2022

अजा एकादशी व्रत कथा

पौराणिक काल में अयोध्या नगरी में एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। उसका नाम हरिश्चन्द्र था। वह अत्यन्त वीर, प्रतापी तथा सत्यवादी था। प्रभु इच्छा से उसने अपना राज्य स्वप्न में एक ऋषि को दान कर दिया और परिस्थितिवश उसे अपनी स्त्री और पुत्र को भी बेच देना पड़ा। स्वयं वह एक चाण्डाल का दास बन गया। उसने उस चाण्डाल के यहाँ कफन लेने का काम किया, किन्तु उसने इस आपत्ति के काम में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। जब इसी प्रकार उसे कई वर्ष बीत गये तो उसे अपने इस नीच कर्म पर बड़ा दुख हुआ और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगा। वह सदैव इसी चिन्ता में रहने लगा कि मैं क्या करूँ? किस प्रकार इस नीच कर्म से मुक्ति पाऊँ? एक बार की बात है, वह इसी चिन्ता में बैठा था कि गौतम् ऋषि उसके पास पहुँचे। हरिश्चन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुख-भरी कथा सुनाने लगा। राजा हरिश्चन्द्र की दुख-भरी कहानी सुनकर महर्षि गौतम भी अत्यन्त दुखी हुए और उन्होंने राजा से कहा- ‘हे राजन! भादों के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा है। तुम उस एकादशी का विधानपूर्वक व्रत करो तथा रात्रि को जागरण करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।’ महर्षि गौतम इतना कह आलोप हो गये। अजा नाम की एकादशी आने पर राजा हरिश्चन्द्र ने महर्षि के कहे अनुसार विधानपूर्वक उपवास तथा रात्रि जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी पाप नष्ट हो गये। उस समय स्वर्ग में नगाड़े बजने लगे तथा पुष्पों की वर्षा होने लगी। उसने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवेन्द्र आदि देवताओं को खड़ा पाया। उसने अपने मृतक पुत्र को जीवित तथा अपनी पत्नी को राजसी वस्त्र तथा आभूषणों से परिपूर्ण देखा। व्रत के प्रभाव से राजा को पुनः अपने राज्य की प्राप्ति हुई। वास्तव में एक ऋषि ने राजा की परीक्षा लेने के लिए यह सब कौतुक किया था, परन्तु अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से ऋषि द्वारा रची गई सारी माया समाप्त हो गई और अन्त समय में हरिश्चन्द्र अपने परिवार सहित स्वर्ग लोक को गया। जो मनुष्य इस उपवास को विधानपूर्वक करते हैं तथा रात्रि-जागरण करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्त में वे स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। इस एकादशी व्रत की कथा के श्रवण मात्र से ही अश्वमेध यज्ञ के फल की प्राप्ति हो जाती है।

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पिठोरी अमावस्या की व्रत कथा

भाद्रपद महीने की अमावस्या, पिठोरी अमावस्या के रूप में मनाई जाती है। इस दिन महिलायें अपनी संतान की लम्बी आयु के लिए व्रत रखती है। ऐसी मान्यता है कि मां दुर्गा की कृपा से संतान को न सिर्फ लंबी आयु मिलती है, बल्कि मृत संतान को भी नया जीवन मिल सकता है। पिठौरी अमावस्या के दिन आटे से 64 देवियों के पिंड बनाकर उनकी पूजा की जाती है।बहुत पहले की बात है। एक परिवार में सात भाई थे। सभी का विवाह हो चुका था। सबके छोटे-छोटे बच्चे भी थे। परिवार की सलामती के लिए सातों भाईयों की पत्नी पिठोरी अमावस्या का व्रत रखना चाहती थीं। लेकिन जब पहले साल बड़े भाई की पत्नी ने व्रत रखा तो उनके बेटे की मृत्यु हो गई। दूसरे साल फिर एक और बेटे की मृत्यु हो गई। सातवें साल भी ऐसा ही हुआ।तब बड़े भाई की पत्नी ने इस बार अपने मृत पुत्र का शव कहीं छिपा दिया। गांव की कुल देवी मां पोलेरम्मा उस समय गांव के लोगों की रक्षा के लिए पहरा दे रही थीं। उन्होने जब इस दु:खी मां को देखा तो वजह जाननी चाही। जब बड़े भाई की पत्नी ने सारा किस्सा सुनाया तो देवी पोलेरम्मा को दया आ गई। उन्होने उस दु:खी मां से कहा कि वह उन उन स्थानों पर हल्दी छिड़क दे जहां जहां उसके बेटों का अंतिम संस्कार हुआ है। मां ने ऐसा ही किया। जब वह घर लौटी तो सातों पुत्र को जीवित देख, उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। तभी से उस गांव की हर मां अपने बच्चों की लंबी आयु की कामना के लिए पिठोरी अमावस्या का व्रत रखने लगीं यह व्रत उन सभी महिलाओं को करना चाहिए जिनके संतान हो। इस दिन प्रातः जल्दी उठकर स्नान करे। यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी में स्नान करे। स्नान के बाद सूर्य भगवान को जल अर्पण करे। चुकी अमावस्या को पितरों का दिन कहा जाता है इसलिए इस दिन पिंड दान और तर्पण भी करे।इसके पश्चात पूजन हेतु आटे से देवियों की 64 प्रतिमा या पिंड बनाये। इन सभी 64 प्रतिमा को एक साथ एक पाटे पर रखे। भगवान को भोग लगाने के लिए आटे से बनने वाले व्यंजन बनाये। संध्या समय विधि विधान से देवी की पूजा करे। पूजन के समय देवी की प्रतिमा को सुहाग का सामान चढ़ाये। पूजन के पश्चात ब्राह्मणों को भोजन कराके स्वयं भोजन करे।

