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Basant Panchami 2025: बसंत पंचमी के दिन क्या करें और क्या नहीं

Basant Panchami 2025 Avoid These Mistakes: वसंत पंचमी  का दिन विशेष रूप से मां सरस्वती की पूजा के लिए समर्पित है। इस दिन लोग मां की विशेष रूप से पूजा और अर्चना करते हैं। वसंत पंचमी के दिन कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। आइए जानते हैं इस दिन ऐसे कौन से काम है जो करने चाहिए और ऐसे कौन से काम हैं जिन्हें करने से बचना चाहिए।  Basant panchamike din kya karna chahiye:बसंत पंचमी का त्योहार ज्ञान की देवी मां सरस्वती को समर्पित है। हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को बसंत पंचमी का त्योहार मनाते है। इस दिन संगीत की देवी मां सरस्वती की विधिवत पूजा की जाती है। मान्यता है कि ब्रह्मा जी ने इस दिन चार हाथों वाली मां सरस्वती प्रकट की थी, जिनके एक हाथ में वीणा, दूसरे हाथ में पुस्तक, तीसरे हाथ में माला और चौथे हाथ में वर मुद्रा हैं। जिस दिन मां सरस्वती प्रकट हुई थीं, उस दिन Basant Panchami 2025 बसंत पंचमी थी। इस साल बसंत पंचमी कुछ जगहों पर 2 फरवरी और कुछ जगहों पर 3 फरवरी को मनाई जाएगी। बसंत पंचमी के दिन मां सरस्वती की पूजा करने के अलावा कुछ नियमों का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। जानें बसंत पंचमी के दिन क्या करें और क्या नहीं वसंत पंचमी 2025 तिथि Basant Panchami 2025 साल 2025 में माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि 2 फरवरी, रविवार को आएगी। जब देशभर में वसंत पंचमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह दिन मां सरस्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। कहते हैं इस दिन माँ सरस्वती की पूजा करने से व्यक्ति को उनके आशीर्वाद से ज्ञान और बुद्धि की प्राप्ति होती है। पीले रंग का महत्व वसंत पंचमी Basant Panchami 2025 के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। अर्घ्य देने के बाद पीले वस्त्र पहनकर विधिपूर्वक माँ सरस्वती की पूजा करना लाभकारी होता है। इस पूजा में मां सरस्वती को पीले रंग के वस्त्र, भोग और पुष्प अर्पित करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। Basant Panchami 2025 Ke din kya kare बसंत पंचमी के दिन क्या करें- 1.बसंत पंचमी के दिन पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए। अगर नदी में स्नान करना संभव नहीं है तो घर पर ही पानी में गंगाजल मिलाकर नहा लें। 2. मां सरस्वती की विधिवत पूजा करनी चाहिए और मां को पीले रंग के पुष्प अर्पित करने चाहिए। 3. मां सरस्वती को पीले भोग अति है। इस दिन मां को पीली बूंदी, केसर हलवा और मालपुआ, खीर या मिठाई आदि का भोग लगाना चाहिए। 4. मां सरस्वती की पूजा के समय पेन, पेपर और बही खाता आदि करना चाहिए। 5. बसंत पंचमी के दिन पीले रंग के वस्त्र धारण करना चाहिए। बसंत पंचमी के दिन क्या न करें- Basant Panchami 2025 Ke Din kya kare Nhi kare 1. बसंत पंचमी के दिन वाद-विवाद से बचना चाहिए। किसी को भी अपशब्द नहीं कहने चाहिए। 2. इस दिन से बसंत ऋतु आरंभ होती है। इस दिन पेड़-पौधे या फिर फसल काटने की मनाही होती है। 3. बसंत पंचमी के दिन सात्विक भोजन करना चाहिए। तामसिक भोजन से दूरी रखनी चाहिए। 4. बसंत पंचमी के दिन स्नान आदि से पहले भोजन नहीं करना चाहिए। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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Jaya Ekadashi 2025 Bhog: जया एकादशी पर लगाएं भगवान विष्णु को इन चीजों का भोग, धन-दौलत में होगी अपार वृद्धि

Jaya Ekadashi 2025 Bhog: 20 फरवरी 2024 को माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी है। आप लोगों को पता ही है कि प्रत्येक महीने में एकादशी दो बार आती है। एक बार कृष्ण पक्ष में और दूसरी बार शुक्ल पक्ष में। कृष्ण पक्ष की एकादशी पूर्णिमा के बाद आती है और शुक्ल पक्ष की एकादशी अमावस्या के बाद आती है। अतः 20 फरवरी 2024 यानी कल जया एकादशी का व्रत रखा जाएगा। Jaya Ekadashi 2025 Bhog शास्त्रों में ये एकादशी बड़ी ही फलदायी बताई गई है। एकादशी में भगवान विष्णु के निमित्त व्रत करने और उनकी पूजा करने का विधान है। Jaya Ekadashi 2025 Bhog जया एकादशी के दिन जो गृहस्थ हैं और जो गृहस्थ नहीं हैं, दोनों को ये व्रत करना चाहिए और श्री विष्णु की पूजा करनी चाहिए। साथ ही माता लक्ष्मी की भी पूजा-अर्चना करनी चाहिए। कहते हैं Jaya Ekadashi 2025 Bhog इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को भूत-प्रेत और भय आदि से भी छुटकारा मिलता है। जया एकादशी के दिन विभिन्न शुभ फलों की प्राप्ति के लिए क्या कुछ खास उपाय करने चाहिए। जया एकादशी भोग (Jaya Ekadashi 2025 Bhog List ) जया एकादशी शुभ मुहूर्त (Jaya Ekadashi 2025) वैदिक पंचांग के अनुसार, Jaya Ekadashi 2025 Bhog माघ महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 07 फरवरी को रात 09 बजकर 26 मिनट पर शुरू होगी। वहीं इसका Jaya Ekadashi 2025 Bhog समापन 08 फरवरी को रात 08 बजकर 15 मिनट पर होगा। उदया तिथि को देखते हुए, इस साल जया एकादशी का व्रत दिन शनिवार, 08 फरवरी को रखा जाएगा। जया एकादशी व्रत के दिन करें ये उपाय Jaya Ekadashi 2025 Date: कब है जया एकादशी? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व

