October 2023

Karwa Chauth 2023: करवा चौथ कब है? सर्वार्थ सिद्धि योग में होगी चंद्रमा की पूजा, जानें मुहूर्त, अर्घ्य समय और पारण

Karwa Chauth 2023 date: हिंदू कैलेंडर के अनुसार, करवा चौथ का व्रत हर साल कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है. उस दिन कार्तिक संकष्टी चतुर्थी होती है, जिसे वक्रतुंड संकष्टी चतुर्थी कहते हैं. करवा चौथ के दिन सुहागन महिलाएं और विवाह योग्य युवतियां अपने जीवनसाथी की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए निर्जला व्रत रखती हैं. इस व्रत में चंद्रमा की पूजा करना और अर्घ्य देना जरूरी है. इसके बिना करवा चौथ का व्रत पूरा नहीं होता है. करवा चौथ 2023 कब है?वैदिक पंचांग के अनुसार, इस बार कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 31 अक्टूबर दिन मंगलवार को रात 09 बजकर 30 मिनट से प्रारंभ हो रही है. य​ह तिथि 01 नवंबर बुधवार को रात 09 बजकर 19 मिनट पर खत्म होगी. उदयातिथि और चतुर्थी के चंद्रोदय के आधार पर करवा चौथ व्रत 1 नवंबर बुधवार को रखा जाएगा. इस दिन व्रती को 13 घंटे 42 मिनट तक निर्जला व्रत रखना होगा. व्रत सुबह 06 बजकर 33 मिनट से रात 08 बजकर 15 मिनट तक होगा. करवा चौथ व्रत कथा | Karwa Chauth Vrat Katha In Hindi करवा चौथ 2023 का पूजा मुहूर्त क्या है?जो महिलाएं 01 नवंबर बुधवार को करवा चौथ का व्रत रखेंगी, उनको शाम में पूजा के लिए 1 घंटा 18 मिनट का शुभ समय प्राप्त होगा. करवा चौथ पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 05 बजकर 36 मिनट से शाम 06 बजकर 54 मिनट तक है. करवा चौथ 2023 पर चंद्रमा पूजन और अर्घ्य का समय क्या है?करवा चौथ के दिन चंद्रोदय रात 08 बजकर 15 मिनट पर होगा. इस समय से आप चंद्रमा पूजन के साथ अर्घ्य दे सकते हैं. चंद्रमा को अर्घ्य देने पर व्रत पूरा होता है. करवा चौथ 2023 पारण समयकरवा चौथ व्रत का पारण चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद किया जाता है. पति के हाथों जल ​पीकर व्रत को पूरा करते हैं. 1 नवंबर को रात 08:15 बजे के बाद आप कभी भी पारण कर सकती हैं. तीन योग में है करवा चौथ 2023इस साल करवा चौथ पर 3 योग बन रहे हैं. इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 06:33 बजे से प्रारंभ हो रहा है, जो अगले दिन प्रात: 04:36 बजे तक रहेगा. सर्वार्थ सिद्धि को शुभ योग माना जाता हैं. इसमें किए गए कार्य सफल सिद्ध होते हैं. उस दिन प्रात:काल से दोपहर 02 बजकर 07 मिनट तक परिघ योग है, उसके बाद से ​शिव योग प्रारंभ होगा, जो अगले दिन तक रहेगा. करवा चौथ के दिन मृगशिरा नक्षत्र सुबह से लेकर अगले दिन 2 नंवबर को सुबह 04:36 बजे तक है.

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Hanuman Ji:जब जीवन में मिले ये संकेत, तो समझ लीजिए आप पर बनी हुई है हनुमान जी की कृपा

Hanuman Ji: हनुमान जी को भगवान राम के परम भक्त के रूप में जाना जाता है। तुलसीदास ने हनुमान चालीसा में भगवान हनुमान के कई गुणों का विस्तृत वर्णन किया है। उनके चरित्र के चलते ही गोस्वामी तुलसीदास ने हनुमान जी को ‘सकल गुण निधानं’ कहा है। कुछ ऐसे संकेत बताए गए हैं जिनके मिलने पर आप यह जान सकते हैं कि आपके ऊपर हनुमान जी की कृपा बनी हुई है। आइए जानते हैं वह कौन-से संकेत हैं। निर्भय होता है जीवन अगर आपके जीवन में किसी प्रकार का डर नहीं है और आप पूरी सच्चाई के साथ अपना जीवन जी रहे हैं तो इसका अर्थ है कि आपके ऊपर संकटमोचन हनुमान जी की विशेष कृपा बनी हुई है। क्योंकि जिस भक्त पर हनुमान जी प्रसन्न रहते हैं उसका जीवन भयमुक्त बीतता है। Hanuman ji:रामभक्‍त हनुमान को किसने दिया था अमर होने का वरदान? पढ़ें ये पौराणिक कथा काम में नहीं आती कोई बाधा जब व्यक्ति के किसी काम में बाधा न आए। साथ ही उसे हर कार्य में सफलता की प्राप्ति हो रही है तो, यह भी इस बात की ओर संकेत करता है कि हनुमान जी की कृपा आपके ऊपर बनी हुई है। जब हाथ में दिखे मंगल रेखा अगर आपके हाथों में मंगल रेखा साफ दिखाई देने लगे तो इसका अर्थ है कि बजरंगबली आपसे प्रसन्न हैं। ऐसा होने पर कार्यों में आ रही बाधाएं दूर होंगी। घर के किसी भी सदस्य को किसी प्रकार का रोग या पीड़ा नहीं होगी।   शनि दशा का नहीं होता प्रभाव अगर व्यक्ति पर किसी प्रकार से शनि की साढ़े साती, ढैया या अन्य किसी भी प्रकार की शनि पीड़ा का असर नहीं होता तो समझा जाता है कि उस व्यक्ति पर हनुमान जी की विशेष कृपा बनी हुई है। जगन्नाथ का मंदिर : जगन्नाथपुरी में ही सागर तट पर बेदी हनुमान का प्राचीन एवं प्रसिद्ध मंदिर है। कहावत है कि महाप्रभु जगन्नाथ में वीर मारुति को यहां समुद्र को नियंत्रित करने हेतु नियुक्त किया था, परंतु जब-तब हनुमान भी जगन्नाथ-बलभद्र एवं सुभद्रा के दर्शनों का लोभ संवरण नहीं कर पाते थे, सम्प्रति समुद्र भी उनके पीछे नगर में प्रवेश कर जाता। केसरीनंदन की इस आदत से परेशान हो जगन्नाथ महाप्रभु ने हनुमान को यहां स्वर्ण बेड़ी से आबद्ध कर दिया।

