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Published October 6, 2023
Updated October 6, 2023

श्रीदुर्गा सप्तशती एक संस्कृत ग्रंथ है जो हिंदू देवी दुर्गा की स्तुति करता है। यह ग्रंथ दुर्गाष्टशती और दशमस्कंद नामक दो भागों में विभाजित है। दुर्गाष्टशती में देवी दुर्गा के आठ रूपों की स्तुति की गई है, जबकि दशमस्कंद में देवी दुर्गा के दश रूपों की स्तुति की गई है।

श्रीदुर्गा सप्तशती में दुर्गाष्टशती के अंत में श्रीदुर्गा सप्तशलोकी नामक एक छोटी स्तुति भी शामिल है। यह स्तुति देवी दुर्गा के सात रूपों की स्तुति करती है।

श्रीदुर्गा सप्तशलोकी के सात रूप निम्नलिखित हैं:

  • पहला रूप: महाकाली, जो सभी बुराईयों का नाश करने वाली हैं।
  • दूसरा रूप: महालक्ष्मी, जो धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवी हैं।
  • तीसरा रूप: महासरस्वती, जो ज्ञान, कला और संगीत की देवी हैं।
  • चौथा रूप: भद्रकाली, जो सभी कष्टों को दूर करने वाली हैं।
  • पांचवां रूप: त्रिपुरसुंदरी, जो सभी सुखों को प्रदान करने वाली हैं।
  • छठा रूप: त्रिपुरभैरवी, जो सभी दुश्मनों को हराने वाली हैं।
  • सातवां रूप: चंद्रघंटा, जो सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।

श्रीदुर्गा सप्तशलोकी का पाठ करने से भक्तों को देवी दुर्गा की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह भक्तों को सभी प्रकार के नुकसान और खतरों से बचाता है, और उन्हें आरोग्य, धन और समृद्धि प्राप्त करने में मदद करता है।

श्रीदुर्गा सप्तशलोकी के कुछ प्रमुख श्लोक इस प्रकार हैं:

  • प्रथम श्लोक:

ॐ नमस्ते महाकाली, नमस्ते महालक्ष्मी। नमस्ते महासरस्वती, नमस्ते भद्रकाली।

अर्थ:

हे महाकाली, आपको नमस्कार है। हे महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है। हे महासरस्वती, आपको नमस्कार है। हे भद्रकाली, आपको नमस्कार है।

  • अंतिम श्लोक:

ॐ नमस्ते चंद्रघंटा, सर्वसिद्धिप्रदायिनी। त्वं देवि सर्वशक्तिमते, नमस्ते नमस्ते नमस्ते।

अर्थ:

हे चंद्रघंटा, आपको नमस्कार है। आप सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं। हे देवी, आप सर्वशक्तिमान हैं। आपको नमस्कार है, आपको नमस्कार है, आपको नमस्कार है।

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