VRAT KATHA

Devshayani Ekadashi Vrat Katha: देवशयनी एकादशी की व्रत कथा क्या है,आप भी इस व्रत…..

Devshayani ekadashi vrat katha:आषाढ़ महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु चार महीने के लिए निद्रा में चले जाते हैं। इसलिए इस एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। हिंदू धर्म में आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के निमित्त व्रत रखा जाता है और उनकी पूजा की जाती है। इस दिन से भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं। एकादशी व्रत के नियमों का पालन करने के अलावा व्रत कथा का भी विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी की कथा के बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है। आइए, जानते हैं कि भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में क्यों चले जाते हैं और इसके पीछे क्या कथा है।  Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा Devshayani Ekadashi Vrat Katha पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्माजी ने नारदजी को बताया था कि सतयुग में मांधाता नामक एक चक्रवर्ती राजा का शासन था। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी रहती थी, लेकिन नियति को पलटने में देर नहीं लगती है। अचानक, तीन वर्षों तक वर्षा नहीं होने के कारण राज्य में भयंकर अकाल पड़ गया। यज्ञ, हवन, पिंडदान, कथा-व्रत आदि धार्मिक क्रियाएं कोई भी कार्य नहीं हो पा रहे थे। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपनी व्यथा सुनाई। राजा मांधाता इस स्थिति से पहले ही परेशान थे और सोचते थे कि न जाने किस पाप के कारण यह आपदा उन पर आई है। अंगिरा ऋषि ने बताया कारण Devshayani Ekadashi Vrat Katha राजा मांधाता अपनी सेना सहित वन की ओर प्रस्थान कर, ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम में पहुंचे। ऋषिवर ने उन्हें आशीर्वाद दिया और उनके आने का कारण पूछा। राजा ने हाथ जोड़कर कहा, महात्मन्, मैं धर्म का पालन पूरी ईमानदारी से करता हूं, लेकिन इसके बावजूद भी पिछले तीन वर्षों से मेरे राज्य में बारिश नहीं हुई है और राज्य में अकाल पड़ा हुआ है। महर्षि अंगिरा ने कहा कि हे राजन्! सतयुग में छोटे से पाप का भी भयंकर दण्ड मिलता है। आपके राज्य में एक शूद्र तपस्या कर रहा है, जो इस युग में अनुचित माना गया है। इसी कारण आपके राज्य में वर्षा नहीं होती। जब तक वह शूद्र तपस्वी जीवित रहेगा, अकाल समाप्त नहीं होगा। राजा मांधाता ने कहा, “हे भगवान! मेरा मन किसी निर्दोष व्यक्ति को मारने को तैयार नहीं है। कृपया कोई अन्य उपाय बताएं।” महर्षि अंगिरा उन्हें आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने की सलाह दी। इस व्रत के प्रभाव से उनके राज्य में अवश्य वर्षा होने की बात कही। राजा ने राजधानी लौटकर विधि-विधान से पद्मा एकादशी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से मूसलाधार वर्षा हुई और राज्य धन-धान्य से भर गया।

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Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा, जानें कथा पाठ का लाभ

