August 2022

जब श्रीकृष्ण से नाराज़ होकर राधा रानी ने बोल दिए ये वचन

कहा जाता है सावन का महीना अपने साथ कई त्यौहार लेकर आता है। ये अपने साथ सावन  की झड़ी के साथ-साथ त्यौहारों की भी झड़ी लेकर आता है। कल यानि 15 अगस्त पूर्णिमा के दिन श्रावण के महीने का तो समापन हो जाएगा। लेकिन त्यौहारों की झड़ी अभी लगी रहेगी। इस महीने की 24 अगस्त को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। इस पर्व को श्री कृष्ण के जन्म दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन देश का माहौल बहुत ही अद्भुत होता ह। श्री कृष्ण के मंदिरों में उन्हें माक्खन खिलाने के लिए उनकी भक्तों की लंबी कतारे देखने को मिलती हैं। इसके अलावा सड़कों पर राधा-कृष्ण की झांकियां निकाली जाती हैं।जन्माष्टमी के आने से पहले आज हम आपको श्रीकृष्ण व राधा से जुड़ी एक कथा बताने जा रहे हैं। राध-कृष्ण के प्रेम की अनोखी गाथा सब जानते हैं। बल्कि कहा जाता था कि राधा-कृष्ण के केवल शरीर दो थे लेकिन उनकी आत्मा एक ही थी। एक-दूसरे से ज़रा सी भी दूरी इन्हें बर्दाश नहीं होती थी। लेकिन क्या आपको पता है कि एक बार श्री कृष्ण ने कुछ ऐसा कर दिया था कि राधा समेत सभी गोपियां उनसे नाराज़ हो गई थी। बल्कि राधा रानी ने उन्हें ये तक कह दिया था कि मुझ छूना मत। आइए जानते हैं क्या था ये किस्सा-कहा जाता है इस घटना के बाद श्री कृष्ण ने जो किया उसकी निशानी आज भी गोवर्धन पर्वत की तलहटी में कृष्ण कुंड के रूप में मौजूद है। माना जाता है राधा-कृष्ण का ये संवाद ही कुंड के निर्माण का मुख्य कारण था। राधा रानी द्वारा श्री कृष्ण को उनको स्पर्श करने से मना कर देने की वजह थी भगवान श्री कृष्ण द्वारा कंस के भेजे हुए असुर अरिष्टासुर का वध करना। शास्त्रों के अनुसार अरिष्टासुर बैल के रूप में व्रजवासियों को कष्ट देने आया था। मगर इस सब से अंजान राधा व सभी गोपियां बैल की हत्या करने के कारण श्री कृष्ण को गौ का हत्यारा मान रही थी।  जिसके बाद श्री कृष्ण ने राधा को खूब समझाने की कोशिश की उन्होंने बैल की मृत्यु नहीं बल्कि असुर का वध किया है। जब खूब समझाने के बाद भी राधा रानी नहीं मानी तो श्री कृष्ण ने जोर ज़मीन पर अपनी ऐड़ी पटकी, जिससे वहां जल की धारा बहने लगी।कहा जाता है इस जलधारा से एक कुंड बन गया। श्री कृष्ण ने सभी तीर्थों को गोवर्धन पर्वत की तलहटी में बने इस जलकुंड में आने को कहा। इनके आदेश पर सभी तीर्थ राधा कृष्ण के सामने उपस्थिति हो गए, और सभी कुंड में प्रवेश कर गए। जिसके बाद श्री कृष्ण ने इस कुंड में स्नान किया और कहा कि जो भी इस कुंड में स्नान करेगा उसे एक ही बार में सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त होगा।

जब श्रीकृष्ण से नाराज़ होकर राधा रानी ने बोल दिए ये वचन Read More »

जान‍िए, धरती पर राधा-कृष्‍ण का प्रेम कहां से और कब शुरू हुआ था?

राधा-कृष्‍ण के अलौक‍िक प्रेम को तो सभी जानते हैं। यह उनके प्रेम की ही पराकाष्‍ठा है कि चोट कान्‍हा को लगे तो पीर राधा को होती है। पुराणों में श्री राधारानी को कृष्‍ण की शाश्‍वत जीवन संग‍िनी कहा जाता है। लेकिन क्‍या आप जानते कि इस प्रेम की शुरुआत धरती पर कब और कहां से हुई? 11 माह में हुई थी कान्‍हा से पहली मुलाकात कथा मिलती है कि श्रीराधा रानी की कान्‍हा से पहली मुलाकात तब हुई थी जब वह स्‍वयं 11 महीने की थीं। तब श्रीकृष्‍ण महज एक द‍िन के थे। उस समय उनका जन्‍मोत्‍सव मनाया जा रहा था। कहा जाता है क‍ि उस समय राधाजी अपनी मां कीर्ती के साथ नंदगांव आई थीं। तब वह अपनी माता की गोद में थीं और कन्‍हैया पालने में। तो ऐसे राधाजी की गोद में पहुंच गए कान्‍हा गर्ग संहिता में उल्‍लेख मिलता है कि जन्‍मोत्‍सव के बाद कान्‍हा दूसरी बार राधाजी से तब मिले तब वह अपने पिता नंद बाबा के भांडीर वन से गुजर रहे थे। कहा जाता है कि उसी समय नंदबाबा जी के सामने एक द‍िव्‍य ज्‍योति प्रकट हुई। बताया जाता है कि जो स्वयं श्री राधारानी थीं। उन्‍होंने नंदबाबा से कहा क‍ि वह कन्‍हैया को उन्‍हें दे दें। तब नंदबाबा ने कान्‍हाजी को राधा रानी की गोद में डाल द‍िया। कहा जाता है कि यह मुलाकात लौकिक नहीं बल्कि अलौकिक थी। राधा रानी के पास जाकर त्‍याग दिया बाल रूप कथा के अनुसार, जब नंदबाबा ने राधाजी की गोद में कन्‍हैया को सौंपा तब कान्‍हा ने अपना बाल रूप त्‍याग द‍िया। कुछ ही देर में वह किशोर रूप में आ गए। उसी समय ब्रह्माजी उपस्थित हुए और उन्‍होंने कृष्‍ण-राधा का व‍िवाह संपन्‍न कराया। कथा के अनुसार कुछ द‍िनों तक राधा-कृष्‍ण एक साथ उसी वन में रहे और फिर राधारानी ने पुन: बालरूप के श्रीकृष्‍ण को नंदबाबा को सौंप द‍िया। तो यहां से शुरू हुई थी कन्‍हैया की प्रेम कहानी कहा जाता है कि वन की मुलाकात के बाद राधाजी और कान्‍हा संकेत नाम की जगह पर हुई थी। यह स्‍थान नंद गांव और बरसाना जो कि राधा जी की जन्‍मस्‍थली थी उसके बीच में है। यह एक छोटा सा गांव है। मान्‍यता है कि इसी स्‍थान पर मुरलीधर और राधा की अद्भुद प्रेम कहानी शुरू हुई थी। बता दें क‍ि हर साल भाद्र शुक्‍ल अष्‍टमी से चतुर्दशी तिथ‍ि तक संकेत गांव में राधा-कृष्‍ण के प्रेम को याद‍ किया जाता है। उनकी याद में उत्‍सव का आयोजन क‍िया

