Chatushloki Bhagwat | चतु:श्लोकी भगवत्

Chatushloki Bhagwat:चतुश्लोकी भागवत: हिन्दू धर्म के अनुसार, “ॐ” इस संसार की प्रत्येक सृष्टि का मूल प्राण है। चतुश्लोकी भागवत के चार श्लोकों में भगवत गीता की संपूर्ण शिक्षाओं का सार है। श्रीमद्भागवत भगवान का स्वरूप है, इसलिए इसकी भक्तिपूर्वक पूजा की जाती है। इसके पठन और श्रवण से भोग और मोक्ष दोनों सुलभ हो जाते हैं। Chatushloki Bhagwat मन की शुद्धि के लिए इससे बड़ा कोई साधन नहीं है। जैसे सिंह की दहाड़ सुनकर भेड़िया भाग जाता है, वैसे ही भागवत के पठन से कलियुग के सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। इसे सुनकर हरि हृदय में अपना निवास बनाते हैं। चतुश्लोकी भागवत में श्री वल्लभ ने वैष्णवों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पुरुषार्थों का अर्थ समझाया है। उन्होंने अपने वैष्णवों से कहा है कि एक वैष्णव के लिए उसके सभी कर्म और इच्छाएं केवल एक ही शक्ति अर्थात श्रीनाथजी की ओर निर्देशित होती हैं। भागवत का लोक में विशेष स्थान है, इसलिए भागवत पाठकों के लिए रोजगार की समस्या समस्याजनक नहीं है। आज लाखों लोग भागवत प्रवक्ता बनकर स्वयं कमा रहे हैं और दूसरों को जीविका का अवसर दे रहे हैं। Chatushloki Bhagwat इस प्रकार भागवत का ज्ञान प्राप्त करके और प्रवचनकर्ता बनकर कोई भी व्यक्ति धन के साथ-साथ सम्मान और सिद्धि भी अर्जित कर सकता है। Chatushloki Bhagwat ke labh:चतुश्लोकी भागवत के लाभ इस प्रकार दुख, अत्याचार, दुर्भाग्य की विजय तथा पापों का शमन, शत्रुओं पर विजय, ज्ञान प्राप्ति, रोजगार, सुख समृद्धि तथा मोक्ष अर्थात सफल जीवन के पूर्ण प्रबंध के लिए भागवत का नित्य पठन-पाठन अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इसमें जो फल सहज में सुलभ होते हैं, वे अन्य साधनों की अपेक्षा दुर्लभ रहते हैं। वस्तुतः संसार में शुककथा (भागवत शास्त्र) से शुद्ध कोई वस्तु नहीं है। अत: भागवत का पठन-पाठन सबके लिए सदैव लाभदायक है। ये चार श्लोक ही सम्पूर्ण महाकाव्य भागवत पुराण का सार हैं। इन चारों श्लोकों का प्रतिदिन पूर्ण श्रद्धा के साथ पाठ करने तथा सुनने से मनुष्य का अज्ञान तथा अहंकार दूर होकर उसे आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य चतुश्लोकी भागवत का पाठ करता है, वह पापों से मुक्त होकर अपने जीवन में सत्य मार्ग का अनुसरण करता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जिन व्यक्तियों को स्वयं का ज्ञान नहीं है, उन्हें स्वयं का आकलन करने के लिए चतुश्लोकी भागवत के इन श्लोकों का पाठ करना चाहिए ताकि व्यक्ति अपनी क्षमताओं का मूल्यांकन कर सके। चतु:श्लोकी भगवतम् | Chatushloki Bhagwat ज्ञानं परमगुहां मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । सरहस्यं तदंगं च ग्रहाण गदितं मया ।।1।। यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मक: । तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।2।। अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम् । पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ।।3।। ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तम: ।।4।। यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु । प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ।।5।। एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनात्मन: । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ।।6।। एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना । भवान् कल्पविकल्पेषु न विमुज्झति कर्हिचित् ।।7।।

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Chakra Raj Stotra | चक्र राज स्तोत्र

Chakra Raj Stotra श्री गरुड़ पुराण में चक्र राज स्तोत्र का वर्णन है। चक्र राज स्तोत्र भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र को समर्पित है। सुदर्शन चक्र के पाठ का नियमित पाठ करने से व्यक्ति की समस्त बाधाएं कट जाती हैं, जैसे सुदर्शन चक्र दुष्टों को काटता है, समस्त पीड़ाएं कट जाती हैं। Chakra Raj Stotra:जीवन में किसी व्यक्ति का भूल जाना, गायब हो जाना, दूर चले जाना या खो जाना, ऐसी घटनाएं स्वाभाविक रूप से होती रहती हैं। ऐसी स्थिति में हैहय वंश के कार्तवीराज राजा, जो भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र Chakra Raj Stotra के अवतार माने जाते हैं, उनकी साधना करने से ऐसी समस्या से तुरंत छुटकारा मिल जाता है। सुदर्शन चक्र के बारे में शास्त्रों में वर्णन है कि वे किसी भी दिशा या किसी भी व्यक्ति की इच्छित सामग्री या खोज को लाने में सक्षम हैं। Chakra Raj Stotra पौराणिक कथाओं में आपने भगवान विष्णु और कृष्ण के अस्त्र के रूप में सुदर्शन चक्र का उल्लेख सुना होगा। भगवान विष्णु और श्री कृष्ण के हाथों में सुशोभित चक्र राज स्तोत्र की महिमा और महत्व के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। पौराणिक कथाओं में आपने भगवान विष्णु और कृष्ण के अस्त्र के रूप में सुदर्शन चक्र का उल्लेख अवश्य सुना होगा। भगवान विष्णु और श्री कृष्ण के हाथों में सुशोभित चक्र राज स्तोत्र की महिमा और महत्व के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। सुदर्शन चक्र प्राचीन काल में एक अचूक अस्त्र हुआ करता था, जो लक्ष्य का पीछा करने के बाद, अपना कार्य करने के बाद अपने स्थान पर वापस आ जाता था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चक्र राज स्तोत्र किसी भी दिशा में खोई हुई वस्तु या किसी भी खोए हुए व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति को खोजने में सक्षम है और साधना करके उसे पुनः पाया जा सकता है। ऐसा माना जाता है कि सुदर्शन चक्र की यह दिव्य शक्ति कलयुग में काम करती है और कोई भी व्यक्ति सुदर्शन चक्र के चक्र राज स्तोत्र का पाठ करके खोई हुई वस्तु को वापस पा सकता है। वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार, वास्तविकता, जो पारलौकिक स्तर पर एकात्मक है, अनुभव में प्रक्षेपित होती है जो द्वैत और विरोधाभास की विशेषता रखती है। इस प्रकार हमारे पास शरीर और चेतना, होने और बनने, लालच और परोपकार, भाग्य और स्वतंत्रता से जुड़ा द्वैत है। देवता कल्पना के क्षेत्र में और सामूहिक रूप से समाज में भी इस द्वंद्व को पाटते हैं (काक, 2002): विष्णु नैतिक कानून के देवता हैं, जबकि शिव सार्वभौमिक चेतना हैं। इसके विपरीत, समय और परिवर्तन की प्रक्रियाओं में प्रक्षेपण देवी के माध्यम से होता है। चेतना (पुरुष) और प्रकृति (प्रकृति) एक ही सिक्के के विपरीत पहलू हैं। Chakra Raj Stotra चक्र राज स्तोत्र लाभ ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र Chakra Raj Stotra के इस मंत्र का नियमित जाप करने वाले व्यक्ति के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं तथा इसकी साधना करने से व्यक्ति अपनी सभी मनोकामनाएं पूरी कर सकता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए? जिस व्यक्ति की कोई वस्तु खो गई हो, उसे अपनी वस्तु वापस पाने के लिए चक्र राज स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। चक्र राज स्तोत्र | Chakra Raj Stotra प्रोक्ता पञ्चदशी विद्या महात्रिपुरसुन्दरी । श्रीमहाषोडशी प्रोक्ता महामाहेश्वरी सदा ॥1॥ प्रोक्ता श्रीदक्षिणा काली महाराज्ञीति संज्ञया । लोके ख्याता महाराज्ञी नाम्ना दक्षिणकालिका । आगमेषु महाशक्तिः ख्याता श्रीभुवनेश्वरी ॥2॥ महागुप्ता गुह्यकाली नाम्ना शास्त्रेषु कीर्तिता । महोग्रतारा निर्दिष्टा महाज्ञप्तेति भूतले ॥3॥ महानन्दा कुब्जिका स्यात् लोकेऽत्र जगदम्बिका । त्रिशक्त्याद्याऽत्र चामुण्डा महास्पन्दा प्रकीर्तिता ॥4॥ महामहाशया प्रोक्ता बाला त्रिपुरसुन्दरी । श्रीचक्रराजः सम्प्रोक्तस्त्रिभागेन महेश्वरि ॥5॥ पञ्चदशी विद्या महात्रिपुरसुन्दरी और श्रीमहाषोडशी विद्या सदैव महामाहेश्वरी कही गई हैं। श्रीदक्षिणा काली को महाराज्ञी नाम से कहा गया है और श्री भुवनेश्वरी आगमों में महाशक्ति नाम से प्रसिद्ध हैं। शास्त्रों में गुह्यकाली नाम से महागुप्ता का वर्णन है और पृथ्वी पर महोग्रतारा महाज्ञप्ता बताई गई हैं। जगदम्बा कुंजिका इस लोक में महानन्दा हैं और त्रिशक्त्यात्मिका आद्या चामुण्डा महास्पन्दा कही गई हैं। बाला त्रिपुरसुन्दरी महामहाशया कही गई हैं। हे महेश्वर!इस प्रकार तीन भागों में श्रीचक्रराज का वर्णन है।

