September 9, 2022

विभीषण से कर लेने घटोत्कच गया था लंका, जानिए भीम पुत्र घटोत्कच से जुडी रोचक जानकारी

महाभारत में ऐसे अनेक पात्र हैं, जिनके बारे में लोग कम ही जानते हैं। ऐसा ही एक पात्र है भीम का पुत्र घटोत्कच। अधिकांश लोग ये जानते हैं कि घटोत्कच भीम व राक्षसी हिडिंबा का पुत्र था और उसकी मृत्यु कर्ण के हाथों हुई थी। इसके अलावा भी घटोत्कच से जुड़ी अनेक रोचक बातें हैं, जो बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको घटोत्कच से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-घटोत्कच क्यों गया लंका?महाभारत के दिग्विजय पर्व के अनुसार, जब राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ का आयोजन किया तो भीम, अर्जुन, नकुल व सहदेव को अलग-अलग दिशाओं में निवास कर रहे राजाओं से कर (टैक्स) लेने के लिए भेजा। कुछ राजाओं ने आसानी से कर दे दिया तो कुछ युद्ध के बाद कर देने के लिए राजी हुए। इसी क्रम में सहदेव ने घटोत्कच को लंका जाकर राजा विभीषण से कर लेकर आने को कहा। घटोत्कच अपनी मायावी शक्ति से तुरंत लंका पहुंच गया। वहां जाकर उसने राजा विभीषण को अपना परिचय दिया और आने का कारण बताया। घटोत्कच की बात सुनकर विभीषण प्रसन्न हुए और उन्होंने कर के रूप में बहुत धन देकर उसे लंका से विदा किया।ऐसे हुआ घटोत्कच का जन्मलाक्षागृह की आग से बच निकलने के बाद पांडव अपनी माता के साथ छिपते हुए वन में चले गए। उस वन में हिडिंबासुर नाम का राक्षस अपनी बहन हिडिंबा के साथ रहता था। हिडिंबा ने जब भीम को देखा तो उससे प्रेम करने लगी। तभी हिडिंबासुर भी वहां आ गया। युद्ध में भीम ने उसका वध कर दिया। कुंती के कहने पर भीम ने हिडिंबा से विवाह कर लिया। कुछ समय बाद भीम और हिंडिबा के मिलन से एक महापराक्रमी बालक पैदा हुआ। वह क्षणभर में ही बड़े-बड़े राक्षसों से भी बढ़ गया और तुरंत ही जवान हो गया। उसके सिर पर बाल नहीं थे। भीम और हिंडिबा ने उसके घट अर्थात सिर को उत्कच यानी केशहीन देखकर उसका नाम घटोत्कच रख दिया।घटोत्कच ने की थी पांडवों की सहायतावनवास के दौरान जब पांडव गंदमादन पर्वत की ओर जा रहे थे, तभी रास्ते में बारिश व तेज हवाओं के कारण द्रौपदी बहुत थक गई। तब भीम ने अपने पुत्र घटोत्कच को याद किया। घटोत्कच तुंरत वहां आ गया। भीम ने उसे बताया कि तुम्हारी माता (द्रौपदी) बहुत थक गई है। तुम उसे कंधे पर बैठाकर हमारे साथ इस तरह चलो की उसे किसी तरह का कष्ट न हो। घटोत्कच ने भीम से कहा कि- मेरे साथ और भी साथी हैं, आप सभी उनके कंधे पर बैठ जाइए। माता द्रौपदी को मैं अपने कंधे पर बैठा लेता हूं। इस तरह आप सभी आसानी से गंदमादन पर्वत तक पहुचं जाएंगे। पांडवों ने ऐसा ही किया। कुछ ही देर में घटोत्कच व उसके साथियों ने पांडवों को गंदमादन पर्वत तक पहुंचा दिया। घटोत्कच ने भी किया था दुर्योधन से युद्धकुरुक्षेत्र के मैदान में जब पांडव व कौरवों की सेना में युद्ध छिड़ा हुआ था, उस समय घटोत्कच और दुर्योधन के बीच भी भयानक युद्ध हुआ था। जब भीष्म पितामाह