September 22, 2022

कहानी जयद्रथ कि – बेटे कि मृत्यु के साथ ही फट गया था पिता का भी मस्तक

महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत में अनेक ऐसे पात्र हैं, जिनके बारे में लोग कम ही जानते हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही पात्र जयद्रथ के बारे में बता रहे हैं। जयद्रथ की मृत्यु अर्जुन के हाथों हुई थी। अर्जुन ने जयद्रथ का सिर इस प्रकार काटा था कि वह जाकर तपस्या कर रहे वृद्धक्षत्र (जयद्रथ के पिता) की गोद में गिरा। जैसे ही वृद्धक्षत्र ने जयद्रथ का मस्तक पृथ्वी पर गिराया, उनका सिर भी फट गया। कौन था जयद्रथ?जयद्रथ सिंधु देश का राजा था। उसका विवाह कौरवों की बहन दु:शला से हुआ था। महाभारत के अनुसार, जब पांडव 12 वर्ष के वनवास पर थे, तब एक दिन राजा जयद्रथ उसी जंगल में गुजरा, जहां पांडव रह रहे थे। उस समय आश्रम में द्रौपदी को अकेला देख जयद्रथ ने उसका हरण कर लिया। जब पांडवों को यह बात पता चली तो उन्होंने पीछा कर जयद्रथ को पकड़ लिया। भीम जयद्रथ का वध करना चाहते थे, लेकिन कौरवों की बहन दु:शला का पति होने के कारण अर्जुन ने उन्हें रोक दिया। गुस्से में आकर भीम ने जयद्रथ के बाल मूंडकर पांच चोटियां रख दी। जयद्रथ की ऐसी हालत देखकर युधिष्ठिर को उस पर दया आ गई और उन्होंने जयद्रथ को मुक्त कर दिया। जयद्रथ ने लिया था महादेव से वरदानपांडवों से पराजित होकर जयद्रथ अपने राज्य नहीं गया। अपने अपमान का बदला लेने के लिए वह हरिद्वार जाकर भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिए घोर तपस्या करने लगा। तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे दर्शन दिए और वरदान मांगने के लिए कहा। जयद्रथ ने भगवान शिव से युद्ध में पांडवों को जीतने का वरदान मांगा। तब भगवान शिव ने जयद्रथ से कहा कि- पांडवों से जीतना या उन्हें मारना किसी के भी बस में नहीं है। लेकिन युद्ध में केवल एक दिन तुम अर्जुन को छोड़ शेष चार पांडवों को युद्ध में पीछे हटा सकते हो। क्योंकि अर्जुन स्वयं भगवान नर का अवतार है इसलिए उस पर तुम्हारा वश नहीं चलेगा। ऐसा कहकर भगवान शंकर अंतर्धान हो गए और जयद्रथ अपने राज्य में लौट गया। जयद्रथ के कारण ही हुई थी अभिमन्यु की मृत्युमहाभारत युद्ध में जब गुरु द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए चक्रव्यूह बनाया तो उसके मुख्य द्वार पर जयद्रथ को नियुक्त किया। योजना के अनुसार, संशप्तक योद्धा अर्जुन को युद्ध के लिए दूर ले गए। जब युधिष्ठिर ने देखा कि चक्रव्यूह के कारण उनके सैनिक मारे जा रहे हैं तो उन्होंने अभिमन्यु से इस व्यूह को तोड़ने के लिए कहा। अभिमन्यु ने कहा कि- मुझे इस व्यूह में प्रवेश करना तो आता है, लेकिन इससे बाहर निकलने का उपाय मुझे नहीं पता। तब युधिष्ठिर व भीम ने अभिमन्यु को विश्वास दिलाया कि तुम जिस स्थान से व्यूह भंग करोगे, हम भी उसी स्थान से व्यूह में प्रवेश कर जाएंगे और व्यूह का विध्वंस