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Mahashivratri 2025:मेष राशि वाले आज करें इस मंत्र का जाप, वैवाहिक जीवन में आएगी खुशहाली, जानें 12 राशियों के लिए शिव मंत्र

Mahashivratri 2025: शिव भक्तों के लिए महाशिवरात्रि का दिन बहुत खास होता है। इस दिन शिवजी का माता पार्वती संग विवाह संपन्न हुआ था। मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन शिव-गौरी की पूजा करने से मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। कब है महाशिवरात्रि? Kab hai Mahashivratri 2025 द्रिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि का आरंभ 26 फरवरी 2025 को सुबह 11 बजकर 08 मिनट पर होगा और अगले दिन 27 फरवरी 2025 को सुबह 08 बजकर 54 मिनट पर समाप्त हो जाएगा। Mahashivratri 2025 महाशिवरात्रि में निशिता काल पूजा का बड़ा महत्व है। इसलिए 26 फरवरी 2025 को महाशिवरात्रि मनाई जाएगी। महाशिवरात्रि 2025: पूजा मुहूर्त Mahashivratri puja Muhurat महाशिवरात्रि Mahashivratri 2025 के दिन शिवजी की निशिता काल में पूजा की जाती है। 27 फरवरी को सुबह 12 बजकर 09 मिनट से लेकर 12 बजकर 59 मिनट तक निशिता काल पूजा का समय रहेगा। इस दिन चार प्रहर में भी शिव-गौरी की आराधना की जाती है। रात्रि प्रथम प्रहर पूजा मुहूर्त- 06:19 पी एम से 09:26 पी एम रात्रि द्वितीय प्रहर पूजा मुहूर्त- 09:26 पी एम से 27 फरवरी को 12:34 ए एम तक रात्रि तृतीय प्रहर पूजा मुहूर्त- 12:34 ए एम से 27 फरवरी को 03:41 ए एम तक रात्रि चतुर्थ प्रहर पूजा मुहूर्त- 03:41 ए एम से 27 फरवरी को 06:48 ए एम तक भद्राकाल : महाशिवरात्रि Mahashivratri 2025 के दिन सुबह 11:08 ए एम से 10:05 पी एम तक भद्राकाल भी रहेगा। हिंदू धर्म में भद्राकाल में धार्मिक कार्यों की मनाही होती है। पारण टाइमिंग- 26 फरवरी को महाशिवरात्रि का व्रत रखने वाले जातक 27 फरवरी को सुबह 06:48 ए एम से 08:54 ए एम तक व्रत का पारण कर सकते हैं। इस दिन शिव-गौरी की पूजा करें। अपने क्षमतानुसार अन्न-धन का दान करें। इसके बाद व्रत खोलें। महाशिवरात्रि पर राशि अनुसार मंत्र Mahashivratri per Rashi Anusar Mantra

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Ox in Dream:सपने में नंदी बैल देखना असली मतलब यह है शुभ या अशुभ जानिए क्या कहता है स्वप्न शास्त्र

