November 19, 2023

Dev Uthani Ekadashi 2023:देवउठनी एकादशी इस बार बन रहे हैं ये तीन शुभ संयोग, भूलकर ना करें ये काम, विष्णु भगवान हो जायेंगे नाराज

सनातन परंपरा में जिस कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की देवोत्थान या फिर कहें देवउठनी एकादशी पर श्रीहरि अपनी योगनिद्रा से जागते हैं और उसमें शादी-ब्याह जैसे मांगलिक कार्यों की शुरुआत होती है, उसकी तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि आदि के बारे में जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. सनातन परंपरा में एकादशी तिथि को भगवान श्री विष्णु की पूजा के लिए बहुत ज्यादा शुभ माना गया है, लेकिन इसका महत्व तब और ज्यादा बढ़ जाता है, जब यह कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में पड़ती है और देवउठनी या फिर देवोत्थान एकादशी के नाम से जानी जाती है. हिंदू धर्म में देवउठनी को इसलिए बहुत ज्यादा शुभ माना गया है क्योंकि इसी भगवान श्री विष्णु चार महीने बाद अपनी योगनिद्रा से जागते हैं और उसी के बाद शुभ कार्यों की शुरुआत होती है. आइए देवोत्थान एकादशी तिथि की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और जरूरी नियम के बारे में विस्तार से जानते हैं. देवउठनी एकादशी की पूजा का शुभ मुहूर्त देश की राजधानी दिल्ली के पंचांग के अनुसार इस साल कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की एकादशी 22 नवंबर 2023 की रात्रि 11:03 बजे से प्रारंभ होकर 23 नवंबर 2023 की रात्रि 09:01 बजे समाप्त होगी. ऐसे में उदया तिथि के अनुसार इस साल देवोत्थान एकादशी का पावन पर्व 23 नवंबर 2023 को मनाया जाएगा और इस व्रत का पारण अगले दिन 24 नवंबर 2023 को प्रात:काल 06:51 से 08:57 बजे के बीच किया जा सकेगा. गौरतलब है कि एकादशी का व्रत बगैर पारण के अधूरा माना जाता है. देवउठनी एकादशी की पूजा विधि देवउठनी एकादशी पर भगवान श्री विष्णु का आशीर्वाद पाने के लिए व्यक्ति को प्रात:काल सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए फिर उसके बाद उगते हुए सूर्य देवता को अर्घ्य देना चाहिए. इसके बाद भगवान श्री विष्णु के व्रत एवं पूजन का संकल्प करना चाहिए और अपने घर के ईशान कोण में उनकी विधि-विधान से फल-फूल, धूप-दीप, चंदन-भोग आदि अर्पित करके पूजा करनी चाहिए. देवउठनी एकादशी की पूजा में एकादशी की कथा का पाठ या श्रवण जरूर करना चाहिए और सबसे अंत में श्रीहरि और माता लक्ष्मी की आरती करना चाहिए तथा अधिक से अधिक लोगों को इस व्रत एवं पूजा का प्रसाद बांटना चाहिए. हिंदू मान्यता के अनुसार एकादशी का व्रत बगैर पारण के अधूरा माना गया है, इसलिए व्रत के अगले दिन शुभ समय में पारण जरूर करें. देवउठनी पूजा का अचूक उपाय देवउठनी एकादशी वाले दिन व्यक्ति को भगवान श्री विष्णु के सामने घी का दीया जलाना चाहिए और उसके बाद पूरे घर-आंगन, छत और मुख्य द्वार पर दीया जरूर रखना चाहिए. हिंदू मान्यता है कि देवोत्थान एकादशी के दिन घर में देशी घी का दीया जलाने से घर में हमेशा सुख-शांति और सौभाग्य बना रहता है.

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Chhath puja:छठ पर्व की पौराणिक लोक कथाएं

छठ पर्व बांस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बरतनों, गन्ने के रस, गु़ड़, चावल और गेहूं से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है। Chhath puja: छठ पूजा की परंपरा और उसके महत्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएं प्रचलित हैं। पूजा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व के लिए न विशाल पंडालों और भव्य मंदिरों की जरूरत होती है न ऐश्वर्ययुक्त मूर्तियों की। एक पौराणिक लोककथा के अनुसार लंका विजय के बाद राम राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था। Chhath Puja 2023: छठ पूजा में भूलकर भी न करें ये गलतियां, छठी मैया हो जाएंगी नाराज एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी। सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की। कर्ण भगवान सूर्य का परम भक्त था। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देता था। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्घा बना था। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्घति प्रचलित है। कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है। वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं। Chhath puja एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परंतु वह मृत पैदा हुआ। प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। राजन तुम मेरा पूजन करो तथा और लोगों को भी प्रेरित करो। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे छठ कहा गया है। यह पर्व वर्ष में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जानेवाले छठ पर्व को चैती छठ व कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को कार्तिकी छठ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्घि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए यह पर्व मनाया जाता है। इस पर्व को स्त्री और पुरुष समान रूप से मनाते हैं। छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते। षष्ठी को मनाया जाने वाला छठ पूजा सूर्य उपासना का अनुपम लोकपर्व है। यह मुख्य रूप से पूर्वी भारत के बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है।

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