जान‍िए, धरती पर राधा-कृष्‍ण का प्रेम कहां से और कब शुरू हुआ था? Read More »

प्रेम दिवस: जानें राधा और कृष्ण की प्रेम कहानी! मिलने से लेकर बिछड़ने तक

पश्चिमी संस्कृति के अनुसार इन दिनों प्यार का सप्ताह चल रहा है। ऐसे में जरूरी नहीं है कि हर किसी के लिए प्यार का यह सप्ताह हसीन ही हो। इसमें असफलता के चलते कई बार लोग गलत कदम भी उठा लेते हैं। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए आज हम आपको राधा कृष्ण की प्रेम कहानी के बारे में बता रहे हैं, जिससे आप पहचान सकते हैं कि सच्चा प्रेम क्या होता है? इसमें राधा जो बाल गोपाल के साथ बड़ी हुईं, उनके साथ खेला, कूदा, रास रचाए, इतना ही नहीं कृष्ण ने सबसे ज्यादा बंसी राधा के कहने पर बजाई। राधा-कृष्ण का प्रेम ऐसा था जिसकी आज भी मिसाल दी जाती है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात ये है कि इतने प्रेम के बाद भी कृष्ण राधा की मिलन नहीं हुआ, उनकी शादी नहीं हुई। कुल मिलाकर इसमें प्यार है तो एक दूसरे से दूर रहना भी… इस कथा को आपके सामने रखने का मकसद केवल प्यार में बिछड़ जानें वाले को गलत कदम उठाने से रोकने का है। दरअसल हिंदू धर्म में भी राधे-श्याम या राधे-कृष्ण … ये शब्द अटूट प्रेम का हिस्सा माने जाते हैं। भले ही ये एक दूसरे के कभी हो नहीं सके लेकिन फिर भी इनका एक दूसरे के साथ ही हमेशा नाम लिया जाता है। तो चलिए जानते हैं किराधा-कृष्ण की ये प्रेम कहानी अधूरी कैसे रह गई थी?एक ओर जहां कई लोग राधा सिर्फ काल्पनिक मानते हैं, इसका कारण ये है कि भागवत जिसने भी पढ़ी है उसका कहना है कि सिर्फ दशम स्कंद में ही जब महारास का वर्णन हो रहा है वहीं एक जगह राधा के बारे में बताया गया है कि वो भी रास कर रही हैं और आनंद ले रही हैं। जबकि अलग-अलग ग्रंथों में राधा और कृष्ण की गोपियों का अलग वर्णन है। एक जगह ये भी लिखा है कि कृष्ण की 64 कलाएं ही गोपियां थीं और राधा उनकी महाशक्ति यानि राधा और गोपियां कृष्ण की ही शक्तियां थीं, जिन्होंने स्त्री रूप ले लिया था। कुछ जानकारों के अनुसार तो गोपियों को ही भक्ति मार्ग का परमहंस (जिसके दिमाग में दिन रात परमात्मा रहता है) तक कहा गया है, क्योंकि उनके मन व दिमाग में 24 घंटे कृष्ण ही रहते थे। वहीं राधा और कृष्ण के प्रेम का असली वर्णन मिलता है गर्ग संहिता में, गर्ग संहिता के रचयिता यदुवंशियों (कंस) के कुलगुरु ( जो एक तरह से कृष्ण के भी कुलगुरु हुए) ऋषि गर्गा मुनि थे। जानकारों के अनुसार गर्ग संहिता में राधा और कृष्ण की लीलाओं के बारे में बताया गया है। इस संहिता में मधुर श्रीकृष्णलीला है। जहां राधा-कृष्ण के प्रेम के बारे में बताया गया है। वहीं इसमें राधाजी की माधुर्य-भाव वाली लीलाओं का भी वर्णन है। गर्ग-संहिता में श्रीमद्भगवद्गीता में जो कुछ सूत्ररूप से कहा गया है उसी का बखान किया गया है। जानकारों का ये तक कहना है कि अगर गर्ग मुनि यदुवंशियों के कुलगुरु थे तो वे अपने सामने चल रही कृष्ण लीला में किसी काल्पनिक किरदार का चित्रण करेंगे? ऐसा मुमकिन नहीं लगता, यहीं से राधा के सत्य होने का प्रमाण मिलता है। राधा से वादा और रुकमणी से विवाह…कहा जाता है कि भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण राधा से ये वादा करके गए थे कि वो वापस आएंगे, लेकिन कृष्ण राधा के पास वापस नहीं आए और चले गए। उनकी शादी भी माता लक्ष्मी के रूप रुकमणी से हुई। कहा जाता है कि रुकमणी ने कभी कृष्ण को देखा नहीं था फिर भी उन्हें अपना पति मानती थीं। जब रुकमणी के भाई रुकमी ने उनकी शादी किसी और से करनी चाही तो रुकमणी ने कृष्ण को याद किया और कहा कि अगर वो नहीं आएंगे तो वो अपनी जान दे देंगी। इसके बाद ही कृष्ण रुकमणी के पास गए और उनसे शादी कर ली। राधा ने कृष्ण से क्या कहा?…कृष्ण के वृंदावन छोड़ने के बाद से ही राधा का वर्णन बहुत कम हो गया। राधा और कृष्ण जब आखिरी बार मिले थे तो राधा ने कृष्ण से कहा था कि भले ही वो उनसे दूर जा रहे हैं, लेकिन मन से कृष्ण हमेशा उनके साथ ही रहेंगे… इसके बाद कृष्ण मथुरा गए और कंस और बाकी राक्षसों को मारने का अपना काम पूरा किया। इसके बाद प्रजा की रक्षा के लिए कृष्ण द्वारका चले गए और द्वारकाधीश के नाम से लोकप्रिय हुए। वहीं जब कृष्ण वृंदावन से निकल गए तब राधा की जिंदगी ने अलग ही मोड़ ले लिया था। कहते हैं कि राधा की शादी एक यादव से हो गई। राधा ने अपने दांपत्य जीवन की सारी रस्में निभाईं और बूढ़ी हुईं, लेकिन उनका मन तब भी कृष्ण के लिए समर्पित था। जानें कौन थे? राधा के पति…राधा के पति का वर्णन ब्रह्मावैवर्त पुराण में मिलता है। ये वेदव्यास द्वारा रचित 18 पुराणों में से एक है। वैसे राधा की शादी के बारे में भी अलग-अलग कहानियां प्रचलित हैं। कुछ के अनुसार राधा की शादी अनय से हुई थी, अनय भी वृंदावन निवासी थे और राधा और अनय की शादी बृह्मा की एक परीक्षा के बाद हुई थी। एक कथा के अनुसार बृह्मा ने ये पता लगाने के लिए की कृष्ण वाकई विष्णु अवतार हैं उनके सारे दोस्तों को अगवा कर जंगल में छुपा दिया था। उस समय अनय भी जंगल में थे और गलती से वो भी अगवा हो गए थे। तब कृष्ण ने अपने सभी दोस्तों का रूप लिया (अनय के साथ) और फिर सभी बच्चों के घरों में रहने लगे। इसके बाद अनय रूपी कृष्ण की शादी राधा से हुई थी। वहीं एक अन्य कथा के अनुसार असल में राधा की शादी हुई ही नहीं थी। ब्रह्मावैवर्त पुराण के अनुसार राधा अपने घर को छोड़ते समय अपनी परछाई (छाया राधा/माया राधा) घर पर मां कीर्ती के साथ छोड़ गई थीं। छाया राधा की शादी रायान गोपा (यशोदा के भाई) से हुई थी और अनय से नहीं, इसीलिए कई बार ये भी कहा जाता है कि राधा रिश्ते में श्रीकृष्ण की मामी थीं। इनकी शादी साकेत गांव में हुई थी जो बरसाने और नंदगांव के बीच स्थित था, कहा जाता है कि राधा ने अपना शादीशुदा जीवन अच्छे से व्यतीत किया भले