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Mauni Amavasya 2025:मौनी अमावस्या के दिन क्यों रखा जाता है मौन व्रत? जानिए महत्व

Mauni Amavasya 2025: मौनी अमावस्या के स्नान-दान और पितरों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के कार्य किए जाते हैं। इस दिन मानसिक शांति और मोक्ष प्राप्ति के लिए मौन व्रत रखने का भी बड़ा महत्व है। मौनी शब्द मौन से उत्पन्न हुआ है यानी इस दिन मौन रहकर व्रत करना चाहिए। मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत धारण कर मन को संयमित करके काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से दूर रखना चाहिए। देवतागण प्रयागराज आकर अदृश्‍य रूप से संगम में स्‍नान करते हैं। वहीं मौनी अमावस्‍या के दिन पितृगण पितृलोक से संगम में स्‍नान करने आते हैं और इस तरह देवता और पितरों का इस दिन संगम होता है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन पवित्र संगम में देवताओं का निवास होता है इसलिए इस दिन मौन रखकर गंगा स्नान का विशेष महत्व है। प्रयागराज कुंभ मेले के दौरान, मौनी अमावस्या सबसे महत्वपूर्ण स्नान दिवस में से एक है, और इसे अमृत योग के दिन और कुंभ पर्व के दिन के रूप में जाना जाता है। मान्यता है कि इसी दिन जैन संप्रदाय के प्रथम तीर्थंकार ऋषभ देव ने अपनी लंबी तपस्या का मौन व्रत तोड़ा था और संगम के पवित्र जल में स्नान किया था। Mauni Amavasya 2025:मौनी अमावस्या के दिन स्नान-दान के कार्य पुण्य फलदायी माने जाते हैं। वैसे तो सनातन धर्म में हर माह में आने वाली अमावस्या तिथि महत्वपूर्ण होती है। इस दिन पितरों की आत्माशांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है, लेकिन मौनी अमावस्या के दिन पितरों को प्रसन्न करने का उत्तम दिन माना जाता है। मान्यता है कि मौनी अमावस्या के दिन पितरों के पिंडदान और तर्पण से उन्हें बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। मौनी अमावस्या के दिन स्नान-दान के साथ साधु-संत और अन्य लोग मौन व्रत भी रखते हैं। ऐसा कहा जाता है कि मौनी अमावस्या के दिन व्रत-उपवास रखने से आत्मसंयम, शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए विस्तार से जानते हैं मौनी अमावस्या की सही तिथि और इस दिन मौन व्रत का महत्व? Mauni Amavasya 2025 मौनी अमावस्या 2025: कब है? द्रिक पंचांग के अनुसार, माघ महीने के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि का आरंभ 28 जनवरी 2025 को रात 07 बजकर 35 मिनट पर होगा और अगले दिन 29 जनवरी 2025 को शाम 06 बजकर 05 मिनट पर समाप्त होगा। ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, 29 जनवरी 2025 को मौनी अमावस्या मनाया जाएगा। मौनी अमावस्या पर मौन व्रत का महत्व Mauni Amavasya per moon vrat ka mahetwa 2025 मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत किया जाता है। यह व्रत साधु-संतों और अन्य व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, मौन व्रत रखने से मानसिक शांति मिलती है और व्यक्ति का आध्यात्मिक कार्यों में मन लगता है। इस व्रत को रखने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मौन व्रत के दौरान व्यक्ति अपने विचारों और वाणी पर संयम रखता है। इससे ध्यान में एकाग्रता बढ़ती है और व्यक्ति आध्यात्मिक विकास की ओर आगे बढ़ता है। यहीं नहीं, मौन व्रत रखने से वाणी शुद्ध होती है। साधक को मानसिक शांति मिलती है। ऐसा कहा जाता है कि मौनी अमावस्या के दिन मौन व्रत रखने से सामाजिक पद-प्रतिष्ठा में वृद्धि होती है और वाणी में मधुरता आती है। हालांकि, मौनी अमावस्या के दिन पवित्र नदी में स्नान के बाद ही पूरे दिन मौन व्रत किया जाता है और दान-पुण्य के कार्य किए जाते हैं। अमावस्या तिथि समाप्त होने के बाद मौन व्रत पूर्ण होता है। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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Som Pradosh Vrat 2025:शुभ योग में साल 2025 का पहला सोम प्रदोष व्रत, जानें तिथि, मुहूर्त और पूजा विधि