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Papankusha Ekadashi 2023: कब है पापांकुशा एकादशी? जानें सही तिथि, विष्णु पूजा का मुहूर्त, हरि कृपा से मिटेंगे सारे पाप

Papankusha Ekadashi 2023: पापांकुशा एकादशी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस दिन श्रीहरि की पूजा करने से व्यक्ति पाप मुक्त हो जाता है. जानें पापांकुशा एकादशी की डेट, मुहूर्त और महत्व अक्टूबर में दो एकादशी पड़ेंगी इंदिरा एकादशी और पापांकुशा एकादशी. आश्विन शुक्ल एकादशी के दिन इच्छित फल की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए. अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पापांकुशा एकादशी के नाम से जाना जाता है. इस दिन व्रत करने वालों को यमलोक की यातनाएं नहीं सेहनी पड़ती. आइए जानते हैं अक्टूबर में पापांकुशा एकादशी व्रत की डेट, मुहूर्त और महत्व Kab Hai Papankusha Ekadashi 2023 Kab Hai Papankusha Ekadashi 2023:  पापांकुशा एकादशी का व्रत आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है. पापांकुशा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पापों का प्रायश्चित होता है. हरि कृपा से मोक्ष की प्राप्ति होती है. जो व्यक्ति पापांकुशा एकादशी का व्रत विधिपूर्वक करता है, उसे 100 सूर्य यज्ञ और 1 हजार अश्वमेध यज्ञ करने के समान पुण्य फल प्राप्त होता है. भगवान विष्णु के आशीर्वाद से व्यक्ति की मनोकामनाएं पूरी होती है.  इस साल पापांकुशा एकादशी व्रत कब है? पापांकुशा एकादशी व्रत का पूजा मुहूर्त और महत्व क्या है? कब है पापांकुशा एकादशी 2023पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 24 अक्टूबर दिन मंगलवार को दोपहर 03 बजकर 14 मिनट से प्रारंभ होगी. इस तिथि की समाप्ति 25 अक्टूबर दिन बुधवार को दोपहर 12 बजकर 32 मिनट पर होगी. उदयातिथि के आधार पर इस साल पापांकुशा एकादशी व्रत 25 अक्टूबर को रखा जाना उत्तम है. 3 शुभ योग में है पापांकुशा एकादशी व्रतइस साल पापांकुशा एकादशी का व्रत 3 शुभ योग में है. पापांकुशा एकादशी के दिन रवि योग, वृद्धि योग और ध्रुव योग बन रहे हैं. उस दिन रवि योग सुबह 06 बजकर 28 मिनट से प्रारंभ हो रहा है और दोपहर 01 बजकर 30 मिनट तक मान्य रहेगा. वहीं वृद्धि योग प्रात:काल से प्रारंभ होगा और वह दोपहर 12 बजकर 18 मिनट तक रहेगा. उसके बाद से ध्रुव योग शुरू होगा, रात तक है. पापांकुशा एकादशी 2023 पूजा मुहूर्त25 अक्टूबर को पापांकुशा एकादशी व्रत की पूजा आप सूर्योदय के बाद से कर सकते हैं क्योंकि उस समय से रवि योग और वृद्धि योग रहेगा. ये दोनों ही शुभ योग हैं. वृद्धि योग में आप जो भी कार्य करते हैं, उसके फल में वृद्धि होती है. रवि योग सूर्य के प्रभाव वाला होता है. व्रत के दिन आप पूजा के लिए राहुकाल का त्याग करें. उस दिन राहुकाल दोपहर 12 बजकर 05 मिनट से दोपहर 01 बजकर 29 मिनट तक है. राहुकाल में एकादशी की पूजा न करें. पापांकुशा एकादशी पर भद्रा और पंचकपापांकुशा एकादशी के दिन भद्रा और पंचक भी है. उस​ दिन भद्रा सुबह 06 बजकर 28 मिनट से शुरू हो रही है और दोपहर 12 बजकर 32 मिनट तक रहेगी. भद्रा का वास धरती पर है तो इस समय में कोई शुभ कार्य न करें. पापांकुशा एकादशी पर पूरे दिन पंचक है. पापांकुशा एकादशी व्रत का महत्वपौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यदि आपने जाने या अनजाने में कोई भी पाप किया है तो उसके प्रायश्चित के लिए पापांकुशा एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु के पद्मनाभ स्वरूप की पूजा करें. उनकी कृपा से आपके पाप मिट जाएंगे. इस दिन आप अपनी क्षमता के अनुसार दान करके पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं. पापांकुशा एकादशी पर अन्न, जल, तिल, गाय, भूमि, सोना आदि का दान करना चाहिए. पापांकुशा एकादशी 2023 व्रत पारण समय (Papankusha Ekadashi 2023 Vrat Parana Time) पापांकुशा एकादशी व्रत का पारण 26 अक्टूबर 2023 को सुबह 06 बजकर 28 मिनट पर से  सुबह 08 बजकर 43 मिनट तक शुभ मुहूर्त है. पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय 09:44 तक रेहगी पापांकुशा एकादशी महत्व (Papankusha Ekadashi Significance) पापांकुशा एकादशी का व्रत अपने नाम स्वरूप जातक को पाप से मुक्ति दिलाता है. मान्यता है कि पापांकुशा एकादशी का निराहार व्रत करने से श्रीहरि भगवान विष्णु बहुत प्रसन्न होते हैं और भक्तों को कभी धन-दौलत, सुख, सौभाग्य की कमी नहीं होने देते. पापांकुशा एकादशी पूजा विधि (Papankusha Ekadashi Puja Vidhi) एकादशी तिथि पर सुबह उठकर स्नान आदि करने के बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए. संकल्प अपनी शक्ति के अनुसार ही लेना चाहिए यानी एक समय फलाहार का या फिर बिना भोजन का, संकल्प लेने के बाद घट स्थापना की जाती है और उसके ऊपर श्रीविष्णुजी की मूर्ति रखी जाती है. इस व्रत को करने वाले व्यक्ति को रात्रि में विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए. इस व्रत का समापन द्वादशी तिथि की सुबह ब्राह्मणों को अन्न का दान और दक्षिणा देने के बाद होता है.

