April 5, 2023

जब प्रभु राम ने तोड़ा पवनपुत्र हनुमान का घमंड, पढ़ें यह रोचक कथा

मंगलवार का दिन पवनपुत्र हनुमान जी की आराधना के लिए समर्पित है. कई बार हनुमान जी ने अपने प्रभु राम की मदद के लिए असंभव को भी संभव कर दिया. इतना ही नहीं, उन्होंने ने राम नाम के महत्व के लिए प्रभु राम के क्रोध का सामना भी किया. हनुमान जी के आराध्य प्रभु राम हैं और राम जी को हनुमान जी सभी भक्तों में सबसे अधिक प्रिय हैं. हनुमान जी और प्रभु राम से जुड़ी कई कहानियां हैं. आज हम आपको एक ऐसी कथा के बारे में बता रहे हैं, जिसमें प्रभु राम ने हनुमान जी के घमंड को तोड़ा था. लंका युद्ध के पहले की बात है. समुद्र को पारकर लंका जाने के लिए सेतु बनाया जाना था. उससे पूर्व प्रभु राम चाहते थे कि सेतु पर एक शिवलिंग की स्थापना की जाए. प्रभु राम ने हनुमान जी से अपने मन की बात बताई और कहा कि काशी जाकर शिवलिंग लाएं और मुहूर्त से पूर्व आ जाएं. पवनपुत्र के लिए काशी जाना कोई बड़ी बात नहीं थी. वे तो अतुलित बलशाली और वेगवान थे. वे पलभर में ही काशी पहुंच गए. अपने वेग पर उनको थोड़ा सा अभिमान हो गया. प्रभु राम तो अंतर्यामी हैं. उन्हें यह बात पता चल गई. उन्होंने सुग्रीव से कहा कि मुहूर्त बीत जाएगी, ऐसे में वे रेत की ही शिवलिंग सेतु पर स्थापित कर देते हैं. प्रभु राम ने वहां पर रेत का शिवलिंग स्थापित कर दिया. इसी बीच हनुमान जी काशी से शिवलिंग लेकर प्रभु राम के पास पहुंच गए. उन्होंने देखा कि प्रभु राम ने तो रेत का शिवलिंग स्थापित कर दिया है. हनुमान जी ने प्रभु राम से कहा कि आपने मुझे काशी भेजकर यह शिवलिंग लाने को कहा था. यह लेकर आ गया, लेकिन आपने रेत का शिवलिंगस्थापित कर दिया. तब प्रभु राम ने कहा कि उनसे भूल हो गई है. ऐसा करो कि इस रेत वाले शिवलिंग को यहां से हटा दो. फिर वे काशी से लाए शिवलिंग को यहां स्थापित कर देंगे. हनुमान जी ने प्रभु आज्ञा पाकर अपनी पूंछ से रेत के शिवलिंग को पकड़ लिया और उसे उखाड़ने की कोशिश करने लगे. लेकिन वह शिवलिंग वहां से एक इंच भी नहीं हिला. हनुमान जी को पहले आश्चर्य हुआ, लेकिन थोड़े ही देर में उनको अपनी गलती का एहसास हो गया. उनका घमंड टूट गया. फिर उन्होंने अपने प्रभु श्री राम से क्षमा मांगी.

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जानिए वरुथिनी एकादशी पर्व का महत्व और इससे जुड़ी पौराणिक कथा