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इंदिरा एकादशी की व्रत कथा

आश्चिन कृ्ष्ण पक्ष की एकादशी, इन्दिरा एकादशी कहलाती है। पितृ पक्ष में आने के कारण इसका बड़ा ही महत्त्व है। शास्त्रों के अनुसार इस एकादशी के व्रत के फल से भटकते हुए पितरों को गति प्राप्त हो जाती है, साथ ही व्रत को करने वाला स्वयं भी मोक्ष को प्राप्त होता हैं। इस एकादशी के दिन शालीग्राम का पूजा किया जाता है।प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था। वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और विष्णु का परम भक्त था। एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया।सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहाँ यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो। मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा। उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूँ। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में ‍कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूँ, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इंद्रसेन को अपने पिता के यमलोक में पड़े होने की बात सुनकर महान दुख हुआ और उसने नारद से कहा- ‘हे नारदजी! यह तो बड़े दुख का समाचार है कि मेरे पिता यमलोक में पड़े हैं। मैं उनकी मुक्ति का उपाय अवश्य करूंगा। आप मुझे इन्दिरा एकादशी व्रत का विधान बताने की कृपा करें।’नारदजी कहने लगे- आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करता हुआ प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूँगा। हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए, इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएँ और दक्षिणा दें। पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूँघकर गौ को दें तथा ध़ूप, दीप, गंध, ‍पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से ऋषिकेश भगवान का पूजन करें। रात में भगवान के निकट जागरण करें। इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी मौन होकर भोजन करें। नारदजी कहने लगे कि हे राजन! इस विधि से यदि तुम आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएँगे। इतना कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गए।

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उपांग ललिता पंचमी व्रत कथा

हिन्दू पंचांग के अनुसार शारदीय नवरात्रि के आश्विन शुक्‍ल पंचमी को ललिता पंचमी पर्व या उपांग ललिता पर्व मनाया जाता है। यह पर्व शक्तिस्वरूपा देवी ललिता को समर्पित है। ललिता देवी को माता सती पार्वती का ही एक रूप माना जाता हैं। यह पर्व पूरे भारतभर में मनाया जाता है। इस सुअवसर पर भक्तजन व्रत रखते हैं जिसे ललिता पंचमी व्रत या उपांग ललिता व्रत के नाम से जाना जाता है। ललिता देवी को ‘त्रिपुर सुंदरी’ के नाम से भी जाना जाता है। पुराणों के अनुसार जब माता सती अपने पिता दक्ष द्वारा अपमान किए जाने पर यज्ञ अग्नि में अपने प्राण त्‍याग देती हैं तब भगवान शिव उनके शरीर को उठाए घूमने लगते हैं, ऐसे में पूरी धरती पर हाहाकार मच जाता है। जब विष्‍णु भगवान अपने सुदर्शन चक्र से माता सती की देह को विभाजित करते हैं, तब भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर इन्हें ‘ललिता’ के नाम से पुकारा जाने लगा।कालिका पुराण के अनुसार देवी ललिता की दो भुजाएं हैं। यह माता गौर वर्ण होकर रक्तिम कमल पर विराजित हैं। दक्षिणमार्गी शाक्तों के मतानुसार देवी ललिता को ‘चण्डी’ का स्थान प्राप्त है। इनकी पूजा पद्धति देवी चण्डी के समान ही है। नवरात्रि में दुर्गा देवी के 9 रूपों की पूजा की जाती है तथा नवरात्रि के 5वें दिन स्कंदमाता के पूजन के साथ-साथ ललिता पंचमी व्रत तथा शिवशंकर की पूजा भी की जाती है। इस संबंध में ऐसी मान्‍यता है कि मां ललिता 10 महाविद्याओं में से ही एक हैं, अत: पंचमी के दिन यह व्रत रखने से भक्त के सभी कष्‍ट दूर होकर उन्हें मां ललिता का विशेष आशीर्वाद मिलता है। देवी ललिता का ध्यान रूप बहुत ही उज्ज्वल व प्रकाशवान है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन माता ललिता कामदेव के शरीर की राख से उत्पन्न हुए ‘भांडा’ नामक राक्षस को मारने के लिए प्रकट हुई थीं। इस दिन देवी मंदिरों पर भक्तों का तांता लगता है। यह व्रत समस्त सुखों को प्रदान करने वाला होता है अत: इस दिन मां ललिता की पूजा-आराधना का विशेष महत्व है। इस दिन ललितासहस्रनाम, ललितात्रिशती का पाठ विशेष तौर पर किया किया जाता है।

