August 2022

पौराणिक कथा : गुरु द्रोणाचार्य एवं शिष्य अर्जुन

यह पौराणिक कथा महाभारत काल का एक प्रसंग है। यह बात उस समय की है जब आचार्य द्रोणाचार्य सभी राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते थे। और सभी राजकुमार गुरु द्रोणाचार्य के साथ ही वन में रहते थे। यों तो सभी राजकुमार धनुर्विद्या में पारंगत थे पर अर्जुन उनके सबसे ज्यादा प्रतिभावान तथा गुरुभक्त शिष्य थे। इसी कारण द्रोणाचार्य भी उनसे प्रसन्न रहते थे।  दूसरी तरफ द्रोणाचार्य को अपने पुत्र अश्वत्थामा पर भी विशेष अनुराग था इसलिए अश्वत्थामा भी धनुर्विद्या में सभी राजकुमारों में अग्रणी थे, लेकिन अर्जुन अश्वत्थामा से भी अधिक प्रतिभावान थे। एक रात की बात है, सभी शिष्य अपने गुरु के साथ भोजन कर रहे थे। तभी अचानक से तेज़ हवा चलने लगती है और दीपक बुझ जाता है। अंधकार होने के बाद भी सभी लोग भोजन  करना जारी रखते हैं। तभी अर्जुन के मन में एक विचार आता है। ‘इतना अंधकार होने के बाद भी भोजन के कौर को हाथ मुँह तक ले जाता है।’ इस विचार के आते है उन्हें समझ आ जाता है की  निशाना लगाने के लिये प्रकाश से अधिक आवश्यकता अभ्यास की है। और उसी दिन से अर्जुन रात्रि के अंधकार में निशाना लगाने का अभ्यास करना आरम्भ कर देते हैं। यह देख आचार्य द्रोणाचार्य बहुत प्रसन्न होते हैं।  एक बार आचार्य द्रोणाचार्य अपने सभी शिष्यों के साथ नदी में स्नान करने गए। जब गुरु द्रोणाचार्य स्नान करने के लिए जाने लगे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि वो अपनी धोती लाना तो भूल ही गए हैं। उन्होंने अपने प्रिये शिष्य अर्जुन से कहा की तुम आश्रम जाओ और मेरी धोती लेकर आओ। गुरु का आदेश पाकर अर्जुन आश्रम की ओर चल दिया। गुरु ने सोचा अभी अर्जुन को आने में तो समय लगेगा, क्यों न मैं सभी शिष्यों को मंत्रशक्ति का महत्त्व समझा दूँ। गुरु द्रोणाचार्यजी ने शिष्यों से कहा, ‘गदा एवं धनुष्य में शक्ति होती है, किन्तु मंत्र में उससे अधिक शक्ति होती है। ऐसा कहकर, गुरु द्रोणाचार्यजी ने भूमि पर एक मंत्र लिखा एवं उसी मंत्र से अभिमंत्रित एक बाण छोडा । उस एक बाण ने वृक्ष के सभी पत्तों को छेद दिया । यह देखकर, सभी शिष्य आश्चर्य में पड गए। कुछ समय बाद अर्जुन गुरु की धोती लेकर वापस आये तो उन्होंने देखा की बृक्ष की सभी पत्तियों के छेद हैं। वो सोचने लगे की जब पहले मैंने देखा था तो ऐसा नहीं था। जरूर गुरु जी ने सभी शिष्यों को कोई रहस्य बताया होगा। यदि कोई रहस्य होगा तो उसके कुछ सूत्र भी होंगे, प्रारंभ होगा, इसके चिह्न भी होंगे। ऐसा सोच वो इधर उधर खोजने लगे। थोड़ी ही देर में उन्हें भूमि पर लिखा हुआ एक मंत्र दिखाई दिया। वृक्षच्छेदन के सामर्थ्य से युक्त यह मंत्र अद्भुत है, यह बात उनके मन में समा गई और उन्होंने यह मंत्र पढना आरंभ किया। जब उसके मन में  दृण विश्वास उत्पन्न हो गया कि यह मंत्र निश्चित रूप में सफल होगा, तब उन्होंने धनुष पर बाण चढाया और मंत्र का उच्चारण कर छोड दिया । तीर वटवृक्ष की सभी पत्तियों पर, पहले बने छेद के समीप दूसरा छेद बन गया। यह देखकर अर्जुन को अत्यंत आनंद हुआ । गुरु जी ने अन्य शिष्यों को जो विद्या सिखाई, वह मैं ने भी सीख गया, ऐसा विचार कर, वह गुरुदेवजी को धोती देने के लिए नदी की ओर चल पड़े। स्नान से लौटने के बाद जब गुरु द्रोणाचार्य ने वटवृक्ष की पत्तियोंपर दूसरा छेद देखा, तो उन्होंने अपने साथ के सभी शिष्यों से प्रश्न किया ; स्नान से पहले वटवृक्ष की सभी पत्तियों पर एक छेद था । अब दूसरा छेद आप में से किसने किया ? सभी शिष्यों ने ना में जबाब दिया। गुरु द्रोणाचार्य ने अर्जुन की और देखकर पूछा ; क्या यह तुमने किया है ? अर्जुन कुछ संकोच के साथ बोले ; गुरुजी मैंने आपकी आज्ञा के बिना आपके मंत्र का प्रयोग किया । क्योंकि, मुझे लगा कि आपने इन सबको यह विद्या सिखा दी है, तो आपसे इस विषय में पूछकर आपका समय न गंवाकर अपने आप सीख लूं । गुरुदेवजी, मुझसे चूक हुई हो, तो क्षमा कीजिएगा। अर्जुन की यह बात सुनकर द्रोणाचार्य बहुत ही प्रसन्न हुए और बोले, ” हे अर्जुन तुमने धैर्य दिखाकर एवं प्रयत्न कर उत्तीर्ण हो गए । तू मेरा सर्वोत्तम शिष्य है। तुमसे श्रेष्ठ धनुर्धर होना असंभव है । Pauranik Katha Se Shiksha – प्रत्येक शिष्य को सीखने के प्रति जिज्ञासू और जागरूक होना चाहिए कि गुरु का अंतःकरण अभिमान से भर जाए

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जब भगवान शिव ने काल को दिया प्राण दान, भक्त के विश्वास की हुई जीत

