February 23, 2023

 बच्चों की दीर्घायु का पर्व ‘अहोई अष्टमी’, पढ़ें कथा

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को मनाया जाता है। इस दिन माताएं अपने बच्चों की रक्षा के लिए पूरा दिन व्रत करती हैं। शाम को दीवार पर छाप कर अहोई माता की पूजा करती हैं और कथा सुनती हैं। अहोई माता की मूर्ति में संसार संजोया दिखाया जाता है। रात को तारे को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। इस व्रत वाले दिन के संबंध में प्रचलित कथा निम्र है : ‘‘पुराने समय की बात है दतिया नामक नगर में एक सेठ चंद्रभान रहता था। उसकी पत्नी का नाम चंद्रिका था जो बहुत गुणवती, सुंदर तथा चरित्रवान थी। उसके कई संतानें हुईं मगर सभी की छोटी आयु में ही मृत्यु हो जाती थी। संतानों के इस तरह मरते रहने के कारण पति-पत्नी बहुत दुखी थे तथा उन्हें चिंता थी कि उनकी मृत्यु के पश्चात उनका वंश कौन चलाएगा। एक दिन दोनों ने सोचा कि हम सब कुछ त्याग कर जंगलों में निवास करें और यह सोच कर वे सब कुछ छोड़ कर जंगल की ओर चल पड़े। चलते-चलते पति-पत्नी बद्रिका आश्रम के पास शीतल कुंड के समीप पहुंचे और वहां जाकर प्राण त्यागने का मन बना लिया और अन्न-जल त्याग कर बैठ गए। इसी तरह बैठे कई दिन बीत गए तो सातवें दिन आकाशवाणी हुई कि तुम अपने प्राण मत त्यागो। यह दुख तुम्हें पिछले जन्म के पाप कर्मों से मिला है। ऐ सेठ, अब तू अपनी पत्नी से आने वाले कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को व्रत करवाना जिसके प्रभाव से अहोई देवी प्रकट होंगी। तुम उनसे अपने पुत्रों की दीर्घ आयु मांगना। व्रत के दिन तुम राधा कुंड में स्नान करना। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि पर चंद्रिका ने बड़ी श्रद्धा से अहोई देवी का व्रत रखा और रात को सेठ ने राधा कुंड में स्नान किया। जब सेठ स्नान करके वापस आ रहा था तो रास्ते में अहोई देवी ने दर्शन दिए और बोली मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूं। तुम मुझ से कोई भी वर मांगो। अहोई देवी के दर्शन करके सेठ अति प्रसन्न हुआ और उसने कहा कि मां मेरे बच्चे छोटी आयु में ही स्वर्ग सिधार जाते हैं इसलिए उनकी दीर्घायु का वर दें। अहोई देवी ने कहा कि ऐसा ही होगा और अंतर्ध्यान हो गईं। कुछ समय पश्चात सेठ के यहां पुत्र पैदा हुआ और बड़ा होकर विद्वान, शक्तिशाली और प्रतापी हुआ।’’ इस महिमा के कारण ही अहोई माता के व्रत का प्रभाव बना। उस दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि थी इसलिए सभी माताएं इस दिन व्रत रखती हैं तथा विधि अनुसार पूजा आराधना करते हुए अपने बच्चों की दीर्घायु की कामना करती हैं।

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छठ पूजा की ये पावन कथा दूर करेगी आपकी हर व्यथा

