April 24, 2023

भगवान विष्णु के चरणों से निकला अमृत है गंगा

नीराकार ब्रह्म अर्थात् जलरूप ब्रह्म या द्रवरूप में ब्रह्म कोई ‘नराकार ब्रह्म’ (राम, कृष्ण) को भजता है , तो कोई ‘निराकार ब्रह्म’ को; परन्तु कलियुग में मनुष्य के पाप-तापों की शान्ति ‘नीराकार ब्रह्म’ से ही होती है । हिन्दी में ‘नीर’ जल को कहते हैं । ‘द्रव’ तरल पदार्थ को कहते हैं । अत: नीराकार ब्रह्म का अर्थ है ‘भगवान का जलमय रूप’ और यह रूप है मां गंगा मनुष्यों के तापों की शान्ति के लिए ब्रह्म का द्रवरूप होना गंगा को ‘ब्रह्मद्रव’ भी कहते हैं । ‘ब्रह्मद्रव’ का अर्थ है आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक (शारीरिक, मानसिक और भौतिक)—इन तीनों तापों से पीड़ित मनुष्यों की दशा से परमात्मा (ब्रह्म) का द्रवित होकर उनके तापों की शान्ति के लिए जल रूप में अवतरित होना । ताप चाहे कैसा भी हो उसकी शान्ति जल से ही होती है ।  गंगा का एक नाम ‘ब्रह्माम्बु’ है । अम्बु जल को कहते हैं, इसलिए ब्रह्म + अम्बु अर्थात् जलरूप ब्रह्म । भगवान की प्रत्येक लीला के पीछे लोककल्याण ही छिपा होता है । भगवान के जलमय रूप होने के पीछे भी कलियुग में मानव का कल्याण ही छिपा है । यदि गंगा का धरती पर अवतरण न हुआ होता तो कलियुग में मनुष्यों के पापों का मल कैसे धुलता? गंगा सप्तमी 2023 देवी गंगा के सम्मान का दिन भगवान विष्णु का चरणामृत है गंगा आदिकवि वाल्मीकि ने अपने ‘गंगाष्टक’ में गंगा को ‘मुरारि का चरणामृत’ कहा है । अपने प्रभु विष्णु का चरणामृत जानकर भगवान शंकर ने ब्रह्मस्वरूपिणी गंगा को अपने मस्तक पर धारण किया है । कवि रसखान ने तो यहां तक कह दिया कि गंगा समस्त व्याधियों की सर्वोत्तम औषधि है इसीलिए भगवान शंकर अपने मस्तक पर स्थित गंगा के भरोसे ही आक-धतूरे चबाते रहते हैं और उन्हीं के भरोसे उन्होंने हलाहल विष का पान कर लिया— ‘आक धतूरो चबात फिरैं,विष खात फिरैं सिव तोरे भरोसे ।। भगवान की विभूति है गंगा गंगा भगवान के चरणों से उत्पन्न हुई है, विष्णुपदी है, उसका महत्व केवल इतना ही नहीं है; अपितु गंगा साक्षात् परमात्मा की विभूति है । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (१०।३१) में गंगा को अपना स्वरूप बतलाते हुए कहा है—‘स्तोत्रसामस्मि जाह्नवी ।’   गंगा ब्रह्मजल है, उसमें भगवान के गुण होने के कारण वह सदैव शुद्ध, पवित्र व निर्विकार रहने वाला दिव्य पदार्थ है । इसीलिए वह शारीरिक व मानसिक रोगों को दूर करने व सांसारिक भोगों के साथ मोक्ष प्रदान करने की भी क्षमता रखता है गंग सकल मुद मंगल मूला ।सब सुख करनि हरनि सब सूला ।। (राचमा २।८७।४) गंगा के द्रवरूप में आविर्भाव की कथाएं वास्तव में गंगा गोलोक या विष्णुलोक में भगवान श्रीहरि की ही एक स्वरूपाशक्ति हैं । गंगा की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुराणों में अनेक कथाएं है । यहां गंगा के नीराकार ब्रह्मस्वरूप को दर्शाती दो पौराणिक कथाओं का उल्लेख किया जा रहा है । ब्रह्मवैवर्तपुराण (प्रकृतिखण्ड) में गंगा की द्रवरूप में उत्पत्ति की कथा इस प्रकार है श्रीराधाकृष्ण का जलरूप है गंगा एक बार गोलोक में श्रीकृष्ण कार्तिक पूर्णिमा के दिन रासमहोत्सव मना रहे थे । रासमण्डल में श्रीकृष्ण श्रीराधा की पूजा कर विराजमान थे । उसी समय