भगवान शिव को कालों के काल महाकाल हैं। साक्षात् मृत्यु में भी उनका सामना करने का साहस नहीं है। वे मृत्युंजय हैं, अविनाशी हैं, आदि हैं, अनंत हैं। भगवान शिव इतने भोले हैं कि वे अपने भक्त की पुकार पर दौड़े चले आते हैं। उसे मनचाहा वरदान देते हैं और उसके मनोकामनाओं की पूर्ति करते हैं। आज हम आपको लिंगपुराण की एक कथा के बारे में बताते हैं, जिसमें काल को भगवान शिव ने प्राण दान दिया और अपने भक्त के विश्वास को टूटने नहीं दिया। आइए पढ़ते हैं यह पौराणिक कथा। भगवान शिव के परमभक्त श्वेतमुनि पर्वत पर एकांत में अपने आराध्य का ध्यान करते और उनकी पूजा करते थे। वे कहते थे कि मृत्यु उनका क्या कर सकती है? उन्होंने तो साक्षात् महाकाल की शरण ली हुई है। उनके आश्रम में शांति और आत्मविश्वास की पवित्रता झलकती थी। उनके तप के बल से आश्रम दिव्यमान था। श्वेतमुनि अपने जीवन काल के अंतिम पड़ाव पर थे। वे मृत्यु से निडर होकर रुद्र अध्याय का पाठ कर रहे थे। उनके जीवन ​का अंतिम श्वास चल रहा था। अचानक वे चौंक पड़े, उनके समक्ष एक विकराल आकृति खड़ी थी। पूरा शरीर काला था और उसने काले वस्त्र धारण कर रखे थे। श्वेतमुनि ने अपने आश्रम के शिवलिंग को करुणामय होकर देखा और ओम नम: शिवाय मंत्र का उच्चारण किया। उन्होंने शिवलिंग को स्पर्श किया और उस विकराल आकृति से पूछा कि तुमने इस पवित्र आश्रम को अपवित्र करने की हिम्मत कैसे की? इस आश्रम को तो भगवान शिव की कृपा से अभय का आशीष प्राप्त है। उन्होंने दोबारा शिवलिंग को स्पर्श किया।विकराल आकृति वाले काल ने अपना परिचय देते हुए ​​कहा कि अब आप पृथ्वी पर नहीं रह सकते हैं। आपको यमलोक चलना है। इस पर श्वेतमुनि ने शिवलिंग को अपने हाथों से कसकर पकड़ लिया और कहा कि तुमने शिव की भक्ति को चुनौती दी है, क्या तुम्हें नहीं पता है कि भगवान शिव तो स्वयं ही काल के भी काल महाकाल हैं। इस पर काल ने कहा कि शिवलिंग शक्तिविहीन है, निश्चेतन है, पत्थर में महादेव की कल्पना एक भूल है। काल ने श्वेतमुनि को पाश में बांध लिया।मुनि ने कहा कि ये तुम्हारी भूल है। महादेव तो कण कण में व्याप्त हैं। विश्वास के साथ उनका आवाहन करने पर वे अपने भक्त की रक्षा करने आते हैं। तभी भगवान शिव माता पार्वती के साथ वहां प्रकट हो गए। उन्होंने काल को चेताते हुए कहा कि ठहरो! श्वेतमुनि का बात सत्य है। उनका प्रकट होना विश्वास के ही अधीन है। भगवान शिव को देखकर काल प्राणहीन समान हो गया। वह शक्तिहीन हो गया। श्वेतमुनि भगवान शिव की स्तुति करने लगे। इस महादेव ने कहा कि आपकी लिंग उपासना धन्य है। विश्वास की विजय होती है। नंदी के निवेदन करने पर महाकाल शिव ने काल को प्राण दान दे दिया और वे वहां से अंतर्धान हो गए।

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महाभारत के सबसे शक्तिशाली अस्त्र सुदर्शन चक्र से जुडी कुछ रोचक कथा

सुदर्शन चक्र पौराणिक कथाओं (Pauranik Katha) के अनुसार ऐसा अस्त्र है जो विरोधी के हर वार को विफल कर देता था ऐसा अस्त्र जो अभेद और अपना कार्य  को  पूरा करने के बाद ही वापस आता था । आखिर महाभारत के बाद सुदर्शन का क्या हुआ और अब सुदर्शन चक्र कहां है और भगवान विषणु जी को यह अस्त्त्र कैसे प्राप्त हुआ था। अखिर भगवान विषणु जी को सुदर्शन चक्र कैसे प्रप्त हुआ दरअसल सुदर्शन चक्र भगवान विष्णु का अस्त्र था और इसे उनके ही अवतार धारण कर सकते थे । यह अस्त्र एक साथ कई कार्य कर सकता था इसके निर्माण के पीछे भी कई अलग-अलग मान्यताएं है । शिव पुराण के अनुसार एक बार भगवान विषणु कैलाश पर्वत पर चले गए और वहां पहुंचकर वह विधि पूर्वक शिव की तपस्या करने लग गए । श्री विष्णु भगवान ने कई हजार नामों से शिवजी की स्तुति कर तथा प्रत्येक नाम उच्चारण के साथ एक कमल पुष्प शिवज को अर्पण करते थे ।  भगवान विष्णु की उपासना कई वर्षों तक निर्वात चलती रही एक दिन भगवान शिव परमात्मा ने विष्णु की भक्ति की परीक्षा लेनी चाही । भगवान विष्णु हर बार की तरह एक कमल पुष्प शिव को अर्पण करने के लिए लेकर आए तब भगवान शिव ने एक कमल पुष्प कहीं छुपा दिया । शिव माया के द्वारा इस घटना का पता भगवान विष्णु को भी नहीं लगा उन्होंने गिनती में एक पुष्प कम पाकर उसकी खोज आरंभ कर दी ।   श्री भगवान विष्णु ने पुरे ब्रह्मांड का भ्रमण कर लिया परंतु उन्हें वह पुष्प नहीं नहीं मिला । तत्पश्चात भगवान विष्णु एक कमल के बदले अपना एक नेत्र उस स्थान अर्पित कर दिया ।   भगवान विष्णु के इस त्याग से खुश होकर भगवान शिव प्रकट हो विष्णु भगवान को सुदर्शान चक्र कि भेट करते है। बोलते है यह चक्र सृष्टि संचालन के कार्य के लिए उपयोग में आएगी । अन्य पुराणों के अनुसार यह बताया गया है कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने सूर्य की अभेद राख से उन्होंने तीन चीजों का निर्माण किया था पहला पुष्पक विमान, त्रिशूल और सुदर्शन चक्र । जबकि ऋग्वेद के अनुसार सुदर्शन चक्र का वर्णन अलग ही तरह से किया गया है इसमें सुदर्शन चक्र को समय का चक्र बताया गया है कि वह समय को भी माप सकता था सुदर्शन चक्र से ही भगवान विष्णु ने माता सती के पार्थिव शरीर के 51 हिस्से किए थे महाभारत काल में भी श्री कृष्णा ने शिशु पाल का वध सुदर्शान चक्र से ही किया था । महाभारत में जब अर्जुन ने जब जयद्रत को सूरज ढलने से पहले मारने  का वचन लिया जब श्री कृष्ण ने  सुदर्शन चक्र से ही सूर्य को ढक लिया था लेकिन इसके बाद सुदर्शन चक्र का कोई भी कोई वर्णन नहीं मिलता । आखिर जब श्री कृष्ण ने देह त्याग किया तब सुदर्शान चक्र का क्या हुआ ? इसका जवाब हमें भविष्य पुराण में मिलता है जिसमें बताया गया है कि सुदर्शन चक्र को भगवान विष्णु या उनके अवतार के सिवा ना ही कोई धारण कर सकता है और न ही कोई चल चला सकता है जब श्री कृष्ण ने देह त्याग किया सुदर्शन चक्र वही धरती में समा गया और भविष्य में जब कल्कि अवतार जन्म लेंगे तब वही सुदर्शन चक्र को दोबारा पृथ्वी गर्भ से ग्रहण करेंगे । कलयुग के अंत के समय जब बुराई अपनी चरम पर होगी तब भगवान परशुराम और हनुमान कलकी अवतार में आएंगे और उन्हें प्रशिक्षण देंगे तब युद्ध में कल्कि अवतार सुदर्शन चक्र को धारण कर उसका उपयोग करेंगे जिससे वह बुराई अंत कर देंगे। परंतु हम ऋग्वेद में बताएं जल चक्र का वर्णन देखें तो सुदर्शन चक्र ऐसा अस्त्र नहीं था जैसा हम समझते हैं । उसमें बताया गया है सुदर्शन चक्र समय के चक्र को कहा गया है । इसी का इस्तेमाल भगवान विष्णु करते हैं समय के अंतराल का उपयोग कर वह किसी बी विरोधी को शक्तिहीन कर देते हैं । महाभारत में भी जब श्री कृष्ण ने अर्जुन को विराट रूप दिखाया था तब सुदर्शन चक्र के इस्तेमाल से ही समय को रोक दिया था तब रुके हुए समय में ही श्री कृष्ण अर्जुन को गीता का पूरा ज्ञान दिया था अगर हम ऋग्वेद के ज्ञान से समझें तो सुदर्शन चक्र कोई भौतिक अस्त्र था ही नहीं जो कोई और देख या धारण कर सके यह सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु का अवैध गुण है जो हमेशा उनके और उनके अवतारों के साथ रहेगा। तो दोस्तों कैसे लगी आपको यह पौराणिक कथा (Pauranik Katha) Comment box मे कमेंट कर बातायें ।

