Dream Astrology:क्या आपको भी आता है ऊंचाई से गिरने का सपना, जानें इसका मतलब

Dream Astrology:सोते समय आप में से ज्यादातर लोग सपने जरूर देखते हैं। अगर आपको भी कभी ऊंचाई से गिरने का सपना आता है तो आपको इसके फल के बारे में जान लेना चाहिए।  सपने देखना एक आम बात है हम सब नींद में अक्सर सपने देखते हैं। स्वप्न शास्त्र की मानें तो इन सपनों के भी अपने अलग मायने होते हैं। सपने कई तरह के होते हैं और कुछ सपने हमारे भूतकाल और वर्तमान में चल रही घटनाओं की और इशारा करते हैं, वहीं कुछ ऐसे सपने भी होते हैं जो हमें आगे आने वाले समय के लिए सचेत करते हैं। सपने में कई बार हम खुद को किसी ऐसी गतिविधि में लिप्त देखते हैं जिसका कुछ न कुछ मतलब जरूर होता है। हम सपने में कभी- कभी अपने आप को गिरते हुए देखते हैं। हमें ऐसा लगता है कि हम किसी ऊंचाई वाली जगह से सच में गिरने वाले हैं। कई लोग सपने में किसी ऊंची बिल्डिंग या पहाड़ी से खुद को गिरते हुए देखते हैं। Dream Astrology दरअसल ऐसे सपने के पीछे हो सकता है कि भविष्य में आपको किसी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। Dream Astrology:सपने में ऊंचाई से गिरने का मतलब जिस सपने में आप खुद को ऊंचाई से गिरते हुए देखते हैं तो Dream Astrology आपको स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां आने की संभावना हो सकती है। ऐसे किसी भी सपने का अर्थ है कि आपको निकट भविष्य में किसी बड़ी विपत्ति का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे सपने से आर्थिक हानि के साथ स्वास्थ्य की भी क्षति हो सकती है इसलिए इस सपने को अच्छा नहीं माना जाता। सपने में छत से गिरने का मतलब स्वप्न शास्त्र के अनुसार यदि कोई व्यक्ति खुद को सपने में खुद को छत से गिरते हुए देखता है तो इसका मतलब हो सकता है कि आने वाले समय में उस व्यक्ति को शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। जैसे जोड़ो के दर्द या एड़ियों में तकलीफ़ हो सकती है। इसलिए ऐसे सपने को भी शुभ नहीं माना गया। ये सपना आए तो हो जाएं सावधान स्वप्न शास्त्र के अनुसार यदि कोई व्यक्ति सपने में खुद को फिसल कर गिरते हुए देखते हैं तो, इस सपने को शुभ नहीं माना जाता।  इसका अर्थ हो सकता है कि आपको निकट भविष्य में अपने किसी परिचित या रिश्तेदार से धोखा मिल सकता है। Dream Astrology इसलिए सचेत रहने की आवश्यकता है। आसमान से नीचे गिरते हुए देखना आसमान से नीचे गिरते हुए सपने देखने से यह संकेत मिल सकता है कि आप हाल ही में थक गए हैं साथ ही यह इस बात का भी संकेत है कि भविष्य में आप किसी दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं। सामान्यतः इस तरह का सपना मानसिक और शारीरिक थकावट या उप-स्वास्थ्य की स्थिति के कारण बनता है। ऐसा कोई भी सपना आने पर आपको इस बात का ध्यान रखना होगा कि आपकी नींद पूरी हो और मानसिक तनाव न रहे। इसके अलावा आप सपने में (सपने में सांप दिखना शुभ या अशुभ)आसमान से कितनी तेजी से गिरे हैं, इसका भी अलग संकेत हो सकता है जैसे आसमान से तेजी से गिरने का सपना इस ओर इशारा करता है कि आप अपने जीवन में जल्द ही कुछ महत्वपूर्ण बदलाव करेंगे। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आप अपने आप जोर से गिरते हुए देखते हैं Dream Astrology लेकिन इस दौरान तुरंत ही आपकी नींद खुल जाए और आप जाग जाएं तो ऐसा सपना दर्शाता है कि आप सतर्क हैं और अपने आस-पास के लोगों पर जल्दी भरोसा नहीं करते है। अगर आपको भी ऐसे कोई सपने आते हैं तो इसके फल को जानकार आप अपने भविष्य की योजनाएं बना सकते हैं। Dream Astrology अगर आपको यह आर्टिकल अच्छा लगा हो तो इसे शेयर जरूर करें। इसी तरह के अन्य लेख पढ़ने के लिए आपकी अपनी वेबसाइट हरजिन्दगी के साथ जुड़ी रहें।

Dream Astrology:क्या आपको भी आता है ऊंचाई से गिरने का सपना, जानें इसका मतलब Read More »

Vijaya Ekadashi 2025:एकादशी के दिन नहीं किया जाता इस सफेद चीज का सेवन,आज ही जान लें व्रत नियम

