September 28, 2022

नौवें दिन होती है मां सिद्धिदात्री की पूजा

साथ ही मां सिद्धिदात्री की कृपा से महादेव का आधा शरीर देवी की हो गई थी और वह अर्धनारीश्वर कहलाए। नवरात्र के नौवें दिन इनकी पूजा के बाद ही नवरात्र का समापन माना जाता है। नवें दिन सिद्धिदात्री की पूजा करने के लिए नवाहन का प्रसाद और नवरस युक्त भोजन और नौ प्रकार के फल फूल आदि का अर्पण करके नवरात्र का समापन करना चाहिए। मां दुर्गा के नौवें स्वरूप को सिद्धिदात्री के नाम से जाना जाता है, जिनकी चार भुजाएं हैं। इनका आसन कमल और वाहन सिंह है। दाहिने और नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा, बाई ओर से नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प है। भगवती के इस स्वरूप की ही हम नवरात्र के अंतिम दिन आराधना करते हैं। मां दुर्गा के इस रूप को शतावरी और नारायणी भी कहा जाता है। शतावरी और नारायणी दुर्गा के सभी प्रकारों की सिद्धियों को देने वाली मां की पूजा का आरंभ निम्न श्लोक से करना चाहिए देवी सर्वभू‍तेषु माँ सिद्धिदात्री रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:। अर्थात हे मां! सर्वत्र विराजमान और मां सिद्धिदात्री के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूं। हे मां, मुझे अपनी कृपा का पात्र बनाओ। मां सिद्धिदात्री अंतिम ये सभी प्रकार की सिद्धियों को देने वाली हैं। नवदुर्गाओं में मां सिद्धिदात्री अंतिम हैं। नवरात्र-पूजन के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। इस दिन शास्त्रीय विधि-विधान और पूर्ण निष्ठा के साथ साधना करने वाले साधक को सभी सिद्धियों की प्राप्ति हो जाती है। सृष्टि में कुछ भी उसके लिए मुश्किल नहीं रह जाता है। ब्रह्मांड पर पूर्ण विजय प्राप्त करने की सामर्थ्य उसमें आ जाती है।

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आठवें दिन होती है मां महागौरी की पूजा, जानें पूजा विधि, मंत्र और कथा

महागौरी की कथामाता की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको गंगा में स्नान करने के लिए कहा। जिस समय माता पार्वती गंगा में स्नान करने गईं, तब देवी का एक स्वरूप श्याम वर्ण के साथ प्रकट हुईं, जो कौशिकी कहलाईं और एक स्वरूप उज्जवल चंद्र के समान प्रकट हुआ, जो महागौरी कहलाईं नवरात्रि के हर दिन माता के अलग रूप की पूजा की जाती है. आठवें दिन मां महागौरी का पूजन होता है. यहां जानिए मां महागौरी का आशीर्वाद पाने के लिए उनके पूजन की विधि, मंत्र और कथा. का आठवां दिन मां महागौरी को समर्पित होता है. महागौरी के तेज से ही सम्पूर्ण विश्व प्रकाशमान होता है. माता महागौरी के पूजन से सौभाग्य की प्राप्ति होती है और समस्त पापों का नाश होता है. कहा जाता है कि जब माता पार्वती ने महादेव को प्राप्त करने के लिए तपस्या किया, तो उनका रंग काफी काला हो गया था. महादेव ने जब उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया तो उनके रंग को फिर से गौर बना दिया. तब से माता को महागौरी भी कहा जाने लगा. माता महागौरी वृषभ की सवारी करती हैं, उनके चार हाथ हैं. उनके एक हाथ में त्रिशूल है, एक हाथ वरमुद्रा में है, एक हाथ अभय मुद्रा में है और एक हाथ में डमरू है. माता गौरी अपने भक्तों को बल, बुद्धि देने के साथ-साथ नकारात्मकता दूर करती है. जानिए मां महागौरी की पूजा विधि, मंत्र और कथा. महागौरी की पूजा विधि सुबह जल्दी स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें. इसके बाद कलश पूजन और गणपति समेत सभी देवी देवताओं का पूजन करने के बाद मां महागौरी की पूजा करें. माता को पंचामृत से स्नान कराएं. उन्हें गुड़हल का फूल चढ़ाएं. रोली, कुमकुम, अक्षत, सिंदूर, पान, सुपारी, धूप, दीप, पान, सुपारी, लौंग का जोड़ा, इलायची, बताशा आदि अर्पित करें. माता का शृंगार करके सफेद मिठाई का भोग लगाएं. इसके बाद माता के मंत्रों का जाप करें, दुर्गा सप्तशती का पाठ करें और कथा पढ़ें. इसके बाद आरती करके क्षमा याचना करें. इन मंत्रों का जाप करें 1. या देवी सर्वभूतेषु महागौरी रूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: 2. श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बराधरा शुचि:, महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा. 3. ॐ देवी महागौर्यै नम: मां महागौरी की कथा पौराणिक कथा के मुताबिक पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के बाद मां पार्वती ने महादेव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था. इस दौरान माता हजारों वर्षों तक निराहार रहीं. तप के प्रभाव से माता का शरीर काला पड़ गया. जब महादेव उनकी तपस्या से प्रसन्न हुए तो उन्होंने मां पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया और माता के शरीर को गंगा के पवित्र जल से कांतिमय बना दिया. इसके बाद माता का रंग एकदम साफ हो गया. तब से माता को महागौरी के रूप में भी जाना जाने लगा. (यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं, इसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है. इसे सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है.)