इस दिन भगवान सूर्य और छठी माता की पूजा का विधान है। ऐसा माना जाता है कि छठ की पूजा तब तक पूर्ण नहीं होती है जब तक इस पावन पर्व की कथा न सुनी जाए। ऐसे में चलिए विस्तार से जानते हैं छठ पूजा की पौराणिक व्रत कथा के बारे में। छठ पूजा व्रत कथा प्रियंवद और मालिनी की कहानी  पुराणों के अनुसार, राजा प्रियंवद नामक राजा हुआ करते थे जिनकी कोई संतान नहीं थी। तब महर्षि कश्यप ने पुत्र प्राप्ति के लिए राजा के यहां यज्ञ का आयोजन किया। महर्षि ने यज्ञ आहुति के लिए बनाई गई गई खीर को प्रियंवद की पत्नी मालिनी को खाने के लिए कहा। खीर के प्रभाव से रजा और रानी को पुत्र तो हुआ किन्तु वह मृत था। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी समय भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूं। माता ने राजा को अपने पूजन का आदेश दिया और दूसरों को भी यह पूजन करने के लिए प्रेरित करने को कहा। राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें शीघ्र ही पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। जिस दिन राजा ने यह व्रत किया था उस दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी तिथि थी। तभी से छठी मैय्या के पूजे जाने की परंपरा आरंभ हुई। कर्ण ने की थी शुरुआत महाभारत काल में कुंती पुत्र कर्ण को दानवीर माना जाता था। कर्ण सिर्फ माता कुंती के ही नहीं अपितु सूर्य देव के भी पुत्र थे। सूर्य देव की कर्ण पर विशेष कृपा थी। कर्ण नियमित रूप से प्रातः काल उठकर सूर्य देव को अर्घ्य दिया करते थे। तभी से एक पर्व के रूप में सूर्य अर्घ्य की परंपरा का आरंभ हुआ। इसके अलावा, कुंती और द्रौपदी के भी व्रत रखने का उल्लेख ग्रंथों में मिलता है। ऐसा कहा जाता है कि द्रौपदी के छठ पूजा करने के बाद ही पांडवों को उनका हारा हुआ सारा राजपाट वापस मिल गया था।  श्री राम और माता सीता ने भी रखा था व्रत रामायण में भी छठ पूजा का वर्णन मिलता है। दरअसल, भगवान राम सूर्यवंशी कुल के राजा थे और उनके आराध्य एवं कुलदेवता सूर्य देव ही थे। इसी कारण से राम राज्य की स्थापना से पूर्व भगवान राम ने माता सीता के साथ कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन छठ पर्व मनाते हुए भगवान सूर्य की पूजा विधि विधान से की थी।  मार्कण्डेय पुराण में भी है वर्णन  मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि छठी मैय्या प्रकृति की अधिष्ठात्री देवी हैं और इसके साथ ही भगवान सूर्य की बहन भी। छठी मैय्या को संतान सुख, संतान की दीर्घायु और सौभाग्य प्रदान करने वाली माता माना गया है। जब बच्चे के जन्म के छठे दिन उसका छठी पूजन होता है तब इन्हीं माता का स्मरण किया जाता है। इनकी कृपा से न सिर्फ संतान को हर तरह की सुख सुविधा प्राप्त होती है बल्कि उसके जीवन में आने वाले कष्टों का अपने आप ही निवारण हो जाता है। तो ये थी छठ पर्व की पावन कथा जिसे सुने बिना आपकी छठ पूजा अपूर्ण है। इस आर्टिकल को शेयर और लाइक जरूर करें, साथ ही कमेंट भी करें। धर्म और त्यौहारों से जुड़े ऐसे ही और आर्टिकल पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से। 

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भगवान कार्तिकेय की पूजा के दौरान जरूर पढ़ें यह व्रत कथा

