April 12, 2023

बाल ब्रह्मचारी होने के बाद भी हनुमान जी को क्यों करने पड़े 3 विवाह पढ़ें पूरी कथा

ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी का विवाह नहीं हुआ था और वे बाल ब्रह्मचारी थे लेकिन ऐसा नहीं है. कुछ शास्त्रों में हनुमान जी के विवाहित होने की बात कही गई है. श्रीराम भक्त हनुमान जी के देश और दुनिया में करोड़ों भक्त हैं. लोगों की बजरंगबली में बड़ी श्रद्धा है. कहते हैं हनुमान जी का नाम लेने भर से मन का ख़ौफ़ ख़त्म हो जाता है. आपने पहलवानों को भी बजरंगबली की पूजा करते देखा होगा. ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी जीवन भर ब्रह्म्चर्य का पालन करते हुए प्रभु श्रीराम की सेवा करते रहे. हिन्दू धर्मशास्त्रों में पवनसुत हनुमान को राम भक्त के रूप में जाना और पूजा जाता है. ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी जीवन भर ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करते हुए प्रभु श्रीराम की सेवा करते रहे. लेकिन वहीं कुछ पौराणिक शास्त्रों में हनुमान जी के विवाहित होने की बात कही गई है. यहां तक की आंध्रप्रदेश में हनुमान जी का एक ऐसा मंदिर है जहां पर हनुमान जी के साथ उनकी पत्नी की भी मूर्ति स्थापित की गई है. आंध्रप्रदेश का यह मंदिर हनुमान जी के विवाह के गवाह का एकमात्र मंदिर माना जाता है. आइए जानते हैं हनुमान जी के तीन विवाह के बारे में  सूर्य की पुत्री सुवर्चला के साथ विवाह  सूर्य की पुत्री सुवर्चला और हनुमान जी के विवाह का उल्लेख पराशर संहिता में मिलता है. पराशर संहिता में उल्लेख किया गया है कि हनुमान जी सूर्य देवता के शिष्य थे. सूर्य देवता हनुमान जी को नौ विद्याओं का ज्ञान देना चाहते थे. इन  नौ विद्याओं में से पांच विद्याएं तो हनुमान जी ने सीख लीं लेकिन बाकी विद्याओं को सीखने के लिए विवाहित होना अनिवार्य था. इसी अनिवार्यता की वजह से सूर्य देवता ने अपनी पुत्री का विवाह हनुमान जी के साथ कर दिया. हनुमान जी से विवाह होने के बाद सुवर्चला सदा के लिए तपस्या में लीन हो गईं. रावण की दुहिता अनंगकुसुमा के साथ विवाह हनुमान जी के दूसरे विवाह का उल्लेख पउम चरित से प्राप्त होता है. पउम चरित के अनुसार रावण और वरुण देव के बीच हुए युद्ध में हनुमान जी वरुण देव की तरफ से रावण से युद्ध किया था जिसके परिणामस्वरूप इस युद्ध में रावण की हार हुई थी. युद्ध में हारने के बाद रावण ने अपनी दुहिता अनंगकुसुमा का विवाह हनुमान जी से कर दिया था.  वरुणदेवकीपुत्रीसत्यवतीसेविवाह  जब वरुण देव और रावण के बीच युद्ध हो रहा था तब हनुमान जी वरुण देव की तरफ से लड़ते हुए वरुण देव को विजय दिलाई थी. वरुण देव ने इस विजय से प्रसन्न होकर अपनी पुत्री सत्यवती का विवाह हनुमान जी से कर दिया था. विवाह के बाद भी आजीवन ब्रह्मचारी रहे हनुमान जी: हनुमान जी ने भले ही विशेष परिस्थितियों के तहत ये तीनों विवाह किए थे लेकिन उन्होंनें कभी भी अपनी पत्नियों के साथ वैवाहिक जीवन व्यतीत नहीं किया और वे आजीवन ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करते रहे. ये सब बातें विभिन्न शास्त्रों के अनुसार बताई गई हैं हालांकि ये बात जगजाहिर है कि परमभक्त हनुमान ने वैवाहिक जीवन व्यतीत नहीं किया और वे आजीवन बह्मचारी रहे.

