2023

छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध है गोला गोकर्णनाथ, सावन में जरूर करें दर्शन

यूपी के लखीमपुरी खीरी जिले की गोला तहसील में भी छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव की नगरी गोला गोकर्णनाथ है, जहां पर दर्शन करने के लिए दूर-दूर से सावन का पवित्र माह चल रहा है और इस समय भक्त भगवान शिव के दर्शन करने लिए शिवनगरी जाते हैं। कोई कांवड़ यात्रा में शामिल होकर तो कोई अन्य माध्यमों से भोलेनाथ का आर्शीवाद लेने के लिए उनकी शरण में जाता है। यूपी के लखीमपुरी खीरी जिले की गोला तहसील में भी छोटी काशी के नाम से प्रसिद्ध भगवान शिव की नगरी गोला गोकर्णनाथ है, जहां पर दर्शन करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। गोला के गोकर्णनाथ के बारे में कहा जाता है कि सतयुग में लंका का राजा रावण भगवान शिव को यहां लाया था। गोला गोकर्णनाथ के बारे में प्राचीन कथा जैसा की प्राचीन कथाओं में बताया गया है कि लंका के राजा रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तपस्या की। रावण की तपस्या से खुश होकर भगवान ने उससे वरदान मांगने को कहा तो रावण ने कहा कि वह उन्हें अपने साथ लंका ले जाना चाहता है। यह सुनकर सभी देवता परेशान हो गए और ब्रह्माजी के पास गए और कहा कि अगर शिव रावण के साथ लंका चले तो सृष्टि का कार्य कैसे होगा? इसके बाद ब्रह्माजी ने भगवान शिव को सोच समझकर वरदान देने के लिए कहा। इस पर शिवजी ने रावण से कहा कि यदि तुम मुझे लंका ले जाना चाहते हो तो ले चलो लेकिन मेरी एक शर्त रहेगी। भगवान शिव ने रावण से कहा कि जहां भी मुझे भूमि स्पर्श हो जाएगी, मैं वही स्थापित हो जाउंगा। इस बात पर रावण सहमत हो गया। भगवान ने एक शिवलिंग का रूप धारण कर लिया। इसके बाद रावण शिवलिंग को लेकर जा रहा था। इसी दौरान भगवान शिव ने रावण को लघुशंका की इच्छा जगा दी। काफी समय तक बर्दाश्त करने के बाद रावण ने एक चरवाहे को शिवलिंग पकड़ाकर लघुशंका करने लगा। इसी समय भगवान ने अपना वजन बढ़ा दिया और इससे चरवाहे ने रावण को आवाज लगाकर कहा कि वह अब इस शिवलिंग को उठाए नहीं रह सकता है। रावण लघुशंका करने में व्यस्त होने के कारण सुन नहीं पाया। इधर चरवाहे ने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। यह है भूतनाथ की कहानी जब रावण वापस आया और वह चरवाहे का मारने के लिए दौड़ा तो चरवाहे कुएं में गिर गया। इसके बाद रावण ने शिवलिंग को उठाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह असफल रहा। इससे क्रोधित होकर रावण ने अंगुठे से शिवलिंग को जोर से दबा दिया, आज भी शिवलिंग पर रावण के अंगुठे का निशान है। रावण निराश होकर वापस लंका चला गया। इसके बाद भगवान शिव ने चरवाहे की आत्मा को बुलाकर कहा कि आज के बाद लोग तुम्हें भूतनाथ के नाम से जानेंगे और मेरे दर्शन के बाद तुम्हारे दर्शन करने पर भक्तों को विशेष पूण्यलाभ मिलेगा। इसके बाद से श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने के लिए गोला के गोकर्णनाथ आते हैं। सावन के महीने में भगवान शिव दर्शनों को आने वाले लाखों भक्त शिवलिंग के दर्शनों के बाद बाबा भूतनाथ के भी दर्शन अवश्य करते हैं।

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इस कारण भगवान शिव को प्रिय है सावन मास, जानिए पौराणिक कथा

 सावन माह 14 जुलाई 2022 से शुरू हो रहा है। सावन मास भगवान शिव का सबसे प्रिय मास है। सावन में भगवान शिव की विशेष पूजा होती है। जानिए भगवाव शिव को ये माह क्यों पसंद है। इसे सावन मास के नाम से भी जानते हैं। यह पूरा माह भगवान शिव को ही समर्पित होता है। इसी कारण इसे भोलेनाथ का सबसे प्रिय मास कहा जाता है।  इस साल सावन 14 जुलाई से शुरू हो रहे हैं। इस पूरे मास में भगवान शिव के साथ माता पार्वती की विधिवत पूजा करने का विधान है। शिव पुराण के अनुसार, सावन मास में भगवान शिव और माता पार्वती भू-लोक में निवास करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर सावन मास को भी भगवान शिव का प्रिय माह क्यों कहा जाता है। जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथा। इस साल 59 दिनों का होगा सावन, इस विधि से करें महादेव को प्रसन्न इस कारण भगवान शिव को पसंद है सावन माह धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव को सावन माह काफी प्रिय है। क्योंकि दक्ष की पुत्री माता सती ने अपने जीवन को त्याग कर कई वर्षों तक शापित जीवन जिया। इसके बाद वह हिमालयराज के घर में पुत्री के अवतार में जन्म लिया। जहां उनका नाम पार्वती रखा गया। माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने का दृढ़ निश्चय लिया। ऐसे में मां पार्वती ने कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनके विवाह करने का प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इसके बाद सावन माह में ही शिव जी का विवाह माता पार्वती से हुआ था।  सावन मास में भगवान शिव अपने ससुराल आए थे, जहां पर उनका अभिषेक करके धूमधाम से स्वागत किया गया था। इस वजह से भी सावन माह में अभिषेक का महत्व है। सावन की पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार, सावन मास में ही समुद्र मंथन हुआ था। इस मंथन से हलाहल विष निकला तो चारों तरफ हाहाकार मच गया। संसार की रक्षा करने के लिए भगवान शिव ने विष को कंठ में धारण कर लिया। विष की वजह से कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष का प्रभाव कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने भगवान शिव को जल अर्पित किया, जिससे उन्हें राहत मिली। इससे वे प्रसन्न हुए। तभी से हर साल सावन मास में भगवान शिव को जल अर्पित करने या उनका जलाभिषेक करने का रिवाज शुरू हो गया।

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गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है और गुरु पूर्णिमा का इतिहास