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भगवान् परशुराम ने क्यों किया था महाबली सहस्त्रबाहु का वध

एक बार सहस्त्रबाहु अर्जुन अपनी सेना के साथ जंगल में ब्रह्मण के लिए गए होते है। उसी जंगल में परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि का आश्रम भी रहता है । सहस्त्रबाहु अर्जुन जंगल में विश्राम करने लिए लिए जमदग्नि के आश्रम देख अपनी सेनाओ के साथ आश्रम की और चल देते है । आश्रम पहुंचने के बाद ऋषि जमदग्नि सहस्त्रबाहु अर्जुन और उनकी सेनाओ का खूब सेवा सत्कार करते है और अपनी कामधेनु गाय की सहायता से उनका और उनकी सेनाओ के लिए राजसी भोजन की व्यवस्था भी करते है। ऋषी जग्मद्नी द्वारा सहस्त्रबाहु और उनके सानिको का इत्नी जल्दी राजसी भोजन की व्यव्स्था देख अचम्भित हो जाते है और सोचने लगते है की इतनी जल्दी और वो भी राजसी भोजन का प्रबनध एक साधरण ऋषि मुनि कैसे कर सकता है। जरूर इसके पास कोई रहस्य है। सहस्त्रबाहु ऋषि जग्मद्नी से यह सभी व्यवस्था करने का राज पूछते है । चमत्कारी कामधेनु गाय को बालपूर्वक ले जाते है ऋषि जगमदनी सहस्रबाहु अर्जुन को अपनी गाय कामधेनु के बारे में बातते हुए कहते है की महाराज यह सब इस गाय की कृपा है। कामधेनु गाय को देख और उसकी इस चमत्कार से प्रसन्न उस पर मोह जाते है और ऋषि जमदग्नि से कामधेनु गाय को अपने साथ ले जाने की इच्छा जाहिर करते है। परन्तु ऋषि जग्मद्नी कामधेनु गाय को ले जाने से इंकार कर देते हैं। ऋषि जग्मद्नी द्वारा मना करने पर सहस्रबाहु क्रोधित हो जाते है और बलपूर्वक काम धेनु गाय को अपने साथ ले जाते है। अपने पिता के अपमान सुन परशुराम क्रोधित हो उठते है कुछ समय बाद परशुराम जब आश्रम आते तो उन्हें उनके पिता घटना के बारे में बताते है और यह सुन परशुराम अत्यंत क्रोधित हो उठते और अपना फ़ारसु उठा सहस्रबाहु के नगर महिस्मती की और चल देते हैं। सहस्रबाहु कामधेनु और अपनी सेनाओ के साथ रास्ते में ही होते है । सहस्रबाहु परशुराम को अपनी ओर त्रीव गति से आते हुए देख अपनी सेनाओ को परशुराम को रोकने का आदेश देते है। सहस्रबाहु की सेना परशुरराम को रोकने के लिए उनके पास आती है पर कुछ पालों मे ही परशुराम हजारो सेनिको के रक्त से युद्ध भूमि को लाल कर देते है । अपनी सेनाओ का नष्ट होता देख सहस्रबाहु अर्जुन स्वयं परशुराम से युद्ध करने के लिए आ जाते हैं और घनघोर युद्ध प्रारम्भ हो जाता है। सहस्रबाहु का वध परन्तु सहस्रबाहु के लिए परशुराम के समक्ष टिक पाना असंभव ही था सहस्रबाहु जब अपनी हजारो भुजाओ से परशुराम को जकड़ने के लिए आगे बढते है तो परशुराम अपनी परसु से उनकी एक एक कर सभी भुजाओ को काट उसका सर धड़ से अलग कर डालते है । सहस्रबाहु अर्जुन वध के बाद भगववान परशुराम अपनी कामधेनु गाय को लेकर अपने पिता को सौप देते है। ऋषि जग्मद्नी अपने गाय को देख काफी प्रसन्न हो जाते है और अपने पुत्र परशुराम को गले लगाकर उन्हें आशीर्वाद देते है। क्यों परशुराम पृथ्वी को 21 बार क्षत्रिय विहीन करते है कहा जाता है जब सहस्रबाहु के पुत्रों ने अपने पिता का प्रतिशोध लेने के लिए परशुराम के पिता का छल पूर्वक वध कर देते है। जब जमदन्गि का वध हो जाता है तो उनकी पत्नी रेणुका भी उनके साथ अग्नि में लीन हो जाती है। इस घटना से परशुराम अति क्रोधित हो सहस्रबाहु के पुत्रों का वध कर देते है और साथ ही महिस्मती राज्य को भी उजाड़ डालते है और पृथ्वी से 21 बार सभी क्षत्रियों का नाश कर पृथ्वी को क्षत्रियविहीन करने के बाद परशुराम एक बड़े पर्वत पर जा भगवान् शिव के ध्यान में लीन हो जाते है।

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क्यों काटा था भगवान परशुराम ने अपनी ही माँ का सिर