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शनि त्रयोदशी व्रत कथा

जब त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन आती है तो वो शनि त्रयोदशी या शनि प्रदोष कहलाती है। सभी त्रयोदशी तिथि में शनि त्रयोदशी त्रयोदशी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। शनि त्रयोदशी का व्रत संतान प्राप्ति के लिए किया जाता है। साथ ही इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।प्राचीन समय की बात है। एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था। वह अत्यन्त दयालु था। उसके यहां से कभी कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को जी भरकर दान-दक्षिणा देता था। लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्‍नी स्वयं काफी दुखी थे। दुःख का कारण था- उनके सन्तान का न होना। सन्तानहीनता के कारण दोनों घुले जा रहे थे।एक दिन उन्होंने तीर्थयात्र पर जाने का निश्‍चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सोंप चल पडे। अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति-पत्‍नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की समाधि नही टूटी। मगर सेठ पति-पत्‍नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे। हे रुद्रदेव शिव नमस्कार । शिव शंकर जगगुरु नमस्कार ॥ अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे । सेठ पति-पत्‍नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले- ‘मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूं वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं।’ साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि त्रयोदशी व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई हे नीलकंठ सुर नमस्कार । शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार ॥ हे उमाकान्त सुधि नमस्कार । उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥ ईशान ईश प्रभु नमस्कार । विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार ॥ तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि त्रयोदशी व्रत करने लगे । कालान्तर में सेठ की पत्‍नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया । शनि त्रयोदशी व्रत के प्रभाव से उनके यहां छाया अन्धकार लुप्त हो गया । दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे।

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षटतिला एकादशी व्रत कथा

माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहते है। एक बार दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा- ‘हे ऋषि श्रेष्ठ! मनुष्य मृत्युलोक में ब्रह्महत्या आदि महापाप करते हैं और दूसरे के धन की चोरी तथा दूसरे की उन्तति देखकर ईर्ष्या आदि करते हैं, ऐसे महान पाप मनुष्य क्रोध, ईर्ष्या, आवेग और मूर्खतावश करते हैं और बाद में शोक करते हैं कि हाय! यह हमने क्या किया! हे महामुनि! ऐसे मनुष्यों को नरक से बचाने का क्या उपाय है? कोई ऐसा उपाय बताने की कृपा करें, जिससे ऐसे मनुष्यों को नरक से बचाया जा सके अर्थात उन्हें नरक की प्राप्ति न हो। ऐसा कौन-सा दान-पुण्य है, जिसके प्रभाव से नरक की यातना से बचा जा सकता है, इन सभी प्रश्नों का हल आप कृपापूर्वक बताइए?’ एक बार नारद मुनि ने भगवान श्रीहरि से षटतिला एकादशी का माहात्म्य पूछा, वे बोले- ‘हे प्रभु! आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें। षटतिला एकादशी के उपवास का क्या पुण्य है? उसकी क्या कथा है, कृपा कर मुझसे कहिए।’ नारद की प्रार्थना सुन भगवान श्रीहरि ने कहा- ‘हे नारद! मैं तुम्हें प्रत्यक्ष देखा सत्य वृत्तांत सुनाता हूँ, ध्यानपूर्वक श्रवण करो- बहुत पहले मृत्युलोक में एक ब्राह्मणी रहती थी। वह सदा व्रत-उपवास किया करती थी। एक बार वह एक मास तक उपवास करती रही, इससे उसका शरीर बहुत कमजोर हो गया। वह अत्यंत बुद्धिमान थी। फिर उसने कभी भी देवताओं तथा ब्राह्मणों के निमित्त अन्नादि का दान नहीं किया। मैंने चिंतन किया कि इस ब्राह्मणी ने उपवास आदि से अपना शरीर तो पवित्र कर लिया है तथा इसको वैकुंठ लोक भी प्राप्त हो जाएगा, किंतु इसने कभी अन्नदान नहीं किया है, अन्न के बिना जीव की तृप्ति होना कठिन है। ऐसा चिंतन कर मैं मृत्युलोक में गया और उस ब्राह्मणी से अन्न की भिक्षा मांगी। इस पर उस ब्राह्मणी ने कहा-हे योगीराज! आप यहां किसलिए पधारे हैं? मैंने कहा- मुझे भिक्षा चाहिए। इस पर उसने मुझे एक मिट्टी का पिंड दे दिया। मैं उस पिंड को लेकर स्वर्ग लौट आया। कुछ समय व्यतीत होने पर वह ब्राह्मणी शरीर त्यागकर स्वर्ग आई। मिट्टी के पिंड के प्रभाव से उसे उस जगह एक आम वृक्ष सहित घर मिला, किंतु उसने उस घर को अन्य वस्तुओं से खाली पाया। वह घबराई हुई मेरे पास आई और बोली- ‘हे प्रभु! मैंने अनेक व्रत आदि से आपका पूजन किया है, किंतु फिर भी मेरा घर वस्तुओं से रिक्त है, इसका क्या कारण है?’ मैंने कहा- ‘तुम अपने घर जाओ और जब देव-स्त्रियां तुम्हें देखने आएं, तब तुम उनसे षटतिला एकादशी व्रत का माहात्म्य और उसका विधान पूछना, जब तक वह न बताएं, तब तक द्वार नहीं खोलना।’ प्रभु के ऐसे वचन सुन वह अपने घर गई और जब देव-स्त्रियां आईं और द्वार खोलने के लिए कहने लगीं, तब उस ब्राह्मणी ने कहा- ‘यदि आप मुझे देखने आई हैं तो पहले मुझे षटतिला एकादशी का माहात्म्य बताएं।’ तब उनमें से एक देव-स्त्री ने कहा- ‘यदि तुम्हारी यही इच्छा है तो ध्यानपूर्वक श्रवण करो- मैं तुमसे एकादशी व्रत और उसका माहात्म्य विधान सहित कहती हूं।’ जव उस देव-स्त्री ने षटतिला एकादशी का माहात्म्य सुना दिया, तब उस ब्राह्मणी ने द्वार खोल दिया। देव-स्त्रियों ने ब्राह्मणी को सब स्त्रियों से अलग पाया। उस ब्राह्मणी ने भी देव-स्त्रियों के कहे अनुसार षटतिला एकादशी का उपवास किया और उसके प्रभाव से उसका घर धन्य-धान्य से भर गया, अतः हे पार्थ! मनुष्यों को अज्ञान को त्यागकर षटतिला एकादशी का उपवास करना चाहिए। इस एकादशी व्रत के करने वाले को जन्म-जन्म की निरोगता प्राप्त हो जाती है। इस उपवास से मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।”

