April 2023

कौन थे सीता माता के दो भाई जिनका रामायण में नहीं मिलता जिक्र

हम सभी ने पढ़ा, सुना और देखा है कि माता सीता की तीन बहनें थीं लेकिन आज हम आपको माता सीता के उन भाइयों के बारे में बताने जा रहे हैं जिनका जिक्र रामयण में नहीं मिलता है।   रामायण में राजा जनक की चार पुत्रियों का वर्णन मिलता है जो कुछ इस प्रकार है- माता सीता, उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति। इस तथ्य से यह पता चलता है कि माता सीता की मात्र तीन बहनें ही थीं लेकिन कुछ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि माता सीता के दो भाई भी थे। हालांकि माता सीता के इन भाइयों के बार में रामयण में कोई भी बात वर्णित नहीं है। हमें बताया कि रामायण में भले ही माता सीता के भाइयों का उल्लेख नहीं मिलता है लेकिन अन्य ग्रंथों में माता सीता के भाइयों के नाम और उनके बारे में जानकारी दी गई हैं। तो चलिए जानते हैं कौन थे माता सीता के भाई। पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता सीता और श्री राम का विवाह तय हुआ था तब विवाह के समय ब्रह्महर्षि वशिष्ठ एवं राजर्षि विश्वामित्र उपस्थित थे। यहां तक कि श्री राम  और मात सीता का विवाह देखने स्वयं ब्रह्मा, विष्णु एवं रूद्र ब्राह्मणों के वेश में आए थे। दूसरी ओर सभी देवी और देवता भी विभिन्न वेश में विवाह के दौरान उपस्थित थे। विवाह का मंत्रोच्चार चल रहा था और उसी बीच कन्या के भाई द्वारा की जाने वाली रस्म की बारी आई। इस रस्म में कन्या का भाई कन्या के आगे-आगे चलते हुए लावे का छिड़काव करता है। विवाह करवाने वाले पुरोहित ने जब इस प्रथा के लिए कन्या के भाई को बुलाने के लिए कहा तो वहां समस्या खड़ी हो गई, क्योंकि उस समय तक जनक का कोई पुत्र नहीं था।   ऐसे में सभी एक दूसरे से विचार करने लगे। इसके चलते विवाह में विलंब होने लगा। अपनी पुत्री के विवाह में इस प्रकार विलम्ब होता देखकर पृथ्वी माता भी दुखी हो गयी। तभी विवाह के समारोह के बीच एक रक्तवर्ण का युवक उठा और इस रस्म को पूरा करने के लिए आकर खड़ा हो गया। उस युवक ने राजा जनक से माता सीता के भाई द्वारा की जाने वाली रस्म निभाने का आग्रह किया।  असल में वह और कोई नहीं बल्कि स्वयं मंगलदेव थे जो वेश बदलकर नवग्रहों सहित श्रीरामचन्द्र और सीता का विवाह देखने हेतु वहां उपस्थित हुए थे। चूंकि माता सीता का जन्म पृथ्वी से हुआ और मंगल भी पृथ्वी के पुत्र थे। इसी सम्बन्ध से मंगलदेव माता सीता के भाई भी लगते थे। इसी कारण पृथ्वी माता के संकेत से वे इस विधि को पूर्ण करने के लिए आगे आए। वहीं, अन्य पौराणिक कथा के अनुसार राजा जनक के छोटे भाई के पुत्र थे लक्ष्मीनिधि जो रिश्ते में मात सीता के भाई लगते थे। तो इस प्रकार माता सीता के दो भाई थे एक मंगल और दूसरे लक्ष्मी निधि। हालांकि मंगल ग्रह के माता सीता के भाई होने पर सनातनियों द्वारा पुष्टि की गई है लेकिन लक्ष्मीनिधि नामक भाई के बारे में कोई खास प्रमाण नहीं मिलता है।  तो ये थे माता सीता के वो दो भाई जिनका जिक्र रामायण में साक्षात रूप से नहीं मिलता है। अगर हमारी स्टोरीज से जुड़े आपके कुछ सवाल हैं, तो वो आप हमें आर्टिकल के नीचे दिए कमेंट बॉक्स में बताएं। हम आप तक सही जानकारी पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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कब है सीता नवमी? जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

माता सीता के जन्मोत्सव को हर साल सीता नवमी के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में आइये जानते हैं सीता नवमी की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व के बारे में।      हिन्दू धर्म में माता सीता को पतित-पावना और पतिव्रता स्त्री का सर्वोच्च उदाहरण माना गया है। वहीं, इसके अलावा माता सीता मां लक्ष्मी का भी अवतार मानी जाती हैं। माता सीता के जन्मोत्सव को हर साल सीता नवमी के रूप में मनाया जाता है। कि सीता नवमी इस बार कब पड़ रही है और साथ ही जानेंगे शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व के बारे में।  भगवान शिव ने किया था विष्णु जी के पुत्रों का वध, जानें पौराणिक कथा सीता नवमी 2023 कब है वैशाख शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि का शुभारंभ 28 अप्रैल, दिन शुक्रवार को शाम 4 बजकर 1 मिनट से हो रहा है। वहीं, इसका समापन 29 अप्रैल, दिन शनिवार को शाम 6 बजकर 22 मिनट से हो रहा है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, इस साल सीता नवमी 29 अप्रैल को मनाई जाएगी।  सीता नवमी 2023 पूजा विधि (Sita Navami 2023 Puja Vidhi) सीता नवमी की पूजा अष्टमी से शुरू हो जाती है।  अष्टमी के दिन सुबह उठकर गंगाजल से भूमि पर छिड़काव किया जाता है।  फिर एक मंडप लगाया जाता है। मंडप को पूर्ण रूप से सजाया जाता सीता नवमीसीता नवमीहै।  मंडप के पीच में एक चौकी पर लाल कपड़ा रख दिया जाता है।  नवमी की पूजा तक मंडप वाली जगह पर बिना शुद्धि के जाना मना होता है। सीता नवमी के दिन प्रातः उठकर स्नान किया जाता है।  फिर स्वच्छ वस्त्र धारण कर माता सीता की प्रतिमा को मंडप में लाया जाता है।  मूर्ति के स्थान पर आप तस्वीर भी मंडप में ला सकते हैं।  मात सीता को मंडप के बीचों बीच चौकी पर स्थापित किया जाता है।  फिर मां का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लिया जाता है।  मां सीता का अभिषेक कर उनका श्रृंगार किया जाता है।  माता सीता को पुष्प, फल, फूल, अक्षत और सुहाग का सामान अर्पित करते हैं।  फिर मां सीता को भोग लगाया जाता है और माता सीता के मंत्रों का जाप किया जाता है।  अंत में आरती करने के बाद माता सीता का प्रसाद परिवार में बांटा जाता है। व्रत पूरा होने के बाद दशमी के दिन मंडप को पवित्र नदी में विसर्जित किया जाता है। सीता नवमी का महत्व सीता नवमी का व्रत सुहागिनों और अविवाहिताओं दोनों के द्वारा रखा जाता है। मान्यता है कि सीता नवमी का व्रत रखने से शादीशुदा महिलाओं का वैवाहिक जीवन मधुर हो जाता है और उनके वैवाहिक जीवन के कष्ट भी दूर होते हैं। साथ ही, कुंवारी कन्याओं द्वारा व्रत रखने और माता सीता की पूजा करने से मनवांछित वर की प्राप्ति होती है और जीवन सुख-समृद्धिमय बीतता है।  तो ये थी सीता नवमी से जुड़ी समस्त जानकारी। अगर हमारी स्टोरीज से जुड़े आपके कुछ सवाल हैं, तो वो आप हमें आर्टिकल के नीचे दिए कमेंट बॉक्स में बताएं। हम आप तक सही जानकारी पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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चातुर्मास कथा:-भगवान विष्णु आखिर चार महीने योग निंद्रा में क्यों जाते हैं

