September 27, 2022

देवी चंद्रघंटा की साधना से मिलता है यह लाभ, जगाएं अपने अंदर माता की शक्तियों को

माता का तीसरा स्वरूपनवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन मां चंद्रघंटा को दूध का भोग चढ़ाएं और उसे जरूरतमंद को दान कर देना चाहिए। ऐसा करने से धन-वैभव और ऐशवर्य की प्राप्ति होती है। नवरात्रि की तृतीय देवी चन्द्रघंटा मणिपुर चक्र पर विराज कर मानव सृष्टि से भय का उन्मूलन कर साहस और ऊर्जा का संचार करती है। यह शक्ति तृतीय चक्र पर विराज कर ब्रह्माण्ड से दसों प्राणों को संतुलित करती है और महाआकर्षण प्रदान करती है। मानव शरीर में चन्द्रघण्टा के जागृत न होने से कैंसर, मधुमेह, उच्चरक्तचाप और ख़राब पाचन की समस्या का जन्म होता है। माता चंद्रघंटा को अपने अंदर जागृत करने के लिए इस ध्यान मंत्र का नियमित जप करना चाहिए। पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥ हमारे मणिपुर चक्र अर्थात् नाभि चक्र पर विराजने वाली वाली ऊर्जा चंद्रघंटा जीवन के ढेरों सुगंधों और ब्रम्हाण्डिय ध्वनियों के संग अपने हाथों में धारण किए हुए कमल के रूप में कीचड़ में भी पवित्रता व स्निग्धता तथा अनेक लक्ष्य के साथ भी एकजुटता की द्योतक हैं। यह भय से मुक्त करके अभय प्रदान करती है। नवरात्रि के तीसरे दिन पूजित चंद्रघण्टा के ललाट पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र स्थापित है इसलिए इस शक्ति को चंद्रघंटा के नाम से जाना जाता है। मणिपुर चक्र देह में चक्र व्यवस्था का तृतीय चक्र है। जो नाभि के पीछे केंद्रित है। यह देह का आग्नेय केंद्र या मार्तण्ड केंद्र भी कहलाता है क्योंकि इसका आधार तत्व रोहिताश्व अर्थात् अग्नि है। देह में चंद्रघण्टा के प्रतिपादन कर मणिपुर चक्र के बोध से स्वाधिष्ठान चक्र की निषेधात्मक प्रवृत्तियां उड़न छू हो जाती हैं। चंद्रघण्टा के स्पंदन से मनुष्य में स्पष्ट और उचित निर्णय की क्षमता पूर्ण चमक व धमक के साथ प्रकट होती है और व्यक्ति में बौद्धिक क्षमता का विकास, स्वयं पर विश्वास व ज्ञान के प्रकाश का संचार होता है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति में उत्तम गुणों के साथ अंतर्मन में आनंद का अप्रतिम संचार होने लगता है और मानव किसी महामानव सा अपना ही नहीं सबका बेड़ा पार करने की क्षमता से ओत-प्रोत हो जाता है। यह चक्र स्फूर्ति का केन्द्र है। चंद्रघण्टा के अंतर्मन में जागृत होते ही जीवन से भय का नाश होने लगता है।अगर देह में चंद्रघंटा जागृत न हों तो अग्नाशय और पाचक तंत्र की प्रक्रिया प्रभावित होती है और पाचन बिगड़ जाता है, परिसंचारी रोग, मधुमेह और रक्तचाप में असंतुलन जैसे कई विकार तकलीफ देने लगते हैं। नाभि चक्र के बाधित होने से ही व्यक्ति को भय और अवसाद का अनुभव होता है। भयभीत होने पर नाभि के आसपास हलचल और गुड़गुड़ को आप स्पष्ट रूप से महसूस कर सकते हैं। नाभि चक्र का प्रतीक रंग पीला प्रतिनिधि मेष यानी मेढ़ा और प्रतीक चिह्न शीर्ष बिंदु वाला त्रिभुज है। दस पंखुडिय़ों वाला यह चक्र दस प्राणों को यथा प्राण, व्यान, अपान, समान, उदान, कूर्म, क्रीकल, शेषनाग, देवदत्त व धनंजय को प्रतिबिम्बित करती है। इसका मंत्र है रं। चंद्रघण्टा के जागृत होने से व्यक्ति अनिद्रा और चिंता से निर्मुक्त होकर आनंद, ज्ञान, बौद्धिकता, साफ़गोई और अपने सटीक फ़ैसले से जग जीत लेता है।

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नवरात्र का चौथा दिनः इसलिए कुम्हड़े की बलि से प्रसन्न होती है मां कूष्मांडा

