February 24, 2023

रोहिणी व्रत महत्त्व, पूजा एवम उद्यापन विधि

भारत देश में रीती रिवाजों का मैला हैं. सभी धर्म एवम जाति की भिन्न – भिन्न विभिन्न मान्यतायें हैं, जिनके अनुसार वे अपने धर्म का पालन करते हैं.पूजा, पाठ, उपवास एवम व्रत का पालन सभी धर्मो में किया जाता हैं उसी प्रकार जैन धर्म में कई व्रत एवम उपवास का नियम होता हैं. रोहिणी व्रत जैन धर्म के अनुयायी द्वारा किया जाता हैं. इस पूजा में जैन धर्म के लोग भगवान वासुपूज्य की पूजा करते हैं. यह व्रत जैन महिलाओ द्वारा अपने पति की लम्बी आयु एवम स्वास्थ्य के लिए करती हैं. रोहिणी व्रत तिथी व इसका महत्त्व क्या हैं  सत्ताविस नक्षत्र में से रोहिणी एक नक्षत्र हैं. जब रोहिणी नक्षत्र सूर्योदय के बाद प्रबल होता हैं. उस दिन रोहिणी व्रत किया जाता हैं. यह दिन प्रति 27 दिनों के बाद आता है, इस प्रकार रोहिणी व्रत वर्ष में बारह – तेरह बार मनाया जाता हैं. नियमानुसार रोहिणी व्रत 3 वर्ष, 5 वर्ष अथवा 7 वर्ष तक नियमित किया जाता है, उसके बाद इस व्रत का उद्यापन कर दिया जाता हैं. इस उपवास का पालन करने से दुःख तकलीफ एवम परेशानियों से छुटकारा मिलता हैं. साल 2023 में रोहिणी व्रत कब है रोहिणी व्रत  का पालन जैन धर्म के लोगो द्वारा किया जाता है.जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर भगवान कहे जाते हैं, जिनके अनुसार मनुष्य जाति का सबसे बड़ा धर्म अहिंसा हैं. वे एक सन्यासी व्यक्ति थे, जिन्होंने आध्यात्म को सदा साधना एवम कठोर सैयमित जीवन के रूप में देखा हैं. उनका मानना था मनुष्य खुद अपने ही भौतिक सुखो के सामने परतंत्र हैं, अगर मनुष्य स्वयं की भावनाओं अर्थात इन्द्रियों पर नियंत्रण करेगा, तब ही सच्चे मायने में एक तपस्वी कहलायेगा. जैन धर्म में रोहिणी व्रत महिलाओं द्वारा किया जाता हैं, जिसे वे अपने परिवार की खुशहाली एवम पति की लम्बी उम्र के लिए करती हैं, विधि अनुसार 5 वर्ष 5 महीने तक रोहिणी व्रत का पालन करना अच्छा माना जाता हैं. रोहिणी व्रत की पूजा कैसे की जाती हैं रोहिणी व्रत उद्यापन विधि यह व्रत एक निश्चित काल तक ही किया जाता हैं इसका निर्णय व्रती स्वयं लेता हैं. मानी गई व्रत अवधि पूरी होने पर इस व्रत का उद्यापन कर दिया जाता हैं. इस व्रत के लिए 5 वर्ष 5 माह की अवधि श्रेष्ठ कही जाती हैं. उद्यापन के लिए इस व्रत को नियमित रूप से करके गरीबो को भोजन कराया जाता हैं एवम दान दिया जाता हैं एवम भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती हैं उद्यापन के दिन इनके दर्शन किये जाते हैं. इस प्रकार पुराणों में रोहिणी व्रत का महत्व निकलता हैं.रोहिणी एक नक्षत्र हैं जैन एवम हिन्दू धर्म में नक्षत्र की मान्यता लगभग समाना होती हैं. रोहिणी व्रत का नियमित पालन करने से धन, धान्य एवम सुखो में वृद्धि होती हैं. MOST IMPORTANT QUESTION Q- रोहिणी व्रत का महत्व क्या है? Ans- रोहिणी व्रत का महत्व है दुख और परेशानियों से छुटकारा पाना। Q- रोहिणी व्रत की पूजा कब की जाती है? Ans- रोहिणी व्रत सूर्योदय के बाद की जाती है। Q- रोहिणी व्रत किस समुदाय के लोग करते हैं? Ans- रोहिणी व्रत की सबसे ज्यादा मान्यता जैन समुदाय में है। Q- रोहिणी व्रत कब होता है? Ans- रोहिणी व्रत 27 नक्षत्रों से मिलने पर होता है रोहिणी व्रत। Q- रोहिणी व्रत कौन करता है? Ans- रोहिणी व्रत कोई भी कर सकता है।