को पता चला कि दुर्योधन और घटोत्कच में युद्ध हो रहा है तो उन्होंने द्रोणाचार्य को कहा कि- घटोत्कच को युद्ध में कोई भी पराजित नहीं कर सकता। इसलिए आप उसकी सहायता के लिए जाईए। भीष्म के कहने पर द्रोणाचार्य, जयद्रथ, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, विकर्ण व अनेक महारथी दुर्योधन की सहायता के लिए गए, लेकिन घटोत्कच ने उन्हें भी अपने पराक्रम से घायल कर दिया। घटोत्कच ने अपनी माया से ऐसा भयानक दृश्य उत्पन्न किया कि उसे देखकर कौरवों की सेना भाग गई। घटोत्कच ने किया था अलम्बुष का वधयुद्ध के दौरान घटोत्कच और कौरवों की ओर से युद्ध कर रहे राक्षस अलम्बुष में भी भयानक युद्ध हुआ था। अलम्बुष भी मायावी विद्याएं जानता था। घटोत्कच युद्ध में जो भी माया दिखाता, उसे अलम्बुष अपनी माया से नष्ट कर देता था। अलम्बुष ने घटोत्कच को अपने तीरों से घायल कर दिया। गुस्से में आकर घटोत्कच ने उसका वध करने का निर्णय लिया। घटोत्कच ने अपने रथ से अलम्बुष के रथ पर कूद कर उसे पकड़ लिया और उठाकर जमीन पर इस प्रकार पटका कि उसके प्राण निकल गए। यह देख पांडवों की सेना में हर्ष छा गया और वे प्रसन्न होकर अपने अस्त्र-शस्त्र लहराने लगे। इसका भी वध किया था घटोत्कच नेजब कर्ण पांडवों की सेना का संहार कर रहा था। उस समय श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को अपने पास बुलाया और कर्ण से युद्ध करने के लिए भेजा। जब दुर्योधन ने देखा कि घटोत्कच कर्ण पर प्रहार करना चाहता है तो उसने राक्षस जटासुर के पुत्र अलम्बुष (यह पहले वाले अलम्बुष से अलग है) को युद्ध करने के लिए भेजा। इस अलम्बुष और घटोत्कच में भी भयानक युद्ध हुआ। पराक्रमी घटोत्कच ने इस अलम्बुष का भी वध कर दिया। दुर्योधन की ओर फेंका था अलम्बुष का मस्तकराक्षस अलम्बुष का सिर काटकर घटोत्कच दुर्योधन के पास पहुंचा और गर्जना करते हुए बोला कि- मैंने तुम्हारे सहायक का वध कर दिया है। अब कर्ण और तुम्हारी भी यही अवस्था होगी। जो अपने धर्म, अर्थ और काम तीनों की इच्छा रखता है, उसे राजा, ब्राह्मण और स्त्री से खाली हाथ नहीं मिलना चाहिए (इसलिए मैं तेरे लिए यह मस्तक भेंट के रूप में लाया हूं)। ऐसा कहकर घटोत्कच ने अलम्बुष का सिर दुर्योधन की ओर फेंक दिया। ऐसा था घटोत्कच का रथमहाभारत के द्रोणपर्व के अनुसार, घटोत्कच के रथ पर जो झंडा था, उस पर मांस खाने वाले गिद्ध दिखाई देता था। उसके रथ में आठ पहिए लगे थे और चलते समय वह बादलों के समान गंभीर आवाज करता था। सौ बलवान घोड़े एस रथ में जुते थे। उन घोड़े के कंधों पर लंबे-लंबे बाल थे, उनकी आंखें लाल थी। घटोत्कच का रथ रीछ की खाल से मढ़ा था। उस रथ में सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र रखे हुए थे। विरूपाक्ष नाम का राक्षस उस रथ का सारथि था। ऐसी हुई घटोत्कच की मृत्युजब श्रीकृष्ण के कहने पर घटोत्कच कर्ण से युद्ध करने गया तो उनके बीच भयानक युद्ध होने लगा। घटोत्कच और कर्ण दोनों ही पराक्रमी योद्धा थे, इसलिए वे एक-दूसरे के प्रहार को काटने लगे। इन दोनों का युद्ध आधी रात तक चलता रहा। जब कर्ण ने देखा