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सपने में कभी गाय देखी है,सपने में गाय दिखना माना जाता है बहुत शुभ

सपने में गाय देखना एक खास संकेत देता है. गाय दिखना बहुत शुभ माना जाता है. ये इस पर भी निर्भर करता है कि आपको सपने में किस तरह की गाय दिखाई देती है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार रात के समय गहरी नींद में आने वाले सपने हमें अपने भविष्य में होने वाले शुभ या अशुभ संकेतों के बारे में बताते हैं. कई बार हमें ऐसे सपने दिखाई देते हैं, जो उठने के बाद भी हमारे दिमाग में रह जाते हैं और कुछ जिन्हें हम पूरी तरह से भूल जाते हैं. ऐसे सपनों को जानने के लिए हम उत्सुक रहते हैं कि आखिर उस सपने के पीछे का अर्थ क्या है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार आने वाला हर सपना अपने साथ कोई ना कोई संकेत जरूर लेकर आता है. हर सपने का कोई ना कोई अर्थ जरूर निकलता है. अगर आप उस अर्थ को जान लें तो हो सकता है कि आने वाला समय आपके लिए शुभ हो जाए, इसलिए हर व्यक्ति को अपने आने वाले सपनों को नजरअंदाज करने के बजाय, उसके मतलब को समझने की कोशिश करनी चाहिए. यदि आपको सपने में गाय दिखाई देती है तो इस सपने का क्या अर्थ है? यदि सपने में व्यक्ति गाय को खुद की ओर आता देखता है तो इस स्वप्न को शुभ मानिए। इस सपने को देखने के बाद सुबह आपको कोई शुभ समाचार मिल सकता है। साथ ही घर में सुख-समृद्धि भी आती है। मालूम हो कि ऐसी स्थिति में गाय देखना धन आगमन का भी संदेश होता है। Dream Interpretation अगर आपको सपने में सफेद गाय दिखाई देती है तो इसका मतलब है कि भविष्य में आपको कई तरह की खुशियां मिलने वाली हैं. आपके परिवार में कुछ अच्छी खबर सुनने को मिलने वाली है. सपने में सफेद गाय दिखना बेहद शुब संकेत माना जाता है. सपने में गाय का बछड़ा देखना भी बहुत अच्छा माना जाता है. यह सपना बताता है कि आने वाले दिनों में आपकी आर्थिक स्थिति पहले से ज्यादा मजबूत होने वाली है. आप जिस भी काम में हाथ डालेंगे उसमें आपको सफलता मिलेगी. यह सपना बताता है कि आपके जीवन से परेशानियां जल्दी ही समाप्त होने वाली हैं. गाय का सपने में आना एक गंभीर अर्थ लिए हुए है. शास्त्रों के मुताबिक गाय को एक पवित्र पशु माना गया है. साथ ही इसे कामधेनु का रूप भी मानते हैं. पौराणिक कथाओं के अनुसार समुद्र मंथन से अमृत कलश के साथ 14 अन्य रत्नों की प्राप्ति हुई थी, जिनमें से एक कामधेनु गाय थी, इसलिए गाय को पशुधन भी कहा जाता है और हिंदू धर्म में इसे विशेष दर्जा दिया गया है.

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दशहरे पर पहले क्या करना चाहिए? दुर्गा विसर्जन या फिर भगवान राम की पूजा

दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है जो हर साल अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। यह त्योहार असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक है। दशहरा के दो मुख्य धार्मिक कथाएं हैं। एक कथा के अनुसार, भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था, जो एक राक्षस राजा था जो लंका पर शासन करता था। दूसरी कथा के अनुसार, देवी दुर्गा ने इसी दिन महिषासुर, एक राक्षस को मार डाला था जो देवताओं और मनुष्यों पर अत्याचार कर रहा था। दुर्गा विसर्जन का शुभ मुहूर्त : 24 अक्टूबर 2023, मंगलवार को प्रात:काल 06:27 से 08:42 बजे के बीच दशहरे का विजय मुहूर्त : दोपहर 01:58 से 02:43 बजे के बीच दशहरा को मनाने के कई तरीके हैं। कुछ लोग देवी दुर्गा या भगवान राम की पूजा करते हैं। अन्य लोग रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों को जलाते हैं। दशहरा के दिन कई जगहों पर भव्य मेलों और समारोहों का आयोजन किया जाता है। दशहरा भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में भी मनाया जाता है। 2023 में, दशहरा 24 अक्टूबर को मनाया जाएगा। दशहरा के कुछ प्रमुख अनुष्ठान और समारोह इस प्रकार हैं: दशहरा एक महत्वपूर्ण हिंदू त्योहार है जो बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है। यह एक ऐसा दिन है जब लोग अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने और अच्छे के लिए काम करने का संकल्प लेते हैं।

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Hanuman ji:रामभक्‍त हनुमान को किसने दिया था अमर होने का वरदान? पढ़ें ये पौराणिक कथा