Vijaya Ekadashi Do’s And Don’ts: विजया एकादशी को विजय प्राप्त करने वाली एकादशी भी कहा जाता है. यहां जानिए इस साल विजया एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा और इस दिन खानपान से जुड़ी किन बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है.  Vijaya Ekadashi 2025: हर माह में आने वाली एकादशी तिथि को विष्णुजी की कृपा पाने व्रत और पूजन किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विष्णुजी की पूजा-अर्चना करने से सुख-सौभाग्य में वृद्धि होती है और साधक को जीवन के समस्त दुखों से छुटकारा मिलता है। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को Vijaya Ekadashi 2025 विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन व्रत और विष्णुजी की पूजा करने से साधक को हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है, लेकिन विजया एकादशी व्रत में कुछ कार्यों की मनाही भी होती है। मान्यता है कि ऐसा करने से श्रीहरि विष्णुजी नाराज हो सकते हैं। इसलिए एकादशी व्रत के नियमों का खास ध्यान रखना चाहिए। Vijaya Ekadashi 2025 आइए जानते हैं कि विजया एकादशी व्रत के दिन किन कार्यों को करने से बचना चाहिए? एकादशी पर क्या नहीं खाना चाहिए | What Not To Eat On Ekadashi  विजया एकादशी के दिन भगवान विष्णु को नाराज ना करने की कोशिश की जाती है. इस दिन व्रत रखकर क्या खाया जा रहा है इसका खास ध्यान रखा जाता है. कुछ व्रतों में चावल का सेवन किया जाता है लेकिन एकादशी के व्रत में चावल का सेवन नहीं किया जाता है. चावल (Rice) के अलावा कोई और अन्न या फिर नमक का सेवन नहीं करना चाहिए. लहसुन, मसूर की दाल और प्याज के सेवन से भी बचना चाहिए. माना जाता है कि इन चीजों के सेवन से भगवान विष्णु नाराज हो सकते हैं.  एकादशी पर किन चीजों का सेवन करना चाहिए  एकादशी के व्रत में कुट्टू के आटे की रोटी या पूड़ियां बनाकर खाई जा सकती हैं. इस दिन आलू और साबूदाने का सेवन किया जा सकता है. साबूदाने के खीर या खिचड़ी बनाई जा सकती है. दही, दूध और फलों को खाना भी एकादशी पर अच्छा माना जाता है. Vijaya Ekadashi 2025 Per Ase Kare Puja विजया एकादशी पर ऐसे करें पूजा  Vijaya Ekadashi 2025 विजया एकादशी पर सुबह उठकर स्नान किया जाता है. इस दिन पीले रंग के कपड़े पहनना बेहद शुभ माना जाता है. सुबह ही व्रत का प्रण लिया जाता है. Vijaya Ekadashi 2025 पूजा करने के लिए भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करके उनके समक्ष धूप, दीप, पुष्प, फूल, तुलसी और भोग आदि अर्पित किया जाता है. व्रत की कथा पढ़ी जाती है, आरती की जाती है और पूजा का समापन होता है.  Vijaya Ekadashi 2025 Ke na kare ye Kaam:विजया एकादशी के न करें ये काम विजया एकादशी के दिन चावल का सेवन न करें। मान्यता है कि इससे विष्णुजी रुष्ट हो सकते हैं। श्रीहरि विष्णुजी को तुलसी का पत्तियां अति प्रिय है। विष्णुजी के भोग में तुलसी के पत्तों को शामिल करना बेहद जरूरी माना जाता है। कहते हैं कि इसके बिना विष्णुजी भोग को ग्रहण नहीं करते हैं, लेकिन एकादशी तिथि में तुलसी के पत्ते को नहीं तोड़ना चाहिए। पूजा में इस्तेमाल करने के लिए तुलसी के पत्तों को एक दिन पहले तोड़कर रख लें। विजया एकादशी के दिन व्रती के साथ परिवार के अन्य सदस्यों को भी सात्विक भोजन करना चाहिए। घर के प्रत्येक सदस्य को मांस-मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि इससे विष्णुजी नाराज हो सकते हैं। सनातन धर्म में शुभ कार्यों में काले रंग के वस्त्रों को धारण करने की मनाही होती है। Vijaya Ekadashi 2025 एकादशी व्रत में भी साधक को काले रंग का वस्त्र नहीं पहनना चाहिए। इस दिन विष्णुजी की पूजा-अर्चना के दौरान पीले रंग के वस्त्र पहन सकते हैं। विजया एकादशी के दिन क्रोध से बचें। अपने से बड़े-बुजुर्गों को अपमानित न करें। अपशब्दों का इस्तेमाल करने से बचें। मन में नकारात्मक विचार न लाएं। एकादशी व्रत में ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना चाहिए। इस दिन घर की साफ-सफाई का भी खास ख्याल रखें। घर के किसी भी हिस्से को गंदा न रखें और शाम को तुलसी के पौधे के समक्ष घी का दीपक जलाएं। एकादशी व्रत में किसी भी तरह से झूठ न बोलें। हिंसा से बचें। अपने मन,कर्म और वचन से किसी को परेशान न करें। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

Vijaya Ekadashi 2025:एकादशी के दिन नहीं किया जाता इस सफेद चीज का सेवन,आज ही जान लें व्रत नियम Read More »