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कैसे आये भगवान राम के पग तलवे में ये चार चिन्ह :–कमल_ वज्र _अंकुश _ध्वजा

बाबा तुलसी दास जी ने रामचरित्र मानस में लिखा है।“ललित अंक कुलसादिक चारी ।।” अर्थात भगवान राम के पग तलवे में चार चिन्ह अंकित हैं। १- कमल २- वज्र ३-अंकुश ४-ध्वजा। आइए जानते है कैसे आए प्रभु श्री राम के पग तलवे में ये चिन्ह  पूर्व कल्प में गज के पैर को ग्राह ने अपने मुख से पकड लिया। हाथी को खाना चाहता है। दर्द से हाथी कराह उठा।चिल्लाने लगा। अपनी सूंढ में एक कमल पुष्प लेकर भगवान को पुकारने लगा। हे कमलापति कमलनयन भक्तवत्सल प्रभु हमारी रक्षा कीजिए। भक्त की वेदना भगवान से सही नही गई। भगवान नंगे पाँव दौड के गज के पास पहुँच गये।गज को ग्रह से बचाया। भगवान को समर्पित करने के लिए गज के पास सूँढ मे कमल पुष्प तथा भक्ती ये दो चीजें थी उसने बडे प्रेम से दोनों वस्तुएें प्रभु को अर्पित करदीं।भगवान विष्णु ने ” उस भक्ति रूपी कमल को अपने पाँव के तलवे में स्थापित कर लिया। और गज से बोले :– ये भक्ति रूपी कमल हमारे पाँव के तलवे में अनन्त काल तक रहेगा । २– वज्र– विष्णुजी तपस्या कर रहे थे वहीं एक वृक्ष उग आया जो गुडहल के नाम से जाना गया। उसने विष्णु जी को धूप से बचाने के लिए अपनी छाया विष्णु जी पे करदी। और दस हजार वर्षों तक लगातार विष्णु जी पे पुष्पों की बरसात करता रहा। लेकिन विष्णु जी ने अपने नेत्र नही खोले। यह देखकर वृक्ष को क्रोध आ गया। अपने पुष्पों को पत्थर रूप में परिवर्तित करके भगवान विष्णु जी पे बरसाने लगा। अचानक भगवान विष्णु जी के नेत्र खुल गये ।भगवान का सारा शरीर घायल हो गया था।विष्णु जी ने उसे दंड नही दिया बल्कि उसे बरदान दिया। उसे भक्ती का बरदान देके पत्थर रूपी पुष्पों को अस्त्र में परिवर्तित कर के वज्र बना दिया। और वृक्ष से बोले ये भक्तिरूपी पुष्प वज्र हमारे पाँव के तलवे में तुम्हारी निशानी के रूप में अनन्तकाल तक रहेगी । ३–अंकुश नारयणी नाम की एक नाग कन्या थी । जिसने भगवान विष्णु की ऩिराहार रह कर पच्चास हजार वर्षों तक घोर तपस्या की। नाग कन्या की तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु प्रगट हुए और कन्या से वर मांग ने को कहा। कन्या बोली :– प्रभु मैं -सदा आप के साथ रहना चाहती हूँ, आप के साथ रहकर आप पे आने वाली हर मुसीबत तथा दैहिक,दैविक,भौतिक तापों का हनन करना चाहती हूँ। बस यही वर चाहिए । कन्या की बात सुनके भगवान विष्णु ने उस कन्या को अंकुश रूप में परिवर्तित करके अपने पग के तलवे में स्थापित कर लिया।

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महाभारत युद्ध का 18 दिनों का घटनाक्रम : जानिए किस दिन क्या हुआ था

