2023

जानिए कैसे हुआ भगवान गणेशजी का जन्म

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था। शास्त्रों के अनुसार बुधवार का दिन भगवान गणेश की पूजा के लिए विशेष फलदायी होता है। इस बार बुधवार के दिन से 10 दिनों तक चलने वाले गणेशोत्सव पर्व का शुभारंभ हो रहा है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश का जन्म हुआ था इस कारण से हर माह में आने वाली दोनों चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश की विशेष रूप से पूजा आराधना की जाती है। जब भाद्रपद माह की चतुर्थी आती है तब भगवान गणेश का जन्मोत्सव विधि-विधान और धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। महाराष्ट में जगह-जगह गणेश पंडालों में गणपति की विशाल प्रतिमा स्थापित की जाती है और 10 दिनों तक लगातार सिद्धिदाता और विध्नहर्ता की उपासना की जाती है। भगवान गणेश की सभी देवी-देवताओं में सबसे पहले पूजा की जाती है। हर शुभ काम से पहले भगवान गणेश की पूजा और ऊं गणेशाय नम: का जाप किया जाता है। गणेश उत्सव के मौके पर आइए जानते हैं गणेश जन्म कथा के बारे में। ऐसे हुआ गणेशजी का जन्म गणेश चतुर्थी की कथा के अनुसार,एक बार माता पार्वती ने स्न्नान के लिए जाने से पूर्व अपने शरीर के मैल से एक सुंदर बालक को उत्पन्न किया और उसे गणेश नाम दिया। पार्वतीजी ने उस बालक को आदेश दिया कि वह किसी को भी अंदर न आने दे,ऐसा कहकर पार्वती जी अंदर नहाने चली गई। जब भगवान शिव वहां आए ,तो बालक ने उन्हें अंदर आने से रोका और बोले अन्दर मेरी मां नहा रही है,आप अन्दर नहीं जा सकते। शिवजी ने गणेशजी को बहुत समझाया,कि पार्वती मेरी पत्नी है। पर गणेश जी नहीं माने तब शिवजी को बहुत गुस्सा आया और उन्होंने गणेशजी की गर्दन अपने त्रिशूल से काट दी और अन्दर चले गये।  जब पार्वतीजी ने शिवजी को अन्दर देखा तो बोली कि आप अन्दर कैसे आ गए। मैं तो बाहर गणेश को बिठाकर आई थी। तब शिवजी ने कहा कि मैंने उसको मार दिया। तब पार्वती जी रौद्र रूप धारण कर लिया और कहा कि जब आप मेरे पुत्र को वापस जीवित करेंगे तब ही मैं यहां से चलूंगी अन्यथा नहीं। शिवजी ने पार्वती जी को मनाने की बहुत कोशिश की पर पार्वती जी नहीं मानी।  सारे देवता एकत्रित हो गए सभी ने पार्वतीजी को मनाया पर वे नहीं मानी। तब शिवजी ने विष्णु भगवान से कहा कि किसी ऐसे बच्चे का सिर लेकर आये जिसकी मां अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सो रही हो। विष्णुजी ने तुरंत गरूड़ जी को आदेश दिया कि ऐसे बच्चे की खोज करके तुरंत उसकी गर्दन लाई जाए। गरूड़ जी के बहुत खोजने पर एक हथिनी ही ऐसी मिली जो कि अपने बच्चे की तरफ पीठ करके सो रही थी। गरूड़ जी ने तुरंत उस बच्चे का सिर लिया और शिवजी के पास आ गये। शिवजी ने वह  सिर गणेश जी के लगाया और गणेश जी को जीव दान दिया,साथ ही यह वरदान भी दिया कि आज से कही भी कोई भी पूजा होगी उसमें गणेश जी की पूजा सर्वप्रथम होगी । इसलिए हम कोई भी कार्य करते है तो उसमें हमें सबसे पहले गणेशजी की पूजा करनी चाहिए,अन्यथा पूजा सफल नहीं होती। 

जानिए कैसे हुआ भगवान गणेशजी का जन्म Read More »