भगवान विष्णु इस सृष्टि के पालनकर्ता हैं। शास्त्रों और पुराणों में एकादशी का बहुत महत्व बताया गया है। सनातन धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है। एकादशी को इसी वजह से हरि वासर और हरि का दिन भी कहा जाता है। हिन्दू कैलेंडर के हर महीने में दो एकादशी पड़ती है। हर एकादशी का अपना महत्व है और इसी क्रम में वरुथिनी एकादशी भी आता है। इस दिन भगवान मधुसूदन की पूजा की जाती है। वरुथिनी एकादशी को लेकर मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से जातकों के सारे दुख दूर होते हैं और उन्हें करोड़ों साल तक ध्यान करने जितना फल प्राप्त होता है। यूं तो हर एकादशी में दान का विशेष महत्व है लेकिन मान्यता है कि वरुथिनी एकादशी में दान करने से सूर्य ग्रहण के दौरान स्वर्ण दान जितना फल प्राप्त होता है। वरुथिनी एकादशी के व्रत से कन्यादान के कर्म से भी ज्यादा फल प्राप्त होता है। यही वजह है कि वरुथिनी एकादशी का सनातन धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। आज हम आपको इस लेख में वरुथिनी एकादशी के व्रत से जुड़ी एक पौराणिक कथा बताएंगे जोकि स्वयं भगवान विष्णु से जुड़ी है लेकिन उससे पहले आपको वरुथिनी व्रत से जुड़ी कुछ खास जानकारी दे देते हैं। वरुथिनी एकादशी व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा मान्यता है कि एक बार पांडु पुत्र अर्जुन के आग्रह पर भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें वरुथिनी एकादशी व्रत का महत्व और उससे जुड़ी एक कथा बताई। इस कथा के अनुसार बहुत पहले नर्मदा तट के किनारे एक राज्य हुआ करता था जिस पर मान्धाता नामक राजा का राज हुआ करता था। राजा मान्धाता एक बेहद ही नेक दिल, दानी और तपस्वी राजा था। एक बार राजा मान्धाता किसी जंगल में तपस्या में लीन थे। तभी कहीं से वहां पर एक जंगली भालू आ धमकता है और उनके पैरों को चबाने लगता है। राजा मान्धाता इस कृत्य से घबराते नहीं हैं लेकिन जब भालू उन्हें खींच कर ले जाने लगता है तब वे भगवान श्री हरि विष्णु को याद करते हैं। भक्त की पुकार सुनकर श्री हरि वहाँ प्रकट हो जाते हैं और जंगली भालू का गला अपने सुदर्शन चक्र से काट डालते हैं। लेकिन जब तक ऐसा कुछ होता तब तक वह भालू राजा मान्धाता का एक पैर चबा चुका था। यह देख कर राजा बहुत दुखी होते हैं। तब राजा के दुख को देखते हुए भगवान विष्णु को उन पर दया आ जाती है। ऐसे में भगवान विष्णु राजा मान्धाता को बताते हैं कि उनके पैर की यह हालत उनके पूर्व जन्म में किए गए पापों का फल है। श्री हरि विष्णु राजा मान्धाता से आगे कहते हैं कि राजा मथुरा जाएँ और वहाँ भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा के साथ-साथ वरुथिनी एकादशी का व्रत भी रखें। इससे उनके खराब अंग पुनः ठीक हो जाएंगे।  राजा मान्धाता भगवान श्री हरि विष्णु के आदेशों का पालन करते हुए मथुरा जाते हैं और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखते हुए भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा करते हैं जिसके फलस्वरूप उनका खराब पाँव वापस से ठीक हो जाता है।

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कब है वरूथिनी एकादशी? जान लें विष्णु पूजा का शुभ मुहूर्त और पारण समय, व्रत से होंगे 4 लाभ

वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को वरूथिनी एकादशी का व्रत रखा जाता है. एक बार युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से वैशाख कृष्ण एकादशी की महिमा और पूजा विधि के बारे में जानना चाहा. तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि वैशाख कृष्ण एकादशी वरूथिनी एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है. वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पाप मिटते हैं, भय दूर होता है, मोक्ष की प्राप्ति होती है और सौभाग्य मिलता है.  हिंदू धर्म के व्रत त्‍योहारों में एकादशी का सबसे प्रमुख स्‍थान है। प्रत्‍येक मास में दो एकादशी होती है और सभी का कुछ खास महत्‍व होता है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरुथिनी एकादशी कहा जाता है। इस व्रत के बारे में शास्‍त्रों में बताया जाता है कि संपूर्ण व‍िधि-विधान से यह व्रत करने और पूजा करने से उपासक को बैकुंठ लोक की प्राप्ति होती है और सभी पापों का नाश होता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं इस व्रत के महत्‍व, परंपरा और शुभ मुहूर्त के बारे मे वरूथिनी एकादशी तिथि 2023 हिंदू कैलेंडर के अनुसार, वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 15 अप्रैल दिन शनिवार को रात 08 बजकर 45 मिनट पर प्रारंभ हो रही है और इस तिथि का समापन अगले दिन 16 अप्रैल दिन रविवार को शाम 06 बजकर 14 मिनट तक है. उदयातिथि के आधार पर वरूथिनी एकादशी का व्रत 16 अप्रैल रविवार को रखा जाएगा. 3 शुभ योगों में है वरूथिनी एकादशी 16 अप्रैल को वरूथिनी एकादशी वाले दिन प्रात:काल से शुक्ल योग है, जो देर रात 12:13 बजे तक है. उसके बाद से ब्रह्म योग है. यह पारण के दिन हैं. इन दो शुभ योगों के अलावा त्रिपुष्कर योग पारण वाले दिन 17 अप्रैल को प्रात: 04 बजकर 07 मिनट से सुबह 05 बजकर 54 मिनट तक है. व्रत के दिन शतभिषा नक्षत्र है. व्रत के दिन का अभिजित मुहूर्त सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:47 बजे तक है. वरूथिनी एकादशी पूजा मुहूर्त 2023 वरूथिनी एकादशी वाले दिन सुबह 07:32 बजे से लेकर दोपहर 12:21 बजे तक शुभ समय है. इसमें सुबह 09:08 बजे से सुबह 10:45 बजे तक लाभ-उन्नति मुहूर्त और सुबह 10:45 बजे से दोपहर 12:21 बजे तक अमृत-सर्वोत्तम मुहूर्त है. इन मुहूर्त में आप एकादशी व्रत की पूजा कर सकते हैं. दोपहर में शुभ-उत्तम मुहूर्त 01:58 बजे से 03:34 बजे तक है.

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