चातुर्मास से जुड़ी एक कथाभगवान विष्णु ने देवमाता अदिति और कश्यप ऋषि के घर एक ब्राह्मण बालक के रूप में जन्म लिया था. यह भगवान विष्णु का वामन अवतार था. य​​ह घटना उस समय की है, जब असुरों के राजा बलि ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया. स्वर्ग पर फिर से देवतों का अधिपत्य हो, इसके लिए भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया श्रीविष्णु के पास इस संसार के पालन का जिम्मा है और वो अपनी माया के माध्यम से इस संसार का संचालन करते हैं, लेकिन चार महीने के लिए श्रीविष्णु योग निंद्रा में चले जाते है। सनातन धर्म में भगवान विष्णु को समस्त देवताओं का स्वामी माना गया है। देवासुर संग्राम में भी स्वयं भगवान विष्णु देवताओं की सहायता करते हैं ऐसा पुराणों में उल्लेख है। भागवत पुराण के अनुसार जितने भी दिव्य संत, साधु, मुनि इस धरती पर जन्म लेते हैं वो सब विष्णु के अवतार हैं। राम, कृष्ण, परशुराम ये सब भी विष्णु के ही अवतार कहे जाते हैं। श्री विष्णु क्षीर सागर में निवास करते हैं और लक्ष्मी उनकी सेवा में रहती हैं। भगवान कौस्तुक मणि को धारण करते हैं और सर्प पर शयन करते हैं। उनका वाहन गरुड़ और चार भुजाएं हैं। श्री विष्णु के पास इस संसार के पालन का जिम्मा है और वो अपनी माया के माध्यम से इस संसार का संचालन करते हैं, लेकिन चार महीने के लिए श्रीविष्णु योग निंद्रा में चले जाते है। दरअसल धर्म ग्रन्थों की माने तो आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक की अवधि को चार्तुमास कहा जाता है और इन चार महीनों में श्री विष्णु निंद्रा में चले जाते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है क्योंकि इसी दिन से देवताओं की रात शुरू होती है। इसके अलावा कार्तिक शुक्ल एकादशी को देवउठनी एकादशी कहा जाता है और उसके बाद मांगलिक कार्य शुरू होते है। इन चार महीनों में जितने भी मांगलिक कार्य है वो सब निषेध होते हैं। भगवान विष्णु के निंद्रा में जाने के संदर्भ में दो मत है। पौराणिक कथा- बालि संग पाताललोक में करते हैं निवास एक मत यह है कि वे क्षीर सागर में ही निंद्रा में होते हैं और दूसरा मत यह है कि वो पाताललोक में बालि के यहां निवास करते हैं जिन्हे संकर्षण विष्णु कहा जाता है। दरअसल जब विष्णु ने वामन अवतार लिया तो बालि से उन्होंने तीन पग भूमि मांगी। दो पग में उन्होंने पूरा संसार मापकर तीसरा पग बालि के सिर पर रखकर उसे पाताल भेज दिया, लेकिन वरदान के रूप में बालि ने विष्णु को ही मांग लिया। वरदान के कारण स्वयं विष्णु जब पाताल में बालि के साथ चले गए तो सभी मंगल कार्य बंद हो गए। इसके बाद खुद लक्ष्मी ने बालि को राखी बांधकर भगवान विष्णु को मुक्त करने का वचन लिया। तभी से विष्णु चार महीने बालि के पास निवास करने लगे और उन चार महीनों को चार्तुमास कहा जाने लगा। माना जाता है कि इन चार महीनों में शिव स्वयं सृष्टि की देखभाल करते हैं। श्री विष्णु मत्स्य अवतार पौराणिक कथा भगवान विष्णु योगनिद्रा को दिए वचन का करते हैं पालन एक दूसरी कथा के अनुसार योग माया जोकि सृष्टि का संचालन करती हैं, उन्होंने श्रीविष्णु से कहा कि आप मुझे भी अपने शरीर में स्थान दें। योग निंद्रा भगवान विष्णु के सृष्टि संचालन में उनकी सहायता करती हैं तो श्रीविष्णु उनसे मना नहीं कर पाए। श्रीविष्णु ने योग निंद्रा को आँखों में स्थान दे दिया और इसी मत के अनुसार इन चार महीनों में श्रीविष्णु रहते तो क्षीर सागर में ही है लेकिन वो योग निंद्रा में चले जाते है जिसके कारण कोई भी मांगलिक कार्य संभव नहीं है। चातुर्मास का जैन धर्म में महत्व इन चार महीनों का जैन और बौद्ध धर्म में भी बड़ा महत्व बताया गया है। अगर आप जैन मुनियों को देखें तो वो सारा वर्ष भ्रमण करते हैं, लेकिन इन चार महीनों में वो एक ही स्थान पर रहकर सभी नियमों का पालन करते हैं। पुराणों के अनुसार आषाढ़ में वामन पूजा, श्रावण में शिव पूजा, भाद्रपद में गणेश और श्रीकृष्ण की पूजा की जाती है। इन चार महीनों में धर्म, जप और तप का बड़ा महत्व कहा गया है। ये चार माह मनुष्य को भगवान की सेवा करने में, उनकी कथा सुनने में और उनकी भक्ति करने में बिताने चाहिए।

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भगवान शिव ने किया था विष्णु जी के पुत्रों का वध, जानें पौराणिक कथा

