May 6, 2023

तुलसी और विष्णु की कहानी

सावर्णि मुनि की पुत्री तुलसी अपूर्व सुंदरी थी। उनकी इच्छा थी कि उनका विवाह भगवान नारायण के साथ हो। इसके लिए उन्होंने नारायण पर्वत की घाटी में स्थित बदरीवन में घोर तपस्या की। दीर्घ काल तक तपस्या के उपरांत ब्रह्मा जी ने प्रसन्न होकर दर्शन दिया और वर मांगने को कहा। तुलसी ने कहा- “सृष्टिकर्ता ब्रह्मदेव ! आप अन्तर्यामी है। सबके मन की बात जानते है, फिर भी मैं अपनी इच्छा बताती हूं। मैं चाहती हूं कि भगवान श्री नारायण मुझे पति रूप में मिले।” ब्रह्मा ने कहा-“तुम्हारा अभीष्ट तुम्हें अवश्य मिलेगा। अपने पूर्व जन्म में किसी अपराध के कारण तुम्हें शाप मिला है। इसी प्रकार भगवान श्री नारायण के एक पार्षद को भी दानव-कुल में जन्म लेने का शाप मिला है। दानव कुल में जन्म ने के बाद भी उसमे नारायण का अंश विद्यमान रहेगा। इसलिए इस जन्म में पूर्व जन्म के पाप के शमन के लिए सम्पूर्ण नारायण तो नहीं, नारायण के अंश से युक्त दानव-कुल जन्मे उस शापग्रस्त पार्षद से तुम्हारा विवाह होगा। शाप-मुक्त होने पर भगवान श्री नारायण सदा सर्वदा के लिए तुम्हारे पति हो जायेंगे।” तुलसी ने ब्रह्मा के इस वर को स्वीकार किया, क्योंकि मानव-कुल में जन्म के कारण उसे मायावी भोग तो भोगना ही था। तुलसी बदरीवन में ही रहने लगी। नारायण का वह पार्षद दानव कुल में शंखचूड़ के नाम से पैदा हुआ था। कुछ दिनों के बाद वह भ्रमण करता हुआ बदरीवन में आया। यहां तुलसी को देखते ही वह उस पर मुग्ध हो गया। तुलसी के सामने उसने अपने साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। इतने में ही वहां ब्रह्मा जी आ गए और तुलसी से कहा-“तुलसी ! शंखचूड़ को देखो, कैसा देवोपम इसका स्वरूप है। दानव कुल में जन्म लेने के बाद भी लगता है जैसे इसके शरीर में नारायण का वास हो। तुम प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लो।” तुलसी को भी लगा कि उसकी तपस्या पूर्ण हुई। उसे इच्छित फल मिला है। शंखचूड़ के साथ उसका गांधर्व-विवाह हो गया और वह शंखचूड़ के साथ उसके महल में पत्नी बनकर आ गई। शंखचूड़ ने अपनी परम सुंदरी सती साध्वी पत्नी तुलसी के साथ बहुत दिनों तक राज्य किया। उसने अपने राज्य का इतना विस्तार किया कि देवलोक तक उसके अधिकार में आ गया। स्वर्ग का सुख भोगने वाले देवताओं की दशा भिखारियों जैसे हो गई। शंखचूड़ किसी को कष्ट नहीं देता था, पर अधिकार और राज्य छिन जाने से सारे देवता मिलकर ब्रह्मा,विष्णु और शिव की सभा में गए तथा अपनी विपत्ति सुनाई। ब्रह्मा जी ने कहा-“तुलसी परम साध्वी है। उसका विवाह शंखचूड़ से मैंने ही कराया था। शंखचूड़ को तब तक नहीं हराया या मारा जा सकता है जब तक तुलसी को न छला जाए।” विष्णु ने कहा -“शंखचूड़ पूर्व जन्म में मेरा पार्षद था। शाप के कारण उसे दैत्यकुल में जन्म लेना पड़ा। इस जन्म में भी मेरा अंश उसमे व्याप्त है। साथ ही तुलसी के पतिव्रत-धर्म से वह अजेय है।” फिर देवताओं की सहमति से भगवान शिव ने शंखचूड़ के पास सन्देश भेजा कि या तो वह देवताओं