श्री गणेश चतुर्थी व्रत कथा 

पौराणिक एवं प्रचलित श्री गणेश कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेश जी भी बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर शिव जी ने कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। भगवान श्री गणेश का जन्म भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को हुआ था, इस दिन को गणेश जन्मोत्सव के रूप में बनाया जाता है। यदि भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को रविवार या मंगलवार दिन पड़ता है तो इस व्रत को महाचतुर्थी व्रत कहा जाता है। यह व्रत करने से भगवान गणेश का आर्शीवाद प्राप्त होता है। व्रत की विधि व विधान : गणेश चतुर्थी के दिन प्रात काल स्न्नानादि से निवूत होकर सोना, चाँदी, ताँबा, मिट्टी या गोबर से एक दन्त गणेश की मूर्ति बनाकर उसकी पूजा की जाती है तथा इक्कीस मोदकों का भोग लगाते है तथा हरित दुर्वा के इक्कीस अंकुर निम्न दस नाम लेकर चढ़ाने चाहिए १. गतापि, २. गोरी सुमन, ३. अधनाशक, ४. एकदन्त, ५. ईशपुत्र, ६. सर्वसिद्धिप्रद, ७. विनायक, ८. कुमार गुरु, १०. इंभवकवाय और १०. मूषक वाहन। इक्कीस मोदकों में से दस मोदक ब्राह्मणों को दान देना तथा ग्यारह मोदक घर में रखें और स्वमं प्रसाद रूप में ग्रहण करे। किन किन बातो का ध्यान रखे : ब्रह्मचर्य का पालन करे।दिन में निंद्रा ना ले।झूठ, गुस्सा, वाद – विवाद व् किसी को दंड ना दे।कम बोले व् भगवान् का ध्यान करे।और इस दिन “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए। गणेश चतुर्थी व्रत की प्रथम कथा श्री गणेश चतुर्थी व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव व माता पार्वती नर्मदा नदी के तट पर बैठे हुए थे, जहां माता पार्वती ने भगवान शिव से चौपड़ खेलने को कहा। शिव जी ने बोला खेल तो लेंगे परन्तु खेल में हार-जीत का फैसला करने के लिए हमें एक पुतला बनाकर उसकी प्राण-प्रतिष्ठा करनी रहेगी जो इस खेल में हार जीत को सुनियोजित करेगा। इस पर पार्वती जी भी राजी हो गई थी तद पच्यात शिव जी ने एक पुतले की प्राण-प्रतिष्ठा की और उस से कहा – “बेटा, हम चौपड़ खेलना चाहते हैं, और खेल में हार-जीत का फैसला तुमको करना होगा कि हम दोनों में से कौन हारा और कौन जीता?” और उसके बाद भगवान शिव व माता पार्वती ने चौपड़ खेल खेलना शुरू किया। खेल को 3 बार खेला गया और तीनों ही बार माता पार्वती ने ही खेल को जीता। परन्तु खेल समाप्त होने के बाद बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिए कहा गया तो उस बालक ने महादेव को ही विजयी बताया। ऐसा फैसला सुनकर माता पार्वती को क्रोध आना निश्चय था और उन्होंने क्रोध वश उस में उन्होंने बालक को श्राप दे दिया की तुम लंगड़े और कीचड़ में पड़े रहोगें। जिसके बाद बालक ने माता पार्वती से माफी मांगी और कहा कि यह मुझसे अज्ञानतावश हुआ है, मैंने किसी द्वेष भाव से ऐसा नहीं किया था। जब बालक द्वारा क्षमा मांगी तो माता ने कहा- ‘यहां पर गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऐसा करने पर तुम मुझे प्राप्त करोगे।’ ऐसा बताकर माता पार्वती शिव के साथ कैलाश पर्वत पर लौट आई। पुरे एक वर्ष के बाद वह स्थान पर नागकन्याएं आईं, तब नागकन्याओं से श्री गणेश के व्रत की संपूर्ण विधि मालूम कर उस बालक ने 21 दिन तक लगातार गणेश जी का व्रत पूजन किया। उस बालक की सच्ची श्रद्धा को देखकर गणेश जी प्रसन्न हुए। उन्होंने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिए बोला। उस बालक ने कहा- ‘हे विनायक! मुझमें इतनी शक्ति दीजिए कि मैं अपने पैरों से स्वयं चलकर कैलाश पर्वत पर अपने माता-पिता के पास पहुंच सकूं और वे यह देख कर प्रसन्न हों सके।’ बालक को वरदान देकर श्री गणेश अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद वह बालक कैलाश पर्वत पर स्वयं पहुंच गया और कैलाश पर्वत पर पहुंचने की अपनी कथा उसने भगवान शिव जी को सुनाई। चौपड़ वाले दिन से माता पार्वती शिवजी से भी विमुख हो गई थीं अत: देवी के रुष्ट होने पर भगवान शिव ने भी बालक के बताए अनुसार 21 दिनों तक श्री गणेश का व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से माता पार्वती के मन से भगवान शिव के लिए जो नाराजगी थी, वह समाप्त हो गई। तब यह व्रत विधि भगवान शंकर ने माता पार्वती को बताई। यह सुनकर माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जागृत हुई। तब माता पार्वती ने भी 21 दिन तक श्री गणेश का व्रत किया तथा दूर्वा, फूल और लड्डूओं से गणेश जी का पूजन-अर्चन किया। व्रत के 21वें दिन कार्तिकेय स्वयं माता पार्वतीजी से आ मिले। उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का यह व्रत समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति करने वाला व्रत माना जाता रहा है। इस व्रत को करने से मनुष्‍य के सारे कष्ट दूर होकर मनुष्य को समस्त सुख-सुविधाएं प्राप्त होती हैं। गणेश चतुर्थी व्रत की द्वितीय कथा श्री गणेश चतुर्थी व्रत की एक और पौराणिक कथा के अनुसार एक बार सभी देवता एक विपदा में उलझे थे। जिसके निवारण के लिए वे सभी देवता भगवान् शिव के निकट आये, उस समय  शिव जी के दोनों सुपुत्र बैठे थे। देवताओं की सभी बात सुनकर शिव जी ने अपने बेटों कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण करना चाहता है। इस पर दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया। इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा। भगवान शिव के ऐसा कहने पर कार्तिकेय बिना समय गवाए अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल जाते है, और गणेश जी इस सोच में पड़ गए कि वह चूहे की सवारी करके ऐसा कार्य करने में तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्होंने अपनी सोच समझ से एक उपाय सूझा। गणेश

श्री गणेश चतुर्थी व्रत कथा  Read More »

रामायण की कहानी हनुमान जी का जन्म

रामभक्त हनुमान को कई नामों से जाना जाता है, जैसे मारुति नंदन, पवनपुत्र व संकटमोचन आदि। माना जाता है कि वह भगवान शिव के 11वें रूद्र अवतार थे और उनके जन्म का उल्लेख कई पौराणिक कथाओं में मिलता है। इस कहानी में हम हनुमान जी के जन्म से जुड़ी ऐसी ही एक प्रचलित कथा बता रहे हैं। इस हवन के बाद पंडित ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को फल दिए, जिन्हें खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई थी। इन्हीं फलों में से एक छोटा-सा अंश एक पक्षी उठाकर ले गया, जिसे उसने बाद में माता अंजनी के सामने रख दिया। इस प्रकार भगवान शिव के आशीर्वाद से हुआ था केसरीनंदन हनुमान का जन्म हनुमान जी के जन्म की कथा बहुत रोचक है। वे माता अंजनी और वानर राज केसरी के पुत्र थे। माना जाता है हनुमान जी जन्म कोई साधारण संयोग नहीं था, बल्कि देवतागण, नक्षत्र और सारे भगवान के आशीर्वाद से पृथ्वी से पाप का विनाश करने के लिए हुआ था। मान्यताओं के अनुसार, माता अंजनी को यह वरदान मिला हुआ था कि उनका होने वाला पुत्र शिव का अंश होगा। इसके अलावा, एक मान्यता यह भी है कि जब बजरंगबली का जन्म हुआ था, उसी समय रावण के घर भी एक पुत्र ने जन्म लिया था। यह संयोग दुनिया में अच्छाई और बुराई का संतुलन बनाए रखने के लिए हुआ था। बात सतयुग की है, जब माता अंजनी एक जंगल में बैठकर पुत्र प्राप्ति के लिए भगवान शिव की पूजा कर रही थीं। वह हाथ जोड़कर और आंखें बंद करके आराधना में लीन थी, तभी उनकी सामने रखी कटोरी में एक फल आकर गिरा। माता अंजनी ने जब उस फल को देखा, तो उन्होंने उसे प्रसाद समझ कर सेवन कर लिया। दरअसल, जब माता अंजनी जंगल में पूजा कर रही थी, तब वहां से दूर अयोध्या में राजा दशरथ भी पुत्र प्राप्ति के लिए शिव-यज्ञ करवा रहे थे। इस हवन के बाद पंडित ने राजा दशरथ की तीनों रानियों को फल दिए, जिन्हें खाने से उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई थी। इन्हीं फलों में से एक छोटा-सा अंश एक पक्षी उठाकर ले गया, जिसे उसने बाद में माता अंजनी के सामने रख दिया। वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी के जन्म स्थान का वर्णन वाल्मीकि रामायण मे किष्किंधाकांड में सबसे पहले हनुमान जी के जन्म और उनके जन्म स्थान का वर्णन मिलता है. प्रसंग यह है कि जब सारे वानर माता सीता की खोज में समुद्र के किनारे पहुंचते हैं तो लंका जाने के लिए समुद्र कौन पार करेगा इसको लेकर सभी संशय में पड़ जाते हैं. जाम्बवंत जी हनुमान जी को समुद्र पार कर लंका जाने के लिए उत्साहित करते हैं और हनुमान जी को उनके दिव्य जन्म की कथा सुनाते हैं. वाल्मीकि रामायण की कथा के अनुसार महावीर हनुमान जी की माता अंजना पहले स्वर्ग में पुंजकस्थली नामक अप्सरा थी, जिन्हें एक शाप (लोकश्रुतिओं के अनुसार ये शाप दुर्वासा ऋषि ने दिया था) की वजह से धरती पर एक वानरी के रुप में जन्म लेना पड़ता है. जो कभी भी अपना रुप एक इंसान की तरह कर सकती थीं