Som Pradosh Vrat 2025: वैसे तो रोजाना घरों में भोलेनाथ की पूजा की जाती है, लेकिन प्रदोष तिथि विशेष है। मान्यता है कि इस दिन महादेव की पूजा करने से साधक के जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है, साथ ही भाग्य में भी वृद्धि होती हैं। माह की त्रयोदशी तिथि का प्रदोष काल मे होना, प्रदोष व्रत होने का सही कारण है। प्रदोष काल सूर्यास्त से 45 मिनट पहिले प्रारम्भ होकर सूर्यास्त के बाद 45 मिनट होता है।प्रदोष का दिन जब साप्ताहिक दिवस सोमवार को होता है उसे सोम प्रदोष कहते हैं, मंगलवार को होने वाले प्रदोष को भौम प्रदोष तथा शनिवार के दिन प्रदोष को शनि प्रदोष कहते हैं। वैसे तो त्रयोदशी तिथि ही भगवान शिव की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ है। परंतु प्रदोष के समय शिवजी की पूजा करना और भी लाभदायक है। ध्यान देने योग्य तथ्य: प्रदोष व्रत एक ही देश के दो अलग-अलग शहरों के लिए अलग हो सकते हैं। चूँकि प्रदोष व्रत सूर्यास्त के समय, त्रयोदशी के प्रबल होने पर निर्भर करता है। तथा दो शहरों का सूर्यास्त का समय अलग-अलग हो सकता है, इस प्रकार उन दोनो शहरों के प्रदोष व्रत का समय भी अलग-अलग हो सकता है। इसीलिए कभी-कभी ऐसा भी देखने को मिलता है कि, प्रदोष व्रत त्रयोदशी से एक दिन पूर्व अर्थात द्वादशी तिथि के दिन ही हो जाता है। सूर्यास्त होने का समय सभी शहरों के लिए अलग-अलग होता है अतः प्रदोष व्रत करने से पूर्व अपने शहर का सूर्यास्त समय अवश्य जाँच लें, चाहे वो शहर एक ही देश मे क्यों ना हों। प्रदोष व्रत चन्द्र मास की शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष की दोनों त्रयोदशी के दिन किया जाता है। Som Pradosh Vrat 2025:सोम प्रदोष व्रत 2025 तिथि पंचागं के अनुसार माघ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरूआत 26 जनवरी के दिन रात 8 बजकर 54 मिनट पर होगी, इस तिथि का समापन 27 जनवरी को रात 8 बजकर 34 मिनट पर होगा। ऐसे में 27 जनवरी 2025 को प्रदोष व्रत रखा जाएगा, इस दिन सोमवार होने के कारण इसे सोम प्रदोष कहा जाएगा। सोम प्रदोष व्रत 2025 मुहूर्त:Som Pradosh Vrat 2025 Muhurat ज्योतिषियों की मानें तो 27 जनवरी को सोम प्रदोष व्रत के दिन महादेव की पूजा के लिए मुहूर्त शाम 5 बजकर 56 मिनट से रात 8 बजकर 34 मिनट तक रहने वाला है, आप इस अवधि में महादेव की आराधना कर सकते हैं। सोम प्रदोष व्रत शुभ योग Som Pradosh Vrat 2025 Subh yoog इस साल माघ माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर मूल नक्षत्र बन रहा है, जो रात 09: 02 मिनट तक रहेगा, इस दौरान हर्षण योग भी बनेगा। प्रदोष व्रत पूजा विधि Pradosh Vrat Puja vidhi प्रदोष व्रत की महिमा Pradosh Vrat ki Mahima प्रदोष व्रत को रखने से दो गायों को दान देने के समान पुन्य फल प्राप्त होता है। प्रदोष व्रत को लेकर एक पौराणिक तथ्य सामने आता है कि एक दिन जब चारों और अधर्म की स्थिति होगी, अन्याय और अनाचार का एकाधिकार होगा, मनुष्य में स्वार्थ भाव अधिक होगी। व्यक्ति सत्कर्म करने के स्थान पर नीच कार्यों को अधिक करेगा। उस समय में जो व्यक्ति त्रयोदशी का व्रत रख, शिव आराधना करेगा, उस पर शिव कृ्पा होगी। इस व्रत को रखने वाला व्यक्ति जन्म-जन्मान्तर के फेरों से निकल कर मोक्ष मार्ग पर आगे बढता है. उसे उतम लोक की प्राप्ति होती है। प्रदोष व्रत का महत्व ❀ मान्यता और श्रध्दा के अनुसार स्त्री-पुरुष दोनों यह व्रत करते हैं। कहा जाता है कि इस व्रत से कई दोषों की मुक्ति तथा संकटों का निवारण होता है. यह व्रत साप्ताहिक महत्त्व भी रखता है।❀ रविवार को पड़ने वाले प्रदोष व्रत से आयु वृद्धि तथा अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया जा सकता है।❀ सोमवार के दिन त्रयोदशी पड़ने पर किया जाने वाला व्रत आरोग्य प्रदान करता है और इंसान की सभी इच्छाओं की पूर्ति होती है।❀ मंगलवार के दिन त्रयोदशी का प्रदोष व्रत हो तो उस दिन के व्रत को करने से रोगों से मुक्ति व स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।❀ बुधवार के दिन प्रदोष व्रत हो तो, उपासक की सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।❀ गुरुवार के दिन प्रदोष व्रत पड़े तो इस दिन के व्रत के फल से शत्रुओं का विनाश होता है।❀ शुक्रवार के दिन होने वाला प्रदोष व्रत सौभाग्य और दाम्पत्य जीवन की सुख-शान्ति के लिए किया जाता है।❀ संतान प्राप्ति की कामना हो तो शनिवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत करना चाहिए।❀ अपने उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए जब प्रदोष व्रत किए जाते हैं तो व्रत से मिलने वाले फलों में वृ्द्धि होती है। प्रदोष व्रत का उद्यापन ❀ इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशियों तक रखने के बाद व्रत का उद्यापन करना चाहिए।❀ व्रत का उद्यापन त्रयोदशी तिथि पर ही करना चाहिए।❀ उद्यापन से एक दिन पूर्व श्री गणेश का पूजन किया जाता है. पूर्व रात्रि में कीर्तन करते हुए जागरण किया जाता है।❀ प्रात: जल्दी उठकर मंडप बनाकर, मंडप को वस्त्रों और रंगोली से सजाकर तैयार किया जाता है।❀ ‘ऊँ उमा सहित शिवाय नम:’ मंत्र का एक माला यानी 108 बार जाप करते हुए हवन किया जाता है।❀ हवन में आहूति के लिए खीर का प्रयोग किया जाता है।❀ हवन समाप्त होने के बाद भगवान भोलेनाथ की आरती की जाती है और शान्ति पाठ किया जाता है।❀ अंत: में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है और अपने सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।

