April 2023

भगवान विष्णु के चरणों से निकला अमृत है गंगा

नीराकार ब्रह्म अर्थात् जलरूप ब्रह्म या द्रवरूप में ब्रह्म कोई ‘नराकार ब्रह्म’ (राम, कृष्ण) को भजता है , तो कोई ‘निराकार ब्रह्म’ को; परन्तु कलियुग में मनुष्य के पाप-तापों की शान्ति ‘नीराकार ब्रह्म’ से ही होती है । हिन्दी में ‘नीर’ जल को कहते हैं । ‘द्रव’ तरल पदार्थ को कहते हैं । अत: नीराकार ब्रह्म का अर्थ है ‘भगवान का जलमय रूप’ और यह रूप है मां गंगा मनुष्यों के तापों की शान्ति के लिए ब्रह्म का द्रवरूप होना गंगा को ‘ब्रह्मद्रव’ भी कहते हैं । ‘ब्रह्मद्रव’ का अर्थ है आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक (शारीरिक, मानसिक और भौतिक)—इन तीनों तापों से पीड़ित मनुष्यों की दशा से परमात्मा (ब्रह्म) का द्रवित होकर उनके तापों की शान्ति के लिए जल रूप में अवतरित होना । ताप चाहे कैसा भी हो उसकी शान्ति जल से ही होती है ।  गंगा का एक नाम ‘ब्रह्माम्बु’ है । अम्बु जल को कहते हैं, इसलिए ब्रह्म + अम्बु अर्थात् जलरूप ब्रह्म । भगवान की प्रत्येक लीला के पीछे लोककल्याण ही छिपा होता है । भगवान के जलमय रूप होने के पीछे भी कलियुग में मानव का कल्याण ही छिपा है । यदि गंगा का धरती पर अवतरण न हुआ होता तो कलियुग में मनुष्यों के पापों का मल कैसे धुलता? गंगा सप्तमी 2023 देवी गंगा के सम्मान का दिन भगवान विष्णु का चरणामृत है गंगा आदिकवि वाल्मीकि ने अपने ‘गंगाष्टक’ में गंगा को ‘मुरारि का चरणामृत’ कहा है । अपने प्रभु विष्णु का चरणामृत जानकर भगवान शंकर ने ब्रह्मस्वरूपिणी गंगा को अपने मस्तक पर धारण किया है । कवि रसखान ने तो यहां तक कह दिया कि गंगा समस्त व्याधियों की सर्वोत्तम औषधि है इसीलिए भगवान शंकर अपने मस्तक पर स्थित गंगा के भरोसे ही आक-धतूरे चबाते रहते हैं और उन्हीं के भरोसे उन्होंने हलाहल विष का पान कर लिया— ‘आक धतूरो चबात फिरैं,विष खात फिरैं सिव तोरे भरोसे ।। भगवान की विभूति है गंगा गंगा भगवान के चरणों से उत्पन्न हुई है, विष्णुपदी है, उसका महत्व केवल इतना ही नहीं है; अपितु गंगा साक्षात् परमात्मा की विभूति है । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (१०।३१) में गंगा को अपना स्वरूप बतलाते हुए कहा है—‘स्तोत्रसामस्मि जाह्नवी ।’   गंगा ब्रह्मजल है, उसमें भगवान के गुण होने के कारण वह सदैव शुद्ध, पवित्र व निर्विकार रहने वाला दिव्य पदार्थ है । इसीलिए वह शारीरिक व मानसिक रोगों को दूर करने व सांसारिक भोगों के साथ मोक्ष प्रदान करने की भी क्षमता रखता है गंग सकल मुद मंगल मूला ।सब सुख करनि हरनि सब सूला ।। (राचमा २।८७।४) गंगा के द्रवरूप में आविर्भाव की कथाएं वास्तव में गंगा गोलोक या विष्णुलोक में भगवान श्रीहरि की ही एक स्वरूपाशक्ति हैं । गंगा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुराणों में अनेक कथाएं है । यहां गंगा के नीराकार ब्रह्मस्वरूप को दर्शाती दो पौराणिक कथाओं का उल्लेख किया जा रहा है । ब्रह्मवैवर्तपुराण (प्रकृतिखण्ड) में गंगा की द्रवरूप में उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है श्रीराधाकृष्ण का जलरूप है गंगा एक बार गोलोक में श्रीकृष्ण कार्तिक पूर्णिमा के दिन रासमहोत्सव मना रहे थे । रासमण्डल में श्रीकृष्ण श्रीराधा की पूजा कर विराजमान थे । उसी समय श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए सरस्वती प्रकट हुईं और उन्होंने अपनी मधुर स्वरलहरी में गीत गाकर और दिव्य वीणा के वादन से सारा वातावरण झंकृत कर दिया । उसी समय भगवान शंकर भी श्रीकृष्ण सम्बन्धी सरस पद गाने लगे । उसे सुनकर सभी देवगण मूर्छित हो गए । जब उनकी चेतना लौटी तब वहां श्रीराधाकृष्ण के स्थान पर सारे रासमण्डल में जल-ही-जल फैला हुआ था । सभी गोप-गोपी और देवगण भगवान श्रीराधाकृष्ण को न पाकर विलाप करते हुए उनसे पुन: प्रकट होने की प्रार्थना करने लगे । तब भगवान श्रीकृष्ण  ने आकाशवाणी द्वारा कहा मैं सर्वात्मा श्रीकृष्ण और मेरी स्वरूपाशक्ति श्रीराधा—हम दोनों ने ही भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए यह जलमय विग्रह (नीराकार स्वरूप) धारण कर लिया है ।’ यदि कोई मनुष्य गंगा का जल हाथ में लेकर प्रतिज्ञा करेगा और फिर उस अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन नहीं करेगा वह नरक का भागी होगा । वे ही पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण और राधा जलरूप होकर गंगा बन गए और वह दिव्य जलराशि ही ‘देवनदी’ गंगा के नाम से प्रसिद्ध हुई । गोलोक से प्रकट होने वाली गंगा का यही रहस्य है । श्रीमद्देवीभागवत में गंगा के ब्रह्मद्रव रूप में आविर्भाव की कथा दक्षकन्या सती के देहत्याग करने पर जब भगवान शिव तप करने लगे, तब देवताओं ने जगन्माता की स्तुति कर उनसे दोबारा भगवान शंकर का वरण करने की प्रार्थना की । देवी ने तब प्रसन्न होकर कहा मैं दो रूपों में पर्वतराज हिमालय और मैना के घर प्रकट होऊंगी ।’ पहले वे अपने अंश रूप से वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को गंगा रूप में प्रकट हुईं फिर पूर्णावतार धारणकर पार्वती के रूप में प्रकट हुईं । हिमालय के घर में सती का अंशावतार गंगा के रूप में प्रकट होने पर ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोचा कि सती के छायाशरीर को लेकर जब शिवजी ताण्डव कर रहे थे तो उनके पैरों के आघात से पृथ्वी रसातल में जाने लगी । जगत की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने चक्र से छायासती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे, उस अपराध के कारण भगवान शिव अभी तक हमसे रुष्ट हैं । यदि हम गंगा को शिवजी को प्रदान कर दें तो वे हमसे अवश्य प्रसन्न हो जाएंगे जैसे छायासती भगवान शिव के सिर पर स्थित रहीं वैसे ही ये गंगा जलरूप में उनके सिर पर सुशोभित रहेंगी । गंगा की ब्रह्मलोक से भूलोक तक की यात्रा ब्रह्माजी सहित सभी देवगण हिमालय के घर गंगा को मांगने के लिए पहुंच गए और उन्हें सारी बात बता दी । गिरिसुता गंगा पिता की आज्ञा से सदाशिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी के कमण्डलु में निराकार रूप से स्थित हो कर स्वर्गलोक में आ गयीं ।  जब उनकी माता मैना को यह बात पता चली तो उन्होंने गुस्से में शाप देते हुए कहा माता से बिना बात किए तुम स्वर्ग चलीं गयीं, इसलिए तुम्हें जलरूप में पुन: पृथ्वी पर आना होगा ।’ ब्रह्माजी ने मूर्तिमान गंगा को शंकरजी को दे दिया और वे शंकरजी के साथ कैलास चली गयीं । ब्रह्माजी की प्रार्थना पर एक अंश से वे निराकार रूप में उनके कमण्डलु में स्थित हो गयीं और ब्रह्माजी उन्हें ब्रह्मलोक में ले गए । गंगा के शंकरजी