रामायण की कहानी हनुमान जी का जन्म Read More »

काली की रचना कैसे हुई शिव शंकर भगवान की कथा

प्राचीन काल में राक्षस अपनी तपस्या के बल पर ऐसी शक्तियां प्राप्त कर लेते थे, जिनके सामने टिकना देवताओं के लिए भी मुश्किल हो जाता था। राक्षस अपनी शक्तियों का प्रयोग करके आतंक और भय फैलाते थे। ऐसी ही एक घटना रक्तबीज नाम से राक्षस से जुड़ी है। रक्तबीज का अंत मां काली के हाथों हुआ, लेकिन इस दौरान गलती से मां काली का पांव भगवान शिव के ऊपर आ गया था। आइये, जानते हैं उस घटना के बारे में एक बार रक्तबीज नाम के एक राक्षस ने भगवान शिव को प्रसन्न किया और उनसे एक वरदान हासिल कर लिया। रक्तबीज को यह वरदान मिला था कि उसका खून जहां भी गिरेगा, वहां से उसी के समान राक्षस पैदा हो जाएगा। रक्तबीज को अपने इस गुण पर बहुत अभिमान था, इसलिए उसने अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। घमंड में चूर रक्तबीज ने देवताओं को युद्ध के लिए ललकारा। देवता रक्तबीज से लड़ने के लिए आ गए, लेकिन जहां भी रक्त बीज का रक्त गिरता, वहां से एक और रक्त बीज पैदा हो जाता। इसका परिणाम यह हुआ कि बहुत सारे रक्तबीज पैदा हो गए, जिन्हें हराने का कोई रास्ता देवताओं को दिखाई नहीं दे रहा था। दुर्गा अथवा पार्वती के प्रचंड अवतार को ही कहा निकाली कहते हैं। असुरों से युद्ध करते समय दुर्गा ने सोचा कि चंद और मुंड नाम के असुरों को मारने के लिए हिंसक और विनाशक रूप धारण करना चाहिए। गुस्से में आकर दुर्गा ने अपने तीसरे नेत्र से तेज बिजली निकाल दी। इस बिजली से नारी की एक काली आकृति प्रकट हुई। उसकी आंखें सुलग रही थी और बाल बिखरे हुए थे। उसकी लाल जीव चमक रही थी। हीरे या सोने के गहनों के बजाय वह मनुष्य  की खोपड़ी की माला पहने हुए थी। उसके तीन हाथों में त्रिशूल तलवार और मनुष्य की खोपड़ी थी। चौथे हाथ से वह आशीर्वाद दे रही थी।  पूरी तरह से रक्त पिपासु दिख रही वह देवी असुरों को मारने चल पड़ी। उसने चंद और मुंड को मार डाला। इस तरह उसका नाम चामुंडा पड़ गया।  इसके बाद शिव जी प्रकट हुए और उन्होंने काली के विनाश को रोकने के लिए अपने आप को उसके पैरों पर गिरा दीया। शिव को अपने पैरों के नीचे गिरा दे काली को अपनी गलती महसूस हुई और उसने मारकाट बंद कर दी।

काली की रचना कैसे हुई शिव शंकर भगवान की कथा Read More »

शिव और पार्वती का विवाह

भगवान शिव की पत्‍नी मां पार्वती हैं और इन दोनों का जन्म जन्मांतरोंं का संबंध है. पुराणों में इनके विवाह की कई तरह की कथाएं हैं. लोकमान्‍यताओं के अनुसार, शिवजी ने हिमालय के मंदाकिनी क्षेत्र के त्रियुगीनारायण में पार्वती से विवाह किया था. जहां के लोग कहते हैं कि आज भी वहां अग्नि की अखंड ज्योति जल रही है. वो ज्‍योति कभी बुझती नहीं हैं. बताया जाता है कि, शिव-पार्वती उसी ज्योति के सामने विवाह बंधन में बंधे थे. हिमालय के राजा हिमवंत और उनकी पत्नी मेनादेवी शिव जी के भक्त थे। उनकी इच्छा एक ऐसी पुत्री पाने की थी जिसका विवाह में शिव जी के साथ कर सके। मेनादेवी ने शिवजी की पत्नी गौरीदेवी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या शुरू कर दी। कई दिनों तक वह बिना खाए पिए तप करती रही। गौरीदेवी ने प्रसन्न होकर मेनादेवी की बेटी के रूप में जन्म लेने का वचन दे दिया। गौरीदेवी ने आग में कूदकर अपनी जान दे दी। इसके बाद उन्होंने मेनादेवी की बेटी के रूप में जन्म लिया, जिसका नाम पार्वती रखा गया। पार्वती ने जब बोलना शुरू किया तो उनके मुंह में पहला शब्द शिव ही निकला। बड़ी होकर वह बहुत सुंदर युवती बनी। इस बीच शिवजी ने अपनी पत्नी की मृत्यु से दुखी होकर लंबा ध्यान शुरू कर दिया था। हिमवंत को आशंका हो रही थी की शायद शिवजी गहन ध्यान मैं होने के कारण पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार ना करें। उन्होंने समस्या के समाधान के लिए नारद को बुलाया। नारद ने उनसे कहा कि पार्वती तपस्या के जरिए शिव जी का हृदय जीत सकती थी। हिमवंत ने पार्वती को शिव जी के पास ही भेज दिया। पार्वती ने दिन-रात उनकी पूजा और सेवा की। शिवजी पार्वती की भक्ति से बहुत प्रसन्न हुए, लेकिन उन्होंने उनकी परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने युवा ब्राह्मण का रूप धारण किया और पार्वती के पास जाकर कहने लगे कि भिकारी की तरह रहने वाले शिवजी से विवाह करना सही नहीं होगा। पार्वती यह सुनकर बहुत क्रोधित हुई। उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वे शिव को छोड़कर और किसी के साथ विवाह नहीं करेंगी। उनके उत्तर से संतुष्ट होकर शिव अपने असली रूप में आ गए और पार्वती से विवाह करने को तैयार हो गए। हिमवंत ने धूमधाम से दोनों का विवाह कर दिया।

शिव और पार्वती का विवाह Read More »

जगत के पालनहार भगवान विष्णु के निवास स्थान बदरीनाथके खुले कपाट, जानें इससे जुड़ी रोचक बातें