शिव ने लिया वृषभ अवतार और किया संहारदेवताओं और मनुष्‍यों की गुहार पर भोलेनाथ ने वृषभ यानी कि बैल अवतार धारण किया और पाताल लोक पहुंच गए। इसके बाद उन्‍होंने एक-एक करके भगवान विष्‍णु के सभी पुत्रों का संहार कर दिया। इस तरह उन्‍होंने तीनों लोकों को विष्‍णु के दानवीय पुत्रों के आतंक से बचाया। हिंदू धर्म में गुरुवार के दिन भगवान विष्णु की पूजा के लिए बेहद खास माना जाता है. कहते हैं सच्चे मन से उनकी पूजा करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं भगवान विष्णु जरूर पूरा करते हैं. हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार गुरुवार को भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करने से जीवन के सभी संकटों से छुटकारा मिलता है. भगवान विष्णु जगत के पालनहार कहलाते हैं. मान्यता है कि गुरुवार के दिन अगर भक्त विष्णु जी की विधिवत पूजा करते हैं और गुरुवार के उपायों को आजमाते हैं तो उनके जीवन में किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं रहती है. शिव पुराण में एक कथा यह मिलती है कि तीनों लोकों को दानवों से बचाने के लिए भोलेनाथ ने भगवान विष्‍णु के पुत्रों का संहार किया था. आइए जानते हैं ये संपूर्ण कथा. शिवपुराण के अनुसार अमृत मंथन के दौरान समुद्र से निकले अमृत को धारण करने के लिए देवताओं और दानवों के बीच भीषण युद्ध हुआ. इसपर विराम लगाने के लिए भगवान विष्‍णु मोहिनी का रूप लेक पहुंचें. दानवों ने जब मोहिनी का इतना सुंदर रूप देखा तो वह उस पर मोहित हो उठे. मोहिनी का रूप बनाए हुए भगवान विष्‍णु ने दानवों को छल से अमृत का पान करने से रोक लिया. इससे दुखी होकर दानव फिर से देवताओं के साथ युद्ध करने लगे लेकिन उनकी एक न चली. अपनी हार देखते हुए देवता पाताल लोक की ओर चले गए. श्री विष्‍णु ने वहां भी उनका पीछा किया. भगवान विष्णु जब दानवों के पीछे पाताल लोक पहुंचें तो उन्‍होंने देखा कि उनकी कैद में कुछ अप्‍सराएं थीं. वह सभी शिव भक्‍त थीं. भगवान विष्‍णु ने उन्‍हें दानवों से मुक्‍त कराया. उनके अनुपम मनमोहक छवि को देखकर सभी अप्‍सराएं मोहित हो गईं. अप्‍सराओं ने भगवान शिव की अनन्‍य भक्ति की. साथ ही वरदान में विष्‍णु जी को पति रूप में मांगा. भोलेनाथ ने माया रची और भगवान विष्‍णु को उनका पति बना दिया. कथा के अनुसार विवाह के बाद कुछ दिनों तक भगवान विष्णु पाताल लोक में ही रुके. इसके बाद उन अप्‍सराओं से विष्‍णु के पुत्रों का जन्‍म हुआ लेकिन सभी में दानवीय अवगुण थे. धीरे-धीरे उन पुत्रों ने तीनों लोकों में आतंक मचाना शुरू कर दिया. देवता-मनुष्‍य सभी परेशान होकर भोलेनाथ की शरण में पहुंचे. देवताओं और मनुष्‍यों की गुहार पर भोलेनाथ ने वृषभ यानी कि बैल अवतार धारण किया और पाताल लोक पहुंच गए. इसके बाद उन्‍होंने एक-एक करके भगवान विष्‍णु के सभी पुत्रों का संहार कर दिया. इस तरह उन्‍होंने तीनों लोकों को विष्‍णु के दानवीय पुत्रों के आतंक से बचाया. शिवपुराण की कथा के अनुसार जैसे ही भगवान विष्‍णु को वृषभ द्वारा अपने पुत्रों के संहार की खबर मिली तो वह अत्‍यंत क्रोधित हो गए. क्रोध में ही वह वृषभ से लड़ने पहुंच गए लेकिन दोनों ही देवता थे तो लड़ाई का अंत नहीं हो रहा था. तब अप्‍सराओं ने भगवान शिव से विष्‍णु जी को उनके वरदान से मुक्‍त करने की प्रार्थना की. जैसे ही भगवान विष्णु अपने वास्‍तविक रूप में आए तो उन्‍हें संपूर्ण घटनाक्रम का बोध हुआ. इसके बाद उन्‍होंने शिव जी से अपने लोक जाने की आज्ञा मांगी और वापस विष्‍णुलोक लौट गए.

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श्री विष्णु मत्स्य अवतार पौराणिक कथा

मत्स्यावतार (मत्स्य = मछली का) भगवान विष्णु का अवतार है जो उनके दस अवतारों में से प्रथम है। इस अवतार में भगवान विष्णु ने इस संसार को भयानक जल प्रलय से बचाया था। साथ ही उन्होंने हयग्रीव नामक दैत्य का भी वध किया था जिसने वेदों को चुराकर सागर की गहराई में छिपा दिया था एक बार ब्रह्मा जी के पास से वेदों को एक बहुत बड़े दैत्य हयग्रीव ने चुरा लिया। चारों ओर अज्ञानता का अंधकार फैल गया और पाप तथा अधर्म का बोल-बाला हो गया। तब भगवान ने धर्म की रक्षा के लिए मत्स्य रूप धारण करके उस दैत्य का वध किया और वेदों की रक्षा की। कल्पांत के पूर्व एक पुण्यात्मा राजा तप कर रहा था। राजा का नाम सत्यव्रत था। सत्यव्रत पुण्यात्मा तो था ही, बड़े उदार हृदय का भी था। प्रभात का समय था, सूर्योदय हो चुका था। सत्यव्रत कृतमाला नदी में स्नान कर रहा था। उसने स्नान करने के पश्चात् जब तर्पण के लिए अंजलि में जल लिया, तो अंजलि में जल के साथ एक छोटी-सी मछली भी आ गई। जैसे ही सत्यव्रत ने मछली को नदी के जल में छोड़ना चाहा, मछली बोली: राजन! जल के बड़े-बड़े जीव छोटे-छोटे जीवों को मारकर खा जाते हैं। अवश्य कोई बड़ा जीव मुझे भी मारकर खा जायेगा। कृपा करके मेरे प्राणों की रक्षा कीजिए। सत्यव्रत के हृदय में दया उत्पन्न हो उठी। उसने मछली को जल से भरे हुए अपने कमंडलु में डाल लिया। एक रात में मछली का शरीर इतना बढ़ गया कि कमंडलु उसके रहने के लिए छोटा पड़ने लगा। इसी तरह राजा जिस भी पात्र में उस मछली को रखते वही छोटा हो जाता और मछली का आकार बढ़ता जाता। तब सत्यव्रत ने मछली को निकालकर एक सरोवर में डाल किया, किंतु सरोवर भी मछली के लिए छोटा पड़ गया। इसके बाद सत्यव्रत ने मछली को नदी में और फिर उसके बाद समुद्र में डाल किया। आश्चर्य! समुद्र में भी मछली का शरीर इतना अधिक बढ़ गया कि मछली के रहने के लिए वह छोटा पड़ गया। अतः मछली पुनः सत्यव्रत से बोली: राजन! यह समुद्र भी मेरे रहने के लिए उपयुक्त नहीं है। मेरे रहने की व्यवस्था कहीं और कीजिए। सत्यव्रत विस्मित हो उठा। उसने आज तक ऐसी मछली कभी नहीं देखी थी। वह विस्मय-भरे स्वर में बोला: मेरी बुद्धि को विस्मय के सागर में डुबो देने वाले आप कौन हैं? आपका शरीर जिस गति से प्रतिदिन बढ़ता है, उसे दृष्टि में रखते हुए बिना किसी संदेह के कहा जा सकता है कि आप अवश्य परमात्मा हैं। यदि यह बात सत्य है, तो कृपा करके बताइये के आपने मत्स्य का रूप क्यों धारण किया है? सचमुच, वह भगवान श्रीहरि ही थे। मत्स्य रूपधारी श्रीहरि ने उत्तर दिया: राजन! एक दैत्य ने वेदों को चुरा लिया है। जगत् में चारों ओर अज्ञान और अधर्म का अंधकार फैला हुआ है। मैंने हयग्रीव को मारने के लिए ही मत्स्य का रूप धारण किया है। आज से सातवें दिन सारी पृथ्वी पानी में डूब जाएगी। जल के अतिरिक्त कहीं कुछ भी दृष्टिगोचर नहीं होगा। आपके पास एक नाव पहुंचेगी, आप सभी अनाजों और औषधियों के बीजों को लेकर सप्तऋषियों के साथ नाव पर बैठ जाइयेगा। मैं उसी समय आपको पुनः दिखाई पड़ूंगा और आपको आत्मतत्त्व का ज्ञान प्रदान करूंगा। सत्यव्रत उसी दिन से हरि का स्मरण करते हुए प्रलय की प्रतीक्षा करने लगे। सातवें दिन प्रलय का दृश्य उपस्थित हो उठा। जल उमड़कर अपनी सीमा से बाहर बहने लगा। भयानक वृष्टि होने लगी। थोड़ी ही देर में जल ही जल हो गया। संपूर्ण पृथ्वी जल में समा गई। उसी समय एक नाव दिखाई पड़ी। सत्यव्रत सप्तऋषियों के साथ उस नाव पर बैठ गए, उन्होंने नाव के ऊपर संपूर्ण अनाजों और औषधियों के बीज भी भर लिए। नाव प्रलय के सागर में तैरने लगी। प्रलय के उस सागर में उस नाव के अतिरिक्त कहीं भी कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था। सहसा मत्स्यरूपी भगवान प्रलय के सागर में दिखाई पड़े। सत्यव्रत और सप्तर्षिगण मतस्य रूपी भगवान की प्रार्थना करने लगे: हे प्रभो! आप ही सृष्टि के आदि हैं, आप ही पालक है और आप ही रक्षक ही हैं। दया करके हमें अपनी शरण में लीजिए, हमारी रक्षा कीजिए। सत्यव्रत और सप्तऋषियों की प्रार्थना पर मत्स्यरूपी भगवान प्रसन्न हो उठे। उन्होंने अपने वचन के अनुसार सत्यव्रत को आत्मज्ञान प्रदान किया और बताया: सभी प्राणियों मे, मैं ही निवास करता हूं। न कोई ऊंच है, न नीच, सभी प्राणी एक समान हैं, जगत् नश्वर है। नश्वर जगत् में मेरे अतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है। जो प्राणी मुझे सबमें देखता हुआ जीवन व्यतीत करता है, वह अंत में मुझमें ही मिल जाता है। मत्स्य रूपी भगवान से आत्मज्ञान पाकर सत्यव्रत का जीवन धन्य हो उठा। वे जीते जी ही जीवन मुक्त हो गए। प्रलय का प्रकोप शांत होने पर मत्स्य रूपी भगवान ने उस दैत्य को मारकर, उससे वेद छीन लिए। भगवान ने ब्रह्मा जी को पुनः वेद दे दिए।