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गंगा सप्तमी 2023 देवी गंगा के सम्मान का दिन

गंगा सप्तमी को ज्यादातर भारत के उत्तरी भागों में बहुत जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू धर्म में, गंगा नदी को सबसे पवित्र नदी माना जाता है और इसे देवी के रूप में पूजा जाता है। इस प्रकार, गंगा सप्तमी को हिंदुओं के लिए एक शुभ दिन माना जाता है और यह देवी गंगा को समर्पित है। इसे जाह्नु सप्तमी के रूप में भी जाना जाता है, और गंगा पूजन वह दिन है जिसे देवी गंगा के पुनर्जन्म का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, गंगा सप्तमी वैशाख महीने के दौरान चंद्रमा के वैक्सिंग चरण के 7 वें दिन मनाई जाती है, जिसे बैशाख के नाम से भी जाना जाता है, यानी शुक्ल पक्ष की सप्तमी को। इस दिन, अधिकांश हिंदू तीर्थ स्थानों में भक्तों द्वारा विशेष पूजा और प्रार्थना की जाती है, जहां गंगा नदी उत्तराखंड में ऋषिकेश, इलाहाबाद में त्रिवेणी संगम आदि से गुजरती है। आइए जानते हैं गंगा सप्तमी का महत्व और इस पर्व के पीछे की कथा गंगा सप्तमी 2023 तिथि और समय इस वर्ष गंगा सप्तमी 27 अप्रैल, 2023 को मनाई जाएगी। महत्वपूर्ण समय नीचे दिए गए हैं गंगा सप्तमी मध्याह्न मुहूर्त – सुबह 11 बजे से दोपहर 01:38 बजे तकअवधि – 02 घंटे 38 मिनटसप्तमी तिथि शुरू – 26 अप्रैल 2023 को सुबह 11:27 बजेसप्तमी तिथि समाप्त – 27 अप्रैल 2023 को दोपहर 1:38 बजेगंगा सप्तमी की कथा और महत्व सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा पद्म पुराण, ब्रह्म पुराण और नारद पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों में गंगा सप्तमी के पीछे के महत्व और कथा का उल्लेख है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि देवी गंगा सबसे पहले ‘गंगा दशहरा’ के दिन पृथ्वी पर आई थीं। लेकिन एक बार ऐसा हुआ कि संत जह्नु ने गंगा नदी का जल पी लिया। हालांकि, देवताओं और राजा भगीरथ के अनुरोध के बाद, ऋषि जाह्नु ने वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष सप्तमी के दिन एक बार फिर गंगा को छोड़ दिया। तब से, इस दिन को गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है, और यह देवी गंगा के पुनर्जन्म का प्रतीक है। इसके अलावा, ऋषि जाह्नु की बेटी होने के कारण, देवी गंगा को ‘जाह्नवी’ भी कहा जाता है, और परिणामस्वरूप, इस दिन को ‘जह्नु सप्तमी’ भी कहा जाता है। भारत में गंगा नदी को बहुत पवित्र माना जाता है। गंगा सप्तमी पर किए जाने वाले समारोह और अनुष्ठान उन स्थानों में बहुत प्रसिद्ध हैं जहां गंगा और उसकी सहायक नदियां बहती हैं। हिंदू भक्तों के लिए, जो देवी गंगा की पूजा करते हैं, यह दिन बहुत ही आशाजनक है, और वे पवित्र जल में डुबकी भी लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि गंगा नदी में पवित्र स्नान करने से लोगों को उनके सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। कई हिंदू भक्त भी गंगा नदी के पास अंतिम संस्कार करने की इच्छा रखते हैं क्योंकि यह उन्हें मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है। ज्योतिष की दृष्टि से भी यह पर्व महत्वपूर्ण है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, इस दिन देवी गंगा की पूजा करने से व्यक्ति मंगल दोष के प्रभाव को कम कर सकता है, क्योंकि यह जन्म कुंडली में ‘मंगल’ के प्रभाव को कम करता है। गंगा सप्तमी पर किए जाने वाले अनुष्ठान इस दिन आपको कुछ अनुष्ठानों का पालन करना चाहिए: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर गंगा नदी में पवित्र स्नान करें। इसके अलावा, देवी गंगा की पूजा करें, क्योंकि यह बहुत अनुकूल मानी जाती है।कोई गंगा नदी के पार एक माला विसर्जित कर सकता है और प्रसिद्ध गंगा आरती में भाग ले सकता है। गंगा आरती का विशेष महत्व है क्योंकि माना जाता है कि इस दिन “माँ गंगा” स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित होती है।यह कई घाटों पर किया जाता है और भारत के विभिन्न हिस्सों से लाखों भक्त इस आरती में भाग लेते हैं।गंगा आरती समाप्त होने के बाद, संत अपने आस-पास मौजूद सभी लोगों को दीपक प्रसारित करते हैं। अपने नीचे किए हुए हाथों को लौ पर रखें और शुद्धि और आशीर्वाद लेने के लिए अपनी हथेलियों को माथे पर उठाएं। यहां, आरती में छोटे दीये और फूल होते हैं जिन्हें बाद में नदी में बहा दिया जाता है।गंगा सप्तमी के दिन दीपदान की रस्म या दीप या दीपक का दान किया जाता है। पवित्र नदी के किनारे विशाल मेलों का भी आयोजन किया जाता है।गंगा सप्तमी के दिन गंगा सहस्रनाम स्तोत्र और ‘गायत्री मंत्र’ का पाठ करना भी बहुत शुभ माना जाता है। अंत गंगा को हिंदुओं के लिए एक ‘देवी’ या देवी के रूप में देखा जाता है, और इस प्रकार, भक्त गंगा सप्तमी पर पूर्ण समर्पण और भक्ति के साथ उनकी पूजा करते हैं। इससे उन्हें सुख, यश और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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गंगा सप्तमी पर बन रहा है अत्यंत शुभ योग, जरूर करें ये खास उपाय