मार्गशीर्ष शुक्ल 14 को महाभारत युद्ध प्रारम्भ हुआ था जो लगातार 18 दिनों तक चला था। यहां जानिए महाभारत युद्ध के 18 दिनों में किस दिन क्या हुआ था… पहला दिनयुद्ध के पहले दिन पांडव पक्ष को भारी हानि हुई थी। विराट नरेश के पुत्र उत्तर और श्वेत को शल्य और भीष्म ने मार दिया था। भीष्म ने पांडवों के कई सैनिकों का वध कर दिया था। ये दिन कौरवों के लिए उत्साह बढ़ाने वाला और पांडव के लिए निराशाजनक था। दूसरा दिनदूसरे दिन पांडवों को अधिक नुकसान नहीं हुआ था। द्रोणाचार्य ने धृष्टद्युम्न को कई बार हराया। भीष्म ने अर्जुन और श्रीकृष्ण को कई बार घायल किया। भीम ने हजारों कलिंग और निषाद मार गिराए। अर्जुन ने भीष्म को रोके रखा। तीसरा दिनतीसरे दिन भीम ने घटोत्कच के साथ मिलकर दुर्योधन की सेना को युद्ध से भगा दिया। इसके बाद भीष्म भीषण संहार मचा देते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन को भीष्म वध करने को कहते हैं, लेकिन अर्जुन उत्साह से युद्ध नहीं कर पाते हैं, जिससे श्रीकृष्ण स्वयं ही भीष्म को मारने के लिए दौड़ पड़ते हैं। तब अर्जुन भरोसा दिलाते हैं कि वे पूरे उत्साह से युद्ध लड़ेंगे। चौथा दिनइस दिन कौरवों अर्जुन को रोक नहीं सके। भीम ने कौरव सेना में हाहाकार मचा दिया। दुर्योधन ने अपनी गजसेना भीम को मारने के लिए भेजी, लेकिन घटोत्कच के साथ मिलकर भीम ने उन सबको मार दिया। भीष्म से अर्जुन और भीम का भयंकर युद्ध हुआ। पांचवां दिनयुद्ध के पांचवें दिन भीष्म ने पांडव सेना में खलबली मचा दी। भीष्म को रोकने के लिए अर्जुन और भीम ने उनसे युद्ध किया। सात्यकि ने द्रोणाचार्य रोके रखा। भीष्म ने सात्यकि को युद्ध से भागने के लिए मजबूर कर दिया। छठा दिनइस दिन भी दोनों पक्षों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। दुर्योधन क्रोधित होता रहा, लेकिन भीष्म उसे आश्वासन देते रहे और पांचाल सेना का संहार कर दिया। सातवां दिनसातवें दिन अर्जुन कौरव सेना पर हावी हो जाता है। धृष्टद्युम्न दुर्योधन को युद्ध में हरा देता है, अर्जुन का पुत्र इरावान विन्द और अनुविन्द को हरा देता है। दिन के अंत में भीष्म पांडव सेना पर हावी हो जाते हैं। आठवां दिनआठवें दिन भी भीष्म पांडव सेना पर हावी रहते हैं। भीम धृतराष्ट्र के आठ पुत्रों का वध कर देता है, राक्षस अम्बलुष अर्जुन पुत्र इरावान का वध कर देता है। घटोत्कच दुर्योधन को अपनी माया से प्रताड़ित करता है। तब भीष्म की आज्ञा से भगदत्त घटोत्कच, भीम, युधिष्ठिर व अन्य पांडव सैनिकों को पीछे ढकेल देता है। दिन के अंत तक भीम धृतराष्ट्र के नौ और पुत्रों का वध कर देता है। नवां दिननवें दिन दुर्योधन भीष्म से कर्ण को युद्ध में लाने की बात कहता है, तब भीष्म उसे आश्वासन देते हैं कि या तो श्रीकृष्ण को युद्ध में शस्त्र उठाने के लिए विवश कर देंगे या किसी एक पांडव का वध कर देंगे। युद्ध में भीष्म को रोकने के लिए श्रीकृष्ण को अपनी प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ती है और वे शस्त्र उठा लेते हैं। इस दिन भीष्म पांडवों की सेना का अधिकांश भाग समाप्त कर देते हैं। दसवां दिनइस दिन पांडव श्रीकृष्ण के कहने पर भीष्म से उनकी मुत्यु का उपाय पूछते हैं। भीष्म के बताए उपाय के अनुसार अर्जुन