Devshayani ekadashi Vrat Katha In Hindi : आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी का उपवास किया जाता है। इस एकादशी का व्रत करने से और कथा सुनने व पढ़ने मात्र से जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। आइए जानते हैं देवशयनी एकादशी व्रत कथा के बारे में… आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी व्रत किया जाता है। सनातन धर्म में इस एकादशी का काफी महत्व माना जाता है क्योंकि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु क्षीर सागर की योग निद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद कार्तिक मास की एकादशी तिथि तक को भगवान विष्णु योगनिद्रा से निकलते हैं। इस दौरान भगवान शिव सृष्टि का संचालन करते हैं। देवशयनी एकादशी व्रत कथा का शास्त्रों में विशेष महत्व बताया गया है। इस व्रत की कथा सुनने व पढ़ने मात्र से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। देवशयनी एकादशी व्रत कथा:Devshayani Ekadashi Vrat Katha वामन अवतार की कथा:Story of Vaman Avatar वामन पुराण के अनुसार, एक बार राजा बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया था। Devshayani Ekadashi Vrat Katha यह देखकर इंद्र समेत अन्‍य देवी-देवता घबरा गए और भगवान विष्णु की शरण में पहुंच गए। देवताओं को परेशान देखकर भगवान विष्‍णु ने वामन अवतार धारण किया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। राजा बलि ने वामन देवता से कहा कि जो मांगना चाहते हैं मांग लीजिए। इस पर वामन देवता ने भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली। पहले और दूसरे पग में वामन देवता ने धरती और आकाश और पूरा संसार को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची तो राजा बलि से वामन देवता ने पूछा कि तीसरा पग में कहां रखूं तब राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। भगवान विष्णु राजा बलि को देखकर काफी प्रसन्‍न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। बलि ने उनसे वरदान में पाताल लोक में बस जाने की बात कही। बलि की बात मानकर उनको पाताल में जाना पड़ा। ऐसा करने से समस्‍त देवता और मां लक्ष्‍मी परेशान हो गए। Devshayani Ekadashi Vrat Katha अपने पति विष्‍णुजी को वापस लाने के लिए मां लक्ष्‍मी गरीब स्‍त्री के भेष में राजा बलि के पास गईं और उन्‍हें अपना भाई बनाकर राखी बांध दी और उपहार के रूप में विष्‍णुजी को पाताल लोक से वापस ले जाने का वरदान ले लिया। माता लक्ष्‍मी के साथ वापस जाते हुए भगवान विष्णु ने राजा बलि को वरदान दिया की वह प्रत्‍येक वर्ष आषाढ़ शुक्‍ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक मास की एकादशी तक पाताल में ही निवास करेंगे और इन 4 महीने की अवधि को उनकी योगनिद्रा माना जाएगा। यही वजह है कि दीपावली पर मां लक्ष्‍मी की पूजा भगवान विष्‍णु के बिना ही की जाती है। भगवान कृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाई थी यह कथा:Lord Krishna told this story to Yudhishthir Devshayani Ekadashi Vrat Katha:देवशयनी एकादशी व्रत कथा का वर्णन खुद भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। भगवान श्रीकृष्ण ने इस वृतांत को धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था। कथाओं के अनुसार, सतयुग में मांधाता नाम का एक चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। एक बार उसके राज्य में तीन साल तक वर्षा नहीं हुई, जिसकी वजह से राज्य में भंयकर अकाल पड़ गया। अकाल की वजह से चारो ओर त्रासदी का माहौल बन गया। राज्य के लोगों के अंदर धार्मिक भावनाएं कम होने लगीं। प्रजा ने राजा के पास जाकर अपना दर्द बताया, जिससे राजा भी चिंतित थे। राजा मांधाता को लगता था कि आखिर ऐसा कौन-सा