इस दिन पूजा के दौरान स्कंद षष्ठी की व्रत कथा भी पढ़ी जाती है। तो आइए पढ़ते हैं स्कंद षष्ठी की व्रत कथा। पुराणों में कुमार कार्तिकेय के जन्म का वर्णन मिलता है। जब असुरों ने देवलोक में आतंक मचाया हुआ था तब देवगण को असुरों से पराजय का सामना करना पड़ा था। देवताओं के निवास स्थान पर भी असुरों ने अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। सभी देवगण असुरों को आतंक से इतने परेशान हो चुके थे कि वो सभी मिलकर भगवान ब्रह्मा के पास गए और मदद की प्रार्थना की। तब ब्रह्मा जी ने बताया कि भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा। लेकिन इस समय भगवान शिव माता सती के वियोग में समाधि में लीन थे। तब सभी देवताओं और इंद्र ने शिवजी समाधि से जगाने का प्रयत्न किया और इसके लिए उन्होंने भगवान कामदेव की मदद ली। कामदेव अपने बाण से शिव पर फूल फेंकते हैं जिससे उनके मन में माता पार्वती के लिए प्रेम की भावना विकसित हो।इससे शिवजी की तपस्या भंग हो जाती हैं और वे क्रोध में आकर अपनी तीसरी आंख खोल देते हैं। इससे कामदेव भस्म हो जाते हैं। तपस्या भंग होने के बाद वे माता पार्वती की तरफ खुद को आकर्षित पाते हैं। इसके बाद शिवजी का विवाह माता पार्वती से हो जाता है। इस तरह भगवान कार्तिकेय का जन्म होता है। फिर भगवान कार्तिकेय असुरों के राजा तारकासुर का वध कर देवताओं को उनका निवास स्थान वापस प्रदान करते हैं। कार्तिक पूर्णिमा : पढ़ें भगवान कार्तिकेय की रोचक कथा धार्मिक एवं पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बारह मासों में सबसे श्रेष्ठ मास कार्तिक माह को माना गया है। इस दिन कार्तिकेय के पूजन का विशिष्ठ महत्व है। कहा जाता है कि कार्तिकेय को भगवान विष्णु द्वारा धर्म मार्ग को प्रबल करने की प्रेरणा दी गई है। कार्तिकेय ने इसी आधार पर धर्मशास्त्र में भगवान विष्णु के दामोदर अवतार तथा अर्द्घांगिनी राधा का विशेष उल्लेख किया है। यह महीना भगवान कार्तिकेय द्वारा की गई साधना का माह माना जाता है। इस कारण ही इसका नाम कार्तिक महीना पड़ा। इस दिन वर्षभर में एक बार खुलने वाले भगवान कार्तिकेय मंदिर के पट खुलते हैं। मध्यप्रदेश के संभवतः इकलौते प्राचीन मंदिरों में से एक ग्वालियर के गंगा मंदिर, जीवाजीगंज में स्थित है।  पुराण और शास्त्रों के अनुसार शंकरजी की आज्ञा के बाद जब भगवान गणेश और कार्तिकेय पृथ्वी परिक्रमा के लिए गए थे। गणेश जी भारी-भरकम शरीर वाले होने के कारण एक जगह बैठ गए और कार्तिकेय मोर पर सवार होकर पृथ्वी परिक्रमा पर चले गए। कार्तिकेय काफी वर्षों तक भ्रमण करते रहे और परिक्रमा पूरी नहीं कर सके। गणेशजी ने धीरे-धीरे अपने माता-पिता की परिक्रमा पूरी कर ली और गणेश जी को बुद्धिमान मान लिया गया। बड़ा मानकर गणेशजी की शादी करा दी। जब कार्तिकेय वापस आए तो वे इस बात से क्रोधित होकर तपस्या पर चले गए।  जब शंकर-पार्वती कार्तिकेय को मनाने के लिए गए तो उन्होंने शंकर-पावती को शाप दे दिया कि जो स्त्री दर्शन करेंगी तो सात जन्म वह विधवा रहेंगी और पुरुष दर्शन करेंगे तो वे सात जन्म तक नरक को भोगेंगे। फिर शंकर-पार्वती ने आग्रह किया कि कोई ऐसा दिन हो, जब आपके दर्शन हो सकें।  तब भगवान कार्तिकेय ने कहा कि कार्तिक पूर्णिमा के दिन जो दर्शन करेगा, उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। जब से यह एक वर्ष में एक बार कार्तिकेय पूर्णिमा को खुलता है। इस मंदिर में गंगा, जमुना, सरस्वती, हनुमान, लक्ष्मी नारायण व भगवान कार्तिकेय आदि के मंदिर हैं। जिसमें भगवान कार्तिकेय का मंदिर वर्ष में एक बार कार्तिकेय पूर्णिमा को ही खुलता है। वहीं अन्य मंदिर प्रतिदिन खुलते हैं। कार्तिकेय पूर्णिमा पर सुबह अभिषेक के साथ दिन भर भजन-कीर्तन होता है, वहीं दूसरे दिन सुबह 4 बजे भोग लगाकर मंदिर के पट बंद किए जाते हैं, जो अगली कार्तिक पूर्णिमा पर खोले जाते है।  कार्तिक पूर्णिमा के संबंध में यह मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय के दर्शन करने से घरों में खुशहाली व सुख-शांति एक वर्ष तक बनी रहती है।

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जानिए स्कंद षष्ठी का महत्त्व, व्रत कथा एवं पूजा विधि 