सनातन शास्त्रों की मानें तो कालांतर में बदरीनाथ में देवों के देव महादेव का निवास स्थान था। जगत का पालनहार भगवान विष्णु को यह स्थान बहुत पसंद आया। इसके लिए भगवान विष्णु ने महादेव से निवास के लिए मांग लिया। उस समय महादेव ने विष्णु जी को निवास हेतु बदरीनाथ देकर कैलाश पर चले गए बदरीनाथ मंदिर को बदरीनारायण मंदिर भी कहा जाता है। जो अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के रूप बद्रीनाथ को समर्पित है। यह हिन्दुओं के चार धाम मेें से एक धाम है। ऋषिकेश से यह 294 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर दिशा में स्थित है। ये पंच बदरी में से एक बद्री भी है। उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से तथा हिंदू धर्म की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। देवों की भूमि उत्तराखंड स्थित बदरीनाथ धाम के कपाट आज सुबह 7 बजकर 10 मिनट पर विधि पूर्वक श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए हैं। इस शुभ और पावन अवसर पर हेलीकॉप्टर के माध्यम से बदरीनाथ धाम में पुष्प वर्षा की गई। जिस समय जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु निवास स्थान के कपाट खोले गए। उस समय 10 हजार से अधिक श्रद्धालु उपस्थित थे। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलते ही श्रीहरि के नाम का उद्घोष होने लगा। श्रद्धालुओं ने नारायण का जयकारा लगाया। पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। इसके पश्चात, श्रद्धालुओं ने नारायण श्री हरि विष्णु और अखंड ज्योति के दर्शन किए। इसके साथ ही चारधाम यात्रा की शुरुआत हो गई। आइए, बदरीनाथ से जुड़ी कुछ रोचक बातें जानते हैं कैसे नाम पड़ा बदरीनाथ पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, चिरकाल में एक बार भगवान श्रीहरि विष्णु से अप्रसन्न होकर माता लक्ष्मी अपने मायके चली गईं। उस समय भगवान विष्णु वियोग में क्षीर सागर से पृथ्वी पर तप करने आ गए। तत्कालीन समय में उस स्थान पर घना जंगल था। वहीं, चारों तरफ ऊंचे पहाड़ थे। इसके लिए भगवान विष्णु को एकांतवास के लिए यह स्थान उपयुक्त लगा। कालांतर में भगवान विष्णु ने कठिन तपस्या और साधना की। कुछ दिनों के बाद माता लक्ष्मी को अपनी गलती का अहसास हुआ। इसके पश्चात भगवान विष्णु को ढूंढते-ढूंढते मां इसी स्थान पर आ गईं। माता लक्ष्मी को देख भगवान प्रसन्न हुए। चारों तरफ बेर फल का पेड़ देख माता लक्ष्मी ने स्थान को बदरीनाथ नाम दिया

जगत के पालनहार भगवान विष्णु के निवास स्थान बदरीनाथके खुले कपाट, जानें इससे जुड़ी रोचक बातें Read More »

जानें, कैसे हुई तुलसी की उत्पत्ति और क्या हैं इसकी पूजा विधि और महत्व

वृंदा के शाप से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। तब माता लक्ष्मी की याचना पर वृंदा ने शाप वापस लिया और विष्णु जी को शाप मुक्त कर खुद पति जलंधर के साथ सती हो गईं। वृंदा के सती राख से एक पौधा का सृजन हुआ, जिसे तुलसी कहा गया। कालांतर में विष्णु जी ने वृंदा को वरदान दिया कि मेरे साथ आपकी पूजा-उपासना जरूर की जाएगी तुलसी का जन्म  तुलसी को हिंदू शास्त्रों में वृंदा के नाम से जाना जाता है। वह कालनेमि नामक राक्षस राजा की एक सुंदर राजकुमारी थी। उनका विवाह जालंधर से हुआ था जो भगवान शिव का एक शक्तिशाली हिस्सा था। जालंधर में अपार शक्ति थी क्योंकि वह भगवान शिव के तीसरे नेत्र से अग्नि से उत्पन्न हुआ था। जालंधर को राजकुमारी वृंदा से प्यार हो गया, जो एक बेहद पवित्र और एक समर्पित महिला थी।  सनातन धर्म में तुलसी का विशेष महत्व है। हर रोज लोग स्नान-ध्यान के बाद तुलसी जी की पूजा आराधना जरूर करते हैं। ऐसी मान्यता है कि अगर भगवान विष्णु जी और माता लक्ष्मी की कृपा पाना है तो रोजाना सुबह में तुलसी को जल का अर्घ्य देना चाहिए और शाम में दीपक जलाकर आरती करनी चाहिए। ऐसा करने से व्यक्ति के घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है। धार्मिक ग्रंथों में लिखा है कि तुलसी जी भगवान विष्णु जी की अर्धांगनी हैं, जो माता लक्ष्मी की स्वरूप हैं। आइए जानते हैं कि क्यों तुलसी पूजा क्यों की जाती है और पूजा कैसे करनी चाहिए- सूर्य ग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथा क्या बताती है, नहीं जानते हैं तो यहां पढ़ें तुलसी जी की पूजा क्यों की जाती है पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, चिरकाल में वृंदा नामक एक युवती रहती थी, जो कि भगवान विष्णु जी की परम भक्त थीं, लेकिन वह राक्षस कुल की थीं। कालांतर में वृंदा की शादी जलंधर नामक राक्षस से हुई। इसके बाद वह कुशल गृहिणी बनकर गृहस्थ जीवन व्यतीत करने लगीं। इसके बावजूद वह भगवान विष्णु जी की नित्य पूजा किया करती थीं। इस युद्ध में देवता जलंधर को हरा न सके इसी दौरान एक बार देवताओं और दानवों के बीच भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में जलंधर भी दानवों की तरफ से युद्ध करने गए। उस समय वृंदा ने कहा कि-हे स्वामी आप युद्ध में जा रहे हैं और मैं पूजा करने जा रही हूं। आप युद्ध और मैं तप करूंगी। इस तप में विष्णु जी से आपकी सलामती की प्रार्थना करूंगी। इसके बाद वृंदा विष्णु जी की तपस्या में लग गई। इस युद्ध में देवता जलंधर को हरा न पाए। विष्णु जी शालिग्राम पत्थर बन गए इसके बाद विष्णु जी जलंधर रूप धारण कर वृंदा के पास पहुंचे। अपने पति को देख वृंदा झट से विष्णु जी के मायारूपी जलंधर के चरण स्पर्श की। उसी समय देवताओं ने जलंधर को युद्ध में परास्त कर उसका वध कर दिया। इसके बाद जलंधर का सर वृंदा के पास आकर गिरा। यह देख वृंदा समझ गई कि उसके साथ छल किया गया। उसी समय वृंदा ने छली विष्णु जी को पत्थर होने का शाप दिया। इस शाप के फलस्वरूप विष्णु जी शालिग्राम पत्थर बन गए। वृंदा के शाप से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। तब माता लक्ष्मी की याचना पर वृंदा ने शाप वापस लिया और विष्णु जी को शाप मुक्त कर खुद पति जलंधर के साथ सती हो गईं। वृंदा के सती राख से एक पौधा का सृजन हुआ, जिसे तुलसी कहा गया। कालांतर में विष्णु जी ने वृंदा को वरदान दिया कि मेरे साथ आपकी पूजा-उपासना जरूर की जाएगी।  रोजाना तुलसी जी की पूजा कैसे करें हर रोज स्नान-ध्यान के बाद तुलसी जी के साथ शालिग्राम (प्राण प्रतिष्ठा कर ) पत्थर को भी जल का अर्घ्य दें। इसके बाद तुलसी स्थल का चार बार परिक्रमा करें। जब आप तुलसी जी की परिक्रमा करें तो निम्न मंत्र का उच्चारण जरूर करें। वृंदा वृंदावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी। पुष्पसारा नंदनीय तुलसी कृष्ण जीवनी।। एतभामांष्टक चैव स्त्रोतं नामर्थं संयुतम। यः पठेत तां च सम्पूज्य सौश्रमेघ फलंलमेता।। इसके बाद भगवान श्रीहरि विष्णु जी और माता तुलसी से घर की सुख, शांति और समृद्धि के प्रार्थना करें। इसी तरह शाम में तुलसी जी की रोजाना आरती करें। आरती ज्योति स्थल पर तंदुल से स्वस्तिक का चिन्ह जरूर बनाएं। उसी स्थान पर आरती ज्योति रखें।