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पवनपुत्र हनुमान बचपन में बेहद नटखट थे जानें उनसे जुड़ी रोचक बातें

हनुमान बाल्यकाल से ही बहुत चंचल स्वभाव के थे जनता से रिश्ता वेबडेस्क।त्रेता युग में जब श्रीराम ने अयोध्या में अवतार लिया तो उनकी सेवा करने के लिए भगवान शंकर ने भी अपने अंश से वायु के द्वारा कपिराज केसरी की पत्नी अंजना माता के यहां वानर रूप में अवतार लिया. यह छोटा सा बालक बाल्यकाल से ही बहुत चंचल स्वभाव का था. इसके चलते उन्‍हें ऋषियों ने श्राप तक दे दिया था. ऋषियों ने दिया था हनुमान जी को श्राप ऋषियों के आश्रम में लगे बड़े-बड़े पेड़ों को हनुमान जी अक्‍सर अपनी सशक्त भुजाओं से चपलता में तोड़ देते थे, तो कभी आश्रम के सामान को अस्त व्यस्त कर देते थे. जिसके कारण ऋषियों को हवन पूजन और अध्ययन अध्यापन में व्यवधान होता था. इससे ऋषियों ने नाराज होकर उन्हें श्राप दिया कि आज से तुम अपना बल भूले रहोगे और जब कोई तुम्हें स्मरण कराएगा तभी तुम्हें अपने बल का भान होगा. बस इस घटना के बाद से वे सामान्य वानरों की भांति रहने लगे. इंद्र के प्रहार से टेढ़ी हो गई थी ठोड़ी केसरी नंदन के हनुमान नाम पड़ने की कथा भी एक घटना से जुड़ी है. जन्म के कुछ समय बाद ही उन्‍होंने सूर्य को लाल फल समझा और उसे पाने के लिए वे आकाश की ओर दौड़ पड़े. संयोग से उस दिन सूर्य ग्रहण था और राहु ने उन्हें देखा तो समझा कि सूर्य को कोई और पकड़ने आ रहा है तो राहु खुद ही उसे पकड़ने के लिए आगे बढ़ा. किंतु जैसे ही वायुपुत्र केसरी नंदन उसकी ओर पूरे वेग से बढ़े तो भयभीत हो कर राहु भाग गया और सीधे इन्द्रदेव से गुहार लगाई. इंद्रदेव का ऐरावत निगलने वाले थे हनुमान जब इन्द्रदेव सफेद ऐरावत पर सवार होकर देखने निकले कि मामला क्या है. तब अंजनी पुत्र ने ऐरावत हाथी को बड़ा सा सफेद फल समझा और सूर्य को छोड़कर उसे ही खाने की लिए लपक पड़े. इन्द्र ने घबराकर अपने वज्र से प्रहार किया जो पवन पुत्र की ठोड़ी (हनु) पर लगा. इससे पवनपुत्र की ठोड़ी टेढ़ी हो गई. वे बज्र के प्रहार से मूर्छित हो कर गिर पड़े, पुत्र को मूर्छित देख वायुदेव क्रोधित हो गए और उन्होंने अपनी गति ही बंद कर ली. श्वास रुकने से सभी जीव जंतु और देवता भी व्याकुल हो गए. अंत में सभी देवताओं ने उस बालक को अग्नि जल व वायु आदि से अभय होकर अमर होने का वरदान दिया. इसके बाद ही वायुदेव प्रसन्न हुए और अपनी गति शुरू की. इस घटना के बाद से ही उस बालक का नाम हनुमान पड़ गया. माता के आदेश पर सूर्य से प्राप्त किया ज्ञान हनुमान जी ने मां के आदेश पर भगवान सूर्यनारायण के पास जाकर वेद वेदांग आदि सभी शास्त्रों और कलाओं का अध्ययन किया. सभी प्रकार के ज्ञान और कलाओं में निपुण होने के बाद वे किष्किंधा पर्वत पर सुग्रीव के साथ रहने लगे. सुग्रीव ने इनकी योग्यता और कुशलता को परख कर अपना सचिव बना लिया. वे सुग्रीव के सबसे प्रिय हो गए. जब बालि ने अपने ही छोटे भाई सुग्रीव को मार कर घर से निकाल दिया तब भी हनुमान जी ने सुग्रीव का साथ दिया और उनके साथ ऋष्यमूक पर्वत पर रहने लगे.