प्रेम दिवस: जानें राधा और कृष्ण की प्रेम कहानी! मिलने से लेकर बिछड़ने तक Read More »

बच्चों के लिए कृष्ण के बालपन की 15 सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ

कहानी सुनाना न केवल माता–पिता और बच्चों के बीच संबंध को और गहरा करने का एक तरीका है, बल्कि नैतिकता पर चर्चा करने और मूल्यों को समझाने का एक आसान और मज़ेदार उपाय भी है। भगवान कृष्ण के बचपन की कहानियों को जानने के लिए आगे पढ़ें, जो निश्चित रूप से बच्चों को बहुत अच्छी लगेंगी। सीख के साथ बच्चों के लिए भगवान कृष्ण की कहानियाँ भगवान कृष्ण बच्चों और वयस्कों, सभी के बीच सबसे लोकप्रिय हिंदू भगवानों में से एक हैं। उनकी कहानियों में मज़ेदार, हँसी और अच्छे आदर्शों से भरे किस्से हैं। यहाँ बच्चों के आनंद के लिए भगवान के विशेष 15 कहानियाँ हैं: 1. कृष्ण के माता–पिता की कहानी प्राचीन काल में, ‘उग्रसेन’ नाम का एक राजा था, जिसके दो बच्चे थे – ‘कंस’ नाम का एक बेटा और ‘देवकी’ नाम की एक बेटी। देवकी नम्र और शांत स्वभाव की थी, लेकिन कंस दुष्ट था। जब वह बड़ा हुआ, तो उसने अपने पिता को क़ैदख़ाने में डाल दिया, और राजा की गद्दी खुद संभाली, जबकि उसकी बहन की शादी राजा ‘वासुदेव’ से हुई। एक दिन, कंस ने एक आकाशवाणी सुनी – तुम्हारी बहन का आठवाँ पुत्र बड़ा होने पर एक दिन तुम्हारी हत्या करेगा। इससे दुष्ट कंस डर के मारे अंदर तक हिल गया और वह अपनी बहन को मारना चाहता था। लेकिन वासुदेव ने देवकी को जिंदा रखने का आग्रह किया और कंस द्वारा देवकी के आठवें पुत्र को मारने के लिए सहमत हुए। कंस ने अपनी ही बहन और उसके पति को कैद कर लिया, दंपति की आठवीं संतान भगवान कृष्ण थे जो कंस द्वारा उन्हें मारने के लिए किए गए सभी प्रयासों से बच गए और अंत में उन्होंने अपने दुष्ट मामा को परास्त कर दिया। सीख – यदि आप बुरे हैं और आपके बुरे इरादे हैं, तो आपको अपने पापों की सज़ा ज़रूर मिलेगी। हमेशा सकारात्मक रहें और दूसरों का भला करने के बारे में सोचें। 2. भगवान कृष्ण का जन्म देवकी और वासुदेव उनके भाई कंस द्वारा कैद किए गए थे। हर बार जब देवकी एक बच्चे को जन्म देती, कंस खुद आ जाता और अपने हाथों से बच्चे को मार देता था । देवकी के सातवें बेटे का गर्भपात हुआ, लेकिन वह रहस्यमयी तरीके से वृंदावन की रानी रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित हो गया, जो कृष्ण के भाई – बलराम के रूप में दुनिया में आए। उनके आंठवे पुत्र का जन्म आधी रात को जेल के भीतर हुआ, यह भगवान कृष्ण थे और उस विशेष दिन को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। सीख – अगर कुछ अच्छा होना है, तो वह होकर रहेगा । अच्छाई हमेशा बुराई पर हावी होती है। 3. वासुदेव ने कृष्ण के जीवन को कैसे बचाया कृष्ण का जन्म विष्णु के रूप में हुआ था और उनके माता–पिता ने प्रार्थना की थी कि वह एक साधारण बच्चे में बदल जाएं, ताकि वे उसे कंस से छिपा सकें। प्रभु ने अपने पिता को उन्हें वृंदावन ले जाने और एक नवजात बच्ची के साथ अदला–बदली करने की सलाह दी। फिर, जादुई रूप से क़ैदख़ाने के पहरेदार सो गए और सभी ताले और जंजीरें अपने आप खुल गईं।वासुदेव छोटे कृष्ण को लेकर वृंदावन के लिए रवाना हो गए। जब वह यमुना नदी के तट पर पहुँचे तो उन्होंने देखा कि नदी में बाढ़ आई हुई थी।अपने सिर पर छोटे कृष्ण को रखते हुए, जैसे ही वासुदेव ने नदी को पार करने का प्रयास किया और पानी ने जैसे ही कृष्ण के पैर की अंगूठे को छुआ यहाँ पर भी रहस्यमयी तरीके से नदी का पानी पीछे हट गया जिससे वासुदेव अपनी यात्रा पूरी कर सके। वह फिर यशोदा के घर पहुँचे, बच्चों की अदला–बदली की और बच्ची के साथ वापस क़ैदख़ाने लौट आए। देवकी और वासुदेव को उम्मीद थी कि कंस लड़की को छोड़ देगा क्योंकि भविष्यवाणी थी कि एक लड़का कंस को मारेगा, लेकिन कंस ने परवाह नहीं की। उसने बच्चे को उनके हाथों से छीन लिया और उसे एक पत्थर पर फेंक कर मार दिया। लेकिन लड़की देवी दुर्गा में बदल गई और उन्होंने कंस को बताया कि कृष्ण जीवित हैं और उसे उसके बुरे कर्मों के लिए उसे दंडित करेंगे। सीख – कभी–कभी शक्तियाँ खुद के नियंत्रण से परे होती हैं। यदि आपके केवल बुरे इरादे हैं, तो आप कभी भी सफल नहीं होंगे। 4. कृष्ण और राक्षसी पुतना कृष्ण के मामा कंस उसे मारने के लिए बेताब थे, इसलिए उन्होंने ‘पुतना’ नामक एक राक्षसी को यह कार्य सौंपा। राक्षसी ने एक सुंदर महिला का रूप धारण किया और उस कमरे में जा पहुँची जहाँ कृष्ण थे। उसने अपने स्तनों पर जहर लेपा हुआ था और कृष्ण को दूध पिलाने का अनुरोध किया। कृष्ण की माँ को उसके असली इरादों का पता नहीं था और उन्होंने पुतना को दूध पिलाने की अनुमति दे दी। लेकिन कृष्ण ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उस राक्षसी के जीवन को चूस लिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। विष ने कृष्ण का कुछ नहीं बिगाड़ा लेकिन कृष्ण को दूध पिलाने का अच्छा कर्म करने के कारण, पुतना की आत्मा को मुक्ति मिल गई। सीख – कभी भी किसी को जान–बूझकर चोट नहीं पहुँचानी चाहिए, क्योंकि आपको इसके लिए भुगतना पड़ सकता है। 5. भगवान कृष्ण का मक्खन पसंद करना भगवान कृष्ण को मक्खन खाना बहुत पसंद था, वृंदावन शहर में हर कोई उनकी शरारतों और मक्खन चुराने के प्रयासों से वाकिफ था इसीलिए उन्हें “माखन चोर” कहा जाता था। कृष्ण की माँ यशोदा कृष्ण से मक्खन को छुपाने के लिए इसे ऊँचाई पर बाँध देती थीं।एक बार, जब यशोदा आसपास नहीं थीं तो कृष्ण ने अपने दोस्तों को बुलाया। वे एक दूसरे के ऊपर चढ़ गए और कैसे भी वह मक्खन के बर्तन तक पहुँचने में कामयाब रहे। सभी ने मिलकर मक्खन से भरा बर्तन नीचे उतार लिया और बड़े मज़े से मक्खन को मिल–बाँट कर खाया। लेकिन दुर्भाग्य से, उन्हें एहसास नहीं हुआ कि यशोदा वापस आ गई हैं। कृष्ण के सभी दोस्त वापस अपने घरों में भाग गए, लेकिन कृष्ण को शरारती होने के लिए फटकार पड़ी। सीख – हमेशा अपने से बड़ों की बात मानें और कभी चोरी न करें। 6. भगवान कृष्ण और यशोदा भगवान कृष्ण शरारती थे और उनकी माँ यशोदा उनकी शरारतों से थक चुकी थीं। एक दिन, उन्होंने कृष्ण की हरकतों को रोकने के लिए उन्हें बाँधने का फैसला किया। यशोदा उन्हें बाँधने के लिए एक रस्सी लाईं, लेकिन उन्हें एहसास हुआ कि रस्सी बहुत छोटी थी। वह फिर एक बड़ी रस्सी ले आईं , लेकिन वह भी

