November 23, 2023

Shree Ram भगवान श्रीराम को रामचंद्र जी क्यों कहा जाता है, जानिए यह पौराणिक कथा

Shree Ram मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को सनातन संस्कृति का आधार माना जाता है। भगवान श्री राम, विष्णु जी के अवतार हैं। रामचरित मानस के अनुसार, भगवान श्री राम के शासन काल को राम राज्य कहा जाता है। भगवान श्री राम ने अपने जीवन काल में हमेशा एक न्यायप्रिय और प्रजाप्रिय राजा की तरह शासन किया। भगवान श्री राम ने हमेशा “रघुकुल रीति सदा चली आई, प्राण जाई पर वचन न जाई।” के आधार पर अपना कर्तव्य निभाया। इसी कारण अपने पिता राजा दशरथ के कहने पर राज धर्म और वचन के पालन के लिए भगवान श्री राम 14 वर्षों के वनवास पर भी गए। अपने जीवन काल में भगवान श्री राम ने अपने वचन और धर्म को हमेशा अपने स्वार्थ से ऊपर रखा। Shree Ram मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। इसका अर्थ है कि वे मर्यादाओं के सर्वोच्च पुरुष हैं। भगवान श्री राम ने अपने जीवन में हमेशा मर्यादाओं का पालन किया। उन्होंने कभी भी अपने स्वार्थ के लिए मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं किया। भगवान श्री राम की मर्यादाओं के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं: भगवान श्री राम के गुण भगवान श्री राम में अनेक गुणों का समावेश है। वे एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श भाई, आदर्श मित्र और आदर्श राजा थे। उनके कुछ प्रमुख गुण इस प्रकार हैं: भगवान श्री राम का महत्व भगवान श्री राम का जीवन सभी के लिए एक प्रेरणा है। उनके जीवन से हमें अनेक बातें सीखने को मिलती हैं। भगवान श्री राम हमें बताते हैं कि हमें हमेशा मर्यादाओं का पालन करना चाहिए, धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए, अपने वचन और कर्तव्य के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, दूसरों की मदद करनी चाहिए और क्षमाशील होना चाहिए। अयोध्या नगरी में हुआ श्री राम का जन्म राम चरित मानस और रामायण जैसे धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान श्री राम का जन्म त्रेतायुग में अयोध्या नगरी के रघुकुल वंश के राजा दशरथ और उनकी पत्नी कौशल्या के घर में हुआ। राजा दशरथ कई वर्षों तक संतान सुख से वंचित रहे थे। इसके बाद ऋषि मुनियों द्वारा बताए गए उपायों को करने से राजा दशरथ की तीनों रानियों कौशल्या, केकैयी और सुमित्रा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। माता कौशल्या के पुत्र भगवान श्री राम हुए जो श्री हरि के रूप थे। रानी केकैयी भरत की माता बनीं और माता सुमित्रा ने शेषनाग अवतार लक्ष्मण जी और शत्रुघ्न को जन्म दिया। चार पुत्रों की प्राप्ति से राजा दशरथ बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने पूरे अयोध्या नगरी में उत्सव मनाया और सभी अयोध्या वासियों को भी इस उत्सव का सहभागी बनाया। चंद्रमा को दिए वरदान के कारण कहलाए ‘रामचंद्र’ भगवान श्रीराम का रामचंद्र नाम भगवान श्री राम के जन्म के समय अयोध्या नगरी में अत्यधिक हर्षोल्लास था। स्वर्ग लोक के देवता भी भगवान विष्णु के धरती पर अवतार लेने से बहुत प्रसन्न थे। वे सभी अयोध्या नगरी में भगवान श्री राम के दर्शन करने के लिए आए थे। एक दिन भगवान विष्णु और अन्य देवताओं के साथ अयोध्या नगरी में एक उत्सव मनाया जा रहा था। इस उत्सव में भगवान सूर्य देव भी उपस्थित थे। उत्सव की शोभा देखकर भगवान सूर्य देव इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने अस्त होना भूल गए। इससे अयोध्या नगरी में रात नहीं हुई। रात ने भगवान विष्णु से कहा कि मैं भी आपके राम रूप के दर्शन करना चाहती हूं। तब भगवान विष्णु ने भगवान सूर्य देव से अस्त होने की प्रार्थना की। भगवान सूर्य देव ने भगवान विष्णु की प्रार्थना सुनकर अस्त होना शुरू किया। जब अयोध्या नगरी में रात हुई तब रात ने भगवान श्री राम से कहा कि सूर्य देव के कारण मुझे देरी से आपके दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। भगवान श्री राम ने इस देरी के फलस्वरूप रात को वरदान दिया कि इस जन्म में उनका रंग रात के रंग की तरह ही रहेगा। इसके बाद चंद्रदेव ने भी भगवान श्री राम से कहा कि सूर्यदेव के कारण मुझे भी आपके दर्शन पाने में देरी हो गई। भगवान श्री राम ने चंद्रदेव को भी यह वरदान दिया कि चंद्रदेव का नाम भगवान राम के नाम के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा। इसी कारण आज भी संसार में भगवान श्री राम को रामचंद्र जी के नाम से जाना जाता है। रामचंद्र ram नाम का अर्थ “राम” शब्द का अर्थ “सुख, शांति और आनंद” होता है। “चंद्र” शब्द का अर्थ “चाँद” होता है। अतः, रामचंद्र नाम का अर्थ हुआ “सुख, शांति और आनंद का चंद्रमा”। भगवान श्रीराम के इस नाम का अर्थ यह है कि वे संसार में सुख, शांति और आनंद के प्रतीक हैं। वे अपने भक्तों को सुख, शांति और आनंद प्रदान करते हैं। रामचंद्र नाम का महत्व Importance of name Ramchandra भगवान श्रीराम का रामचंद्र नाम बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह नाम उनके गुणों और उनकी लीलाओं को दर्शाता है। यह नाम उनके भक्तों के लिए आशीर्वाद और प्रेरणा का स्रोत है। भगवान श्री राम के रामचंद्र नाम का जाप करने से मन को शांति और आनंद प्राप्त होता है। यह नाम भक्तों को जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करता है।