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जानकी या सीता नवमी

महत्वपूर्ण जानकारी जानकी या सीता नवमी 2023 शनिवार, 29 अप्रैल 2023 नवमी तिथि शुरू – 28 अप्रैल 2023 अपराह्न 04:01 बजे नवमी तिथि समाप्त – 29 अप्रैल 2023 को शाम 06:22 बज सीता नवमी हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन को देवी सीता की जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। विवाहित महिलाएं सीता नवमी के दिन व्रत रखती हैं और अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। सीता नवमी को सीता जयंती और जानकी नवमी भी कहा जाता है। सीता जयंती वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन मनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि मंगलवार के दिन पुष्य नक्षत्र में माता सीता का जन्म हुआ था। देवी सीता का विवाह भगवान राम से हुआ था। भगवान राम का जन्म भी चैत्र माह के शुक्ल पक्ष के दौरान नवमी तिथि को हुआ था। हिंदू कैलेंडर में सीता जन्मदिवस रामनवमी के एक महीने के बाद आती है। देवी सीता, मिथिला के राजा जनक की दत्तक पुत्री थीं। इसलिए इस दिन को जानकी नवमी के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब राजा जनक यज्ञ करने के लिए भूमि की जुताई कर रहे थे, तो उन्हें सोने के ताबूत में एक बच्ची मिली। एक जुताई वाली भूमि को ‘सीता’ कहा जाता था इसलिए राजा जनक ने बच्ची का नाम सीता रखा। सीता नवमी के दिन पूरे देश में भगवान राम और जानकी मंदिरों में विशेष पूजा व अनुष्ठान किया जाता है। मंदिरों को फूलों व लाइटों से सजाया जाता है। रामायण के पाठ बाद भजन कार्यक्रम भी विभिन्न स्थानों पर आयोजित किए जाते हैं। कुछ मंदिर द्वारा राम रथ यात्रा निकालते हैं और ’जय सिया राम’ का जाप करते हैं और पूरे रास्ते भक्ति गीत गाते हैं। सीता नवमी पूजा सीता नवमी के दिन देवी सीता की पूजा कि जाती है। इस वैवाहित महिलायें इस दिन व्रत करती है और अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती है। ऐसा माना जाता है कि सीता नवमी व्रत करने से व्यक्ति में शील, मातृत्व, त्याग और समर्पण जैसे गुण आते हैं। सीता और भगवान राम की एक साथ पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। सीता नवमी पूजा विधि माता सीता को श्रृंगार करके सुहाग का सामान अर्पित करें। इसके बाद रोली, माला, फूल, चावल, धूप, दीप, फल व मिष्ठान अर्पित करें। तिल के तेल या गाय के घी से दीपक जलाएं और फिर माता की आरती उतारें। इसके बाद 108 बार माता सीता के मंत्रों का जप करें और सीता चालीसा का पाठ करें

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सीता नवमी से जुडी पौराणिक कथा