Devya Aratrikam:देव्या अरात्रिकम् 

Devya Aratrikam (देव्या अरात्रिकम्) प्रवरातीरनिवासिनि निगमप्रतिपाद्येपारावारविहारिणि नारायणि हृद्ये।प्रपञ्चसारे जगदाधारे श्रीविद्येप्रपन्नपालननिरते मुनिवृन्दाराध्ये॥जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे।मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे॥१॥ pravarātīranivāsini nigamapratipādyepārāvāravihāriṇi nārāyaṇi hṛdye।prapañcasāre jagadādhāre śrīvidyeprapannapālananirate munivṛndārādhye॥jaya devi jaya devi jaya mohanarūpe।māmiha janani samuddhara patitaṃ bhavakūpe॥1॥ हे प्रवरानदीतीरवासिनी, वेदों से प्रतिपादित, क्षीरसागरविहारिणी, नारायणप्रिया, मनोहारिणी, संसार की सार और आधाररूपिणी, लक्ष्मी और विद्यास्वरूपिणी, शरणागत की रक्षा में तत्पर, मुनिगणों से आराधित हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! हे मनोहर रूपवाली! तुम्हारी जय हो! हे मातः! इस संसारकूप में पड़े हुए मेरा उद्धार करो॥१॥ ध्रुवपदम्॥ दिव्यसुधाकरवदने कुन्दोज्ज्वलरदनेपदनखनिर्जितमदने मधुकैटभकदने।विकसितपङ्कजनयने पन्नगपतिशयनेखगपतिवहने गहने सङ्कटवनदहने॥जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे।मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे॥२॥ dhruvapadam॥ divyasudhākaravadane kundojjvalaradanepadanakhanirjitamadane madhukaiṭabhakadane।vikasitapaṅkajanayane pannagapatiśayanekhagapativahane gahane saṅkaṭavanadahane॥jaya devi jaya devi jaya mohanarūpe।māmiha janani samuddhara patitaṃ bhavakūpe॥2॥ पूर्णचन्द्र के समान दिव्य मुखवाली, कुन्दपुष्प के-से स्वच्छ दाँतों वाली, अपने पैरों की नख-ज्योति से मदन को पराजित करने वाली, मधुकैटभ का संहार करने वाली, प्रफुल्लित कमल-समान नेत्रोंवाली, Devya Aratrikam शेषशायिनी, गरुडवाहिनी, दुराराध्या, संकट वन को भस्म करने वाली (हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! हे मातः! इस संसारकूपमें पड़े हुए मेरा उद्धार करो) ॥ २॥ मञ्जीराङ्कितचरणे मणिमुक्ताभरणेकञ्चुकिवस्त्रावरणे वक्त्राम्बुजधरणे।शक्रामयभयहरणे भूसुरसुखकरणेकरुणां कुरु मे शरणे गजनक्रोद्धरणे॥जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे।मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे॥३॥ mañjīrāṅkitacaraṇe maṇimuktābharaṇekañcukivastrāvaraṇe vaktrāmbujadharaṇe।śakrāmayabhayaharaṇe bhūsurasukhakaraṇekaruṇāṃ kuru me śaraṇe gajanakroddharaṇe॥jaya devi jaya devi jaya mohanarūpe।māmiha janani samuddhara patitaṃ bhavakūpe॥3॥ चरणों में नूपुर धारण करने वाली, मणि और मोतियों के आभूषण धारण करने वाली, चोली और वस्त्रों से सुसज्जित, कमलमुखी, इन्द्र के विघ्न बाधाओं को दूर करने वाली, ब्राह्मणों के लिये आनन्ददायिनी, Devya Aratrikam गज और ग्राह का उद्धार करने वाली हे देवि! Devya Aratrikam मुझ शरणागतपर कृपा करो। (हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! जय हो! हे मातः ! इस संसार कूप में पड़े हुए मेरा उद्धार करो) ॥३॥ छित्त्वा राहुग्रीवां पासि त्वं विबुधान्ददासि मृत्युमनिष्टं पीयूषं विबुधान्।विहरसि दानवऋद्वान् समरे संसिद्धान्मध्वमुनीश्वरवरदे पालय संसिद्धान्॥जय देवि जय देवि जय मोहनरूपे।मामिह जननि समुद्धर पतितं भवकूपे॥४॥ chittvā rāhugrīvāṃ pāsi tvaṃ vibudhāndadāsi mṛtyumaniṣṭaṃ pīyūṣaṃ vibudhān।viharasi dānavaṛdvān samare saṃsiddhānmadhvamunīśvaravarade pālaya saṃsiddhān॥jaya devi jaya devi jaya mohanarūpe।māmiha janani samuddhara patitaṃ bhavakūpe॥4॥ तुम राहु की ग्रीवा काटकर देवों की रक्षा करती हो, असुरों को उनकी इच्छा के विपरीत मृत्यु और देवताओं को अमृत देती हो, युद्धकुशल और वीर दैत्यों से रण-क्रीडा कराने वाली हो। Devya Aratrikam हे मध्वमुनीश्वर को वर देने वाली! भक्तों का पालन करो। (हे देवि! तुम्हारी जय हो! जय हो! जय हो! हे मातः! इस संसार कूप में पड़े हुए मेरा उद्धार करो) ॥ ४॥ इति देव्या आरात्रिकं समाप्तम्।

Devya Aratrikam:देव्या अरात्रिकम्  Read More »

इस्कॉन मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

इस्कॉन की स्थापना भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में न्यूयॉर्क में की थी। इस्कॉन मंदिर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा शहर के वृंदावन में स्थित एक हिंदू मंदिर है। यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम को समर्पित है। इस्कॉन मंदिर का पूरा नाम इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (ISKCON) है। इस संस्था की स्थापना भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद ने 1966 में न्यूयॉर्क में की थी। स्वामी प्रभुपाद जी ने ही वृंदावन में इस मंदिर बनाने का सपना देखा और उसे पूरा भी किया। मंदिर को कृष्ण बलराम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर का इतिहास इस्कॉन मंदिर:स्वामी प्रभुपाद भारत में कई जगहों पर इस्कॉन मंदिर बनवाना चाहते थे। 1975 में उन्होंने वृंदावन में यह मंदिर बनवाया था। ये भारत में इस्कॉन द्वारा निर्मित पहला मंदिर था। राम नवमी के मंदिर शुभ अवसर पर उन्होंने मंदिर का उद्घाटन किया और कृष्ण-बलराम, राधा-श्यामासुंदर, ललिता देवी, विशाखा देवी और गौरा-नितई के दिव्य देवताओं की स्थापना की। मंदिर उसी स्थान पर बना है जहां श्री कृष्ण और श्री बलराम ने अपना बचपन बिताया था। इस्कॉन मंदिर:का महत्व इस्कॉन मंदिर दुनिया भर के कृष्ण भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र है, क्योंकि यह शक्ति और भक्ति का प्रतीक है। मंदिर वृन्दावन में आकर भक्त श्री कृष्ण की भक्ति में डूब जाते हैं और अपने सारे कष्टों को भूल जाते हैं। मंदिर में पूजा की उच्च गुणवत्ता का पालन किया जाता है और कुछ प्रक्रियाओं को नित्य रूप से किया जाता है, जिसमें से कुछ हैं – 6 प्रकार की आरतियाँ, 6 प्रकार के भोग और इष्टदेव को चढ़ावा, पुजारियों द्वारा धार्मिक विधि-विधान के साथ इष्टदेवों की अनुशासित पूजा। मंदिर के जरिए इस्कॉन के अनुयायियों ने विश्व में गीता, हिंदू धर्म और संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया और प्रक्रिया सतत जारी है। इस्कॉन मंदिर की वास्तुकला मंदिर सफेद संगमरमर से निर्मित है और इस मंदिर की बनावट वृंदावन की प्रभावशाली मंदिरों में से एक है। ये जटिल नक्काशीदार दीवारों और गुंबदों, घुमावदार सीढ़ियों और मेहराबों के साथ विशेष कारीगरी का एक उदाहरण है। मंदिर परिसर में तीन मंदिर हैं; एक भगवान कृष्ण और उनके भाई भगवान बलराम को समर्पित, दूसरा श्री गौर – निताई (श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद) को समर्पित और तीसरा श्री श्यामसुंदर (भगवान कृष्ण और राधा रानी) को समर्पित। मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत मंदिर के केंद्रीय स्लैब में बाईं ओर नित्यानंद के साथ चैतन्य महाप्रभु और भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद और इस्कॉन मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत उनके आध्यात्मिक गुरु भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर की मूर्तियां लगी हुई हैं। जैसे ही आप मंदिर के दरवाजे में प्रवेश करते हैं, काले और सफेद संगमरमर के चारखानेदार प्रांगण आपका ध्यान आकर्षित करते हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 04:00 AM – 12:45 PM श्रृंगार आरती का समय 07:15 AM – 07:25 AM भागवत कथा का समय 08:00 AM – 08:30 AM राज भोग आरती का समय 12:00 PM – 12:30 PM उत्थापन आरती का समय 04:00 PM – 04:30 PM शयन आरती का समय 08:00 PM – 08:15 PM मंगला आरती का समय 04:30 AM – 05:00 AM गुरु पूजा का समय 07:25 AM – 08:00 AM पुष्प आरती का समय 08:30 AM – 09:30 AM शाम को मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 08:15 PM संध्या आरती का समय 06:30 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद इस्कॉन मंदिर में फूलों के साथ माखन, मिश्री, पेड़ा और बर्फी का भोग लगाया जाता है।