तिष पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन गंगा सप्तमी मनाई जाती है। गंगा सप्तमी के दिन मां गंगा की विशेष उपासना की जाती है और इस दिन को मां गंगा के धरती पर प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। बता दें कि इस वर्ष 27 अप्रैल 2023, गुरुवार के दिन गंगा सप्तमी मनाई जाएगी। इस विशेष दिन पर मां गंगा की उपासना करने से और पितरों को जल प्रदान करने से साधक को कई गुना लाभ मिलता है। ज्योतिष शास्त्र में गंगा सप्तमी के संदर्भ में कई उपाय बताए गए हैं। साथ ही यह भी बताया गया है कि इस विशेष दिन पर गंगा स्नान करने के बाद पितरों को गंगा जल अर्पित करने से और दान-धर्म करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और साधकों को सुख-समृद्धि एवं ऐश्वर्य का आशीर्वाद मिलता है। गंगा सप्तमी 2023 शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि का शुभारंभ 26 अप्रैल को सुबह 11:27 पर होगा और इस तिथि का समापन 27 अप्रैल को दोपहर 1:48 पर हो जाएगा। उदया तिथि के अनुसार यह पर्व 27 अप्रैल 2023, गुरुवार के दिन मनाया जाएगा। इस विशेष दिन पर सर्वार्थ सिद्धि योग पूरे दिन रहेगा और गुरु पुष्य योग सुबह 7 बजे से अगली सुबह 5:43 मिनट तक रहेगा। गंगा सप्तमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:17 से सुबह 5:01 के बीच रहेगा। मान्यता है कि ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान करने से साधक के सभी पाप धुल जाते हैं और उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है। सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा गंगा सप्तमी के दिन जरूर करें यह कार्य गंगा सप्तमी के विशेष अवसर पर स्नान ध्यान के बाद मां गंगा की पूजा अवश्य करें। इसके लिए एक कटोरी में गंगा जल भर लें और उस कटोरी के समक्ष गाय के घी का दीपक जलाकर मां गंगा की पूजा करें। इसके बाद आरती के साथ पूजा संपन्न करें। गंगा सप्तमी के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इसलिए इस विशेष दिन पर किसी जरूरतमंद, गरीब, असहाय अथवा किसी ब्राह्मण को अन्न, धन या वस्त्र का दान अवश्य करें ऐसा करने से साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है और कई जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं।गंगा सप्तमी के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक जरूर करें। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान शिव की जटाओं से ही मां गंगा प्रवाहित होती हैं। ऐसे में इस दिन एक पात्र में गंगाजल भरकर भगवान शिव का जलाभिषेक करें और महादेव को बेलपत्र अर्पित करें।

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शनिवार को पीपल की पूजा करने से क्यों प्रसन्न होते हैं शनिदेव,जानिए पौराणिक कथा

पीपल का पेड़ वैज्ञानिक दृष्टि से जितना महत्वपूर्ण है धार्मिक दृष्टि से भी उतना ही महत्तवपूर्ण है। हिन्दू धर्मशास्त्रों में पीपल के पेड़ पर पितरों का वास माना गया है अतः पितृ पूजा में पीपल के पेड़ का विशेष स्थान है । इसके अतिरिक्त स्कंदपुराण में पीपल के वृक्ष की तुलना श्री हरि विष्णु से की गई है। गीता में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि वृक्षों में मैं पीपल हूं। इसलिए हिन्दू धर्म में पीपल के पेड़ को पूजनीय माना गया है। इसके साथ ही मान्यता है कि शनिवार के दिन पीपल के पेड़ का पूजन करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं, आज हम जानेगें इसके पीछे की पौराणिक कथा। ऋषि पिप्लाद की कथा पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि पिप्लाद के माता-पिता की मृत्यु शनि की महादशा के कारण अल्पायु में हो गई थी। जिससे क्रोधित हो कर ऋषि पिप्लाद ने पीपल के पेड़ के नीचे कई वर्षों तक केवल पीपल के पत्ते खा कर ब्रह्म देव का तप किया। ब्रह्म देव ने प्रसन्न होकर उन्हे वरदान में ब्रह्मदण्ड प्रदान किया। ऋषि पिप्लाद ने प्रतिशोध में ब्रह्मदण्ड का प्रहार शनिदेव पर किया, जिससे उनका एक पैर टूट गया। शनिदेव जीवन रक्षा के लिए भगवान शिव की शरण में जा पहुंचे। भगवान शिव ने ऋषि पिप्लाद का क्रोध शांत कराते हुए वरदान दिया कि शनिवार के दिन जो भी पीपल के पेड़ का पूजन करेगा, शनिदेव की महादशा का उस पर दुष्प्रभाव नहीं होगा। राक्षस कैटभ की कथा एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार स्वर्गलोक पर असुरों का राज हो गया था। तब कैटभ नाम का एक राक्षस पीपल के पेड़ का रूप धारण कर यज्ञों को नष्ट करने लगा। जब ऋषिगण यज्ञ समिधा लेने पीपल के पेड़ के पास जाते, तो राक्षस उनका भक्षण कर लेता था। ऋषियों ने शनि देव से सहायता मांगी। शनिदेव स्वयं ब्राह्मण कुमार का रूप लेकर पीपल के पेड़ के पास गए और राक्षस कैटभ का वध कर दिया। इस तरह शनिदेव ने पीपल के पेड़ और ऋषियों को राक्षस के आतंक से मुक्ति दिलाई। तब से मान्यता है कि जो भी शनिवार को पीपल के पेड़ की पूजा करता है उस पर शनिदेव शीध्र प्रसन्न होते हैं।

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जानें भारत के प्राचीन मंदिरों के बारे में, जिसका वर्षों पुराना है इतिहास