बच्चों के लिए कृष्ण के बालपन की 15 सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ Read More »

जब श्रीकृष्ण ने दिया था अपने ही पुत्र को कोढ़ी होने का श्राप! पढ़ें यह कथा

जागरण अध्यात्म में हम लगातार आपके लिए पौराणिक कथाओं की जानकारी लेते आए हैं। आज भी हम आपको ऐसी ही एक पौराणिक कथा बता रहे हैं जिसमें भगवान कृष्ण ने अपने ही पुत्र को कोढ़ी होने का श्राप क्यों दिया यह वर्णित है। भविष्य पुराण, स्कंद पुराण और वराह पुराण में बताया गया है कि श्री कृष्ण ने स्वयं ही अपने पुत्र सांबा को कोढ़ी होने का श्राप दिया था। इससे मुक्ति पाने के लिए सांबा ने सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। यह मंदिर पाकिस्तान के मुलतान शहर में मौजूद है। इसे आदित्य मंदिर के नाम से जाना जाता है। स्थित है। इस सूर्य मंदिर को आदित्य मंदिर के नाम से भी जाना जाता था। आइए जानते हैं कि इस पौराणिक कथा के पीछे क्या कहानी छिपी है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण के 8 रानियां थीं। इनमें से एक का नाम जामवंती थी जो निषादराज जामवंत की पुत्री थीं। कहा जाता है कि जामवंत उन पात्रों में से एक हैं जो रामायण और महाभारत दोनों ही काल में उपस्थित थे। पुराणों में ऐसा कहा गया है कि एक बहुमुल्य मणि जीतने के लिए श्रीकृष्ण और जामवंत के बीच 28 दिनों तक युद्ध चला था। लेकिन युद्ध के बीच में ही जामवंत ने श्रीकृष्ण के स्वरूप को पहचान लिया था। इसके बाद उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह अपनी पुत्री जामवंती से कर दिया। श्रीकृष्ण और जामवंती के पुत्र का नाम सांबा था। वह बेहद ही आकर्षक था। उसे देख श्रीकृष्ण की कई छोटी रानियां उसके प्रति आकृष्ट रहती थीं। ऐसे में एक दिन ऐसा हुआ कि श्रीकृष्ण की एक रानी ने सांबा की पत्नी का रूप लिया और उसे आलिंगन में भर लिया। यह सब श्रीकृष्ण ने देख लिया। यह देख वे बेहद क्रोधित हुए। क्रोध में श्रीकृष्ण ने अपने ही पुत्र को कोढ़ी हो जाने और मृत्यु के पश्चात् डाकुओं द्वारा उसकी पत्नियों को अपहरण कर ले जाने का श्राप दे दिया।पुराणों के अनुसार, सांबा को इस कोढ़ से मुक्ति दिलाने के लिए महर्षि कटक ने सांबा को सूर्य देव की अराधना करने के लिए कहा। इसके बाद सांबा ने एक सूर्यदेव का मंदिर बनवाया। यह मंदिर चंद्रभागा नदी के किनारे मित्रवन में स्थित है। इसी मंदिर में सांबा ने 12 वर्षों तक सूर्य देव की कड़ी तपस्या की। बस तब से ही चंद्रभागा नदी को कोढ़ ठीक करने वाली नदी के रूप में ख्याति मिली है। ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति इस नदी में स्नान करता है उसका कोढ़ जल्दी ठीक हो जाता है।