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सातवें दिन होती है माता कालरात्रि की पूजा, पढ़ें विधि और व्रत कथा

इसे सुनेंभगवान शिव ने माता से अनुरोध किया। इसके बाद मां पार्वती ने स्वंय शक्ति व तेज से मां कालरात्रि को उत्पन्न किया। इसके बाद जब मां दुर्गा ने दैत्य रक्तबीज का अंत किया और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को मां कालरात्रि ने जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया। इस रूप में मां पार्वती कालरात्रि कहलाई। मां कालरात्रि की पूजा अर्चना करने से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. नवरात्र का सातवां दिन हैं. इस दिन शक्ति के रूप मां दुर्गा के सातवें स्वरूप माता कालरात्रि की पूजा की जाती है. मां कालरात्रि को काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, चंडी आदि नामों से भी जाना जाता है. मान्यता है कि मां कालरात्रि की पूजा अर्चना करने से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है. साथ ही जीवन में आने वाली सभी बाधाएं भी दूर हो जाती हैं. ऐसे करें देवी की पूजा इस दिन भी सुबह जल्दी उठकर स्नान कर साफ कपड़े धारण करें. सबसे पहले गणपति बप्पा की अराधना करें.  फिर माता कालरात्रि की पूजा में अक्षत, धूप, रातरानी के पुष्प, गंध, रोली, चंदन का इस्तेमाल करते हुए उनका पूजन करें. मां को पान, सुपारी भेंट करें. घी या कपूर जलाकर मां कालरात्रि की आरती करें और कथा सुनें. देवी कालरात्रि को गुड़ का भोग लगाएं देवी कालरात्रि का मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः या देवी सर्वभू‍तेषु मां कालरात्रि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।। मां की कथादेवी भागवत पुराण (Bhagwat puran) के अनुसार, मां कालरात्रि का शरीर अंधकार की तरह काला है, सिर के बाल बिखरे हुए हैं, गले में बिजली की तरह चमकने वाली एक माला है. मां के तीन नेत्र हैं जो ब्रह्मांड की तरह बिल्कुल गोल और विशाल हैं. मां की चार भुजाएं हैं जिसमें एक हाथ में उन्होंने तलवार, दूसरे में लौह अस्त्र, तीसरा हाथ अभय मुद्रा में और चौथा वरमुद्रा में है. मां कालरात्रि का वाहन गर्दभ है. ऐसी मान्यता है कि मां अपने इस स्वरूप में भक्तों को अकाल मृत्यु से बचाती हैं.  पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, दुर्गासुर नामक राक्षस कैलाश पर्वत पर देवी पार्वती की अनुपस्थिति में हमला करने की कोशिश कर रहा था. उससे निपटने के लिए देवी पार्वती ने कालरात्रि को भेजा लेकिन वह राक्षस लगातार विशालकाय होता जा रहा था. तब देवी ने अपने आप को और भी अधिक शक्तिशाली बनाया और शस्त्रों से सुसज्जित हुईं. उसके बाद उन्होंने दुर्गासुर को मार गिराया. इसी कारण उन्हें दुर्गा कहा गया. मां कालरात्रि की आरती काल के मुंह से बचाने वाली दुष्ट संहारिणी नाम तुम्हारा महा चंडी तेरा अवतारा पृथ्वी और आकाश पर सारा महाकाली है तेरा पसारा खंडा खप्पर रखने वाली दुष्टों का लहू चखने वाली कलकत्ता स्थान तुम्हारा सब जगह देखूं तेरा नजारा सभी देवता सब नर नारी गावे स्तुति सभी तुम्हारी रक्तदंता और अन्नपूर्णा कृपा करे तो कोई भी दुःख ना ना कोई चिंता रहे ना बीमारी ना कोई गम ना संकट भारी उस पर कभी कष्ट ना आवे महाकाली मां जिसे बचावे तू भी ‘भक्त’ प्रेम से कह कालरात्रि मां तेरी जय