कर देंगे। युधिष्ठिर व भीम की बात मानकर अभिमन्यु चक्रव्यूह भेदकर उस में प्रवेश कर गया, लेकिन महादेव के वरदान से युधिष्ठिर, भीम, नकुल व सहदेव आदि वीरों को जयद्रथ ने बाहर ही रोक दिया। चक्रव्यूह में फंसकर अभिमन्यु की मृत्यु हो गई। श्रीकृष्ण ने माया से उत्पन्न कर दिया अंधकारअर्जुन को जब पता चला कि अभिमन्यु की मृत्यु का कारण जयद्रथ है तो उन्होंने प्रतिज्ञा की कि- कल निश्चय ही मैं जयद्रथ का वध कर डालूंगा या स्वयं अग्नि समाधि ले लूंगा। जयद्रथ की रक्षा के लिए गुरु द्रोणाचार्य ने अगले दिन चक्र शकटव्यूह की रचना की। शाम तक युद्ध करने के बाद भी अर्जुन जयद्रथ तक नहीं पहुंच पाया क्योंकि उसकी रक्षा कर्ण, अश्वत्थामा, भूरिश्रवा, शल्य आदि महारथी कर रहे थे। जब भगवान श्रीकृष्ण ने देखा कि सूर्य अस्त होने वाला है तब उन्होंने अपनी माया से सूर्य को ढ़कने के लिए अंधकार उत्पन्न कर दिया। सभी को लगा कि सूर्य अस्त हो गया है। यह देखकर जयद्रथ व उसके रक्षक असावधान हो गए। जयद्रथ स्वयं अर्जुन के सामने आ गया और उससे अग्नि समाधि लेने के लिए कहने लगा। तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तुरंत जयद्रथ का वध कर दो। इसलिए फटा जयद्रथ के पिता का मस्तकश्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक गुप्त बात बताई कि जयद्रथ के पिता वृद्धक्षत्र ने उसे वरदान दिया है कि जो भी वीर इसका सिर पृथ्वी पर गिराएगा, उसके मस्तक के भी सौ टुकड़े हो जाएंगे। इसलिए तुम इस प्रकार बाण चलाओ कि जयद्रथ का मस्तक कट कर उसके पिता की गोद में गिरे। वे इस समय समंतकपंचक क्षेत्र में तपस्या कर रहे हैं।अर्जुन ने अमोघ तीर चलाकर जयद्रथ का मस्तक काट दिया, यह मस्तक सीधे वृद्धक्षत्र की गोद में जाकर गिरा। जैसे ही उन्होंने जयद्रथ का मस्तक पृथ्वी पर गिराया, उनके मस्तक के सौ टुकड़े हो गए। इस प्रकार अर्जुन ने जब जयद्रथ का वध कर दिया, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी माया से उत्पन्न अंधकर दूर कर दिया।

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कूर्म जयंती | भगवान विष्णु के कूर्म अवतार की कहानी

वैशाख मास की पूर्णिमा पर कूर्म जयंती का पर्व मनाया जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का अवतार लिया था तथा समुद्र मंथन में सहायता की थी। भगवान विष्णु के कूर्म अवतार को कच्छप अवतार भी कहते हैं। कूर्मावतार भगवान के प्रसिद्ध दस अवतारों में द्वितीय अवतार है, और २४ अवतारों में ग्यारहवा अवतार है। कूर्म अवतार की कहानी (Kurma Avatar Story) – एक समय की बात है कि महर्षि दुर्वासा देवराज इंद्र से मिलाने के लिये स्वर्ग लोक में गये। उस समय देवताओं से पूजित इंद्र ऐरावत हाथी पर आरूढ़ हो कहीं जाने के लिये तैयार थे। उन्हें देख कर महर्षि दुर्वासा का मन प्रसन्न हो गया और उन्होंने विनीत भाव से देवराज को एक पारिजात-पुष्पों की माला भेंट की।