श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए सरस्वती प्रकट हुईं और उन्होंने अपनी मधुर स्वरलहरी में गीत गाकर और दिव्य वीणा के वादन से सारा वातावरण झंकृत कर दिया । उसी समय भगवान शंकर भी श्रीकृष्ण सम्बन्धी सरस पद गाने लगे । उसे सुनकर सभी देवगण मूर्छित हो गए । जब उनकी चेतना लौटी तब वहां श्रीराधाकृष्ण के स्थान पर सारे रासमण्डल में जल-ही-जल फैला हुआ था । सभी गोप-गोपी और देवगण भगवान श्रीराधाकृष्ण को न पाकर विलाप करते हुए उनसे पुन: प्रकट होने की प्रार्थना करने लगे । तब भगवान श्रीकृष्ण  ने आकाशवाणी द्वारा कहा मैं सर्वात्मा श्रीकृष्ण और मेरी स्वरूपाशक्ति श्रीराधा—हम दोनों ने ही भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए यह जलमय विग्रह (नीराकार स्वरूप) धारण कर लिया है ।’ यदि कोई मनुष्य गंगा का जल हाथ में लेकर प्रतिज्ञा करेगा और फिर उस अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन नहीं करेगा वह नरक का भागी होगा । वे ही पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण और राधा जलरूप होकर गंगा बन गए और वह दिव्य जलराशि ही ‘देवनदी’ गंगा के नाम से प्रसिद्ध हुई । गोलोक से प्रकट होने वाली गंगा का यही रहस्य है । श्रीमद्देवीभागवत में गंगा के ब्रह्मद्रव रूप में आविर्भाव की कथा दक्षकन्या सती के देहत्याग करने पर जब भगवान शिव तप करने लगे, तब देवताओं ने जगन्माता की स्तुति कर उनसे दोबारा भगवान शंकर का वरण करने की प्रार्थना की । देवी ने तब प्रसन्न होकर कहा मैं दो रूपों में पर्वतराज हिमालय और मैना के घर प्रकट होऊंगी ।’ पहले वे अपने अंश रूप से वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को गंगा रूप में प्रकट हुईं फिर पूर्णावतार धारणकर पार्वती के रूप में प्रकट हुईं । हिमालय के घर में सती का अंशावतार गंगा के रूप में प्रकट होने पर ब्रह्मा आदि देवताओं ने सोचा कि सती के छायाशरीर को लेकर जब शिवजी ताण्डव कर रहे थे तो उनके पैरों के आघात से पृथ्वी रसातल में जाने लगी । जगत की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने चक्र से छायासती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे, उस अपराध के कारण भगवान शिव अभी तक हमसे रुष्ट हैं । यदि हम गंगा को शिवजी को प्रदान कर दें तो वे हमसे अवश्य प्रसन्न हो जाएंगे जैसे छायासती भगवान शिव के सिर पर स्थित रहीं वैसे ही ये गंगा जलरूप में उनके सिर पर सुशोभित रहेंगी । गंगा की ब्रह्मलोक से भूलोक तक की यात्रा ब्रह्माजी सहित सभी देवगण हिमालय के घर गंगा को मांगने के लिए पहुंच गए और उन्हें सारी बात बता दी । गिरिसुता गंगा पिता की आज्ञा से सदाशिव को पतिरूप में प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी के कमण्डलु में निराकार रूप से स्थित हो कर स्वर्गलोक में आ गयीं ।  जब उनकी माता मैना को यह बात पता चली तो उन्होंने गुस्से में शाप देते हुए कहा माता से बिना बात किए तुम स्वर्ग चलीं गयीं, इसलिए तुम्हें जलरूप में पुन: पृथ्वी पर आना होगा ।’ ब्रह्माजी ने मूर्तिमान गंगा को शंकरजी को दे दिया और वे शंकरजी के साथ कैलास चली गयीं । ब्रह्माजी की प्रार्थना पर एक अंश से वे निराकार रूप में उनके कमण्डलु में स्थित हो गयीं और ब्रह्माजी उन्हें ब्रह्मलोक में ले गए । गंगा के शंकरजी