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बहुत सरल हैं केले के पेड़ के 4 उपाय, कभी नहीं होगी आर्थिक तंगी, जेब रहेगी हमेशा गर्म

बहुत से ऐसे पेड़-पौधे हैं, जिन्हें हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है. लोग इन पेड़-पौधों की पूजा-अर्चना करते हैं. मान्यता है कि इन पेड़-पौधों में भगवान का वास होता है. इनमें प्रमुख हैं, तुलसी का पौधा, पीपल का वृक्ष, आंवला वृक्ष, केले का पेड़ आदि. इन वृक्षों का पूजन करना हिंदू धर्म में बहुत लाभकारी बताया जाता है. धर्म शास्त्रों केले के पेड़ को खास महत्व दिया गया है. माना गया है कि केले के पेड़ में भगवान विष्णु का वास होता है और इसके पत्तों और जड़ों में देव गुरु बृहस्पति का. गुरुवार के दिन विधि-विधान से केले के पेड़ की पूजा की जाए तो व्यक्ति की सभी परेशानियां दूर हो सकती हैं और मनोकामनाएं पूरी हो सकती हैं. केले के पेड़ की उपयोगिता के बारे में बता रहे है केले के पेड़ के उपाय 1. माना जाता है कि यदि आपके घर में केले का पेड़ सही दिशा में लगा हो तो आपको जीवन में कभी भी दुख और दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ेगा. साथ ही यदि केले के पेड़ से जुड़े कुछ उपाय करें, तो यह आपके लिए बेहद लाभकारी साबित होगा. 2. हिंदू धर्म शास्त्रों के अनुसार, गुरुवार के दिन केले के पेड़ का पूजन करने से जीवन में आ रही आर्थिक समस्याओं से मुक्ति मिलती है. साथ ही घर में सुख-समृद्धि और खुशियां आती हैं. 3. यदि आप भी अपने घर में सुख-समृद्धि और धन दौलत की चाह रखते हैं. तो इसके लिए आप अपने घर में चुपचाप से केले के पेड़ की जड़ लाकर रख दें. इसके बाद इसे गंगाजल से धोकर इसपर पीले रंग का धागा बांध दें. केले की इस जड़ को घर की तिजोरी या अपने धन स्थान पर रखें. माना जाता है कि इस उपाय को यदि गुरुवार के दिन किया जाए तो ये ज्यादा लाभकारी सिद्ध होता है. 4. ज्योतिष शास्त्र में बताया गया है कि गुरुवार के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर पीले रंग के वस्त्र धारण कर केले के पेड़ के पास जाकर, अपनी मनोकामना कहें. ध्यान रखें इस दौरान आपको कोई रोक-टोक ना करें. माना जाता है कि ऐसा करने से जल्द ही आपकी मनोकामना पूर्ण होगी.

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क्‍या आप जानते हैं पूजा में केले के पत्तों को क्यों इतना महत्व दिया जाता है

केले के फल, तना और पत्तों को हमारे पूजा विधान में अनेक तरह से उपयोग किया जाता है. इसे शुभ और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है. यह भी मान्यता है कि केले जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व हिन्दू धर्म में भगवान की पूजा करते समय नियमों के पालन के साथ ही पूजा सामग्री का उपस्थित होना बेहद महत्वपूर्ण है। इसी पूजा सामग्री में खास वस्तु है केले का पत्ता और पान का पत्ता। आगे की स्लाइड्स पर क्लिक करें और जानें इन दोनों पत्तों का पूजा में महत्व जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व केले का वृक्ष शुभ और संपन्नता का प्रतीक है। यही वजह है कि केले का पौधा, हिंदू धर्म में काफी पवित्र माना जाता है। कहते हैं केले के वृक्ष में साक्षात भगवान विष्णु का वास होता है। भगवत पूजा में इसका उपयोग करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को केले का भोग लगाया जाता है और केले के पत्तों में प्रसाद बांटा जाता है। माना जाता है कि समृद्धि के लिए केले के पेड़ की पूजा अच्छी होती है। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व गुरुवार को भगवान बृहस्पतिदेव की पूजा में केले का विशेष महत्व है। इतना ही नहीं केले के पत्ते पर भोजन ग्रहण करने वाले को उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व केले के पत्तों को घर के प्रवेश द्वार पर शादी विवाह और कथा के दौरान मंडप बनाने के काम में भी लाया जाता है। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व किसी भी शुभ कार्य से पहले या पूजा पाठ के दौरान पान के पत्ते के जरिये भगवान का नमन किया जाता है। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पान के एक पत्ते में विभिन्न देवी-देवताओं का वास है। स्कंद पुराण के मुताबिक देवताओं द्वारा समुद्र मंथन के समय पान के पत्ते का प्रयोग किया गया था। यही वजह है कि पूजा में पान के पत्ते के इस्तेमाल का विशेष महत्व है। जानें, पूजा में केले और पान के पत्ते का महत्व पूजा में इस्तेमाल होने वाला पान का पत्ता हमेशा सही सलामत रूप में, चमकदार और कहीं से भी सूखा नहीं होना चाहिए। नहीं तो इससे व्यक्ति की पूजा साकार नहीं होती।

