कर समुद्र में मंदराचल के आधार बन गए। भगवान कूर्म  की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घुमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ। 3. वराह अवतार धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने दूसरा अवतार वराह रूप में लिया था। वराह अवतार से जुड़ी कथा इस प्रकार है- पुरातन समय में दैत्य हिरण्याक्ष ने जब पृथ्वी को ले जाकर समुद्र में छिपा दिया तब ब्रह्मा की नाक से भगवान विष्णु वराह रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु के इस रूप को देखकर सभी देवताओं व ऋषि-मुनियों ने उनकी स्तुति की। सबके आग्रह पर भगवान वराह ने पृथ्वी को ढूंढना प्रारंभ किया। अपनी थूथनी की सहायता से उन्होंने पृथ्वी का पता लगा लिया और समुद्र के अंदर जाकर अपने दांतों पर रखकर वे पृथ्वी को बाहर ले आए। जब हिरण्याक्ष दैत्य ने यह देखा तो उसने भगवान विष्णु के वराह रूप को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ। अंत में भगवान वराह ने हिरण्याक्ष का वध कर दिया। इसके बाद भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर उस पर पृथ्वी को स्थापित कर दिया। 4. भगवान नृसिंह भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस अवतार की कथा इस प्रकार है- धर्म ग्रंथों के अनुसार दैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से भी अधिक बलवान मानता था। उसे मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था। उसके राज में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था उसको दंड दिया जाता था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकशिपु का पता चली तो वह बहुत क्रोधित हुआ और प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया। हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई। तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। 5. वामन अवतार सत्ययुग में प्रह्लाद के पौत्र दैत्यराज बलि ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया। सभी देवता इस विपत्ति से बचने के लिए भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने कहा कि मैं स्वयं देवमाता अदिति के गर्भ से उत्पन्न होकर तुम्हें स्वर्ग का राज्य दिलाऊंगा। कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया। एक बार जब बलि महान यज्ञ कर रहा था तब भगवान वामन बलि की यज्ञशाला में गए और राजा बलि से तीन पग धरती दान में मांगी। राजा बलि के गुरु शुक्राचार्य भगवान की लीला समझ गए और उन्होंने बलि को दान देने से मना कर दिया। लेकिन

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