पुराणों के अनुसार भगवान परशुराम को श्री हरि विष्णु के अवतार माना गया है। भगवान विष्णु का यह सबसे क्रूर अवतार था। शिव जी द्वारा प्राप्त परशु के कारण ही उनका नाम परशुराम पड़ा था। परशुराम महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका की संतान थे। परशुराम उनके सबसे छोटे कर लाडले पुत्र थे पांचो भाइयों में परशुराम ही सबसे तेजस्वी और न्याय पूर्ण योद्धा थे।  धरती पर उनके जैसा योद्धा कोई नहीं था। परशुराम अपने माता-पिता के सबसे लाडले और आज्ञाकारी पुत्र होते हुए भी उन्होंने माता का सिर काट दिया था आखिर उन्होने ऐसा कठोर कदम क्यों लेना पड़ा ऐसा क्या कारण था जो उनकी माता के जीवन से भी बढ़कर था। आगे हम इसके बारे में विस्तारपूर्वक पड़ेंगे। परशुराम के पिता जगमदनी बड़े ज्ञानी और तपस्वी थे उन्हें सभी प्रकार की सिद्धियों का ज्ञान था।  परशुराम अपने पिता की आज्ञाकारी पुत्र थे और पिताजी की हर आज्ञा को पत्थर की लकीर मान हर हाल में पूर्ण करते थे। माता रेणुका से हो गई थी यह एक भूल और महर्षि जमदग्नि हुए क्रोधित एक बार की बात है ऋषि जग मदनी के स्नान के लिए पत्नी रेणुका नदी में पानी लेने के लिए गई वही कुछ दूरी पर राजा चित्र भी स्नान कर रहे थे। राजा चित्ररथ को देख वह काफी समय तक वह उन्हें ही स्नान करते देखती रही। उनका मन विचलित हो गया और भूल गई कि उन्हें अपने पति के लिए स्नान का पानी ले जाना था। काफी समय हो गया महर्षि जमदग्नि पत्नी रेणुका की प्रतीक्षा में बैठे उनका इंतजार करते रहे। जब पत्नी रेणुका आश्रम पहुंची तो ऋषि जगमदनी ने अपनी ध्यानशक्ति से उनके देर में आने का कारण ज्ञात करना चहा इससे उन्हें सब ज्ञात हो गया और महाऋषि जगमादनी अपनी पत्नी पर क्रोधित हो उठे। पिता ने दया चारो पुत्रों को दिया अपनी ही माँ का सर काट देने का आदेश उसी समय उनके चारो पुत्र रघुवंशी शुरू वस्तु और विश्वासों भी आश्रम आ गए  थे। महर्षि जमदग्नि ने अपने चारों पुत्रों को बारी-बारी से अपनी मां का वध करने को कहा पर किसी ने भी माँ की मोहा वश ऐसा करने का हिम्मत नहीं जुटा पाए। किसी ने भी पिता की आज्ञा को नहीं माना और सभी पीछे हट गए क्योंकि हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार किसी भी स्त्री की हत्या को बहुत बड़ा पाप माना गया है और यही अपनी ही मां का वध करने की बात थी लेकिन पिता आज्ञा का विरोध करना भी एक बड़ा अपराध है। चारों पुत्र समझ नहीं पा रहे थे क्या करना उचित होगा जब ऋषि के चारों पुत्रों ने उनकी आज्ञा को नहीं माना तो अपने चारों पुत्रों को चेतना बुद्धि और विचार नष्ट होने का शार्प दे दि। परशुराम ने ही अपने पिता के आदेश क्यों माना वही थोड़ी देर में परशुराम भी आश्रम आ गए । परशुराम को देख महर्षि जमदग्नि ने उन्हें अपनी मां की और अपने चारों भाइयों का वध करने का आदेश दिया । अपनी पिता की आज्ञा पाकर उन्होंने अपनी माता और चारों भाइयों का वध कर डाला यह देख ऋषि जगमग काफी प्रसन्न हुए और परशुराम से वर मांगने के लिए कहा । परशुराम जानते थे कि उनके पिता बहुत बड़े ज्ञानी हैं और सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त हैं । उन्हें अपने पिता की बातों से पूर्ण से अवगत था कि वह अपने पिता के आदेश मानेंगे तो उनके पिताजी उन्हें मुंह मांगा वरदान देंगे । इसलिए उनके पिताजी जब उनसे वरदान मांगने को कहते हैं तो परशुराम ने अपनी मां का और अपने चारों भाइयों को पुनर्जीवित करने का वरदान मांगते है। इससे उनके पिता ने उनकी इच्छा मान माता रेणुका और चारों भाइयों को जीवित हो गए इस तरह परशुराम ने अपने पिता की आज्ञा भी मानी और अपनी माता और भाइयों को जीवित भी करा लिया। परशुराम ने अपनी पुनः जीवित माँ हत्या पाप के लिया किया पारयश्चित परन्तु माता तो पुण्य जीवित हो गई पर उन पर अपनी मां हत्या का पाप चढ़ गया  इस पाप से मुक्ति पाने के लिए परशुराम एक पर्वत पर शिव आराधना करने के लिए चले गए। कई वर्षों की कठोर तपस्या से प्रसन्न शिवजी ने उनके समक्ष आ गए और उन्हें मृत्यु कुंडली के जल में स्नान करने के आदेश दिया तभी वह अपनी माता के बाप से मुक्त हो पाएंग परशुराम ने शिवजी कहे अनुसार ऐसा ही किया और अपने माता हत्या के पाप से मुक्ति प्राप्त की यह मृत्यु गुंडे हो वर्तमान राजस्थान के चित्तौड़ जिले में है स्थित है इस स्थान को मेवाड़ के तीर्थ स्थल भी कहा जाता है इस स्थान से कुछ दूरी पर एक पहाड़ी पर भगवान शिव जी का मंदिर जिसे परशुराम जी ने खुद अपने परसों से काटकर बनाया था ।

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भगवान श्री कृष्ण ने अभिमन्यु को चक्रव्यूह से क्यों नहीं बचाया था

दोस्तों महाभारत कथा से तो आप भली-भांति परिचित होंगे ही महाभारत युद्ध क्यों और कैसे और किन योद्धाओं में लड़ा गया था यह तो आपको पता ही होगा और भगवान श्री कृष्ण ने किस का साथ दिया था। लेकिन इसमें कई ऐसे योद्धाओं से जुड़े कई रोचक तथ्य और रहस्य भी हैं। जिन्हें आप को जानना चाहिए ऐसे ही एक पौराणिक कथा (Pauranik Katha, dharmik kahani) अभिमन्यु से भी जुड़ी है इस रोचक कथा के बारे में हम नीचे विस्तारपूर्वक बताएंगे। अर्जुन और सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु को तो आप लोग जानते ही होंगे की महाभारत युद्ध मे अभिमन्यु वीरगति को प्राप्त हो गए थे। लेकिन बहुत से लोगों के मन में यह प्रश्न अवश्य होता होगा कि आखिर सर्वशक्तिमान श्री कृष्ण ने अपनी ही बहन सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु को क्यों नहीं बचाया था। जबकि अर्जुन और पांचों पांडवों की युद्ध के अंत तक उनके रक्षा कवच बने रहे थे तो अभिमन्यु को क्यों मर जाने दिया अगर चाहते तो लीलाधारी भगवान श्री कृष्ण अपने सुदर्शन चक्र भेज अभिमन्यु को चक्रव्यूह से बाहर ले आते और अभिमन्यु का वध नहीं हो पाता परंतु श्री कृष्ण ने ऐसा नहीं किया। इसलिए कारण नहीं बचाया श्रीकृष्ण ने अभिमन्यु को कहां जाता है जब भी धरती पर धर्म और सत्य की हानि होने लगे तो भगवान को नियति के अनुसार धरती से अधर्मियों और अत्याचारियों का नाश करना होता है और इस उद्देश्य हेतु भगवान स्वयं धरती पर जन्म लेते हैं और उनके इस उद्देश्य में सहायता हेतु विभिन्न देवी-देवताओं को भी अपने पुत्र को भेज या स्वयं जाकर धरती पर जन्म लेना होता है। ऐसा ही जब द्वापर युग में भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण अवतार में जन्म लिया था तब ब्रह्मा जी ने और सभी देवी देवताओं को भी श्रीकृष्ण की सहायता हेतु धरती पर जन्म लेने का आदेश दिया था। किसने किया था ब्रह्मा जी के आदेश का विरोध ? ब्रह्मा जी के इस आदेश का सभी देवी देवताओं ने स्वागत किया था । परंतु चंद्रमा ने इस आदेश का विरोध किया और अपने पुत्र वरचा को पृथ्वी पर जन्म लेने से इनकार कर दिया। लेकिन जब सभी देवताओं ने मिलकर चंद्रमा को समझाया कि धर्म की रक्षा करना ही हम देवताओं का परम कर्तव्य और धर्म है । इसलिए हम सभी को ब्रह्मा जी का आदेश का पालन करना है यह हमारा दायित्व और कर्तव्य भी है। चन्द्रमा के इस शर्त के कारण ही अभिमन्यु को मरना पड़ा सभी देवताओं के समझाने पर चंद्रमा मान तो गए पर फिर भी उन्होंने एक शर्त भी रख दी कि यदि मेरा पुत्र धरती पर जन्म लेगा तो वह ज्यादा दिनों तक धरती पर नहीं रुकेगा और महाभारत युद्ध में अपना कार्य समाप्त होते ही वह मेरे पास लौट आएगा। इसके साथ ही वह युद्ध में अपने पराक्रम से बड़े-बड़े महारथियों को भी चकित कर खोर युद्ध लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होगा और उसके इस अदम्या साहस को युगो युगो तक याद रखा जाएगा। दोस्तो चंद्रमा पुत्र “वरचा” ही अभिमन्यु थे जिसने धरती पर ब्रह्मा के आदेश का पालन कर श्री कृष्ण की सहायता के लिए जन्म लिया था। चंद्रमा के शर्त अनुसार ही श्री कृष्ण ने अभिमन्यु की नियति में दखल नहीं दिया और अभिमन्यु महाभारत युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो अपने पिता चंद्रमा के पास चले गए।