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Pausha Amavasya:पौष अमावस्या 2024: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्त्व

Pausha Amavasya:दृक पंचांंग के अनुसार, 30 दिसंबर 2024, सोमवार को कृष्ण पक्ष की पौष अमावस्या मनाई जाएगी। इस दिन शुभ मुहूर्त में स्नान-दान के कार्य महत्वपूर्ण माने जाते हैं। Paush Amavasya :सनातन धर्म में अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान और दान-पुण्य के कार्य बेहद शुभ माने जाते हैं। जब किसी भी माह में अमावस्या तिथि सोमवार को मनाई जाती है, तो इसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। पौष माह में आने वाली कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की अमावस्या तिथि को पौष अमावस्या कहते हैं। दृक पंचांग के अनुसार,30 दिसंबर 2024 दिन सोमवार को कृष्ण पक्ष की पौष अमावस्या मनाई जाएगी। यह साल 2024 की आखिरी अमावस्या है। इस दिन देवी-देवताओं का पूजा-अर्चना के साथ घर के मृत पूर्वजों की आत्माशांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के कार्य शुभ माने जाते हैं। आइए जानते हैं दिसंबर में पौष अमावस्या की सही डेट, शुभ मुहूर्त और इस दिन क्या करें-क्या नहीं? When is Paush Amavasya in December:दिसंबर में कब है पौष अमावस्या? दृक पंचांग के अनुसार, Pausha Amavasya पौष माह कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि का आरंभ 30 दिसंबर को सुबह 04 बजकर 01 मिनट पर होगा और अगले दिन 31 दिसंबर 2024 को सुबह 03 बजकर 56 मिनट पर समाप्त होगा। इसलिए उदयातिथि के अनुसार, 30 दिसंबर 2024 दिन सोमवार को पौष अमावस्या मनाई जाएगी। इसलिए इसे सोमवती अमावस्या भी कहा जाएगा। सोमवती अमावस्या के दिन शिवजी की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व है। When is amavasya:अमावस्या कब है? पौष अमावस्या तिथि पितृ / दर्श / स्नान / दान अमावस्या : सोमवार, 30 दिसंबर 2024 पौष कृष्ण अमावस्या : 30 दिसंबर 2024 4:01 AM – 31 दिसंबर 2024 3:56 AM Paush Amavasya 2024 auspicious time:पौष अमावस्या 2024 शुभ मुहूर्त : ब्रह्म मुहूर्त- 05:16 ए एम से 06:11 ए एम अभिजित मुहूर्त- 11:54 ए एम से 12:35 पी एम विजय मुहूर्त- 01:57 पी एम से 02:38 पी एम What to do on the day of Paush Amavasya:पौष अमावस्या के दिन क्या करें ? Pausha Amavasya:पौष अमावस्या के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र नदीं में स्नान करें। ऐसा संभव न हो तो घर मं गंगाजल डालकर स्नान करें। तांबे के लौटे में जल भरकर और काला तिल मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें। अमावस्या Pausha Amavasya के दिन मौन रहकर व्रत-उपवास करें। सोमवती अमावस्या के दिन दूध,शहद, दही, काला तिल, सफेद कपड़े और चीनी इत्यादि का दान कर सकते हैं। इस दिन गरीबों और जरुरतमंदों को भोजन खिलाएं। What not to do on the day of Paush Amavasya:पौष अमावस्या के दिन क्या न करें? पौष अमावस्या Pausha Amavasya के दिन क्रोध पर नियंत्रण रखें। किसी से व्यर्थ में वाद-विवाद न करें। पौष अमावस्या Pausha Amavasya के दिन मौन रहें और अपशब्दों का इस्तेमाल करने से बचें। इस दिन मांस-मदिरा समेत तामसिक भोजन का सेवन करने से बचना चाहिए। मान्यता है कि Pausha Amavasya अमावस्या के दिन तुलसी पर जल नहीं अर्पित करना चाहिए और न ही तुलसी को स्पर्श करें। अमावस्या के दिन फल और वस्त्रों का दान करना शुभ माना जाता है, लेकिन इस दिन अन्न का दान न करने की सलाह दी जाती है। इस दिन पाप कर्म जैसे चोरी करना, झूठ बोलना समेत अन्य गलत कार्यों से बचना चाहिए। Darsh Amavasya:दर्श अमावस्या दर्श अमावस्या के दिन चंद्रमा पूर्ण रूप से रात को दिखाई नही देता है। अतः तिथिवार अमावस्या Pausha Amavasya तथा दर्श अमावस्या अलग-अलग दिन होसकती है। अमावस्या के दिन, ग्रहों की अतिरिक्त ऊर्जा विकिरण द्वारा मनुष्यों तक पहुँचती है। मानव पर अमावस्या का सबसे आम प्रभाव मानसिक बीमारी, क्रोध अथवा चिड़चिड़ापन आना है। Somvati Amavasya:सोमवती अमावस्या सोमवार के दिन आने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं। हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सोमवती अमावस्या का एक विशेष महत्त्व है।  Bhaum Amavasya:भौम अमावस्या साप्ताहिक दिन मंगलवार को आने वाली अमावस्या को भौम अमावस्या कहते हैं, इसे भौमवती अमावस्या भी कहा जाता है। मंगलवार के दिन होने के कारण भौम अमावस्या पर हनुमानजी की पूजा का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है। शुभवारी अमावस्या सोमवती अमावस्या तथा शनि अमावस्या की तरह ही, गुरुवार के दिन होने वाली अमावस्या को शुभवारी अमावस्या कहते हैं।. शनि अमावस्या:Shani Amavasya जैसे सप्ताह के पहले दिन सोमवार को आने वाली अमावस्या को सोमवती अमावस्या कहते हैं, इसी प्रकार शनिवार के दिन आने वाली अमावस्या को शनि अमावस्या कहते हैं। डिस्क्लेमर: इस आलेख में दी गई जानकारियों पर हम दावा नहीं करते कि ये पूर्णतया सत्य है और सटीक है। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