इस्कॉन मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत Read More »

चिंतामन गणेश मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत

चिंतामन गणेश मंदिर:यहाँ गणेशजी 3 रूपों में विराजमान हैं चिंतामन गणेश मंदिर भारत के मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन में स्थित है। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर से करीब 6 किलोमीटर की दूरी पर ग्राम जवास्या में भगवान गणेश जी का यह प्राचीनतम मंदिर बना हुआ है। चिंतामन गणेश मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही हमें गौरीसुत गणेश की तीन प्रतिमाएं दिखाई देती हैं। यहां पार्वतीनंदन तीन रूपों में विराजमान हैं। पहला चिंतामन, दूसरा इच्छामन और तीसरा सिद्धिविनायक। चिंतामन गणेश मंदिर में चैत्र माह के हर बुधवार को मेला लगता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार चिंतामन गणेश माता सीता द्वारा स्थापित षट् विनायकों में से एक हैं। मंदिर का इतिहास चिंतामन गणेश मंदिर में चिंतामन गणेश जी की स्थापना भगवान श्री राम व माता सीता ने वनवास के दौरान की थी। इच्छामन और सिद्धिविनायक गणेश जी की स्थापना लक्ष्मण जी और सीता माता ने की थी। ऐसा कहा जाता है कि जो भक्त चैत्र माह के बुधवार के दिन चिंतामण गणेश मंदिर में पूजा-अर्चना करते है। भगवान गणेश उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। साथ ही उसे सभी प्रकार की चिंताओं से मुक्त भी कर देते हैं। मंदिर में स्थित चिंतामन गणेश भक्तों को चिंता से मुक्ति, सिद्धिविनायक स्वरूप सिद्धि प्रदान करते हैं और इच्छामन गणेश इच्छा की पूर्ति करते हैं। मंदिर का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यहाँ के किसान चैत्र माह में रबी की फसल पकने के बाद सबसे पहले भगवान चिंतामन गणेश को अपनी फसल अर्पित करते हैं। उसके बाद ही बाजार मे बेचने जाते हैं। ऐसा करने से भगवान चिंतामन गणेश किसानों के कार्य में आने वाली हर बाधा को समाप्त कर देते हैं। इस मंदिर में श्रद्धालु यहां मन्नत का धागा भी बांधते हैं और उल्टा स्वस्तिक भी बनाते हैं। मंदिर की वास्तुकला चिंतामन गणेश मंदिर 9वीं शताब्दी से 13वीं के मध्य यानी परमारकालीन का माना जाता है। इस मंदिर के शिखर पर गुंबदों के साथ सिंह भी विराजमान है। इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवत् 155 में महाराजा विक्रमादित्य द्वारा श्रीयंत्र के अनुरूप करवाया गया था। उसके बाद इसका जीर्णोद्धार पेशवाकाल में कराया गया। वहीं वर्तमान मंदिर का जीर्णोद्धार अहिल्याबाई होलकर के शासनकाल में हुआ। मंदिर में स्थापित श्रीगणेश जी की मूर्ति खड़ी हुई है।जो जमीन के अंदर आधी धंसी है, जिसकी वजह से आधी मूर्ति के दर्शन होते हैं। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 09:30 PM भोग आरती आरती का समय 12:00 PM – 12:30 PM चौथी आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM पहली आरती का समय 08:00 AM – 09:00 AM तीसरी आरती का समय 04:00 PM – 04:30 PM पांचवीं आरती का समय 09:00 PM – 09:30 PM मंदिर का प्रसाद चिंतामन गणेश मंदिर में भक्त शुद्ध घी और मेवे से बने लड्‌डू का भोग लगाते हैं। गणेशजी के इस मंदिर में भक्तों द्वारा मन्नत के लिए दूध, दही, चावल और नारियल में से किसी एक वस्तु को चढ़ाया जाता है। मकर संक्रांति पर महिलाएं इस दिन व्रत के बाद चिंतामन गणेश को तिल के बने व्‍यंजनों का भोग लगाती हैं।

चिंतामन गणेश मंदिर:उज्जैन, मध्य प्रदेश, भारत Read More »

Sapne Me Shivling Dekhna: सपने में शिवलिंग की पूजा करने का मतलब जानिए, इस मामले में होता है बेहद लाभकारी