शिखंडी को आगे करके भीष्म पर बाण ही बाण चला देते हैं। अर्जुन के बाणों से भीष्म बाणों की शय्या पर लेट जाते हैं। ग्याहरवां दिनग्याहरवें दिन कर्ण युद्ध में आ जाता है। कर्ण के कहने पर द्रोणाचार्य को सेनापति बनाया जाता है। दुर्योधन और शकुनि द्रोण से कहते हैं कि युधिष्ठिर को बंदी बना लेंगे तो युद्ध खत्म हो जाएगा। दुर्योधन की योजना अर्जुन पूरी नहीं होने देता है। कर्ण भी पांडव सेना का भारी संहार करता है। बारहवां दिनयुधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए शकुनि और दुर्योधन अर्जुन को युधिष्ठिर से काफी दूर भेजने में कामयाब हो जाते हैं, लेकिन अर्जुन समय पर पहुंचकर युधिष्ठिर को बंदी बनने से बचा लेते हैं। तेरहवां दिनइस दिन दुर्योधन राजा भगदत्त को अर्जुन से युद्ध करने के लिए भेजता है। भगदत्त भीम को हरा देते हैं, अर्जुन के साथ युद्ध करते हैं। श्रीकृष्ण भगदत्त के वैष्णवास्त्र को अपने ऊपर लेकर अर्जुन की रक्षा करते हैं। अर्जुन भगदत्त की आंखो की पट्टी तोड़ देता है, जिससे उसे दिखना बंद हो जाता है। अर्जुन इस अवस्था में ही उनका वध कर देता है। इसी दिन द्रोण युधिष्ठिर के लिए चक्रव्यूह रचते हैं। जिसे केवल अभिमन्यु तोड़ना जानता था, लेकिन निकलना नहीं जानता था। युधिष्ठिर भीम आदि को अभिमन्यु के साथ भेजता है, लेकिन चक्रव्यूह के द्वार पर जयद्रथ सभी को रोक देता है। केवल अभिमन्यु ही प्रवेश कर पाता है। वह अकेला ही सभी कौरवों से युद्ध करता है और मारा जाता है। पुत्र अभिमन्यु का अन्याय पूर्ण तरीके से वध हुआ देखकर अर्जुन अगले दिन जयद्रथ वध करने की प्रतिज्ञा ले लेता है और ऐसा न कर पाने पर अग्नि समाधि लेने को कह देता है। चौदहवां दिनअर्जुन की अग्नि समाधि वाली बात सुनकर कौरव जयद्रथ को बचाने योजना बनाते हैं। द्रोण जयद्रथ को बचाने के लिए उसे सेना के पिछले भाग मे छिपा देते है, लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा किए गए सूर्यास्त के कारण जयद्रथ बाहर आ जाता है और अर्जुन और वध कर देता है। इसी दिन द्रोण द्रुपद और विराट को मार देते हैं। पंद्रहवां दिनइस दिन पाण्डव छल से द्रोणाचार्य को अश्वत्थामा की मृत्यु का विश्वास दिला देते हैं, जिससे निराश हो द्रोण समाधि ले लेते हैं। इस दशा में धृष्टद्युम्न द्रोण का सिर काटकर वध कर देता है। सोलहवां दिनइस दिन कर्ण को कौरव सेनापति बनाया जाता है। इस दिन वह पांडव सेना का भयंकर संहार करता है। कर्ण नकुल-सहदेव को हरा देता है, लेकिन कुंती को दिए वचन के कारण उन्हें मारता नहीं है। भीम दुःशासन का वध कर देता है और उसकी छाती का रक्त पीता है। सत्रहवां दिनसत्रहवें दिन कर्ण भीम और युधिष्ठिर को हरा देता है, लेकिन कुंती को दिए वचन के कारण उन्हें मारता नहीं है। युद्ध में कर्ण के रथ का पहिया भूमि में धंस जाता है, तब कर्ण पहिया निकालने के लिए नीचे उतरता है और उसी समय श्रीकृष्ण के कहने पर अर्जुन कर्ण का वध कर देता है। फिर

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अदभुत रहस्य :- आखिर क्यों निगला सीताजी ने लक्ष्मण को