Ox in Dream:रात में सोते हुए समय सपने देखना हर व्यक्ति के लिए आम बात है. स्वप्न शास्त्र के अनुसार, सपने में नंदी बैल दिखाई देना बहुत शुभ माना गया है. यह सपना घर में सुख-शांति आने का संकेत देता है. आइए जानते हैं, इस सपने के संकेतों के बारे में:   सपने में नंदी देखना कैसा होता है क्या यह भगवान शिव का आपके लिए शाप है या आशीर्वाद है. नंदी भगवान शिव के बहुत ही बड़े भक्त थे, नंदी एक तरह से भक्ति का प्रतिक भी होते है. तो Ox in Dream नंदी की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें हमेशा अपने साथ रहने का वरदान दिया था और अपने सपने में नंदी को भगवान शिव के साथ देखना बड़ा ही दुर्लभ और शुभ स्वप्न माना जाता है. सपनो की दुनिया बड़ी रहस्य्मय होती है, अक्सर हमे हमारे आने वाले कल के बारे में अच्छा बुरा सपने में दिखाई दें जाता है. Ox in Dream ऐसे ही सपने में नंदी बैल को देखना भी होता है, Ox in Dream आप नंदी से बात करना या दर्शन करना या उन्हें किसी भी रूप में सपने में देख सकते है. यहाँ तक की आप नंदी बैल को सामान्य बैल के जैसे भी देख सकते है और यह संकेत भी होता है. तो चलिए आगे जानते है नंदी जी के स्वप्न फल के बारे में. सपने में नंदी देखने का मतलब Sapne me ox dekhne ka matlab स्वप्न शास्त्र के अनुसार, अगर सपने में नंदी बैल nandi bel देखा है तो इसका मतलब ये है आपके जीवन में नए काम की शुरुआत होगी. इसके बाद आपका जीवन सुखमय हो जाएगा. आपको शिव और पार्वती की पूजा अवश्य करनी चाहिए ताकि आपको इस सपने का पूरा लाभ मिल सके और आप भी एक सुखमय जीवन का लाभ ले सकें. सुख-समृद्धि का संकेत देता है नंदी Ox in Dream स्वप्न शास्त्र के अनुसार, अगर सपने में आपको नंदी बैल दिखाई देता है तो इसका एक खास मतलब होता है. Ox in Dream इस सपने को शुभ माना गया है. यह सपना शांति, समृद्धि और स्थिरता का प्रतीक है. अगर आप सपने में भगवान शिव नंदी पर सवार हैं तो इसका मतलब है कि आपको सफलता, तरक्की और मान-सम्मान मिलने वाला है.  गर्भवती स्त्री के सपने में नंदी बैल आने का मतलब Sapne me nandi bail ko dekhna स्वप्न शास्त्र के अनुसार, अगर किसी गर्भवती स्त्री को सपने में नंदी Ox in Dream दिखाई देते है तो इसे काफी शुभ माना जाता है. इसका मतलब है कि आपको भाग्यशाली संतान की प्राप्ति होगी. इस तरह के सपने धन वृद्धि के संकेत भी देते हैं. सपने में सफेद बैल का मारना Sapne me white ox ko marna स्वप्न शास्त्र के अनुसार, एक सफेद बैल के मारने का सपना देखना कोई असामान्य घटना नहीं है. यह छिपी हुई आक्रामकता, अनसुलझे क्रोध या खुद को अभिव्यक्त करने की दबी हुई इच्छा का प्रतिनिधित्व कर सकता है.  सपने में शिवलिंग और नंदी देखना Sapne me shivling or nandi Dekhna यह भी बड़ा ही शुभ स्वप्न होता है, यह स्वप्न आपके अंदर छुपी हुई भक्ति भाव को दिखाता है और संकेत करता है की आने वाले समय में आपको अपनी भक्ति का फल मिलने वाला है. यह बहुत ही शुभ होता है, अगर आप वह मंदिर देखते है जहाँ आप दर्शन के लिए जाते है तो यह स्वप्न संकेत करता है की आपके अंदर उस मंदिर और भगवान के प्रति दिनों दिन भक्ति भाव बढ़ता जा रहा आने वाले समय में आप और भी ज्यादा धार्मिक हो जायेंगे, एक तरह से यह भगवान की कृपा होने को बताता है. यानी भक्ति आपके अंदर गहराई में बढ़ती जा रही है और आपसे शिव जी भी प्रसन्न है ऐसा आपका यह शिलिंग और Ox in Dream नंदी को देखना संकेत करता है. इसके अलावा अगर आप कोई ऐसा मंदिर देखते है जिसे आपने असल जीवन में कभी नहीं देखा यानी अनजानी जगह को देखते है जहाँ शिवलिंग और नंदी दिखाई देते है तो यह आपके पिछले जन्म की स्मृति याद का संकेत करता है. (Disclaimer: यहां दी गई सभी जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. Karmasu.in इसकी पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.) सपने में दिख जाए बाघ, तो हो जाएं सावधान वरना होगा भारी नुकासान

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Ghatikachala Hanuman Stotram:श्रीघटिकाचलहनुमत्स्तोत्रम् 

श्रीघटिकाचलहनुमत्स्तोत्रम् विशेषताएँ:Ghatikachala Hanuman Stotram Ghatikachala Hanuman Stotram:श्रीघटिकाचलहनुमत्स्तोत्रम् के साथ-साथ यदि हनुमान कवच और हनुमान चलीसा का पाठ किया जाए तो, श्रीघटिकाचलहनुमत्स्तोत्रम् का बहुत लाभ मिलता है यह स्तोत्र शीघ्र ही फल देने लग जाता है| हनुमत् मंगलाष्टक का पाठ करने से मनोवांछित कामना पूर्ण होती है| अगर आपका मन पढाई में नही लग पा रहा है तो आपको हनुमान सहस्रहनाम का पाठ करना चाहिए| जीवन में शांति प्राप्त करने के लिए इस स्तोत्र का पाठ नियमित रुप से करना चाहिए श्रीघटिकाचलहनुमत्स्तोत्रम् (Ghatikachala Hanuman Stotram) शङ्खचक्रधरं देवं घटिकाचलवासिनम् । योगारूढं ह्याञ्जनेयं वायुपुत्रं नमाम्यहम् ॥ १॥ भक्ताभीष्टप्रदातारं चतुर्बाहुविराजितम् । दिवाकरद्युतिनिभं वन्देऽहं पवनात्मजम् ॥ २॥ कौपीनमेखलासूत्रं स्वर्णकुण्डलमण्डितम् । लङ्घिताब्धिं रामदूतं नमामि सततं हरिम् ॥ ३॥ दैत्यानां नाशनार्थाय महाकायधरं विभुम् । गदाधरकरो यस्तं वन्देऽहं मारुतात्मजम् ॥ ४॥ नृसिंहाभिमुखो भूत्वा पर्वताग्रे च संस्थितम् । वाञ्छन्तं ब्रह्मपदवीं नमामि कपिनायकम् ॥ ५॥ बालादित्यवपुष्कं च सागरोत्तारकारकम् । समीरवेगं देवेशं वन्दे ह्यमितविक्रमम् ॥ ६॥ पद्मरागारुणमणिशोभितं कामरूपिणम् । पारिजाततरुस्थं च वन्देऽहं वनचारिणम् ॥ ७॥ रामदूत नमस्तुभ्यं पादपद्मार्चनं सदा । देहि मे वाञ्छितफलं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् ॥ ८॥ इदं स्तोत्रं पठेन्नित्यं प्रातःकाले द्विजोत्तमः । तस्याभीष्टं ददात्याशु रामभक्तो महाबलः ॥ ९॥

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Lord Shiva in Dream:सपने में भगवान शिव को देखने का क्या होता है मतलब, जानिए इससे जीवन पर कैसा पड़ता है प्रभाव