पाप हो गया है, जिसकी सजा हमारे राज्य को ईश्वर दे रहा है। इस संकट से मुक्ति पाने के लिए राजा अपनी सेना के साथ ब्रह्माजी के पुत्र अंगिरा ऋषि के आश्रम पहुंचे। Devshayani Ekadashi Vrat Katha ऋषिवर ने उनको यहां आने का कारण पूछा। तब राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि हे ऋषिवर, मैंने हमेशा से पूरा निष्ठा से धर्म का पालन किया है, फिर मेरे राज्य की ऐसी हालत क्यों है। कृपया करके मुझे इसका समाधान दें। अंगिरा ऋषि ने कहा कि यह सतयुग है, यहां छोटे से पाप का भी बड़ा दंड मिलता है। अंगिरा ऋषि ने राजा को आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने को कहा। महर्षि ने कहा कि इस व्रत का फल जरूर मिलेगा और इसके प्रभाव से तुम्हारा संकट से भी निकल आएगा। Devshayani Ekadashi Vrat Katha महर्षि अंगिरा के निर्देश का पालन करते हुए राजा अपनी राजधानी वापस आ गए और उन्होंने चारों वर्णों सहित देवशयनी एकादशी का व्रत पूरा किया, जिसके बाद राज्य में मूसलधार वर्षा हुई।

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Satyanarayan Vrat Katha:श्री सत्यनारायण भगवान व्रत कथा संपूर्ण हिंदी में,जानें पूजन विधि

Satyanarayan Vrat Katha:शास्त्रों में बताया गया है कि सत्यनारायण व्रत कथा का पाठ करने से व्यक्ति को हजार यज्ञ करने के बराबर पुण्य फल की प्राप्ति होती है। सत्यनारायण भगवान व्रत कथा में भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप के बारे में बताया गया है। इस व्रत का पाठ करने से घर में सुख समृद्धि का वास होता है और भगवान विष्णु की कृपा बना रहती है। सत्यनारायण कथा का महत्व:Importance of Satyanarayan Vrat Katha भगवान सत्यनारायण का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। स्कन्द पुराण में भगवान विष्णु ने नारद को इस व्रत का महत्व बताया है। ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति सत्य को ईश्वर मानकर, निष्ठा के साथ इस व्रत और कथा का श्रवण करता है उसे मनमुताबिक फल की प्राप्ति होती है। पुराणों में यहां तक कहा गया है कि सत्यनारायण कथा कराने से हजारों वर्ष किए गए यज्ञ के बराबर फल मिलता है।   कब कराई जा सकती है कथा:When can the story be conducted? महीने की एकादशी, बृहस्पतिवार और हर महीने की पूर्णिमा तिथि को विष्णु जी का पूजन करने का विशेष फल प्राप्त होता है। इसलिए इन विशेष दिनों में सत्यनारायण की कथा पढ़ना और सुनना शुभ माना जाता है। सत्यनारायण व्रत पूजन:Satyanarayan fast worship सत्यनारायण व्रत के दौरान पूरे दिन उपवास रखना चाहिए। व्रत के दिन सुबह स्नान करके साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। शुभ मुहूर्त में पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके सत्यनारायण भगवान का पूजन करें। संध्या काल में पंडित को बुलाकर सत्यनारायण की कथा श्रवण करनी चाहिए। चौकी पर कलश रखकर भगवान विष्णु की मूर्तियां सत्यनारायण की फोटो रखकर पूजन करना चाहिए। भगवान को भोग में चरणामृत, पान, तिल, रोली, कुमकुम, फल, फूल, सुपारी और दुर्गा आदि अर्पित करें। सत्यनारायण भगवान की कथा सुनने के लिए परिवार के साथ- साथ अन्य भक्तों को भी शामिल करें। अंत में सभी लोगों में कथा का प्रसाद बांटे। Satyanarayan Vrat Katha:श्री सत्यनारायण भगवान व्रत कथा Satyanarayan Vrat Katha:सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय एक समय की बात है नैषिरण्य तीर्थ में शौनिकादि, 