स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि | महत्व | भगवान कार्तिकेय का जन्म कथा

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स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि | महत्व | भगवान कार्तिकेय का जन्म कथा
KARMASU 4 April 2023 5 मिनट पढ़ें
EKADASHIMYTHOLOGICAL STORIES📅 4 April 2023🔄 अपडेट: 3 October 2023⏱ 5 मिनट
इस लेख में
  1. स्कंद षष्ठी का महत्व
  2. भारत में स्कन्द षष्ठी
  3. बैंगन छठ 
  4. स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि
  5. भगवान कार्तिकेय की पूजा का मंत्र
  6. कार्तिकेय गायत्री मंत्र

स्कंद षष्ठी 2023 का महत्वसंतान प्राप्ति के लिए भी षष्ठी तिथि को महत्वपूर्ण माना गया है. पौराणिक कथा में सुनने को मिलता है कि, इस व्रत के प्रभाव से ही च्यवन ऋषि को आंखों की ज्योति प्राप्त हुई थी. वहीं स्कंद षष्ठी व्रत के प्रभाव और भगवान स्कंद की कृपा से ही प्रियव्रत का मृत शिशु फिर से जीवित हो गया था

स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा की जाती है। इनकी पूजा से जीवन में हर तरह की कठिनाइंया दूर होती हैं और व्रत रखने वालों को सुख और वैभव की प्राप्ति होती है। साथ ही संतान के कष्टों को कम करने और उसके सुख की कामना से ये व्रत किया जाता है। हालांकि यह त्योहार दक्षिण भारत में प्रमुख रूप से मनाया जाता है। दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को सुब्रह्मण्यम के नाम से भी जाना जाता है। उनका प्रिय पुष्प चंपा है। इसलिए इस व्रत को चंपा षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है।

स्कंद षष्ठी का महत्व

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भगवान कार्तिकेय षष्ठी तिथि और मंगल ग्रह के स्वामी हैं तथा दक्षिण दिशा में उनका निवास स्थान है। इसीलिए जिन जातकों की कुंडली में कर्क राशि अर्थात् नीच का मंगल होता है, उन्हें मंगल को मजबूत करने तथा मंगल के शुभ फल पाने के लिए इस दिन भगवान कार्तिकेय का व्रत करना चाहिए। क्योंकि स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय को प्रिय होने से इस दिन (Skanda Shashti Vrat) व्रत अवश्य करना चाहिए।

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पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिकेय अपने माता-पिता और छोटे भाई श्रीगणेश से नाराज होकर कैलाश पर्वत छोड़कर मल्लिकार्जुन (शिव जी के ज्योतिर्लिंग) आ गए थे और कार्तिकेय ने स्कन्द षष्ठी को ही दैत्य तारकासुर का वध किया था तथा इसी तिथि को कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति बने थे।

भारत में स्कन्द षष्ठी

भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर है। ज्ञात हो कि स्कन्द पुराण कार्तिकेय को ही समर्पित है। स्कन्द पुराण में ऋषि विश्वामित्र द्वारा रचित कार्तिकेय 108 नामों का भी उल्लेख हैं। इस दिन निम्न मंत्र से कार्तिकेय का पूजन करने का विधान है। खासकर दक्षिण भारत में इस दिन भगवान कार्तिकेय के मंदिर के दर्शन करना बहुत शुभ माना गया है। चम्पा षष्ठी या स्कन्द षष्ठी का त्योहार दक्षिण भारत, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि में प्रमुखता से मनाया जाता है।

स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि | महत्व | भगवान कार्तिकेय का जन्म कथा

बैंगन छठ 

स्कंद षष्ठी का दिन भगवान शिव के अवतार जिसे खंडोबा के नाम से जाना जाता है, उन्हें भी समर्पित है। खंडोबा को ही मल्हारी मार्तण्ड भी कहा गया। होलकर राजवंश के कुल देवता मल्हारी मार्तण्ड की चम्पा षष्ठी की रात्रि बैंगन छठ का आयोजन होता है। चौंसठ भैरवों में मार्तण्ड भैरव भी एक हैं। वैसे सूर्य को भी मार्तण्ड कहा गया है। जैसे बिहार में छठ पूजा, सूर्य पूजा का महत्व है, उसी तरह महाराष्ट्र में बैंगन छठ का महत्व है। महाराष्ट्र में जैजूरी खंडोबा का मुख्य स्थान है, जो होळ गांव के पास है। इंदौर के शासक इसी होळ गांव के होने से होलकर कहलाए और खंडोबा उनके कुल देवता है।