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परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहते है। धर्म ग्रंथों के अनुसार इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। वैसे इस एकादशी के कई अन्य नाम भी है जैसे की – जलझूलनी एकादशी, वामन एकादशी, डोल ग्यारस आदि। इस कथा को स्वयं श्री कृष्ण ने पांडवों को सुनाई थी। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! अब तुम समस्त पापों का शमन करने वाली इस कथा का ध्यानपूर्वक श्रवण करो। त्रेतायुग में बलि नाम का एक असुर था। वह अत्यन्त भक्त, दानी, सत्यवादी तथा ब्राह्मणों की सेवा करने वाला था। वह सदा यज्ञ, तप आदि किया करता था। अपनी इसी भक्ति के प्रभाव से वह स्वर्ग में देवेन्द्र के स्थान पर राज्य करने लगा। देवराज इन्द्र तथा अन्य देवता इस बात को सहन नहीं कर सके और भगवान श्रीहरि के पास जाकर प्रार्थना करने लगे। अन्त में मैंने वामन रूप धारण किया और तेजस्वी ब्राह्मण बालक के रूप में राजा बलि पर विजय प्राप्त की।” यह सुनकर अर्जुन ने कहा- “हे लीलापति! आपने वामन रूप धारण करके उस बलि को किस प्रकार जीता, कृपा कर यह सब विस्तारपूर्वक बताइये।” भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- “मैंने वामन रूप धारण करके राजा बलि से याचना की- हे राजन! तुम मुझे तीन पग भूमि दान दे दो, इससे तुम्हें तीन लोक के दान का फल प्राप्त होगा। राजा बलि ने इस छोटी-सी याचना को स्वीकार कर लिया और भूमि देने को तैयार हो गया। जब उसने मुझे वचन दे दिया, तब मैंने अपना आकार बढ़ाया और भूलोक में पैर, भुवन लोक में जंघा, स्वर्ग लोक में कमर, महलोक में पेट, जनलोक में हृदय, तपलोक में कण्ठ और सत्यलोक में मुख रखकर अपने शीर्ष को ऊँचा उठा लिया। उस समय सूर्य, नक्षत्र, इन्द्र तथा अन्य देवता मेरी स्तुति करने लगे। तब मैंने राजा बलि से पूछा कि हे राजन! अब मैं तीसरा पग कहाँ रखूँ। इतना सुनकर राजा बलि ने अपना शीर्ष नीचे कर लिया। तब मैंने अपना तीसरा पग उसके शीर्ष पर रख दिया और इस प्रकार देवताओं के हित के लिए मैंने अपने उस असुर भक्त को पाताल लोक में पहुँचा दिया तब वह मुझसे विनती करने लगा। तब मैने उससे कहा कि हे बलि! मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगा

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शुक्रवार संतोषी माता व्रत कथा (Shukravar Santoshi Mata Vrat Katha)