हमारे भारत देश में हजारों वर्षों पहले से ही गुरुओं को एक महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया जाता आ रहा है। माना जाता है कि गुरु एक ऐसा मार्ग बनाता है, जिसके जरिए कोई भी व्यक्ति अज्ञानता से ज्ञान की ओर अग्रसर होता है। इतना ही नहीं ऐसा भी मानना हैं कि गुरु से दीक्षा के बिना मोक्ष की प्राप्ति भी नहीं हो पाती है। प्राचीन काल से ही सनातन धर्म में गुरुओं को ज्ञानदाता, मोक्षदाता तथा ईश्वर के समतुल्य महत्वता प्रदान की जाती है। वेदों और पुराणों के अनुसार गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के सामान्य पूज्य माना जाता है। हमारे देश में गुरुओं को और भी महत्वता प्रदान करने के लिए एक विशेष दिवस भी गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा का पर्व पूरी तरह से गुरु को समर्पित होता है। आज हम इस लेख के माध्यम से गुरु पूर्णिमा क्या है, गुरु पूर्णिमा क्यों मनाई जाती है, गुरु पूर्णिमा का इतिहास तथा गुरु पूर्णिमा कब हैं? इन सभी विषयों पर आपको विस्तार पूर्वक से जानकारी प्रदान करने का प्रयास करेंगे। आज के हमारे इस महत्वपूर्ण एवं गुरु को पूरी तरह से समर्पित लेख को कृपया अंतिम तक अवश्य पढ़ें। गुरु पूर्णिमा क्या है? गुरु पूर्णिमा का पर्व पूरी तरह से गुरु को समर्पित होता है। इस पावन दिवस के अवसर पर सभी शिष्य अपने गुरुओं को आदर, सम्मान और कृतज्ञता पूर्ण रूप से उनकी पूजा अर्चना करते हैं। हमारे देश में तो वैसे इस पर्व को लगभग बहुत कम ही लोग मनाते हैं, परंतु ऐसे भी बहुत से व्यक्ति आज भी मौजूद हैं, जो गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर इसे बहुत ही भव्यता पूर्ण तरीके से मनाना पसंद करते हैं। गुरु पूर्णिमा का पर्व शिष्य और गुरु के बीच एक दूसरे की महत्वता को समझाने का कार्य करता है। हमारे हिंदू धर्म की मान्यता है कि बिना गुरु के ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति असंभव है। यही कारण है कि सनातन धर्म में गुरु पूर्णिमा को बहुत महत्व प्रदान किया जाता है। हिंदू धर्म के मान्यताओं के अनुसार महर्षि वेद व्यास को मानव जाति का गुरु माना जाता है और गुरु पूर्णिमा का भी रिश्ता महर्षि वेदव्यास के साथ जुड़ा हुआ है। इस पावन दिवस के दिन सभी छात्र अपने गुरुओं का आशीर्वाद लेते अपने जीवन को सफल बनाते हैं। गुरु पूर्णिमा को आषाढ़ माह में ही क्यों मनाया जाता है और इसका महत्त्व क्या है? आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेद व्यास का आज से करीब 3000 वर्षों पूर्व जन्म हुआ था। मान्यता है कि उनके जन्म दिवस के अवसर पर ही गुरु पूर्णिमा जैसे महान पर्व को मनाने की परंपरा को शुरू किया गया है। गुरु पूर्णिमा महोत्सव पूरी तरह से महर्षि वेदव्यास को समर्पित है। हिंदी कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का त्यौहार मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा को आषाढ़ माह में मनाने के पीछे बहुत ही सुंदर व्याख्यान है। जो आषाढ़ माह में आसमान में घने-घने काले बादलों का ज्यादा झुंड मौजूद होता है और उन्हीं काले घने बादलों के बीच में चंद्रमा अपनी रोशनी से पृथ्वी को प्रकाशमय करता है। काले घने बादलों का तात्पर्य अज्ञान रूपी शिष्य है और काले घने बादलों के बीच चंद्रमा ज्ञान रूपी गुरु की छवि को व्यक्त करता है। अनेकों प्रकार के शिष्य हो सकते हैं और वे सभी काले घने बादलों के समान ही अज्ञानता से भरे होते हैं और जो व्यक्ति अज्ञान शिष्य को अपने ज्ञान के माध्यम से ज्ञानवान बनाता है, वह केवल गुरु ही हो सकता है। गुरु एक ऐसा जरिया होते हैं, जो अज्ञानता को ज्ञान के प्रकाश में परिवर्तित करने की शक्ति रखता है। जहां पर गुरु और शिष्य का मिलन होता है, वहीं पर सार्थकता होती है। गुरु की महत्वता सदैव बनी रहे और गुरु के बिना किसी भी प्रकार का ज्ञान संभव नहीं है, इन्हीं चीजों के मुख्य बिंदुओं पर गुरु पूर्णिमा के पर्व को आषाढ़ माह मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा पर्व से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं जैसा कि गुरु पूर्णिमा का महान पर्व पूरी तरह से महर्षि वेदव्यास को समर्पित है तो त्यौहार को महर्षि वेद व्यास के जन्म उत्सव के दिन ही मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त मान्यता है कि इसी शुभ दिवस के अवसर पर आषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास ने अपने शिष्यों को भागवत गीता का ज्ञान प्रदान किया था। इसके अतिरिक्त गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी लोग जानते हैं। महर्षि वेद व्यास को हिंदू धर्म में तीनों कालों का ज्ञाता माना जाता है। महाऋषि वेद व्यास ही ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने हिंदू धर्म के चारों वेदों का विभाजन किया। महर्षि वेद व्यास ने श्रीमद्भागवत गीता की रचना के समेत 18 पुराणों की भी रचना की थी। गुरु पूर्णिमा उत्सव से जुड़ी मान्यताएं हमारे हिंदू धर्म में सनातन धर्म के संस्कृत में गुरु को सदैव पूजनीय माना जाता है। जैसा कि हम सभी लोगों ने पौराणिक कथाएं और कहानियां भी सुनी है, जिसमें स्वयं ईश्वर भी गुरु के समक्ष नतमस्तक रहते हैं। हमारे हिंदू धर्म की पौराणिक कथाओं में भगवान ने भी गुरु को सर्वश्रेष्ठ स्थान प्रदान किया है और यह कहा है कि गुरु का स्थान सबसे ऊंचा है और गुरु की जगह सदैव कोई भी नहीं ले सकता है। माता-पिता भले ही जन्म देते हैं, परंतु किसी भी व्यक्ति को बिना गुरु के किसी भी प्रकार का ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है। अगर गुरु ना हो तो दुनिया का हर एक इंसान अज्ञानता के अंधेरे में सदैव डूबा रहेगा। गुरु एक ऐसा ज्ञान तब प्रकाश का प्रतीक होता है, जो अंधेरे रूपी अज्ञानता को अपने ज्ञान के जरिए अज्ञानता के अंधेरे को प्रकाशित करता है। हिंदू धर्म की मान्यताओं और पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान ब्रह्मा जी को गुरु का दर्जा दिया गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान ब्रह्मा जी ही सभी जीवो एवं प्राणियों के सृजनकर्ता है और उसी प्रकार से गुरु भी अपने शिष्यों के सृजनकर्ता कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर के दिन ही भगवान शिव ने सभी सप्त ऋषि यों को योग्य विद्या सिखाई थी, जिससे वह आगे चलकर आदि योगी और

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क्यों मनाया जाता है गुरु पूर्णिमा का त्योहार? नोट कर लें डेट, शुभ मुहूर्त और महत्व

मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु के आशीर्वाद से धन-संपत्ति और सुख-शांति का आशीर्वाद पाया जा सकता है।  सनातन हिंदू परंपरा में गुरु का स्थान ईश्वर से भी उपर माना गया है। गुरु की पूजा के लिए हर साल आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा का त्योहार मनाया जाता है। मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु के आशीर्वाद से धन-संपत्ति और सुख-शांति का आशीर्वाद पाया जा सकता है। इस साल गुरु पूर्णिमा 3 जुलाई, सोमवार को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं कि गुरु पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व। गुरु पूर्णिमा का शुभ मुहूर्त गुरु पूर्णिमा के दिन इस बार कई शुभ योगों का निर्माण होने जा रहा है। इस दिन ब्रह्म योग और इंद्र योग बनेंगे। हिंदू पंचांग के अनुसार, 2 जुलाई के दिन रविवार की शाम 6 बजकर 2 मिनट पर आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत हो रही है। जबकि यह 3 जुलाई को सोमवार की रात 11 बजकर 8 मिनट पर खत्म हो जाएगी। लेकिन उदयातिथि के अनुसार गुरु पूर्णिमा 3 जुलाई को मनाई जाएगी। पूजा विधिमान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्यक्ति को स्नान-ध्यान करने के बाद गुरु के पास जाकर उनकी विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। यदि आप किसी कारण से अपने गुरु के पास नहीं जा सकते हैं तो आप अपने घर में ही पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनके चित्र का पुष्प, चंदन, धूप, दीप आदि से पूजन करें। इस दिन गुरु वेदव्यास के साथ-साथ शुक्रदेव और शंकराचार्य आदि गुरुओं का भी आवाहन करें और ”गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये” मंत्र का जाप करें। इस साल 59 दिनों का होगा सावन, इस विधि से करें महादेव को प्रसन्न कौन थे महर्षि वेदव्याससनातन धर्म में महर्षि वेदव्यास को प्रथम गुरु का दर्जा प्राप्त है। महर्षि वेदव्यास ने हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण महाकाव्य महाभारत, श्रीमद्भगवतगीता, 18 पूराणों के साथ ही वेदों का भी संकलन किया है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार महर्षि वेदव्यास स्वंय भगवान विष्णु के एक रूप थे। मान्यताओं के अनुसार वेदों को विभक्त करने के कारण उनका नाम वेदव्यास परा था। गुरु पूर्णिमा को वेद व्यास जयंतीगुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा या वेद व्यास जयंती नाम से भी जानते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार, महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास जी का जन्म आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि को हुआ था, इस वजह से इस दिन को व्यास जयंती या व्यास पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं. उन्होंने महाकाव्य महाभारत की रचना की थी. गुरु पूर्णिमा के दिन वेद व्यास जी की पूजा करते हैं.

