April 14, 2023

सत्यवान और सावित्री की कहानी STORY

सावित्री के पतिव्रता धर्म की कथा का सार :- यह है कि एकनिष्ठ पतिपरायणा स्त्रियां अपने पति को सभी दुख और कष्टों से दूर रखने में समर्थ होती है। जिस प्रकार पतिव्रता धर्म के बल से ही सावित्री ने अपने पति सत्यवान को यमराज के बंधन से छुड़ा लिया था। इतना ही नहीं खोया हुआ राज्य तथा अंधे सास-ससुर की नेत्र ज्योति भी वापस दिला दी। STORY OF SATYAWAN AND SAVITRI सावित्री देवी ने कहा – ” राजन ! तुम मेरे नित्य भक्त हो, अतः मैं तुम्हें कन्या प्रदान करूँगी। मेरी कृपा से तुम्हें सर्वांग सुंदरी कन्या प्राप्त होगी। “ यह कहकर वह देवी आकाश में बिजली की भाँति अदृश्य हो गयी। उस राजा की मालती नाम की पतिव्रता पत्नी थी। समय आने पर उसने सावित्री के समान रूपवाली एक कन्या को जन्म दिया। तब राजा ने ब्राह्मणों से कहा – ” तप के द्वारा आवाहन किये जाने पर माता सावित्री ने इसे मुझे दिया है तथा यह सावित्री के समान रूपवाली है, अतः इसका नाम सावित्री होगा। “ तब उन ब्राह्मणों ने उस कन्या का नाम सावित्री रख दिया। समय बीतने पर जब सावित्री युवती हुई तब सावित्री को वर खोजने के लिये कहा गया तो उसने द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पतिरूप में वरण कर लिया। इधर यह बात जब नारदजी को मालूम हुई तो वे राजा अश्वपति के पास आकर बोले कि आपकी कन्या ने वर खोजने में बड़ी भारी भूल की है। सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा अवश्य है, परंतु वह अल्पायु है। एक वर्ष बाद ही उसकी मृत्यु हो जायेगी। राजकुमारी सावित्री को सत्यवान नाम के एक निर्धन युवक से प्रेम हो गया। नारद मुनि ने उसे समझाया कि वह सत्यवान से विवाह ना करें क्योंकि उसकी मौत जल्दी होना तय है। सावित्री ने नारद की बात नहीं मानी और सत्यवान से विवाह कर लिया। जल्द ही सत्यवान की मृत्यु का दिन आ गया। यमराज स्वयं उसे लेने आए। सावित्री ने उनसे सत्यवान के प्राण ना लेने की विनती की लेकिन यम ने कहा की मृत्यु को कोई नहीं रोक सकता। सावित्री उनके पीछे मिलो मिल चलती गई। उसकी लगन देखकर यम बहुत प्रभावित हुए और बोले, “मैं तुम्हें दो वरदान देता हूं; तुम सत्यवान के प्राणों को छोड़कर कुछ भी मांग लो।” सावित्री ने पहले वरदान में अपने ससुर की कुशलता की मांग की। और दूसरे वरदान में उसने चतुराई दिखाते हुए अपने लिए सौ पुत्रों की मांग कर दी। यम ने बिना सोचे समझे हां कर दी। क्योंकि बिना पति के वह पुत्र कैसे पा सकेगी। यम निरुत्तर हो गए और उन्होंने सावित्री के पति सत्यवान के प्राण लौटा दिए। STORY OF SATYAWAN AND SAVITRI who is savitri what are the first two things savitri asks for from yamraj? savitri satyavan from the mahabharata satyavan from the mahabharata savitri story of savithri and satyavan

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भगवान शिव ने पार्वती जी की मगरमच्छ बनकर क्यों ली परीक्षा, पढ़ें ये पौराणिक कथा