जब श्रीकृष्ण ने दिया था अपने ही पुत्र को कोढ़ी होने का श्राप! पढ़ें यह कथा Read More »

जब भगवान श्रीकृष्ण ने रखा अपनी बहन के ‘रक्षा सूत्र’ का मान

रक्षाबंधन (Rakshabandhan) का पावन त्योहार बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है. इस दिन बहनें अपने भाइयों को रक्षा सूत्र बांधती हैं और भाई अपनी बहन को आजीवन रक्षा करने का वचन देते हैं. इस साल रक्षाबंधन का त्योहार 11 अगस्त 2022 को मनाया जाएगा. रक्षाबंधन का पर्व मनाने के पीछे कई पौराणिक कथाएं हैं, भगवान श्रीकृष्ण और द्रौपदी से जुड़ी रक्षाबंधन की ये पौराणिक कथा सबसे अधिक प्रचलित है. दिल्ली के आचार्य गुरमीत सिंह जी बता रहे हैं महाभात के समय भगवान श्री कृष्ण और द्रौपदी से जुड़ी रक्षाबंधन की इस कथा के बारे में. श्रीकृष्ण-द्रौपदी की कथाइस कथा के अनुसार, जब सुदर्शन चक्र से भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध किया तो उनकी उंगली कट गई थी, जिससे रक्त बहने लगा था. यह देख द्रौपदी ने अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्रीकृष्ण की उंगली पर बांध दी. उसी क्षण श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को अपनी बहन मान लिया और आजीवन उसकी रक्षा करने का वचन दिया. श्रीकृष्ण ने द्रौपदी से कहा, जिस समय भी वह स्वयं को संकट में पाएं, उन्हें याद कर सकती हैं.जब धृतराष्ट्र के भरी राजसभा में द्रौपदी का चीरहरण किया जा रहा था और द्रौपदी की साड़ी उतारने का प्रयास किया जा रहा था, तब भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और विदुर जैसे न्यायकर्ता मूकदर्शक बन गए थे. पांडव भी द्रौपदी की लाज नहीं बचा पाए. तब द्रौपदी ने अपनी आंखें बंद की और भाई श्रीकृष्ण को याद किया.बहन द्रौपदी का आह्वान सुनकर श्रीकृष्ण ने अपनी शक्ति से उसकी लाज बचाई. श्रीकृष्ण ने अपनी शक्ति से द्रौपदी की साड़ी को इतना बड़ा कर दिया कि दु:शासन साड़ी खींचते-खींचते थक गया और बेहोश हो गया. राजदरबार में साड़ी का ढ़ेर लग गया, लेकिन द्रौपदी की साड़ी कृष्ण की लीला से समाप्त नहीं हुई. इस तरह से श्रीकृष्ण ने अपने दिए वचन से बहन द्रौपदी की लाज बचाई और रक्षा का दायित्व निभाया.

जब भगवान श्रीकृष्ण ने रखा अपनी बहन के ‘रक्षा सूत्र’ का मान Read More »