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इस साल 59 दिनों का होगा सावन, इस विधि से करें महादेव को प्रसन्न

अधिमास के कारण 59 दिनों का होगा सावन: महादेव को समर्पित सावन मास में इस बार अधिमास लग रहा है। 19 वर्षों बाद ऐसा संयोग हो रहा है, जब सावन माह में अधिमास लग रहा है। अधिमास के कारण 59 दिनों का होगा सावन: महादेव को समर्पित सावन मास में इस बार अधिमास लग रहा है। 19 वर्षों बाद ऐसा संयोग हो रहा है, जब सावन माह में अधिमास लग रहा है। ऐसे में यह सावन लगभग दो माह 59 दिनों का होगा। पंचांग के अनुसार श्रावन मास की शुरुआत चार जुलाई 2023 से हो रही है और यह 31 अगस्त-2023 को समाप्त होगा। शिव भक्तों को महादेव की उपासना के लिए दो माह का सावन मिलेगा। इस दौरान आठ सोमवारी होगी। सावन 2023 की तिथियां, त्योहार और शिवजी की पूजा से जुड़ी सभी खास बातें, यहां जानें पूजा- विधि सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें। स्नान करने के बाद साफ- स्वच्छ वस्त्र पहन लें। घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। अगर संभव है तो व्रत करें। भगवान भोलेनाथ का गंगा जल से अभिषेक करें। भगवान भोलेनाथ को पुष्प अर्पित करें। भोलेनाथ के साथ ही माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा भी करें। किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है।  भगवान शिव को भोग लगाएं। इस बात का ध्यान रखें भगवान को सिर्फ सात्विक चीजों का भोग लगाया जाता है। भगवान शिव की आरती करें।  इस दिन भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करें। शिव पूजा- सामग्री पुष्प, पंच फल पंच मेवा, रत्न, सोना, चांदी, दक्षिणा, पूजा के बर्तन, कुशासन, दही, शुद्ध देशी घी, शहद, गंगा जल, पवित्र जल, पंच रस, इत्र, गंध रोली, मौली जनेऊ, पंच मिष्ठान्न, बिल्वपत्र, धतूरा, भांग, बेर, आम्र मंजरी, जौ की बालें,तुलसी दल, मंदार पुष्प, गाय का कच्चा दूध, ईख का रस, कपूर, धूप, दीप, रूई, मलयागिरी, चंदन, शिव व मां पार्वती की श्रृंगार की सामग्री आदि।\

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सावन 2023 की तिथियां, त्योहार और शिवजी की पूजा से जुड़ी सभी खास बातें, यहां जानें

सावन का महीना शिवजी की अराधना के लिए समर्पित होता है. इस बार अधिकमास पड़ने के कारण सावन एक नहीं बल्कि दो महीने का होगा. सावन 4 जुलाई से शुरू होकर 31 अगस्त 2023 को समाप्त होगा. सावन का महीना भगवान शिवजी का प्रिय महीना है और इस पूरे महीने भगवान शिव जी पूजा-अराधना की जाती है और व्रत रखे जाते हैं. लेकिन शिव भक्तों के लिए इस साल सावन का महीना बहुत खास रहने वाला है, जिसमें शिवजी की दोगुनी कृपा बरसेगी. दरअसल इस साल अधिकमास पड़ने के कारण सावन एक नहीं बल्कि दो महीने का होगा और 8 सावन सोमवार के व्रत रखे जाएंगे. ऐसा दुर्लभ संयोग पूरे 19 साल बाद बना हैं जिसमें, सावन पूरे 59 दिनों का होगा. जानते हैं सावन महीने से जुड़ी महत्वपूर्ण बातें. इस साल क्यों खास रहेगा सावन इस साल सावन महीने की शुरुआत 04 जुलाई से होगी और 31 अगस्त को इसकी समाप्ति होती है. सावन महीने में इस साल पूरे 59 दिनों तक भगवान शिव की उपासना की जाएगी. बता दें कि, अधिकमास लगने के कारण इस साल सावन दो महीने का होगा. इसमें अधिकमास की अवधि 18 जुलाई से 16 जुलाई तक होगी. सावन महीने का आखिर इतना महत्व क्यों सावन वह महीना होता है, जिसमें शिवभक्त भगवान की भक्ति में रम जाते हैं. सावन में पूरे महीने शिवालयों में भक्तों की भीड़ देखने को मिलती है. मान्यता है कि सावन में किए गए पूजा-व्रत से शीघ्र फल की प्राप्ति होती है और भगवान अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. खासकर सावन में पड़ने वाले सोमवार का विशेष महत्व होता है. सावन 2023 में कितने सोमवार और कब सावन का पहला सोमवार: 10 जुलाई सावन का दूसरा सोमवार: 17 जुलाई सावन का तीसरा सोमवार: 24 जुलाई (अधिकमास) सावन का चौथा सोमवार: 31 जुलाई (अधिकमास) सावन का पांचवा सोमवार: 7 अगस्त (अधिकमास) सावन का छठवां सोमवार: 14 अगस्त (अधिकमास) सावन का सातवां सोमवार: 21 अगस्त सावन का आठवां सोमवार: 28 अगस्त शिवजी को क्यों प्रिय है सावन का महीना? सावन को शिवजी का प्रिय महीना कहा जाता है. इसे लेकर ऐसी पौराणिक और धार्मिक मान्यता है कि, दक्ष पुत्री माता सती ने अपने जीवन को त्याग कर कई हजार वर्षों तक श्रापित जीवन व्यतीत किया. इसके बाद उनका जन्म हिमालय राज के घर माता पार्वती के रूप में हुआ. माता पार्वती ने भोलेनाथ को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए सावन में कठोर तप किए. इसके बाद भगवान शिव माता पार्वती से प्रसन्न हुए और पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया. इसके साथ ही एक मान्यता यह भी है कि, सावन में भगवान शिव कैलाश छोड़कर धरती पर निवास करते हैं. सावन में शिवजी धरती पर आककर सृष्टि का संचालन करते हैं. इन्हीं कारणों से सावन माह का महत्व और भी बढ़ जाता है. सावन माह 2023 व्रत-त्योहारों की सूची दिनांक दिन व्रत-त्योहार 4 जुलाई मंगलवार सावन मास आरंभ, पहला मंगला गौरी व्रत 6 जुलाई गुरुवार संकष्टी चतुर्थी 11 जुलाई मंगलवार दूसरा मंगला गौरी व्रत 13 जुलाई गुरुवार कामिका एकादशी 14 जुलाई शुक्रवार प्रदोष व्रत  15 जुलाई शनिवार मासिक शिवरात्रि 16 जुलाई रविवार कर्क संक्रांति 17 जुलाई सोमवार सावन मास अमावस्या 18 जुलाई मंगलवार तीसरा मंगला गौरी व्रत (अधिकमास) 25 जुलाई मंगलवार चौथा मंगला गौरी व्रत (अधिकमास) 29 जुलाई शनिवार पद्मिनी एकादशी 30 जुलाई रविवार प्रदोष व्रत 1 अगस्त मंगलवार पूर्णिमा व्रत,पांचवा मंगला गौरी व्रत (अधिकमास) 4 अगस्त शुक्रवार संकष्टी चतुर्थी 8 अगस्त मंगलवार छठा मंगला गौरी व्रत (अधिकमास) 12 अगस्त शनिवार परम एकादशी 13 अगस्त रविवार प्रदोष व्रत 14 अगस्त सोमवार मासिक शिवरात्रि 15 अगस्त मंगलवार सातवां मंगला गौरी व्रत (अधिकमास), स्वतंत्रता दिवस 16 अगस्त बुधवार अमावस्या 17 अगस्त गुरुवार सिंह संक्रांति,हरियाली तीज 21 अगस्त सोमवार नाग पंचमी 22 अगस्त मंगलवार आठवां मंगला गौरी व्रत 27 अगस्त रविवार श्रावण पुत्रदा एकादशी 28 अगस्त सोमवार प्रदोष व्रत 29 अगस्त मंगलवार ओणम/थिरुवोणम, नौवां मंगला गौरी व्रत 30 अगस्त बुधवार रक्षा बंधन 31 अगस्त गुरुवार श्रावण पूर्णिमा