आज शारदीय नवरात्र का चौथा दिन है। इस दिन दुर्गा के नौ रुपों में से चतुर्थ रुप देवी कूष्मांडा की पूजा होती है। देवी कुष्मांडा को देवी भागवत् पुराण में आदिशक्ति के रुप में बताया गया है। इनका निवास सूर्य मंडल के भीतर के लोक में है। यहां निवास करने की शक्ति और क्षमता सिर्फ देवी कूष्मांडा में ही है।इनके अंगों की कांति सूर्य के समान ही उज्जवल है। देवी कूष्मांडा के प्रकाश से दसों दिशाएं प्रकाशित हो रही हैं। माता की आठ भुजाएं हैं इसलिए यह अष्टभुजा देवी भी कहलाती हैं। माता अपने हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत से भरा कलश, गदा, चक्र और जपमाला धारण करती हैं। मां कुष्मांडा का वाहन सिंह है। सृष्टि निर्माण के समय माता कूष्मांडा अपनी मंद हंसी से ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करती हैं इसिलए इनका नाम कूष्मांडा है। संस्कृत भाषा में कूष्माण्डा को कुम्हड़ भी कहते हैं। जो भक्त माता को कुम्हड़े की बलि प्रदान करते हैं माता उससे प्रसन्न होती है। देवीभाग्वत् पुराण में क्या कहा गया है देवी कूष्मांडा के बारे में देवी पुराण में बताया गया है कि सृष्टि के आरंभ से पहले अंधकार का साम्राज्य था। उस समय आदि शक्ति जगदम्बा देवी कूष्मांडा के रुप में वनस्पतियों एवं सृष्टि की रचना के लिए जरूरी चीजों को संभालकर सूर्य मण्डल के बीच में विराजमान थी। सृष्टि रचना का जब समय आया तब इन्होंने ही ब्रह्मा विष्णु एवं भगवान शिव की रचना की।इसके बाद सत्, रज और तम गुणों से तीन देवियों को उत्पन्न किया जो सरस्वती, लक्ष्मी और काली रूप में प्रकट हुई। सृष्टि चलाने में सहायता प्रदान करने के लिए आदि शक्ति ने ब्रह्मा जी को सरस्वती, विष्णु को लक्ष्मी एवं शिव को देवी काली सौंप दिया। आदि शक्ति की कृपा से ही ब्रह्मा जी सृष्टि के रचयिता बने, विष्णु पालनकर्ता और शिव संहारकर्ता। नवरात्र में देवी कूष्मांडा की पूजा का रहस्य पुराणों में मौजूद कथा के अनुसार तारकासुर के आतंक से जगत को मुक्ति दिलाने के लिए यह जरुरी था कि भगवान शिव के पुत्र का जन्म हो। इसलिए भगवान शिव ने देवी पार्वती से विवाह किया।देवी पार्वती से जब देवों ने तारकासुर से मुक्ति के लिए प्रार्थना की तब माता ने अपने आदिशक्ति रुप को प्रकट किया और यह बताया कि जल्दी ही कुमार कार्तिकेय का जन्म होगा और वह तारकासुर का वध करेगा।मां का आदिशक्ति रुप देखकर देवताओं की शंका और चिंताओं का निदान हुआ। मां इस रुप में भक्तों को यह बताती है कि जो भी भक्त मां कूष्मांडा का ध्यान पूजन करता है उसकी सारी समस्याएं और कष्ट दूर हो जाते हैं। इसलिए नवरात्र के चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होती है। कुष्मांडा माता को देवी दुर्गा का चौथा स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुष्मांडा माता का यह रूप देवी पार्वती के विवाह से लेकर कार्तिकेय की प्राप्ति के बीच का है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, कुष्मांडा माता ने अपने अंदर से ब्राह्मण की रचना की, जिसकी वजह से माता के इस स्वरूप का नाम कुष्मांडा पड़ा। नवरात्रि के चौथे दिन पूजा कैसे करें   नवरात्रि के चौथे दिन सुबह जल्दी उठकर कुष्मांडा माता की पूजा करें। माता की पूजा करने के लिए सबसे पहले हाथ में फूल ले और माता के मंत्र का जाप करें। पूजा में मां को लाल रंग का पुष्प, गुड़हल या गुलाब, सिंदूर, धूप, गंध, भोग चढ़ाए। सफेद कुम्हड़े( पेठे का फल) की बलि माता को अर्पित करें, इसके बाद माता को मालपुए, दही और हलवे का भोग लगाएं।  सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।। ध्यान वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम् ।। भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम् ।। पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम् ।। प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्। कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम् ।। कूष्मांडा देवी का ध्यान मंत्र वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्। सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥ भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्। कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥ पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्। मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥ प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्। कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

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द्वितीय नवरात्रि : माँ ब्रह्मचारिणी की पूजन विधि और पौराणिक कथा ?