इस दिन भगवान शिव के पुत्र, कार्तिकेय की पूजा की जाती है। कहते हैं इस दिन संसार में हो रहे कुकर्मों को समाप्त करने के लिए कार्तिकेय का जन्म हुआ था। स्कन्द, मुरुगन, सुब्रमण्यम यह सभी नाम भगवान कार्तिकेय के हैं। बताया जाता हैं कि स्कंद षष्ठी की उपासना से च्यवन ऋषि को आंखों की ज्योति प्राप्त हुई थी। इस दिन यह भी बताया गया है कि स्कंद षष्ठी की कृपा से प्रियव्रत के मृत शिशु के प्राण लौट आए थे। इस तिथि से जुड़ी प्रसिद्ध कथा   राक्षस ताड़कासुर का अत्याचार हर जगह फैल गया था जिसके कारण सभी देवताओं को हार का सामना करना पड़ रहा था। एक दिन सभी देवता मिलकर ब्रह्म देव के पास पहुंचे और उनसे अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे। ब्रह्म देव ने उन्हें बताया की ताड़कासुर का वध भगवान शिव के पुत्र के अलावा कोई नहीं कर सकता लेकिन माता सती के अंत के बाद शिवजी साधना में लीन हो गए थे। सभी देवता भगवान शिव के पास गुहार लेकर गए और शिवजी ने उनकी बात सुनकर पार्वती से विवाह किया। शुभ मुहूर्त में विवाह होने के बाद कार्तिकेय का जन्म हुआ और उन्होंने ताड़कासुर का वध किया। इस दिन कार्तिकेय के साथ-साथ भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करने का भी विशेष महत्त्व है। इस दिन दान आदि कार्य करने से विशेष लाभ मिलता है। स्कंद देव की स्थापना करके अखंड दीपक जलाए जाते हैं। कार्तिक भगवान को स्नान करवाकर, नए वस्त्र पहनाकर, पूजा की जाती है। इस दिन भगवान को भोग लगाया जाता है। स्कंद षष्ठी पूजन में तामसिक भोजन मांस, शराब, प्याज, लहसुन का त्याग करना चाहिए और ब्रह्मचर्य आवश्यक होता है। कहते हैं इस दिन भगवान कार्तिकेय पर दही में सिंदूर मिलाकर चढ़ाने से व्यवसाय पर आ रहे व्यावसायिक कष्ट समाप्त हो जाते हैं और आर्थिक स्थिति अच्छी होती है। इस दिन पूरे मन से भगवान कार्तिकेय का पूजन करने से जीवन के अनेक प्रकार के कष्ट दूर होते हैं।स्कंद षष्ठी भगवान कार्तिकेय को समर्पित महत्वपूर्ण हिंदू त्योहारों में से एक है। स्कंद षष्ठी को कांडा षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। भगवान कार्तिकेय का एक नाम स्कंद कुमार भी है। तमिल हिंदुओं के बीच लोकप्रिय हिंदू देवता भगवान स्कंद कुमार हैं। वह भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र हैं और उन्हें भगवान गणेश का छोटा भाई माना जाता है। लेकिन उत्तरी भारत में, स्कंद को भगवान गणेश के बड़े भाई के रूप में पूजा जाता है। भगवान स्कंद के अन्य नाम मुरुगन, कार्तिकेयन और सुब्रमण्य हैं। स्कंद षष्ठी को कांडा षष्ठी के नाम से भी जाना जाता है। पंचमी तिथि या षष्ठी तिथि सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच शुरू होती है और बाद में स्कंद षष्ठी व्रत के लिए इस दिन पंचमी और षष्ठी दोनों को संयुग्मित किया जाता है। इसका उल्लेख धर्मसिंधु और निर्णय सिंधु में मिलता है । जुलाई के महीने में स्कंद षष्टि का व्रत 5 जुलाई यानी मंगलवार के दिन रखा जाएगा। मान्यता है कि भगवान कार्तिकेय की विधि विधान से पूजा करने पर व्यक्ति को सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को स्कंद षष्ठी व्रत रखा जाता है। आइए जानते हैं व्रत से की तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में। स्कंद षष्ठी व्रत का महत्वभगवान मुरुगन ने सोरपद्मन और उसके भाइयों तारकासुर और सिंहमुख को षष्ठी के दिन मार दिया था। स्कन्द षष्ठी का यह दिन जीत का प्रतीक है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान मुरुगन ने वेल या लांस नामक अपने हथियार का उपयोग करके सोरपद्मन का सिर काट दिया था। कटे हुए सिर से दो पक्षी निकले – एक मोर जो कार्तिकेय का वाहन बन गया और एक मुर्गा जो उनके झंडे पर प्रतीक बन गया। स्कंद षष्ठी का व्रत रखने से निसंतान को संतान की प्राप्ति होती है। स्कंद षष्ठी व्रत की कथा के अनुसार, च्यवन ऋषि के आंखों की रोशनी चली गई थी, तो उन्होंने स्कंद कुमार की पूजा की थी। व्रत के पुण्य प्रभाव से उनके आंखों की रोशनी वापस आ गई। 

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स्कंद षष्ठी की पौराणिक कथा जानते हैं आप?