रोहिणी व्रत महत्त्व, पूजा एवम उद्यापन विधि Read More »

रोहिणी व्रत आज, जानिए व्रत का महत्व एवं पौराणिक कथा

रोहिणी व्रत का जैन समुदाय में खास महत्‍व है। यह व्रत आत्‍मा के विकारों को दूर कर कर्म बंध से छुटकारा दिलाने में सहायक है। रोहिणी व्रत के संबंध में पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्‍मीपति के साथ राज करते थे। उनके 7 पुत्र एवं 1 रोहिणी नाम की पुत्री थी। महत्व- दिगंबर जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। 27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। महिलाओं के लिए यह व्रत अनिवार्य माना गया है। हालांकि इस व्रत को कोई भी कर सकता है। इस व्रत को पुरुष और महिलाएं दोनों कर सकते हैं। यह व्रत आत्‍मा के विकारों को दूर कर कर्म बंधन से छुटकारा दिलाने में सहायक है। इस व्रत में पूरे विधि विधान के सात भगवान वासुपूज्य की पूजा की जाती है।  इस दिन जैन धर्म के अनुयायी वासुपूज्य स्वामी की पूजा और उपासना करके व्रत रखते है। इस दिन व्रत रखने से भगवान वासुपूज्य और माता रोहिणी के आशीर्वाद से घर से आर्थिक समस्या दूर होती हैं तथा उस घर में सदैव धन की देवी मां लक्ष्मी का वास होना, माना जाता है और ऋण मुक्त होने और आय बढ़ने का मार्ग मिल जाता है। माना जाता है कि इस दिन व्रत करने से पति की आयु लंबी हो जाती है और उनका स्वास्थ भी अच्छा रहता है। इससे ईर्ष्या, द्वेष, जैसे भाव भी दूर हो जाते हैं। घर में सुख, समृद्धि और धन-धान्य की निरंतर बढ़ोतरी होती है। इस व्रत का समापन उद्यापन के बाद ही किया जाता है। कथा पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्‍मीपति के साथ राज करते थे। उनके 7 पुत्र एवं 1 रोहिणी नाम की पुत्री थी। एक बार राजा ने निमित्‍तज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? तो उन्‍होंने कहा कि हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ तेरी पुत्री का विवाह होगा। यह सुनकर राजा ने स्‍वयंवर का आयोजन किया जिसमें कन्‍या रोहिणी ने राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाली और उन दोनों का विवाह संपन्‍न हुआ।  एक समय हस्तिनापुर नगर के वन में श्री चारण मुनिराज आए। राजा अपने प्रियजनों के साथ उनके दर्शन के लिए गया और प्रणाम करके धर्मोपदेश को ग्रहण किया। इसके पश्‍चात राजा ने मुनिराज से पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्‍यों है? तब गुरुवर ने कहा कि इसी नगर में वस्‍तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। उस धनमित्र की दुर्गंधा कन्‍या उत्पन्‍न हुई। धनमित्र को हमेशा चिंता रहती थी कि इस कन्‍या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लोभ देकर अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से उसका विवाह कर दिया, लेकिन अत्‍यंत दुर्गंध से पीडि़त होकर वह एक ही मास में उसे छोड़कर कहीं चला गया। इसी समय अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए नगर में आए, तो धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ वंदना करने गया और मुनिराज से पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्‍होंने बताया कि गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल राज्‍य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा, रानी सहित वनक्रीड़ा के लिए चले, सो मार्ग में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के लिए आहार व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली तो गई, परंतु क्रोधित होकर उसने मुनिराज को कड़वी तुम्‍बी का आहार दिया जिससे मुनिराज को अत्‍यंत वेदना हुई और तत्‍काल उन्‍होंने प्राण त्‍याग दिए। जब राजा को इस विषय में पता चला, तो उन्‍होंने रानी को नगर में बाहर निकाल दिया और इस पाप से रानी के शरीर में कोढ़ उत्‍पन्‍न हो गया। अत्‍यधिक वेदना व दु:ख को भोगते हुए वो रौद्र भावों से मरकर नर्क में गई। वहां अनंत दु:खों को भोगने के बाद पशु योनि में उत्‍पन्न और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्‍या हुई। यह पूर्ण वृत्तांत सुनकर धनमित्र ने पूछा- कोई व्रत-विधानादि धर्म कार्य बताइए जिससे कि यह पातक दूर हो।  तब स्वामी ने कहा- सम्‍यकदर्शन सहित रोहिणी व्रत पालन करो अर्थात प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन आए, उस दिन चारों प्रकार के आहार का त्‍याग करें और श्री जिन चैत्‍यालय में जाकर धर्मध्‍यान सहित 16 प्रहर व्‍यतीत करें अर्थात सामायिक, स्‍वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय बिताए और स्‍वशक्ति दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 मास तक करें। दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और आयु के अंत में संन्यास सहित मरण कर प्रथम स्‍वर्ग में देवी हुई। वहां से आकर तेरी परमप्रिया रानी हुई।  इसके बाद राजा अशोक ने अपने भविष्य के बारे में पूछा, तो स्‍वामी बोले- भील होते हुए तूने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, सो तू मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर जन्म लिया, सो अत्‍यंत घृणित शरीर पाया, तब तूने मुनिराज के उपदेश से रोहिणी व्रत किया। फलस्‍वरूप स्वर्गों में उत्‍पन्‍न होते हुए यहां अशोक नामक राजा हुआ। इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहिणी, रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्‍वर्गादि सुख पाने के उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।