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नवरात्रि के छठे दिन होती है मां कात्यायनी की पूजा, जानें देवी मां की आरती, मंत्र, भोग व कथा

नवरात्रि के छठे दिन मां कात्यायनी की पूजा करने का विधान है. कात्यायनी देवी दुर्गा जी का छठा अवतार हैं. शास्त्रों के अनुसार देवी ने कात्यायन ऋषि के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया, इस कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ गया. दिव्य रुपा कात्यायनी देवी का शरीर सोने के समाना चमकीला है. मां दुर्गा का छठवां रूप मां कात्यायनी है जो ज्वलंत स्वरूप को प्रदर्शित करती हैं। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर मां कात्यायनी की पूजा विधि अनुसार की जाती है। कहा जाता है कि मां कात्यायनी की पूजा करने से शक्ति प्राप्त होती है। इतना ही नहीं मां कात्यायनी अपने भक्तों को सुख और समृद्धि का भी वरदान देती हैं। मां कात्यायनी की तेजोमय छवि की पूजा आराधना करने से सफलता और प्रसिद्धि भी मिलती है। जानकारों के मुताबिक, मां कात्यायनी का मंत्र अत्यंत प्रभावशाली और शक्तिशाली होता है। विधि अनुसार मां कात्यायनी की पूजा करने से वह प्रसन्न होती हैं। मां कात्यायनी की पूजा में लाल गुलाब अवश्य अर्पित करना चाहिए। अगर लाल गुलाब संभव ना हो तो भक्त कोई भी लाल फूल अर्पित कर सकते हैं।  अगर आप भी मां कात्यायनी की पूजा कर रहे हैं तो यहां जाने उनकी आरती, मंत्र, कथा और भोग। मां कात्यायनी आरती,  मां कात्यायनी की आरती जय जय अंबे, जय कात्यायनी।  जय जगमाता, जग की महारानी। बैजनाथ स्थान तुम्हारा। वहां वरदाती नाम पुकारा।  कई नाम हैं, कई धाम हैं। यह स्थान भी तो सुखधाम है। हर मंदिर में जोत तुम्हारी। कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी। हर जगह उत्सव होते रहते। हर मंदिर में भक्त हैं कहते। कात्यायनी रक्षक काया की। ग्रंथि काटे मोह माया की। झूठे मोह से छुड़ाने वाली। अपना नाम जपाने वाली। बृहस्पतिवार को पूजा करियो। ध्यान कात्यायनी का धरियो। हर संकट को दूर करेगी। भंडारे भरपूर करेगी। जो भी मां को भक्त पुकारे। कात्यायनी सब कष्ट निवारे। मां कात्यायनी बीज मंत्र:क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नमः मां कात्यायनी के मंत्र:1. ॐ देवी कात्यायन्यै नमः।। 2. एत्तते वदनम साओमय्म लोचन त्रय भूषितम।पातु न: सर्वभितिभ्य, कात्यायनी नमोस्तुते।। मां कात्यायनी की कथा बहुत समय पहले महर्षि कात्यायन मां दुर्गा की तपस्या करते थे। उनकी तपस्या और श्रद्धा देखकर मां दुर्गा ने उन्हें यह वरदान दिया था कि वह उनकी पुत्री के रूप में उनके घर में जन्म लेंगी। मां दुर्गा ने जो वरदान दिया था वह पूरा हुआ और महर्षि कात्यायन के आश्रम में मां दुर्गा का जन्म हुआ। त्रिदेवों के तेज से देवी दुर्गा की उत्पत्ति हुई थी। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर मां दुर्गा ने ऋषि कात्यायन के घर में जन्म लिया था। जब देवी दुर्गा का जन्म हुआ था तब ऋषि ने मां दुर्गा की तीन दिनों तक पूजा की थी। इसी बीच महिषासुर राक्षस लोगों को अत्यधिक परेशान कर रहा था जिसका संहार मां कात्यायनी ने किया था।  मां कात्यायनी का भोग: मां कात्यायनी को लाल रंग बेहद प्रिय है और उन्हें प्रसन्न करने के लिए लाल गुलाब अवश्य चढ़ाना चाहिए। इसके साथ भोग लगाने के लिए मां कात्यायनी को शहद अर्पित करना चाहिए।