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सहस्त्रबाहु अर्जुन द्वारा अहंकारी रावण को बंधी बनाना

सहस्रबाहु अर्जुन एक पराकर्मी और शूर वीर योद्धा थे । भगवान् द्वारा उन्हें हर प्रकार की सिद्धियां प्राप्त थी और वायु की गति से पूरे संसार में कोई भी रूप धारण कर जब चाहे विचरण कर सकते थे। पुराणो के अनुसार शास्त्र बाहु ने महाराज हेय की 10वी पीढ़ी मात पद्मनी और महाराज कृतवीर्ये के परिवार में हुआ था। चन्द्रवंश कृतवीर्ये के पुत्र होने के कारण इन्हे कृतवीर्ये अर्जुन के नाम से भी जाना जाता था। इसके आलावा पुराणों और ग्रंथो मे हैहयाधिपति, सहस्रार्जुन, दषग्रीविजयी, सुदशेन, चक्रावतार, सप्तद्रवीपाधि, कृतवीर्यनंदन, राजेश्वर आदि आदि के नामों का भी वर्णन है। कृतवीर्ये अर्जुन का उल्लेख कई वेद, वाल्मीकि रामयण, महाभारत जैसे कई हिन्दू धर्म ग्रंथो में भी मिलता है । भगवान् विष्णु पुराण के अनुसार कृतवीर्ये -अर्जुन की उत्पाती श्री हरी विष्णु और माता लक्ष्मी द्वारा हुई है। धार्मिक कथाओं और ग्रंथो के अनुसार सहस्रबाहु अर्जुन विष्णु के दसवे अवतार दत्तात्रेय के उपासक थे और अपनी कठोर तपस्या वा भक्ति आराधना से भगवान् दत्तात्रेय को प्रसन्न क्र उनसे 10 वरदान प्राप्त किये थे । जिसमे उन्हें हजार भुजाओ का वरदान भी मिला था और तभी से इनका नाम सहस्रबाहु अर्जुन व बाहुबली भी कहा जाने लगा था। दत्तात्रेय दावरा वरदान पाने के बाद सहस्रबाहु महिस्मती नगरी के चक्रवर्ती सम्राट बन गए थे.. वर्तमान में यह नगरी मध्य प्रदेश में महसेवर नाम के नाम से जाना जाता है। मध्य प्रदेश के वर्तमान शहर माहेश्वर में सहस्रबाहु राजेस्वर नाम का भव्य मंदिर भी है जहा प्रतिवर्ष कार्तिक मॉस की शुक्लपक्ष की सप्तमी तिथि को सहस्रबाहु की जयंती मनाई जाती है जो दीवाली के ठीक बाद पड़ती है । सहस्रबाहु अर्जुन की जयंती के समय महेस्वर नगर में उत्सव जैसे माहोल रहता है और कई दिनों तक उनकी पूजा अर्चना भी की जाती है। जो एक बड़े भंडारे के साथ समाप्त होता है। सहस्रबाहु के मंदिर के बीचो बीच शिवलिंग वा राजेश्वर सहस्त्रबाहु जी की समाधि है। जहा लगभग 500 वर्षो से घी के दीपक अखंड प्रज्वलती है। रावण जब पहुंचा सहस्त्रबाहु अर्जुन को हराने हिन्दू शास्त्रों के अनुसार एक बार रावण सहस्रबाहु को हारने की इच्छा से उसके नगर महिस्मती पहुँच गया जो नर्मदा नदी के तट पर बसा हुआ था । रावण नर्मदा नदी के तट पर पहुंच अपनी शक्तियों को बढ़ने के लिए भगवान् शिव की आराधना करने लगा। वही कुछ दूरी पर सहस्रबाहु भी अपनी रानियों के साथ नदी मे जलविहार कर रहे थे और जल विहार करते समय सहस्रबाहु ने अपनी हजारो भुजाओ से नर्मदा नदी के पानी के प्रवाह को रोक दिया। जिससे एक तरफ पानी का जल स्तर बढ़ने लगा अचनाक नदी में पानी जल स्तर बढ़ने से तट के किनारे बना रावण का शिवलिंग भी बह गया । यह देख रावण ने अपने सैनिको को नदी का यू  अचानक जल स्तर बढने का कारण पता लगाने के लिए भेजा। रावण और सहस्त्रबाहु अर्जुन का भयंकर युद्ध जब सैनिको ने रावण से आकर नदी के पानी रुकने की बात बताई तो । रावण क्रोधित हो सहस्रबाहु को युद्ध के लिए ललकारने लगा। इधर सहस्रबाहु भी एक प्रकर्मी योद्धा । रावण द्वारा बार बार ललकारने पर वह भी रावण के समक्ष उपस्थित हो गया और देखते ही देखते दोनों योद्धाओ के बीच महा युद्ध छिड़ गया दोनों के बीच युद्ध बराबरी का हो रहा था । यह महा युद्ध कई दिनों तक चला अंत म सहस्रबाहु अर्जुन ने इस युद्ध से क्रोधित हो अपने विशाल और विकराल रूप मे आ गया। सहस्रबाहु अर्जुन के विकराल रूप के सामने रावण बोना सा प्रतीत हो रहा था । सहस्रबाहु ने रावण को अपनी हाजरो भुजाओ में जकड लिया। रावण ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी फिर भी वह आजाद नहीं हो पाया। सहस्रबाहु ने रावण को बंधी बना अपने कारागार में डाल दिया । लेकिन बाद मे रावण के दादा महर्षि पुलत्श्य ने शास्त्र बहु से रावण को छोड़ने का आग्रह किया और सहस्रबाहु ने रावण को आजाद कर दिया। अंत में रावण ने सहस्रबाहु से मित्रता कर लंका लौट गया।

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भगवान श्रीकृष्ण से पहले देवी योगमाया ने यशोदा मैया के गर्भ से लिया था जन्म, एक ही दिन मनाया जाता है जन्मोत्सव