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kaal Bhairav Jayanti 2024:काल भैरव जयंती कब है? नोट कर लें डेट, शुभ मुहूर्त और पूजा-विधि

kaal Bhairav :हर साल मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर काल भैरव जयंती मनाई जाती है। धार्मिक कथाओं के अनुसार इसी दिन काल भैरव का अवतरण हुआ था। इस साल 22 नवंबर, शुक्रवार को काल भैरव जयंती है। kaal Bhairav :काल भैरव जयंती, जिसे महाकाल या भैरव अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है। इसे भगवान शिव के उग्र रूप kaal Bhairav काल भैरव के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने स्वयं काल भैरव का रूप धारण किया था, जो उनके विनाशकारी रूप का प्रतीक है। यह तिथि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है और इस वर्ष 2024 में काल भैरव जयंती 22 नवंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। आइए जानते हैं इस पर्व का महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में। 1. kaal Bhairav काल भैरव जयंती 2024 का शुभ मुहूर्त काल भैरव जयंती पर विशेष पूजा का आयोजन शुभ मुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस दिन काल भैरव की पूजा रात्रि के समय करना उत्तम होता है। आइए जानते हैं इस बार का शुभ मुहूर्त: अष्टमी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 22, 2024 को 06:07 पी एम बजे अष्टमी तिथि समाप्त – नवम्बर 23, 2024 को 07:56 पी एम बजे 2. काल भैरव का महत्व भगवान काल भैरव को हिंदू धर्म में समय, शक्ति और न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है। kaal Bhairav उनका स्वरूप अत्यंत भयंकर है, जो अन्याय और अधर्म का नाश करने के लिए विख्यात हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव ने काल भैरव को बुराइयों को समाप्त करने और शत्रुओं का संहार करने के लिए अवतरित किया था। इस दिन की पूजा से: 3. काल भैरव जयंती पर पूजा विधि kaal Bhairav काल भैरव जयंती पर पूजा की विधि का विशेष महत्व होता है। kaal Bhairav पूजा विधि का पालन सही तरीके से करने पर भगवान काल भैरव प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इस पर्व पर की जाने वाली पूजा विधि इस प्रकार है: 3.1. संकल्प लें 3.2. दीपक जलाएं 3.3. फूल, अक्षत और भोग चढ़ाएं 3.4. काल भैरव स्तोत्र और मंत्र जाप 3.5. पान और शराब का भोग 3.6. रात्रि जागरण और भैरव भजन 4. kaal Bhairav काल भैरव जयंती का पुण्यफल और लाभ इस दिन काल भैरव की पूजा करने से जीवन में आने वाली हर प्रकार की समस्याओं से छुटकारा मिलता है। काल भैरव की कृपा से भक्तों को हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियों से रक्षा मिलती है। इसके अतिरिक्त इस दिन पूजा करने से: निष्कर्ष काल भैरव जयंती को भगवान शिव के क्रोध और शक्ति के रूप के रूप में मनाया जाता है। इस दिन की पूजा विधि और मान्यताओं के अनुसार, भक्तों को काल भैरव के आशीर्वाद से जीवन में सुरक्षा, साहस और सभी समस्याओं से मुक्ति प्राप्त होती है। काल भैरव जयंती पर विधिपूर्वक पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और भगवान की कृपा सदैव बनी रहती है।

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तुलसी विवाह श्लोक (हिंदी, अंग्रेजी में अर्थ सहित): TULSI VIVAH 2024

तुलसी विवाह श्लोक (हिंदी, अंग्रेजी में अर्थ सहित) तुलसी विवाह में श्लोकों का पाठ किया जाता है जो भगवान विष्णु और माता की महिमा का वर्णन करते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख श्लोक हिंदी और अंग्रेजी में अर्थ सहित दिए गए हैं: 1. तुलसी स्तुति श्लोकत्वं तुलसी जगन्माता विष्णोश्च प्रियवल्लभा।नमस्ते नारदनुते नारायणमनः प्रिये॥ हिंदी अर्थहे तुलसी! आप इस जगत की माता हैं और भगवान विष्णु की प्रिय पत्नी हैं। नारद मुनि ने आपकी महिमा का गान किया है। नारायण के मन को प्रिय हो, आपको प्रणाम। English TranslationO Tulsi! You are the mother of the universe and the beloved of Lord Vishnu. Sage Narada has sung your praises. You are dear to the heart of Narayana. I bow to you. 2. विष्णु स्तुति (श्री विष्णु मंत्र) श्लोकॐ नमो भगवते वासुदेवाय। हिंदी अर्थमैं भगवान वासुदेव को प्रणाम करता हूँ। English TranslationI bow to Lord Vasudeva. 3. तुलसी विवाह के लिए विशेष श्लोक श्लोकधर्मात्मनो महावीर्या धर्मिष्टे धर्मपूजिते।धर्मिष्ठो धर्मिणां श्रेष्ठो विष्णुस्तुलस्याः पतिः सदा॥ हिंदी अर्थतुलसी का विवाह हमेशा भगवान विष्णु से ही होता है, जो धर्म के रक्षक, महावीर, और सभी धार्मिक अनुष्ठानों के पालनकर्ता हैं। English TranslationTulsi’s marriage is always with Lord Vishnu, the protector of Dharma, the mighty one, and the upholder of all religious rituals. 4. माता विवाह मंत्र श्लोकत्वं लक्ष्मी साक्षाद् विष्णुपत्नी, त्वं भव सदा मंगलप्रदा।त्वया युक्तो हरिः साक्षात् तुलसी त्वां नमाम्यहम्॥ हिंदी अर्थहे माता , आप लक्ष्मी का रूप हैं और भगवान विष्णु की पत्नी हैं। आप सदा मंगल प्रदान करने वाली हैं। मैं आपको नमस्कार करता हूँ। English TranslationO Tulsi, you are the form of Lakshmi and the consort of Lord Vishnu. You are always auspicious and bless us with prosperity. I bow to you. 5. मंत्र माता के विवाह के दौरान श्लोकतुलस्यामृतजन्मासि सदा त्वं केशवप्रिय।केशवस्त्वां पाणिग्राहिष्यति कं सन्निधौ॥ हिंदी अर्थहे तुलसी! आप अमृत स्वरूप हैं और सदा केशव (भगवान विष्णु) को प्रिय हैं। आपके विवाह में केशव (विष्णु) आपके पति बनेंगे। English TranslationO Tulsi! You are born of nectar and are always dear to Keshava (Lord Vishnu). In your wedding, Keshava (Vishnu) will become your husband. इन श्लोकों का उच्चारण विवाह के दौरान शुभ और पुण्यदायक माना गया है। ये श्लोक भगवान विष्णु और माता की पवित्रता और महत्व को दर्शाते हैं।