Lord Shiva in Dream:स्वप्न में शिवलिंग के दर्शन, ज्योतिर्लिंग की यात्रा संकेत देती है कि, कार्य करते रहें आप सही दिशा में हैं सफलता अवश्य मिलेगी।  Lord Shiva in Dream:स्वप्न शास्त्र में सपनों के फलादेश के बारे में बताया गया है। धर्म शास्त्रों के जानकार बताते हैं कि हर स्वप्न कुछ ना कुछ संकेत जरूर देता है। हालांकि यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि स्वप्न किस वक्त देखा गया है। स्वप्न शास्त्र के अनुसार, कुछ सपने…. श्रावण माह में शिवभक्ति अपने चरम पर है। सभी शिवभक्त अपनी लौकिक-पारलौकिक इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए अहर्निश शिव आराधना में लगे हुए हैं। ऐसे में कई भक्तों को तो स्वप्न ईष्ट के दर्शन भी होंगे। उनकी पूजा-आराधना के शुभा-शुभफल के संकेत भी दिखाई देंगे। यद्यपि ये स्वप्न हमेशा सत्य नहीं होते किन्तु कई बार देखा गया है कि ये बिल्कुल सत्य होते हैं। आदिकाल से ही ईश्वर अपने अनेकों भक्तों को स्वप्न में आकर निर्देशित करते रहे हैं। कई पुजारियों, राजाओं, सेठ-साहूकारों को तो देवी-देवता स्वयं स्वप्न में आकर निर्देशित कर चुके हैं कि मेरी मूर्ति यहां से निकालो, मन्दिर बनवाओं अथवा वो हमारा भक्त है उसकी सहायता करों आदि-आदि ऐसे अनेकों प्रमाण आज भी मिलते हैं। कई बार सपने उसी दिन सत्यघटित होते देखे गए हैं Lord Shiva in Dream इनमें से एक सर्वाधिक प्रसिद्द स्वप्न त्रेतायुग में त्रिजटा ने लंकापति रावण और लंका निवासियों की दुर्दसा का देखा था कि, ‘सपने वानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।। और वह स्वप्न तो उसी दिन सत्य घटित हुआ था। ऐसे और भी अनेकों प्रमाण हैं। Lord Shiva in Dream:सावन में शिव सम्बंधित स्वप्न पवित्र श्रावण माह में शिव भक्तों को स्वप्न में अधिकांशतः अपने ईष्ट के दर्शन होते सुने गए हैं। यदि साक्षात शिव के दर्शन हों तो दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों तथा सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है। स्वप्न में शिवलिंग के दर्शन, ज्योतिर्लिंग की यात्रा संकेत देती है कि, कार्य करते रहें आप सही दिशा में हैं सफलता अवश्य मिलेगी। स्वप्न में शिवलिंग Lord Shiva in Dream पर बेलपत्र-पुष्पादि अर्पित करना, माता दुर्गा को नारियल-चुनरी चढ़ाना, हनुमान जी को सिंदूर का लेप करना, गणेश जी पर दूर्वा अर्पित करना, किसी भी देवी-देवता की आराधना-आरती करते देखना, शंख बजाना ये सब आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी होने और पूजा स्वीकार होने के संकेत हैं। स्वप्न में रुद्राभिषेक करना या करवाना, शिव चालीसा का पाठ करना, शिव महिमा के स्तोत्र पढ़ना, शिवजी पर गंगाजल अथवा जल से अभिषेक करना, दानपुण्य करना आदि भी शिवकृपा प्राप्ति के लक्षण हैं। Lord Shiva in Dream:स्वप्न शास्त्र में सपनों के फलादेश के बारे में बताया गया है। धर्म शास्त्रों के जानकार बताते हैं कि हर स्वप्न कुछ ना कुछ संकेत जरूर देता है। हालांकि यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि स्वप्न किस वक्त देखा गया है। Lord Shiva in Dream स्वप्न शास्त्र के अनुसार, कुछ सपने शुभ संकेत देते हैं, जबकि कुछ स्वप्न बेहद अशुभ संकेत देने वाले होते हैं। आइए जानते हैं कि सपने में शिवजी की देखना शुभ संकेत देता है या अशुभ। Lord Shiva in Dream सपने में भगवान शिव को देखना डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है। किसी भी उपाय को करने से पहले संबंधित विषय के एक्सपर्ट से सलाह अवश्य लें।

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Jaya Ekadashi 2025 Bhog: जया एकादशी पर लगाएं भगवान विष्णु को इन चीजों का भोग, धन-दौलत में होगी अपार वृद्धि

Jaya Ekadashi 2025 Bhog: 20 फरवरी 2024 को माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी है। आप लोगों को पता ही है कि प्रत्येक महीने में एकादशी दो बार आती है। एक बार कृष्ण पक्ष में और दूसरी बार शुक्ल पक्ष में। कृष्ण पक्ष की एकादशी पूर्णिमा के बाद आती है और शुक्ल पक्ष की एकादशी अमावस्या के बाद आती है। अतः 20 फरवरी 2024 यानी कल जया एकादशी का व्रत रखा जाएगा। Jaya Ekadashi 2025 Bhog शास्त्रों में ये एकादशी बड़ी ही फलदायी बताई गई है। एकादशी में भगवान विष्णु के निमित्त व्रत करने और उनकी पूजा करने का विधान है। Jaya Ekadashi 2025 Bhog जया एकादशी के दिन जो गृहस्थ हैं और जो गृहस्थ नहीं हैं, दोनों को ये व्रत करना चाहिए और श्री विष्णु की पूजा करनी चाहिए। साथ ही माता लक्ष्मी की भी पूजा-अर्चना करनी चाहिए। कहते हैं Jaya Ekadashi 2025 Bhog इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को भूत-प्रेत और भय आदि से भी छुटकारा मिलता है। जया एकादशी के दिन विभिन्न शुभ फलों की प्राप्ति के लिए क्या कुछ खास उपाय करने चाहिए। जया एकादशी भोग (Jaya Ekadashi 2025 Bhog List ) जया एकादशी शुभ मुहूर्त (Jaya Ekadashi 2025) वैदिक पंचांग के अनुसार, Jaya Ekadashi 2025 Bhog माघ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 07 फरवरी को रात 09 बजकर 26 मिनट पर शुरू होगी। वहीं इसका Jaya Ekadashi 2025 Bhog समापन 08 फरवरी को रात 08 बजकर 15 मिनट पर होगा। उदया तिथि को देखते हुए, इस साल जया एकादशी का व्रत दिन शनिवार, 08 फरवरी को रखा जाएगा। जया एकादशी व्रत के दिन करें ये उपाय Jaya Ekadashi 2025 Date: कब है जया एकादशी? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

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Jaya Ekadashi 2025 Date: कब है जया एकादशी? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