रोहिणी व्रत आज, जानिए व्रत का महत्व एवं पौराणिक कथा Read More »

जैन समुदाय में क्यों जरूरी है ‘रोहिणी व्रत’, जानिए महत्व एवं पौराणिक कथा

जैन समुदाय में रोहिणी व्रत का बहुत महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। 27 नक्षत्रों में शामिल रोहिणी नक्षत्र के दिन यह व्रत होता है, इसी वजह से इसे रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी व्रत का जैन समुदाय में खास महत्‍व है। यह व्रत आत्‍मा के विकारों को दूर कर कर्म बंध से छुटकारा दिलाने में सहायक है। यहां पाठकों के लिए पेश है रोहिणी व्रत की संपूर्ण कथा  रोहिणी व्रत के संबंध में पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में चंपापुरी नामक नगर में राजा माधवा अपनी रानी लक्ष्‍मीपति के साथ राज करते थे। उनके 7 पुत्र एवं 1 रोहिणी नाम की पुत्री थी। एक बार राजा ने निमित्‍तज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा? तो उन्‍होंने कहा कि हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ तेरी पुत्री का विवाह होगा।यह सुनकर राजा ने स्‍वयंवर का आयोजन किया जिसमें कन्‍या रोहिणी ने राजकुमार अशोक के गले में वरमाला डाली और उन दोनों का विवाह संपन्‍न हुआ।एक समय हस्तिनापुर नगर के वन में श्री चारण मुनिराज आए। राजा अपने प्रियजनों के साथ उनके दर्शन के लिए गया और प्रणाम करके धर्मोपदेश को ग्रहण किया। इसके पश्‍चात राजा ने मुनिराज से पूछा कि मेरी रानी इतनी शांतचित्त क्‍यों है? तब गुरुवर ने कहा कि इसी नगर में वस्‍तुपाल नाम का राजा था और उसका धनमित्र नामक एक मित्र था। उस धनमित्र की दुर्गंधा कन्‍या उत्पन्‍न हुई। धनमित्र को हमेशा चिंता रहती थी कि इस कन्‍या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लोभ देकर अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से उसका विवाह कर दिया, लेकिन अत्‍यंत दुर्गंध से पीडि़त होकर वह एक ही मास में उसे छोड़कर कहीं चला गया। इसी समय अमृतसेन मुनिराज विहार करते हुए नगर में आए, तो धनमित्र अपनी पुत्री दुर्गंधा के साथ वंदना करने गया और मुनिराज से पुत्री के भविष्य के बारे में पूछा। उन्‍होंने बताया कि गिरनार पर्वत के निकट एक नगर में राजा भूपाल राज्‍य करते थे। उनकी सिंधुमती नाम की रानी थी। एक दिन राजा, रानी सहित वनक्रीड़ा के लिए चले, सो मार्ग में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के लिए आहार व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली तो गई, परंतु क्रोधित होकर उसने मुनिराज को कड़वी तुम्‍बी का आहार दिया जिससे मुनिराज को अत्‍यंत वेदना हुई और तत्‍काल उन्‍होंने प्राण त्‍याग दिए। जब राजा को इस विषय में पता चला, तो उन्‍होंने रानी को नगर में बाहर निकाल दिया और इस पाप से रानी के शरीर में कोढ़ उत्‍पन्‍न हो गया। अत्‍यधिक वेदना व दु:ख को भोगते हुए वो रौद्र भावों से मरकर नर्क में गई। वहां अनंत दु:खों को भोगने के बाद पशु योनि में उत्‍पन्न और फिर तेरे घर दुर्गंधा कन्‍या हुई। यह पूर्ण वृत्तांत सुनकर धनमित्र ने पूछा- कोई व्रत-विधानादि धर्मकार्य बताइए जिससे कि यह पातक दूर हो। तब स्वामी ने कहा- सम्‍यग्दर्शन सहित रोहिणी व्रत पालन करो अर्थात प्रति मास में रोहिणी नामक नक्षत्र जिस दिन आए, उस दिन चारों प्रकार के आहार का त्‍याग करें और श्री जिन चैत्‍यालय में जाकर धर्मध्‍यान सहित 16 प्रहर व्‍यतीत करें अर्थात सामायिक, स्‍वाध्याय, धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय बिताए और स्‍वशक्ति दान करें। इस प्रकार यह व्रत 5 वर्ष और 5 मास तक करें। दुर्गंधा ने श्रद्धापूर्वक व्रत धारण किया और आयु के अंत में संन्यास सहित मरण कर प्रथम स्‍वर्ग में देवी हुई। वहां से आकर तेरी परमप्रिया रानी हुई। इसके बाद राजा अशोक ने अपने भविष्य के बारे में पूछा, तो स्‍वामी बोले- भील होते हुए तूने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, सो तू मरकर नरक गया और फिर अनेक कुयोनियों में भ्रमण करता हुआ एक वणिक के घर जन्म लिया, सो अत्‍यंत घृणित शरीर पाया, तब तूने मुनिराज के उपदेश से रोहिणी व्रत किया। फलस्‍वरूप स्वर्गों में उत्‍पन्‍न होते हुए यहां अशोक नामक राजा हुआ। इस प्रकार राजा अशोक और रानी रोहिणी, रोहिणी व्रत के प्रभाव से स्‍वर्गादि सुख भोगकर मोक्ष को प्राप्‍त हुए।

जैन समुदाय में क्यों जरूरी है ‘रोहिणी व्रत’, जानिए महत्व एवं पौराणिक कथा Read More »