शुक्रवार के दिन माँ संतोषी का व्रत-पूजन किया जाता है। इस पूजा के दौरान माता की आरती, पूजन तथा अंत में माता की कथा सुनी जाती है। आइए जानें! शुक्रवार के दिन की जाने वाली संतोषी माता व्रत कथा..संतोषी माता व्रत कथा-एक बुढ़िया थी, उसके सात बेटे थे। 6 कमाने वाले थे जबकि एक निक्कमा था। बुढ़िया छहों बेटों की रसोई बनाती, भोजन कराती और उनसे जो कुछ जूठन बचती वह सातवें को दे देती। एक दिन वह पत्नी से बोला- देखो मेरी माँ को मुझ पर कितना प्रेम है।वह बोली- क्यों नहीं, सबका झूठा जो तुमको खिलाती है।वह बोला- ऐसा नहीं हो सकता है। मैं जब तक आँखों से न देख लूं मान नहीं सकता।बहू हंस कर बोली- देख लोगे तब तो मानोगे। कुछ दिन बाद त्यौहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमे के लड्डू बने। वह जांचने को सिर दुखने का बहाना कर पतला वस्त्र सिर पर ओढ़े रसोई घर में सो गया। वह कपड़े में से सब देखता रहा। छहों भाई भोजन करने आए। उसने देखा, माँ ने उनके लिए सुन्दर आसन बिछा नाना प्रकार की रसोई परोसी और आग्रह करके उन्हें जमाया। वह देखता रहा। छहों भोजन करके उठे तब माँ ने उनकी झूठी थालियों में से लड्डुओं के टुकड़े उठाकर एक लड्डू बनाया। जूठन साफ कर बुढ़िया माँ ने उसे पुकारा- बेटा, छहों भाई भोजन कर गए अब तू ही बाकी है, उठ तू कब खाएगा।वह कहने लगा- माँ मुझे भोजन नहीं करना, मैं अब परदेश जा रहा हूँ।माँ ने कहा- कल जाता हो तो आज चला जा।वह बोला- हाँ आज ही जा रहा हूँ। यह कह कर वह घर से निकल गया। सातवें बेटे का परदेश जाना-चलते समय पत्नी की याद आ गई। वह गौशाला में कण्डे (उपले) थाप रही थी।वहाँ जाकर बोला-हम जावे परदेश आवेंगे कुछ काल,तुम रहियो संतोष से धर्म आपनो पाल।वह बोली-जाओ पिया आनन्द से हमारो सोच हटाय,राम भरोसे हम रहें ईश्वर तुम्हें सहाय।दो निशानी आपन देख धरूं में धीर,सुधि मति हमारी बिसारियो रखियो मन गम्भीर। वह बोला- मेरे पास तो कुछ नहीं, यह अंगूठी है सो ले और अपनी कुछ निशानी मुझे दे। वह बोली- मेरे पास क्या है, यह गोबर भरा हाथ है। यह कह कर उसकी पीठ पर गोबर के हाथ की थाप मार दी। वह चल दिया, चलते-चलते दूर देश पहुँचा। परदेश मे नौकरी-वहाँ एक साहूकार की दुकान थी। वहाँ जाकर कहने लगा- भाई मुझे नौकरी पर रख लो।साहूकार को जरूरत थी, बोला- रह जा।लड़के ने पूछा- तनखा क्या दोगे।साहूकार ने कहा- काम देख कर दाम मिलेंगे। साहूकार की नौकरी मिली, वह सुबह 7 बजे से 10 बजे तक नौकरी बजाने लगा। कुछ दिनों में दुकान का सारा लेन-देन, हिसाब-किताब, ग्राहकों को माल बेचना सारा काम करने लगा। साहूकार के सात-आठ नौकर थे, वे सब चक्कर खाने लगे, यह तो बहुत होशियार बन गया। सेठ ने भी काम देखा और तीन महीने में ही उसे आधे मुनाफे का हिस्सेदार बना लिया। वह कुछ वर्ष में ही नामी सेठ बन गया और मालिक सारा कारोबार उसपर छोड़कर चला गया। पति की अनुपस्थिति में सास का अत्याचार-इधर उसकी पत्नी को सास ससुर दु:ख देने लगे, सारी गृहस्थी का काम कराके उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते। इस बीच घर के आटे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटे नारियल की नारेली में पानी। एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी, रास्ते में बहुत सी स्त्रियां संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दी। संतोषी माता का व्रत-वह वहाँ खड़ी होकर कथा सुनने लगी और पूछा- बहिनों तुम किस देवता का व्रत करती हो और उसके करने से क्या फल मिलता है। यदि तुम इस व्रत का विधान मुझे समझा कर कहोगे तो मैं तुम्हारा बड़ा अहसान मानूंगी। तब उनमें से एक स्त्री बोली- सुनो, यह संतोषी माता का व्रत है। इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है और जो कुछ मन में कामना हो, सब संतोषी माता की कृपा से पूरी होती है। तब उसने उससे व्रत की विधि पूछी। संतोषी माता व्रत विधि-वह भक्तिनि स्त्री बोली- सवा आने का गुड़ चना लेना, इच्छा हो तो सवा पांच आने का लेना या सवा रुपए का भी सहूलियत के अनुसार लाना। बिना परेशानी और श्रद्धा व प्रेम से जितना भी बन पड़े सवाया लेना। प्रत्येक शुक्रवार को निराहार रह कर कथा सुनना, इसके बीच क्रम टूटे नहीं, लगातार नियम पालन करना, सुनने वाला कोई न मिले तो धी का दीपक जला उसके आगे या जल के पात्र को सामने रख कर कथा कहना। जब कार्य सिद्ध न हो नियम का पालन करना और कार्य सिद्ध हो जाने पर व्रत का उद्यापन करना। तीन मास में माता फल पूरा करती है। यदि किसी के ग्रह खोटे भी हों, तो भी माता वर्ष भर में कार्य सिद्ध करती है, फल सिद्ध होने पर उद्यापन करना चाहिए बीच में नहीं। उद्यापन में अढ़ाई सेर आटे का खाजा तथा इसी परिमाण से खीर तथा चने का साग करना। आठ लड़कों को भोजन कराना, जहाँ तक मिलें देवर, जेठ, भाई-बंधु के हों, न मिले तो रिश्तेदारों और पास-पड़ोसियों को बुलाना। उन्हें भोजन करा यथा शक्ति दक्षिणा दे माता का नियम पूरा करना। उस दिन घर में खटाई न खाना। यह सुन बुढ़िया के लड़के की बहू चल दी। व्रत का प्रण करना और माँ संतोषी का दर्शन देना-रास्ते में लकड़ी के बोझ को बेच दिया और उन पैसों से गुड़-चना ले माता के व्रत की तैयारी कर आगे चली और सामने मंदिर देखकर पूछने लगी- यह मंदिर किसका है।सब कहने लगे संतोषी माता का मंदिर है, यह सुनकर माता के मंदिर में जाकर चरणों में लोटने लगी। दीन हो विनती करने लगी- माँ मैं निपट अज्ञानी हूँ, व्रत के कुछ भी नियम नहीं जानती, मैं दु:खी हूँ। हे माता ! जगत जननी मेरा दु:ख दूर कर मैं तेरी शरण में हूँ। माता को दया आई- एक शुक्रवार बीता कि दूसरे को उसके पति का पत्र आया और तीसरे शुक्रवार को उसका भेजा हुआ पैसा आ पहुँचा। यह देख जेठ-जिठानी मुंह सिकोडऩे लगे।लड़के ताने देने लगे- काकी के पास पत्र आने लगे, रुपया आने लगा, अब तो काकी की खातिर बढ़ेगी।बेचारी सरलता से कहती- भैया कागज आवे रुपया आवे हम सब के लिए अच्छा है। ऐसा