हिंदू धर्म में सोमवार के दिन का बेहद महत्व माना जाता है. सोमवार का दिन भगवान भोलेनाथ (Lord Shiva) को समर्पित होता है. जो भी व्यक्ति सोमवार के दिन विधि-विधान से शिवजी का पूजन और आराधना करता है. उसके जीवन के समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं. इसके साथ ही जीवन में सुख एवं समृद्धि का वास हो जाता है. भगवान भोलेनाथ को बेहद जल्दी प्रसन्न होने वाला देवता भी माना जाता है. भोलेनाथ का विवाह पार्वती जी के साथ हुआ था. इसके लिए पार्वती जी ने सैंकड़ों वर्षों तक कठिन तप किया था. तप के बाद एक वक्त ऐसा भी आया था जब पार्वती जी को भगवान शिव की परीक्षा का सामना करना पड़ा था. आइए जानते हैं ये पौराणिक कथा.. शिव जी ने ली इस तरह परीक्षा पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए सैकड़ों वर्षों तक कठोर तप किया था. उनकी तपस्या को देखकर देवताओं ने शिवजी से देवी पार्वती की मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना की थी. इसके बाद भोलेनाथ ने सप्तर्षियों को पार्वती जी की परीक्षा लेने के लिए भेजा. इस परीक्षा के दौरान सप्तर्षियों ने शिवजी के ढेरों अवगुणों को बताते हुए माता पार्वती से शिव जी से विवाह न करने का कहा लेकिन पार्वती जी अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुईं.इस पर खुद भोलेनाथ ने माता पार्वती की परीक्षा लेने का निर्णय लिया. माता पार्वती के तप से प्रसन्न होकर शंकर जी उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए. कुछ क्षणों बाद ही एक मगरमच्छ ने एक लड़के को पकड़ लिया और लड़का मदद के लिए पुकारने लगा. बच्चे की आवाज सुनकर पार्वती जी नदी किनारे पहुंची और उनका मन द्रवित हो गया. इस बीच लड़के ने माता पार्वती को देखकर कहा कि मेरी न मां है न बाप, न कोई मित्र ही है..माता आप ही मेरी रक्षा करें. इस पर पार्वती जी ने मगरमच्छ से कहा कि ग्राह इस लड़के को छोड़ दें. इस पर मगरमच्छ ने कहा कि दिन के छठे पहर जो मुझे मिलता है उसे आहार बनाना मेरा नियम है. पार्वती जी के विनती करने पर मगरमच्छ ने लड़के को छोड़ने के बदले में पार्वती जी के तप से प्राप्त वरदान का पुण्य फल मांग लिया. इस पर पार्वती जी तैयार हो गईं. मगरमच्छ ने बालक को छोड़ दिया और तेजस्वी बन गया. अपने तप का फल दान करने के बाद पार्वती जी ने बालक को बचा लिया और एक बार फिर भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए तप करने बैठ गईं. इस पर भोलेनाथ दोबारा प्रकट हुए और पूछा कि तुम अब क्यों तप कर रही हो, मैंने तम्हें पहले ही मनमांगा दान दे दिया है. इस पर पार्वती जी ने अपने तप का फल दान करने की बात कही. इस पर शिवजी प्रसन्न होकर बोले मगरमच्छ और लड़के दोनों के स्वरूप में मैं ही था. मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था कि तुम्हारा चित्त प्राणिमात्र में अपने सुख दुख का अनुभव करता है या नहीं. तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए ही मैंने ये लीला रचाई थी. अनेको रूप में दिखने वाला मैं ही एक सत्य हूं. अनेक शरीरों में नजर आने वाला मैं निर्विकार हूं. इस तरह पार्वती जी शिव जी की परीक्षा में उत्तीर्ण हुई और उनकी अर्धांगिनी बनी पार्वती जी ने कहा- हे ग्राह ! तप तो मैं पुन: कर सकती हूं, किंतु यदि तुम इस लड़के को निगल जाते तो क्या इसका जीवन वापस मिल जाता ? देखते ही देखते वह लड़का अदृश्य हो गया। मगरमच्छ लुप्त हो गया। पार्वती जी ने विचार किया- मैंने तप तो दान कर दिया है। अब पुन: तप आरंभ करती हूं। पार्वती ने फिर से तप करने का संकल्प लिया। भगवान सदाशिव फिर से प्रकट होकर बोले- पार्वती, भला अब क्यों तप कर रही हो? पार्वती जी ने कहा- प्रभु ! मैंने अपने तप का फल दान कर दिया है। आपको पतिरूप में पाने के संकल्प के लिए मैं फिर से वैसा ही घोर तप कर आपको प्रसन्न करुंगी। महादेव बोले- मगरमच्छ और लड़के दोनों रूपों में मैं ही था। तुम्हारा चित्त प्राणिमात्र में अपने सुख-दुख का अनुभव करता है या नहीं, इसकी परीक्षा लेने को मैंने यह लीला रची। अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक ही एक हूं। मैं अनेक शरीरों में, शरीरों से अलग निर्विकार हूं। तुमने अपना तप मुझे ही दिया है इसलिए अब और तप करने की जरूरत नहीं…. देवी ने महादेव को प्रणाम कर प्रसन्न मन से विदा किया।