महारास प्रसंग के समय रास पंचाध्यायी के प्रथम श्लोक में श्री शुकदेव जी कहते हैं- “योगमायामुपाश्रिता” अर्थात योगमाया का ही आश्रय ग्रहण कर भगवान श्रीकृष्ण ने महारास की इच्छा की. देश-दुनिया में आज धूमधाम से श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जा रहा है. भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी योगेश्वर श्रीकृष्ण के प्राकट्य के साथ-साथ उनकी योग शक्ति योगमाया के प्राकट्य का भी दिन है. लीला पुरुषोत्तम की समस्त लीलाएं जन कल्याण के लिए होती हैं और आद्यशक्ति योगमाया उन लीलाओं का संपादन करती हैं. देवी योगमाया का अवतार श्री कृष्ण के अवतार के साथ ही होता है. देवकी के गर्भ में आने से पूर्व ही भगवान कृष्ण, योगमाया से कहते हैं- हे देवी जब मैं वसुदेव-देवकी के पुत्र के रूप में जन्म लूंगा, उस समय आप भी नंद-यशोदा की पुत्री के रूप में जन्म लेना.” कहा जाता है कि देवी योगमाया का जन्म, भगवान कृष्ण से पहले हुआ था. ऐसे में वे उनकी बड़ी बहन थीं. इन नामों से जानी जाती हैं देवी योगमाया महारास प्रसंग के समय रास पंचाध्यायी के प्रथम श्लोक में श्री शुकदेव जी कहते हैं- “योगमायामुपाश्रिता” अर्थात योगमाया का ही आश्रय ग्रहण कर भगवान श्रीकृष्ण ने महारास की इच्छा की. यही देवी योगमाया लोक में भद्रकाली, दुर्गा, वैष्णवी, कुमुदा, चंडिका, कृष्णा, वृंदा, विजया, माधवी, कन्या, माया, नारायणी, अंबिका, शारदा इत्यादि नामों से विख्यात हुईं. आज अनेक स्थानों पर इनकी पूजा की जाती है. देवी भागवत महापुराण बाराह पुराण आदि ग्रंथों से यह स्पष्ट होता है कि एकानंशा अथवा महामाया अथवा योगमाया ही भगवान श्री कृष्ण की बहन हैं. यह योगमाया ही यादवों की कुल देवी के रूप में उनकी उपास्य रही हैं. मथुरा एवं आसपास के क्षेत्रों में खुदाई के दौरान मिली एकानंशा के साथ-साथ सप्तमातृका की मूर्तियों का मिलना ब्रज में शक्ति की साधना को सिद्ध करता है. वृंदावन में योग माया मंदिर वृंदावन में प्राचीन श्री गोविंद देव मंदिर के नीचे नींव में योगमाया अथवा पाताल देवी का मंदिर स्थित है. यह सिद्ध देवी हैं. इस मंदिर के द्वार केवल नवरात्रों में ही दो बार श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खुलते हैं. बाकी दिनों में मंदिर के सेवायत ही देवी की पूजा-अर्चना करते हैं. ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा में आने वाले गांव देवी आटस में भी प्राचीन योगमाया देवी का मंदिर है. यहां भी नवरात्रों में छठ मेले का आयोजन किया जाता है. योगमाया ब्रज के विभिन्न स्थलों पर अनेक नामों से पूजा-अर्चना होती है.

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विक्रम बेताल की अंतिम कहानी: भिक्षु शान्तशील की कथा

चौबीस बार लगातार प्रयास करने के बाद, आखिरकार राजा विक्रमादित्य शव को श्मशान ले जाने में कामयाब हो जाते हैं और बेताल शव को त्याग देता है। आगे जानिए क्या हुआ जब राजा विक्रमादित्य शव को लेकर योगी के पास पहुंचे। राजा विक्रमादित्य और उसके कंधे पर शव को देखकर योगी बहुत खुश हुआ। उसने खुशी जताते हुए राजा से कहा, “हे राजन, आपने इस मुश्किल काम को करके यह साबित कर दिया कि आप सभी राजाओं में सबसे श्रेष्ठ हैं।” यह कहते हुए उसने राजा के कंधे से शव को उतारा और उसे तंत्र साधना के लिए तैयार करने लगा। जब तंत्र साधना हो गई तो उसने राजा से कहा, “हे राजन, अब आप इसे लेटकर प्रणाम करें।” इतना सुनते ही राजा को बेताल की बात याद आ गई। उसने योगी को कहा, “मुझे ऐसा करना नहीं आता, इसलिए आप मुझे पहले करके बता दें, फिर में ऐसा कर लूंगा।” जैसे ही योगी प्रणाम करने के लिए झुका, राजा ने उसका सिर काट दिया। यह सब देखकर बेताल बहुत खुश हुआ और बोला, “राजन यह योगी विद्वानों का राजा बनना चाहता था, लेकिन अब तुम बनोगे विद्वानों के राजा। मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया, अब तुम्हें जो चाहिए मांग लो।” यह सुनते ही राजा ने बोला, “अगर आप खुश हैं तो मैं यही चाहता हूं कि आपने जो मुझे चौबीस कहानियां सुनाई हैं, उनके साथ यह पच्चीसवीं कहानी भी पूरी दुनिया में मशहूर हो जाए और हर कोई इन्हें आदर के साथ पढ़ें।” बेताल ने यह सुनते ही कहा, “जैसी आपकी इच्छा, ऐसा ही होगा, ये कहानियां ‘बेताल-पच्चीसी’ के नाम से जानी जाएंगी और जो भी इन्हें ध्यान से पढ़ेगा या सुनेगा, उनके पाप खत्म हो जाएंगे।” इतना कहकर बेताल चला गया और उसके जाने के बाद शिवजी ने राजा को दर्शन दिए। शिवजी ने प्रकट होकर राजा से कहा, “तुमने इस दुष्ट योगी को मारकर एक अच्छा काम किया है। अब तुम जल्द ही सात द्वीपों समेत पाताल और पृथ्वी पर राज करोगे। जब तुम्हारा इन सभी चीजों से मन भर जाए, तो तुम मेरे पास चले आना।” इतना कहकर शिवजी वहां से चले गए। इसके बाद राजा अपने नगर गए और वहां जब सब को राजा की वीरता के बारे में पता चला तो सभी ने राजा की प्रशंसा की और खुशियां मनाई। कुछ ही वक्त बाद राजा विक्रमादित्य धरती और पाताल के राजा बन गए। जब उनका मन भर गया, तो वे भगवान शिवजी के पास चले गए। समाप्त कहानी से सीख: बुराई की कभी जीत नहीं होती है। अगर व्यक्ति का मन साफ हो और उसमें धैर्य हो, तो उसे हर जगह मान-सम्मान मिलता है।

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विक्रम बेताल की चौबीसवीं कहानी: रिश्ता क्या हुआ?