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भारत के 10 रहस्यमय मंदिर..

प्राचीनकाल में जब मंदिर बनाए जाते थे तो वास्तु और खगोल विज्ञान का ध्यान रखा जाता था। इसके अलावा राजा-महाराजा अपना खजाना छुपाकर इसके ऊपर मंदिर बना देते थे और खजाने तक पहुंचने के लिए अलग से रास्ते बनाते थे। इसके अलावा भारत में कुछ ऐसे मंदिर भी हैं जिनका संबंध न तो वास्तु से है, न खगोल विज्ञान से और न ही खजाने से इन मंदिरों का रहस्य आज तक कोई जान पाया है। ऐसे ही 10 मंदिरों के बारे में हमने आपके लिए जानकारी जुटाई है। भारत में वैसे तो हजारों रहस्यमय मंदिर हैं लेकिन यहां प्रस्तुत हैं कुछ खास 10 प्रसिद्ध रहस्यमय मंदिरों की संक्षिप्त जानकारी जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे। कैलाश मानसरोवर यहां साक्षात भगवान शिव विराजमान हैं। यह धरती का केंद्र है। दुनिया के सबसे ऊंचे स्थान पर स्थित कैलाश मानसरोवर के पास ही कैलाश पर्वत और आगे मेरू पर्वत स्थित है। यह संपूर्ण क्षेत्र शिव और देवलोक कहा गया है। रहस्य और चमत्कार से परिपूर्ण इस स्थान की महिमा वेद और पुराणों में भरी पड़ी है। कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22,068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। चूंकि तिब्बत चीन के अधीन है अतः कैलाश चीन में आता है, जो चार धर्मों- तिब्बती धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिन्दू का आध्यात्मिक केंद्र है। कैलाश पर्वत की 4 दिशाओं से 4 नदियों का उद्गम हुआ है- ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज व करनाली। कन्याकुमारी मंदिर समुद्री तट पर ही कुमारी देवी का मंदिर है, जहां देवी पार्वती के कन्या रूप को पूजा जाता है। मंदिर में प्रवेश के लिए पुरुषों को कमर से ऊपर के वस्त्र उतारने पड़ते हैं। प्रचलित कथा के अनुसार देवी का विवाह संपन्न न हो पाने के कारण बच गए दाल-चावल बाद में कंकर बन गए। आश्चर्यजनक रूप से कन्याकुमारी के समुद्र तट की रेत में दाल और चावल के आकार और रंग-रूप के कंकर बड़ी मात्रा में देखे जा सकते हैं। सूर्योदय और सूर्यास्त कन्याकुमारी अपने सूर्योदय के दृश्य के लिए काफी प्रसिद्ध है। सुबह हर होटल की छत पर पर्यटकों की भारी भीड़ सूरज की अगवानी के लिए जमा हो जाती है। शाम को अरब सागर में डूबते सूरज को देखना भी यादगार होता है। उत्तर की ओर करीब 2-3 किलोमीटर दूर एक सनसेट प्वॉइंट भी है। करनी माता का मंदिर  करनी माता का यह मंदिर जो बीकानेर (राजस्थान) में स्थित है, बहुत ही अनोखा मंदिर है। इस मंदिर में रहते हैं लगभग 20 हजार काले चूहे। लाखों की संख्या में पर्यटक और श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामना पूरी करने आते हैं। करणी देवी, जिन्हें दुर्गा का अवतार माना जाता है, के मंदिर को ‘चूहों वाला मंदिर’ भी कहा जाता है। यहां चूहों को काबा कहते हैं और इन्हें बाकायदा भोजन कराया जाता है और इनकी सुरक्षा की जाती है। यहां इतने चूहे हैं कि आपको पांव घिसटकर चलना पड़ेगा। अगर एक चूहा भी आपके पैरों के नीचे आ गया तो अपशकुन माना जाता है। कहा जाता है कि एक चूहा भी आपके पैर के ऊपर से होकर गुजर गया तो आप पर देवी की कृपा हो गई समझो और यदि आपने सफेद चूहा देख लिया तो आपकी मनोकामना पूर्ण हुई समझो। शनि शिंगणापुर  देश में सूर्यपुत्र शनिदेव के कई मंदिर हैं। उन्हीं में से एक प्रमुख है महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में स्थित शिंगणापुर का शनि मंदिर। विश्वप्रसिद्ध इस शनि मंदिर की विशेषता यह है कि यहां स्थित शनिदेव की पाषाण प्रतिमा बगैर किसी छत्र या गुंबद के खुले आसमान के नीचे एक संगमरमर के चबूतरे पर विराजित है। यहां शिगणापुर शहर में भगवान शनि महाराज का खौफ इतना है कि शहर के अधिकांश घरों में खिड़की, दरवाजे और तिजोरी नहीं हैं। दरवाजों की जगह यदि लगे हैं तो केवल पर्दे। ऐसा इसलिए, क्योंकि यहां चोरी नहीं होती। कहा जाता है कि जो भी चोरी करता है उसे शनि महाराज सजा स्वयं दे देते हैं। इसके कई प्रत्यक्ष उदाहरण देखे गए हैं। शनि के प्रकोप से मुक्ति के लिए यहां पर विश्वभर से प्रति शनिवार लाखों लोग आते हैं। सोमनाथ मंदिर  सोमनाथ मंदिर एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है जिसकी गिनती 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में होती है। प्राचीनकाल में इसका शिवलिंग हवा में झूलता था, लेकिन आक्रमणकारियों ने इसे तोड़ दिया। माना जाता है कि 24 शिवलिंगों की स्थापना की गई थी उसमें सोमनाथ का शिवलिंग बीचोबीच था। इन शिवलिंगों में मक्का स्थित काबा का शिवलिंग भी शामिल है। इनमें से कुछ शिवलिंग आकाश में स्थित कर्क रेखा के नीचे आते हैं। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। इस स्थान को सबसे रहस्यमय माना जाता है। यदुवंशियों के लिए यह प्रमुख स्थान था। इस मंदिर को अब तक 17 बार नष्ट किया गया है और हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया। यहीं भगवान श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे, तब ही शिकारी ने उनके पैर के तलुए में पद्मचिह्न को हिरण की आंख जानकर धोखे में तीर मारा था, तब ही कृष्ण ने देह त्यागकर यहीं से वैकुंठ गमन किया। इस स्थान पर बड़ा ही सुन्दर कृष्ण मंदिर बना हुआ है। कामाख्या मंदिर कामाख्या मंदिर को तांत्रिकों का गढ़ कहा गया है। माता के 51 शक्तिपीठों में से एक इस पीठ को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यह असम के गुवाहाटी में स्थित है। यहां त्रिपुरासुंदरी, मतांगी और कमला की प्रतिमा मुख्य रूप से स्थापित है। दूसरी ओर 7 अन्य रूपों की प्रतिमा अलग-अलग मंदिरों में स्थापित की गई है, जो मुख्य मंदिर को घेरे हुए है।  पौराणिक मान्यता है कि साल में एक बार अम्बूवाची पर्व के दौरान मां भगवती रजस्वला होती हैं और मां भगवती की गर्भगृह स्थित महामुद्रा (योनि-तीर्थ) से निरंतर 3 दिनों तक जल-प्रवाह के स्थान से रक्त प्रवाहित होता है। इस मंदिर के चमत्कार और रहस्यों के बारे में किताबें भरी पड़ी हैं। हजारों ऐसे किस्से हैं जिससे इस मंदिर के चमत्कारिक और रहस्यमय होने का पता चलता है। अजंता-एलोरा के मंदिर  अजंता-एलोरा की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर

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विवाद का कारण क्यों बनती हैं पौराणिक कथाएं

राजनीतिक दायरे में इधर जिस तरह राम को लेकर कहासुनी हुई, उसकी एक परंपरा ही बनती जा रही है..प्रारंभिक समय में पौराणिक कथाएं गाई या सुनाई जाती थीं। लिखने की परंपरा बहुत बाद में आई। वाचक अपनी इच्छा या प्रचलित मान्यताओं के आधार पर उनमें जोड़ना, घटाना करते रहते थे। इसी कारण एक ही पात्र या कथा से जुड़े कई-कई रूप मिलते थे। कईं बार ये परस्पर विरोधी भी हुआ करते थे। इसके बावजूद हम धर्म से जुड़ी हर बात को लेकर आज तक इतने संवेदनशील क्यों हैं? बाल्मीकि रामायण सब रामायणों का मूलाधार है, पर उसमें भी प्रक्षिप्त अंश मिलते हैं। सीता रामायण की प्रमुख और महत्वपूर्ण पात्र हैं। अचरज की बात है कि उनके माता-पिता के बारे में निश्चित और विस्तृत जानकारी न होने के कारण उनके जन्म के विषय में कई कहानियां मिलती हैं। विद्वानों का ध्यान इस विविधता से जन्म लेने वाली समस्या की ओर गया। फादर कामिल बुल्के ने सीता जन्म से जुड़ी प्रत्येक कहानी की पुरातनता और उससे जुड़े महत्व को दृष्टि में रखकर उन कथाओं को क्रम में लगाकर रखना चाहा। जब श्री राम मां चंडी के चरणों में अर्पित करने वाले थे अपना नेत्र, पढ़ें रामायण से जुड़ी यह कथा बाल्मीकि रामायण पर आधारित रामोपाख्यान, हरिवंश रामायण आदि में सीता को ‘जनकस्य कुले जाता’ कहा गया। पर बाल्मीकि रामायण में ही दो जगह उनके चमत्कारी जन्म की कथा भी मिलती है। हो सकता है कि यह बाद में जोड़ी गई हो। पहली के अनुसार सीता को भूमिजा कहा गया और ज्यादातर रामकथाओं ने इसे ही स्वीकार किया। इसके अनुसार राजा जनक पूजा हेतु धरती पर हल चला रहे थे, तभी हल रेखा से एक बालिका मिली, जिसे अपनाकर उन्होंने सीता नाम दिया। बाल्मीकि रामायण के बांग्ला और उत्तर पश्चिमी संशोधित संस्करणों में चमत्कारिक जन्म कथा को विस्तार दिया गया। जन संस्करण में सीता अत्रि मुनि की पत्नी अनुसूया को अपने जन्म की कथा सुनाती हैं। दो अन्य संस्करणों में भी यह कथा काफी लंबी दी हुई है। इसके अनुसार सीता के धरती से निकलने पर आकाश वाणी हुई, ‘जनक, यह बालिका मेनका से उत्पन्न तुम्हारी मानस पुत्री है।’ क्षेमेंद्र की रामायण मंजरी में भी यही कहानी मिलती है। रावण से रिश्ता बाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड के सत्रहवें खंड में वेदवती की कहानी मिलती है। इसके अनुसार सीता पूर्वजन्म में लक्ष्मी का अवतार थीं और वे विष्णु को पाने के लिए हिमालय पर तप कर रही थीं। उनके सौंदर्य से अभिभूत रावण उन्हें पाने के लिए जबरदस्ती करता है तो वे खुद को बचाकर उसे श्राप देती हैं कि जल्द ही वे चमत्कारी जन्म लेकर उसे नष्ट करेंगी। इस कथा के कुछ भिन्न रूप श्रीमद् भागवत् पुराण और ब्रह्म वैवर्त पुराण आदि में भी मिलते हैं। बाल्मीकि की दूसरी चमत्कारिक कथा में सीता को रावण के नाश हेतु अवतरित होते बताया गया है। ईसा के बाद की 9वीं शताब्दी से आगे तक न केवल भारत वरन् पड़ोसी देशों में भी प्रचलित मान्यता पर आधारित कहानी के अनुसार सीता रावण की पुत्री थीं। भारत, तिब्बत, खोटान, इंडोनेशिया, इंडोचीन आदि में इसका प्रचार हुआ। भारत में यह पहली बार जैन लेखक गुणभद रचित उत्तर पुराण में मिलती है। इस कथा के कई रूप मिले। कुछ में उन्हें मंदोदरी से पैदा बताया गया है, जिसने यह जानकर कि बालिका उनके पति के नाश का कारण बनेगी, उसका त्याग कर दिया था। वह किसानों को मिली, जिन्होंने उसे राजा जनक को दे दिया। 18वीं शताब्दी की कश्मीरी रामायण में भी यहीं कथा मिलती है। जावनी सेरत कांड की कहानी मिलती-जुलती है, पर पालने वाले ऋ षि मेतिली बताए गए हैं। इस कथा में बालिका का नाम सिंता है। इसी समय की स्यामी रामायण में समुद्र में फेंकी गई बालिका को देवता उस दिशा में ले जाते हैं कि वह लंका से मिथिला पहुंचकर जनक को मिलती है। कंबोडिया की रामकथा में लंका से संबंध नहीं जोड़ा है। ये सारी कथाएं गुणभद से प्रेरित कही जा सकती हैं। अद्भुत रामायण के अनुसार सीता ऋ षियों के रक्त से जन्मीं और आनंद रामायण के अनुसार अग्नि से उत्पन्न हुई थीं। दशरथ जातक के अनुसार दशरथ की पहली पत्नी से राम, लक्ष्मण के साथ सीता भी जनमी थीं। जावा की राम कलिंग और मलाया की सेरीराम में भी उन्हें दशरथ पुत्री बताया गया है। पेरिस में फादर बुशे के रखे पत्रों में निहित कहानी के अनुसार केहुमी समुद मंथन से जन्मी थीं। उन्हें वेदमुनि ने पाला था। वे विष्णु से उनका विवाह करना चाहते थे जो तब तक रामेन के रूप में जन्म ले चुके थे। बाद में वे उन्हीं से ब्याही गई थीं। क्या ये विभिन्न कथाएं हमें सीता का अपमान लगनी चाहिए? पौराणिक पात्रों को लेकर कही गई हर बात हमारे यहां विवाद का रूप ले लेती है। कितने अचरज की बात है कि हम अपनी आस्था और ज्ञान के अहंकार में, अपनी मान्यता के गर्व में किसी दूसरे की बात को न सुनना चाहते हैं, न समझना चाहते हैं। जबकि अपने धर्म से जुड़ी हर बात को जानने की जिज्ञासा हममें होनी चाहिए। आस्था और संदेह मनुष्य के लिए आस्था और संदेह, दोनों ही आवश्यक हैं, क्योंकि ये ही हमें अज्ञात मोड़ों से निकालते हैं। विदेशों तक फैली कथाएं हमारे पौराणिक नायकों का आदर करती हैं। अगर कभी वे किसी चरित्र को लेकर जिज्ञासा व्यक्त करती हैं तो इसे उसका अनादर नहीं समझा जाना चाहिए। इन भिन्न कथाओं को पढ़कर हम एक अलग सोच से रूबरू होते हैं। धर्म का मूल एक अच्छी सोच में ही निहित है। व्यक्ति धामिर्क हो या धर्मनिरपेक्ष, अभिजन साहित्य का प्रेमी हो या लोक साहित्य का, यदि वह वास्तव में ज्ञान पिपासु है तो खुली दृष्टि से सब कुछ देखने-सुनने की कोशिश करेगा। सही यह होगा कि जो उसको अच्छा लगे उसे ग्रहण करे और जो अच्छा नहीं लगे, उसे छोड़ दे। इतना ही ठीक है। किसी अलग कथा या व्याख्या पर प्रहार करना अथवा उसे तोड़ना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है।