एक समय की बात है मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम रावण का वध करके भगवती सीता के साथ अवधपुरी वापस आ गए । अयोध्या को एक दुल्हन की तरह से सजाया गया और उत्सव मनाया गया ।उत्सव मनाया जा रहा था तभी सीता जी को यह ख्याल आया की वनवास जाने से पूर्व मां सरयु से वादा किया था कि अगर पुन: अपने पति और देवर के साथ सकुशल अवधपुरी वापस आऊंगी तो आपकी विधिवत रूप से पूजन अर्चन करूंगी ।यह सोचकर सीता जी ने लक्ष्मण को साथ लेकर रात्रि में सरयू नदी के तट पर गई। सरयु की पूजा करने के लिए लक्ष्मण से जल लाने के लिए कहा ,! लक्ष्मण जी जल लाने के लिए घडा लेकर सरयू नदी में उतर गए। जल भर ही रहे थे कि तभी-सरयू के जल से एक अघासुर नाम का राक्षस निकला जो लक्ष्मण जी को निगलना चाहता था ।लेकिन तभी भगवती सीता ने यह दृश्य देखा :—-और लक्ष्मण को बचाने के लिए माता सीता ने अघासुर के निगलने से पहले स्वयं लक्ष्मण को निगल गई । लक्ष्मण को निगलने के बाद सीता जी का सारा शरीर जल बनकर गल गया (यह दृश्य हनुमानजी देख रहे थे जो अद्रश्य रुप से सीता जी के साथ सरयू तट पर आए थे ) उस तन रूपी जल को श्री हनुमान जी घड़े में भरकर भगवान श्री राम के सम्मुख लाए। और सारी घटना कैसे घटी यह बात हनुमान जी ने श्री राम जी से बताई । मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी हँसकर बोले:– -हे मारूति सुत सारे राक्षसों का बध तो मैने कर दिया लेकिन ये राक्षस मेरे हाथों से मरने वाला नही है । इसे भगवान भोलेनाथ का वरदान प्राप्त है कि जब त्रेतायुग में सीता और लक्ष्मण का तन एक तत्व में बदल जायेगा तब उसी तत्व के द्वारा इस राक्षस का बध होगा । और वह तत्व रूद्रावतारी हनुमान के द्वारा अस्त्र रूप में प्रयुक्त किया जाये । सो हनुमान इस जल को तत्काल सरयु जल में अपने हाथों से प्रवाहित कर दो। इस जल के सरयु के जल में मिलने से अघासुर का बध हो जायेगा और सीता तथा लक्ष्मण पुन:अपने शरीर को प्राप्त कर सकेंगे । हनुमान जी ने घडे के जल को आदि गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करके सरयु जल में डाल दिया ।घडे का जल ज्यों ही सरयु जल में मिला त्यों ही सरयु के जल में भयंकर ज्वाला जलने लगी उसी ज्वाला में अघासुर जलकर भस्म हो गया । और सरयु माता ने पुन: सीता तथा लक्ष्मण को नव-जीवन प्रदान किया ।_____________________अवधपुरी मम् पुरी सुहावन ।उत्तर दिश बह सरयु पावन ।।_____________________|| राम ||

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अनंत चतुर्दशी व्रत कथा