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TULSI VIVAH 2024:तुलसी विवाह: महत्व, विधि, और वेदों में प्रमाण

TULSI VIVAH:तुलसी विवाह: महत्व, विधि, और वेदों में प्रमाण TULSI VIVAH तुलसी विवाह हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है, जो कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे देवउठनी एकादशी भी कहते हैं, पर मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के शालिग्राम स्वरूप का विवाह तुलसी माता से किया जाता है। इस पूजा का हिंदू धर्म में विशेष स्थान है, और इसका उल्लेख वेदों एवं पुराणों में भी मिलता है। तुलसी विवाह को शुभ विवाहों का आरंभ भी माना जाता है, और ऐसा माना जाता है कि इसके बाद सभी मांगलिक कार्य जैसे शादी-विवाह पुनः आरंभ हो जाते हैं। TULSI VIVAH तुलसी विवाह का महत्व तुलसी का विवाह एक धार्मिक और पौराणिक अनुष्ठान है, जिसमें भगवान विष्णु के अवतार शालिग्राम जी का विवाह माता तुलसी से संपन्न किया जाता है। इसे धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। पद्म पुराण में बताया गया है कि जो भक्त तुलसी विवाह कराते हैं, वे असीम पुण्य के भागी होते हैं। ऐसा माना जाता है कि तुलसी विवाह से घर में सुख, समृद्धि और शांति आती है। इसके अलावा, तुलसी को जीवनदायिनी औषधि माना गया है, और इसके धार्मिक और स्वास्थ्य दोनों ही लाभ होते हैं। TULSI VIVAH तुलसी विवाह का वेदों में प्रमाण तुलसी विवाह का उल्लेख विभिन्न वेदों और पुराणों में मिलता है। स्कंद पुराण, पद्म पुराण, और गरुड़ पुराण में तुलसी माता के महत्व और उनके विवाह का वर्णन किया गया है। स्कंद पुराण में तुलसी को लक्ष्मी का अवतार माना गया है, और उनके विवाह से संबंधित कथाएं दी गई हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, तुलसी माता का जन्म वृंदा नाम की एक असुर कन्या के रूप में हुआ था। उनकी भक्ति और पवित्रता के कारण उन्हें विष्णु जी की पत्नी बनने का वरदान मिला। वेदों में तुलसी को जीवन का प्रतीक माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार, तुलसी के सेवन से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। वहीं, धार्मिक दृष्टिकोण से, तुलसी माता के पूजन से व्यक्ति को सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। इसलिए तुलसी विवाह एक धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ एक आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी है। TULSI VIVAH तुलसी विवाह के लाभ TULSI VIVAH तुलसी विवाह की पूजन सामग्री तुलसी विवाह में विशेष पूजा सामग्री का उपयोग किया जाता है। यह सामग्री पूजा की शुद्धता और प्रभाव को बढ़ाती है तुलसी विवाह की पूजा विधि तुलसी विवाह की पूजा विधि सरल है, परंतु इसे पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ किया जाना चाहिए: तुलसी विवाह के मंत्र और स्तोत्र तुलसी विवाह में श्री विष्णु मंत्र और तुलसी स्तोत्र का पाठ करना शुभ माना जाता है। इसके अलावा, विष्णु सहस्रनाम और तुलसी चालीसा का पाठ भी किया जा सकता है। यह माना जाता है कि इन मंत्रों के उच्चारण से वातावरण पवित्र और सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है। निष्कर्ष तुलसी विवाह न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना भी है। इसका पालन कर हम भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। तुलसी विवाह के आयोजन से हमें धार्मिक, सामाजिक, और पारिवारिक लाभ प्राप्त होते हैं। इसका महत्व वेदों और पुराणों में भी दर्शाया गया है, जिससे इसकी प्राचीनता और पवित्रता का पता चलता है। तुलसी विवाह का आयोजन करके न केवल हम अपने घर में सुख-समृद्धि ला सकते हैं, बल्कि इसका पुण्य फल भी प्राप्त कर सकते हैं। इस पवित्र अनुष्ठान को श्रद्धा और विश्वास के साथ संपन्न करें और तुलसी माता एवं भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करें।

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Ahoi Ashtami 2024: महिलाएं क्यों पहनती हैं खास स्याहु माला? जानिए इसका धार्मिक महत्व