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पांचवें दिन होती है स्कंदमाता की पूजा, जानिए कथा, आरती, मंत्र और सभी संबंधित जानकारी

नवरात्रि में पांचवें दिन इस देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। कहते हैं कि इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम से अभिहित किया गया है। इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा होती की जाती है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है। भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजमान है। इन माता की चार भुजाएं हैं। माता ने अपने दो हाथ में कमल का फूल पकड़ा हुआ है। इनकी एक भुजा ऊपर की तरफ उठी हुई है। एक हाथ से अपने पुत्र स्कंद को पकड़ा हुआ है। सिंह इनका वाहन है। जानिए मां अम्बे के इस स्वरूप की कैसे करें पूजा, ये हैं मंत्र, आरती और कथा… स्कंदमाता की आरती जय तेरी हो अस्कंध मातापांचवा नाम तुम्हारा आतासब के मन की जानन हारीजग जननी सब की महतारीतेरी ज्योत जलाता रहू मैहरदम तुम्हे ध्याता रहू मैकई नामो से तुझे पुकारामुझे एक है तेरा सहाराकही पहाड़ो पर है डेराकई शेहरो मै तेरा बसेराहर मंदिर मै तेरे नजारेगुण गाये तेरे भगत प्यारेभगति अपनी मुझे दिला दोशक्ति मेरी बिगड़ी बना दोइन्दर आदी देवता मिल सारेकरे पुकार तुम्हारे द्वारेदुष्ट दत्य जब चढ़ कर आयेतुम ही खंडा हाथ उठायेदासो को सदा बचाने आई‘चमन’ की आस पुजाने आई स्कंदमाता की कथा पहाड़ों पर रहकर सांसारिक जीवों में नवचेतना का निर्माण करने वालीं स्कंदमाता। नवरात्रि में पांचवें दिन इस देवी की पूजा-अर्चना की जाती है। कहते हैं कि इनकी कृपा से मूढ़ भी ज्ञानी हो जाता है। स्कंद कुमार कार्तिकेय की माता के कारण इन्हें स्कंदमाता नाम से अभिहित किया गया है। इनके विग्रह में भगवान स्कंद बालरूप में इनकी गोद में विराजित हैं। इस देवी की चार भुजाएं हैं। ये दाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा से स्कंद को गोद में पकड़े हुए हैं। नीचे वाली भुजा में कमल का पुष्प है। बाईं तरफ ऊपर वाली भुजा में वरदमुद्रा में हैं और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है। इनका वर्ण एकदम शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। इसीलिए इन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। सिंह इनका वाहन है। यह देवी विद्वानों और सेवकों को पैदा करने वाली शक्ति है। यानी चेतना का निर्माण करने वालीं। कहते हैं कालिदास द्वारा रचित रघुवंशम महाकाव्य और मेघदूत रचनाएं स्कंदमाता की कृपा से ही संभव हुईं। स्कंदमाता की पूजा से मिलता है ये वरदान जिन लोगों को संतान प्राप्ति में बाधा आ रही हो, उन्हें मां के इस स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। आदिशक्ति का यह स्वरूप संतान प्राप्ति की कामना पूर्ण करनेवाला माना गया है। स्कंदमाता की पूजा में कुमार कार्तिकेय का होना जरूरी होता है। स्कंदमाता को इन चीजों का लगाएं भोग… स्‍कंदमाता को भोग स्‍वरूप केला अर्पित करना चाहिए। मां को पीली वस्‍तुएं अति प्रिय होती हैं, इसलिए केसर डालकर खीर बनाएं और उसका भी भोग लगा सकते हैं। जो भक्त देवी स्कंद माता का भक्ति-भाव से पूजन करते हैं उसे देवी की कृपा प्राप्त होती है। देवी की कृपा से भक्त की मुराद पूरी होती है और घर में सुख, शांति एवं समृद्धि रहती है। मां के इस स्वरूप का ध्यान मंत्र यह है… सिंहासना गता नित्यं पद्माश्रि तकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।। या देवी सर्वभू‍तेषु मां स्कंदमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। मां को प्रसन्न करने के लिए क्या करें? स्कंदमाता की पूजा में धनुष बाण अर्पित करने का विशेष महत्व है। इन्हें सुहाग का सामान अर्पित करना चाहिए। नवरात्र के पांचवें दिन लाल वस्‍त्र में सुहाग की सभी सामग्री लाल फूल और अक्षत के समेत मां को अर्पित करने से महिलाओं को सौभाग्‍य और संतान की प्राप्ति होती है।  