Hanuman Ji Puja: हिंदू धर्म में हनुमान जी भगवान श्री राम के सबसे बड़े भक्त और समर्पण के प्रतीक हैं. हनुमान जी ने अपना पूरा जीवन श्री राम को समर्पित कर दिया था. हनुमान जी को महावीर, बजरंगबली, पवन पुत्र, अंजनेय समेत कई नामों से पुकारा जाता है. राम भक्त हनुमान की वीरता और साहस की कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं. मान्यता है कि कलयुग में अगर धरती पर कोई ईश्वर है, तो वे केवल हनुमान जी है. हनुमान जी को चिरंजीवी होने का वरदान मिला हुआ है. वाल्मीकि रामायण में हनुमान के अमर होने का वर्णन किया गया है. आइये जानते हैं हनुमान जी को किसने अमर होने का वरदान दिया था. Hanuman ji:हनुमानजी बंदर या वानर थे या किसने दिया हनुमान को अमर होने का वरदान? वाल्मीकि रामायण के अनुसार, रावण का वध करने और लंका पर विजय प्राप्त करने के बाद प्रभु श्री राम अयोध्या लौटे, तब उन्होंने युद्ध में साथ देने वाले सभी वीरों को उपहार दिया. विभीषण, अंगद और सुग्रीव समेत कई वीरों को उपहार मिला. इस दौरान हनुमान जी ने भगवान श्री राम से याचना करते हुए कहा कि ‘यावद् रामकथा वीर चरिष्यति महीतले। तावच्छरीरे वत्स्युन्तु प्राणामम न संशय:।। यानि, हे राम! इस लोक पर जब तक राम कथा प्रचलित रहे, तब तक मेरे प्राण शरीर में बसे रहें.

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Hanuman ji:दोपहर में क्यों नहीं करते हनुमान जी की पूजा? क्या है सही समय? यहां जानें सब कुछ

Lord Hanuman Puja: हिंदू धर्म में लगभग सभी देवी देवताओं की पूजा पाठ के लिए समय निश्चित किया गया है. माना जाता है कि सही समय पर पूजा पाठ करने से व्यक्ति को शुभता प्राप्त होती है. हनुमान जी की पूजा का समय भी निश्चित है. बहुत से लोगों के मन में यह सवाल रहता है, कि हनुमान जी की पूजा किस समय करनी चाहिए? जिससे पूजा का शुभ फल प्राप्त हो. हिंदू धर्म शास्त्रों में बताया गया है, कि हनुमान जी की पूजा सुबह अथवा शाम के वक्त ही करनी चाहिए. हिंदू धर्म पुराणों के अनुसार बजरंगबली की पूजा करने से कुंडली में मौजूद निर्बल ग्रह प्रबल होते हैं, और शुभ फल देते हैं. शनि की महादशा और साढ़ेसाती को दूर करने के लिए भी हनुमान जी की पूजा करना लाभकारी होता है, लेकिन दोपहर के समय हनुमान जी की पूजा कभी भी ना करें, शास्त्रों में इसके पीछे की रोचक कथा बताई जाती है. Hanuman ji :हनुमानजी के 108 नाम, लेकिन जानिए 11 खास नामों का रहस्य प्रातःकाल ऐसे लें हनुमानजी का नाम रामचरितमानस के सुंदरकांड में हनुमान जी कहते हैं “प्रात नाम जो लेई हमारा, तेहि दिन ताहि न मिलहि आहारा।” यानी प्रातः काल में जो उनका नाम लेता है उसे दिनभर आहार नहीं मिलता. असल में हनुमान जी वानर रूप धारी हैं, और साथ ही देवता भी हैं, और देवताओं का नाम बिना स्नान और पवित्र हुए बिना नहीं लिया जाना चाहिए. इसलिए हनुमान जी का नाम लेना और पूजन करना है तो प्रातः काल स्नान करके पवित्र होने के बाद ही पवित्र भाव से ही उनका नाम लिया जाना चाहिए. ऐसा करने से कोई दोष नहीं लगता और हनुमान जी की कृपा भी प्राप्त होती है. हनुमानजी की पूजा का समय और लाभहनुमानजी की पूजा संध्या के समय करना भी शुभ मंगलकारी होता है। ज्योतिषीय उपायों में बताया जाता है कि रात में 8 बजे के बाद घी का दीप जलाकर हनुमान चालीसा अथवा सुंदरकांड का पाठ किया जाए तो यह बहुत ही शुभ फलदायी होता है। हनुमान जन्मोत्सव यानी हनुमान जयंती का दिन हो या अन्य दिन शाम के समय हनुमानजी की पूजा करें तो मन में किसी प्रकार का क्लेश और भय नहीं रहता है। प्रतिकूल ग्रह दशाओं से निकला भी व्यक्ति के लिए आसान हो जाता है। इसलिए दोपहर में हनुमानजी की पूजा नहीं होतीहनुमानजी की पूजा के बारे में ऐसी मान्यता है कि दोपहर के समय हनुमानजी की पूजा करने से पूजा का फल नहीं मिलता है। क्योंकि इस समय की गई पूजा को हनुमानजी स्वीकार नहीं करते हैं। इसकी वजह यह है कि हनुमानजी दोपहर के समय भारत में नहीं रहते हैं। इस समय विभीषणजी को दिए वचन के अनुसार हनुमानजी लंका चले जाते हैं। इसलिए इनकी पूजा दोपहर के समय नहीं की जाती है। इसलिए दोपहर की पूजा नहीं स्वीकारते हनुमानजीविभीषणजी हनुमानजी से बड़ा स्नेह रखते थे। इन्होंने हनुमानजी से आग्रह किया, हे हनुमानजी आप हमारे साथ लंका में ही निवास कीजिए। लेकिन राम भक्त हनुमानजी भगवान राम से दूर कैसे रह सकते थे। इसलिए इन्होंने लंका में रहने से मना कर दिया। लेकिन विभीषणजी को एक वचन दे दिया, क्योंकि वह विभीषणजी के स्नेह को भी ठुकराना नहीं चाहते थे। हनुमानजी ने विभीषणजी से कहा कि वह नियमित रूप से दिन में दोपहर के समय लंका आएंगे और फिर वापस चले जाएंगे। शाम के समय हनुमानजी लंका से लौटकर आ जाते हैं। इसलिए शाम के समय हनुमानजी की पूजा फलदायी होती है।