Sapne Me Shivling Dekhna :सपने में भगवान शिव की मूर्ति देखना या फिर शिवलिंग देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि सपने में भोलेनाथ का किसी भी रूप में दिखना जीवन में बहुत से आश्‍चर्यजनक परिवर्तन लाने वाला माना जाता है। सपने में शिवलिंग का जलाभिषेक करना या फिर पूजा करने के अर्थ है कि आपके जीवन में किस अति महत्‍वपूर्ण कार्य के शुभ परिणाम मिल सकते हैं। आइए जानते हैं भगवान शिव से जुड़े ऐसे ही कुछ सपनों का अर्थ। Swapna Shastra : अगर आप भगवान शिव के परम भक्‍त हैं और आप खुद को सपने में शिवलिंग की पूजा करते हुए देखते हैं तो यह बहुत ही शुभ संयोग माना जाता है। सपने में शिवजी के दर्शन करना आपके जीवन में तरक्‍की के शुभ संकेत और मनोकामना पूर्ण होने के संकेत देता है। आइए जानते हैं शिवजी का आपके सपने में विभिन्‍न रूपों में नजर आना क्‍या बताता है। Sapne Me Shivling Dekhna:सपने में शिवलिंग का दिखना सपने में यदि आपने शिवलिंग को देखा तो यह बहुत ही शुभ माना जाता है। ऐसा मानते हैं कि यदि सपने में आपको शिवलिंग दिखाई दे तो निजी जीवन में आपका कोई बहुप्रतीक्षित कार्य बनने वाला है। ऐसा कहते हैं Sapne Me Shivling Dekhna कि आपको उस कार्य में सफलता मिलना तय और भोले बाबा का हाथ आपके ऊपर है। Sapne Me Shivling Dekhna सपने में शिवलिंग की पूजा करते देखना यदि आपने सपने में खुद को शिवलिंग की पूजा करते देखा है तो समझ लीजिए आपके जीवन से सभी प्रकार के अशुभ तत्‍वों का नाश होने वाला है। ऐसा सपना अच्‍छा समय आने का और पुरानी परेशानियां दूर होने का संकेत देता है। यह सपना किसी की अधूरी इच्‍छा पूरी होने का और मनोकामना पूर्ति का संकेत देता है। सपने में सपरिवार भगवान शिव की पूजा करना यदि आप खुद को अपने परिवार के साथ शिवजी Sapne Me Shivling Dekhna की पूजा करते देखते हैं तो यह इस बात का संकेत है कि आप अपने काम में पूरे त्‍याग, समर्पण और ईमानदारी के साथ लगे रहते हैं। ऐसा सपना आना बताता है कि कार्यक्षेत्र में आपकी आने वाली परेशानियां जल्‍द ही दूर होने वाली हैं। आपके जीवन में सुख समृद्धि और सौभाग्‍य आने वाला है। ऐसा सपना उन्‍नति और सुख सौभाग्‍य का प्रतीक माना जाता है। सपने में सफेद शिवलिंग देखना अगर आपको सपने में यदि सफेद शिवलिंग के दर्शन हों तो यह इस बात का संकेत माना जाता है कि आने वाले वक्‍त में आपको या फिर आपके परिवार के किसी सदस्‍य को गंभीर रोग से छुटकारा मिल सकता है और आपके जीवन में कुछ अच्‍छा होने वाला है। सपने में शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना सपने में शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ना भी असल जीवन में बहुत ही शुभ संकेत देता है। इसका अर्थ है कि आप अपने जीवन में सुख शांति की ओर बढ़ रहे हैं। संघर्ष का दौर आपके जीवन से समाप्‍त होने वाला है और जल्‍द ही आपके जीवन में स्‍थायित्‍व आने वाला है और सब कुछ आपके अनुसार होने वाला है।

Sapne Me Shivling Dekhna: सपने में शिवलिंग की पूजा करने का मतलब जानिए, इस मामले में होता है बेहद लाभकारी Read More »

Mahashivratri 2025: महाशिवरात्रि की रात जागने से क्या होता है?

Mahashivratri 2025: हिंदू धर्म शास्त्रों में महाशिवरात्रि का दिन बड़ा ही पावन और विशेष माना गया है. इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था. इसलिए इस दिन भोलेनाथ का पूजन और व्रत किया जाता है. मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव के पूजन और व्रत से भकतों की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं. Mahashivratri 2025: हिंदू पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह साल का अंतिम महीना होता है. हिंदू धर्म शास्त्रों में ये महीना भगवान महादेव को समर्पित किया गया है. इसी महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि पड़ती है. Mahashivratri 2025 महाशिवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है. महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का पूजन और व्रत किया जाता है. इस दिन व्रत और पूजन करने से भगवान शिव सारी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं. Mahashivratri 2025 Kab hai:महाशिवरात्रि कब है ? हिंदू पंचांग के अनुसार, इस साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 26 फरवरी को सुबह 11 बजकर 8 मिनट पर शुरू होगी. वहीं 27 फरवरी को सुबह 8 बजकर 54 मिनट प इस तिथि का समापन होगा. ऐसे में महाशिवरात्रि 26 फरवरी को मनाई जाएगी. इस दिन इसका व्रत रखा जाएगा. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार… हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि पर पूरी रात जागकर भगवान शिव की आराधना और जागरण किया जाता है. महाशिवरात्रि की रात में जागरण करने का अध्यामिक और वैज्ञानिक महत्व क्या है, आइए जानते हैं. महाशिवरात्रि की रात का धार्मिक महत्व महाशिवरात्रि के दिन भोलेनाथ वैराग्य जीवन छोड़कर मां पार्वती के साथ विवाह के बंधन में बंधे थे. इस दिन माता पार्वती और भोलेनाथ रात में भ्रमण पर निकलते हैं. ऐसे में जो लोग रात्रि जागरण कर महादेव की आराधना करते हैं Mahashivratri 2025 उनके समस्त दुख दूर होते हैं और जीवन में खुशियों का आगमन होता है.  महाशिवरात्रि की रात का वैज्ञानिक महत्व महाशिवरात्रि की रात में ब्रह्माण्ड में ग्रह और नक्षत्रों की ऐसी स्थिति होती है जिससे एक खास ऊर्जा का प्रवाह होता है. इस रात ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य के भीतर की ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर जाने लगती है यानी प्रकृति स्वयं मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद कर रही होती है. Mahashivratri 2025 इसलिए  महाशिवरात्रि की रात में जागरण करने व रीढ़ की हड्डी सीधी करके ध्यान मुद्रा में बैठने की बात कही गई है. Mahashivratri 2025 Puja Vidhi महाशिवरात्रि पूजा विधि महाशिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और शुभ मुहूर्त में ही पूजा करें. इस दिन रात्रि के चारों प्रहर में भी पूजा की जाती है. लेकिन निशिता मुहूर्त में पूजा करना सबसे शुभ होता है. पूजा के लिए साफ कपड़े पहन लें और शिव-पार्वती का ध्यान करें. आसन लेकर बैठ जाएं. एक साफ स्थान पर चौकी रखें और सफेद का कपड़ा बिछाएं.  चौकी के ऊपर शिव पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें. आप मंदिर जाकर भी शिवलिंग की पूजा कर सकते हैं.  सबसे पहले शिवलिंग का गंगाजल, कच्चे दूध, गन्ने के रस, दही आदि से अभिषेक करें. फिर घी का दीपक जलाकर विधि-विधान से शिवजी और मां पार्वती का पूजन करें. शिवजी को चंदन का टीका लगाएं और उन्हें बेलपत्र, भांग, धतूरा, फूल, मिष्ठान आदि सभी सामग्रियां अर्पित करें. माता पार्वती को भी सिंदूर लगाएं और उनका पूजन करें.  साथ ही पार्वती जी को सुहाग का सामान भी अर्पित करें. अब भगवान को भोग लगाएं और फिर शिवजी की आरती करें. इस दिन शिवजी के प्रिय मंत्रों का जाप भी जरूर करें. Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