Ahoi Ashtami 2024: महिलाएं क्यों पहनती हैं खास स्याहु माला? जानिए इसका धार्मिक महत्व 🌸 Ahoi Ashtami एक महत्वपूर्ण त्योहार है, जब माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन स्याहु माता की पूजा की जाती है और विशेष स्याहु माला को धारण किया जाता है। आइए जानें, इस माला का महत्व और इसे पहनने का धार्मिक कारण। Ahoi Ashtami का महत्व अहोई अष्टमी के दिन महिलाएं स्याहु माता की पूजा करती हैं, जो संतान की लंबी आयु और खुशहाल जीवन का आशीर्वाद देती हैं। इस व्रत को संतान प्राप्ति के लिए भी किया जाता है, और मान्यता है कि स्याहु माता कभी भी अपनी भक्तों को निराश नहीं करतीं। यह व्रत विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण होता है, जो अपनी संतान की भलाई और उनके जीवन में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए पूजा करती हैं। स्याहु माला का धार्मिक महत्व अहोई अष्टमी पर स्याहु माला पहनना एक महत्वपूर्ण परंपरा है। यह माला आमतौर पर चांदी की होती है और इसे लाल या सफेद धागे में पिरोया जाता है, जिसमें स्याहु माता की तस्वीर और चांदी के मोती लगे होते हैं। हर साल माला में दो चांदी के मोती जोड़े जाते हैं, जो संतान की वृद्धि और उनकी सुरक्षा का प्रतीक हैं। इसे पहनने से माना जाता है कि स्याहु माता प्रसन्न होती हैं और संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद देती हैं। How to Worship Syahu Mata on Ahoi Ashtami स्याहु माला कब तक पहनें? इस माला को दिवाली तक पहना जाता है और फिर इसे संभालकर रख दिया जाता है। पूजा के दौरान रखा गया मिट्टी के घड़े का पानी दिवाली के दिन संतान को नहलाने के लिए उपयोग किया जाता है। यह माना जाता है कि यह स्याहु माता का आशीर्वाद होता है, जिससे संतान को लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य का वरदान मिलता है निष्कर्ष: Ahoi Ashtami का व्रत और स्याहु माला का धार्मिक महत्व माताओं के लिए बेहद खास है। इस दिन की पूजा और व्रत से संतान की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। 🌸 #AhoiAshtami2024 #SyahuMala #AhoiMata #SantanKiKhushhali #ReligiousTradition

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Ahoi Ashtami 2024: अहोई अष्टमी के दिन इस स्तोत्र का पाठ करने से मिलेगा सभी क्षेत्रों में सफलता

अहोई अष्टमी:धराधरेन्द्र नन्दिनी शशंक मालि संगिनी, सुरेश शक्ति वर्धिनी नितान्तकान्त कामिनी। निशाचरेन्द्र मर्दिनी त्रिशूल शूल धारिणी, मनोव्यथा विदारिणी शिव तनोतु पार्वती । भुजंग तल्प शामिनी महोग्रकान्त भागिनी, प्रकाश पुंज दायिनी विचित्र चित्र कारिणी। प्रचण्ड शत्रुधर्षिणी दया प्रवाह वर्षिणी, सदा सुभग्य दायिनी शिव तनोतु पार्वती। । प्रकृष्ट सृष्टि कारिका प्रचण्ड नृत्य नर्तिका , पिनाक पाणिधारिका गिरिश ऋग मालिका। समस्त भक्त पालिका पीयूष पूर्ण वर्षिका, कुभाग्य रेखमर्जिका शिव तनोतु पार्वती । तपश्चरी कुमारिका जगत्परा प्रहेलिका, विशुद्ध भाव साधिका सुधा सरित्प्रवाहिका। प्रयत्न पक्ष पौसिका सदार्धि भाव तोषिका, शनि ग्रहादि तर्जिका शिव तनोतु पार्वती । शुभंकरी शिवंकरी विभाकरी निशाचरी, नभश्चरी धराचरी समस्त सृष्टि संचरी । तमोहरी मनोहरी मृगांक मालि सुन्दरी, सदोगताप संचरी,शिवं तनोतु पार्वती।। पार्वती पंचक नित्यमधीयते यत कुमारिका, दृष्कृतं निखिलं हत्वा वरं प्रप्नोति सुन्दरम।। अहोई अष्टमी :पार्वती पंचक स्तोत्र: देवी पार्वती की स्तुति पार्वती पंचक स्तोत्र एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है जो देवी पार्वती की स्तुति करता है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए लाभदायक माना जाता है जो विवाह योग्य हैं या सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं। यह स्तोत्र देवी पार्वती से सुंदर वर प्राप्त करने और दाम्पत्य जीवन में सुख-शांति लाने के लिए मांगा जाता है। अहोई अष्टमी:स्तोत्र का महत्व अहोई अष्टमी :स्तोत्र का पाठ पार्वती पंचक स्तोत्र का पाठ संस्कृत में होता है। आप इस स्तोत्र का पाठ किसी अनुभवी ब्राह्मण से करवा सकते हैं या स्वयं भी कर सकते हैं। स्तोत्र का अर्थ समझने के लिए आप हिंदी अनुवाद भी देख सकते हैं। अहोई अष्टमी:यहाँ स्तोत्र का एक अंश दिया गया है: धराधरेन्द्र नन्दिनी शशंक मालि संगिनी, सुरेश शक्ति वर्धिनी नितान्तकान्त कामिनी। निशाचरेन्द्र मर्दिनी त्रिशूल शूल धारिणी, मनोव्यथा विदारिणी शिव तनोतु पार्वती । अर्थ: धरती के स्वामी शंकर की पत्नी, चंद्रमा के साथ विहार करने वाली, देवों की शक्ति को बढ़ाने वाली, अत्यंत मनोहारी और कामना पूर्ण करने वाली, राक्षसों के चंद्रमा का नाश करने वाली, त्रिशूल धारण करने वाली, मन के दुःखों को दूर करने वाली, शिवजी पार्वती को प्रदान करें। अहोई अष्टमी:स्तोत्र का जाप कैसे करें अहोई अष्टमी:स्तोत्र के लाभ पार्वती पंचक स्तोत्र का नियमित जाप करने से कई लाभ प्राप्त होते हैं, जैसे कि: यदि आप पार्वती पंचक स्तोत्र का पाठ करना चाहते हैं, तो आप किसी अनुभवी ब्राह्मण से संपर्क कर सकते हैं या फिर इंटरनेट पर उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। अस्वीकरण: यह जानकारी केवल सामान्य जानकारी के लिए है। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पहले किसी विद्वान से सलाह लेना उचित होता है। क्या आप पार्वती पंचक स्तोत्र के बारे में और अधिक जानना चाहते हैं? यदि आप स्तोत्र का पूरा पाठ, इसका हिंदी अनुवाद, या इसके जाप के तरीके के बारे में अधिक जानना चाहते हैं, तो कृपया मुझे बताएं। आप यह भी पूछ सकते हैं: मुझे आपकी मदद करने में खुशी होगी।