जानें, कैसे हुई तुलसी की उत्पत्ति और क्या हैं इसकी पूजा विधि और महत्व Read More »

दुर्गा अष्टमी की कहानी

नमस्कार दोस्तों, हम आपके सामने एक ऐसी कथा लेकर आ रहे हैं जो पौराणिक और धार्मिक है, जिसे शायद बहुत कम ही लोगों को पता होता है। लेकिन न पता होने के कारण भी हम उस को मानते है। हम जिस त्यौहार को मनाते, उसके विषय मे जानकारी जरूर होनी चाहिए तभी त्यौहार भी अच्छा होता है और खुशी मनाने में भी अच्छा लगता है। साल में 365 दिन होते है, उनमें से कुछ खास महीनों में 9 दिन ऐसे है आते है, जो माता रानी के होते है। जिनमें 9  देवियों की पूजा की जाती है। इस 9 दिन को ही नवरात्रि कहा जाता है। भारत मे लोग इस समय को बड़े ही सुंदर ढंग से मनाते है। इसमें झाँकीय सजाई जाती है, माता की आरती की जाती है, पूजा भी होती है और लोग अपनी मनोकामना के लिए उपवास भी रखते है। नवरात्रि ग्रीष्म के समय अप्रैल माह के दूसरे सप्ताह में होती है और शीतकालीन समय मे यह अक्टूबर माह में पड़ती है। इस 9 दिनों में किये गए कार्य बड़े ही शुभ माने जाते है, जो अत्यंत ही सुंदर ढंग से मनाए जाते है। लोग इस नवरात्रि में ही घर के लिए समान खरीदते है। इस समय के बीच 8वें दिन एक ऐसे दिन माना जाता है, जो एक ऐसी देवी की पूजा की जाती है। जिन्होंने ने इस जीवन जगत में असुरों का नास किया था और इस दिन को अष्टमी के नाम से जाना जाने लगा था। तो चलिए जानते है इसे क्यों मानते है। दुर्गा अष्टमी की कहानी प्राचीन समय मे जब स्वर्ग पर असुरों ने अपना कब्जा जमाने का सोच और उस पर चढ़ाई करके स्वर्ग के राजा इंद्र से युद्ध किया। उन असुरों में से सबसे शक्तिशाली असुर महिसशुर था, जिसमें स्वर्ग के राजा इंद्र की हार हो जाती है। तब इंद्र तीनों लोकों के स्वामी भगवान शिव के पास जाते है और उनसे प्रार्थना करते है। फिर वे भगवान विष्णु के पास जाते है तथा ब्रम्हा के पास जाते है। तब तीनों देवता मिल कर एक ऐसी आदिशक्ति को प्रकट करते है, जो अत्यंत ही शक्तिशाली होती है। जब आदि शक्ति का जन्म होता है तभी सभी देवता वही उपस्थित होते है, जिन्होंने आदि शक्ति को अपनी ही  इच्छानुशार शक्ति देते है, जिससे आदि शक्ति और भी शक्तिशाली हो जाती है। महिषासुर सभी जगह अपना आधिपत्य जमा रहा था, उसने ऋषि मुनियों को भी असुर बना दिया था और अगर जो इसकी बात नहीं मानता था, वह उसे मार देता था। जगह-जगह पर हो रहे यज्ञ को उसने भंग कर दिया था। बहुत ही दुष्ट था, वह बहुत अत्याचार कर रहा था। तभी महिसशुर और माँ दुर्गा के बीच लड़ाई होती है, जिसमें मां दुर्गा सभी असुरों का नाश कर देती है। अपने त्रिसूल से महिषाशुर का वध कर देती है और इसी दिन को दुर्गा अष्टमी के रूप में मनाया जाने लगा। इसे लोग बहुत ही धूम धाम से मनाते है। अच्छे अच्छे पकवान भी बनाते है और गीत संगीत होता है लोग ढोल मंजीरा से नाच गाना करते है। सभी देवियों में दुर्गा को ही सबसे सर्वोपरी माना गया है, जिन्होंने असुरों का वध करने के साथ ही अपने भक्तों के द्वारा प्रसंसा करने पर उन्हें वरदान देती है और मुसीबतों से बचाती है। आप सबको इन सबका उदाहरण फिल्मों में देखने को मिल ही गया होगा, लेकिन यह सभी घटना सत्य है। इनकी आरती में भी कहा गया है कि “सूदन को आंख दे कोढ़िन को काया, मझींन को पुत्र दे” अर्थात अन्धो को आंखे दे और जो व्यक्ति गरीब होते है, उनको धन से भर दे, मंझिन को पुत्र दे अर्थात जिन स्त्रियों को पुत्र नसीब नहीं होता है, उन्हें पुत्र देती है। नवरात्रि में नव देवियों की पूजा की जाती है। नौ रूप शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी (दुर्गा) का नाम दिया गया है।

दुर्गा अष्टमी की कहानी Read More »