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जब श्री राम मां चंडी के चरणों में अर्पित करने वाले थे अपना नेत्र, पढ़ें रामायण से जुड़ी यह कथा

 दुर्गा मां की यह कथा रामायण से जुड़ी हुई है। जब लंकापति रावण माता सीता का हरण कर लंका ले गया था। तब ब्रह्मा जी ने रावण का वध करने के लिए श्री राम को मां चंडी की पूजा करने का सुझाव दिया था। दुर्गा मां की यह कथा रामायण से जुड़ी हुई है। जब लंकापति रावण माता सीता का हरण कर लंका ले गया था। तब ब्रह्मा जी ने रावण का वध करने और लंका पर विजय प्राप्त करने के लिए श्री राम को मां दुर्गा के स्वरूप मां चंडी की पूजा करने का सुझाव दिया था। इस पूजा के लिए श्री राम को मां को 108 नीलकमल के पुष्प अर्पित करने थे। ब्रह्मा जी का सुझाव मानकर श्री राम ने मां चंडी का आह्वान शुरू किया और 108 नीलकमल के फूल मंगवा लिए। जब यह बात रावण को पता चली तो उसने इस पूजा में खलल डालने की कोशिश और अपनी माया से एक नीलकमल गायब कर दिया। पृथ्वी पर कलयुग का आगमन कैसे हुआ और क्यों हुआ मां चंडी की पूजा करते समय जब श्री राम को एक नीलकमल का पुष्प गायब होने की बात का पता चला तो श्री राम को लगा कि उनकी पूजा सफल नहीं होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि नीलकमल का फूल बेहद दुर्लभ है और आसानी से पाया नहीं जाता है। लेकिन बाद में उन्हें याद आया कि उनके भक्त उन्हें नीलकमल से संबोधित कते हैं। ऐसे में श्री राम ने मां चंडी को नीलकमल की जगह अपना नेत्र अर्पित करने का ​फैसला किया। श्री राम ने एक-एक कर 107 नीलकमल के पुष्प मां चंडी को अर्पित कर दिए। आखिरी फूल अर्पित करने के लिए उन्होंने अपने तरकश से तीर निकाला और अपनी आंख निकालकर मां के चरणों में चढ़ाने का फैसला लिया। श्री राम तीर से अपना नेत्र निकालने की जा रहे थे कि तभी मां जगदम्बा उनके समक्ष प्रकट हुईं। मां ने कहा कि वो उनकी पूजा से बेहद प्रसन्न हैं। ऐसे में श्री राम को उनका नेत्र अर्पित करने की आवश्यकता नहीं है। इसके बाद मां जगदम्बा ने श्री राम को लंका विजय का आशीर्वाद प्रदान किया। फिर श्री राम ने लंका पर विजय प्राप्त कर रावण का वध किया और माता सीता को बंधनमुक्त कराया। 

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पृथ्वी पर कलयुग का आगमन कैसे हुआ और क्यों हुआ