Mahashivratri 2025: महाशिवरात्रि की रात जागने से क्या होता है? Read More »

Devyapradh Kshamapan Stotra:देव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम्

Devyapradh Kshamapan Stotra (देव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम्) Devyapradh Kshamapan Stotra:न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः। न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम ॥१॥ विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत्। तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥२॥ पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तव सुतः। मदीयोऽयं त्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥३॥ जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया। तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ॥४॥ परित्यक्ता देवा विविधविधसेवाकुलतया मया पच्चाशीतेरधिकमपनीते Devyapradh Kshamapan Stotra तु वयसि। इदानीं चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम ॥५॥ श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातङ्को रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः। तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ ॥६॥ चिताभस्मालेपो गरलमशनं दिक्पटधरो जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः। कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदम ॥७॥ न मोक्षस्याकाङ्क्षा भवविभववाञ्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः। अतस्त्वां संयाचे Devyapradh Kshamapan Stotra जननि जननं यातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीति जपतः ॥८॥ नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः किं रुक्षचिन्तनपरैर्न कृतं वचोभिः। श्यामे त्वमेव यदि किञ्चन मय्यनाथे धत्से कृपामुचितमम्ब परं तवैव ॥९॥ आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि। नैतच्छठत्वं मम भावयेथाः क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरन्ति ॥१०॥ जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि। अपराधपरम्परावृतं न हि माता समुपेक्षते सुतम ॥११॥ मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि। एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥१२॥ ॥इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्॥

Devyapradh Kshamapan Stotra:देव्यपराध क्षमापन स्तोत्रम् Read More »

वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत

वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर:इस मंदिर को विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर बताया जाता है, जो अभी मथुरा के वृंदावन में अंडर कंस्ट्रक्शन है। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर, भारत के उत्तर प्रदेश में मथुरा जिले के वृन्दावन शहर का एक ऐतिहासिक मंदिर है। इस मंदिर को विश्व का सबसे ऊंचा मंदिर बताया जाता है, जो अभी मथुरा के वृंदावन में अंडर कंस्ट्रक्शन है। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर परिसर करीब 26 एकड़ में फैला हुआ है और इसकी ऊंचाई 700 फीट है। इस मंदिर में वर्ष भर में आने वाले विभिन्न तरह के धार्मिक पर्वों और त्योहारों को मनाया जाएगा। आने वाले समय में यह मंदिर हिन्दूओं के लिए एक बहुत बड़ा दर्शनिक स्थान होगा। मंदिर का इतिहास वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का निर्माण कार्य 2014 में शुरू हुआ। इस मंदिर की नीव का पहला पत्थर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी द्वारा रखा गया था। वर्तमान समय में इस मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जिसके पुरे होने की संभावना 2024 से 2025 के बीच में है। इसका निर्माण कार्य पूरा होते ही यह मंदिर सभी श्री कृष्ण भक्तों के लिए खोल दिया जायेगा। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर की संरचना में आईआईटी दिल्ली के सिविल इंजीनियर डिपार्टमेंट के इंजिनियर लगे हुए हैं, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जिनके स्ट्रक्चरल कंसलटेंट संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के थोर्नटन टॉमसटी हैं। इस मंदिर के निर्माण के लिए मुख्य आर्केटेक्ट के रूप में गुरुग्राम की कंपनी InGenious Studio प्राइवेट लिमिटेड और नोएडा स्थित क्विंटेस्सेंस डिजाईन स्टूडियो काम कर रही है। मंदिर का महत्व वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का मुख्य आकर्षण एक कैप्सूल एलिवेटर होगा, जो आगंतुकों को शीर्ष पर ले जाएगा जहां से आप पुरे ब्रज मंडल के विहंगम दृश्य का आनंद ले सकेंगे। मंदिर के निर्माण की कुल लागत लगभग 300 करोड़ होगी, जिस कारण यह दुनिया का सबसे महंगा मंदिर बन जाएगा । वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर मंदिर परिसर के चारों ओर 12 वनों का नाम ब्रज मंडल के 12 उद्यानों के नाम पर रखा जाएगा, जो इस प्रकार हैं- महावन, वृंदावन, लोहावन, काम्यवन, कुमुदवन, तलवन, भांडीरावण, मधुवन, कुमुदवन, बहुलवन, बिल्ववन और भद्रवन। मंदिर की वास्तुकला वृंदावन चंद्रोदय मंदिर का निर्माण आधुनिक डिजाइन के साथ एक पारंपरिक नागर शैली की वास्तुकला के अनुसार किया जा रहा है। यह मंदिर दुनिया का सबसे ऊंचा धार्मिक स्थल बनने जा रहा है, वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर जो लगभग 700 फीट ऊंचा और 213 मीटर लंबा होगा। वृंदावन चंद्रोदय मंदिर परिसर लगभग 26 एकड़ भूमि के क्षेत्र में बनेगा। इस परिसर के चारों ओर हरे-भरे जंगल बनाए जा रहे हैं। इस जंगल को फल-फूल के वृक्षों, झरनों और छोटी-छोटी कृत्रिम पहाड़ियों से बनाया जायेगा, यहां पर श्री कृष्ण काल के वर्णन के अनुसार सब कुछ निर्मित किया जाएगा। मंदिर का समय सुबह मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 12:00 PM दोपहर में मंदिर खुलने का समय 01:00 PM – 08:00 PM