शिव के 10 अवतार के नाम

शिवजी त्रिदेवों में से एक हैं. ब्रह्मदेव जहां सृष्टि के रचयिता माने गए हैं, वहीं विष्णु पालक और शिव संहारक माने गए हैं. विष्णु को हरि और शिव को हर कहा जाता है. धर्मशास्त्रों में हरि के 24 अवतारों का वर्णन है, उसी प्रकार ‘हर’ के 19 अवतारों का उल्लेख है. यहां आज हम आपको शिव महापुराण में बताए गए शिव जी के कुछ अंश अवतारों का उल्लेख करेंगे. शिवजी ने कई रुद्रावतार लिए, जिनमें 11वें रुद्र अवतार महावीर हनुमान माने गए हैं. शिवजी का पहला स्वरूप ‘महाकाल’ को माना गया है. यही वह रूप है, जो संहार का प्रतीक है. इन्‍हें काल भी कहा जाता है. जब कोई भी प्राणी देह त्यागता है तो ‘काल’ का नाम आता है. बहुत सारे भक्तजन शिवजी को ‘महाकाल’ ही कहते हैं. 1.योगीश्वर सद्गुरु: योग के पथ पर होने का अर्थ है कि आप अपने जीवन में एक ऐसे चरण पर आ गए हैं जहाँ आपने अपने भौतिक शरीर की सीमाओं को जान लिया है। आपने भौतिक सीमाओं से परे जाने की आवश्यकता को महसूस किया है – आप स्वयं को इस असीम ब्रह्माण्ड में भी बँधा हुआ पा रहे हैं। आप यह देखने योग्य हो गए हैं कि अगर आप छोटी सीमा में बंध सकते हैं, तो आप कहीं न कहीं विशाल सीमा में भी बंध सकते हैं। आपको ये बात समझने के लिए ब्रह्माण्ड के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जाने की ज़रूरत नहीं है। यहीं बैठे आप जानते हैं कि अगर यह सीमा आपके लिए बाधा बन रही है तो विशाल ब्रह्माण्ड भी कभी आपके लिए बाधा बन जाएगा – दूरियाँ लांघने की क्षमता आने से ये आपके अनुभव में आ जाएगा। एक बार आपकी दूरियाँ लांघने की क्षमता बढ़ेगी, तो आपके लिए किसी भी तरह की सीमा बाधा बन जाएगी। जब आप इसे एक बार जान और समझ लेंगे, जब आप उस तड़प को जान लेंगे, जिसे भौतिक रूप से पूरा नहीं किया जा सकता – तो आप योग की खोज करना शुरू करते हैं। योग का अर्थ है भौतिक सीमाओं के बंधनों से आजाद होना। आपका प्रयास केवल भौतिकता पर महारत जासिल करना नहीं, पर इसकी सीमा को तोड़ते हुए, ऐसे आयाम को छूना है, जो भौतिक प्रकृति नहीं रखता। आप ऐसी दो चीज़ों को जोड़ना चाहते हैं – जिनमें एक सीमा में कैद तथा दूसरी असीम है। आप सीमाओं को अस्तित्व की असीम प्रकृति में विलीन करना चाहते हैं, इसलिए, योगेश्वराय। 2.भूतेश्वर यह सारी भौतिक सृष्टि – जिसे हम देख, सुन, सूंघ, छू व चख सकते हैं – यह देह, यह ग्रह, ब्रह्माण्ड, सब कुछ – यह सब कुछ पंच तत्वों का ही खेल है। केवल पंच तत्वों की मदद से कैसी अद्भुत शरारत – ये ‘सृष्टि’ रच दी गई है! केवल पंच तत्व, जिन्हें आप एक हाथ की अंगुलियों से गिन सकते हैं, इसने कितनी चीज़ें तैयार की गई हैं। सृजन इससे अधिक करुणामयी नहीं हो सकता। अगर ये कहीं पचास लाख तत्व होते तो आप कहीं खो कर रह जाते। पंच भूतों के रूप में जाने गए, इन तत्वों को साधना ही सब कुछ है – आपकी सेहत, आपका कल्याण, इस जगत में आपका बल और अपनी इच्छा से कुछ रचने की योग्यता। जाने-अनजाने, चेतन या अचेतन तौर पर, व्यक्ति किसी हद तक इन विभिन्न आयामों को साध लेते हैं। वे कितना नियंत्रण रखते हैं, उसी से उनकी देह, मन और उनके द्वारा होने वाले कामों और उनकी सफलता की प्रकृति सुनिश्चित होती है – या उनकी दृष्टि या समझ कहां तक जा सकती है आदि तय होता है। भूत भूत भूतेश्वराय का अर्थ है कि जो भी जीवन के पंच भूतों को साध लेता है, वह कम से कम भौतिक जगत में, अपने जीवन की नियति या भाग्य को तय कर सकता है। 3.कालेश्वर काल – समय। भले ही आपने पांचों तत्त्वों को अपने बस में कर लिया हो, इस असीम के साथ एकाकार हो गए हों या आपने विलय को जान लिया हो – जब तक आप यहाँ हैं, समय चलता जा रहा है। समय को साधना, एक बिलकुल ही अलग आयाम है। काल का अर्थ केवल समय नहीं, इसका एक अर्थ अंधकार भी है। समय अंधकार है। समय प्रकाश नहीं हो सकता क्योंकि प्रकाश समय में एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक जाता है। प्रकाश समय का दास है। प्रकाश एक ऐसा तत्व है, जिसका एक आदि और अंत है। समय वैसा तत्व नहीं है। हिंदू जीवनशैली के अनुसार, वे समय के छह अलग-अलग आयाम हैं। एक बात तो आपको जाननी ही होगी – जब आप यहाँ बैठे हैं, तो आपका समय तेज़ी से भाग रहा है। मृत्यु के लिए तमिल में बहुत सटीक शब्द या अभिव्यक्ति है – कालम् आइटांगा- ‘उसका समय समाप्त हो गया।’ अंग्रेज़ी में भी हम कुछ समय पहले ऐसा कहते थे, ‘वह एक्सपायर हो गया।’ किसी दवा की तरह इंसान की भी एक्सपायरी डेट होती है। आपको लग सकता है कि आप कई जगहों पर जा रहे हैं। नहीं, जहाँ तक आपके शरीर का संबंध है, यह सीध कब्र की ओर जा रहा है, एक क्षण के लिए भी इसकी यात्रा नहीं थमती। आप इसे धीमा तो कर सकते हैं किंतु यह अपनी दिशा नहीं बदलता। जब आप बड़े होंगे तो धीरे-धीरे जान सकेंगे कि यह धरती आपको वापस निगलने की तैयारी में है। जीवन अपनी बारी पूरी करता है। समय जीवन का एक विशेष आयाम है – यह अन्य तीन आयामों के साथ मेल नहीं खाता। और ब्रह्माण्ड की सभी वस्तुओं में से, यह सबसे अधिक रहस्यमयी है। आप इसकी व्याख्या नहीं कर सकते क्योंकि यह है ही नहीं। यह अस्तित्व के ऐसे किसी भी रूप में नहीं है, जिनकी आपको समझ है। यह सृष्टि का सबसे शक्तिशाली आयाम है, जो सारे ब्रह्माण्ड को एक साथ थामे रखता है। इसी के कारण आधुनिक भौतिकी भ्रम में है कि गुरुत्वाकर्षण कैसे काम करता है, क्योंकि गुरुत्वाकर्षण है ही नहीं। यह समय ही है जो सब कुछ एक साथ बाँधे रखता है। 4.शिव-सर्वेश्वर-शंभो शिव का अर्थ है, ‘जो है ही नहीं, जो विलीन हो गया।’ जो है ही नहीं, हर चीज़ का आधार नहीं, और वही असीम सर्वेश्वर है। शंभो केवल एक मार्ग और एक कुँजी

शिव के 10 अवतार के नाम Read More »

सूर्य ग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथा क्या बताती है, नहीं जानते हैं तो यहां पढ़ें