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केले के पेड़ के बारे में जानकारी और कथा जाने

पौराणिक कथाओं के अनुसार केले के पेड़ की बहुत बड़ी अहमियत है। इस पेड़ को बहुत पवित्र माना जाता है। भगवान विष्णु और देव गुरू वृहस्पति को केले के पेड़ से जोड़ कर देखा जाता है। विष्णुजी को और पूजन कार्यो में इसका भोग लगाया जाता है। और ज्यादातर दक्षिण भारत में इसका बहुत ही बड़ा महत्व है। वहाँ इसके पत्तों मे भोजन करने का भी प्रचलन है। आइए जानते हैं इसके बारे में जानकारी  प्रतिबंध के पेड़ की जानकारी केले के पेड़ का हर हिस्सा काम मे आता है, इसके फल हर महीने मिल जाते हैं। यह पेड़ नहीं है क्योंकि इसमे लकड़ी नहीं होती है, लेकिन पत्तों से ही तना बना होता है। किनारों उसमे लिपटे होते हैं। इस पेड़ की जिंदगी तब तक होती है जब तक उसमे फल नहीं लग जाते, फल लगते ही और पकते ही इस पेड़ को काट दिया जाता है। विज्ञान के अनुसार इसका लाभ विज्ञान के अनुसार इस मे मुख्य तो विटामिन – ए, विटामिन – सी, थायमिन, राईबो- फ्लेविन, नियासिन और अन्य खनिज पदार्थ होते हैं। इसमे जल की मात्रा – 64.3%, प्रोटीन – 1.3%, कार्बोहाइड्रेट – 24.7% और चिकनाई – 8.3% हैं। केले के आयुर्वेदिक लाभ केले का एक एसा फल है जो हर मौसम में मिलता है। यह अत्यंत मधुर और पोष्टिक फल है। केला बहुत शक्तिशाली, मधुर, वीर्य और मांस बढ़ाने वाला फल हैं। यह दृष्टि दोष मे भी हितकारी है। पके केले के नियमित सेवन करने से शारीरिक कमज़ोरी दूर होती है और शरीर पुष्ट रहता है। यह कफ, रक्त पित्त, वात को नष्ट करता है। केले के वास्तु टिप्स घर के मुख्य द्वार और पिछले हिस्से में प्रतिबंध के पेड़ को ना लगाया गया। प्रतिबंध के पेड़ के आसपास साफ – सफाई रखी गई। गुरुवार को केले के पेड़ की पूजा करने से गुरु ग्रह से संबंधित समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है। इसकी पूजा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। आइए जानते हैं इसके ज्योतिषी लाभ – इसमे गुरु ग्रह का वास होता है जिससे इसकी पूजा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। गुरुवार के गुरुवार को इसकी पूजा करने से गुरु ग्रह बलवान होता है। जिससे वैवाहिक जीवन में आने वाले सभी विधाओं से दूर हो जाता है। और सन्तान संबंधी समस्याओं से भी मुक्ति मिलती है। उच्च शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति मे भी सहायता मिलती है। धन संबंधी परेशानियां दूर हो जाती है।  आइए जानते हैं केले के पेड़ की कथा पौराणिक कथाओं और शिव महापुराण में वर्णित कथा के अनुसार एक बार देव राज इंद्र और देव गुरू वृहस्पति को अभिमान आ गया. दोनों को अभिमान अपने अपने पद को लेकर, वृहस्पति को अभिमान हुआ कि मे देव गुरु हूं, और इंद्र को अभिमान हुआ कि मैं देव राज हू. इसी अभिमान वस दोनों में चर्चा हुई  कि सभी देवी-देवता हमारा सत्कार करते हैं, हमे प्रणाम करते हैं लेकिन महादेव शंकर हमारा सत्कार नहीं करते, हमे प्रणाम नहीं किया करते. दोनों ने अभिमान के वस मे यह बात कही, अब तो शिव जी से बात करनी ही पड़ेगी. यह कहते हुए दोनों (इंद्र और वृहस्पति) शिव जी से बात करने के लिए कैलाश पर्वत की ओर चल पड़े उधर भगवान शिव ने दोनों (इंद्र और वृहस्पति) की बातों को भाप लिया और अपना फक्कड़ (भिकारी) का भेष बनाकर कैलाश पर्वत के बाहर बैठ गए. जैसे ही इंद्र और वृहस्पति  दोनों कैलाश पर्वत पहुंचे भगवान शिव से मिलने तो उन्होंने कैलाश पर्वत के बाहर बैठे भिखारि को देख कर, उससे कहा कि कहां है तेरा भोला शिव जा और उससे बोल की देवराज और देवगुरु आए हैं, आकार उनका सत्कार करो, लेकिन उस भिखारि ने कोई जवाब नहीं दिया. इंद्र और वृहस्पति के बार बार कहने पर भी जब भिखारि ने कोई जवाब नहीं दिया तो अभिमान से भरे हुए इंद्र और वृहस्पति को क्रोध आ गया. और इंद्र ने भिखारि के बाल पकड़कर उस पर बज्र का प्रहार कर दिया. इंद्र के बज्र से प्रहार करते ही भिखारि के भेष लिए स्वयं शिव के आँखों में से आंसू आ गए. और आंसू आते ही शिव असली रूप मे आ गए और दोनों को श्राप दे दिया. इंद्र को श्राप दिया कि हे इंद्र तू देवताओ का राजा होते हुए भी अभिमानी है, अतः तेरा राज्य दैत्यों के द्वारा छीन लिया जाएगा. और वृहस्पति को श्राप दिया कि हे वृहस्पति तू गुरु है, तेरे पास प्रेम और त्याग नाम की कोई वस्तु नहीं है, तू ज्ञानी होते हुए भी तेरी बुद्धी जड़ के समान है, अतः मैं तुझे श्राप देता हूं कि आज से तू जड़ वृक्ष बन जाए. श्राप मिलते ही इंद्र और वृहस्पति को ज्ञान हुआ, उनकी बुद्धी मे लगा अभिमान का पर्दा हटा और उनको एहसास हुआ कि ये हमने क्या कर दिया, दोनों महादेव शिव के चरणों में घिर गए और अपने किए हुए कृत्य के लिए क्षमा मांगने लग गए. तब शिव जी ने दोनों को क्षमा किया और दोनों को अपने चरणों से उठाकर कहा कि मेरा दिया हुआ श्राप तो झूठा नहीं हो सकता है. लेकिन हे इंद्र जब जब भी दानव तेरा राज्य छीन लेंगे तो तब तब हम देव (मैं शिव और विष्णु) तेरा राज्य दानवों से बचा लेंगे. और वृहस्पति से कहा कि हे वृहस्पति मेरे श्राप के कारण तू जड़ वृक्ष तो बनेगा, पर मैं शिव तुझे आशीर्वाद देता हूं कि तेरा वृक्ष सर्वश्रेष्ठ वृक्ष होगा और वह केले के पेड़ के नाम से प्रसिद्ध होगा. वह एसा वृक्ष होगा कि ना अग्नि उसे जला सकेगी और ना पानी उसे गला सकेगा और तेरा फल बारह मास में उपलब्ध होता रहेगा. और लोग इसकी पूजा करेंगे और इसमे स्वयं भगवान विष्णु का निवास होगा. तब से ही देवगुरु वृहस्पति पेड़ के रूप में प्रकट हुए और केले के पेड़ के रूप में सदा के लिए पुज्य हुए.