भारत में ऐसे कई पुराने मंदिर हैं, जिनका इतिहास अति प्राचीन है। इनकी सुंदरता और प्रसिद्धि आज भी बरकरार है। आइए जानें इन मंदिरों के बारे में भारत की संस्कृति और आध्यात्मिकता की चर्चा विश्व भर में फैली हुई हैं। विभिन्न धर्मों के संगम की धरती भारत में एक से बढ़कर एक पुराने व भव्य कलात्मक मंदिर हैं, जिनकी सुंदरता देखने लायक है। हजारों साल पुराने इन मंदिरों की खूबसूरती व समृद्धि को देखकर आप भारत के विशाल इतिहास का अंदाजा लगा सकते हैं। इन मंदिरों की नक्काशी में भारतीय संस्कृति, कला व सौंदर्य का अनूठा संगम है, जिन्हें देखने के लिए लोग दूर-दूर से आते हैं। आइए जानें भारत के प्राचीन और मशहूर इन मंदिरों के बारे में बृहदेश्वर मंदिर, तमिलनाडु तमिलनाडु के तंजौर में स्थित बृहदेश्वर मंदिर हिन्दुओं का एक प्रसिद्ध प्राचीन मंदिर है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर को 1002 ईस्वी में चोल शासक राजाराज चोल प्रथम ने निर्माण करवाया था। यह मंदिर द्रविड़ शैली का अनूठा उदाहरण है। इस मंदिर के शीर्ष की ऊंचाई 66 मीटर है। इसकी प्रसिद्धि को देखने लोग मीलों दूरी का सफर तय करते हैं। यह मंदिर अपने समय में विश्व की विशालतम संरचनाओं में गिना जाता था। चेन्नाकेशव मंदिर, कर्नाटक कर्नाटक के बैलूर में स्थित चेन्नाकेशव मंदिर होयलस काल में बनाया गया है। यगाची नदी के किनारे स्थित यह मंदिर द्रविड़ शैली पर अधारित है। विष्णु भगवान को समर्पित इस मंदिर की दीवारों पर पौराणिक के पात्रों का चित्रांकन किया गया है। इसकी संरचना इतनी भव्य है कि इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा मान्यता दी गई है। इसके तीन प्रवेश द्वारों में से पूर्वी प्रवेश द्वार सबसे अच्छा माना जाता है। इस मंदिर को विजयनगर के शासकों द्वारा चोलों पर उनकी विजय को दर्शाने के लिए बनाया गया था। दिलवाड़ा मंदिर, राजस्थान राजस्थान के सिरोही जिले के माउंट आबू नगर में स्थित दिलवाड़ा मंदिर पांच मंदिरों का समूह है, जिसका निर्माण 11वीं और 13वीं शताब्दी के बीच हुआ था। जैन धर्म को समर्पित यह मंदिर में 48 स्तम्भ हैं, जिनमें नृत्यांगनाओं की बनी आकृतियां हैं, जो सबको अपनी और आकर्षित करती हैं। इस मंदिर की निर्माण कला अति उत्तम और दर्शनीय है। यह मंदिर जैन धर्म के सबसे सुंदर तीर्थ स्थलों में शामिल है द्वारकाधीश मंदिर भगवान श्री कृष्ण को समर्पित द्वारकाधीश मंदिर को जगत मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। गुजरात में मौजूद इस मंदिर को चार धाम यात्रा में शामिल किया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर लगभग 2500 साल पुराना है। यह इतना पुराना है कि इस मंदिर की चर्चा पुरातात्विक तथ्यों में भी देखने को मिलता है। यह मंदिर पांच मंजिला है, जिसमें लगभग 72 खंभे हैं। इस मंदिर की विशालता अति प्राचीन है। श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में स्थित श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक विशाल व प्राचीन मंदिर है। ये मंदिर 108 दिव्य मंदिरों में से एक है। दक्षिण भारत के सबसे खूबसूरत और भव्य मंदिरों में शामिल इस मंदिर को छठी और नौवीं शताब्दी के बीच बनवाया गया था। यह लगभग 156 एकड़ में फैला हुआ है, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर भी माना जाता है। इसकी सुंदरता देखने योग्य है। सोमनाथ मंदिर गुजरात सोमनाथ भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम हैं। गुजरात में स्थित इस मंदिर को 7वीं शताब्दी में बनवाया गया था। इस मंदिर का निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था। इस वैभवशाली मंदिर को कई बार तोड़ा गया। फिर भी इस मंदिर की विशालता और भव्यता आज भी कायम है। ऋग्वेद में भी इस मंदिर का उल्लेख किया गया है।  ब्रह्मा मंदिर, राजस्थान राजस्थान के पुष्कर में स्थित इस मंदिर की संरचना 14वीं शताब्दी की मानी जाती है। इस मंदिर को करीब 2000 साल पुराना बताया जाता है। इस मंदिर के बीचों-बीच ब्रह्मा और उनकी दूसरी पत्नी गायत्री की मूर्ति है। आपको बता दें कि यह मंदिर भारत का एक मात्र ब्रह्मा मंदिर है, जहां हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। यहां पर साल में दो बार मेले का भी आयोजन होता है, जिसमें देश-विदेश के बहुत सारे तीर्थ यात्री और पर्यटक भाग लेते हैं लिंगराज मंदिर, भुवनेश्वर ओडिशा के भुवनेश्वर में स्थित लिंगराज मंदिर भारत के प्राचीन मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण सोमवंशी राजा जजति केशरि ने 11वीं शताब्दी में करवाया था। भगवान शिव के एक रूप हरिहारा को समर्पित यह मंदिर काफी विशाल है। इसकी अनुपम स्थापत्य कला बेहद अट्रैक्टिव है, जिसे देखने भारत के कोने-कोने से लोग आते हैं। कैलाश मंदिर, महाराष्ट्र महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित यह दो मंजिला मंदिर एक ही पत्थर को काटकर बनाया गया है। यह मंदिर एलोरा की गुफाओं में स्थित है। लगभग 12 हजार साल पुराने इस मंदिर का निर्माण राष्ट्रकूट वंश के शासकों ने करवाया था। इसे बनाने में करीब 150 साल लगे और 7000 मजदूरों ने इस पर लगातार काम किया। यह मंदिर प्राचीन भारतीय सभ्यता का जीवंत प्रदर्शन करता हुआ नजर आता है। दुनिया भर में एक ही पत्थर की शिला से बनी हुई सबसे बड़ी मूर्ति के लिए यह मंदिर मशहूर है।

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सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा

हिन्दू धर्म कई रहस्यों से भरा हुआ है. जितना जानने की कोशिश करें उतना ही कम है. हिन्दू पुराणों में उल्लेख है कि सृष्टि की रचना परमपिता ब्रम्हा द्वारा की गई है. हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार संसार के जीव-जंतु, पेड़-पौधे, नर-नारी सभी की रचना भगवान ब्रम्हा ने की है. यह कार्य उन्हें भगवान शिव ने सौंपा था. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सृष्टि की रचना के समय ब्रम्हा के 5 मुख हुआ करते थे, और इन्हीं से वह सभी दिशाओं में देखा करते थे, लेकिन आज हम जहां भी देखते हैं वहां तस्वीरों में ब्रम्ह देव के 4 मुख ही दिखाए जाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्रह्म देव का 5वां सिर कहां गया? आइए जानते हैं. माँ सरस्वती की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार हिन्दू पौराणिक कथाओं में सारी सृष्टि, जीव-जंतु, पेड़-पौधे, नर-नारी सभी भगवान ब्रम्हा द्वारा रचित बताए गए हैं. ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रम्हा के चार सिर हैं जो चारों वेदों के प्रतीक हैं. ब्रम्ह देव का एक सिर और हुआ करता था. मतलब उनके कुल 5 सिर थे. कथाओं में उल्लेख मिलता है कि जब ब्रह्म देव ने सारी सृष्टि की रचना कर ली, तब सृष्टि में मानव विकास के लिए उन्होंने एक बेहद सुन्दर स्त्री को बनाया. जिसका नाम सतरूपा था. देवी सतरूपा वैसे तो ब्रम्हा की पुत्री थीं. परन्तु वे इतनी सुन्दर थीं कि ब्रम्ह देव उनको देखते ही उनपर मोहित हो गए और उनको अपनाने के लिए आगे बढ़े, देवी सतरूपा उनसे बचने के लिए हर दिशा की तरफ जाने लगीं लेकिन ब्रम्ह देव ने अपने 3 सिर और उत्पन्न कर हर तरफ से देवी सतरूपा को देखना नहीं छोड़ा. जब सतरूपा ब्रम्ह देव की नजरों से नहीं बच पाईं. तब वे ऊपर की तरफ दौड़ने लगीं. उस समय ब्रम्ह देव ने अपने एक और सिर की उत्पत्ति की जो ऊपर की तरफ देख सके. देवी सतरूपा की ब्रम्हा से बचने की हर कोशिश नाकाम साबित हो गई. भगवान शिव ब्रम्ह देव की ये सब हरकतें देख रहे थे. शिव की दृष्टि में सतरूपा ब्रह्मा की पुत्री थीं, इसीलिए उन्हें यह घोर पाप लगा. इससे क्रोधित होकर भगवान शिव ने अपने एक गण भगवान भैरव को प्रकट किया और भगवान भैरव ने ब्रह्म देव का पांचवा सिर काट दिया. ताकि सतरूपा को उनकी कुदृष्टि से बचाया जा सके. जब ब्रम्हा का पांचवां सिर कट गया तब उन्हें होश आया और उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ.  (Disclaimer इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबधित विशेषज्ञ से संपर्क करें)

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माँ सरस्वती की कथा

माँ सरस्वती की कथा हंस एवं मोर की सवारी करने वाली सरस्वती देवी हिन्दुओं की मुख्य देवी माना जाता हैं, इन्हें शारदा, शतरूपा, वीणावादिनी, वीणापाणि, वाग्देवी, वागेश्वरी, भारती आदि नामों से भी भक्त पुकारते हैं. विद्या की अधिष्ठात्री देवी की उपासना करने से ज्ञान तथा सद्बुद्धि की प्राप्ति होती हैं. कहा जाता हैं कि कालिदास अपने जमाने का सबसे बड़ा मुर्ख था जिसने माँ सरस्वती की आराधना की जिससे वों महान कवि बन गया. बसंत पंचमी (माघ शुक्ल पंचमी) को इनका जन्म दिवस हैं. माँ सरस्वती की कथा महासरस्वती या चामुंडा माता की कथा एक समय शुम्भ निशुम्भ के दो दैत्य बहुत बलशाली थे. उनमे युद्ध में मनुष्य तो क्या देवता भी हार गये. जब देवताओं ने देखा कि अब युद्ध में जीत नही सकते. तब वे स्वर्ग छोड़कर भगवान विष्णु की स्तुति करने लगे. उस समय भगवान विष्णु के शरीर से एक ज्योति प्रकट हुई जो कि महासरस्वती थी. महासरस्वती अत्यंत रूपवान थी, उनका रूप देखकर वे दैत्य मुग्ध हो गये और अपना सुग्रीव नाम का  दूत उस देवी के पास अपनी इच्छा प्रकट करने के लिए भेजा. उस दूत को देवी ने वापिस कर दिया. उसके बाद उन दोनों ने सोच समझकर अपने सेनापति धुभ्राक्ष को सेना सहित भेजा, जो देवी  द्वारा सेना सहित मारा गया. फिर चंड मुंड लड़ने आए और वे भी मार डाले गये. इसके बाद रक्तबीज लड़ने आया, जिसके रक्त की एक बूंद जमीन पर गिरने से एक वीर पैदा होता था. वह बहुत बलवान था उसे भी देवी ने मार डाला. अंत में चामुंडा से शुम्भ निशुम्भ स्वयं दोनों लड़ने आए और देवी के हाथों मारे  गये. सभी देवता दैत्यों की मृत्यु के बाद बहुत खुश हुए और अपना अपना कार्य करने लगे. देवी सरस्वती को विद्या साहित्य एवं संगीत की देवी कहा जाता हैं, इन क्षेत्रों के लोगों एवं विद्यार्थियों द्वारा माँ सरस्वती की नित्य पूजा अर्चना की जाती हैं. माँ को खुश करने के लिए आरती, भजन, चालीसा, शारदे वंदना, शंखनाद आदि भी किए जाते हैं. हाथ में किताब एवं वाद्य यंत्र लिए पास में मोर की आकृति हरेक सरस्वती फोटो में देखने को मिलती हैं. शिक्षा को मानव का तीसरा चक्षु माना जाता हैं. शिक्षा एवं ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण बसंत पंचमी के दिन विद्यालयों तथा शिक्षण संस्थानों में सरस्वती वंदना के साथ विभिन्न कार्यक्रमों की शुरुआत होती हैं. हिन्दू देवी सरस्वती का निवास स्थान सत्यलोक में माना जाता हैं. एक मुख चार हाथ एक में माला एक में किताब तथा दोनों हाथों में वीणा धारण करने वाली देवी का वाहन हंस को माना जाता हैं. सरस्वती का पिता ब्रह्मा जी को माना जाता हैं. सरस्वती मंत्र इस प्रकार हैं. जिसका पूजा के समय उच्चारण करना चाहिए. “ॐ एं सरस्वत्यै नमः” यहाँ दिए गये सरस्वती फोटो गैलरी, सरस्वती फोटो डाउनलोड, माँ सरस्वती फोटो गैलरी को आप अपने मोबाइल में डाउनलोड कर सकते हैं.  माँ सरस्वती फोटो डाउनलोड, सरस्वती माँ का फोटो, सरस्वती माता का फोटो को अपनी स्क्रीन वालपेपर के रूप में सेट कर देवी को सम्मान प्रदान कर सकते हैं. बंसत पंचमी सरसवती फोटो, सरस्वती माता फोटो hd के दिन बेहतरीन तस्वीरों का पूजन कर आप अपने घर में भी सजा सकते हैं. या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥॥ शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌। हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌ वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥॥ माँ सरस्वती का पूजन किस दिन करें? हिंदू कैलेंडर के माघ महीने के वसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा की जाती है। पौराणिक ग्रंथों में ऐसा माना जाता है कि वसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती जी ब्रह्मा जी के मुख से प्रकट हुई थी। ‌] मां सरस्वती जी की पूजा बसंत पंचमी के पांचवे दिन की जाती है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मां सरस्वती जी की पूजा फरवरी महीने में की जाती है वसंत ऋतु के समय माता सरस्वती जी की पूजा करते समय लोग पीले रंग का वस्त्र धारण करते हैं। माँ सरस्वती के नाम (उनका अर्थ) माता सरस्वती के कई नाम हैं लेकिन इनमें प्रमुख हैं – शारदा – शिक्षा की देवी हंसवाहिनी – हंस के ऊपर विराजने वाली देवी। बुद्धिमाता – ज्ञान और बुद्धि की देवी। वरदायिनी – वर देने वाली देवी। भुवनेशवरी – पृथ्वी की देवी। सरस्वती माता का व्रत किस दिन होता है वसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती का पूजन निर्जल व्रत रखकर की जाती हैं और अन्य दिनों में मां सरस्वती व विष्णु जी की पूजा व्रत के साथ गुरुवार के दिन करना सबसे योग्य माना जाता है। माँ सरस्वती के पति कौन है सरस्वती पुराण के अनुसार मां सरस्वती जी का विवाह अपने पिता ब्रह्मा जी के साथ हुआ था। मां सरस्वती जी के पति ब्रह्मा जी हैं। बसंत पंचमी क्यों मनाई जाती है? वसंत पंचमी का त्यौहार हर साल मनाया जाता है लेकिन वसंत पंचमी मनाए जाने के पीछे एक बहुत ही प्रचलित लोक गाथा है जिसके अनुसार जब सृष्टिकर्ता ब्रह्मा देव सृष्टि का निर्माण कर रहे थे तब उन्होंने जीव जंतु, पेड़ पौधे, प्राणी पक्षी सभी की रचना की थी। लेकिन सृष्टि का निर्माण करते समय ब्रह्मा जी से कोई कमी रह गई थी जिसके कारण सृष्टि में कहीं भी आवाज का नामोनिशान नहीं था। इसीलिए ब्रह्मा जी ने जब अपने कमंडल से जल छिड़का तो उस जल से एक बहुत ही सुंदर स्त्री प्रकट हुई। 4 हाथों वाली सुंदर स्त्री के हाथ में वीणा दूसरे हाथ में पुस्तक तीसरे हाथ में माला और छोटे हाथ से वर मुद्रा बनी हुई थी। इस सुंदर स्त्री को ब्रह्मा जी ने माता सरस्वती का नाम दिया और उनसे वीणा बजाने के लिए कहा। जब माता सरस्वती जी ने वीणा बजाई तो सृष्टि के हर कोने कोने में स्वर गूंजने लगा। माता सरस्वती वसंत पंचमी के दिन प्रकट हुई थी इसीलिए बसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती की पूजा हर साल की जाती हैं। मां सरस्वती का पूजन कैसे करें? विद्या की देवी मां सरस्वती जी की पूजा पूरे विधि विधान से की जाती हैं। वसंत पंचमी के दिन माता सरस्वती की पूजा करते समय लोग पीले रंग का वस्त्र पहनते हैं और पूर्व या उत्तर की ओर