देवराज ने माला ग्रहण तो कर ली, किन्तु उसे स्वयं न पहन कर ऐरावत के मस्तक पर डाल दी और स्वयं चलने को उद्यत हुए। हाथी मद से उन्मत्त हो रहा था उसने सुगन्धित तथा कभी म्लान न होने वाली उस माला को सूंड से मस्तक पर से खींच कर मसलते हुए फेंक दिया और पैरों से कुचल डाला। यह देखकर ऋषि दुर्वासा अत्यंत क्रुद्ध हो उठे और उन्होंने शाप देते हुए कहा- रे मूढ़! तुमने मेरी दी हुई माला का कुछ भी आदर नहीं किया। तुम त्रिभुवन की राजलक्ष्मी से संपन्न होने के कारण मेरा अपमान करते हो, इसलिये जाओ आज से तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो जायेगी और यह तुम्हारा यह वैभव भी श्रीहीन हो जाएगा। इतना कहकर दुर्वासा ऋषि शीघ्र ही वहाँ से चल दिये। श्राप के प्रभाव से इन्द्रादि सभी देवगण एवं तीनों लोकश्रीहीन हो गये। यह दशा देख कर इन्द्रादि देवता अत्यंत दु:खी हो गये। महर्षि का शाप अमोघ था, उन्हें प्रसन्न करने की सभी प्राथनाएं भी विफल हो गयीं। तब असहाय, निरुपाय तथा दु:खी देवगण, ऋषि-मुनि आदि सभी प्रजापति ब्रह्माजी के पास गये। ब्रह्मा जी ने उन्हें साथ लेकर वैकुण्ठ में श्री नारायण के पास पहुंचे और सभी ने अनेक प्रकार से नारायण की स्तुति की और बताया कि “प्रभु” एक तो हम दैत्यों के द्वारा अत्यंत कष्ट में हैं और इधर महर्षि के शाप से श्रीहीन भी हो गये हैं।आप शरणागतों के रक्षक हैं, इस महान कष्ट से हमारी रक्षा कीजिये। स्तुति से प्रसन्न होकर श्रीहरि ने गंभीर वाणी में कहा- तुम लोग समुद्र का मंथर करो, जिससे लक्ष्मी तथा अमृत की प्राप्ति होगी, उसे पीकर तुम अमर हो जाओगे, तब दैत्य तुम्हारा कुछ भी अनिष्ट न कर सकेंगे। किन्तु यह अत्यंत दुष्कर कार्य है, इसके लिये तुम असुरों को अमृत का प्रलोभन देकर उनके साथ संधि कर लो और दोनों पक्ष मिलकर समुद्र मंथन करो। यह कहकर प्रभु अन्तर्हित हो गये। प्रसन्नचित्त इन्द्रादि देवों ने असुरराज बलि तथा उनके प्रधान नायकों को अमृत का प्रलोभन देकर सहमत कर लिया। मथानी के लिये मंदराचल का सहारा लिया और वासुकिनाग की रस्सी बनाकर सिर की ओर दैत्यों ने तथा पूछ की ओर देवताओं ने पकड़ कर समुद्र का मंथन आरम्भ कर दिया। किन्तु अथाह सागर में मंदरगिरी डूबता हुआ रसातल में धसने लगा। यह देखकर अचिन्त्य शक्ति संपन्न लीलावतारी भगवान श्रीहरि ने कूर्मरूप धारण कर मंदराचल पर्वत अपनी पीठ पर धारण कर लिया। भगवान कूर्म की विशाल पीठ पर मंदराचल तेजी से घूमने लगा और इस प्रकार समुद्र मंथन संपन्न हुआ।

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नृसिंह चतुर्दशी : व्रत पूजन विधि और कथा

वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नृसिंह चतुर्दशी कहते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार, इसी तिथि को भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर दैत्यों के राजा हिरण्यकशिपु का वध किया था। इस दिन भगवान नृसिंह को प्रसन्न करने के लिए व्रत रखा जाता है व पूजा भी की जाती है। व्रत व पूजा की विधि इस प्रकार है- व्रत व पूजा विधिनृसिंह चतुर्दशी की सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद व्रत के लिए संकल्प लें। इसके बाद दोपहर में नदी, तालाब या घर पर ही वैदिक मंत्रों के साथ मिट्टी, गोबर, आंवले का फल और तिल लेकर उनसे सब पापों की शांति के लिए विधिपूर्वक स्नान करें। इसके बाद साफ कपड़े पहनकर संध्या तर्पण करें। अब पूजा स्थल को गाय के गोबर से लीप कर उस पर अष्ट दल (आठ पंखुड़ियों वाला) कमल बनाएं। कमल के ऊपर पंचरत्न सहित तांबे का कलश स्थापित करें। कलश के ऊपर चावलों से भरा हुआ बर्तन रखें और बर्तन में अपनी इच्छा के अनुसार सोने की लक्ष्मी सहित भगवान नृसिंह की प्रतिमा रखें। इसके बाद दोनों मूर्तियों को पंचामृत से स्नान करवाएं। योग्य विद्वान ब्राह्मण (आचार्य) को बुलाकर उनके हाथों फूल व षोडशोपचार सामग्रियों से विधिपूर्वक भगवान नृसिंह का पूजन करवाएं। भगवान नृसिंह को चंदन, कपूर, रोली व तुलसीदल भेंट करें तथा धूपदीप दिखाएं। इसके बाद घंटी बजाकर आरती उतारें और नीचे लिखे मंत्र के साथ भोग लगाएं- नैवेद्यं शर्करां चापि भक्ष्यभोज्यसमन्वितम्।ददामि ते रमाकांत सर्वपापक्षयं कुरु।। अब भगवान नृसिंह से सुख की कामना करें। रात में जागरण करें तथा भगवान नृसिंह की कथा सुनें। दूसरे दिन यानी पूर्णिमा पर स्नान करने के बाद फिर से भगवान नृसिंह की पूजा करें। ब्राह्मणों को दान दें उन्हें भोजन करवाएं व दक्षिणा भी दें। इसके बाद पुन: भगवान नृसिंह से मोक्ष की प्रार्थना करें। अंत में आचार्य (पूजन करने वाला ब्राह्मण) को दक्षिणा से संतुष्ट करके विदा करें। इसके बाद स्वयं भोजन करें। धर्म ग्रंथों के अनुसार, जो इस प्रकार नृसिंह चतुर्दशी के पर्व पर भगवान नृसिंह की पूजा करता है, उसके मन की हर कामना पूरी हो जाती है। उसे मोक्ष की प्राप्ति भी होती है नृसिंह अवतार की कहानीदैत्यों का राजा हिरण्यकशिपु स्वयं को भगवान से भी अधिक बलवान मानता था। उसे मनुष्य, देवता, पक्षी, पशु, न दिन में, न रात में, न धरती पर, न आकाश में, न अस्त्र से, न शस्त्र से मरने का वरदान प्राप्त था। उसके राज्य में जो भी भगवान विष्णु की पूजा करता था, उसको दंड दिया जाता था। उसके पुत्र का नाम प्रह्लाद था। प्रह्लाद बचपन से ही भगवान विष्णु का परम भक्त था। यह बात जब हिरण्यकशिपु को पता चली तो पहले उसने प्रह्लाद को समझाने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकशिपु ने उसे मृत्युदंड दे दिया। लेकिन हर बार भगवान विष्णु के चमत्कार से वह बच गया। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका, जिसे अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, वह प्रह्लाद को लेकर धधकती हुई अग्नि में बैठ गई।तब भी भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया और होलिका जल गई। जब हिरण्यकशिपु स्वयं प्रह्लाद को मारने ही वाला था, तब भगवान विष्णु नृसिंह का अवतार लेकर खंबे से प्रकट हुए और उन्होंने अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु का वध कर दिया।