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गंगा सप्तमी 2023 देवी गंगा के सम्मान का दिन

गंगा सप्तमी को ज्यादातर भारत के उत्तरी भागों में बहुत जोश और उत्साह के साथ मनाया जाता है। हिंदू धर्म में, गंगा नदी को सबसे पवित्र नदी माना जाता है और इसे देवी के रूप में पूजा जाता है। इस प्रकार, गंगा सप्तमी को हिंदुओं के लिए एक शुभ दिन माना जाता है और यह देवी गंगा को समर्पित है। इसे जाह्नु सप्तमी के रूप में भी जाना जाता है, और गंगा पूजन वह दिन है जिसे देवी गंगा के पुनर्जन्म का सम्मान करने के लिए मनाया जाता है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, गंगा सप्तमी वैशाख महीने के दौरान चंद्रमा के वैक्सिंग चरण के 7 वें दिन मनाई जाती है, जिसे बैशाख के नाम से भी जाना जाता है, यानी शुक्ल पक्ष की सप्तमी को। इस दिन, अधिकांश हिंदू तीर्थ स्थानों में भक्तों द्वारा विशेष पूजा और प्रार्थना की जाती है, जहां गंगा नदी उत्तराखंड में ऋषिकेश, इलाहाबाद में त्रिवेणी संगम आदि से गुजरती है। आइए जानते हैं गंगा सप्तमी का महत्व और इस पर्व के पीछे की कथा गंगा सप्तमी 2023 तिथि और समय इस वर्ष गंगा सप्तमी 27 अप्रैल, 2023 को मनाई जाएगी। महत्वपूर्ण समय नीचे दिए गए हैं गंगा सप्तमी मध्याह्न मुहूर्त – सुबह 11 बजे से दोपहर 01:38 बजे तकअवधि – 02 घंटे 38 मिनटसप्तमी तिथि शुरू – 26 अप्रैल 2023 को सुबह 11:27 बजेसप्तमी तिथि समाप्त – 27 अप्रैल 2023 को दोपहर 1:38 बजेगंगा सप्तमी की कथा और महत्व सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा पद्म पुराण, ब्रह्म पुराण और नारद पुराण जैसे पवित्र ग्रंथों में गंगा सप्तमी के पीछे के महत्व और कथा का उल्लेख है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि देवी गंगा सबसे पहले ‘गंगा दशहरा’ के दिन पृथ्वी पर आई थीं। लेकिन एक बार ऐसा हुआ कि संत जह्नु ने गंगा नदी का जल पी लिया। हालांकि, देवताओं और राजा भगीरथ के अनुरोध के बाद, ऋषि जाह्नु ने वैशाख महीने में शुक्ल पक्ष सप्तमी के दिन एक बार फिर गंगा को छोड़ दिया। तब से, इस दिन को गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है, और यह देवी गंगा के पुनर्जन्म का प्रतीक है। इसके अलावा, ऋषि जाह्नु की बेटी होने के कारण, देवी गंगा को ‘जाह्नवी’ भी कहा जाता है, और परिणामस्वरूप, इस दिन को ‘जह्नु सप्तमी’ भी कहा जाता है। भारत में गंगा नदी को बहुत पवित्र माना जाता है। गंगा सप्तमी पर किए जाने वाले समारोह और अनुष्ठान उन स्थानों में बहुत प्रसिद्ध हैं जहां गंगा और उसकी सहायक नदियां बहती हैं। हिंदू भक्तों के लिए, जो देवी गंगा की पूजा करते हैं, यह दिन बहुत ही आशाजनक है, और वे पवित्र जल में डुबकी भी लगाते हैं। ऐसा माना जाता है कि गंगा नदी में पवित्र स्नान करने से लोगों को उनके सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। कई हिंदू भक्त भी गंगा नदी के पास अंतिम संस्कार करने की इच्छा रखते हैं क्योंकि यह उन्हें मोक्ष के मार्ग पर ले जाता है। ज्योतिष की दृष्टि से भी यह पर्व महत्वपूर्ण है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, इस दिन देवी गंगा की पूजा करने से व्यक्ति मंगल दोष के प्रभाव को कम कर सकता है, क्योंकि यह जन्म कुंडली में ‘मंगल’ के प्रभाव को कम करता है। गंगा सप्तमी पर किए जाने वाले अनुष्ठान इस दिन आपको कुछ अनुष्ठानों का पालन करना चाहिए: सुबह सूर्योदय से पहले उठकर गंगा नदी में पवित्र स्नान करें। इसके अलावा, देवी गंगा की पूजा करें, क्योंकि यह बहुत अनुकूल मानी जाती है।कोई गंगा नदी के पार एक माला विसर्जित कर सकता है और प्रसिद्ध गंगा आरती में भाग ले सकता है। गंगा आरती का विशेष महत्व है क्योंकि माना जाता है कि इस दिन “माँ गंगा” स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित होती है।यह कई घाटों पर किया जाता है और भारत के विभिन्न हिस्सों से लाखों भक्त इस आरती में भाग लेते हैं।गंगा आरती समाप्त होने के बाद, संत अपने आस-पास मौजूद सभी लोगों को दीपक प्रसारित करते हैं। अपने नीचे किए हुए हाथों को लौ पर रखें और शुद्धि और आशीर्वाद लेने के लिए अपनी हथेलियों को माथे पर उठाएं। यहां, आरती में छोटे दीये और फूल होते हैं जिन्हें बाद में नदी में बहा दिया जाता है।गंगा सप्तमी के दिन दीपदान की रस्म या दीप या दीपक का दान किया जाता है। पवित्र नदी के किनारे विशाल मेलों का भी आयोजन किया जाता है।गंगा सप्तमी के दिन गंगा सहस्रनाम स्तोत्र और ‘गायत्री मंत्र’ का पाठ करना भी बहुत शुभ माना जाता है। अंत गंगा को हिंदुओं के लिए एक ‘देवी’ या देवी के रूप में देखा जाता है, और इस प्रकार, भक्त गंगा सप्तमी पर पूर्ण समर्पण और भक्ति के साथ उनकी पूजा करते हैं। इससे उन्हें सुख, यश और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