शिव के दूसरे पुत्र कार्तिकेय के जन्म की कथा भी विचित्र है। पौराणिक कथा के अनुसार जब पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव की पत्नी ‘सती’ कूदकर भस्म हो गईं, तब शिवजी विलाप करते हुए गहरी तपस्या में लीन हो गए। उनके ऐसा करने से सृष्टि शक्तिहीन हो जाती है। इस मौके का फायदा दैत्य उठाते हैं और धरती पर तारकासुर नामक दैत्य का चारों ओर आतंक फैल जाता है। देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ता है। चारों तरफ हाहाकार मच जाता है तब सभी देवता ब्रह्माजी से प्रार्थना करते हैं। तब ब्रह्माजी कहते हैं कि तारक का अंत शिव पुत्र करेगा। इंद्र और अन्य देव भगवान शिव के पास जाते हैं, तब भगवान शंकर ‘पार्वती’ के अपने प्रति अनुराग की परीक्षा लेते हैं और पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होते हैं और इस तरह शुभ घड़ी और शुभ मुहूर्त में शिवजी और पार्वती का विवाह हो जाता है। इस प्रकार कार्तिकेय का जन्म होता है। कार्तिकेय तारकासुर का वध करके देवों को उनका स्थान प्रदान करते हैं।पुराणों के अनुसार षष्ठी तिथि को कार्तिकेय भगवान का जन्म हुआ था इसलिए इस दिन उनकी पूजा का विशेष महत्व है। शिव के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय को सुब्रमण्यम, मुरुगन और स्कंद भी कहा जाता है। कार्तिकेय की पूजा मुख्यत: दक्षिण भारत में होती है। अरब में यजीदी जाति के लोग भी इन्हें पूजते हैं, ये उनके प्रमुख देवता हैं। उत्तरी ध्रुव के निकटवर्ती प्रदेश उत्तर कुरु के क्षे‍त्र विशेष में ही इन्होंने स्कंद नाम से शासन किया था। इनके नाम पर ही स्कंद पुराण है। स्कंद षष्ठी: जानें, व्रत कथा और पूजन विधि बहुत कम लोग जानते होंगे परंतु बाकी त्यौहारों की तरह इस त्यौहार का भी बहुत महत्व है। बता दें कि भगवान कार्तिकेय को युद्ध का राजा माना जाता है यही कारण था कि देवताओं ने इन्हें अपना सेनापति नियुक्त किया था। जैसे हिंदू धर्म के सभी त्योहार अच्छी की बुराई पर जीत का प्रतीक माने जाते हैं ठीक वैसे ही स्कंद पष्ठी भी बुराई पर अच्छाई का प्रतीक माना जाता है। कहा जाता है कि इनके आशीर्वाद से मान सम्मान, प्रतिष्ठा और विजय प्राप्त होती है।इस शुभ अवसर पर भगवान शिव और माता पार्वती की भी पूजा की जाती है। परंतु सबसे पहले इसमें स्कंद देव (कार्तिकेय) की स्थापना करके पूजा की जाती है और साथ ही अखंड दीपक जलाए जाते हैं। वहीं, भक्तों द्वारा स्कंद षष्ठी का पाठ किया जाता है। भगवान को स्नान कराया जाता है, उसके बाद नए वस्त्र पहनाए जाते हैं फिर विधिपूर्वक की पूजा कर भोग लगाया जाता है।इस दिन कुछ कामों को करने की मनाही होती है। अगर इस दिन ये काम किए जाए तो इसका अंजाम बहुत बुरा भुगतना पड़ता है। जैसे कि हम सब जानते हैं कि पूजा की कई अलग-अलग विधियां होती हैं, इनकी पूजन विधि में भी कुछ खास नियम का अपनाया जाना बहुत आवश्यक माना जाता है। ज्योतिष के अनुसार ध्यान इस दिन भगवान क्रार्तिकेय की पूजा करने से पहले मांस, शराब, प्याज, लहसुन का त्याग कर देना चाहिए और साथ ही इसमें ये भी कहा गया है कि ब्रह्मचर्य का संयम रखना बहुत ज़रूरी होता है। ध्यान रहें कि किसी भी खास काम की सिद्धि के लिए इस समय कि गई पूजा-अर्चना सबसे ज्यादा फलदायी मानी जाती है। स्कंद षष्ठी के दिन करें इन मंत्रों का जाप ज्योतिष की मानें को अगर इन मंत्रों के साथ भगवान की पूजा करना बहुत फलदायक होती है।“ॐ तत्पुरुषाय विधमहे: महा सैन्या धीमहि तन्नो स्कंदा प्रचोदयात” “ॐ शारवाना-भावाया नम: ज्ञानशक्तिधरा स्कंदा वल्लीईकल्याणा सुंदरा, देवसेना मन: कांता कार्तिकेया नामोस्तुते”

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