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प्रद्युम्न – कामदेव ने ही लिया था भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म

कामदेव ने ही, श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में जन्म लिया था। आइए जानते है इससे सम्बंधित रोचक पौराणिक कथा –भगवान शंकर के शाप से जब कामदेव भस्म हो गया तो उसकी पत्नी रति अति व्याकुल होकर पति वियोग में उन्मत्त सी हो गई। उसने अपने पति की पुनः प्राप्ति के लिये देवी पार्वती और भगवान शंकर को तपस्या करके प्रसन्न किया। पार्वती जी ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि तेरा पति यदुकुल में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेगा और तुझे वह शम्बासुर के यहाँ मिलेगा। इसीलिये रति शम्बासुर के घर मायावती के नाम से दासी का कार्य करने लगी। “इधर कामदेव रुक्मणी के गर्भ में स्थित हो गये। समय आने पर रुक्मणी ने एक अति सुन्दर बालक को जन्म दिया। उस बालक के सौन्दर्य, शील, सद्गुण आदि सभी श्री कृष्ण के ही समान थे। जब शम्बासुर को पता चला कि मेरा शत्रु यदुकुल में जन्म ले चुका है तो वह वेश बदल कर प्रसूतिकागृह से उस दस दिन के शिशु को हर लाया और समुद्र में डाल दिया। समुद्र में उस शिशु को एक मछली निगल गई और उस मछली को एक मगरमच्छ ने निगल लिया। वह मगरमच्छ एक मछुआरे के जाल में आ फँसा जिसे कि मछुआरे ने शम्बासुर की रसोई में भेज दिया। जब उस मगरमच्छ का पेट फाड़ा गया तो उसमें से अति सुन्दर बालक निकला। उसको देख कर शम्बासुर की दासी मायावती के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वह उस बालक को पालने लगी। उसी समय देवर्षि नारद मायावती के पास पहुँचे और बोले कि हे मायावती! यह तेरा ही पति कामदेव है। इसने यदुकुल में जन्म लिया है और इसे शम्बासुर समुद्र में डाल आया था। तू इसका यत्न से लालन-पालन कर। इतना कह कर नारद जी वहाँ से चले गये। उस बालक का नाम प्रद्युम्न रखा गया। थोड़े ही काल में प्रद्युम्न युवा हो गया। प्रद्युम्न का रूप लावण्य इतना अद्भुत था कि वे साक्षात् श्री कृष्णचन्द्र ही प्रतीत होते थे। रति उन्हें बड़े भाव और लजीली दृष्टि से देखती थी। तब प्रद्युम्न जी बोले कि तुमने माता जैसा मेरा लालन-पालन किया है फिर तुममें ऐसा परिवर्तन क्यों देख रहा हूँ? तब रति ने कहा – “पुत्र नहीं तुम पति हो मेरे। मिले कन्त शम्बासुर प्रेरे॥मारौ नाथ शत्रु यह तुम्हरौ। मेटौ दुःख देवन कौ सिगरौ॥ “इतना कह कर मायावती रति ने उन्हें महा विद्या प्रदान किया तथा धनुष बाण, अस्त्र-शस्त्र आदि सभी विद्याओं में निपुण कर दिया। युद्ध विद्या में प्रवीण हो जाने पर प्रद्युम्न अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होकर शम्बासुर की सभा में गये। शम्बासुर उन्हें देखकर प्रसन्न हुआ और सभासदों से कहा कि इस बालक को मैंने पाल पोष कर बड़ा किया है। इस पर प्रद्युम्न बोले कि अरे दुष्ट! मैं तेरा बालक नहीं वरन् तेरा वही शत्रु हूँ जिसको तूने समुद्र में डाल दिया था। अब तू मुझसे युद्ध कर। “प्रद्युम्न के इन वचनों को सुनकर शम्बासुर ने अति क्रोधित होकर उन पर अपने बज्र के समान भारी गदा का प्रहार किया। प्रद्युम्न ने उस गदा को अपनी गदा से काट दिया। तब वह असुर अनेक प्रकार की माया रच कर युद्ध करने लगा किन्तु प्रद्युम्न ने महा विद्या के प्रयोग से उसकी माया को नष्ट कर दिया और अपने तीक्ष्ण तलवार से शम्बासुर का सिर काट कर पृथ्वी पर डाल दिया। उनके इस पराक्रम को देख कर देवतागणों ने उनकी स्तुति कर आकाश से पुष्प वर्षा की। फिर मायावती रति प्रद्युम्न को आकाश मार्ग से द्वारिकापुरी ले आई। गौरवर्ण पत्नी के साथ साँवले प्रद्यम्न जी की शोभा अवर्णनीय थी।”वे नव-दम्पति श्री कृष्ण के अन्तःपुर में पहुँचे। रुक्मणी सहित वहाँ की समस्त स्त्रियाँ साक्षात् श्री कृष्ण के प्रतिरूप प्रद्युम्न को देखकर आश्चर्यचकित रह गये। वे सोचने लगीं कि यह नर श्रेष्ठ किसका पुत्र है? न जाने क्यों इसे देख कर मेरा वात्सल्य उमड़ रहा है। मेरा बालक भी बड़ा होकर इसी के समान होता किन्तु उसे तो न जाने कौन प्रसूतिकागृह से ही उठा कर ले गया था। उसी समय श्री कृष्ण भी अपने माता-पिता देवकी और वसुदेव तथा भाई बलराम के साथ वहाँ आ पहुँचे। श्री कृष्ण तो अन्तर्यामी थे किन्तु उन्हें नर लीला करनी थी इसलिये वे बालक के विषय में अनजान बने रहे। तब देवर्षि नारद ने वहाँ आकर सभी को प्रद्युम्न की आद्योपान्त कथा सुनाई और वहाँ उपस्थित समस्त जनों के हृदय में हर्ष व्याप्त गया।

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महाभारत युद्ध में कौरवों और पांडवों ने कब-कब छल से किया योद्धाओं का वध

कौरवों और पांडवों ने मिलकर महाभारत युद्ध के लिए कुछ नियम बनाए थे जिनका दोनों ही पक्षों को पालन करना था। युद्ध शुरू होने से कुछ दिनों बाद तक तो इन नियमों का पालन किया गया, लेकिन बाद में इन नियमों को कई बार तोड़ा गया और छल का सहारा लेकर योद्धाओं को मारा गया। युद्ध में कब, किसने छल से योद्धाओं का वध किया, आज हम आपको यही बता रहे हैं- शिखंडी को आगे कर किया भीष्म को पराजितयुद्ध शुरू होने पर कौरवों की ओर से भीष्म पितामाह को सेनापति बनाया गया। भीष्म ने पांडवों की सेना में हाहाकार मचा दिया। तब अर्जुन ने शिखंडी को आगे कर भीष्म से युद्ध किया। भीष्म जानते थे कि शिखंडी का जन्म स्त्री के रूप में हुआ है और पिछले जन्म में भी वह एक स्त्री था। भीष्म ने स्त्री पर वार न करने की प्रतिज्ञा की थी। इसलिए वे अर्जुन पर वार नहीं कर पाए और अर्जुन ने भीष्म को पराजित कर दिया। कौरवों ने किया अभिमन्यु का वधयुद्ध शुरू होने से पहले ये नियम बनाया गया था कि एक योद्धा से एक योद्धा ही युद्ध करेगा। दूसरा कोई उनके बीच नहीं जाएगा, लेकिन कौरवों ने इस नियम को