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गंगा सप्तमी पर बन रहा है अत्यंत शुभ योग, जरूर करें ये खास उपाय

तिष पंचांग के अनुसार, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि के दिन गंगा सप्तमी मनाई जाती है। गंगा सप्तमी के दिन मां गंगा की विशेष उपासना की जाती है और इस दिन को मां गंगा के धरती पर प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। बता दें कि इस वर्ष 27 अप्रैल 2023, गुरुवार के दिन गंगा सप्तमी मनाई जाएगी। इस विशेष दिन पर मां गंगा की उपासना करने से और पितरों को जल प्रदान करने से साधक को कई गुना लाभ मिलता है। ज्योतिष शास्त्र में गंगा सप्तमी के संदर्भ में कई उपाय बताए गए हैं। साथ ही यह भी बताया गया है कि इस विशेष दिन पर गंगा स्नान करने के बाद पितरों को गंगा जल अर्पित करने से और दान-धर्म करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और साधकों को सुख-समृद्धि एवं ऐश्वर्य का आशीर्वाद मिलता है। गंगा सप्तमी 2023 शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि का शुभारंभ 26 अप्रैल को सुबह 11:27 पर होगा और इस तिथि का समापन 27 अप्रैल को दोपहर 1:48 पर हो जाएगा। उदया तिथि के अनुसार यह पर्व 27 अप्रैल 2023, गुरुवार के दिन मनाया जाएगा। इस विशेष दिन पर सर्वार्थ सिद्धि योग पूरे दिन रहेगा और गुरु पुष्य योग सुबह 7 बजे से अगली सुबह 5:43 मिनट तक रहेगा। गंगा सप्तमी के दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 4:17 से सुबह 5:01 के बीच रहेगा। मान्यता है कि ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान करने से साधक के सभी पाप धुल जाते हैं और उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है। सृष्टि के रचयिता ब्रम्ह देव के 4 सिर क्यों है, जानें इसकी पौराणिक कथा गंगा सप्तमी के दिन जरूर करें यह कार्य गंगा सप्तमी के विशेष अवसर पर स्नान ध्यान के बाद मां गंगा की पूजा अवश्य करें। इसके लिए एक कटोरी में गंगा जल भर लें और उस कटोरी के समक्ष गाय के घी का दीपक जलाकर मां गंगा की पूजा करें। इसके बाद आरती के साथ पूजा संपन्न करें। गंगा सप्तमी के दिन दान-पुण्य का विशेष महत्व है। इसलिए इस विशेष दिन पर किसी जरूरतमंद, गरीब, असहाय अथवा किसी ब्राह्मण को अन्न, धन या वस्त्र का दान अवश्य करें ऐसा करने से साधक को मोक्ष की प्राप्ति होती है और कई जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं।गंगा सप्तमी के दिन भगवान शिव का जलाभिषेक जरूर करें। ऐसा इसलिए क्योंकि भगवान शिव की जटाओं से ही मां गंगा प्रवाहित होती हैं। ऐसे में इस दिन एक पात्र में गंगाजल भरकर भगवान शिव का जलाभिषेक करें और महादेव को बेलपत्र अर्पित करें।

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