बाल रूप में ही भगवान कृष्ण ने आठ असुरों को दिखा दिया था यमलोक का रास्ता

जब देवकी और वसुदेव का विवाह संपन्न हुआ तो एक आकाशवाणी हुई. इस आकाशवाणी ने कहा था कि देवकी के गर्भ से जन्म लेने वाली आठवीं संतान कंस का वध करेगी. इस बात की जानकारी होते ही कंस ने दोनों को मथुरा के बंदीगृह में कैद कर दिया. इस बंदीगृह में कंस ने देवकी और वसुदेव की सात संतानों का बारी बारी से वध कर दिया लेकिन आठवीं संतान के रूप में जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो भगवान की माया से वसुदेव ने कृष्ण को यशोदा के घर पहुंचा दिया. लेकिन यह बात अधिक दिनों तक छिप न सकी. कंस को मालूम पड़ गया कि देवकी की आठवीं संतान का जन्म हो चुका है और वह गोकुल में है. इसके बाद कंस ने कई राक्षसों को कृष्ण की हत्या करने के लिए भेजे लेकिन कृष्ण ने कान्हा के रूप में इन सभी राक्षसों का वध कर दिया. ऐसे किया पुतना का वध भगवान कृष्ण ने सबसे पहले पुतना का वध किया. पुतना श्रीकृष्ण को स्तनपान के जरिए विष देकर मार देना चाहती थी. पुतना कृष्ण को विषपान कराने के लिए एक सुंदर स्त्री का रूप धारण कान्हा के पास पहुंची. मौका पाकर पुतना ने पालने में खेल रहे कृष्ण को उठा लिया और स्तनपान कराने लगी. श्रीकृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर दिया तृणावर्त को उतारा मौत के घाट पुतना की मौत की खबर सुनकर कंस क्रोध से पागल हो गया और उसने बदला लेने के लिए तृणावर्त नामक राक्षस को भेजा. यह शक्तिशाली राक्षस था जो बवंडर का रूप धारण करके बड़े-बड़े पेड़ों को भी उखाड़ देता था. तृणावर्त बवंडर बनकर गया और कृष्ण को भी अपने साथ उड़ा लिया. इसके बाद श्रीकृष्ण ने अपना भार बहुत बड़ा लिया, जिसे तृणावर्त भी संभाल नहीं पाया. जब बवंडर शांत हुआ तो कृष्ण ने गला दबाकर तृणावर्त को मार डाला. वत्सासुर का वध कंस अब कृष्ण के खून प्यासा हो चुका था. उसने पुतना और तृणावर्त के बाद वत्सासुर को भेजा. वत्सासुर एक बछड़े का रूप धारण करके श्रीकृष्ण की गायों के साथ मिल गया. कृष्ण उस समय गायों का चरा रहे थे. कृष्ण ने उस बछड़े के रूप में दैत्य को पहचान लिया और उसकी पूंछ पकड़ घुमाया और एक वृक्ष पर पटक दिया. जिससे उसकी वहीं पर मौत हो गई. बकासुर का वध कंस ने वत्सासुर के बाद बकासुर को कृष्ण को मारने के लिए भेजा. बकासुर एक बगुले का रूप धारण करके श्रीकृष्ण को मारने के लिए पहुंचा. बगुले ने कृष्ण को निगल लिया और कुछ ही देर बाद कान्हा ने उस बगुले को चीरकर उसका वध कर दिया. अघासुर का वध अघासुर पुतना और बकासुर का छोटा भाई था. अघासुर ने कृष्ण को मारने के लिए विशाल अजगर का रूप धारण किया. इसी रूप में अघासुर अपना मुंह खोलकर रास्ते में ऐसे बन गया जैसे कोई गुफा हो. उस समय श्रीकृष्ण और सभी बालक वहां खेल रहे थे. एक बड़ी गुफा देखकर सभी बालकों ने उसमें प्रवेश किया. मौका पाकर अघासुर ने अपना मुंह बंद कर लिया. जब सभी को अपने प्राणों पर संकट नजर आया तो श्रीकृष्ण से सबको बचाने की प्रार्थना करने लगे. तभी कृष्ण ने अपना शरीर तेजी से बढ़ाना शुरू कर दिया. इस कारण अघासुर को सांस लेने में परेशानी होने लगी और अंत में भगवान ने उसका भी वध कर दिया. यमलार्जुन को श्राप से किया मुक्त कान्हा बचपन में बहुत ही शरारती थे. कई बार माता यशोदा श्रीकृष्ण की शरारतों से परेशान हो जाती थीं. एक बार जब ये अधिक परेशान हों गईं तो उन्होंने कृष्ण को ऊखल से बांध दिया. जब माता यशोदा घर के दूसरों कामों में व्यस्त हो गई तब कृष्ण ऊखल को ही खींचने लगे. वहां आंगन में दो बड़े-बड़े वृक्ष भी लगे हुए थे, कृष्ण ने उन दोनों वृक्षों के बीच में ऊखल फंसा दिया और जोर लगाकर खींच दिया। ऐसा करते ही दोनों वृक्ष जड़ सहित उखड़ गए. वृक्षों के उखड़ते ही उनमें से दो यक्ष प्रकट हुए, जिन्हें यमलार्जुन के नाम से जाना जाता था. ये दोनों यक्ष पूर्व जन्म कुबेर के पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे. इन दोनों ने एक बार देवर्षि नारद का अपमान कर दिया था. इस कारण देवर्षि ने इन्हें वृक्ष बनने का शाप दे दिया. जिस बाल लीला के दौरान श्रीकृष्ण ने वृक्षों को उखाड़कर इन दोनों यक्षों को मुक्ति प्रदान की.

बाल रूप में ही भगवान कृष्ण ने आठ असुरों को दिखा दिया था यमलोक का रास्ता Read More »

श्रीकृष्ण जन्म कथा, भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा, श्री कृष्ण जन्म लीला, कृष्ण का जन्म कहां हुआ था, 

श्रीकृष्ण जन्म कथा, भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं, क्योंकि यह दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिवस माना जाता है। इसी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। यह तिथि उसी शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण की जन्म संबंधी कथा भी सुनते-सुनाते हैं, जो इस प्रकार है-द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा। यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है? कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया।वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ माया थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।म मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी। उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए। अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा। यह है कृष्ण जन्म की कथा।

श्रीकृष्ण जन्म कथा, भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा, श्री कृष्ण जन्म लीला, कृष्ण का जन्म कहां हुआ था,  Read More »

जन्माष्टमी के पूजन सामग्री में इन चीजों को करें शामिल, पूरी होंगी मन की मुरादें

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव यानी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को लेकर पूरे देश में धूम है। हिंदू पंचांग के अनुसार, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण की विधिवत पूजा की जाती है। श्रीकृष्ण की पूजा में कुछ पूजन सामग्री शामिल करना जरूरी माना गया है। मान्यता है कि ऐसा करने से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से जातक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। जन्माष्टमी पूजन सामग्री लिस्ट- बाल गोपाल के लिए झूला या पालना, भगवान कृष्ण की मूर्ति या प्रतिमा, छोटी बांसुरी, एक पोशाक, आभूषण, तुलसी के पत्ते, चंदन, अक्षत, मक्खन, केसर, कलश, हल्दी, छोटी इलायची, पान, सुपारी, सिक्के या रुपए, सफेद कपड़ा, लाल कपड़ा, नायिरल, कुमकुम, लौंग, मौली, इत्र, सिंहासन, गंगाजन, दीया, सरसों का तेल या घी, रुई की बत्ती, अगरबत्ती, धूपबत्ती, खीरा, सेब, मीठा, नींबू, नाशपाती, अमरूद व कपूर आदि। जन्माष्टमी महत्व- मान्यता है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन विधिवत पूजा-अर्चना करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। घर में सुख-समृद्धि का आगमन होता है। इस दिन बाल गोपाल माखन-मिश्री का भोग जरूर लगाना चाहिए।

जन्माष्टमी के पूजन सामग्री में इन चीजों को करें शामिल, पूरी होंगी मन की मुरादें Read More »

प्रभु श्रीकृष्ण ने सबसे बड़े भक्त अर्जुन का कैसा तोड़ा था अहंकार, पढ़ें ये पौराणिक कथा

एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनकी इस भावना को भगवान श्रीकृष्ण ने समझ लिया। अर्जुन का अहंकार तोड़ने के लिए एक दिन भगवान उन्हें अपने साथ घुमाने ले गए। भ्रमण करते…एक बार अर्जुन को अहंकार हो गया कि वही भगवान के सबसे बड़े भक्त हैं। उनकी इस भावना को भगवान श्रीकृष्ण ने समझ लिया। अर्जुन का अहंकार तोड़ने के लिए एक दिन भगवान उन्हें अपने साथ घुमाने ले गए। भ्रमण करते समय उन दोनों की मुलाकात एक गरीब ब्राह्मण से हुई। उस ब्राह्मण का व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से एक तलवार लटक रही थी। अर्जुन हैरान हो गए। उन्होंने उस ब्राह्मण से पूछा, ‘आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा न हो, इसलिए सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह साधन तलवार आपके साथ क्यों है?’ यह प्रश्न सुन कर ब्राह्मण ने जवाब दिया, ‘मैं कुछ लोगों को दंड देना चाहता हूं।’अर्जुन ने उत्सुक होकर फिर प्रश्न किया, ‘हे महामना! आपके शत्रु कौन हैं?’ ब्राह्मण ने उत्तर दिया, ‘मैं चार लोगों को ढूंढ़ रहा हूं, जिन्होंने मेरे भगवान को परेशान किया है, ताकि उन्हें उनके कर्मों का दंड दे सकूं।’ अर्जुन ने फिर पूछा, ‘वे चार लोग कौन हैं?’ ब्राह्मण ने कहा, ‘सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को विश्राम नहीं करने देते, हमेशा भजन-कीर्तन कर उन्हें जगाए रखते हैं। उसके बाद मैं द्रौपदी से भी अत्यंत नाराज हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकार लिया, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें उसी समय भोजन छोड़कर उठना पड़ा, ताकि पाण्डवों को महर्षि दुर्वासा ऋषि के शाप से बचा सकें। इतना ही नहीं, द्रौपदी ने मेरे आराध्य को जूठा भोजन खिला दिया।’ अर्जुन ने पूछा, ‘आपका तीसरा शत्रु कौन है?’ ब्राह्मण ने उत्तर दिया, ‘वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उस धृष्ट के कारण मेरे भगवान को गरम तेल के कड़ाहे में प्रवेश करना पड़ा, हाथी के पैरों तले कुचला जाना पड़ा और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश होना पड़ा। और, मेरा चौथा शत्रु है अर्जुन। उसका दुस्साहस तो देखिए, उसने तो मेरे भगवान को अपना सारथि ही बना डाला। उसे भगवान की असुविधा का थोड़ा भी ध्यान नहीं रहा। इससे कितना कष्ट हुआ होगा मेरे आराध्य भगवान श्रीकृष्ण को।’ यह सब बताते-बताते उस गरीब ब्राह्मण की आंखों से आंसू बहने लगे। उस गरीब ब्राह्मण की ऐसी निस्वार्थ भक्ति देख कर अर्जुन का सारा अहंकार पानी की तरह बह गया। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा, ‘मेरी आंखें खुल गईं प्रभु, इस जगत में न जाने आपके कैसे-कैसे अद्भुत भक्त हैं। मैं तो उनके आगे कुछ भी नहीं हूं।’ यह सुन भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराने लगे।

प्रभु श्रीकृष्ण ने सबसे बड़े भक्त अर्जुन का कैसा तोड़ा था अहंकार, पढ़ें ये पौराणिक कथा Read More »

जन्माष्टमी पर पढ़ें भगवान कृष्ण के जन्म की ये पावन कथा और व्रत पूजन करें पूर्ण

जन्माष्टमी के दिन लोग बाल कृष्ण की पूजा करते हैं। पूजा के दौरान कृष्ण जी की जन्म कथा सुनना जरूरी माना जाता है। यहां जानिए कृष्ण जन्म की ये पौराणिक कथा। जन्माष्टमी का पर्व पूरे भारत में बेहद ही धूमधाम से मनाया जाता है। ये त्योहार भगवान कृष्ण को समर्पित है। मान्यता अनुसार भाद्रपद माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था। इस तिथि को सनातन धर्म के लोग कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। भगवान कृष्ण, भगवान विष्णु के आठवें अवतार माने जाते हैं। जन्माष्टमी के दिन लोग बाल कृष्ण की पूजा करते हैं। पूजा के दौरान कृष्ण जी की जन्म कथा सुनना जरूरी माना जाता है। यहां जानिए कृष्ण जन्म की ये पौराणिक कथा। द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन का मथुरा में शासन था। वह बड़े ही दयालु थे और प्रजा भी उनका काफी सम्मान करती थी। लेकिन उनका पुत्र कंस दुर्व्यसनी था और प्रजा को कष्ट दिया करता था। जब उसके पिता को ये बात पता चली तो उनके पिता उग्रसेन ने उसे खूब समझाया। लेकिन कंस ने अपने पिता की बात मानने की बजाय उल्टा उन्हें ही गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन थी देवकी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था।कंस अपने बहन देवकी ये बहुत प्रेम करता था। एक समय कंस जब अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था कि तभी अचानक रास्ते में आकाशवाणी हुई- ‘हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।’ यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए टूट पड़ा। तब देवकी ने कंस से विनयपूर्वक कहा- ‘मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। इन्हें मारने से क्या लाभ है?’ कंस ने देवकी की बात मान ली। लेकिन वसुदेव और देवकी को उसने कारागृह में डाल दिया। वसुदेव-देवकी की एक-एक करके सात संतानें हुईं और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब बारी थी आठवे बच्चे के होने की। कंस ने इस दौरान कारागार में वसुदेव-देवकी पर और भी कड़े पहरे बैठा दिए। देवकी के साथ नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ ‘माया’ थी।जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। भगवान ने देवकी-वसुदेव से कहा ‘अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में ले जाओ और उनके यहां जिस कन्या का जन्म हुआ है, उसे लाकर कंस को दे दो। भगवान ने कहा इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। लेकिन फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के दरवाजे अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग खुद दे देगी।’ भगवान के आदेश अनुसार वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे जहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और उनकी कन्या को लेकर मथुरा आ गए। वसुदेव के आते ही कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए। कंस तक वसुदेव-देवकी के बच्चा पैदा होने की सूचना पहुंच गई। कंस ने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीना और जैसे ही उसने उस बच्ची को पृथ्वी पर पटक देना चाहा, वैसे ही कन्या आकाश में उड़ गई और उसने कहा- ‘अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन पहुंच चुका है और वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।’

जन्माष्टमी पर पढ़ें भगवान कृष्ण के जन्म की ये पावन कथा और व्रत पूजन करें पूर्ण Read More »