तोड़ा। जब अभिमन्यु अकेला चक्रव्यूह में फंस गया तो कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, शकुनि आदि योद्धाओं ने मिलकर अभिमन्यु का वध कर दिया। इसके बाद ही युद्ध के नियमों का टूटना शुरू हुआ। सात्यकि ने किया भूरिश्रवा का वधभूरिश्रवा बहुत ही पराक्रमी योद्धा था। युद्ध में उसने कौरवों का साथ दिया था। सात्यकि अर्जुन का शिष्य था। कुरुक्षेत्र में जब ये दोनों महावीर मल्ल युद्ध कर रहे थे तब भूरिश्रवा ने सात्यकि को उठाकर जमीन पर पटक दिया और जब वह सात्यकि का वध करना चाहता था, उसी समय अर्जुन ने दूर से ही तीर चलाकर उसका हाथ काट दिया। अर्जुन के द्वारा इस प्रकार युद्ध के नियम तोड़ने पर भूरिश्रवा को बहुत क्रोध आया और वह उपवास लेकर वहीं बैठ गया। सात्यकि ने इसी का फायदा उठाते हुए भूरिश्रवा का वध कर दिया। छल से किया द्रोणाचार्य का वधभीष्म के बाद द्रोणाचार्य को कौरवों का सेनापति बनाया गया। द्रोणाचार्य पर विजय पाना भी जब पांडवों के लिए मुश्किल हो गया तब भीम ने अश्वत्थामा नाम के हाथी का वध कर दिया और ऐसा कहने लगे कि- मैंने अश्वत्थामा का वध कर दिया। द्रोणाचार्य के पुत्र का नाम भी अश्वत्थामा था, इससे वे संशय में पड़ गए। जब उन्होंने इसके बारे में युधिष्ठिर से पूछा तो उन्होंने भी इसे सत्य बताया। पुत्र मोह के कारण द्रोणाचार्य ने अपने हथियार रख दिए और ध्यान की स्थिति में बैठ गए। इसी का फायदा उठाते हुए धृष्टद्युम्न (पांडवों का सेनापति) ने उनका वध कर दिया। अर्जुन ने ऐसे किया कर्ण का वधमहाभारत युद्ध का एक नियम ये भी था कि असावधान व्यक्ति पर कोई वार नहीं करेगा और जो योद्धा अपने रथ से नीचे है, उसके साथ भी युद्ध नहीं किया जाएगा। युद्ध के दौरान जब कर्ण के रथ का पहिया जमीन में धंस गया था और कर्ण उसे निकालने नीचे उतरे, उसी स्थिति में अर्जुन ने उसका वध कर दिया। उस समय कर्ण के पास शस्त्र भी वहीं थे और वह असावधान स्थिति में था। भीम ने किया दुर्योधन का वधजब कौरवों की सेना नष्ट हो गई तब भीम व दुर्योधन में निर्णायक गदा युद्ध हुआ। गदा युद्ध के नियमों के अनुसार योद्धा कमर के नीचे वार नहीं कर सकते, लेकिन भीम ने इस नियम को तोड़ते हुए अपनी गदा से दुर्योधन की जांघ पर वार किया। जांघ पर वार होने से दुर्योधन पराजित हो गया। वहीं तड़पते हुए दुर्योधन के प्राण निकल गए। अश्वत्थामा ने भी तोड़ा युद्ध का नियमरात को कोई किसी पर वार नहीं करेगा, ये भी महाभारत युद्ध का एक नियम था। इस नियम को अश्वत्थामा ने तोड़ा था। दुर्योधन ने मरने से पहले अश्वत्थामा को कौरवों का अंतिम सेनापति बनाया। उस समय अश्वत्थामा के अलावा कौरवों की ओर से केवल कृपाचार्य व कृतवर्मा ही जीवित बचे थे। अश्वत्थामा रात के अंधेरे में पांडवों के शिविर में घुस गया और धृष्टद्युम्न, युधामन्यु के अलावा द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध कर दिया।

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