Jaya Ekadashi 2025 Date: हिंदू धर्म में जया एकादशी का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। धार्मिक मत है कि भगवान विष्णु के शरण और चरण में रहने वाले साधकों पर मां लक्ष्मी की विशेष कृपा बरसती है। उनकी कृपा से धन की समस्या दूर होती है। साथ ही घर में सुख समृद्धि एवं शांति बनी रहती है। माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी (Jaya Ekadashi 2025 Date) तिथि पर साधक भक्ति भाव से लक्ष्मी नारायण जी की पूजा करते हैं। धार्मिक मत है कि एकादशी व्रत करने से साधक पर लक्ष्मी नारायण जी की कृपा बरसती है। उनकी कृपा से व्यक्ति को पृथ्वी लोक पर सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। लेकिन क्या आपको पता है कि जया एकादशी (Jaya Ekadashi 2025 Date) कब और क्यों मनाई जाती है? आइए, इसके बारे में सबकुछ जानते हैं- कब मनाई जाती है जया एकादशी? Jaya Ekadashi 2025 Date सनातन शास्त्रों के अनुसार, माघ माह में जया एकादशी मनाई जाती है। यह पर्व माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर लक्ष्मी नारायण जी की भक्ति भाव से पूजा की जाती है।इस व्रत की महिमा का वर्णन जगत के पालनहार भगवान कृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को दिया था। उस समय जग के नाथ भगवान कृष्ण ने बताया कि माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी व्रत करने से व्यक्ति विशेष को अमोघ फल की प्राप्ति होती है। Jaya Ekadashi 2025 Date साथ ही साधक के पितरों को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। जया एकादशी 2025 तिथि और शुभ मुहूर्त (Jaya Ekadashi 2025 Date and Shubh Muhurat) वैदिक पंचांग के मुताबिक माघ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 07 फरवरी को रात 09 बजकर 27 मिनट पर हो रहा है। वहीं एकादशी तिथि का अंत 08 फरवरी को रात 08 बजकर 14 मिनट पर होगा। ऐसे में उदयातिथि को आधार मानते हुए जया एकादशी 8 फरवरी को रखा जाएगा।  पंचांग के अनुसार, जया एकादशी व्रत पारण का समय 09 फरवरी को सुबह 07 बजकर 04 मिनट से लेकर 09 बजकर 17 मिनट तक है। जया एकादशी का शुभ मुहूर्त ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 05 बजकर 21 मिनट से 06 बजकर 13 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 26 मिनट से 03 बजकर 10 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 06 बजकर 03 मिनट से 06 बजकर 30 मिनट तक निशिता मुहूर्त – रात 12 बजकर 09 मिनट से 01 बजकर 01 मिनट तक   जया एकादशी 2025 महत्व (Jaya Ekadashi 2024 Significance) जया एकादशी के दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की आराधना करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है। साथ ही आरोग्य की प्राप्ति होती है। साथ ही व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है। Jaya Ekadashi 2025 Date वहीं व्यक्ति बैकुंठ धाम प्राप्त करता है। जैसा की इस एकादशी के नाम से पता चल रहा है, यह व्रत सभी कार्यों में विजय दिलाता है और बेहद कल्याणकारी माना गया है। इस व्रत में दान करने का फल संपूर्ण यज्ञों के बराबर प्राप्त होता है।  बता दें कि जया एकादशी व्रत को बहुत ही शक्तिशाली माना जाता है। इस व्रत को रखने से व्यक्ति सबसे जघन्य पापों यहां तक कि ब्रह्महत्या से भी मुक्त कर सकता है। जया एकादशी शुभ योग (Jaya Ekadashi 2025 Shubh Yoga) जया एकादशी Jaya Ekadashi 2025 Date के दिन भद्रावास और रवि योग का संयोग है। रवि योग में भगवान भास्कर की पूजा करने से साधक को आरोग्य जीवन का वरदान प्राप्त होगा। साथ ही करियर और कारोबार को नया आयाम मिलेगा। इस शुभ अवसर पर मृगशिरा और आर्द्रा नक्षत्र का संयोग है। इन योग में भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से साधक की हर मनोकामना पूरी होगी।

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Govind Damodar Stotra | गोविन्द दामोदर स्तोत्र