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Navratri 2023 9 Day: नवरात्रि के नौवें दिन ऐसे करें मां सिद्धिदात्री की पूजा, जानें-विधि और महत्व

 Navratri 2023 9 Day मार्कण्डेय पुराण में मां को अष्ट सिद्धि भी कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि मां सिद्धिदात्री अणिमा महिमा प्राकाम्य गरिमा लघिमा प्राप्ति ईशित्व और वशित्व अष्ट सिद्धि का संपूर्ण स्वरूपा हैं। Navratri 2023 9 Day: चैत्र नवरात्रि के अंतिम दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा-उपासना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की भक्ति-उपासना करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसके लिए साधक श्रद्धा और भक्ति भाव से मां सिद्धिदात्री की पूजा करते हैं। साथ ही माता के निमित्त व्रत उपवास भी करते हैं। इस दिन पूजा संपन्न होने के पश्चात कन्या पूजन का भी विधान है। आइए, मां सिद्धिदात्री की पूजा विधि और महत्व जानते हैं मां का स्वरूप मां सिद्धिदात्री चार भुजा धारी हैं। एक हाथ में कमल पुष्प, तो दूजे में गदा धारण की हैं। वहीं, तीसरे में चक्र, तो चौथे में शंख धारण की हैं। सिंह उनकी सवारी है। मां सिद्धिदात्री समस्त संसार का कल्याण करती हैं। इसके लिए उन्हें जगत जननी भी कहते हैं। महत्व वेदों, पुराणों एवं शास्त्रों में मां की महिमा का वर्णन निहित है। मार्कण्डेय पुराण में मां की महिमा का गुणगान विशेषकर है। मार्कण्डेय पुराण में मां को अष्ट सिद्धि भी कहा गया है। इसका अर्थ यह है कि मां अणिमा, महिमा, प्राकाम्य गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, ईशित्व और वशित्व अष्ट सिद्धि का संपूर्ण स्वरूपा हैं। पूजा विधि इस दिन सुबह ब्रह्म बेला में उठकर सबसे पहले आदिशक्ति और जगत जननी मां दुर्गा को प्रणाम करें। इसके पश्चात, घर की साफ-सफाई कर नित्य कर्मों से निवृत हो जाएं। अब गंगाजल युक्त पानी से स्नान-ध्यान करें और आमचन कर नवीन वस्त्र धारण करें। इसके तत्पश्चात, मां सिद्धिदात्री की स्तुति निम्न मंत्र से करें- या देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:। अब मां सिद्धिदात्री की पूजा फल, फूल, धूप, दीप, कुमकुम, तिल, जौ, चावल आदि से करें। मां को प्रसाद में हलवा-पूरी भेंट करें। अंत में आरती अर्चना कर जीवन में तरक्की, उन्नति, सुख, शांति और समृद्धि की कामना करें। दिनभर उपवास रखें। संध्याकाल में आरती कर फलाहार करें। अगले दिन स्नान ध्यान कर सामान्य दिनों की तरह पूजा करें। इसके पश्चात, ब्राह्मणों को दान देकर व्रत खोलें।

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Navratri 2023 Day 8 : चैत्र नवरात्रि आठवां दिन, आज महागौरी की पूजा विधि, भोग, मंत्र इनकी पूजा से लाभ जानें