जन्माष्टमी व्रत कथा

स्कन्दपुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र श्रीकृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। भविष्यपुराण का वचन है- श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो ‘जयंती’ नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए। कथा इंद्र ने कहा है- हे ब्रह्मपुत्र, हे मुनियों में श्रेष्ठ, सभी शास्त्रों के ज्ञाता, हे देव, व्रतों में उत्तम उस व्रत को बताएँ, जिस व्रत से मनुष्यों को मुक्ति, लाभ प्राप्त हो तथा हे ब्रह्मन्‌! उस व्रत से प्राणियों को भोग व मोक्ष भी प्राप्त हो जाए। इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने कहा- त्रेतायुग के अन्त में और द्वापर युग के प्रारंभ समय में निन्दितकर्म को करने वाला कंस नाम का एक अत्यंत पापी दैत्य हुआ। उस दुष्ट व नीच कर्मी दुराचारी कंस की देवकी नाम की एक सुंदर बहन थी। देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र कंस का वध करेगा। नारदजी की बातें सुनकर इंद्र ने कहा- हे महामते! उस दुराचारी कंस की कथा का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। क्या यह संभव है कि देवकी के गर्भ से उत्पन्न आठवाँ पुत्र अपने मामा कंस की हत्या करेगा। इंद्र की सन्देहभरी बातों को सुनकर नारदजी ने कहा-हे अदितिपुत्र इंद्र! एक समय की बात है। उस दुष्ट कंस ने एक ज्योतिषी से पूछा कि ब्राह्मणों में श्रेष्ठ ज्योतिर्विद! मेरी मृत्यु किस प्रकार और किसके द्वारा होगी। ज्योतिषी बोले-हे दानवों में श्रेष्ठ कंस! वसुदेव की धर्मपत्नी देवकी जो वाक्‌पटु है और आपकी बहन भी है। उसी के गर्भ से उत्पन्न उसका आठवां पुत्र जो कि शत्रुओं को भी पराजित कर इस संसार में ‘कृष्ण’ के नाम से विख्यात होगा, वही एक समय सूर्योदयकाल में आपका वध करेगा। ज्योतिषी की बातें सुनकर कंस ने कहा- हे दैवज, बुद्धिमानों में अग्रण्य अब आप यह बताएं कि देवकी का आठवां पुत्र किस मास में किस दिन मेरा वध करेगा। ज्योतिषी बोले- हे महाराज! माघ मास की शुक्ल पक्ष की तिथि को सोलह कलाओं से पूर्ण श्रीकृष्ण से आपका युद्ध होगा। उसी युद्ध में वे आपका वध करेंगे। इसलिए हे महाराज! आप अपनी रक्षा यत्नपूर्वक करें। इतना बताने के पश्चात नारदजी ने इंद्र से कहा- ज्योतिषी द्वारा बताए गए समय पर हीकंस की मृत्युकृष्ण के हाथ निःसंदेह होगी। तब इंद्र ने कहा- हे मुनि! उस दुराचारी कंस की कथा का वर्णनकीजिए और बताइए कि कृष्ण का जन्म कैसे होगा तथा कंस की मृत्यु कृष्ण द्वारा किस प्रकार होगी। इंद्र की बातों को सुनकर नारदजी ने पुनः कहना प्रारंभ किया- उस दुराचारी कंस ने अपने एक द्वारपाल से कहा- मेरी इस प्राणों से प्रिय बहन की पूर्ण सुरक्षा करना। द्वारपाल ने कहा- ऐसा ही होगा। कंस के जाने के पश्चात उसकी छोटी बहन दुःखित होते हुए जल लेने के बहाने घड़ा लेकर तालाब पर गई। उस तालाब के किनारे एक घनघोर वृक्ष के नीचे बैठकर देवकी रोने लगी। उसी समय एक सुंदर स्त्री जिसका नाम यशोदा था, उसने आकर देवकी से प्रिय वाणी में कहा- हे कान्ते! इस प्रकार तुम क्यों विलाप कर रही हो। अपने रोने का कारण मुझसे बताओ। तब दुःखित देवकी ने यशोदा से कहा- हे बहन! नीच कर्मों में आसक्त दुराचारी मेरा ज्येष्ठ भ्राता कंस है। उस दुष्ट भ्राता ने मेरे कई पुत्रों का वध कर दिया। इस समय मेरे गर्भ में आठवाँ पुत्र है। वह इसका भी वध कर डालेगा। इस बात में किसी प्रकार का संशय या संदेह नहीं है, क्योंकि मेरे ज्येष्ठ भ्राता को यह भय है कि मेरे अष्टम पुत्र से उसकी मृत्यु अवश्य होगी। देवकी की बातें सुनकर यशोदा ने कहा- हे बहन! विलाप मत करो। मैं भी गर्भवती हूँ। यदि मुझे कन्या हुई तो तुम अपने पुत्र के बदले उस कन्या को ले लेना। इस प्रकार तुम्हारा पुत्र कंस के हाथों मारा नहीं जाएगा। तदनन्तर कंस ने अपने द्वारपाल से पूछा- देवकी कहाँ है? इस समय वह दिखाई नहीं दे रही है। तब द्वारपाल ने कंस से नम्रवाणी में कहा- हे महाराज! आपकी बहन जल लेने तालाब पर गई हुई हैं। यह सुनते ही कंस क्रोधित हो उठा और उसने द्वारपाल को उसी स्थान पर जाने को कहा जहां वह गई हुई है। द्वारपाल की दृष्टि तालाब के पास देवकी पर पड़ी। तब उसने कहा कि आप किस कारण से यहां आई हैं। उसकी बातें सुनकर देवकी ने कहा कि मेरे गृह में जल नहीं था, जिसे लेने मैं जलाशय पर आई हूँ। इसके पश्चात देवकी अपने गृह की ओर चली गई। कंस ने पुनः द्वारपाल से कहा कि इस गृह में मेरी बहन की तुम पूर्णतः रक्षा करो। अब कंस को इतना भय लगने लगा कि गृह के भीतर दरवाजों में विशाल ताले बंद करवा दिए और दरवाजे के बाहर दैत्यों और राक्षसों को पहरेदारी के लिए नियुक्त कर दिया। कंस हर प्रकार से अपने प्राणों को बचाने के प्रयास कर रहा था। एक समय सिंह राशि के सूर्य में आकाश मंडल में जलाधारी मेघों ने अपना प्रभुत्व स्थापित किया। भादौ मास की कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को घनघोर अर्द्धरात्रि थी। उस समय चंद्रमा भी वृष राशि में था, रोहिणी नक्षत्र बुधवार के दिन सौभाग्ययोग से संयुक्त चंद्रमा के आधी रात में उदय होने पर आधी रात के उत्तर एक घड़ी जब हो जाए तो श्रुति-स्मृति पुराणोक्त फल निःसंदेह प्राप्त होता है। इस प्रकार बताते हुए नारदजी ने इंद्र से कहा- ऐसे विजय नामक शुभ मुहूर्त में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ और श्रीकृष्ण के प्रभाव से ही उसी क्षण बन्दीगृह के दरवाजे स्वयं खुल गए। द्वार पर पहरा देने वाले पहरेदार राक्षस सभी मूर्च्छित हो गए। देवकी ने उसी क्षण अपने पति

जन्माष्टमी व्रत कथा Read More »