Govind Damodar Stotra:गोविंद दामोदर स्तोत्र: भगवान गोविंदा की सेवा में आसक्त होने से आपको शाश्वत आनंद और संतुष्टि मिलेगी। पूर्ण संतुष्टि और शाश्वत आनंद पाने के लिए वृंदावन जाएँ। “वृंदावन के रास्ते में बिल्वमंगलाचार्य एक बार फिर एक ब्राह्मण की सुंदर पत्नी को देखकर वासना से ग्रसित हो गए। अपनी वासना से लज्जित होकर उन्होंने उस महिला की हेयरपिन से अपनी आँखें फोड़ लीं, क्योंकि उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग से विचलित न होने का दृढ़ निश्चय किया था, Govind Damodar Stotra और यदि उनकी आँखें स्त्री रूप की सुंदरता को नहीं देख सकती थीं, तो वे केवल एक आवाज़ या शरीर के प्रति वासना नहीं कर सकते थे, यदि उन्हें नहीं पता था कि वह युवा है या बूढ़ी, सुंदर है या कुरूप। गोविंदा दामोदर प्रसिद्ध अंधे वैष्णव संत बिल्वमंगल ठाकुर द्वारा लिखी गई एक प्रसिद्ध प्रार्थना है। बिल्वमंगल अपने पिछले जन्म में एक भक्त थे। लेकिन बिल्वमंगल के रूप में अपने जन्म में, वे भक्ति सेवा भूल गए और पूरी तरह से इंद्रिय-तृप्ति में लगे रहे। महिलाओं में पूरी तरह से आसक्त होने के कारण उनकी कई रखैलें थीं। हड्डियों को अशुद्ध माना जाता है। Govind Damodar Stotra लेकिन शंख हड्डी से बना है। फिर भी यह शुद्ध है, ऐसा वेद कहते हैं। क्यों? अगर वैज्ञानिक शंख की जांच करें तो वे पाएंगे कि यह कितना शुद्ध है, खासकर तब जब इसके अंदर पानी हो। मल भी अशुद्ध माना जाता है। किसी का मल शुद्ध नहीं माना जाता। लेकिन गाय का गोबर बहुत शुद्ध माना जाता है। इसे खाया भी जा सकता है। लोग गोमूत्र पीते हैं और इससे स्नान करते हैं। Govind Damodar Stotra इससे रोग दूर होते हैं। गाय के गोबर और मूत्र से बहुत लाभ मिलते हैं। इनमें बहुत औषधीय गुण होते हैं। वेदों में यह कहा गया है और सभी लोग वेदों के अनुसार ही चलते हैं। वेद और उपनिषद भी कहते हैं कि तुलसी का पौधा सभी प्रकार की बीमारियों का इलाज है। गंगाजी का पानी भी बहुत शुद्ध माना जाता है। दूसरी नदियों का पानी दूषित हो जाता है, Govind Damodar Stotra उनमें कीड़े पड़ सकते हैं। Govind Damodar Stotra लेकिन अगर आप गंगा का पानी अमेरिका ले जाएं तो आप देखेंगे कि अगर आप इसे एक साल तक भी अपने पास रखें तो भी उसमें कीड़े नहीं पड़ेंगे। कौन जाने यह पानी कितना दिव्य है? वेदों में यह कहा गया है। इसलिए हमें वेदों के कथनों पर विश्वास करना चाहिए। Govind Damodar Stotra वेदों पर अपनी माँ से भी अधिक विश्वास किया जा सकता है। वेद किसी सांसारिक व्यक्ति द्वारा नहीं लिखे गए हैं। वेदों में निहित ज्ञान को भागवत-तत्त्व-ज्ञान कहा जाता है। वेदों और उनकी शाखाओं द्वारा कहा गया सत्य; Govind Damodar Stotra और विशेष रूप से वेदों के सार श्रीमद्भागवत द्वारा कहा गया सत्य, सर्वोच्च सत्य है। हम सभी गीता का पालन करते हैं। लेकिन श्रीमद्भागवत गीता से भी ऊपर है। गीता प्रथम पुस्तक है और श्रीमद्भागवत स्नातक की पुस्तक है। Govind Damodar Stotra:गोविंद दामोदर स्तोत्र के लाभ: Govind Damodar Stotra:गोविंद दामोदर स्तोत्र जीवन को धन्य बनाता है। गोविंद दामोदर स्तोत्र लोगों में Govind Damodar Stotra आंतरिक आनंद देता है जो मन में शांति देता है। Govind Damodar Stotra:इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: Govind Damodar Stotra:जो लोग अवसाद, मानसिक पीड़ा और अशांति से पीड़ित हैं, Govind Damodar Stotra उन्हें गोविंद दामोदर स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। गोविन्द दामोदर स्तोत्र | Govind Damodar Stotra अग्रे कुरुणामथ पाण्डवानां दु:शासनेनाह्रतवस्त्रकेशा । कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माधवेति ।।1।। श्रीकृष्ण विष्णो मधुकैटभारे भक्तानुकम्पिन् भगवन् मुरारे । त्रायस्व मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेति ।।2।। विक्रेतुकामाखिलगोपकन्या मुरारिपादार्पितचित्तवृत्ति: । दध्यादिकं मोहवशादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति ।।3।। उलूखले सम्भृततण्डुलांश्च संघट्टयन्त्यो मुसलै: प्रमुग्धा: । गायन्ति गोप्यो जनितानुरागा गोविन्द दामोदर माधवेति ।।4।। काचित्कराम्भोजपुटे निषण्णं क्रीडाशुकं किंशुकरक्ततुंडम् । अध्यापयामास सरोरुहाक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ।।5।। ग्रहे ग्रहे गोपवधूसमूह: प्रतिक्षणं पिञ्जरसारिकाणाम् । स्खलद्गिरं वाचयितुं प्रवृत्तो गोविन्द दामोदर माधवेति ।।6।। पय्र्यंकिकाभाजमलं कुमारं प्रस्वापयन्त्योऽखिलगोपकन्या: । जगु: प्रबन्धं स्वरतालबन्धं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।7।। रामानुजं वीक्षणकेलिलोलं गोपी ग्रहीत्वा नवनीतगोलम् । आबालकं बालकमाजुहाव गोविन्द दामोदर माधवेति ।।8।। विचित्रवर्णाभरणाभिरामेऽभिधेहि वक्त्राम्बुजराजहंसि । सदा मदीये रसनेऽग्ररंगे गोविन्द दामोदर माधवेति ।।9।। अंकाधिरूढं शिशुगोपगूढं स्तनं धयन्तं कमलैककान्तम् । सम्बोधयामास मुदा यशोदा गोविन्द दामोदर माधवेति ।।10।। क्रीडन्तमन्तर्व्रजमात्मजं स्वं समं वयस्यै: पशुपालबालै: । प्रेम्णा यशोदा प्रजुहाव कृष्णं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।11।। यशोदया गाढ़मुलूखलेन गोकण्ठपाशेन निबध्यमान: । रुरोद मन्दं नवनीतभोजी गोविन्द दामोदर माधवेति ।।12।। निजांगणे कंकणकेलिलोलं गोपी ग्रहीत्वा नवनीतगोलम् । आमर्दयत्पाणितलेन नेत्रे गोविन्द दामोदर माधवेति ।।13।। ग्रहे ग्रहे गोपवधूकदम्बा: सर्वे मिलित्वा समवाययोगे । पुण्यानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।14।। मन्दारमूले वदनाभिरामं बिम्बाधरे पूरितवेणुनादम् । गोगोपगोपीजनमध्यसंस्थं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।15।। उत्थाय गोप्योऽपररात्रभागे स्मृत्वा यशोदासुतबालकेलिम् । गायन्ति प्रोच्चैर्दधि मन्थयन्त्यो गोविन्द दामोदर माधवेति ।।16।। जग्धोऽथ दत्तो नवनीतपिण्डो ग्रहे यशोदा विचिकित्सयंती । उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविन्द दामोदर माधवेति ।।17।। अभ्यच्र्यं गेहं युवति: प्रवृद्धप्रेमप्रवाहा दधि निर्ममन्थ । गायन्ति गोप्योऽथ सखीसमेता गोविन्द दामोदर माधवेति ।।18।। क्वचित् प्रभाते दधिपूर्णपात्रे निक्षिप्य मंथं युवती मुकुन्दम् । आलोक्य गानं विविधं करोति गोविन्द दामोदर माधवेति ।।19।। क्रीडापरं भोजनमज्जनार्थं हितैषिणी स्त्री तनुजं यशोदा । आजूहवत् प्रेमपरिप्लुताक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ।।20।। सुखं शयानं निलये च विष्णुं देवर्षिमुख्या मुनय: प्रपन्ना: । तेनाच्युते तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ।।21।। विहाय निद्रामरुणोदये च विधाय कृत्यानि च विप्रमुख्या: । वेदावसाने प्रपठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।22।। वृन्दावने गोपगणाश्च गोप्यो विलोक्य गोविन्दवियोगखिन्नाम् । राधां जगु: साश्रुविलोचनाभ्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ।।23।। प्रभातसञ्चारगता नु गावस्तद्रक्षणार्थं तनयं यशोदा । प्राबोधयत् पाणितलेन मन्दं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।24।। प्रवालशोभा इव दीर्घकेशा वाताम्बुपर्णाशनपूतदेहा: । मूले तरुणां मुनय: पठन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ।।25।। एवं ब्रुवाणा विरहातुरा भृशं व्रजस्त्रिय: कृष्णविषक्तमानसा: । विसृज्य लज्जां रुरुदु: स्म सुस्वरं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।26।। गोपी कदाचिन्मणिपिञ्जरस्थं शुकं वचो वाचयितुं प्रवृत्ता । आनन्दकंद व्रजचन्द्र कृष्ण गोविन्द दामोदर माधवेति ।।27।। गोवत्सबालै: शिशुकाकपक्षं बध्नन्तमम्भोजदलायताक्षम् । उवाच माता चिबुकं ग्रहीत्वा गोविन्द दामोदर माधवेति ।।28।। प्रभातकाले वरवल्लवौघा गोरक्षणार्थं धृतवेत्रदण्डा: । आकारयामासुरनन्तमादयं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।29।। जलाशये कालियमर्दनाय यदा कदम्बादपतन्मुरारि: । गोपांगनाश्चुक्रुशुरेत्य गोपा गोविन्द दामोदर माधवेति ।।30।। अक्रूरमासादय यदा मुकुन्दश्चापोत्सवार्थं मथुरां प्रविष्ट: । तदा स पौरैर्जयतीत्यभाषि गोविन्द दामोदर माधवेति ।।31।। कंसस्य दूतेन यदैव नीतौ वृन्दावनान्ताद् वसुदेवसूनू । रुरोद गोपी भवनस्य मध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति ।।32।। सरोवरे कालियनागबद्धं शिशुं यशोदातनयं निशम्य । चक्रुर्लुठन्त्य: पथि गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति ।।33।। अक्रूरयाने यदुवंशनाथं संगच्छमानं मथुरां निरीक्ष्य । ऊचुर्वियोगात् किल गोपबाला गोविन्द दामोदर माधवेति ।।34।। चक्रन्द गोपी नलिनीवनान्ते कृष्णेन हीना कुसुमे

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गोपिकाविरहगीतम् | Gopika Viraha Gitam