Navratri 2023 Day 8 Maa Mahagauri : आज नवरात्रि का आठवां दिन है और आज मां दुर्गा की आठवीं शक्ति महागौरी की पूजा की जाएगी। इसके साथ आज रवि योग का भी प्रभाव बना रहेगा। माता महागौरी की विधिवत पूजा अर्चना करने से जीवन का हर कष्ट दूर होता है और माता की कृपा प्राप्त होती है। आइए जानते हैं चैत्र नवरात्रि के आठवें दिन कैसे पूजा करें, आरती और मंत्र… चैत्र नवरात्रि अंतिम पड़ाव में पहुंच चुके हैं और आज मां दुर्गा की आठवीं शक्ति महागौरी की पूजा की जाएगी। नवरात्रि के आठवें दिन की पूजा का विशेष महत्व है, इस दिन कन्या पूजन भी किया जाता है। माता के कुछ भक्त जो पूरे 9 दिन व्रत नहीं रख पाते, वे प्रतिपदा और अष्टमी तिथि को व्रत रखते हैं। देवीभगवत् पुराण में बताया गया है कि आठवें दिन की पूजा मां दुर्गा के मूल भाव को दर्शाता है और महादेव के साथ उनकी अर्धांगिनी के रूप में महागौरी ही सदैव विराजमान रहती हैं, इसलिए माता का एक नाम शिवा भी है। महागौरी की पूजा करने से सोमचक्र जागृत हो जाता है और इनकी कृपा मात्र से हर असंभव कार्य पूरा हो जाता है। आइए जानते हैं मां महागौरी का स्वरूप, भोग, आरती और मंत्र.. Navratri 2023 9 Day: नवरात्रि के नौवें दिन ऐसे करें मां सिद्धिदात्री की पूजा, जानें-विधि और महत्व इस तरह पड़ा महागौरी नाम (Maa Mahagauri Ki Katha) देवीभागवत पुराण में बताया गया है कि देवी पार्वती का जन्म राजा हिमालय के यहां हुआ था। माता को मात्र 8 वर्ष की आयु में ही अपने पूर्वजन्म की घटनाओं का आभास हो गया था। मात्र 8 वर्ष की आयु में ही माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या भी शुरू कर दी थी। इसलिए नवरात्रि की अष्टमी तिथि को महागौरी की पूजा की जाती है। अपनी तपस्या के दौरान माता ने केवल वायु पीकर तप करना शुरू कर दिया था। तपस्या से माता पार्वती को महान गौरव प्राप्त हुआ था इसलिए माता पार्वती का नाम महागौरी पड़ा। मां महागौरी का प्राकट्य (Importance of Maa Mahagauri Puja) तपस्या से माता पार्वती का शरीर काला पड़ गया था। तब भगवान शिव ने तपस्या से प्रसन्न होकर महागौरी से गंगा स्नान के लिए कहा। जिस समय माता पार्वती ने गंगा में डूबकी लगाई तब देवी का एक स्वरूप श्याम वर्ण के साथ प्रकट हुईं, जो कौशिकी के नाम से जानी गईं और एक स्वरूप उज्जवल चंद्र के समान प्रकट हुआ, वह महागौरी कहलाईं। महागौरी अपने भक्तों की हर मुरादों को पूरा करती हैं और उनकी राह में आ रही अड़चनों को दूर करती हैं। मां की कृपा से कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती। ऐसा है मां महागौरी का स्वरूप देवीभागवत पुराण में बताया गया है कि मां महागौरी के सभी वस्त्र और आभूषण सफेद रंग के हैं इसलिए माता को श्वेताम्बरधरा भी कहा जाता है। अपनी तपस्या से इन्होंने गौर वर्ण प्राप्त किया था। उत्पत्ति के समय यह आठ वर्ष की थीं, इसलिए इन्हें नवरात्र के आठवें दिन पूजा जाता है। अपने भक्तों के लिए यह अन्नपूर्णा स्वरूप हैं। यह धन, वैभव और सुख-शांति की अधिष्ठात्री देवी हैं। सांसारिक रूप में इनका स्वरूप बहुत ही उज्जवल कोमल, श्वेतवर्ण और श्वेत वस्त्रधारी है। देवी एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे हाथ में डमरू लिए हुए हैं। वहीं एक हाथ अभय और एक हाथ वरमुद्रा में है। देवी महागौरी को गायन-संगीत प्रिय है और यह सफेद वृषभ यानि बैल पर सवार हैं। चैत्र नवरात्रि अष्टमी तिथि कन्या पूजन (Navratri Ashtami Tithi Kanya Pujan) अष्टमी पर कन्या पूजन का भी विधान है। हालांकि कुछ लोग नवमी के दिन भी कन्या पूजन करते हैं। लेकिन, अष्ठमी के दिन कन्या पूजन करना भी श्रेष्ठ रहता है। कन्याओं की संख्या 9 हो तो अति उत्तम है अन्यथा दो कन्याओं के साथ भी पूजा की जा सकती है। कन्याओं के साथ एक लांगूरा (बटुक भैरव) भी होना चाहिए। कन्याओं को घर पर बुलाकर उनके पैरों को धुलकर कुमकुम का टिका लगाएं और फिर पूजन में कन्याओं को हलवा-चना, सब्जी, पूड़ी आदि चीजें होनी चाहिए और सामर्थ्य के अनुसार दान दक्षिणा भी दें। इसके बाद पूरे परिवार के साथ चरण स्पर्श करें और माता के जयाकरे लगाते हुए कन्याओं को विदा करें। मां महागौरी पूजा विधि (Maa Mahagauri Puja Vidhi) नवरात्रि की अष्टमी तिथि की पूजा भी अन्य तिथियों की तरह ही की जाती है। जिस तरह सप्तमी तिथि को माता की शास्त्रीय विधि से पूजा की गई, उसी तरह अष्टमी तिथि की भी पूजा होगी। इस दिन देसी घी का दीपक जलाते हुए मां के कल्याणकारी मंत्र ओम देवी महागौर्यै नम: मंत्र का जप करें और माता को लाल चुनरी अर्पित करें। इसके बाद रोली, अक्षत, सफेद फूल, नारियल की मिठाई आदि पूजा की चीजें अर्पित करें। अगर आप अग्यारी कर रहे हैं तो रोज की चरह लौंग, बताशे, इलायची, हवन सामग्री आदि चीजें अर्पित करें। इसके बाद कपूर या दीपक से पूरे परिवार के साथ महागौरी की आरती करें और माता के जयाकरे लगाएं। इसके बाद दुर्गा मंत्र, दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती आदि का पाठ करें और शाम के समय में भी पूजा करें। मां महागौरी के मंत्र (Maa Mahagauri Puja Mantra) श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥ या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ महागौरी माता की आरती (Maa Mahagauri Arti जय महागौरी जगत की माया। जया उमा भवानी जय महामाया।। हरिद्वार कनखल के पासा। महागौरी तेरा वहां निवासा।। चंद्रकली और ममता अंबे। जय शक्ति जय जय मां जगदंबे।। भीमा देवी विमला माता। कौशिकी देवी जग विख्याता।। हिमाचल के घर गौरी रूप तेरा। महाकाली दुर्गा है स्वरूप तेरा।। सती ‘सत’ हवन कुंड में था जलाया। उसी धुएं ने रूप काली बनाया।। बना धर्म सिंह जो सवारी में आया। तो शंकर ने त्रिशूल अपना दिखाया।। तभी मां ने महागौरी नाम पाया। शरण आनेवाले का संकट मिटाया।। शनिवार को तेरी पूजा जो करता। मां बिगड़ा हुआ काम उसका सुधरता।। भक्त बोलो तो सोच तुम क्या रहे हो। महागौरी मां तेरी हरदम ही जय हो।।

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 Navratri 2023 Day 7: माता कालरात्रि की पूजा से आसुरीय प्रभावों से मिलती है मुक्ति, जानें पूजा विधि