विक्रम और बेताल रिश्ता क्या हुआ, बेताल पच्चीसी – चौबीसवीं कहानी राजा विक्रमादित्य कई प्रयासों के बाद बेताल को एक बार फिर पकड़ लेते हैं और श्मशान की ओर चल लेते हैं। हर बार की तरह इस बार भी बेताल नई कहानी सुनाना शुरू करता है। बेताल कहता है…. बहुत समय पहले की बात है। एक राज्य पर मांडलिक नामक का राजा का शासन था। उसकी एक सुन्दर पत्नी और लड़की थी। राजा की पत्नी का नाम चडवती और बेटी का नाम लावण्यवती था। जब लावण्यवती बड़ी हुई और उसके विवाह का समय हुआ, तो राजा मांडलिक के करीबियों ने चुपके से उसका राज्य हड़प लिया और राजा को उसके परिवार के साथ राज्य से बाहर कर दिया। राजा अपनी पत्नी और बेटी के साथ मालव देश की ओर चल दिया, जो उसकी पत्नी चडवती के पिता का राज्य था। चलते-चलते जब रात हो चली, तो उन्होंने वन में ही रात गुजारने का फैसला किया। राजा ने पत्नी और बेटी से कहा कि तुम जाकर कहीं छिप जाओ, क्योंकि यहां पास में भीलों का इलाका है। वह रात को तुम लोगों को परेशान कर सकते हैं। राजा की बात पर पत्नी चडवती और बेटी लावण्यवती वन में जाकर छिप जाती हैं। उसी समय भील राजा पर हमला कर देते हैं। राजा बड़ी बहादुरी से भीलों से लड़ता है, लेकिन अंत में मारा जाता है। भीलों के जाने के बाद जब पत्नी चडवती और बेटी लावण्यवती बाहर आती है, तो वो राजा को मरा हुआ पाती हैं। राजा के शव को देख दोनों बहुत दुखी होती हैं। दोनों मां-बेटी राजा की मौत का शोक मनाते हुए एक तलाब के किनारे जा पहुंचती हैं। तभी चंडसिंह नाम का एक साहूकार अपने बेटे के साथ वहां से गुजरता है। उसे रास्ते में दो महिलाओं के पैरों के निशान दिखाई देते हैं। यह देखकर साहूकार ने अपने बेटे से कह, “अगर ये स्त्रियां मिल जाएं, तो जिससे चाहो तुम शादी कर लेना।” पिता की यह बात सुनकर बेटा कहता है, “पिता जी छोटे पैर वाली उम्र में भी कम होगी। इसलिए, मैं छोटे पैर वाली से ही शादी करूंगा। आप बड़े पैर वाले से शादी कर लेना।” साहूकार की शादी करने की इच्छा नहीं थी, लेकिन बेटे के बार-बार जोर देने पर वह राजी हो जाता है। वो दोनों उत्सुकता से उन पैरों के निशान वाली महिलाओं को ढूंढने में जुट जाते हैं। दोनों जब स्त्रियों को ढूंढते-ढूंढते तलाब के पास पहुंचते हैं, तो उन्हें वो सुन्दर स्त्रियां दिखाई देती हैं। साहूकार आगे बढ़कर स्त्रियों से उनका परिचय पूछता है, तो रानी चडवती सारी आप बीती साहूकार को बता देती हैं। रानी की कहानी सुनकर साहूकार दोनों स्त्रियों को सहारा देने के लिए अपने घर ले आता है। संयोग से रानी चडवती के पैर छोटे और बेटी लावण्यवती के पैर बड़े थे। इसलिए, साहूकार का बेटा रानी चडवती से और साहूकार बेटी लावण्यवती से शादी कर लेता है। उन दोनों की आगे चलकर कई संतान पैदा होती हैं। बेताल पूछता है, “बता विक्रम अब इन दोनों की संतानों का आपस में रिश्ता क्या होगा?” इस सवाल से विक्रम भी सोच में पड़ जाता है। लाख सोचने के बाद भी उसे सही जवाब नहीं सूझता। इसलिए, वह चुपचाप आगे बढ़ता रहता है। ये देखकर बेताल कहता है, “राजन, अगर तुम्हें इसका जवाब नहीं पता, तो परेशान होने की जरूरत नहीं है। मैं तुम्हारे पराक्रम और धीरज से बहुत खुश हूं। मैं इस मुर्दे से निकल जाता हूं और तुम इस मुर्दे को अपने वादे के अनुसार योगी के पास ले जा सकते हो, लेकिन याद रहे जब योगी तुम्हें सिर झुकाकर इस मुर्दे को प्रणाम करने को कहे, तो तुम उनसे कहना कि पहले आप करके दिखाएं कि कैसे करना है। जब योगी सिर झुकाएं, तो तभी अपनी तलवार से उसका सिर काट लेना। उसका सिर काटकर तुम पूरी पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट बन जाओगे। वहीं, अगर तुमने उसका सिर नहीं काटा, तो योगी तुम्हारी बलि दे देगा और सिद्धि प्राप्त कर लेगा।” इतना कहते ही बेताल ने मुर्दे का शरीर छोड़ दिया और राजा विक्रम मुर्दे का शरीर लेकर योगी के पास पहुंच जाते हैं। इसी प्रकार रिश्ता क्या हुआ विक्रम और बेताल की एक अद्भूत कथा समाप्त होती है। कहानी से सीख : बिना तथ्य को जाने किसी भी फैसले को नहीं लेना चाहिए। इससे आगे चलकर परेशानी हो सकती है।

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विक्रम बेताल की कहानी: किसका पुण्य बड़ा? – बेताल पच्चीसी तेईसवीं कहानी