20 अप्रैल 2023 को सूर्य ग्रहण है. करीब 19 साल बाद मेष राशि में सूर्य ग्रहण रहेगा. क्या आप जानते हैं ग्रहण का संबंध समुद्र मंथन से है. आइए जानते हैं कैसे 20 अप्रैल 2023 को सूर्य ग्रहण है.भारतीय समयानुसार, यह सूर्य ग्रहण इन देशों में सुबह 07 बजकर 05 मिनट से लेकर दोपहर 12 बजकर 39 मिनट तक रहेगा. यह सूर्य ग्रहण अश्विनी नक्षत्र में लगेगा, इस नक्षत्र का स्वामी केतु है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार करीब 19 साल बाद मेष राशि में सूर्य ग्रहण रहेगा. वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो जब सूर्य और पृथ्वी के बीच में चंद्रमा आ जाता है तब सूर्य ग्रहण लगता है, जिससे सूर्य पूर्ण या आंशिक रूप से छिप जाता है. सूर्य का प्रकार पृथ्वी तक सीधे नहीं पहुंता, इस घटना को सूर्य ग्रहण करते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं ग्रहण का संबंध समुद्र मंथन से है. आइए जानते हैं कैसे. समुद्र मंथन से जुड़ी है ग्रहण की कथा  विष्णु पुराण के अनुसार प्राचीन काल में देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, इसमें से 14 रत्न निकले थे. मंथन के दौरान जब अमृत निकला तो असुर और देवता इसे ग्रहण करने के लिए युद्ध पर उतारु हो गए. कभी देवता कलश लेकर भागते तो कभी दैत्य. विवाद बढ़ता देख श्रीहरि विष्णु ने इस समस्या का समाधान निकाला और नारायण ने स्वंय मोहिनी बनकर अमृत पिलाने की जिम्मेदारी ले ली. मोहिनी का सुंदर रूप देखकर सभी दैत्य जैसे उन पर मोहित हो गए. मोहिनी के मायाजाल में फंसे असुर विष्णु जी जानते थे कि अगर दैत्यों ने अमृतपान कर लिया तो वह अमर हो जाएंगे और समस्त सृष्टि पर संकट में आ जाएगी. एक तरफ जहां देवता अमृतपान कर रहे थे, मोहिनी के मायाजाल में फंसकर दैत्य अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे. दैत्यों में एक अति चतुर असुर था स्वरभानु, वह विष्णु जी की इस चाल को समझ गया. अमृत पाने के लिए उसने देवता का रुप धारण कर चुपचाप अमृत ग्रहण करने देवताओं की पंक्ति में जा बैठा. राहु-केतु के कारण लगता है ग्रहण चंद्र और सूर्य ने स्वरभानु को पहचान गए और सारा वृतांत विष्णु जी से कह दिया. नारायण अत्यंत क्रोधित हुए और सुदर्शन चक्र से राक्षस का सिर धड़ से अलग कर दिया, चूंकि उस दैत्य ने अमृत की कुछ बूंदे ग्रहण कर ली थी इसलिए वह राहु और केतु के रूप में अमर हो गया. राक्षस का सिर राहु और धड़ केतु कहलाया. तभी से राहु-केतु, चंद्र और सूर्य को अपना शत्रु मानते हैं और समय-समय पर इन ग्रहों को ग्रसते (खाते) है. धर्म में इस घटना को सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण कहा जाता है. अक्सर पूर्णिमा पर चंद्र ग्रहण लगता है तो वहीं अमावस्या पर सूर्य ग्रहण. ग्रहण के समय राहु-केतु की अशुभ छाया से बचने के उपाय सूर्य या चंद्र ग्रहण के समय राहु-केतु और नकारात्मक शक्तियों का संचार तेज हो जाता है. ग्रहण में पाप ग्रहों की अशुभ छाया से बचने के लिए शिव जी के मंत्रों का जाप करें. राहु-केतु शिव के परम भक्त हैं. महादेव साधना करने वालों पर बुरी शक्तियों, पाप ग्रहों के दुष्प्रभाव का असर नहीं होता. सूर्य ग्रहण की अवधि में ॐ शीतांशु, विभांशु अमृतांशु नम: या गायत्री मंत्र का निरंतर जाप करते रहना चाहिए. मान्यता है इससे मानसिक और शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है और किसी तरह की आर्थिक हानि नहीं होती.

सूर्य ग्रहण से जुड़ी पौराणिक कथा क्या बताती है, नहीं जानते हैं तो यहां पढ़ें Read More »