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अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा | बृहस्पतिदेव की कथा (Shri Brihaspatidev Ji Vrat Katha)

॥ अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा ॥भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी।एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूँ। मेरा पति सारा धन लुटाते रहिते हैं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। साधु ने कहा: देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन, सन्तान तो सभी चाहते हैं। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ। जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो। ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक में फैलेगा। परन्तु रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली: महाराज आप मुझे कुछ न समझाएं। मैं ऐसा धन नहीं चाहती जो हर जगह बाँटती फिरूं। साधु ने उत्तर दिया यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तथास्तु! तुम ऐसा करना कि बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्‌टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, भट्‌टी चढ़ाकर कपड़े धोना, ऐसा करने से आपका सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर वह साधु महाराज वहाँ से आलोप हो गये। साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे, कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा। तब एक दिन राजा ने रानी से बोला कि हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूँ, क्योंकि यहाँ पर सभी लोग मुझे जानते हैं। इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता। ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। वहाँ वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगी। एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा: हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहिन रहती है। वह बड़ी धनवान है। तू उसके पास जा और कुछ ले आ, ताकि थोड़ी-बहुत गुजर-बसर हो जाए। दासी रानी की बहिन के पास गई। उस दिन गुरुवार था और रानी की बहिन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। दासी ने रानी की बहिन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बड़ी बहिन ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब दासी को रानी की बहिन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुःखी हुई और उसे क्रोध भी आया। दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी। सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा। उधर, रानी की बहिन ने सोचा कि मेरी बहिन की दासी आई थी, परंतु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुःखी हुई होगी। कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके वह अपनी बहिन के घर आई और कहने लगी: हे बहिन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली। कहो दासी क्यों गई थी? रानी बोली: बहिन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था। ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आई। उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहिन को विस्तार पूर्वक सुना दी। रानी की बहिन बोली: देखो बहिन! भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो। पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहिन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई। दासी रानी से कहने लगी: हे रानी! जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें। तब रानी ने अपनी बहिन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा। उसकी बहिन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें। इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं। व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहिन अपने घर को लौट गई। सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं। फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया। अब पीला भोजन कहाँ से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुःखी थे। चूंकि उन्होंने व्रत रखा था, इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे। इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया। उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी। तब दासी बोली: देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है। रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए, और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना

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Hanuman Ji Vrat Katha: मंगलवार के व्रत में पढ़ें ये व्रत कथा और इस विधि से पूजन करने से प्रसन्न होंगे बजरंगबली