रात के अंधेरे और घने जंगल में कुछ देर भटकने के बाद राजा विक्रमादित्य ने फिर से बेताल को अपनी पकड़ में ले लिया। बेताल ने हर बार की तरह कहानी सुनाने और सवालों का सिलसिला जारी रखा। बेताल ने कहानी सुनाना शुरू किया…. एक समय की बात है, मिथलावती नाम का एक नगर था। वहां गुणधिप नाम के राजा का शासन चलता था। राजा से मिलने के लिए रोजाना दूर-दूर से लोग आया करते थे। एक बार उनसे मिलने और उनकी सेवा करने के लिए किसी राज्य से एक युवक आया। युवक ने राजा से मिलने की बहुत कोशिश की, लेकिन वो राजा से मिल नहीं पाया। अपने साथ युवक जो भी सामान लाया था, वो सब भी खत्म हो गया था। एक दिन की बात है, जब राजा शिकार के लिए जंगल जाते हैं। युवक भी उनके पीछे-पीछे चला जाता है। जंगल इतना घना था कि राजा से उनके नौकर-चाकर बिछड़ जाते हैं। बस राजा और युवक साथ रह जाते हैं। जब राजा जंगल की ओर आगे बढ़ने लगते हैं, तो युवक उन्हें रोकता है। राजा उसकी तरफ देखते हुए कहते हैं, “तुम इतने कमजोर क्यों लग रहे हो।” युवक जवाब देता है, “राजन यह मेरा कर्म दोष है। मैं कई राजाओं के पास रहा हूं, जो हजारों लोगों को पालता है, लेकिन उनकी नजर कभी मुझ पर नहीं पड़ी।” अपनी बात आगे बढ़ाते हुए युवक कहता है, “राजन, छह बातें इंसान को कमजोर बनाती हैं – गलत व्यक्ति से प्रेम, बिना कारण हंसना, स्त्री से बहस करना, बुरे स्वामी के लिए काम करना, गधे पर सवारी और संस्कृत के बिना भाषा। इसके अलावा, पांच चीजें आयु, कर्म, धन, विद्या और यश व्यक्ति के जन्म के साथ ही विधाता उनके नसीब में लिख देता है। जब तक कोई पुण्य करता है, तब तक उसके पास सेवन करने के लिए बहुत से दास होते हैं। जब पुण्य कम हो जाता है, तो भाई ही भाई का दुश्मन बन जाता है, लेकिन राजन, स्वामी की सेवा का फल किसी न किसी दिन जरूर मिलता है।” युवक की इन बातों का राजा पर बहुत असर हुआ। थोड़ी देर बाद दोनों नगर को लौट आए। राजा उस युवक को नौकरी पर रख लेते हैं। कुछ दिन बाद युवक किस काम से बाहर जाता है। उसे रास्ते में एक मंदिर दिखाई देता है। वह अंदर जाता है और वहां स्थापित देवी की पूजा करता है। फिर वह बाहर आता है, तो उसे वहां एक सुंदर स्त्री दिखाई देती है। युवक उस स्त्री पर मोहित हो जाता है। वह स्त्री युवक से कहती है, “तुम पहले इस कुण्ड के पानी से स्नान करों, फिर तुम जो कहोगे वो मैं करूंगी।” स्त्री की बातें सुनकर युवक कुण्ड में उतरकर गोता लगाता है। गोता लगाते ही वह अपने नगर पहुंच जाता है। फिर वह राजा से मिलकर सारी बात बताता है। युवक की बात सुनकर राजा बोलते हैं, “मुझे भी वहां ले चलो, मैं भी यह चमत्कार देखना चाहता हूं।” फिर दोनों घोड़े पर बैठकर मंदिर की ओर चल देते हैं। मंदिर पहुंचकर वो दर्शन करते हैं और जब बाहर निकलते हैं, तो उन्हें वहां एक स्त्री मिलती है, जो राजा पर मोहित हो जाती है। स्त्री राजा से कहती है, “आप जो कहोगे मैं वही करूंगी।” यह सुनकर राजा कहता है, “ तुम इस सेवक से शादी कर लो।” राजा की बात सुनकर स्त्री कहती है, “मुझे तो आप पसंद हो।” फिर राजा उस स्त्री से कहते हैं, “सज्जन इंसान जो कहता है, उस बात को निभाता भी है। इसलिए, तुम्हें अपनी बात का पालन करना चाहिए।” फिर उस स्त्री और युवक का विवाह हो जाता है। इस कहानी को सुनाने के बाद बेताल बोलता है, “हे राजन, अब बताओं कि राजा और सेवक में किसका काम बड़ा हुआ।” राजा विक्रमादित्य ने कहा, “नौकर का काम बड़ा हुआ।” बेताल पूछता है कि कैसे? राजा विक्रमादित्य कहते हैं, “उपकार करना एक राजा का धर्म होता है, लेकिन जिसका धर्म नहीं था उसने उपकार किया है, तो युवक का काम बड़ा हुआ।” राजा का जवाब सुनने के बाद बेताल उड़कर फिर से जंगल के किसी पेड़ पर जाकर लटक जाता है। कहानी से सीख: अपने वादे से इंसान को कभी नहीं मुकरना चाहिए। सच्चे मनुष्य की पहचान यही होती है कि वो किए गए वादे को कैसे पूरा करता है। वो यह नहीं देखता कि वादा पूरा करने के लिए उसे किस चीज का त्याग करना पड़ रहा है।

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विक्रम बेताल की बाईसवीं कहानी: चार ब्राह्मण भाइयों की कथा

जब राजा विक्रमादित्य ने एक बार फिर बेताल को पकड़ा, तो उसने हर बार की तरह एक नई कहानी शुरू कर दी। बेताल ने कहानी सुनाते हुए राजा विक्रमादित्य से कहा…. कुसुमपुर नाम के एक नगर में एक ब्राह्मण परिवार रहा करता था। ब्राह्मण के परिवार में चार बेटे और उसकी पत्नी थी। ब्राह्मण अपने परिवार के साथ सुखी-सुखी जीवन बिता रहा था। एक दिन अचानक ब्राह्मण बीमार हो गया और उसकी हालत दिन-ब-दिन खराब होती चली गई। सेहत में सुधार न होने के कारण एक दिन ब्राह्मण की मौत हो गई। ब्राह्मण की मौत के दुख में उसकी पत्नी भी सती हो गई। ब्राह्मण और उसकी पत्नी की मौत के बाद उनके रिश्तेदारों ने चार लड़कों को अकेला देख उनका सारा धन छीन लिया। पूरी तरह से कंगाल होने पर चारों भाई अपने नाना के यहां रहने चले गए। कुछ दिन तक तो सब ठीक-ठाक चला। बाद में नाना के घर में भी ब्राह्मण के चारों बेटों के साथ बुरा व्यवहार किया जाने लगा। इस स्थिति को देखते हुए चारो भाइयों ने निश्चय किया कि उन्हें कोई विद्या ग्रहण करनी चाहिए, ताकि लोग उनके माता-पिता की तरह ही उनका भी सम्मान करें। यह सोचकर चारो भाई चारों दिशाओं में अलग-अलग चल दिए। चारों भाइयों ने घोर तपस्या की और फलस्वरूप कुछ विशेष विद्याएं हासिल की। जब चारों भाई काफी समय बाद मिले, तो उन्होंने एक-दूसरे को खुद के द्वारा हासिल की गई विद्या के बारे में बताया। एक ने कहा- मैं मरे हुए जीव की हड्डियों पर मांस चढ़ा सकता हूं। दूसरे ने कहा- मैं मांस पर खाल और बाल बना सकता हूं। तीसरे ने कहा- मैं मरे हुए जीव के सभी अंगों का निर्माण कर सकता हूं। चौथे ने कहा- मैं मरे हुए जीव में जान फूंक सकता हूं। सभी ने बारी-बारी हासिल की गई विद्या का गुणगान किया और एक-दूसरे की विद्या की परीक्षा लेने के लिए जंगल पहुंच गए। जंगल में उन्हें एक मरे हुए शेर की हड्डियां मिली। उन्होंने बिना जाने कि यह किस जीव की हड्डियां हैं, उन्हें उठा लिया। पहले ने अपनी विद्या से उन हड्डियों पर मांस चढ़ा दिया। दूसरे ने उस पर खाल और बाल पैदा कर दिए। तीसरे ने उस जीव के सभी अंगों का निर्माण कर दिया। अंत में चौथे ने अपनी विद्या का प्रयोग करके शेर में जान फूंक दी। शेर जीवित होते ही चारों भाइयों को मार कर खा गया। इतना कहते हुए बेताल बोला, “बता विक्रम बता इन चार पढ़े लिखे मूर्ख में सबसे बड़ा मूर्ख कौन था।” विक्रम ने जवाब देते हुए कहा, “इन चार मूर्ख में सबसे बड़ा मूर्ख चौथा भाई था, जिसने शेर में जान फूंके। वजह यह है कि अन्य ने बिना जाने ही शेर के शरीर का निर्माण किया। उन्हें पता ही नहीं था कि वह किस जीव का निर्माण कर रहे हैं। वहीं, चौथे को अच्छी तरह से पता चल चुका था कि यह शेर का ही शरीर हैं। इसके बावजूद उसने शेर के शरीर में जान डाल दी। यही उसकी सबसे बड़ी मूर्खता का प्रमाण है।” विक्रम का जवाब सुनकर बेताल बोला, “विक्रम तूने बिल्कुल ठीक जवाब दिया, लेकिन तूने मेरी शर्त तोड़ दी। मैंने कहा था कि अगल तू बोला, तो मैं वापस पेड़ पर चला जाऊंगा। इसलिए तू बोला और मैं चला। इतना कहकर बेताल एक बार फिर वहीं पेड़ पर जाकर लटक जाता है। इसी के साथ चार मूर्ख विक्रम बेताल कहानी समाप्त होती है। कहानी से सीख: बुद्धि बिना बल का प्रयोग मूर्खता की पहचान है।

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