का राज्य लौटा दे, या फिर उनसे युद्ध करे। शंखचूड़ शंकर के पास पहुंचा। उसने कहा-“देवाधिदेव ! आपके लिए देवताओं का पक्ष लेना उचित नहीं है। राज्य बढ़ाना हर राजा का कर्तव्य है। मैं किसी को दुखी नहीं कर रहा हूं। देवताओं से कहिए वे मेरी प्रजा होकर रहे। मैंने आपका भी कोई अपकार नहीं किया है। हमारा आपका युद्ध शोभा नहीं देता। अगर आप हार गए तो बड़ी लज्जा की बात होगी। मैं हार गया तो आपकी कीर्ति बहुत अधिक नहीं बढ़ेगी।” भगवान शंकर हंसे। वे तो सब रहस्य समझते थे। तुलसी और शंखचूड़ के पूर्व-जन्म के शाप की अवधि लगभग पूरी हो चुकी थी। बोले- “इसमें कीर्ति और लज्जा की बात नहीं। तुम देवों का राज्य लौटाकर उन्हें उनके पद पर प्रतिष्ठित होने दो। युद्ध से बचने का यही एक उपाय है। ” शंखचूड़ ने कहा-“मैंने युद्ध के बल से देवलोक जीता है। कोई उसे युद्ध के द्वारा ही वापस ले सकता है। यह मेरा अंतिम उत्तर है। मैं जा रहा हूं।” ऐसा कहकर शंखचूड़ चला गया। उसने अपनी पत्नी तुलसी को सारी बात बताई और कहा-“कर्म-भोग सब काल-सूत्र में बंधा है। जीवन में हर्ष, शोक, भय, सुख-दुःख, मंगल-अमंगल काल के अधीन है। हम तो केवल निमित्त है। सम्भव है, भगवान शिव देवों का पक्ष लेकर मुझसे युद्ध करे। तुम चिंता मत करना। तुम्हारा सती तेज मेरी रक्षा करेगा।” दूसरे दिन भगवान शंकर के नेतृत्व में देवताओं ने युद्ध छेड़ दिया। शंखचूड़ ने भीषण वाणों की वर्षा कर उनका वेग रोका। उसके प्रहार से देवता डगमगाने लगे। उसने दानवी शक्ति का प्रयोग कर मायावी युद्ध आरम्भ किया। युद्ध स्थल पर वह किसी को दिखाई नहीं देता था, पर उसके अस्त्र-शस्त्र प्रहार कर देवों को घायल कर रहे थे। देवगण अपने अस्त्र चलाएं तो किस पर चलाएं, क्योंकि कोई शत्रु सामने था ही नहीं। कई दिनों तक इस तरह भयंकर युद्ध चला। शंखचूड़ पराजित नहीं हुआ। तब शिव ने विष्णु से कहा-“विष्णु ! कुछ उपाय करो, अन्यथा मेरा तो सारा यश मिट्टी में मिल जाएगा।” विष्णु ने सोचा-‘बल से तो शंखचूड़ को हराया नहीं जा सकता, इसलिए छल का सहारा लेना होगा। उन्होंने तुरन्त अपना स्वरूप शंखचूड़ जैसा बनाया और अस्त्र-शस्त्र से सज्जित हो तुलसी के पास आए, बोले-“प्रिये ! मैं युद्ध जीत गया। सारे देवता भगवान शंकर समेत हार गए। इस ख़ुशी में आओ मैं तुम्हे अंक से लगा लूं।” पति को प्रत्यक्ष खड़ा देख तथा विजय का समाचार सुन वह दौड़कर मायावी शंखचूड़ के गले से लिपट गई। इस प्रकार पति-पत्नी दोनों ने आलिंगन हो खूब ख़ुशी मनाई। पर-पुरुष के साथ इस प्रकार के व्यवहार से उसका सती-तेज नष्ट हो गया। उसका सती-तेज जो शंखचूड़ की कवच के रूप में रक्षा कर रहा था, वह कवच नष्ट हो गया। शंखचूड़ शक्तिहीन हो गया, यह जानते ही भगवान शंकर ने अपने त्रिशूल से प्रहार किया। त्रिशूल के लगते ही शंखचूड़ जलकर भस्म हो गया। शंखचूड़ के मरने को जानकर विष्णु अपने असली स्वरूप में आ गए। सामने अपने पति शंखचूड़ के स्थान पर भगवान विष्णु को खड़ा देख तुलसी बहुत विस्मित हुई। उसको पता लग गया कि स्वयं नारायण ने उसके साथ छल किया है।