Hanuman Ji Vrat Katha: हिंदू धर्म में मंगलवार का दिन भगवान हनुमान को समर्पित है. इस दिन हनुमान जी विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. Hanuman Ji Vrat Katha: हिंदू धर्म में मंगलवार का दिन भगवान हनुमान को समर्पित है. इस दिन हनुमान जी की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है. धार्मिक मान्यता है कि बजरंगबली की पूजा करने से व्यक्ति को बल, बुद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है. जिस जातक की कुंडली में सूर्य कमजोर स्थिति में होता है मंगलवार के दिन हनुमान जी के व्रत रखने से सूर्य मजबूत होता है.  मंगलवार के दिन उपवास करने से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि और मंगल का आगमन होता है. मान्यता है कि इस दिन पूजा के दौरान मंगलवार की कथा श्रवण करने और पाठ करने से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं. आइए जानते हैं मंगलवार की व्रत कथा और पूजन विधि के बारे में.  मंगलवार व्रत कथा पुराणों में दी गई कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक ब्राह्मण दम्पत्ति थे. उनकी कोई संतान नहीं थी. संतान प्राप्ति के लिए ब्राह्मणी मंगलवार के दिन व्रत किया करती थी. मंगलवार के दिन हनुमान जी को भोग लगाने के बाद ही वह कुछ खाती थी. किसी कारण वश एक मंगलवार वह हनुमान जी को भोग नहीं लगा पाई.  इससे दुखी हो ब्राह्मणी ने प्रतिज्ञा ली कि वह अगले मंगलवार से हनुमान जी को भोग लगाने के बाद ही भोजन ग्रहण करेगी. भूखे-प्यासे रहकर ब्राह्मणी ने 6 दिन जैसे-तैसे निकाल लिए, लेकिन सातवें दिन वह मूर्छित होकर गिर पड़ीं. तब हनुमान जी प्रकट हुए और ब्राह्मणी को पुत्र रत्न दिया. ब्राह्मण को इस बात की जानकारी हुई तो उसने बालक को अपना पुत्र मानने से इनकार कर दिया और उसका वध करने की ठानी ली. हालांकि, ब्राह्मण को इसमें सफलता नहीं मिल पाई. उस समय हनुमान जी ने ब्रह्मण के स्वप्न में आकर उन्हें ज्ञात कराया और कहा कि मंगल तुम्हारा पुत्र है. फिर ब्राह्मण ने हनुमान जी से क्षमा याचना की. तब से ही मंगलवार के दिन ये व्रत करने का विधान है. मान्यता है कि इस व्रत को करने से संतान की प्राप्ति होती है. साथ ही, भक्तों को सभी दुखों से छुटकारा मिलता है.  हनुमान जी की पूजा विधि मंगलवार के दिन सुबह उठकर भगवान श्रीराम को प्रणाम करें और अपने दिन की शुरुआत करें. नित्य कर्मों से निवृत होकर गंगाजल युक्त पानी से स्नान करें. अब आमचन कर लाल रंग के वस्त्र धारण करें. इसके बाद हनुमान जी की पूजा लाल रंग के पुष्प, फल, धूप, दीप, अगरबत्ती, मिष्ठान आदि चीजों के साथ करें. पूजा के दौरान हनुमान चालीसा, सुंदर कांड और मंगलवार की कथा का पाठ अवश्य करें. आखिर में आरती अर्चना करें. व्रत के दौरान उपवास रखें. शाम में आरती करने के बाद ही भोजन ग्रहण करें. व्रत में सात्विक भोजन ही ग्रहण करें.  Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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Shani Pradosh Vrat Katha : आज प्रदोष काल में पूजा के समय पढ़े ये व्रत कथा