पौराणिक कथा कथा यह है कि मां लक्ष्मी जी का अवतार सीता माता अपने पिछले जन्म में मुनि कुषध्वजा की बहुत ही सुंदर पुत्री वेदावती थी। वे भगवान विष्णु की भक्त थी वे हर समय केवल उनकी पूजा में ही लीन रहती थी, उनका प्रण था कि वे भगवान विष्णु के अतिरिक्त किसी और से विवाह नही करेंगी। उनके पिता एक ऋषि थे, वे अपनी बेटी के इस प्रण को अच्छी तरह से जानते थे, उन्होनें कभी अपनी पुत्री को अपना मन बदलने के लिए विवष नही किया। पुत्री की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होनें पुत्री के लिए आए अनेकों षक्तिषाली राजाओं और देवताओं के रिष्तों को मना कर दिया। मना किए गए रिष्तों में से एक रिष्ता दैत्यों के षक्तिषाली राजा षंभु का भी था। रिष्ते के लिए न मिलने पर दानव षंभु ने इसे अपना अपमान समझा और अपने अपमान का बदला लेने के उद्देष्य से मौका देखकर वेदावती के माता पिता का वध कर दिया। अपने माता पिता की मृत्यु के बाद वेदावती संसार में बिलकुल अकेली और अनाथ हो गई वे अपने पिता के आश्रम में ही रहने लगी और सारा समय भगवान विष्णु का ध्यान करने लगी। वेदावती बहुत ही खुबसूरत थी और उनकी तपस्या ने उन्हें पहले से भी अधिक सुंदर बना दिया था। एक बार लंका के राजा रावण ने उसे जंगल में भगवान विष्णु के लिए तपस्या करते हुए देखा वो वेदावती की सुंदरता पर मोहित हो गया उसने वेदावती के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा परन्तु उसे भी न में ही जवाब मिला। न में जवाब मिलने पर रावण ने वेदावती की तपस्या भंग कर दी और उनके बालों को पकड़़कर उन्हें घसीटने लगा। ंरावण के इस कुकृत्य से क्रोधित वेदावती ने अपने बाल काट दिए और कहा कि वो वहीं उसकी आखों के सामने ही अग्नि में कूदकर अपने प्राणों का त्याग करेगीं। अग्नि में प्रवेष करते समय वेदावती ने कहा कि रावण ने इस जंगल में उन्हें अपमानित किया है वो दोबारा से जन्म लेकर उसके विनाष का कारण बनेगीं। वो वेदावती ही थीं जो सीता के रुप में जन्मीं और राम जी के माध्यम से रावण के विनाष का कारण बनी। जब वेदावती का जन्म सीता जी के रुप में हुआ तो वे मिथिला नरेष राजा जनक को उनकें खेतों में जुताई करते समय भूमि पर लेटी हुई मिली। उनकी दैविक सुंदरता से प्रभावित होकर राजा जनक ने उन्हें अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। देवी सीता को जानकी, वैदही, मैथली तथा और अन्य नामों से भी जाना जाता है। वे राजा जनक को भूमि पर पड़ी हुई मिली थी इसलिए उन्हें भूदेवी की संतान भी माना जाता है। राजा जनक की पुत्री सीता  माना जाता है कि एक बार मिथिला में भयंकर अकाल पड़ा. उस समय मिथिला के राजा जनक थे. वे बहुत ही ज्ञानी एवं पुण्यात्मा थे. वे प्रजा के हित में धर्म कर्म के कार्यों में बढ़ चढ़कर रूचि लेते थे. ऋषि-मुनियों ने उन्हें सुझाव दिया कि यदि राजा जनक स्वयं हल चलाकर भूमि जोते तो देवराज इंद्र की कृपा से ये अकाल दूर हो सकता है. प्रजा के हित में राजा ने खुद हल चलाने का निर्णंय लिया. हल चलाते-चलाते एक जगह आकर हल अटक गया. राजा ने देखा कि एक सुंदर स्वर्ण कलश है जिसमें हल की नोक अटकी हुई है. कलश को बाहर निकाला तो उसमें एक अति सुन्दर दिव्य ज्योति लिए नवजात कन्या है. धरती मां के आशीर्वाद स्वरूप राजा जनक ने इस कन्या को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया. क्योंकि, हल की नोक को सीत कहा जाता है इसलिए राजा जनक ने इस कन्या का नाम सीता रखा गया. जहां पर उन्होंने हल चलाया वे स्थान वर्तमान में बिहार के सीतामढ़ी के पुनौरा राम गांव को बताया जाता है. रावण और मंदोदरी की पुत्री सीता रामायण में इस बात का उल्लेख किया गया है कि ‘रावण कहता है कि जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूं तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने.’ रामायण की कथा के अनुसार गृत्स्मद नाम का ब्राह्मण लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश में कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था. एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गया तब रावण इनकी कुटिया में आया और उस जगह पर मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया. यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया. रावण ने कहा कि ये अति तीक्ष्ण विष हैं. इसे संभालकर रख दो. मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुखी थी और मौका देखकर मंदोदरी ने कलश में रखा रक्त पी लिया. इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गई. ऐसे में मंदोदरी ने सोचा कि जब मेरे पति मेरे पास नहीं है. उन्हें इस बात का पता चलेगा. तो वे क्या सोचेंगे. यही सब सोचते हुए मंदोदरी तीर्थ यात्रा के बहाने कुरुक्षेत्र चली गई. कहा जाता है कि वहीं पर उसने गर्भ को निकालकर एक घड़े में रखकर भूमि में दफन कर दिया और सरस्वती नदी में स्नान करके वे वापस लंका लौट गई. माना जाता है कि वही घड़ा हल चलाते वक्त मिथिला के राजा जनक को मिला था, जिसमें से सीताजी प्रकट हुईं थी.  

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