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ब्राह्मण पुत्र होने के बाद भी परशुराम में क्यों थे क्षत्रियों के गुण

 यह तो हम सभी जानते है की भगवान परशुराम एक ब्राह्मण थे। लेकिन आचरण उनका क्षत्रियों जैसा था।ब्राह्मण पुत्र होते हुए भी परशुराम में क्षत्रियों के गुण क्यों थे, इसका जवाब जानने के लिए पढ़ते है यह पौराणिक प्रसंग  इसलिए परशुराम में थे क्षत्रियों के गुण महर्षि भृगु के पुत्र ऋचिक का विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती से हुआ था। विवाह के बाद सत्यवती ने अपने ससुर महर्षि भृगु से अपने व अपनी माता के लिए पुत्र की याचना की। तब महर्षि भृगु ने सत्यवती को दो फल दिए और कहा कि ऋतु स्नान के बाद तुम गूलर के वृक्ष का तथा तुम्हारी माता पीपल के वृक्ष का आलिंगन करने के बाद ये फल खा लेना। किंतु सत्यवती व उनकी मां ने भूलवश इस काम में गलती कर दी। यह बात महर्षि भृगु को पता चल गई। तब उन्होंने सत्यवती से कहा कि तूने गलत वृक्ष का आलिंगन किया है। इसलिए तेरा पुत्र ब्राह्मण होने पर भी क्षत्रिय गुणों वाला रहेगा और तेरी माता का पुत्र क्षत्रिय होने पर भी ब्राह्मणों की तरह आचरण करेगा। तब सत्यवती ने महर्षि भृगु से प्रार्थना की कि मेरा पुत्र क्षत्रिय गुणों वाला न हो भले ही मेरा पौत्र (पुत्र का पुत्र) ऐसा हो। महर्षि भृगु ने कहा कि ऐसा ही होगा। कुछ समय बाद जमदग्रि मुनि ने सत्यवती के गर्भ से जन्म लिया। इनका आचरण ऋषियों के समान ही था। इनका विवाह रेणुका से हुआ। मुनि जमदग्रि के चार पुत्र हुए। उनमें से परशुराम चौथे थे। इस प्रकार एक भूल के कारण भगवान परशुराम का स्वभाव क्षत्रियों के समान था।

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कब है चैत्र कालाष्टमी व्रत? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और उपाय

हिंदी कैलेंडर के अनुसार साल का दूसरा माह यानि वैशाख का महीना शुरू हो गया है. इस माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन कालाष्टमी व्रत रखा जाता है. इस व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है और इस दिन काल भैरव का पूजन किया जाता है. काल भैरव को रुद्रावतार कहा जाता है और तंत्र-मंत्र का देवता माना जाता है. कहते हैं कि इनका पूजन करने से व्यक्ति को सिद्धि प्राप्त होती है और कई प्रकार के भय भी दूर होते हैं. कालाष्टमी के दिन लोग व्रत-उपवास रखते हैं और विधि-विधान के साथ काल भैरव का पूजन करते हैं. आइए जानते हैं इस बार कब है कालाष्टमी व्रत और शुभ मुहूर्त. कालाष्टमी व्रत 2023 कब है? हिंदू पंचांग के अनुसार वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन कालाष्टमी व्रत रखा जाता है. इस बार यह तिथि 13 अप्रैल को सुबह 3 बजकर 44 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन 14 अप्रैल को 1 बजकर 34 मिनट पर होगा. काल भैरव का पूजन निशिता मुहूर्त में किया जाता है और अष्टमी तिथि में निशिता मुहूर्त 13 अप्रैल को है. इसलिए 13 अप्रैल को कालाष्टमी व्रत रखा जाएगा. कालाष्टमी व्रत 2023 शुभ मुहूर्त कालाष्टमी व्रत के दिन निशिता मुहूर्त में पूजन किया जाता है. निशिता मुहूर्त 13 अ्रप्रैल को रात 11 बजकर 59 मिनट से लेकर रात 12 बजकर 44 मिनट तक रहेगा. काल भैरव की पूजा के लिए यह शुभ मुहूर्त हैं. इसके अलावा आप दिन में किसी भी समय कालाष्टमी पूजन कर सकते हैं. कालाष्टमी व्रत का महत्व काल भैरव को भगवान शिव का रौद्र रूप माना जाता है.वह समस्त पापों और रोगों का नाश करने वाले हैं.हिंदू शास्त्रों के अनुसार कालाष्टमी के दिन श्रद्धापूर्वक वर्त रखने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है.इस दिन व्रत रखकर कुंडली में मौजूद राहु के दोष से भी मुक्ति मिलती है कालाष्टमी पूजा विधि इस दिन भैरव चालीसा का पाठ करना चाहिए. कालाष्टमी के पावन दिन पर कुत्ते को भोजन कराना चाहिए. ऐसा करने से भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं और सभी इच्छाओं को पूरा करते हैं भैरव बाबा का वाहन कुत्ता होता हैं इसलिए इस दिन कुत्ते को भोजन कराने से विशेष फल की प्राप्ति भक्तों को होती हैं.

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