हर माह की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat) रखा जाता है. ये व्रत महादेव को समर्पित है और उन्हें अत्यंत प्रिय है. कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय जब महादेव ने संसार को बचाने के लिए विषपान किया था, उस दिन त्रयोदशी (Trayodashi) तिथि थी. तब सभी देवताओं ने उनका आभार व्य​क्त करने के लिए प्रदोष काल में उनका पूजन किया था. इससे महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए थे और तभी से महादेव को समर्पित ये व्रत रखा जाने लगा. इस व्रत में आज भी महादेव की पूजा प्रदोष काल (Pradosh Kaal) में ही की जाती है. दिन के हिसाब से प्रदोष का महत्व भी बदल जाता है. आज 15 जनवरी को साल 2022 का पहला प्रदोष व्रत रखा जा रहा है. इस मौके पर पूजा करते समय आप आज शनि प्रदोष की ये कथा जरूर पढ़ें. शनि प्रदोष व्रत कथा (Shani Pradosh Vrat Katha) पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय में एक नगर में प्रसिद्ध व्यापारी रहता था. वो काफी संपन्न था और हमेशा दूसरों की मदद किया करता था. उसके दरवाजे पर जो भी मदद मांगने आ जाता, उसे वो खाली हाथ कभी नहीं लौटाता था. अपने परोपकारी स्वभाव की वजह से समाज में उसकी अच्छी खासी प्रतिष्ठा थी. लोग उसका काफी सम्मान करते थे. उनके घर में बस कमी थी तो संतान की, इस कारण वो व्यापारी और उसकी पत्नी काफी दुखी रहते थे. उन्होंने इसके लिए हर प्रकार के प्रयास किए, लेकिन उनको संतान प्राप्त नहीं हो सकी. एक बार दुखी मन से वो पति और पत्नी तीर्थ यात्रा के लिए निकल पड़े. नगर के बाहर पहुंचने पर उन्हें एक पेड़ के नीचे बैठे साधु दिखे. साधु ध्यान की अवस्था में थे. वे दोनों साधु के पास गए और उनके सामने हाथ जोड़कर बैठ गए. जब साधु का ध्यान खत्म हुआ तो उन्होंने दोनों को देखा और उनसे कहा कि तुम्हारा जो भी दुख है, वो मैं अच्छी तरह से जानता हूं. मुझे मालूम है कि तुम अपने कुल को आगे बढ़ाने के लिए एक संतान चाहते हो. इसके लिए तुम दोनों को महादेव की आराधना करनी चाहिए और शनि प्रदोष व्रत विधि विधान से करना चाहिए. शिव कृपा से ही तुम्हें संतान प्राप्त होगी. इसके बाद साधु ने उन्हें शनि प्रदोष की व्रत विधि भी बताई. इसके बाद व्यापारी और उसकी पत्नी ने उस साधु को प्रणाम किया और तीर्थयात्रा पर चले गए. तीर्थयात्रा से लौटकर आने के बाद उन्होंने शनि प्रदोष का व्रत साधु के बताए अनुसार विधि से किया. कुछ समय तक व्रत करने के बाद एक दिन व्यापारी की पत्नी गर्भवती हो गई और उसने पुत्र रत्न को जन्म दिया. इस प्रकार शनि प्रदोष व्रत करने से उनके जीवन का खालीपन भर गया और परिवार में खुशियां आ गईं. माना जाता है कि जो भी नि:संतान दंपति इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करता है, उसे संतान सुख जरूर मिलता है.

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क्‍या है होलाष्‍टक का अर्थ, क्‍या इस समय उग्र रहते हैं ग्रह?

होलाष्‍टक का अर्थहोलाष्टक शब्द होली और अष्टक दो शब्दों से मिलकर बना है. इसका अर्थ होता है होली से पहले के आठ दिन. इसी दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां शुरू हो जाती है.  होलाष्‍टक की अशुभता क्‍या है?ज्‍योतिष के अनुसार, होलाष्टक के दौरान सभी ग्रह उग्र स्वभाव में होते हैं. इसलिए इस दौरान जो शुभ कार्य किए जाते हैं उनका उत्‍तम फल प्राप्‍त नहीं होता. कहा जाता है कि होलाष्टक के दौरान अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र स्वभाव में होते हैं. क्‍या ना करेंइन दिनों में शुभ कार्य करने की मनाही होती है. इस समय में विवाह, गृह प्रवेश, निर्माण, नामकरण आदि शुभ कार्य वर्जित होते हैं. नए काम भी शुरू नहीं किए जाते. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इन दिनों में जो कार्य किए जाते हैं उनस कष्ट, पीड़ा आती है. विवाह आदि किए जाएं तो भविष्‍य में संबंध विच्छेद, कलह का शिकार होते हैं. होलाष्‍टक में दानशास्त्रों के अनुसार होलाष्टक में व्रत, पूजन व दान का विशेष महत्‍व है. इन दिनों में किए गए व्रत और दान से सभी कष्टों से मुक्ति मिलती है. ईश्वर आशीर्वाद देते हैं. इसलिए इन दिनों में वस्त्र, अनाज आदि दान करने चाहिए. किन कारण से होलाष्टक लगते हैं… दरअसल, जब राजा हिरणकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद और उसकी भगवान विष्णु के प्रति भक्ति भाव देखकर क्रोधित हो उठे तो होली के आठ दिन पहले से उसकी भक्ति छुड़वाने के लिए यातनाएं देने लगे। विष्णु भगवान की कृपा से प्रह्लाद ने हर तरह के कष्ट और परेशानियों को झेल लीं और अपनी भक्ति को जारी रखा। इसके बाद हिरणकश्यप ने अपनी बहन होलिका की मदद ली, जिसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। इसके बाद भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गए और होलिका का अग्नि में जलने से अंत हो गया। इन आठ दिनों में प्रह्लाद के साथ जो कुछ हुआ, उसकी वजह से ही होलाष्टक लगते हैं। होलाष्टक पर न करें शुभ कार्य हिंदुओं में सोलह संस्कार जन्म से लेकर मृत्यु तक किए जाते हैं। इनमें गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, विद्यारंभ भूत संस्कार, कर्णवेध, यज्ञोपवीत, वेदारंभ, केशांत, समावर्तन, विवाह, अन्त्येष्टि हैं। होलाष्टक में सोलह संस्कार समेत कोई भी शुभ कार्य करना वर्जित होता है। इन दिनों में भगवान की भक्ति और पूजा-अर्चना करनी चाहिए जो उत्तम माना गया है। होलाष्टक के दौरान दान-पुण्य करने का अक्षय फल प्राप्त होता है।

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