गोपिकाविरहगीतम् | Gopika Viraha Gitam Gopika Viraha Gitam (गोपिकाविरहगीतम्) गोपिका विरह गीतएहि मुरारे कुंजविहरे एहि प्रणत जन बन्धोहे माधव मधुमथन वरेण्य केशव करुणा सिंधोरास निकुंजे गुन्जित नियतम भ्रमर शतम किल कांतएहि निभ्रित पथ पंथत्वमहि याचे दर्शन दानम हे मधुसूदन शान्तसुन्यम कुसूमासन मिह कुंजे सुन्यम केलि कदम्बदीनः केकि कदम्बमृदु कल ना दम किल सवि षदम रोदित यमुना स्वंभनवनीरजधर श्यामल सुंदर चंद्रा कुसुम रूचि वेशगोपी गण ह्रिदेयेशगोवर्धन धर वृंदावन चर वंशी धर परमेशराधा रंजन कान्स निशुदन प्रणति सातवक चरने निखिल निराश्रये शरनेएहि जनार्दन पीतांबर धर कुंजे मन्थर पवने

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Gopal Hridaya Stotra | गोपाल ह्रदय स्तोत्र

Gopal Hridaya Stotra:गोपाल हृदय स्तोत्र: देवी भागवत के अनुसार श्री कृष्ण देवी माता महाकाली के अवतार हैं। और राधा भगवान शिव का अवतार हैं। देवी महाकाली ने देवी भागवत में कहा है कि मैं कृष्ण नामक पुरुष अवतार में जन्म लूंगी। मैं Gopal Hridaya Stotra भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र और प्रतीकों को धारण करती हूं ताकि ब्रह्मांड मुझे भगवान विष्णु के अवतार के रूप में जाने। माता काली और भगवान कृष्ण एक बीज मंत्र “क्लिं” से जुड़े हैं। दरअसल, हिंदू धर्म के सभी देवता एक शक्तिशाली शक्ति से हैं, जिसे प्रकृति के रूप में वर्णित किया गया है। सभी देवता “ब्रह्म-शक्ति” हैं। इस तथ्य को स्वीकार करें, यह भी माना जाता है कि कृष्ण भगवान श्री विष्णु के दसवें अवतारों में से एक अवतार हैं। भगवान कृष्ण सच्चे प्रेम और मित्रता के प्रतीक हैं। वे अपने भक्तों के लिए बहुत शुभ और दयालु हैं। कृष्ण के 108 नामों की महान प्रार्थना जिसे कृष्ण अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र और गोपाल हृदय स्तोत्र कहा जाता है, उनकी पूजा के दौरान उपयोग किया जाता है। यह भगवान कृष्ण के लिए सबसे शक्तिशाली प्रार्थना है। गोपाल हृदय स्तोत्र एक प्रार्थना है जिसे प्राचीन काल से ही कई ऋषियों द्वारा मानसिक शांति और खुशी के लिए पढ़ा जाता रहा है। इस गोपाल हृदय स्तोत्र से उन्हें व्यक्तिगत रूप से लाभ हुआ है। गोपाल हृदय स्तोत्र मन की शांति, आत्मविश्वास और समृद्धि देता है। गोपाल हृदय स्तोत्र प्रार्थना का पाठ करने से जीवन में आने वाली सभी बाधाएँ दूर होती हैं, जिसमें रोग और नेत्र संबंधी परेशानियाँ, शत्रुओं से परेशानी और सभी चिंताएँ और तनाव शामिल हैं। इस गोपाल हृदय स्तोत्र के अन्य अनगिनत लाभ हैं। Gopal Hridaya Stotra:गोपाल हृदय स्तोत्र के लाभ: Gopal Hridaya Stotra भगवान कृष्ण, जो दुनिया और पृथ्वी के रक्षक हैं, का नाम भी साधकों की इस भूमि पर अत्यंत आवश्यक है, जहाँ शैतान के हर बुरे काम से दुनिया की शांति नष्ट हो रही है और कई लोग अमानवीयता के विलय में हैं। गोपाल हृदय स्तोत्र का जाप करने से भगवान दुनिया को बुरी माया से बचाते हैं। Gopal Hridaya Stotra:इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: Gopal Hridaya Stotra जो लोग समाज में निराश महसूस कर रहे हैं या स्थिति से उबरने के लिए सर्वोत्तम प्रयासों और प्रयासों के बावजूद भी उन्हें किनारे कर दिया गया है, उन्हें भागवत की प्रणाली के अनुसार इस स्तोत्र का नियमित रूप से पाठ करना चाहिए। इस गोपाल हृदय स्तोत्र का पाठ करने से उन्हें जीवन के सभी क्षेत्रों में लाभ होगा। भगवान कृष्ण उन्हें जीवन के बाकी हिस्सों में शांति से रहने में सक्षम बनाएंगे। अधिक जानकारी और गोपाल हृदय स्तोत्र के विवरण के लिए कृपया एस्ट्रो मंत्र से संपर्क करें। गोपाल हृदय स्तोत्र | Gopal Hridaya Stotra विष्णुहृदयस्तोत्रम् श्री गणेशाय नमः । ॐ अस्य श्रीगोपालहृदयस्तोत्रमन्त्रस्य । श्रीभगवान् सङ्कर्षण ऋषिः । गायत्री छन्दः । ॐ बीजम् । लक्ष्मीः शक्तिः । गोपालः परमात्मा देवता । प्रद्युम्नः कीलकम् । मनोवाक्कायार्जितसर्वपापक्षयार्थे श्रीगोपालप्रीत्यर्थे गोपालहृदयस्तोत्रजपे विनियोगः । श्रीसङ्कर्षण उवाच  ॐ ममाग्रतः सदा विष्णुः पृष्ठतश्चापि केशवः । गोविन्दो दक्षिणे पार्श्वे वामे च मधुसूदनः ॥ १॥ उपरिष्टात्तु वैकुण्ठो वाराहः पृथिवीतले । अवान्तरदिशः पातु तासु सर्वासु माधवः ॥ २॥ गच्छतस्तिष्ठतो वापि जाग्रतः स्वपतोऽपि वा । नरसिंहकृताद्गुप्तिर्वासुदेवमयो ह्ययम् ॥ ३॥ अव्यक्तं चैवास्य योनिं वदन्ति व्यक्तं देहं दीर्घमायुर्गतिश्च । वह्निर्वक्त्रं चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे दिशः श्रोते घ्राणमायुश्च वायुम् ॥ ४॥ वाचं वेदा हृदयं वै नभश्च पृथ्वी पादौ तारका रोमकूपाः । अङ्गान्युपाङ्गान्यधिदेवता च विद्यादुपस्थं हि तथा समुद्रम् ॥ ५॥ तं देवदेवं शरणं प्रजानां यज्ञात्मकं सर्वलोकप्रतिष्ठम् । अजं वरेण्यं वरदं वरिष्ठं ब्रह्माणमीशं पुरुषं नमस्ते ॥ ६॥ आद्यं पुरुषमीशानं पुरुहूतं पुरस्कृतम् । ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म व्यक्तासक्तं सनातनम् ॥ ७॥ महाभारतमाख्यानं कुरुक्षेत्रं सरस्वतीम् । केशवं गां च गङ्गां च कीर्तयेन्मां प्रसीदति ॥ ८॥ ॐ भूः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ भुवः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ स्वः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ महः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ जनः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ तपः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ सत्यं पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ भूर्भुवः स्वः पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ वासुदेवाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ सङ्कर्षणाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ प्रद्युम्नाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ अनिरुद्धाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ हयग्रीवाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ भवाद्भवाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ केशवाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ नारायणाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ माधवाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ गोविन्दाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ विष्णवे पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ मधुसूदनाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ वैकुण्ठाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ अच्युताय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ त्रिविक्रमाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ वामनाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ श्रीधराय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ हृषीकेशाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ पद्मनाभाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ मुकुन्दाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ दामोदराय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ सत्याय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ ईशानाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ तत्पुरुषाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ पुरुषोत्तमाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ श्री रामचन्द्राय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ श्री नृसिंहाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ अनन्ताय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ विश्वरूपाय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । ॐ प्रणवेन्दुवह्निरविसहस्रनेत्राय पुरुषाय पुरुषरूपाय वासुदेवाय नमो नमः । य इदं गोपालहृदयमधीते स ब्रह्महत्यायाः पूतो भवति । सुरापानात् स्वर्णस्तेयात् वृषलीगमनात् पति सम्भाषणात् असत्यादगम्यागमनात् अपेयपानादभक्ष्यभक्षणाच्च पूतो भवति । अब्रह्मचारी ब्रह्मचारी भवति । भगवान्महाविष्णुरित्याह । ॥ इति गोपालहृदयस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Maha Kumbh में रबड़ी वाले बाबा की अनोखी कहानी, हर दिन 130 लीटर दूध से बनती है रबड़ी, बांटने का तरीका है अलग