 Navratri 2023 Day 7 शारदीय नवरात्र के सातवें दिन माता कालरात्रि की विधिवत पूजा की जाती है। शास्त्रों के अनुसार माता कालरात्रि सभी सिद्धियों की देवी हैं यही कारण है कि इस दिन इनकी आराधना करने से व्यक्ति को बहुत लाभ मिलता है। Navratri 2023 Day 7: नवरात्र पर्व में मां दुर्गा के सातवें सिद्ध स्वरूप माता कालरात्रि की पूजा को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। शारदीय नवरात्र की सप्तमी तिथि के दिन मां दुर्गा के सबसे शक्तिशाली स्वरूप की विधि-विधान से पूजा की जाती हैं। मान्यता है कि आज के दिन माता (Mata Kalratri Puja) की पूजा करने से और मंत्रों का जाप करने से सभी प्रकार के दुःख-दर्द दूर हो जाते हैं। माता कालरात्रि को को सभी सिद्धियों की देवी के रूप में भी जाना जाता है इसलिए इस दिन तंत्र-मंत्र से भी माता की पूजा की जाती है। शास्त्रों में इस बात का भी वर्णन मिलता है कि माता कालरात्रि के मंत्रों का शुद्ध उच्चारण करने से भूत-बाधाओं से मुक्ति मिलती है और घर से इस प्रकार की नकारात्मक शक्तियां भाग जाती हैं। आइए जानते हैं माता कालरात्रि का स्वरूप, पूजा विधि और ,मंत्र। कैसा है मां कालरात्रि का स्वरूप आपको बता दें कि मां कालरात्रि का रंग रात के समान काला है। मां के चार हाथ है। मां  कालरात्रि के दो हाथों में वज्र और खडग है और उनके अन्य दो हाथ अभय यानि रक्षा और वरदा यानि आशीर्वाद की स्थिति में हैं । मां कालरात्रि के लंबे और खुले बाल हैं। देवी कालरात्रि का वाहन गधा है। बता दें कि देवी कालरात्रि अपने भक्तों को सभी बुराईयों से बचाती हैं और उनपर कृपा करती हैं । नवरात्रि के सातवे दिन उनकी पूजा कि जाती है, क्योंकि वह सभी अंधकारों को नष्ट कर सकती है और दुनिया में शांति लाती है। मां कालरात्रि की पूजा का महत्व  मां कालरात्रि को मां काली भी कहा जाता है । ये देवी दुर्गा का  सातवां अवतार है । शास्त्रों  में इन्हें संकटों और विघ्न को दूर करने वाली देवी माना गया है। आपको बता दे कि नवरात्रि में मां कालरात्रि की पूजा करने से तनाव, अज्ञात भय और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है । इसके साथ ही मां कालरात्रि को शत्रु और दुष्टों का संहार करने वाला भी कहा जाता है। आपको बता दें कि मां कालरात्रि पूर्णता का प्रतीक है वो अपने भक्तों को पूर्णता और खुशी पाने में मदद करती हैं । वो अपने भक्तों को बिना भय के जीवन जीने में मदद करती हैं और उन्हें बुरी शक्तियों और आत्माओं से बचाती हैं। Navratri 2023 Day 8 : चैत्र नवरात्रि आठवां दिन, आज महागौरी की पूजा विधि, भोग, मंत्र इनकी पूजा से लाभ जानें करें इस मंत्र का जाप या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।। पूजा की विधि मां कालरात्रि की पूजा के लिए सुबह 6 बजे का समय उत्तम माना जाता है।  इस दिन सुबह जल्दी स्नान करके मां की पूजा के लिए लाल रंग के कपड़े पहनने चाहिए।  इसके बाद मां के सामने दीप जलाएं। अब फल-फूल, मिठाई आदि से विधिपूर्वक मां कालरात्रि की आराधना करें। पूजा के समय मंत्रों का जाप करना चाहिए उसके बाद आरती करनी चाहिए। मां कालरात्रि के इन मंत्रों का उच्चारण करें। ‘ॐ जयंती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी। ‘दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोस्तु ते।  इस दिन काली चालीसा, सिद्धकुंजिका स्तोत्र, अर्गला स्तोत्रम आदि चीजों का पाठ करना चाहिए।  इन सब के साथ नवरात्रि के सातवें दिन रात्रि में तिल के तेल या सरसों के तेल की अखंण्ड ज्योत जलाएं। माता कालरात्रि की आरती (Mata Kalratri Aarti) कालरात्रि जय-जय-महाकाली । काल के मुह से बचाने वाली ।। दुष्ट संघारक नाम तुम्हारा । महाचंडी तेरा अवतार ।। पृथ्वी और आकाश पे सारा । महाकाली है तेरा पसारा ।। खड्ग-खप्पर रखने वाली । दुष्टों का लहू चखने वाली ।। कलकत्ता स्थान तुम्हारा । सब जगह देखूं तेरा नजारा ।। सभी देवता सब नर-नारी । गावें स्तुति सभी तुम्हारी ।। रक्तदंता और अन्नपूर्णा । कृपा करे तो कोई भी दुःख ना ।। ना कोई चिंता रहे बीमारी । ना कोई गम ना संकट भारी ।। उस पर कभी कष्ट ना आवें । महाकाली मां जिसे बचाबे ।। तू भी भक्त प्रेम से कह । कालरात्रि मां तेरी जय ।।

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Navratri 2023 Day 6: माता कात्यायनी की पूजा से हो जाते हैं सभी दुःख दूर, जानें पूजा विधि और मंत्र