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शिवलिंग क्या है ? जानिए शिव लिंग के बारे में 12 चीज़ें

शिवलिंग एक ऊर्जा का स्वरुप है जिसमें एक या एक से ज्यादा चक्र मौजूद होते हैं। ज़्यादातर ज्योतिर्लिंग में एक या दो चक्र प्रतिष्ठित हैं। ध्यानलिंग में सभी सातों चक्र परम तक प्रतिष्ठित हैं। शिवलिंग का मतलब लिंग शब्द का मतलब है “आकार”। हम इसे “आकार” इसलिए कह रहे हैं क्योंकि जो अप्रकट है, वो जब खुद को प्रकट करने लगता है, या दूसरे शब्दों में कहें तो जब सृष्टि की उत्पत्ति शुरु हुई तो जो सबसे पहला आकार इसने लिया था, वो एक दीर्घवृताकार था । एक पूर्ण दीर्घवृत्त या इल्लिप्स को हम एक लिंग कहते हैं। सृष्टी की शुरुआत हमेशा एक दीर्घवृत्त या एक लिंग के रूप में हुई और उसके बाद ये कई रूपों में प्रकट हुई। और हम अपने अनुभव से यह जानते हैं कि जब आप ध्यान की गहरी अवस्था में जाते हैं तो पूर्ण विलीन होने वाला बिंदु आने से पहले ऊर्जा एक बार फिर एक दीर्घवृत या एक लिंग का रूप ले लेती है। तो इस तरह से सबसे पहला आकार भी लिंग है और सबसे आखिरी आकार भी लिंग है। 1.एक लिंग में ईश्वरत्व को स्थापित करना ज़रूरी तकनीक से, एक साधारण जगह, यहां तक कि एक पत्थर के टुकड़े को एक दिव्य जीवंतता में तब्दील किया जा सकता है। यह ईश्वरत्व को स्थापित करने की प्रक्रिया है।” सद्गुरु अगर आप मुझे कोई चीज़, मान लीजिए कि एक कागज़ का टुकड़ा देते हैं तो मैं उसे अत्यधिक ऊर्जावान बनाकर आपको वापस दे सकता हूं। अगर आप मेरे छूने से पहले और छूने के बाद इसे पकड़ेंगे तो आप दोनों के बीच का अंतर महसूस कर पायेंगे। लेकिन एक कागज़ इस ऊर्जा को बनाए नहीं रख सकता है। लेकिन अगर आप एक सही लिंग आकार बनाते हैं तो ये ऊर्जा का एक असीमित भंडारगृह बन जाता है। एक बार आप इसे प्रतिष्ठित कर देते हैं, तो ये हमेशा वैसा ही रहेगा। 2.शिवलिंग का रहस्य क्या है? – प्राण प्रतिष्ठा का अर्थ प्रतिष्ठा का अर्थ है, ईश्वरत्व को स्थापित करना। इस तरह की स्थापना का जो सबसे सामान्य तरीका है, वो है मंत्रों, अनुष्ठानों तथा अन्य प्रक्रियाओं का इस्तेमाल करना अगर आप किसी आकार की स्थापना या प्रतिष्ठा मंत्रों के माध्यम से करें, तो आपको उस देवता को जीवंत बनाए रखने के लिए उसके निरंतर रख रखाव की ज़रूरत होती है।प्राण-प्रतिष्ठा ऐसी प्रक्रिया नहीं है। जब एक आकार की प्रतिष्ठा या स्थापना जीवन ऊर्जाओं के माध्यम से की जाती है, न कि मंत्रों या अनुष्ठानों से, तो जब यह एक बार स्थापित हो जाए, तो यह हमेशा के लिए रहता है। इसे किसी रख-रखाव की आवश्यकता नहीं पड़ती। यही कारण है कि ध्यानलिंग में पूजा नहीं की जाती क्योंकि इसे ऐसे रख रखाव की ज़रूरत नहीं है। इसे प्राण-प्रतिष्ठा द्वारा स्थापित किया गया है और यह हमेशा ऐसा ही रहेगा। यहां तक कि अगर आप लिंग का पत्थर वाला हिस्सा हटा दें, यह फिर भी वैसा ही रहेगा। अगर पूरी दुनिया का अंत भी हो जाए, तब भी यह वैसा ही रहेगा। 3.लिंग की रचना – एक आत्मपरक सब्जेक्टिव या भीतरी विज्ञान लिंग को बनाने का विज्ञान एक अनुभव से जन्मा विज्ञान है, जो हजारों सालों से यहां मौजूद है। परंतु पिछले आठ सौ या नौ सौ सालों में, खासतौर पर जब भारत में भक्ति आंदोलन की लहर फैली, तो मंदिर निर्माण का विज्ञान खो गया। एक भक्त के लिए अपनी भावनाओं से अधिक महत्वपूर्ण कुछ नहीं होता। उसका रास्ता भावनाओं का है। यह उसकी भावनाओं की ही ताकत होती है, जिसके दम पर वह सबकुछ करता है। तो उन्होंने विज्ञान को किनारे रख दिया और मनचाहे तरीके से मंदिर बनाने लगे। आप जानते हैं, यह एक प्रेम संबंध होता है? एक भक्त जो चाहेकर सकता है। उसके लिए सब जायज है क्योंकि उसके पास एक ही चीज है और वह है अपनी भावनाओं की ताकत। इसी वजह से लिंग बनाने का विज्ञान खत्म होने लगा। वरना यह एक बहुत गहन विज्ञान था। यह एक आत्मपरक विज्ञान या सब्जेक्टिव साईंस है और इसे कभी लिखा नहीं गया। क्योंकि लिखने से इसके गलत समझे जाने की पूरी संभावना थी। इस तरह से, बिना किसी विज्ञान की जानकारी के, अनेक लिंगों की स्थापना की गई। 4.शिवलिंग की उत्पत्ति कैसे हुई ? – चक्रों को दर्शातें हैं लिंग चक्र, ऊर्जा तंत्र में वे स्थान होते हैं जहां प्राण की नाड़ियाँ मिलती हैं और ऊर्जा का एक भंवर बनता है। वैसे तो शरीर में 114 चक्र होते हैं लेकिन आम तौर पर जब हम चक्रों की बात करते हैं तो हम सात महत्वपूर्ण चक्रों की ही बात करते हैं, जो कि जीवन के सात आयामों को दर्शाते हैं। ये सात महत्वपूर्ण ट्रैफिक जंक्शन की तरह हैं। इस समय, भारत में अधिकतर लिंगों में केवल एक या दो चक्र ही स्थापित है। ईशा योग केंद्र में मौजूद ध्यानलिंग की खासियत ये है कि इसमें सातों चक्रों को अपने चरम तक ऊर्जावान बनाकर स्थापित किया गया है। यह ऊर्जा की सबसे उच्चतम संभव अभिव्यक्ति है । ये इस तरह से है कि अगर आप ऊर्जा को लेते हैं और उसे उसकी तीव्रता की चरम सीमा तक ले जाते हैं तो, केवल एक निश्चित सीमा तक ये एक आकार को धारण कर सकती है, उसके बाद ये आकार छोड़ देती है। जब ये अपना आकार छोड़ देती है तो लोग इसे अनुभव नहीं कर पाते। ऊर्जा को उस बिंदु तक धकेलना कि जिसके बाद वो आकार छोड़ दे, और ठीक तभी उसे एक निश्चित रूप दे देना- इस तरह से ध्यानलिंग की स्थापना/प्रतिष्ठा की गई है। 5.पंच भूतों की साधना योग की सबसे बुनियादी साधना है भूतशुद्धि। पंचभूत, प्रकृति के पांच तत्व हैं। अगर आप खुद को देखें तो आपका शरीर पांच तत्वों का बना हुआ है। ये हैं – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश। ये आपस में एक खास तरीके से मिलकर भौतिक शरीर के रूप में प्रकट होते हैं। आध्यात्मिक प्रक्रिया, भौतिक प्रकृति और इन पंच तत्वों से परे जाने की प्रक्रिया है। इन तत्वों की उन सभी चीज़ों पर बहुत ही मज़बूत पकड़ है जिन्हें आप अनुभव करते हैं। इनसे परे जाने के लिए योग का एक बुनियादी अभ्यास है, जिसे भूत शुद्धि कहते हैं। हर एक