Rabri Wale Baba: देवगिरी महाराज ने बताया कि वे हर दिन लगभग 130 लीटर दूध की रबड़ी बनाते हैं और भक्ति में प्रसाद बांटते हैं. उन्होंने कहा कि वे भगवती महाकाली के उपासक हैं और देवी जी की कृपा से उन्हें यह सेवा करने की प्रेरणा मिली है. Maha Kumbh प्रयागराज महाकुंभ में पधारे साधु-संतों की अपनी अलग-अलग किस्से कहानियां हैं. तमाम बाबाओं की खुद की अलहदा पहचान हैं तो कई संन्यासियों की अपनी अलग खासियत है. कुछ इसी तरह की एक कहानी ‘रबड़ी बाबा’ की भी है. महाकुंभ में रबड़ी वाले बाबा  श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र  बने हैं तो वहीं सोशल मीडिया में भी छाए हुए हैं.       देवगिरी जी महाराज ने बताया कि वे हर दिन लगभग 130 लीटर दूध की रबड़ी बनाते हैं और भक्ति में प्रसाद बांटते हैं. उन्होंने कहा कि वे भगवती महाकाली के उपासक हैं और देवी जी की कृपा से उन्हें यह सेवा करने की प्रेरणा मिली है. देवगिरी जी महाराज ने बताया कि वे दूध और मध्यम शक्कर डालकर रबड़ी बनाते हैं. दरअसल, श्रद्धालुओं को डायबिटीज न हो, इसलिए चीनी की मात्रा कम रखते हैं. उन्होंने कहा कि उनका सिद्धांत है कि वे बैठकर रबड़ी खिलाते हैं, बांटते नहीं हैं. Maha Kumbh के इस अनुभव में रबड़ी का महत्व Maha Kumbh में जहां लाखों श्रद्धालु आते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं, वहीं रबड़ी वाले बाबा की सेवा एक अलग ही अनुभव प्रदान करती है। उनके द्वारा बांटी गई रबड़ी केवल एक पारंपरिक मीठा व्यंजन नहीं बल्कि एक धार्मिक और आत्मिक सेवा बन चुकी है। श्रद्धालु इस प्रसाद को न केवल भक्ति से प्राप्त करते हैं, बल्कि यह उनके लिए एक आशीर्वाद जैसा होता है। Maha Kumbh रबड़ी का प्रसाद खाते समय लोग बाबा के साथ अपना आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और साथ ही उनकी भक्ति में भी वृद्धि होती है। यह सेवा देवी भगवती महाकाली की कृपा से संभव देवगिरी जी महाराज का मानना है कि रबड़ी एक तरह से भक्तों को मानसिक शांति और शक्ति देने का माध्यम है। वे इसे किसी प्रकार के साधारण भोजन की तरह नहीं मानते, बल्कि इसे एक दिव्य प्रसाद मानते हैं। रबड़ी बांटने का उनका तरीका बहुत ही संतुलित Maha Kumbh और सुव्यवस्थित है, जहां हर व्यक्ति को उचित समय और स्थान पर यह प्रसाद मिलती है। वे इसे न केवल अपनी सेवा बल्कि एक धार्मिक कर्तव्य के रूप में निभाते हैं। उनका मानना है कि यह सेवा देवी भगवती महाकाली की कृपा से संभव हो रही है, और वे उन्हें इस कार्य के लिए प्रेरित करती हैं। Maha Kumbh में रबड़ी वाले बाबा की सेवा का प्रभाव रबड़ी वाले बाबा की सेवा ने Maha Kumbh में आने वाले श्रद्धालुओं के बीच एक नई पहचान बनाई है। उनके प्रसाद की भव्यता और उनकी भक्ति ने लोगों को आकर्षित किया है। रबड़ी बनाने और उसे श्रद्धालुओं को देने का उनका तरीका उन्हें Maha Kumbh के महत्वपूर्ण आकर्षणों में से एक बना चुका है। Maha Kumbh जैसे बड़े आयोजन में बाबा की उपस्थिति ने यह साबित किया है कि धार्मिक आस्था और सेवा का कोई आकार नहीं होता; ये किसी भी रूप में हो सकती है और उसी रूप में श्रद्धा का प्रसार करती है। रबड़ी बांटने का तरीका रबड़ी वाले बाबा का मानना है कि रबड़ी केवल बांटी नहीं जानी चाहिए, बल्कि श्रद्धा और आस्था के साथ इसे खिलाना चाहिए। वे हर श्रद्धालु को बैठाकर रबड़ी खिलाते हैं और यही उनका सिद्धांत है। वे मानते हैं कि इस प्रक्रिया से श्रद्धालुओं को मानसिक और शारीरिक रूप से शांति मिलती है और उनकी भक्ति का भी संकल्प मजबूत होता है। उनका यह तरीका श्रद्धालुओं के बीच बहुत ही लोकप्रिय हो गया है, और लोग उनकी सेवा का आनंद लेने के लिए उनकी ओर खींचे चले आते हैं।  श्रद्धालुओं को एक विशेष तरह का प्रसाद श्री महंत देवगिरी जी महाराज का मानना है कि Maha Kumbh के पवित्र अवसर पर श्रद्धालुओं को एक विशेष तरह का प्रसाद देना चाहिए। इसी के तहत वे हर दिन करीब 130 लीटर दूध से रबड़ी तैयार करते हैं। Maha Kumbh वे बताते हैं कि रबड़ी बनाने का यह कार्य दिन-रात चलता रहता है, ताकि जितने भी श्रद्धालु आकर प्रसाद ग्रहण करें, उन्हें ताजे और स्वादिष्ट प्रसाद का अनुभव हो सके। 

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