हमारे पुराणों में चार युगों का वर्णन मिलता है सतयुग, त्रेतायुग. द्वापरयुग और कलयुग। कलयुग को एक श्राप कहा जाता है। पर क्या आपको पता है कि इस पृथ्वी पर कलयुग कैसे आया और कैसे हुई थी पृथ्वी पर कलयुग का शुरुआत? चलिए आज आपको हम बताते हैंक्या हम सब ने कभी इस बात पर ध्यान दिया है कि ऐसे क्या कारण रहे होंगे जिसके चलते कलयुग को धरती पर आना पड़ा। कलयुग का प्रभाव पृथ्वी पर जब दिखना शुरू हुआ जब महाभारत के युद्ध के बाद पांडवो ने अपना राजपाठ अर्जुन के बेटे, परीक्षित को सौप कर स्वर्ग की ओर चले गए। वही भगवान श्री कृष्ण भी मानव शरीर त्याग कर वैकुण्ठ लोक चले गए। पांडवो और भगवान श्री कृष्ण के जाने के बाद कलियुग ने प्रभाव दिखाना शुरू किया। कलयुग की की शुरुआत कैसे हुई कलयुग की शुरुआत एक पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है। जिसके अनुसार एक बार राजा परीक्षित भ्रमण करने निकले थे रास्ते में उन्होंने देखा, कलि (कलि के युग को ही कलियुग कहते हैं) एक बैल को मार रहा है, उस बैल का एक टांग ही है। यह बैल धर्म था। यह देख राजा परीक्षित को काफी क्रोध आया कलि को मारने दौड़े। कलि(कलयुग) राजा परीक्षित को आते देख डर गया और राजा परीक्षित से रहम की मांग करने लगा। इस पर राजा परीक्षित ने दया दिखाते हुए कहा कि “तू मेरे राज्य से निकल जा और कही और जा कर रह”। ये सुन कलि(कलयुग) ने कहा की “पूरे धरती पर आपका ही राज है, मैं धरती छोड़ का कहाँ जाऊ”। इस बात पर राजा परीक्षित ने दया दिखाते हुए कहा “जहां अधर्म, चोरी, झूठ हो वहां चले जा और वहां जाकर रह”।लेकिन इन सब स्थानों से कलि(कलयुग) को संतुष्टी नहीं हुई और एक बेहतर जगह मांगने लगा। इस पर राजा परीक्षित ने कलि (कलयुग) को सोने में रहने के लिए कह दिया। यह सुन कलि(कलयुग) काफी खुश हो गया और मान गया। कलि (कलयुग) ने मौका देखकर राजा के सोने के मुकुट में प्रवेश कर लिया। इससे राजा परीक्षित की मानसिक क्षमता (मति) ख़राब हो गयी। राजा परीक्षित के मस्तिस्क में नकारात्मक विचार उत्पन्न होने लगे। राजा परीक्षित ने पास में गुजर रहे एक सांप को मार दिया और उसे ध्यान लगा कर बैठे, एक साधू के गले में डाल दिया। साधू ने जब अपनी आँखे खोली तो उसने अपने गले में मारा हुआ सांप देखा। यह देख साधू को राजा परीक्षित पर काफी क्रोध आया। साधू ने तुरंत राजा परीक्षित को श्राप दिया कि “तेरी मौत आज से सातवे दिन हो जाएगी”।राजा परीक्षित वापस राजमहल आये और माथे से सोने का मुकुट उतारा। सोने का मुकुट उतारते ही उन्हें आपकी गलती का एहसास हुआ। एहसास होते ही राजा परीक्षित दौड़े-दौड़े साधू के पास गए और क्षमा याचना करने लगे। इसपर साधू ने कहा दिया हुआ श्राप वापस नहीं हो सकता लेकिन तुम्हारे पास सात दिन है। इन सात दिनों में जितना अच्छा कर्म कर सकते हो कर लो। इसके बाद राजा परीक्षित वापस राजमहल आ गए और सात दिन बात राजा परीक्षित की मौत हो गयी। राजा परीक्षित के मरने के बाद कलियुग ने पूरे धरती को अपनी चपेट में ले लिया और हर तरफ पाप और अधर्म करने लगा। फिर इसी तरह से कलयुग का आगमन धरती पर हुआ कितने वर्षो का होगा कलयुग वैदिक आलेख के अनुसार चार युग होते हैं।सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलयुग। हिन्दू सनातन धर्म के अनुसार हर चार युग बाद ब्रह्माण्ड में जीवन बनता है और नष्ट होता है। सत्ययुगसतयुग चार युगों में से धरती पर पहला युग था। इस युग में बुराई , झूठ ,क्रोध ,वासना और अहंकार नहीं था। नहीं थे। इस युग में ना किसी को कोई बीमारी थी ना किसी को कोई दुख था। कहा जाता है कि सतयुग में मानव अपनी इच्छा से मृत्यु प्राप्त करता था। सतयुग का कुल समय 17,28,000 मानव वर्ष का था। सत्ययुग में मानव का औसत जीवनकाल 1,00,000 वर्ष होता था। सतयुग में धर्म के चार पांव थे। इस युग का अंत भगवान परशुराम के जन्म के बाद हुआ। त्रेतायुगसतयुग के बाद त्रेतायुग आया। इस यूग में राज्यों और प्रान्तों का जन्म हुआ कई राजा दुसरे देशो परआक्रमण कर उसे जीत कर अपना बल और प्रभुत्व दिखाते थे। इस युग में धर्म के तीन पांव रह गए थे। एक चौथाई लोग बुराई, पाप और हिंसा करने लगे थे। इस युग में मनुष्य के कद की लम्बाई 21 फीट रह गयी थी। त्रेतायुग का कुल समय 12,96,000 मानव वर्ष का था। त्रेतायुग में मानव का औसत जीवनकाल 10,000 वर्ष होता था। भगवन राम का जन्म इसी युग में हुआ था। द्वापरयुगत्रेतायुग युग के बाद तीसरा युग द्वापरयुग था। इस युग में लालच, क्रोध, झूठ फ़ैल गया था। इस युग में मनुष्य के कद की लम्बाई 12 फीट रह गयी थी। इस युग में धर्म के दो पांव रह गए थे। द्वापरयुग का कुल समय 8,64,000 मानव वर्ष का था। द्वापरयुग में मानव का औसत जीवनकाल 1000 वर्ष होता था। द्वापरयुग में ही भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ था और महाभारत भी इसी युग में हुआ था। कलियुगकलियुग चौथा और अंतिम युग है। इस युग में अधर्म अपने चरम पर पहुंच जाएगा। इस युग में देवता मात्र 10000 वर्षो तक ही धरती पर रहेंगे इसके बाद देवता भी धरती से चले जाएंगे। इस युग में धर्म के एक पांव रह गए है। कलियुग का कुल समय 4,32,000 मानव वर्ष का होगा। अभी कलयुग के मात्र 5000 वर्ष ही पूरे हुए हैं। कलियुग में मानव का औसत जीवनकाल 100 वर्ष होता है।जैसे जैसे कलियुग बढ़ता जायेगा वैसे पाप, क्रोध, लालच, हिंसा, वासना, स्वार्थ, बुराई बढती जाएगी और अच्छे कर्म जैसे की दया, क्षमा, सत्य, धर्म ख़त्म होते जायेंगे। जब घोर कलियुग आएगा तब मनुष्य की आयु मात्र 12 वर्षो की रह जाएगी और मनुष्य का आकार घटकर मात्र 4 इंच की रह जाएगी। इस युग का अंत भगवान विष्णु द्वारा कल्कि के अवतार में होगा जो बुराई का अंत करेंगे। कलियुग ख़त्म होने के बाद फिर से एक नए सतयुग की शुरुआत होगी।

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29 जून को देवशयनी एकादशी, जानें क्यों इस बार 5 माह का होगा चातुर्मास

देवशयनी एकादशी 29 जून 2023 को है. ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास से जाने देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का महत्व, मुहूर्त उपाय और इसके नियम आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहते हैं. इस साल देवशयनी एकादशी 29 जून 2023 को है. इस दिन श्रीहरि विष्णु की पूजा करने से कई गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है. देवशयनी एकादशी के दिन से ही जगत के पालनहार भगवान विष्णु का निद्राकाल शुरू हो जाता है, यानी इसी दिन से चतुर्मास की शुरुआत होती है. चतुर्मास शुरू होने के बाद से सारे शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. 5 माह का होगा चातुर्मास देवशयनी एकादशी से चार माह तक भगवान विष्णु देवोत्थानी एकादशी तक के लिए योग निद्रा में चले जाएंगे. फिर वे देवउठनी एकादशी को योग निद्रा से बाहर आएंगे, तब चातुर्मास का समापन होगा. देवउठनी एकादशी 23 नवंबर को है। इस तरह से चातुर्मास 30 जून से लगेगा और 23 नवंबर को खत्म हो जाएगा. इस बार श्रावण पुरुषोत्तम मास होने की वजह से दो माह तक है, इसलिए चातुर्मास की अवधि पांच माह होग. इस दौरान सभी मांगलिक कार्य बंद रहेंगे. हिंदू धर्म में चातुर्मास का बहुत अधिक महत्व माना जाता है. चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ माह से शुरू होती है और कार्तिक की एकादशी के दिन खत्म होते हैं. योग निद्रा से कब जागेंगे देव ज्योतिषाचार्य ने बताया कि चार माह की निद्रा के बाद कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को जब भगवान विष्णु योग निद्रा से उठते हैं तब फिर से सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं. इस बार चातुर्मास चार माह की बजाय पांच माह तक रहेंगे. देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के अलावा कुछ उपाय करने से जीवन में खुशियां आती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करते हैं. इन चार महीनों में सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. चातुर्मास में ये कार्य हैं वर्जित इस दौरान मुंडन, उपनयन संस्कार, विवाह इत्यादि जैसे महत्वपूर्ण मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं. मान्यता है कि भगवान विष्णु के शयनकाल में मांगलिक कार्य करने से व्यक्ति को उनका आशीर्वाद नहीं प्राप्त होता है, जिस वजह से विघ्न उत्पन्न होने का खतरा बना रहता है. हर साल चातुर्मास सामान्‍य रूप से 4 महीने का होता है, लेकिन इस साल अधिक मास होने के कारण चातुर्मास 5 महीने का होगा. यानी कि इस दिन भगवान विष्णु पूरे 5 महीने के लिए योग निद्रा में चले जाएंगा और फिर इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी कि देवउठनी एकादशी के दिन योग निद्रा से जागेंगे. देवशयनी एकादशी का महत्व ज्योतिषाचार्य ने बताया कि देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व होते हैं. देवशयनी एकादशी भगवान विष्णु के आराम का समय है, यानी एक दिन से भगवान विष्णु चार महीने के लिए शयन करने के लिए चले जाते हैं. इसी के साथ इस दिन से चातुर्मास का आरंभ भी हो जाता है. ऐसे में अगले 4 महीने तक कोई भी शुभ कार्य का आयोजन करना वर्जित माना जाता है. हर साल चातुर्मास सामान्‍य रूप से 4 महीने का होता है, लेकिन इस साल अधिक मास होने के कारण चातुर्मास 5 महीने का होगा, यानी कि इस दिन भगवान विष्णु पूरे 5 महीने के लिए योग निद्रा में चले जाएंगा और फिर इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी कि देवउठनी एकादशी के दिन योग निद्रा से जागेंगे. देवशयनी एकादशी पूजा मुहूर्त ज्योतिषाचार्य ने बताया कि पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का शुभारंभ 29 जून 2023 सुबह 03:18 मिनट पर होगा और इस तिथि का समापन 30 जून सुबह 02:42 मिनट पर हो जाएगा. पूजा तिथि के अनुसार, देवशयनी एकादशी व्रत गुरुवार 29 जून 2023 को रखा जाएगा. इस विशेष दिन पर रवि योग का निर्माण हो रहा है, जो सुबह 05:26 मिनट से दोपहर 04:30 मिनट तक रहेगा. भगवान शिव करेंगे सृष्टि का संचालन ज्योतिषाचार्य ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के विश्राम करने से सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं. इस दौरान सभी तरह के धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, बस विवाह समेत अन्य मांगलिक कार्य नहीं होते हैं. इस दौरान भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करना चाहिए. 5 महीने नहीं बजेगी शहनाई ज्योतिषाचार्य ने बताया कि चतुर्मास का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार चतुर्मास आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होकर कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि तक रहता है. साल 2023 में चतुर्मास 29 जून से शुरू होगा, इस दिन देवशयनी एकादशी भी है. 23 नवंबर 2023 को देवोत्थान एकादशी है। कहा जाता है कि इस दिन से भगवान विष्णु विश्राम काल पूरा करने के बाद क्षीर सागर से निकल कर सृष्टि का संचालन करते हैं. देवशयनी और देवउठनी एकादशी ज्योतिषाचार्य ने बताया कि इस साल 29 जून को देवशयनी एकादशी और 23 नवंबर को देव उठनी एकादशी रहेगी, इसलिए चातुर्मास 148 दिनों का रहेगा। इन दिनों में भगवान विष्णु योग निद्रा में रहेंगे. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इस अवधि में सृष्टि को संभालने और कामकाज संचालन का जिम्मा भगवान भोलेनाथ के पास रहेगा. इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान किए जा सकेंगे पर विवाह समेत मांगलिक काम नहीं होंगे. चतुर्मास में नहीं होते विवाह ज्योतिषाचार्य ने बताया कि भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार कहा जाता है। श्रीहरि के विश्राम अवस्था में चले जाने के बाद मांगलिक कार्य जैसे- विवाह, मुंडन, जनेऊ आदि करना शुभ नहीं माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान मांगलिक कार्य करने से भगवान का आशीर्वाद नहीं प्राप्त होता है। शुभ कार्यों में देवी-देवताओं का आवाह्न किया जाता है। भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, इसलिए वह मांगलिक कार्यों में उपस्थित नहीं हो पाते हैं। जिसके कारण इन महीनों में मांगलिक कार्यों पर रोक होती है। पाताल में रहते हैं भगवान ज्योतिषाचार्य ने बताया कि ग्रंथों के अनुसार पाताल लोक के अधिपति राजा बलि ने भगवान विष्णु से पाताल स्थिति अपने महल में रहने का वरदान मांगा था, इसलिए माना जाता है कि देवशयनी एकादशी से अगले 4 महीने