अनंत चतुर्दशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और अनंत फल देने वाला माना गया है। भगवान विष्णु को समर्पित अनंत चतुर्दशी का पर्व भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इसे लोकभाषा में अनंत चौदस के नाम से भी जाता है। इस दिन जगत के पालनहार भगवान विष्णुजी के अनंत रूप की पूजा की जाती है। अनंत अर्थात जिसके न आदि का पता है और न ही अंत का अर्थात वे स्वयं श्री नारायण ही हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत रखकर एवं उनकी पूजा करके अनंतसूत्र बांधने से समस्त बाधाओं से मुक्ति मिलती है। ऐसे कहलाए अनंत भगवान अनंत चतुर्दशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और अनंत फल देने वाला माना गया है। शास्त्रों की मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु ने सृष्टि की शुरुआत में चौदह लोकों तल, अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, पाताल, भू, भुवः, स्वः, जन, तप, सत्य, मह की रचना की थी एवं इन लोकों की रक्षा और पालन के लिए भगवान विष्णु स्वयं भी चौदह रूपों में प्रकट हो गए थे, जिससे वे अनंत प्रतीत होने लगे इसलिए आज के दिन भगवान विष्णु के अनंत रूपों की पूजा की जाती है। अनंत चतुर्दशी की पूजा में सूत्र का बड़ा महत्व है। इस व्रत में स्नानादि करने के बाद अक्षत, दूर्वा, शुद्ध रेशम या कपास के सूत से बने और हल्दी से रंगे हुए चौदह गांठ के अनंत सूत्र को भगवान विष्णु की तस्वीर या प्रतिमा के सामने रखकर पूजा की जाती है। हर गाँठ में श्री नारायण के विभिन्न नामों से पूजा की जाती है। पहले में अनंत,उसके बाद ऋषिकेश,पद्मनाभ, माधव, वैकुण्ठ, श्रीधर, त्रिविक्रम, मधुसूदन, वामन, केशव, नारायण, दामोदरऔर गोविन्द की पूजा होती है फिर अनंत देव का ध्यान करके इस शुद्ध अनंत, जिसकी पूजा की गई होती है को पुरुष दाहिने और स्त्री बांये हाथ में बांधते हैं। मान्यता है कि इस अनंत सूत्र को बांधने से व्यक्ति प्रत्येक कष्ट से दूर रहता है। जो मनुष्य विधिपूर्वक इस दिन श्री हरि की पूजा करता है उसे सभी पापों से छुटकारा मिल जाता है। ऐसा माना गया है कि अगर इस दिन व्रत रखने के साथ-साथ कोई व्यक्ति विष्णु सहस्त्रनाम स्रोत का पाठ करता है तो उसकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। ये व्रत महिलाएं सुख-समृद्धि, धन-धान्य और संतान प्राप्ति के लिए करती हैं। अनंत सूत्र बांधने का मंत्र अनंत संसार महासमुद्रे मग्नं समभ्युद्धर वासुदेव।अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्यनंतसूत्राय नमो नमस्ते।। पांडवों ने भी किया था यह व्रत पुराणों में अनंत चतुर्दशी की कथा के युधिष्ठिर से सम्बंधित होने का उल्लेख मिलता है। पांडवों के राज्यहीन हो जाने पर श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी का व्रत करने का सुझाव दिया। इससे पांडवों को हर हाल में राज्य वापस मिलेगा, इसका विश्वास भी दिलाया। इस पर युधिष्ठिर ने अनंत भगवान के बारे में जिज्ञासा प्रकट की तो कृष्ण जी ने कहा कि वह भगवान विष्णु का ही एक रूप हैं। चतुर्मास में भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर अनंत शयन में रहते हैं। इनके आदि और अंत का पता नहीं है इसीलिए ये अनंत कहलाते हैं। इस व्रत को विधि विधान से करने से जीवन में आ रहे समस्त संकट समाप्त होंगे। जय श्री हरि

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