वृन्दावन चंद्रोदय मंदिर:वृंदावन, उत्तरप्रदेश, भारत Read More »

हर की पौड़ी:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

‘हर की पौड़ी’ या ब्रह्मकुंड के एक पत्थर में श्रीहरि के पदचिह्न स्थापित है। उत्तराखंड के शहर हरिद्वार में स्थित हर की पौड़ी एक अत्यंत प्रतिष्ठित और पवित्र स्थल है। इस स्थान का हिंदू पौराणिक कथाओं में अत्यधिक धार्मिक महत्व है। ‘हर की पौरी’ नाम का सामान्य अर्थ है “भगवान श्री हरि विष्णु के चरण” । इसे पवित्र गंगा नदी के तट पर सबसे पवित्र स्नान घाटों में से एक माना जाता है। इस धार्मिक स्थल को वह बिंदु भी माना जाता है जहां पवित्र गंगा पहाड़ों से निकलकर मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। प्राचीन वैदिक काल के अनुसार, माना जाता है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों ही हर की पौरी आये थे। जिस कारण यह स्थान अत्यधिक पवित्र स्थान के रूप में परिवर्तित हो गया है। मंदिर का इतिहास किंवदंतियों के अनुसार, बताया जाता है कि हर की पौड़ी का निर्माण पहली शताब्दी ईसा पूर्व में राजा विक्रमादित्य द्वारा किया गया था। राजा विक्रमादित्य ने इस घाट को अपने भाई भतृहरि की श्रद्धांजलि के रूप में निर्मित करवाया था। क्योंकि भतृहरि पवित्र गंगा के तट पर ध्यान करते थे। हर की पौड़ी की सीढ़ियों पर कई मंदिर बनाए गए जिनका निर्माण 19वीं सदी में हुआ। 1938 में, घाटों का प्रारंभिक विस्तार किया गया, जिसे उत्तर प्रदेश के आगरा के जमींदार पंडित हरज्ञान सिंह कटारा द्वारा बनवाया गया था। इसके बाद, 1986 में, घाटों का नवीनीकरण भी हुआ। ऐसा भी बताया जाता है कि हर की पौड़ी पर राजा श्वेत ने भगवान् ब्रह्मा की तपस्या की थी। उनकी तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा जी ने वरदान मांगने को कहा। इस पर राजा ने इच्छा रखी कि इस स्थान को भगवान के नाम से जाना जाए। तब से हर की पौड़ी को ‘ब्रह्म कुण्ड’ भी कहा जाता है। मंदिर का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मन्थन होने के बाद अमृत के लिए देव और दानव झगड़ रहे थे तब उनसे बचाकर धन्वंतरी अमृत ले जा रहे थे तो अमृत की कुछ बूँदें पृथ्वी पर गिर गई और वह जगहें धार्मिक स्थान बन गए। हरिद्वार में भी अमृत की बूँदे गिरी थीं वह स्थान हर की पौड़ी था। ऐसा माना जाता है कि यहाँ पर स्नान करने से मोक्ष प्राप्त होता है। यहाँ से ही भक्त जल भरकर अपने घर ले जाते हैं जिसे गंगा जल कहते हैं। मंदिर की वास्तुकला हर की पौड़ी एक बहुत ही सुन्दर घाट है। जो गंगा नदी के तट पर बना हुआ है। यहाँ पर भक्त गंगा स्नान के लिए आते हैं। घाट के पास ही बहुत छोटे छोटे मंदिर बने हुए हैं। हर की पौड़ी के घाट पर ही प्रसिद्ध ” ब्रह्म कुंड” बना हुआ है। इस घाट के एक पत्थर की दीवार पर एक बड़ा पदचिह्न है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह भगवान विष्णु के चरण है। बहुचर्चित शाम की गंगा आरती भी यहां आयोजित की जाती है, जो दुनिया भर से हजारों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है। घाट के थोड़ी थोड़ी दूरी पर नारंगी और सफ़ेद रंग के जीवन रक्षक टावर भी लगाए गए है। जो कि निगरानी के लिए है। ताकि गंगा के तेज बहाव में कोई श्रद्धालु बह न जाएँ। मंदिर का समय गर्मियों के दौरान सुबह की आरती का समय 05:30 AM – 06:30 AM सर्दियों के दौरान सुबह की आरती का समय 06:30 AM – 07:30 AM गर्मियों के दौरान शाम की आरती का समय 06:30 PM – 07:30 PM सर्दियों के दौरान शाम की आरती का समय। गंगा आरती में उपस्थित रहने के लिए आपको आरती से कम से कम आधे घंटे पहले पहुंचना चाहिए। ताकि आप सरलता से आरती के दर्शन कर सकें। 05:30 PM – 06:30 PM

हर की पौड़ी:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत Read More »