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Ahoi Ashtami 2024 Bhog: संतान की खुशहाली और समृद्धि के लिए विशेष भोग

Ahoi Ashtami:अहोई अष्टमी 2024: संतान की खुशहाली और समृद्धि के लिए विशेष भोग Ahoi Ashtami:अहोई अष्टमी हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है, जहाँ माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन विशेष भोग अहोई माता को अर्पित किए जाते हैं, जिन्हें संतान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। Ahoi Ashtami:अहोई अष्टमी 2024 के लिए विशेष भोग: भोग लगाते समय ध्यान रखने योग्य बातें: अहोई अष्टमी का महत्व: Ahoi Ashtami अहोई अष्टमी का व्रत माताओं के लिए संतान की दीर्घायु, सुख, और समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण होता है। इस दिन माता अहोई का व्रत रखने से माना जाता है कि संतान के जीवन से सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं और उनके जीवन में खुशियां आती हैं। व्रत के नियम: SEO के अनुसार उपयोगी टिप्स: निष्कर्ष: अहोई अष्टमी का व्रत और पूजा माता-पिता के लिए संतान की दीर्घायु और समृद्धि की कामना का एक पवित्र अवसर है। इस दिन के भोग और पूजा से संतान की सभी बाधाओं को दूर करने में सहायता मिलती है।

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Pradosh Vrat 2024: कब है भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत? नोट करें शुभ मुहूर्त एवं योग

Pradosh Vrat 2024 प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित एक महत्वपूर्ण व्रत है। यह व्रत हर महीने के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। भाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त और योग जानने के लिए आपको ज्योतिषीय गणनाओं का सहारा लेना होगा। Pradosh Vrat 2024 सनातन धर्म में प्रदोष व्रत (Pradosh Vrat 2024) का विशेष महत्व है। इस व्रत के पुण्य-प्रताप से साधक की हर मनोकामना पूरी होती है। शनिवार के दिन पड़ने के चलते यह शनि प्रदोष व्रत कहलाएगा। शनि प्रदोष व्रत करने से निसंतान दंपती को संतान की प्राप्ति होती है। इस अवसर पर साधक श्रद्रा भाव से भगवान शिव संग शनिदेव की पूजा करते हैं। Pradosh Vrat 2024:   प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि भगवान शिव को समर्पित है। इस दिन देवों के देव महादेव संग मां पार्वती की पूजा की जाती है। साथ ही उनके निमित्त व्रत रखा जाता है। धार्मिक मत है कि प्रदोष व्रत करने से साधक के जीवन में व्याप्त समस्त प्रकार के दुख एवं संकट दूर हो जाते हैं। साथ ही जीवन में मंगल का आगमन होता है। अत: साधक श्रद्धा भाव से भगवान शिव संग मां पार्वती की पूजा करते हैं। आइए, भाद्रपद माह के पहले प्रदोष व्रत की तिथि एवं शुभ मुहूर्त जानते हैं- Dahi Handi 2024: दही हांडी उत्सव कब? जानिए तिथि और इससे जुड़ी पौराणिक कथा Pradosh Vrat 2024 प्रदोष व्रत शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 31 अगस्त को देर रात 02 बजकर 25 मिनट से शुरू होगी और अगले यानी 01 सितंबर को देर रात 03 बजकर 40 मिनट पर समाप्त होगी। त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा की जाती है। अतः 31 अगस्त को प्रदोष व्रत मनाया जाएगा। इस दिन प्रदोष काल यानी पूजा का समय संध्याकाल 06 बजकर 43 मिनट से लेकर रात 08 बजकर 59 मिनट तक है। इस दौरान साधक भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं। Pradosh Vrat 2024 शुभ योग ज्योतिषियों की मानें तो भाद्रपद माह के पहले प्रदोष व्रत पर वरीयान योग का निर्माण हो रहा है। इस योग का समापन शाम 05 बजकर 39 मिनट पर होगा। इस दिन गर और वणिज करण का भी शुभ संयोग बन रहा है। साथ ही पुष्य और अश्लेषा नक्षत्र का निर्माण हो रहा है। इस समय में भगवान शिव की पूजा करने से हर कार्य में सफलता मिलती है। पंचांग सूर्योदय – सुबह 05 बजकर 59 मिनट पर सूर्यास्त – शाम 06 बजकर 43 मिनट पर ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04 बजकर 29 मिनट से 05 बजकर 14 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 28 मिनट से 03 बजकर 19 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 06 बजकर 43 मिनट से 07 बजकर 06 मिनट तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 11 बजकर 59 मिनट से 12 बजकर 44 मिनट तक Pradosh Vrat 2024 प्रदोष व्रत का महत्व Pradosh Vrat प्रदोष व्रत की पूजा विधि अन्य महत्वपूर्ण बातें Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि  KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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