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क्‍यों अपनी ही पुत्री सरस्वती की ओर आकर्षित हुए थे ब्रह्मा? जानें इससे जुड़ी दो भिन्न कथाएं

भारत वर्ष के दो ग्रंथों ‘सरस्वती पुराण’ और ‘मत्स्य पुराण’ में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का अपनी ही बेटी सरस्वती से विवाह करने का प्रसंग है पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी की पत्नी माँ सावित्री देवी हैं, पुराणों के ही अनुसार ब्रह्मा जी ने एक और स्त्री से विवाह किया था जिनका नाम माँ गायत्री है। इतिहास अनुसार यह गायत्री देवी राजस्थान के पुष्कर की रहने वाली थी जो वेदज्ञान में पारंगत होने के कारण महान मानी जाती थीं। कहा जाता है एक बार पुष्‍कर में ब्रह्माजी को एक यज्ञ करना था और उस समय उनकी पत्नीं सावित्री उनके साथ नहीं थी तो उन्होंने गायत्री से विवाह कर यज्ञ संपन्न किया। लेकिन बाद में जब सावित्री को पता चला तो उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दे दिया। पुराणों में माँ सरस्वती के बारे में अलग-अलग मत मिलते हैं। एक मान्यता अनुसार सरस्वती तो ब्रह्मा की पत्नी सावित्री की पुत्री थीं। दूसरे मत अनुसरा वह ब्रह्मा की मानसपुत्र थीं। मान्यता है ब्रह्मा ने उन्हें अपने मुख से प्रकट किया था। एक दुसरे पौराणिक उल्लेख अनुसार देवी महालक्ष्मी “लक्ष्मी देवी नहीं” से जो उनका सत्व प्रधान रूप उत्पन्न हुआ, देवी का वही रूप ‘सरस्वती‘ कहलाया। यह तो ज्ञात है कि देवी सरस्वती का वर्ण श्‍वेत है उनकी छवि बहुत सुंदर है। ब्रह्मा जी के अनेक पुत्र और पुत्रियां थे। सरस्वती देवी को शतरूपा, वाग्देवी, वागेश्वरी, शारदा, वाणी और भारती भी कहा जाता है। भारत वर्ष के दो ग्रंथों ‘सरस्वती पुराण’ और ‘मत्स्य पुराण’ में सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का अपनी ही बेटी सरस्वती से विवाह करने का प्रसंग है जिसके फलस्वरूप इस धरती के प्रथम मानव ‘मनु’ का जन्म हुआ। सरस्वती पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना करते समय ब्रह्मा ने सीधे अपने वीर्य से सरस्वती को जन्म दिया था। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि सरस्वती की कोई मां नहीं केवल पिता, ब्रह्मा थे। स्वयं ब्रह्मा भी सरस्वती के आकर्षण से खुद को बचाकर नहीं रख पाए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी बनाने पर विचार करने लगे। इस कारण माँ सरस्वती ने अपने पिता की इस मनोभावना को भांपकर उनसे बचने के लिए चरों दिशाओं में छिपने का प्रयत्न किया लेकिन उनका हर प्रयत्न निष्फल हुआ। इसलिए माना जाता है विवश होकर उन्हें अपने पिता के साथ विवाह करना पड़ा। सरस्वती पुराण के अनुसार ब्रह्मा और सरस्वती करीब 100 वर्षों तक एक जंगल में पति-पत्नी की तरह रहे। इन दोनों का एक पुत्र भी हुआ जिसका नाम रखा गया था स्वयंभु मनु। माँ सरस्वती उत्पत्ति कथा मत्स्य पुराण अनुसार मत्स्य पुराण में यह कथा थोड़ी सी भिन्न है। मत्स्य पुराण अनुसार ब्रह्मा के पांच सिर थे। कहा जाता है कालांतर में उनका पांचवां सिर काल भैरव ने काट डाला था। कहा जाता है जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की तो वह समस्त ब्रह्मांड में अकेले थे। ऐसे में उन्होंने अपने मुख से सरस्वती, सान्ध्य, ब्राह्मी को उत्पन्न किया। और ब्रह्मा अपनी ही बनाई हुई रचना, सरवस्ती के प्रति आकर्षित होने लगे और लगातार उन पर अपनी कू दृष्टि डाले रहे। ब्रह्मा की कू दृष्टि से बचने के लिए सरस्वती चारों दिशाओं में छिपती रहीं लेकिन वह उनसे नहीं बच पाईं। अंत में सरस्वती आकाश में जाकर छिप गईं, लेकिन अपने पांचवें सिर से ब्रह्मा ने उन्हें आकाश में भी खोज निकाला और उनसे सृष्टि की रचना में सहयोग करने का निवेदन किया। सरस्वती से विवाह करने के पश्चात सर्वप्रथम स्वयंभु मनु को जन्म दिया। इसी कारण ब्रह्मा और सरस्वती की यह संतान ‘मनु’ को पृथ्वी पर जन्म लेने वाला पहला मानव कहा जाता है।