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आखिर क्यों करते हैं पीपल के पेड़ का पूजन, जानिए पौराणिक कथा

आप सभी जानते ही होंगे शनिवार के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पीपल की पूजा कर रहे होते हैं। इस दिन लोग पीपल को जल देते हैं, दीप दिखाते हैं, काले तिल और गुड़ भी अर्पित करते हैं। लेकिन आपने सोचा है ऐसा क्यों? आज हम आपको बताने जा रहे हैं इसका कारण। जी दरअसल पीपल को लेकर श्रीमद्भगवदगीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि ‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम, मूलतो ब्रहमरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे, अग्रत: शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नम:। अर्थात मैं वृक्षों में पीपल हूं। इससे भी इस वृक्ष की महत्‍ता पता चलती है। स्कंदपुराण के अनुसार पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में भगवान श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं का वास है। इसलिए पीपल को पूजनीय पेड़ माना जाता है।’ इसके अलावा यह भी मान्‍यता है क‍ि पीपल के पेड़ की पूजा करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं और जिन जातकों की कुंडली में शनि दोष होता है। उन्हें इसके कुप्रभाव से मुक्ति मिल जाती है। जी दरअसल इसे लेकर पौराणिक कथाएं भी म‍िलती हैं। इनमे पहली कथा के अनुसार ‘एक समय स्वर्ग पर असुरों ने कब्जा कर लिया था। कैटभ नाम का राक्षस पीपल वृक्ष का रूप धारण करके यज्ञ को नष्ट कर देता था। जब भी कोई ब्राह्मण समिधा के लिए पीपल के पेड़ की टहनियां तोड़ने पेड़ के पास जाता, तो यह राक्षस उसे खा जाता। ऋषियों को समझ ही नहीं आ रहा था क‍ि आख‍िर ब्राह्मण कुमार कहां गायब होते जा रहे हैं। ब्राह्मण कुमारों के वापस न लौटने पर ऋषियों ने शनिदेव से सहायता मांगी। इस पर शनिदेव ब्राह्मण बनकर पीपल के पेड़ के पास गए। कैटभ ने शनि महाराज को पकड़ने की कोशिश की, तो शनिदेव और कैटभ में युद्ध हुआ। शनि ने कैटभ का वध कर दिया। तब शनि महाराज ने ऋषियों को कहा कि आप सभी भयमुक्त होकर शनिवार के दिन पीपल के पेड़ की पूजा करें, इससे शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलेगी।’ वहीं एक अन्‍य पौराण‍िक कथा के अनुसार, ‘ऋषि पिप्लाद के माता-पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई थी। बड़े होने इन्हें पता चला कि शनि की दशा के कारण ही इनके माता-पिता को मृत्यु का सामना करना पड़ा। इससे क्रोधित होकर पिप्लाद ने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर घोर तप किया। इससे प्रसन्न होकर जब ब्रह्माजी ने उनसे वर मांगने को कहा, तो पिप्लाद ने ब्रह्मदंड मांगा और पीपल के पेड़ में बैठे शनिदेव पर ब्रह्मदंड से प्रहार किया। इससे शनि के पैर टूट गए। शनिदेव दुखी होकर भगवान शिव को पुकारने लगे। भगवान शिव ने आकर पिप्पलाद का क्रोध शांत किया और शनि की रक्षा की। तभी से शनि पिप्पलाद से भय खाने लगे। पिप्लाद का जन्म पीपल के वृक्ष के नीचे हुआ था और पीपल के पत्तों को खाकर इन्होंने तप किया था इसलिए माना जाता है कि पीपल के पेड़ की पूजा करने से शनि का अशुभ प्रभाव दूर होता है।’

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रविवार, पीपल व लक्ष्मी माता का गहरा संबंध, जानने के लिए पढ़ें ये पौराणिक कथा

शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ वास्तु शास्त्र के अलावा हमारे हिंदू धर्म में भी पेड़-पौधों को बहुत महत्व प्रदान है। यही कारण है कि इनकी विधि वत पूजा का विधान है। इन्हीं में से एक है पीपल का पेड़ जिसे ब्रह्मा जी का रूप माना जाता है। पौराणिक व धार्मिक मतों के अनुसार पीपल पर जल चढ़ाने से व इनकी पूजा करने से कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। परंतु क्या आप जानते हैं इसकी पूजा करने समय दिन वार का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। दरअसल शास्त्रों में पीपल के वृक्ष से जुड़ी एक कथा वर्णित है, जिसमें बताया गया है कि सप्ताह का एक ऐसा भी दिन होता है जिस दौरान पीपल के वृक्ष की पूजा करना फलदायी नहीं कष्टकारी साबित होता है। तो अगर आप जानना चाहते हैं कि कौन सा है वो दिन व क्या इसके पीछे की पौराणिक कथा तो आगे की जानकारी को ध्यान से पढ़िए। पीपल के वृक्ष बारे में एक कथा प्रचलित है कि, एक बार माता लक्ष्मी और उनकी छोटी बहन दरिद्रा श्री विष्णु के पास गई और उनसे बोली, हमें कहीं तो रहने का स्थान दो। तब भगवान विष्णु ने उन्हें पीपल के वृक्ष पर वास करने को कहा। इसलिए पीपल पर जल चढ़ाने से धन-संपदा की परेशानी दूर हो जाती है।  तो वहीं रविवार को पीपल की पूजा नहीं की जाती क्योंकि जब विष्णु भगवान ने माता लक्ष्मी से विवाह करना चाहा तो लक्ष्मी माता ने मना कर दिया था क्योंकि उनकी बहन दरिद्रा का विवाह नहीं हुआ था। दरिद्रा के विवाह के उपरांत ही वह श्री हरी विष्णु से विवाह कर सकती थी। उन्होंने दरिद्रा से पूछा,” वो कैसा वर पाना चाहती हैं।”तो वह बोली कि,” वह ऐसा पति चाहती हैं जो कभी पूजा-पाठ न करे और उसे ऐसे स्थान पर रखे जहां कोई भी पूजा-पाठ न करता हो। तब श्री विष्णु ने उनके लिए ऋषि नामक वर चुना और दोनों विवाह सूत्र में बंध गए। अब दरिद्रा की शर्तानुसार उन दोनों को ऐसे स्थान पर वास करना था जहां कोई भी धर्म कार्य न होता हो। ऋषि उसके लिए उसका मन भावन स्थान ढूंढने निकल पड़े लेकिन उन्हें कहीं पर भी ऐसा स्थान नही मिला। दरिद्रा उनकी प्रतीक्षा में विलाप करने लगी और यहाँ श्री विष्णु ने दोबारा लक्ष्मी के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा तो लक्ष्मी जी बोली,” जब तक मेरी बहन की गृहस्थी नहीं बसती मैं विवाह नहीं करूंगी। धरा पर ऐसा कोई स्थान नहीं है।  जहां कोई धर्म कार्य न होता हो। उन्होंने अपने निवास स्थान पीपल को रविवार के लिए दरिद्रा व उसके पति को दे दिया। इसलिए हर रविवार पीपल के नीचे देवताओं का वास न होकर दरिद्रा का वास होता है। यही वजह है कि इस दिन पीपल की पूजा वर्जित मानी जाती है। इसी लोक विश्वास के आधार पर लोग पीपल के वृक्ष को काटने से आज भी डरते हैं, लेकिन साथ में यह भी बताया गया है कि यदि पीपल के वृक्ष को काटना-छांटना बहुत ही आवश्यक हो तो उसे रविवार को ही काटा-छांटा जा सकता है।