कांच मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत

कांच मंदिर:जैन समाज के कांच मंदिर में सभी धर्मों और समाज के लोग दर्शन करने आते हैं। कांच मंदिर:भारत के मध्य प्रदेश के शहर इंदौर में कांच मंदिर स्थित है। ना केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी मशहूर है। 102 साल पुराने इस मंदिर का पूरा इंटीरियर कांच से किया गया है यानी छत से लेकर, खंभे, दरवाज़े, खिड़कियां, झूमर सबकुछ कांच का बना हुआ है। जैन समाज के कांच मंदिर में सभी धर्मों और समाज के लोग दर्शन करने आते हैं। साथ ही के बेहतरीन बनावट के दर्शन के साथ इसकी खूबसूरती को निहारते ही रह जाते हैं। मंदिर का इतिहास बनाने की शुरुआत करीब 1913 में इंदौर के सर सेठ हुकुमचंद ने की थी। श्री विक्रम सवंत 1978 मिति आषाढ़ सुदी 7 सोमवार सन 1921 में इसमें मूर्ति स्थापना कि गई । कांच मन्दिर बनाने वाले सर सेठ हुकुमचंद ने अपना निजी मन्दिर बनाए जाने के उद्देश्य से इसे बनवाया था, लेकिन ये सभी लोगों के लिए खुला था। सेठ हुकुमचंद ने कांच मंदिर को बनवाने में करीब 1 लाख 62 हज़ार रुपये खर्च करीब 250 कारीगरों से बनवाया था। पूरे मंदिर में बनाई गई अद्भुत कलाकृतियों में जैन धर्म के विषय में बताया गया है। मंदिर का महत्व कांच मंदिर को छत से लेकर ज़मीन तक पूरा कांच का बनाया गया है। इसमें जैन समाज के सभी गुरु और मुनियों की कलाकॄति के साथ धर्म के विषय में भी खूबसूरत नक्काशी की गई है। कांच मंदिर में स्थापित भगवान शांतिनाथ के काली संगरमरमर की मूर्ति राजस्थान से गई थीं। इस मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो पाई इसलिए इसे चेतालय कहा जाता है। में रखा सोने का रथ और पालकी महावीर जयंती पर निकाला जाता था। मंदिर की वास्तुकला कांच मंदिर में श्री चंद्रप्रभा भगवान एवं बाईं और आदिनाथ भगवान विराजे है। शांतिनाथ भगवान कि मूर्ति काले पत्थर कि बनी है, जिसे जयपुर में बनवाया गया, जिसमें अन्दर सारा कार्य कांच का किया हुआ है। यह कांच बेल्जियम से मंगाया गया था व खम्भे लाल पत्थर के है इसका दरवाजा लकड़ी का बना हुआ है। उस पर चाँदी कि परत लगाई गई है। इस मंदिर में कि गयी कारीगरी देखते ही बनती है यहाँ पर कारीगरी और कांच कि नक्काशी ईरान और जयपुर के कारीगरों द्वारा कि गई है | इस मंदिर में कि गयी कांच कि नक्काशी और कारीगरी के कारण यहाँ 3D प्रभाव आता है। मंदिर की की इमारत में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं है बल्कि चूने से पत्थर की जुड़ाई की गई है। इसका आर्किटेक्ट खुद सेठ हुकुमचंद ने किया था। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 10:00 AM – 05:00 PM

कांच मंदिर:इंदौर, मध्य प्रदेश, भारत Read More »

तक्षकेश्वर नाथ:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत

प्रयागराज में इस स्थल को “बड़ा शिवाला” के नाम से जाना जाता है। तक्षकेश्वर नाथ मंदिर, भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के प्रयागराज जिले में स्थित है। संगम नगरी में यमुना किनारे तक्षकेश्वर नाथ मंदिर विश्व का एकलौता तक्षक तीर्थ स्थल है। वर्तमान में यह स्थान प्रयागराज शहर के दक्षिणी क्षेत्र में दरियाबाद मुहल्ले में स्थित है। यह स्थल आदिकाल से संरक्षित है और यहां शेषनाग के अवशेष आज भी मौजूद है। यह यमुना तट पर विशाल घने जंगलों में स्थापित शिवलिंग था। हालांकि यहां अब जंगल का अस्तित्व खत्म हो गया है। प्रयागराज में इस स्थल को “बड़ा शिवाला” के नाम से जाना जाता है। मंदिर का इतिहास तक्षकेश्वर नाथ मंदिर का इतिहास 5,000 साल से भी ज्यादा पुराना है। तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग की प्राचीनता और पौराणिकता स्वयं पुराणों में दर्ज है। पौराणिक कथा के अनुसार, राजा परीक्षित को जब तक्षक नाग ने डसा था, तब उस घटना के प्रायश्चित में इन पांचों मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा की गई थी और वरदान दिया गया था कि जो कोई भी इस मंदिर में जाकर दर्शन करेगा, उसके वंशजों को कभी सर्प की विष बाधा नहीं होगी। पुराणों की माने तो तक्षक संपूर्ण सर्पजाति के स्वामी हैं। आदिकाल से यह धर्म की राजधानी तीर्थराज प्रयाग में निवास कर रहे हैं। शास्त्रों में भी कहा गया है कि काल सर्पयोग शांति, राहु की महादशा, नागदोष एवं विष बाधा से मुक्ति का मुख्य स्थान तक्षकेश्वर नाथ प्रयाग ही है। मंदिर का महत्व ऐसी मान्यता है कि दो दशक पहले तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में सावन के महीने में यहां सांपों का आना जाना अत्याधिक बढ़ जाता था। मान्यता है कि यहां शिवलिंग के दर्शन से कालसर्प दोषों से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में शिव जी के दर्शन करने वाले श्रद्धालुओं को और उनके वंशजों को सर्प विष बाधा से मुक्ति मिलती है। मंदिर की वास्तुकला प्रयागराज में तक्षकेश्वर नाथ मंदिर को नागर शैली में बनाया गया है। मंदिर में विशाल शिखर के साथ गुंबद भी बने हैं। तक्षकेश्वर महादेव के लिंग के चारों ओर तांबे का अर्घ्य बना है। परिसर में हनुमान जी, गणेश जी की मूर्ति है। 20 जनवरी 1992 को खुदाई के दौरान यहां खुदाई में पौराणिक काल के कुछ अवशेष प्राप्त हुये थे। कई पत्थर और प्राचीन मूर्तियां यहां मिलीं और उन पर पर बारीक नक्काशी मौजूदा मानव सभ्यता से भी प्राचीन बताई गई। पुरातत्व विभाग ने भी यहां पत्थरों का अवलोकन किया और अति प्राचीन सभ्यता की कृति होने के कारण आज भी उस पर शोध जारी है। मंदिर का समय सुबह तक्षकेश्वर नाथ मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 12:00 PM शाम को तक्षकेश्वर नाथ मंदिर खुलने का समय 04:00 PM – 10:00 PM मंदिर का प्रसाद तक्षकेश्वर नाथ मंदिर में भक्त शिव जी फल, दूध, लड्डू का भोग चढ़ाते हैं। साथ ही भांग, दतुरा, बेलपत्र भी शिव जी को चढ़ाया जाता है।

तक्षकेश्वर नाथ:प्रयागराज, उत्तरप्रदेश, भारत Read More »