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Poranik katha:श्री राम के अलावा इन 4 से भी हार गया था रावण

Ram:अधिकतर लोग यही जानते हैं कि रावण सिर्फ श्रीराम से ही हारा था, लेकिन ये सच नहीं है। रावण श्रीराम के अलावा शिवजी, राजा बलि, बालि और सहस्त्रबाहु से भी पराजित हो चुका था। यहां जानिए इन चारों से रावण कब और कैसे हारा था…… Poranik katha बालि से रावण की हार एक बार रावण (rawan) बालि से युद्ध करने के लिए पहुंच गया था। बालि उस समय पूजा कर रहा था। रावण बार-बार बालि को ललकार रहा था, जिससे बालि की पूजा में बाधा उत्पन्न हो रही थी। जब रावण नहीं माना तो बालि ने उसे अपनी बाजू में दबा कर चार समुद्रों की परिक्रमा की थी। बालि बहुत शक्तिशाली था और इतनी तेज गति से चलता था कि रोज सुबह-सुबह ही चारों समुद्रों की परिक्रमा कर लेता था। इस प्रकार परिक्रमा करने के बाद सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता था। जब तक बालि ने परिक्रमा की और सूर्य को अर्घ्य अर्पित किया तब तक रावण को अपने बाजू में दबाकर ही रखा था। रावण ने बहुत प्रयास किया, लेकिन वह बालि की गिरफ्त से आजाद नहीं हो पाया। पूजा के बाद बालि ने रावण को छोड़ दिया था। Pauranik katha : कैसे हुई सूर्य देव की उत्पत्ति, जानिए इससे जुड़ी पौराणिक कथा सहस्त्रबाहु अर्जुन से रावण की हार सहस्त्रबाहु अर्जुन के एक हजार हाथ थे और इसी वजह से उसका नाम सहस्त्रबाहु पड़ा था। जब रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंचा तो सहस्त्रबाहु ने अपने हजार हाथों से नर्मदा नदी के बहाव को रोक दिया था। सहस्त्रबाहु ने नर्मदा का पानी इकट्ठा किया और पानी छोड़ दिया, जिससे रावण पूरी सेना के साथ ही नर्मदा में बह गया था। इस पराजय के बाद एक बार फिर रावण सहस्त्रबाहु से युद्ध करने पहुंच गया था, तब सहस्त्रबाहु ने उसे बंदी बनाकर जेल में डाल दिया था। Poranik katha राजा बलि के महल में रावण की हार दैत्यराज बलि पाताल लोक के राजा थे। एक बार रावण (rawan) राजा बलि से युद्ध करने के लिए पाताल लोक में उनके महल तक पहुंच गया था। वहां पहुंचकर रावण ने बलि को युद्ध के लिए ललकारा, उस समय बलि के महल में खेल रहे बच्चों ने ही रावण को पकड़कर घोड़ों के साथ अस्तबल में बांध दिया था। इस प्रकार राजा बलि के महल में रावण की हार हुई। shiv ji शिवजी से रावण की हार रावण (rawan) बहुत शक्तिशाली था और उसे अपनी शक्ति पर बहुत ही घमंड भी था। रावण इस घमंड के नशे में शिवजी को हराने के लिए कैलाश पर्वत पर पहुंच गया था। रावण ने शिवजी को युद्ध के लिए ललकारा, लेकिन महादेव तो ध्यान में लीन थे। रावण कैलाश पर्वत को उठाने लगा। तब शिवजी ने पैर के अंगूठे से ही कैलाश का भार बढ़ा दिया, इस भार को रावण उठा नहीं सका और उसका हाथ पर्वत के नीचे दब गया। बहुत प्रयत्न के बाद भी रावण अपना हाथ वहां से नहीं निकाल सका। तब रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उसी समय शिव तांडव स्रोत रच दिया। शिवजी इस स्रोत से बहुत प्रसन्न हो गए और उसने रावण को मुक्त कर दिया।  मुक्त होने के पश्चात रावण ने शिवजी को अपना गुरु बना लिया।

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