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महाकाली की कहानी

महाकाली विनाश और प्रलय की पूजनीय देवी हैं। महाकाली सार्वभौमिक शक्ति, समय, जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म और मुक्ति की देवी हैं। वह काल (समय) का भक्षण करती है और फिर अपनी काली निराकारता को फिर से शुरू कर देती है। वह महाकाल की पत्नी भी हैं, महाकाली भगवान शिव का ही एक रूप है। संस्कृत में महाकाली महाकाल का नारीकृत रूप है, पार्वती और उनके सभी रूप महाकाली के विभिन्न रूप हैं। महाकाली कौन है? माँ काली शक्ति का एक भयानक रूप है। एक दुष्ट राक्षश के विनाश के लिए उनका अवतरण हुवा था। उनकी त्वचा काली है, उनकी आभूषण खोपड़ी का एक लंबा हार और उनके कई हाथ है। उनकी जीभ तरस्ती गर्म खून के लिए बाहर लटकी हुई है। महाकाली की उत्पत्ति कैसे हुई? रक्तबीज नाम का एक राक्षश था ,उसे ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त था, के उसे स्त्री के आलावा और कोई मार नहीं सकता था। उसे यह भी वरदान था के उसके खून की एक बूँद ज़मीं पर गिरे तो एक और रक्तबीज राक्षश पैदा हो जाये। उसने देवताओ और ब्राह्मणो पर अत्याचार करके तीनो लोको में कोहराम मचा रखा था। देवता इस वरदान के कारण रक्तबीज को मारने में असमर्थ थे। युद्ध के मैदान में, जब देवता उसे मारते हैं, तो उसके खून की हर बूंद जो जमीन को छूती है, खुद को एक नए और अधिक शक्तिशाली रक्त बीज में बदल देती है, और पूरे युद्ध के मैदान को लाखों रक्त बीज के साथ से युद्ध करना पड़ता। निराशा में देवताओं ने मदद के लिए भगवान शिव का रुख किया। लेकिन जैसे ही भगवान शिव उस समय गहरे ध्यान में थे, देवताओं ने मदद के लिए उनकी पत्नी पारवती की ओर रुख किया। देवी ने तुरंत काली के रूप में इस खूंखार दानव से युद्ध करने के लिए निकल पड़े। महाकाली ने रक्तबीज को कैसे मारा? माता युद्ध करते समय जैसे ही उसे मारती तो रक्तबीज के शरीर की बूंद से एक नया रक्तबीज उत्पन्न होने लगा।  तब माता ने अपनी जीभा का आकर बड़ा कर लिया और फिर रक्तबीज का जैसे ही रक्त गिरता, तो वह माता के जीभा में गिरता, ऐसे करते-करते रक्त बीज कमज़ोर होने लगा, फिर माता ने उसका वध कर दिया। मां काली ने शिव जी के ऊपर पैर क्यों रखा ? रक्तबीज का वध करने के बाद महाकाली माता का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। उनका अति विक्राल स्वरुप के सामने आने से सब लोग डरने लगे,और उनके सामने जो भी आता उनका विनाश कर देती,उनको स्वयं ही नहीं पता था के वह क्या कर रही है। देवताओ की चिंता बढ़ गई के महाकाली माँ का गुस्सा कैसे शांत करे। तब देवता महादेव के पास गए और उनको विनंती की के माता को शांत करने का कोई मार्ग बताये। तब स्वयं भगवन शिव ने अनेक उपायों किये पर माता शांत न हो पाई। आखिर शिव जी ने खुद को माता के पैरो के बिच गिरा दिया और जैसे ही माता को शिवजी का स्पर्श हुवा। माता शांत हो गई, और महाकाली से पारवती बन गई। फिर सारे देवतागण जयजयकार करने लगे।

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दुर्गा कथा : मां पार्वती की पवित्र पौराणिक गाथा

‘या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।’  कैलाश पर्वत के निवासी भगवान शिव की अर्धांगिनी मां सती पार्वती को ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है। इसके अलावा भी मां के अनेक नाम हैं जैसे दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेरांवाली आदि, लेकिन सबमें सुंदर नाम तो ‘मां’ ही है। मंगलनाथ में भात पूजा माता की पवित्र कथा आदि सतयुग के राजा दक्ष की पुत्री पार्वती माता को शक्ति कहा जाता है। पार्वती नाम इसलिए पड़ा की वह पर्वतराज अर्थात् पर्वतों के राजा की पुत्र थी। राजकुमारी थी। लेकिन वह भस्म रमाने वाले योगी शिव के प्रेम में पड़ गई। शिव के कारण ही उनका नाम शक्ति हो गया। पिता की अनिच्छा से उन्होंने हिमालय के इलाके में ही रहने वाले योगी शिव से विवाह कर लिया। एक यज्ञ में जब दक्ष ने पार्वती (शक्ति) और शिव को न्यौता नहीं दिया, फिर भी पार्वती शिव के मना करने के बावजूद अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई, लेकिन दक्ष ने शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। पार्वती को यह सब सहन नहीं हुआ और वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। यह खबर सुनते ही शिव ने अपने सेनापति वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने कंधों पर धारण कर शिव ‍क्रोधित हो धरती पर घूमते रहे। इस दौरान जहां-जहां सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे वहां बाद में शक्तिपीठ निर्मित हो गए। जहां पर जो अंग या आभूषण गिरा उस शक्तिपीठ का नाम वह हो गया।  माता का रूप मां के एक हाथ में तलवार और दूसरे में कमल का फूल है। रक्तांबर वस्त्र, सिर पर मुकुट, मस्तक पर श्वेत रंग का अर्धचंद्र तिलक और गले में मणियों-मोतियों का हार हैं। शेर हमेशा माता के साथ रहता है। माता की प्रार्थना जो दिल से पुकार निकले वही प्रार्थना। न मंत्र, न तंत्र और न ही पूजा-पाठ। प्रार्थना ही सत्य है। मां की प्रार्थना या स्तुति के पुराणों में कई श्लोक दिए गए है।

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मंगलनाथ में भात पूजा- ONLINE PUJA

जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं। मांगलिक कुंडली वालों को विवाह के पूर्व मंगलनाथ में भात पूजा करने की सलाह दी जाती है। भात पूजा : भात अर्थात चावल। चावल से शिवलिंगरूपी मंगलदेव की पूजा की जाती है। जो मांगलिक हैं उन्हें विवाह पूर्व भात पूजा अवश्य करना चाहिए।  मंगलदेव की उत्पत्ति धरती माता से हुई थी। मंगलदेव का जन्म मध्यप्रदेश के अवंतिका अर्थात उज्जैन में हुआ था। जहां उनका जन्म हुआ था उसे मंगलनाथ स्थान कहते हैं। इस स्थान पर विश्व का एकमात्र मंगल ग्रह का मंदिर है। कहते हैं कि इस स्थान नर ही मंगल ग्रह की सीधी किरने धरती पर आती है। आप हमारे उच्च कोटि के विद्वान् ब्राम्हणो के द्वारा पूजा का आयोजन ऑनलाइन व् ऑफलाइन के माध्यम से करवा सकते हैं मंगल भात पूजा किसके द्वारा करवाई जानी चाहिए ?मंगल भात पूजा पूरी तरह से आपके जीवन से जुडी हुयी है इसलिए इस पूजा को विशिस्ट, सात्विक और विद्वान ब्राह्मण द्वारा गंभीरता पूर्वक करवानी चाहिए, पंडित श्री रमाकांत चौबे जी को इस पूजा का महत्त्व और विधि भली भांति से ज्ञात है और अभी तक इनके द्वारा की गयी पूजा गयी पूजा भगवान शिव की कृपा से सदैव सफल हुयी है। मंगल भात पूजा क्यों करवानी चाहिएकुछ व्यक्ति ऐसे होते है जिनकी कुंडली में मंगल भारी रहता है उसी को ज्योतिष की भाषा में मंगल दोष कहते है, मंगल दोष कुंडली के किसी भी घर में स्थित अशुभ मंगल के द्वारा बनाए जाने वाले दोष को कहते हैं, जो कुंडली में अपनी स्थिति और बल के चलते जातक के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समस्याएं उत्पन्न कर सकता है, तो वे अपने अनिष्ट ग्रहों की शांति के लिए मंगलनाथ मंदिर में पूजा-पाठ अवश्य करवाए, जैसा की उज्जैन को पुराणों में मंगल की जननी कहा जाता है इस लिए मंगल दोष को निवारण के लिए मंगल भात पूजा को उज्जैन में ही करवाने से अभीस्ट पुण्य एवं फल प्राप्त होता है. मंगल भात पूजा किसको करवानी चाहिए ?वैदिक ज्योतिष के अनुसार यदि किसी जातक के जन्म चक्र के पहले, चौथे, सातवें, आठवें और बारहवें घर में मंगल हो तो ऐसी स्थिति में पैदा हुआ जातक मांगलिक कहा जाता है अथवा इसी को मंगल दोष भी कहते है. यह स्थिति विवाह के लिए अत्यंत अशुभ मानी जाती है, ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि में एक मांगलिक को दूसरे मांगलिक से ही विवाह करना चाहिए. अर्थात यदि वर और वधु दोनों ही मांगलिक होते है तो दोनों के मंगल दोष एक दूसरे से के योग से समाप्त हो जाते है. किन्तु अगर ऐसा किसी कारण से ज्ञात नहीं हो पाता है, और किसी एक की कुंडली में मंगल दोष हो तो मंगल भात पूजा अवस्य करवा लेनी चाहिए. मंगल दोष एक ऐसी विचित्र स्थिति है, जो जिस किसी भी जातक की कुंडली में बन जाये तो उसे बड़ी ही अजीबोगरीब परिस्थिति का सामना करना पड़ता है जैसे संबंधो में तनाव व बिखराव, घर में कोई अनहोनी व अप्रिय घटना, कार्य में बेवजह बाधा और असुविधा तथा किसी भी प्रकार की क्षति और दंपत्ति की असामायिक मृत्यु का कारण मांगलिक दोष को माना जाता है. मूल रूप से मंगल की प्रकृति के अनुसार ऐसा ग्रह योग हानिकारक प्रभाव दिखाता है, आपको वैदिक पूजा-प्रक्रिया के द्वारा इसकी भीषणता को नियंत्रित करने के लिए उज्जैन के मंगलनाथ मंदिर में यह पूजा करवानी चाहिए। क्या मिलते हैं लाभ : 1. मंगलदोष निवारण के लिए विवाह पूर्व भात पूजा के अलावा पीपल विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह आदि के उपाय भी बताए जाते हैं। इन उपायों से वैधव्य योग समाप्त हो जाता है।  2. मंगल यंत्र पूजन का भी एक उपाय है परंतु यह विशेष परिस्थिति में किया जाता है। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि के समय ही मंगल यंत्र पूजन का विधान है। भात पूजा के समय भी यह कार्य किया जा सकता है। इससे दाम्पत्य जीवन में सुख की प्राप्ति होती है और संतान सुख मिलता है। 3. गोलिया मंगल ‘पगड़ी मंगल’ तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हो तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है। भात पूजा करने से सभी का दोष निवारण हो जाता है। GET IN TOUCH 9129388891

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कालसर्प दोष निवारण पूजा

कालसर्प दोष निवारण पूजा – ONLINE KARMASU

व्यक्ति के कर्म या उसके द्वारा किए गए कुछ पिछले कर्मों के परिणामस्वरूप कालसर्प योग दोष कुंडली में होना माना जाता है। इसके अलावा, यदि व्यक्ति ने अपने वर्तमान या पिछले जीवन में सांप को नुकसान पहुंचाया हो तो भी काल सर्प योग दोष की निर्मिति होती है। हमारे मृत पूर्वजों की आत्माए नाराज होने से भी यह दोष कुंडली में पाया जाता है। संस्कृत में काल सर्प दोष द्वारा कई सारे निहितार्थ सुझाए गए है। यह अक्सर कहा जाता है कि अगर काल सर्प दोष निवारण पूजा नहीं की गयी तो, संबंधित व्यक्ति के कार्य को प्रभावित करेगा और सबसे कठिन बना देगा। शिप्रा किनारे नृसिंह घाट पर बना विश्व का एकमात्र पारदेश्वर मंदिर अपने आपमें अनूठा है। महाकाल और हरसिद्धि मंदिर के समीप बने इस मंदिर में ढाई टन वजनी पारद शिवलिंग स्थापित है, जिसके दर्शन मात्र से ही समस्त पाप नष्ट होते हैं यहाँ आप हमारे विद्वान पंडितों के द्वारा घर बैठे अपने नाम गोत्र के साथ या आप यहाँ स्वयं जाकर हमारे माध्यम से कालसर्प दोष निवारण पूजा करवा सकते हैं कालसर्प दोष कुंडली में होने के लक्षण: यदि किसी व्यक्ति को पता नहीं की वे यह दोष से पीड़ित है या नहीं, या वो अनिश्चित है, तो निचे दिए गए कई लक्षण से कुंडली में स्थित काल सर्प योग के बारे में पता चल सकता है: यह भी कहा जाता है कि, कुछ लोगों को एयरोफोबिया ( अँधेरे से डर) भी होता है। किसी की भी कुंडली में इस प्रकार के योग को ठीक करने के लिए, विशेषज्ञ या पंडितजी से काल सर्प योग शांति पूजा करना आवश्यक है। GET IN TOUCH 9129388891

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