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कौन थे भगवान शिव के प्रथम शिष्य, जानें भगवान शिव से जुड़े 7 अनजान रहस्य

शिव या महादेव सनातन संस्कृति में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव भी कहते हैं। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि  कई नामों से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है। शिव हिन्दू धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। शंकर जी को संहार का देवता कहा जाता है। शंकर जी सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं। रावण, शनि, कश्यप ऋषि आदि इनके भक्त हुए है। शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिये उन्हें महादेव कहा जाता है। पुराणों के अनुसार भोलेनाथ स्वयंभू है लेकिन भोलेनाथ से जुड़ी की रहस्यमयी कथाएं प्रचलित हैं। आइए आपको भगवान शिव से जुड़े कुछ ऐसे रहस्यों के बारे में बताते हैं जो शायद ही लोगों को पता है। भगवान शिव की उत्पत्ति  भगवान शिव स्वयंभू हैं, लेकिन पुराणों में उनकी उत्पत्ति का विवरण मिलता है। विष्णु पुराण के अनुसार जहां भगवान विष्णु ब्रह्माजी की नाभि से उत्पन्न हुए वहीं शिव विष्णु जी के माथे के तेज से उत्पन्न हुए, ऐसा उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण के अनुसार माथे के तेज से उत्पन्न होने के कारण ही शिव-शंभू हमेशा योगमुद्रा में रहते हैं।  शिव और शंकर एक ही हैं कुछ पुराणों में भगवान शंकर को शिव इसलिए कहते हैं क्योंकि वे निराकार शिव के समान है। निराकार शिव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है। शंकर को हमेशा योगी के रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए चित्रित किया गया है। अतः शिव और शंकर दो अलग सत्ताएं हैं। मान्यता है कि महेश(नंदी) और महाकाल भगवान शंकर के द्वारपाल हैं और रुद्रदेवता शंकर की पंचायत के सदस्य हैं। भगवान शिव से हुई असुरों की उत्पत्ति  पुराणों के अनुसार जालंधर नामक राक्षस की उत्पत्ति भगवान शंकर के तेज से हुई थी। इसलिए जालंधर को भगवान शिव का एक अंश माना जाता है। अन्य मान्यता के अनुसार भूमा नामक असुर कि उत्पत्ति भगवान भोलेनाथ के पसीने की बूंद से हुई थी। इसके अतिरिक्त कुछ पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि अंधक और खुजा भी भगवान शंकर के पुत्र थे परन्तु धर्म शास्त्रों में इन दोनों का कहीं कोई उल्लेख प्राप्त नहीं है।  शिव के प्रथम शिष्य पुराणों के अनुसार भगवान शिव के प्रारम्भिक शिष्य सप्तऋषि माने जाते हैं। मान्यता है कि सप्तऋषियों ने भगवान शिव के ज्ञान का प्रचार प्रसार पृथ्वी पर किया था जिसके चलते भिन्न-भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। मान्यता है कि भगवान शिव ने ही गुरु शिष्य की परंपरा का आरंभ किया था। शिव के शिष्यों में बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेंद्र, प्राचेतस मनु, भारद्वाज शामिल थे। शिव की पत्नियां ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव की दो पत्नियां थी पहली देवी सती और दूसरी माता पार्वती। लेकिन यदि हिन्दू पौराणिक कथाओं की मानें तो भगवान नीलकंठेश्वर ने एक दो नहीं बल्कि चार विवाह किए थे। उन्होंने यह सभी विवाह आदिशक्ति के साथ ही किए थे।  भगवान शिव ने पहला विवाह माता सती के साथ किया जो कि प्रजापति दक्ष की पुत्री थीं। माता सती के पिता द्वारा भगवान शिव का अपमान न सह पाने के कारण उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसके बाद हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्मी आदिशक्ति ने भगवान शिव से दूसरा विवाह किया। हमारे धर्मग्रंथों में भगवान शिव का तीसरी पत्नी देवी उमा को बताया गया है। देवी उमा को भूमि की देवी भी कहा जाता है। भगवान शिव की चौथी पत्नी मां महाकाली को बताया गया है। उन्होंने इस पृथ्वी पर भयानक दानवों का संहार किया और तीनो लोक की रक्षा की। भगवान शिव क्यों लगाते हैं भस्म  भगवान शिव के भस्म लगाने की पीछे कई मान्यता जुड़ी है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव को मृत्यु का स्वामी माना गया है।  इसी वजह से ‘शव’ से ‘शिव’ नाम बना।  महादेव के मुताबिक शरीर नश्वर है और इसे एक दिन भस्म की तरह राख हो जाना है।  जीवन के इस पड़ाव के सम्मान में शिव जी अपने शरीर पर भस्म लगाते हैं। एक अन्य कथा के अनुसार जब देवी सती ने क्रोध में आकर खुद को अग्नि के हवाले कर दिया था, उस वक्त भगवान शंकर  उनका शव लेकर धरती से आकाश तक हर जगह घूमे थे। विष्णु जी से उनकी यह दशा देखी नहीं गई और उन्होंने माता सती के शव को छूकर भस्म में तब्दील कर दिया। अपने हाथों में भस्म देखकर शिव जी और परेशान हो गए और सती की याद में वो राख अपने शरीर पर लगा ली।  भगवान शिव हर युग में थे उपस्थित  भगवान शिव को आदिपुरुष कहा जाता है। और इसी वजह से माना जाता है भोलेनाथ ही एकमात्र ऐसे देवता हैं जिन्होंने हर युग में अपने भक्तों को दर्शन दिए हैं। सतुग में समुद्र मंथन के समय वे उपस्थित थे। त्रेतायुग में भगवान राम ने भी रामेश्वरम में उनके शिवलिंग रूप की आराधना की। रात्रि प्रवास के दौरान राम को स्वप्न में शिवलिंग का दर्शन हुआ था। द्वापरयुग में भगवान शिव स्वयं कृष्ण के बालरूप के दर्शन करने गोकुल पहुंचे थे। और कलयुग में राजा विक्रमादित्य कि तपस्या प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए थे, ऐसा उल्लेख मिलता है

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