हिंदू धर्म के 10 पवित्र वृक्ष, जानिए उनका रहस्य

हिंदू धर्म का वृक्ष से गहरा नाता है। हिंदू धर्म को वृक्षों का धर्म कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि हिंदू धर्म में वृक्षों का जो महत्व है वह किसी अन्य धर्म में शायद ही मिले। इस ब्रह्मांड को उल्टे वृक्ष की संज्ञा दी है। पहले यह ब्रह्मांड बीज रूप में था और अब यह वृक्ष रूप में दिखाई देता है। प्रलय काल में यह पुन: बीज रूप में हो जाएगा। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति एक पीपल, एक नीम, दस इमली, तीन कैथ, तीन बेल, तीन आंवला और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह पुण्यात्मा होता है और कभी नरक के दर्शन नहीं करता। इसी तरह धर्म शास्त्रों में सभी तरह से वृक्ष सहित प्रकृति के सभी तत्वों के महत्व की विवेचना की गई है। यहां प्रस्तुत है ऐसे दस वृक्ष जिनकी रक्षा करना हर हिंदू का कर्तव्य है और इनको घर के आसपास लगाने से सुख, शांति और समृद्धि की अनुभूति होती है। किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं होता। पीपल देव  हिंदू धर्म में पीपल का बहुत महत्व है। पीपल के वृक्ष को संस्कृत में प्लक्ष भी कहा गया है। वैदिक काल में इसे अश्वार्थ इसलिए कहते थे, क्योंकि इसकी छाया में घोड़ों को बांधा जाता था। अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। औषधीय गुणों के कारण पीपल के वृक्ष को ‘कल्पवृक्ष’ की संज्ञा दी गई है। पीपल के वृक्ष में जड़ से लेकर पत्तियों तक तैंतीस कोटि देवताओं का वास होता है और इसलिए पीपल का वृक्ष प्रात: पूजनीय माना गया है। उक्त वृक्ष में जल अर्पण करने से रोग और शोक मिट जाते हैं। पीपल के प्रत्येक तत्व जैसे छाल, पत्ते, फल, बीज, दूध, जटा एवं कोपल तथा लाख सभी प्रकार की आधि-व्याधियों के निदान में काम आते हैं। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में पीपल को अमृततुल्य माना गया है। सर्वाधिक ऑक्सीजन निस्सृत करने के कारण इसे प्राणवायु का भंडार कहा जाता है। सबसे अधिक ऑक्सीजन का सृजन और विषैली गैसों को आत्मसात करने की इसमें अकूत क्षमता है। पीपल परिक्रमा स्कन्द पुराण में वर्णित पीपल के वृक्ष में सभी देवताओं का वास है। पीपल की छाया में ऑक्सीजन से भरपूर आरोग्यवर्धक वातावरण निर्मित होता है। इस वातावरण से वात, पित्त और कफ का शमन-नियमन होता है तथा तीनों स्थितियों का संतुलन भी बना रहता है। इससे मानसिक शांति भी प्राप्त होती है। पीपल की पूजा का प्रचलन प्राचीन काल से ही रहा है। इसके कई पुरातात्विक प्रमाण भी है। अश्वत्थोपनयन व्रत के संदर्भ में महर्षि शौनक कहते हैं कि मंगल मुहूर्त में पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढ़ाने पर दरिद्रता, दु:ख और दुर्भाग्य का विनाश होता है। पीपल के दर्शन-पूजन से दीर्घायु तथा समृद्धि प्राप्त होती है। अश्वत्थ व्रत अनुष्ठान से कन्या अखण्ड सौभाग्य पाती है। पीपल पूजा  शनिवार की अमावस्या को पीपल वृक्ष की पूजा और सात परिक्रमा करके काले तिल से युक्त सरसो के तेल के दीपक को जलाकर छायादान करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। अनुराधा नक्षत्र से युक्त शनिवार की अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष के पूजन से शनि पीड़ा से व्यक्ति मुक्त हो जाता है। श्रावण मास में अमावस्या की समाप्ति पर पीपल वृक्ष के नीचे शनिवार के दिन हनुमान की पूजा करने से सभी तरह के संकट से मुक्ति मिल जाती है। बरगद या वटवृक्ष बरगद को वटवृक्ष कहा जाता है। हिंदू धर्म में वट सावत्री नामक एक त्योहार पूरी तरह से वट को ही समर्पित है। पीपल के बाद बरगद का सबसे ज्यादा महत्व है। पीपल में जहां भगवान विष्णु का वास है वहीं बरगद में ब्रह्मा, विश्णु और शिव का वास माना गया है। हालांकि बरगद को साक्षात शिव कहा गया है। बरगद को देखना शिव के दर्शन करना है। हिंदू धर्मानुसार पांच वटवृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त पांच वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है। प्रयाग में अक्षयवट, नासिक में पंचवट, वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट और उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है। आम है खास हिंदू धर्म में जब भी कोई मांगलिक कार्य होते हैं तो घर या पूजा स्थल के द्वार व दीवारों पर आम के पत्तों की लड़ लगाकर मांगलिक उत्सव के माहौल को धार्मिक और वातावरण को शुद्ध किया जाता है। अक्सर धार्मिक पंडाल और मंडपों में सजावट के लिए आम के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। आम के वृक्ष की हजारों किस्में हैं और इसमें जो फल लगता है वह दुनियाभर में प्रसिद्ध है। आम के रस से कई प्रकार के रोग दूर होते हैं। भविष्यवक्ता शमी विक्रमादित्य के समय में सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर ने अपने ‘बृहतसंहिता’नामक ग्रंथ के ‘कुसुमलता’नाम के अध्याय में वनस्पति शास्त्र और कृषि उपज के संदर्भ में जो जानकारी प्रदान की है उसमें शमीवृक्ष अर्थात खिजड़े का उल्लेख मिलता है। वराहमिहिर के अनुसार जिस साल शमीवृक्ष ज्यादा फूलता-फलता है उस साल सूखे की स्थिति का निर्माण होता है। विजयादशमी के दिन इसकी पूजा करने का एक तात्पर्य यह भी है कि यह वृक्ष आने वाली कृषि विपत्ती का पहले से संकेत दे देता है जिससे किसान पहले से भी ज्यादा पुरुषार्थ करके आनेवाली विपत्ती से निजात पा सकता है। बिल्व वृक्ष बिल्व अथवा बेल (बिल्ला) विश्व के कई हिस्सों में पाया जाने वाला वृक्ष है। भारत में इस वृक्ष का पीपल, नीम, आम, पारिजात और पलाश आदि वृक्षों के समान ही बहुत अधिक सम्मान है। हिन्दू धर्म में बिल्व वृक्ष भगवान शिव की अराधना का मुख्य अंग है। धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। बिल्व वृक्ष की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। यह शर्बत कुपचन, आंखों की रोशनी में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए उत्तम है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों मे टैनिन, लोह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं। बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में ‘स्कंदपुराण’

हिंदू धर्म के 10 पवित्र वृक्ष, जानिए उनका रहस्य Read More »

रोज 10 मिनट तक रगड़ें नाखून, बालों में दिखेंगे कई बड़े फायदे

नाखून रगड़ने की प्रकिया कोई नई नहीं है. कई सदियों से लोग ऐसा करते आ रहे हैं. एक्यूप्रेशर थैरेपी में भी नाखून रगड़ने को काफी अहमियत दी जाती है. आपने कुछ लोगों को बैठे-बैठे नाखून रगड़ते हुए देखा होगा तो आपके मन में सवाल आता होगा कि आखिर ये व्यक्ति ऐसा क्यों कर रहा है. ऐसे में आपको बता दें कि दुनिया के कई बड़े-बड़े योग गुरु नाखून रगड़ने की सलाह देते हैं. इससे आपको कई तरह की बीमारियों से निजात मिलेगी. इस प्रकिया को बालयाम कहा जाता है. ऐसा करने से आपके बालों को राहत मिलती है. होती है कई समस्याएं नाखून रगड़ने की प्रकिया कोई नई नहीं है. कई सदियों से लोग ऐसा करते आ रहे हैं. एक्यूप्रेशर थैरेपी में भी नाखून रगड़ने को काफी अहमियत दी जाती है. खराब लाइफ स्टाइल, जंक फूड खाना, प्रोटीन और कैल्शियम की कमी होना, समय पर खाना नहीं खाना आदि बातों से कई प्रकार की परेशानियां होने लग जाती हैं. नाखूनों को रगड़ने से आपके बालों का झड़ना, सफेद होना, कमजोर होना और गंजापन आने जैसी परेशानी से आपको राहत मिलेगी. इससे आपके शरीर में ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है. जिससे आपके शरीर में ताकत आती है और चेहरे पर निखार आता है. इसके अलावा नाखून को बार-बार रगड़ने से आपकी त्वचा बेहतर होती है और चर्म रोग दूर हो सकता है. बालायाम करने से आपके झड़े हुए बालों को दोबारा उगाया जा सकता है. बालायाम करने के लिए आप अपने दोनों हाथों को सीने के पास लाए और अंगुलियों को अंदर की तरफ मोड़ें और रगड़ें. जितनी देर हो सके इस प्रक्रिया को करें. कम से कम आप रोजाना 5-10 मिनट ऐसा करें. बता दें कि प्रेग्नेंट महिलाएं ऐसा न करें क्योंकि ऐसा करने से गर्भाशय में संकुचन हो सकता है जो कि नुकसानदायक है.  

रोज 10 मिनट तक रगड़ें नाखून, बालों में दिखेंगे कई बड़े फायदे Read More »