कहा जाता है कि इस दिन तेल का सेवन नहीं करना चाहिए तथा बाजरे की रोटी एवं बैंगन के भुर्ते को प्रसाद वितरित करने का प्रचलन है। महाराष्ट्र और सुदूर मालवा में बसे मराठी भाषियों में मल्हारी मार्तण्ड की नवरात्रि का आयोजन मार्गशीर्ष प्रतिपदा से मार्गशीर्ष शुक्ल षष्ठी तक 5 दिन के उपवास के उपरांत मल्हारी मार्तण्ड की ‘षडरात्रि’ ‘बोल सदानंदाचा येळकोट येळकोट’ के साथ संपन्न होती है। इसीलिए इस दिन भगवान कार्तिकेय और खंडोबा का पूजन विशेष रूप से करना चाहिए।

स्कंद षष्ठी व्रत एवं पूजन विधि

स्कन्द षष्ठी के दिन सुबह जल्दी उठें और घर की साफ-सफाई करें। 

इसके बाद स्नान-ध्यान कर सर्वप्रथम व्रत का संकल्प लें। 

पूजा घर में मां गौरी और शिव जी के साथ भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा को स्थापित करें। 

स्कन्द षष्ठी के दिन व्रतधारी व्यक्तियों को दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके भगवान कार्तिकेय का पूजन करना चाहिए।

पूजन में जल, मौसमी फल, फूल, मेवा, दही, कलावा, दीपक, अक्षत, हल्दी, चंदन, दूध, गाय का घी, इत्र आदि से करें। 

अंत में आरती करें। 

वहीं शाम को कीर्तन-भजन पूजा के बाद आरती करें। 

इसके पश्चात फलाहार करें।

रात्रि में भूमि पर शयन करना चाहिए।

भगवान कार्तिकेय की पूजा का मंत्र

देव सेनापते स्कन्द कार्तिकेय भवोद्भव। कुमार गुह गांगेय शक्तिहस्त नमोस्तु ते॥’

इसके अलावा स्कन्द षष्ठी एवं चम्पा षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय के इन मंत्रों का जाप भी किया जाना चाहिए।

कार्तिकेय गायत्री मंत्र

‘ॐ तत्पुरुषाय विद्महे: महा सैन्या धीमहि तन्नो स्कन्दा प्रचोदयात’।

यह मंत्र हर प्रकार के दुख एवं कष्टों का नाश करने के लिए प्रभावशाली है।

शत्रु नाश के लिए पढ़ें ये मंत्र-

ॐ शारवाना-भावाया नम:
ज्ञानशक्तिधरा स्कन्दा वल्लीईकल्याणा सुंदरा
देवसेना मन: कांता कार्तिकेया नामोस्तुते।

इस तरह से भगवान कार्तिकेय का पूजन-अर्चन करने से जीवन के सभी कष्‍टों से मुक्ति मिलती है।

भगवान कार्तिकेय की जन्म कथा

कुमार कार्तिकेय के जन्म का वर्णन हमें पुराणों में ही मिलता है। जब देवलोक में असुरों ने आतंक मचाया हुआ था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था। लगातार राक्षसों के बढ़ते आतंक को देखते हुए देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से मदद मांगी थी। भगवान ब्रह्मा ने बताया कि भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा, परंतु उस काल च्रक्र में माता सती के वियोग में भगवान शिव समाधि में लीन थे। 

इंद्र और सभी देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने के लिए भगवान कामदेव की मदद ली और कामदेव ने भस्म होकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या को भंग किया। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया और दोनों देवदारु वन में एकांतवास के लिए चले गए। उस वक्त भगवान शिव और माता पार्वती एक गुफा में निवास कर रहे थे। 

उस वक्त एक कबूतर गुफा में चला गया और उसने भगवान शिव के वीर्य का पान कर लिया परंतु वह इसे सहन नहीं कर पाया और भागीरथी को सौंप दिया। गंगा की लहरों के कारण वीर्य 6 भागों में विभक्त हो गया और इससे 6 बालकों का जन्म हुआ। यह 6 बालक मिलकर 6 सिर वाले बालक बन गए। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म हुआ।

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