August 27, 2023

जानिये श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा

श्री कृष्ण के जन्मदिवस को भक्त बड़े ही प्रेम भाव से कृष्ण जन्माष्टमी मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्र माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। आज श्री कृष्ण जन्माष्टमी कथा के बारे में जानते हैं। इससे पहले कि कृष्ण जन्माष्टमी की तिथि और पूजा मुहूर्त के बारे में जानिए। श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा। यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है? पुत्रदा एकादशी व्रत कब? जानें तारीख महत्व और मुहूर्त कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ माया थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी। उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए। अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा। यह है कृष्ण जन्म की कथा। श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत पूजन विधि जन्माष्टमी के एक दिन पूर्व व्रत का नियम ग्रहण करे। जन्माष्टमी के दिन दोपहर को स्नानादि से निर्वत होकर भगवान कृष्ण के लिए एक सूतिका गृह बनाये। उसको फूलो और मालाओं से सजाये। द्वार रक्षा के लिए खड्ग रखना चाहिए। दीवारों को स्वास्तिक व रंगोली सजाये। सूतिका गृह सहित देवकी माता की प्रतिमा स्थापित करे। जन्माष्टमी व्रत कथा महत्व जन्माष्टमी व्रत परिवार में सौभाग्य और शांति लाता है। श्रीकृष्ण आपकी सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं; और आपके विकास की बाधाओं पर जीत हासिल करने में मदद करते है। कृष्ण जन्माष्टमी का मुख्य महत्व सद्भावना को प्रोत्साहित करना और बुरी इच्छा को हतोत्साहित करना है। यह भी एक साथ प्रतीक है। पवित्र अवसर लोगों को एक साथ लाता है, इस प्रकार यह एकता और विश्वास का प्रतीक है।

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पुत्रदा एकादशी व्रत कब? जानें तारीख महत्व और मुहूर्त

साल में आने वाली हर एक एकादशी का अपना अलग ही महत्व है। सावन शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है पुत्रदा एकादशी साल में वैसे 2 बार आती है। पुत्रदा एकादशी को लेकर मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान की सुख की प्राप्ति होती है साथ ही संतान की उन्नति होती है। आइए जानते हैं कब है सावन शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी। इसका महत्व और पूजा विधि। कब है पुत्रदा एकादशी पंचांग के अनुसार, सावन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 26 अगस्त देर रात 12 बजकर 9 मिनट पर प्रारंभ होगी और अगले दिन यानी 27 अगस्त की रात 9 बजकर 33 मिनट तक रहेगी। उदय तिथि में एकादशी तिथि होने के कारण यह व्रत 27 अगस्त को ही रखा जाएगा। वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा व कथा 27 अगस्त को बहुत ही शुभ सर्वार्थ सिद्धि योग भी है। सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 5 बजकर 56 मिनट से आरंभ होगा और 7 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। इसलिए इस शुभ मुहूर्त में पूजा करना अति उत्तम फलदायी रहेगा। पुत्रदा एकादशी का महत्व मान्यताओं के अनुसार, पुत्रदा एकादशी का व्रत उत्तम फल देने वाला है। अगर किसी को संतान सुख में बाधा आ रही है तो वह इस व्रत को रख सकते हैं। साथ ही इस व्रत को रखने से संतान के सभी कष्ट भी दूर होता है। साथ ही संतान को स्वास्थ्य और अच्छी आयु का वरदान मिलता है। पुत्रदा एकादशी पूजा विधि सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि के बाद घर के मंदिर में देसी घी का दीपक जलाएं। इसके बाद भगवान विष्णु को गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। साथ ही तुलसी माला से 108 बार ओम वासुदेवाय नम: का जप करें। अंत में भगवान विष्णु की आरती करें। इस दिन भगवान को भी सात्विक चीजों का ही भोग लगाएं। साथ ही भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। इस दिन रविवार है तो तुलसी के पत्ते पहले ही तोड़ कर रख दें। पुत्रदा एकादशी व्रत कथा  द्वापर युग के आरंभ में महिरूपति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन राज्य के सभी ऋषि-मुनियों, सन्यासियों और विद्वानों को बुलाकर संतान प्राप्ति के उपाय पूछे। राजा की बात सुनकर सभी ने कहा कि ‘हे राजन तुमने पूर्व जन्म में सावन माह की एकादशी के दिन अपने तालाब से एक गाय को जल नहीं पीने दिया था। जिसके कारण गाय ने तुम्हे संतान न होने का श्राप दिया था। इसके बाद सभी ऋषि-मुनियों ने कहा कि हे राजन यदि तुम और तुम्हारी पत्नी पुत्रदा एकादशी का व्रत रखें तो इस श्राप से मुक्ति पा सकते हो। जिसके बाद तुम्हें संतान की प्राप्ति हो सकती है। यह सुनकर राजा ने पत्नी के साथ मिलकर पुत्रदा एकादशी का व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद राजा ने सावन माह में आने वाली पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा और इस व्रत के प्रभाव से वह शाप से मुक्त हो गया। जिसके बाद उसकी पत्नी गर्भवती हुई और एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। राजा काफी प्रसन्न हुए और तब से वह प्रत्येक पुत्रदा एकादशी का व्रत करने लगे। कहते हैं जो कि साधक पूरे मन व श्रद्धा के साथ यह व्रत करता है भगवान विष्णु उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

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