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भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को क्यों दिया था श्राप पढ़ें यह पौराणिक कथा

लक्ष्मी माता का दिन माता लक्ष्मी  की पूजा के लिए समर्पित है. आज लोग माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए कई प्रकार के उपाय करते हैं. जिन पर माता लक्ष्मी की कृपा हो जाती है, वह धन धान्य से परिपूर्ण हो जाता है. हर कोई उनका आशीर्वाद प्राप्त कर लेना चाहता है. कोई नहीं चाहता कि माता लक्ष्मी उससे नाराज हो जाएं. हालांकि एक बार भगवान विष्णु  माता लक्ष्मी से नाराज हो गए थे और उनको श्राप दे दिया था. आखिर ऐसा क्यों हुआ? पढ़ें यह पौराणिक कथा. पौराणिक कथाओं में जिक्र मिलता है कि एक बार श्री हर‍ि धरती पर भ्रमण के लिए जा रहे थे। तभी देवी लक्ष्‍मी ने उनके साथ चलने की अनुमति मांगी। कई बार कहने पर भगवान विष्‍णु ने कहा कि वह साथ चल सकती हैं लेकिन उन्‍हें एक शर्त माननी होगी। उन्‍होंने कहा कि धरती पर कैसी भी स्थिति आए लेकिन उन्‍हें उत्‍तर द‍िशा की ओर नहीं देखना है। देवी लक्ष्‍मी भी भगवान की शर्त मान लेती हैं और साथ चल देती हैं। इस तरह खुद को रोक न सके भगवान और रो पड़े कथा मिलती है कि जब श्री विष्‍णु और माता लक्ष्‍मी पर भ्रमण कर रहे थे। तभी देवी की नजर उत्‍तर द‍िशा की ओर पड़ी। उस ओर इतनी हरियाली थी कि वह खुद को रोक न सकीं और सामने द‍िख रहे बगीचे में चली गईं। इसके बाद उन्‍होंने उस बाग से एक पुष्‍प तोड़ लिया और भगवान विष्‍णु के पास वापस आईं। उन्‍हें देखते ही श्री हरि रो पड़े। तभी माता लक्ष्‍मी को उनकी शर्त याद आई। तब भगवान विष्‍णु ने कहा कि बिना किसी से पूछे उसकी किसी भी वस्‍तु को छूना अपराध है। जब माता लक्ष्मी को मिला श्राप एक समय की बात है माता लक्ष्मी एक सुंदर अश्व को देखने में इतनी ध्यानमग्न थीं, कि उन्होंने भगवान विष्णु की बातों पर ध्यान नहीं दिया. इससे क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने उनको पृथ्वी लोक पर अश्वी बनने का श्राप दे दिया. इससे माता लक्ष्मी दुखी हो गईं, तो भगवान विष्णु ने कहा कि आपको कुछ समय के लिए अश्व की योनी में रहना होगा. फिर आपको एक पुत्र होगा. उसके बाद ही उस योनी से मुक्ति मिलेगी जब समय आया तो माता लक्ष्मी पृथ्वी पर अश्व की योनी में जीवन व्यतीत करने लगीं. उन्होंने काफी समय तक भगवान शिव की आराधना की. अपने तप से उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न किया. भगवान शिव ने कहा कि आपके पति भगवान विष्णु इस पूरे संसार के पालनहार हैं. एक स्त्री का पति ही उसका भगवान होता है. आपको केवल भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए. इस पर माता लक्ष्मी ने कहा कि आप में और श्रीहरि में कोई भेद नहीं हैं. बस दोनों का स्वरूप अलग अलग है. आप यह दुख दूर कीजिए ताकि वह अश्व की योनी से मुक्त हों. इस पर प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको आशीष दिया और भगवान विष्णु को पृथ्वी लोक पर जाने के बारे में अवगत कराने का वचन दिया. कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने अश्व रुप में अवतार लिया और माता लक्ष्मी के साथ अश्व योनी में समय व्यतीत किया. माता लक्ष्मी ने कुछ समय बाद एकवीर नामक पुत्र को जन्म दिया. उसके फलस्वरूप माता लक्ष्मी श्राप से मुक्त होकर वैकुंठ धाम चली गईं. एकवीर से हैहय वंश की उत्पत्ति हुई