स्कंदमाता से मिलता है ज्ञान का आशीर्वाद… मां की कृपा से बुद्धि का विकास होता है और ज्ञान का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मां की कृपा से पारिवारिक शांति की प्राप्ति होती है। मां की आराधना से शुभता की प्राप्ति होती है।    कैसे करें स्कंदमाता की पूजा –  नवरात्रि के पांचवें दिन सबसे पहले स्‍नान करें और स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें।– पूजा स्‍थान में चौकी पर स्‍कंदमाता की तस्‍वीर या प्रतिमा स्‍थापित करें।– प्रतिमा का गंगाजल से शुद्धिकरण करें।– अब एक कलश में पानी लेकर उसमें कुछ सिक्‍के डालें और उसे चौकी पर रखें।– इसके बाद स्‍कंदमाता को रोली-कुमकुम लगाएं और नैवेद्य अर्पित करें।– अब मां की आरती उतारें।– आरती के बाद घर के सभी लोगों को प्रसाद बांटें।– इस दिन आप श्‍वेत कपड़े पहनकर मां को केले का भोग लगाएं। मान्‍यता है क‍ि ऐसा करने से मां निरोगी रहने का आशीर्वाद देती हैं।    स्‍कंद माता का रूप… स्‍कंदमाता की चार भुजाएं हैं। दाईं तरफ की ऊपर वाली भुजा से उन्‍होंने अपने पुत्र स्कंद को गोद में पकड़ा हुआ है। नीचे वाली भुजा में कमल का फूल है। बाईं तरफ ऊपर वाली भुजा वरदमुद्रा में है और नीचे वाली भुजा में कमल पुष्प है। इनका वर्ण एकदम गौर है। ये कमल के आसन पर विराजमान हैं और इनकी सवारी शेर है।    स्कंदमाता का कवच… ऐं बीजालिंका देवी पदयुग्मघरापरा।हृदयं पातु सा देवी कार्तिकेययुता॥श्री हीं हुं देवी पर्वस्या पातु सर्वदा।सर्वांग में सदा पातु स्कन्धमाता पुत्रप्रदा॥वाणंवपणमृते हुं फ्ट बीज समन्विता।उत्तरस्या तथाग्नेव वारुणे नैॠतेअवतु॥इन्द्राणां भैरवी चैवासितांगी च संहारिणी।सर्वदा पातु मां देवी चान्यान्यासु हि दिक्षु वै॥   स्कंदमाता का इन मंत्रों से करें ध्यान… वन्दे वांछित कामार्थे चन्द्रार्धकृतशेखराम्।सिंहरूढ़ा चतुर्भुजा स्कन्दमाता यशस्वनीम्।।धवलवर्णा विशुध्द चक्रस्थितों पंचम दुर्गा त्रिनेत्रम्।अभय पद्म युग्म करां दक्षिण उरू पुत्रधराम् भजेम्॥पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानांलकार भूषिताम्।मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल धारिणीम्॥प्रफुल्ल वंदना पल्ल्वांधरा कांत कपोला पीन पयोधराम्।कमनीया लावण्या चारू त्रिवली नितम्बनीम्॥  स्कंदमाता पूजा विधि (Skandamata Puja Vidhi) : नवरात्रि के पांचवें दिन की पूजा में श्वेत रंग का प्रयोग करें। इस दिन पूजा करने से बुध ग्रह से संबंधित दोष दूर होते हैं। इस दिन माता को केले का भोग लगाना चाहिए। स्कंदमाता की पूजा का श्रेष्ठ समय दिन का दूसरा पहर माना जाता है। इनकी पूजा में चंपा के फूलों का इस्तेमाल करना चाहिए। इन्हें हरे रंग की चूड़ियां चढ़ानी चाहिए। इनकी उपासना से बुद्धि प्राप्त होती है। नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता (skandamata) की पूजा होती है मां स्कंदमाता के मंत्र – सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।–

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