नवरात्र महापर्व के छठे दिन मां दुर्गा के सिद्ध स्वरूप माता कात्यायनी की पूजा का विधान है। इस दिन माता के प्रिय रंग पसंदीदा भोग और मंत्रों को जानना बहुत आवश्यक होता है।  माता कात्यायनी को भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्री के रूप में भी जाना जाता है। माता कात्यायनी (Navratri 2023 Day 6 Puja) का रूप सबसे सुंदर है और  बिहार, उत्तर प्रदेश और झारखंड में इन्हें छठ मैया के रूप में भी जाना जाता है। मान्यताओं के अनुसार नवरात्र के छठे दिन माता कात्यायनी की विधि-विधान से भक्तों को विशेष लाभ प्राप्त होता है। जानिए माता कात्यायनी का स्वरूप, पूजा विधि, पूजा मंत्र और आरती- मां कात्यायनी का स्वरूप शास्त्रों के अनुसार माता का स्वरूप स्वर्ण के समान चमकीला है और उनकी चार भुजाएं हैं। प्रत्येक भुजा में माता ने तलवार, कमल, अभय मुद्रा और वर मुद्रा धारण किया है। माता कात्यायनी को लाल रंग सर्वाधिक पसंद है। किंवदंतियों के अनुसार महर्षि कात्यायन की तपस्या के बाद माता कात्यायनी ने उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया था। मां दुर्गा इन्हीं के रूप में महिषासुर का वध कर उसके आतंक से देव और मनुष्यों को भय मुक्त किया था। मां कात्यायनी पूजा विधि (Maa Katyayani Puja Vidhi) नवरात्रि पर्व के छठे दिन सबसे पहले स्नान-ध्यान के बाद कलश पूजा करें और इसके बाद मां दुर्गा की और माता कात्यायनी की पूजा करें। पूजा प्रारंभ करने से पहले मां को स्मरण करें और हाथ में फूल लेकर संकल्प जरूर लें। इसके बाद वह फूल मां को अर्पित करें। फिर कुमकुम, अक्षत, फूल आदि और सोलह श्रृंगार माता को अर्पित करें। उसके बाद उनके प्रिय भोग शहद को अर्पित करें और मिठाई इत्यादि का भी भोग लगाएं। फिर जल अर्पित करें और घी के दीपक जलाकर माता की आरती करें। आरती से पहले दुर्गा चालीसा व दुर्गा सप्तशती का पाठ करना ना भूले। करें इन मंत्रों का जाप (Maa Katyayani Mantra) 1. या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता । नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।। 2. चंद्रहासोज्जवलकरा शार्दूलवर वाहना । कात्यायनी शुभंदद्या देवी दानवघातिनि ।। माता कात्यायनी की आरती (Maa Katyayani Aarti) जय जय अम्बे, जय कात्यायनी। जय जग माता, जग की महारानी। बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वहां वरदाती नाम पुकारा। कई नाम हैं, कई धाम हैं। यह स्थान भी तो सुखधाम है। हर मंदिर में जोत तुम्हारी। कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी। हर जगह उत्सव होते रहते। हर मंदिर में भक्त हैं कहते। कात्यायनी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की। झूठे मोह से छुड़ाने वाली। अपना नाम जपाने वाली। बृहस्पतिवार को पूजा करियो। ध्यान कात्यायनी का धरियो। हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी। जो भी मां को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे।

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Navratri 2023 Day 5: स्कंदमाता की पूजा, जानिए शुभ मुहूर्त, पूजन विधि, मंत्र और भोग

नवरात्र के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है। माना जाता है कि स्कंदमाता संतान देने के साथ सभी इच्छाएं पूरी करती हैं। जानिए मां दुर्गा के पांचवें स्वरूप की कैसे करें पूजा। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि के दिन के साथ शारदीय नवरात्र का पांचवा दिन है। नवरात्र के पांचवें दिन मां दुर्गा के स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा अर्चना की जाती है। माना जाता है कि स्कंदमाता की विधिवत पूजा करने से सुख-समृद्धि के साथ-साथ संतान प्राप्ति होती है। जानिए नवरात्र के पांचवें दिन कैसे करें स्कंदमाता की पूजा, साथ ही जानिए शुभ मुहूर्त, भोग और मंत्र। Navratri 2023 Day 6: माता कात्यायनी की पूजा से हो जाते हैं सभी दुःख दूर, जानें पूजा विधि और मंत्र कैसा है मां स्कंदमाता का स्वरूप स्कंदमाता की स्वरूप काफी प्यारा है। मां दुर्गा की स्वरूप स्कंदमाता की चार भुजाएं हैं, जिसमें दो हाथों में कमल लिए हैं, एक हाथ में कार्तिकेय बाल रूप में बैठे हुए हैं और एक अन्य हाथ में मां आशीर्वाद देते हुए नजर आ रही हैं। बता दें कि मां का वाहन सिंह है, लेकिन वह इस रूप में कमल में विराजमान है। स्कंदमाता का पूजा विधि नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा की पूजा करने से पहले कलश की पूजा करें। इसके बाद मां दुर्गा और उनके स्वरूप की पूजा आरंभ करें। सबसे पहले जल से आचमन करें। इसके बाद मां को फूल, माला चढ़ाएं। इसके बाद सिंदूर, कुमकुम, अक्षत आदि लगाएं। फिर एक पान में सुपारी, इलायची, बताशा और लौंग रखकर चढ़ा दें। इसके बाद मां स्कंदमाता को भोग में फल में केला और इसके अलावा मिठाई चढ़ा दें। इसके बाद जल अर्पित कर दें। इसके बाद घी का दीपक, धूप जलाकर मां के मंत्र का जाप करें। इसके बाद दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और अंत में दुर्गा मां के साथ स्कंदमाता की आरती करें। मां स्कंदमाता का मंत्र (Maa Skandmata Mantra) ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम: या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:। सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।। मां स्कंदमाता के उपाय (Maa Skandmata Upay) संतान प्राप्ति की कामना के लिए एक चुनरी में नारियल बांध लें और “नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भ सम्भवा. ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी”. ये मंत्र बोलते हुए देवी को नारियल और चुनरी को देवी स्कंदमाता का ध्यान करते हुए माता के चरणों में चढ़ाएं. इसके बाद इसे शयनकक्ष में सिरहाने पर रखें. मान्यता है कि स्कंदमाता की पूजा से संतान की प्राप्ति में आ रही बाधाओं का अंत होता है.

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