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दीपावली पर प्रचलित है लक्ष्मी जी की यह पौराणिक कथा

हमारी लोक संस्कृति में दीपावली त्योहार और माता लक्ष्मी की बड़ी सौंधी सी कथा प्रचलित है। एक बार कार्तिक मास की अमावस को लक्ष्मीजी भ्रमण पर निकलीं। चारों ओर अंधकार व्याप्त था। वे रास्ता भूल गईं। उन्होंने निश्चय किया कि रात्रि वे मृत्युलोक में गुजार लेंगी और सूर्योदय के पश्चात बैकुंठधाम लौट जाएंगी, किंतु उन्होंने पाया कि सभी लोग अपने-अपने घरों में द्वार बंद कर सो रहे हैं।  तभी अंधकार के उस साम्राज्य में उन्हें एक द्वार खुला दिखा जिसमें एक दीपक की लौ टिमटिमा रही थी। वे उस प्रकाश की ओर चल दीं। वहां उन्होंने एक वृद्ध महिला को चरखा चलाते देखा। रात्रि विश्राम की अनुमति मांग कर वे उस बुढ़िया की कुटिया में रुकीं।  वृ्द्ध महिला लक्ष्मीदेवी को बिस्तर प्रदान कर पुन: अपने कार्य में व्यस्त हो गई। चरखा चलाते-चलाते वृ्‍द्धा की आंख लग गई। दूसरे दिन उठने पर उसने पाया कि अतिथि महिला जा चुकी है किंतु कुटिया के स्थान पर महल खड़ा था। चारों ओर धन-धान्य, रत्न-जेवरात बिखरे हुए थे। कथा की फलश्रुति यह है कि मां लक्ष्मीदेवी जैसी उस वृद्धा पर प्रसन्न हुईं वैसी सब पर हों। और तभी से कार्तिक अमावस की रात को दीप जलाने की प्रथा चल पड़ी। लोग द्वार खोलकर लक्ष्मीदेवी के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे। किंतु मानव समाज यह तथ्य नहीं समझ सका कि मात्र दीप जलाने और द्वार खोलने से महालक्ष्मी घर में प्रवेश नहीं करेंगी। बल्कि सारी रात परिश्रम करने वाली वृद्धा की तरह कर्म करने पर और अंधेरी राहों पर भटक जाने वाले पथिकों के लिए दीपकों का प्रकाश फैलाने पर घरों में लक्ष्मी विश्राम करेंगी। ध्यान दिया जाए कि वे विश्राम करेंगी, निवास नहीं। क्योंकि लक्ष्मी का दूसरा नाम ही चंचला है। अर्थात् अस्थिर रहना उनकी प्रकृति है। इस दीपोत्सव पर कामना करें कि राष्ट्रीय एकता का स्वर्णदीप युगों-युगों तक अखंड बना रहे। हम ग्रहण कर सकें नन्हे-से दीप की कोमल-सी बाती का गहरा-सा संदेश कि बस अंधकार को पराजित करना है और नैतिकता के सौम्य उजास से भर उठना है।  ।। न क्रोधो न च मात्सर्य न लोभो ना शुभामति: भवन्ति कृत पुण्यानां भक्तानां सूक्त जापिनाम्।। अर्थात् लक्ष्मी सूक्त का पाठ करने वाले की क्रोध, मत्सर, लोभ व अन्य अशुभ कर्मों में वृत्ति नहीं रहती। वे सत्कर्मों की ओर प्रेरित होते हैं।

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