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देवों के राजा होने के बावजूद क्यों नहीं होती देवराज इंद्र की पूजा, जानिए रोचक कथा

हिंदू धर्म में 33 करोड़ (कोटि) देवी-देवताएं हैं। सभी देवी-देवताओं से जुड़ी कथा-कहानियां पौराणिक ग्रंथों में मिलती है। देवराज इंद्र की बात करें तो उन्हें देवताओं का राजा कहा जाता है। लेकिन इंद्र देवताओं की एक पदवी होती है। हिंदू धर्म में प्रमुख देवी-देवताओं की पूजा की जाती है और मंदिर भी होते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर क्यों इंद्र देव की पूजा नहीं की जाती और ना ही इंद्र देव की पूजा के लिए कोई मंदिर बनवाए गए हैं। कहा जाता है कि एक श्राप के कारण इंद्र देव की पूजा नहीं की जाती है। जानते हैं इस रोचक कहानी के बारे में विस्तार से.. आखिर क्यों नहीं होती देवराज इंद्र की पूजा पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के कारण इंद्र देव की पूजा नहीं की जाती है। शुरुआत में इंद्र देव की पूजा ‘इंद्रोत्सव’ नाम से पूरे उत्तर भारत में होती थी। इस अवसर पर बड़े त्यौहार का आयोजन भी किया जाता था। लेकिन भगवान कृष्ण के कारण इंद्र की पूजा पूरी तरह से बंद हो गई। इंद्र की पूजा के बजाय गोवर्धन पूजा की शुरुआत हुई। कहा जाता है कि भगवान श्री कृष्ण ने इंद्र देव की पूजा बंद कराने के लिए स्वर्ग में सभी देवी-देवताओं से निवेदन किया। भगवान श्री कृष्ण का मानना था कि ऐसे व्यक्ति की पूजा कभी नहीं करनी चाहिए जो ना ही ईश्वर है और ना ईश्वर के समान। जब इंद्र देव को पूजा बंद होने की बात का पता चला तो वे क्रोधित हो गए। उन्होंने तुरंत बादलों को आदेश दिया कि ऐसी वर्षा करो कि बृजवासी पूरी तरह से डूब जाए और उनसे क्षमा मांगने पर विवश हो जाए। इंद्र के आदेश पर ऐसी ही वर्षा हुई और इससे बृजवासी परेशान हो गए। तब भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी एक उंगली पर उठा लिया और सभी बृजवासियों को गोवर्धन पर्वत के नीचे आने को कहा। इस तरह के बृजवासियों पर वर्षा का कोई असर नहीं हुआ और इंद्र का अभिमान भी टूट गया। इंद्र देव को मिला था 100 योनियों का श्राप इंद्र के चित्रों में उनके शरीर पर असंख्य आंखें दिखाई देती है। दरअसल ये आंखें गौतम ऋषि द्वारा मिले श्राप का परिणाम है। पद्ममपुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार, इन्द्र स्वर्गलोक में अप्सराओं के साथ कामवासना से घिरे रहते थे। एक दिन जब वे धरती पर विचरण करने आए तो उन्होंने एक कुटिया के बाहर गौतम ऋषि की पत्नी देवी अहिल्या को देखा। अहिल्या सुंदर और रूपवती थी, जिसे देखते ही इंद्र उनपर मोहित हो गए। छलपूर्वक अहिल्या को पाने के लिए  इंद्र ने अपनी माया से रात को सुबह जैसे वातावरण में बदल दिया। गौतम ऋषि को लगा कि सुबह हो गई और वे कुटिया से निकलकर स्नान और पूजा-पाठ के लिए बाहर चले गए। उनके जाते इंद्र गौतम ऋषि का वेश धारण कर कुटिया में चले गए। अहिल्या इंद्र को गौतम ऋषि के वेश में देख पति समझ बैठी। गौतम ऋषि ने नदी में आसपास का वातावरण देखा जिससे उन्हें अनुभव हुआ कि अभी सुबह नहीं हुई है और वो अपनी कुटिया की तरफ लौट गए। कुटिया लौटते ही उन्होंने देखा कि उनके वेश में कोई दूसरा पुरुष उनकी पत्नी के साथ रति क्रियाएं कर रहा है।  गौतम ऋषि ने क्रोध में आकर पत्नी अहिल्या को जीवनभर पत्थर की शील बनने का श्राप दे दिया। उन्होंने इंद्र से कहा कि तुमने यह सब केवल एक स्त्री की योनि पाने के लिए किया। तुम्हें योनि की इतनी लालसा है, तो तुम्हें वही मिलेगी। तब ऋषि ने इंद्र को हजार योनियों का श्राप दे दिया और इंद्र के शरीर पर हजार योनियां निकल आई। लेकिन इंद्र को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने गौतम ऋषि से क्षमा मांगी। फिर गौतम ऋषि ने उन योनियों को आंखों में बदल दिया। यही कारण है कि इंद्र की अधिकतर तस्वीरों पर असंख्य आंखें दिखाई देती है।

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