September 26, 2022

तपस्या का फल

तपस्या का फल भगवान शंकर को पति के रूप में पाने हेतु माता-पार्वती कठोर तपस्या कर रही थी। उनकी तपस्या पूर्णता की ओर थी। एक समय वह भगवान के चिंतन में ध्यान मग्न बैठी थी। उसी समय उन्हें एक बालक के डुबने की चीख सुनाई दी। माता तुरंत उठकर वहां पहुंची। उन्होंने देखा एक मगरमच्छ बालक को पानी के भीतर खींच रहा है। बालक अपनी जान बचाने के लिए प्रयास कर रहा है, तथा मगरमच्छ उसे आहार बनाने का। करुणामयी मां को बालक पर दया आ गई। उन्होंने मगरमच्छ से निवेदन किया कि बालक को छोड़ दीजिए इसे आहार न बनाएं। मगरमच्छ बोला माता यह मेरा आहार है मुझे हर छठे दिन उदर पूर्ति हेतु जो पहले मिलता है, उसे मेरा आहार ब्रह्मा ने निश्चित किया है। माता ने फिर कहा आप इसे छोड़ दे इसके बदले मैं अपनी तपस्या का फल दुंगी। ग्राह ने कहा ठीक है। माता ने उसी समय संकल्प कर अपनी पूरी तपस्या का पुण्य फल उस ग्राह को दे दिया। ग्राह तपस्या के फल को प्राप्त कर सूर्य की भांति चमक उठा। उसकी बुद्धि भी शुद्ध हो गई। उसने कहां माता आप अपना पुण्य वापस ले लें। मैं इस बालक को यू हीं छोड़ दुंगा। माता ने मना कर दिया तथा बालक को गोद में लेकर ममतामयी माता दुलारने लगी। बालक को सुरक्षित लौटाकर, माता ने अपने स्थान पर वापस आकर तप शुरु कर दिया। भगवान शिव तुरंत ही वहां प्रकट हो गए, और बोले पार्वती अब तुम्हें तप करने की आवश्यकता नहीं है। हर प्राणी में मेरा ही वास है, तुमने उस ग्राह को तप का फल दिया वह मुझे ही प्राप्त हुआ। अत: तुम्हारा तप फल अनंत गुना हो गया। तुमने करुणावश द्रवित होकर किसी प्राणी की रक्षा की अत: मैं तुम पर प्रसन्न हूं तथा तुम्हें पत्नी रूप में स्वीकार करता हूं। कथा का सारंश यही है कि जो परहित की कामना करता है। उस पर परमात्मा की असीम कृपा होती है। जो व्यक्ति असहायों की सहायता, दयालु प्रेमी करुणाकारी होता है। ईश्वर उसको स्वीकार करते हैं। यह कथा शिवपुराण में उल्लेखित है।

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आखिर कहां-कहां जाता है व्यक्ति का पाप, पढ़ें यह पौराणिक कथा

आज की पौराणिक कथा का सार है कि आखिर पाप कहां-कहां जाता है। इसी संदर्भ में एक बार एक ऋषि ने सोचा की लोग पाप धोने के लिए सभी लोग गंगा जाते हैं। ऐसे में सारे पार गंगा में ही समा जाते हैं। इस तरह तो गंगा भी पापी हो जाएगी। उस ऋषि ने यह जानने के लिए आखिर पाप जाता कहां है, तपस्या की। तपस्या करने के फलस्वरूप देवगण प्रकट हुए। तब ऋषि ने उनसे पूछा कि गंगा में जो पापा धोया जाता है वह कहां जाता है। तब भगवान ने कहा कि चलो गंगा जी से ही पूछते हैं इस बारे में। ऋषि और भगवान दोनों ने ही गंगा जी से पूछा कि हे गंगे! सब लोग तुम्हारे यहां पाप धोते हैं तो इसका मतलब क्या आप भी पापी हुईं? तब गंगा ने कहा कि मैं कैसे पापी हो गई। मैं तो सभी पाप लेकर समुद्र को अर्पित कर देती हूं। इसके बाद ऋषि और भगवान समुद्र के पास गए और उनसे पूछा कि हे सागर! गंगा सभी पाप आपको अर्पित कर देती है तो क्या ऐप आप पापी हो गए? तब समुद्र ने कहा कि वो कैसे पापी हुआ। वो सभी सभी पाप को भाप बनाकर बादल बना देता है। अब ऋषि और भगवान दोनों ही बाद के पास गए। उनसे पूछा कि हे बादल! समुद्र पापों को भाप बनाकर बादल बना देते हैं तो क्या आप पापी हुए? बादलों ने कहा, मैं कैसे पापी हुआ। मैं तो सभी पाप को वापस पानी बना देता हूं और धरती पर गिरा देता हूं। इससे ही अन्न उपजता है। इसे ही मानव खाता है। उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है उसी के आधार पर मानव की मानसिकता बनती है।यही कारण है कि कहा जाता है कि ‘जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मन।’ जिस वृत्ति से अन्न प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसा ही विचार मानव का बन जाता है। ऐसे में हमेशआ भोजन शांत रहकर ही ग्रहण करना चाहिए। अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन भी श्रम का होना चाहिए।

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