नवरात्रि के द्वितीय दिवस माँ के ब्रह्मचारिणी स्वरुप की अर्चना की जाती है। माँ बह्मचारिणी माँ दुर्गा का अत्यंत शांत एवं तपस्वी स्वरुप है, माता के इस स्वरुप की आराधना से भक्तों का जीवन सफल हो जाता है। ब्रह्मचारिणी दो शब्दों का मिलान है- ‘ब्रह्म’ और ‘चारिणी’, ब्रह्म का अर्थ है तपस्या तथा चारिणी अर्थात आचरण करने वाली। माता भगवती के तपस्वी आचरण के कारण उन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया है, देवी का यह स्वरुप पूर्ण ज्योतिर्मय एवं भव्य है।  हिन्दू मान्यताओं के अनुसार देवी त्याग और तपस्या का प्रतिरूप हैं, उन्हें वेद-शास्त्र आदि की ज्ञाता भी माना जाता है। माता ब्रह्मचारिणी के वस्त्र धवल हैं तथा उनके दाएं हाथ में अष्टदल कमल एवं बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित है। उनका यह दिव्य स्वरुप भक्तों एवं सिद्धों को अमोघ फल देता है, उनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार एवं संयम की वृद्धि होती है। माँ ब्रह्मचारिणी की कृपा प्राप्त होने से मनुष्य को जीवन में विजय प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की कथा :- देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें ब्रह्मचारिणी नाम से जाना गया। एक हजार वर्ष इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को भी छोड़ने के कारण ही इनका नाम अपर्णा पड़ गया।कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की, यह आप से ही संभव थी। आपकी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ, जल्द ही आपके पिता आपको लेने आ रहे हैं।मां की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी व्रत कथानारदजी की सलाह पर उन्होंने कठोर तप किया, ताकि वे भगवान शिव को पति स्वरूप में प्राप्त कर सकें। कठोर तप के कारण उनका ब्रह्मचारिणी या तपश्चारिणी नाम पड़ा। भगवान शिव की आराधना के दौरान उन्होंने 1000 वर्ष तक केवल फल-फूल खाए तथा 100 वर्ष तक शाक खाकर जीवित रहीं। कठोर तप से उनका शरीर क्षीण हो गया। ‘स्वाधिष्ठान चक्र’ पर ज्योति का ध्यान करें या उसी चक्र पर अर्ध चन्द्र का ध्यान करें। – मां ब्रह्मचारिणी के लिए “ऊं ऐं नमः” का जाप करें और फलाहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए। भक्तों को मां ब्रह्मचारिणी को खुश करने के लिए इस मंत्र का जाप करना चाहिए। या देवी सर्वभू‍तेषु माँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। अर्थ: हे मां! सर्वत्र विराजमान और ब्रह्मचारिणी के रूप में प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बारम्बार प्रणाम है। स्तोत्र पाठ :- तपश्चारिणीत्वंहितापत्रयनिवारिणीम्।ब्रह्मरूपधराब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्घ्नवचक्त्रभेदनी त्वंहिनवऐश्वर्यप्रदायनीम्।धनदासुखदा ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्घ्शंकरप्रियात्वंहिभुक्ति-मुक्ति दायिनी।शान्तिदामानदा,ब्रह्मचारिणी प्रणमाम्यहम्। कवचत्रिपुरा में हृदयेपातुललाटेपातुशंकरभामिनी।अर्पणासदापातुनेत्रोअर्धरोचकपोलोघ्पंचदशीकण्ठेपातुमध्यदेशेपातुमहेश्वरीघ्षोडशीसदापातुनाभोगृहोचपादयो।

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नवरात्रि के दूसरे दिन पढ़े मां ब्रह्मचारिणी की पौराणिक कथा

आज शारदीय नवरात्रि के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा का दिन होता है। बता दें कि ब्रह्म का अर्थ तपस्या से है। मां का ये रूप अपने भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनकी उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। शास्त्रों में ब्रह्मचारिणी का अर्थ तप की चारिणी यानि तप का आचरण करने वाली बताया गया है। देवी का यह रूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य है। इस देवी के दाएं हाथ में जप की माला है और बाएं हाथ में यह कमण्डल धारण किए हैं। चलिए जानते हैं इनका कथा के बारे में- मान्यता है कि पूर्वजन्म में इस देवी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया।  कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए। कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया।  कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है।

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