88,000 ऋषियों ने श्री सूतजी से पूछा हे प्रभु! इस कलियुग में वेद विद्या रहित मनुष्यों को प्रभु भक्ति किस प्रकार मिल सकती है? तथा उनका उद्धार कैसे होगा? हे मुनि श्रेष्ठ ! कोई ऐसा तप बताइए जिससे थोड़े समय में ही पुण्य मिलें और मनवांछित फल भी मिल जाए। इस प्रकार की कथा सुनने की हम इच्छा रखते हैं। सर्व शास्त्रों के ज्ञाता सूतजी बोले: हे वैष्णवों में पूज्य ! आप सभी ने प्राणियों के हित की बात पूछी है इसलिए मैं एक ऐसे श्रेष्ठ व्रत को आप लोगों को बताऊंगा जिसे नारद जी ने लक्ष्मीनारायण जी से पूछा था और लक्ष्मीपति ने मनिश्रेष्ठ नारद जी से कहा था। आप सब इसे ध्यान से सुनिए | एक समय की बात है, योगीराज नारदजी दूसरों के हित की इच्छा लिए अनेकों लोको में घूमते हुए मृत्युलोक में आ पहुंचे। यहां उन्होंने अनेक योनियों में जन्मे प्राय: सभी मनुष्यों को अपने कर्मों द्वारा अनेकों दुखों से पीड़ित देखा। उनका दुख देख नारदजी सोचने लगे कि कैसा यत्न किया जाए जिसके करने से निश्चित रुप से मानव के दुखों का अंत हो जाए। इसी विचार पर मनन करते हुए वह विष्णुलोक में गए। वहाँ वह देवों के ईश नारायण की स्तुति करने लगे जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म थे, गले में वरमाला पहने हुए थे। स्तुति करते हुए नारद जी बोले, हे भगवान! आप अत्यंत शक्ति से संपन्न हैं, मन तथा वाणी भी आपको नहीं पा सकती हैं। आपका आदि, मध्य तथा अंत नहीं है। निर्गुण स्वरुप सृष्टि के कारण भक्तों के दुख को दूर करने वाले है, आपको मेरा नमस्कार है। नारदजी की स्तुति सुन विष्णु भगवान बोले, हे मुनिश्रेष्ठ! आपके मन में क्या बात है? आप किस काम के लिए पधारे हैं? उसे नि:संकोच कहो। इस पर नारद मुनि बोले कि मृत्युलोक में अनेक योनियों में जन्मे मनुष्य अपने कर्मों के द्वारा अनेको दुख से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! आप मुझ पर दया रखते हैं तो बताइए कि वो मनुष्य थोड़े प्रयास से ही अपने दुखों से कैसे छुटकारा पा सकते है। श्रीहरि बोले, हे नारद! मनुष्यों की भलाई के लिए तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिसके करने से मनुष्य मोह से छूट जाता है, वह बात मैं कहता हूं, उसे सुनो। स्वर्ग लोक व मृत्युलोक दोनों में एक दुर्लभ उत्तम व्रत है जो पुण्य देने वाला है। आज प्रेमवश होकर मैं उसे तुमसे कहता हूं। श्रीसत्यनारायण भगवान का यह व्रत अच्छी तरह विधानपूर्वक करके मनुष्य तुरंत ही यहाँ सुख भोग कर, मरने पर मोक्ष पाता है। श्रीहरि के वचन सुन नारदजी बोले कि उस व्रत का फल क्या है? और उसका विधान क्या है? यह व्रत किसने किया था? इस व्रत को किस दिन करना चाहिए? सभी कुछ विस्तार से बताएं। नारद की बात सुनकर श्रीहरि बोले, दुख व शोक को दूर करने वाला यह सभी स्थानों पर विजय दिलाने वाला है। मानव को भक्ति व श्रद्धा के साथ शाम को श्रीसत्यनारायण की पूजा धर्म परायण होकर ब्राह्मणों व बंधुओं के साथ करनी चाहिए। भक्ति भाव से ही नैवेद्य, केले का फल, घी, दूध और गेहूँ का आटा सवाया लें। गेहूं के स्थान पर साठी का आटा, शक्कर तथा गुड़ लेकर व सभी भक्षण योग्य पदार्थो को मिलाकर भगवान का भोग लगाएँ। ब्राह्मणों सहित बंधु-बांधवों को भी भोजन कराएं, उसके बाद स्वयं भोजन करें। भजन, कीर्तन के साथ भगवान की भक्ति में लीन हो जाएं। इस तरह से सत्य नारायण भगवान का यह व्रत करने पर मनुष्य की सारी इच्छाएँ निश्चित रुप से पूरी होती हैं। इस कलि काल अर्थात कलियुग में मृत्युलोक में मोक्ष का यही एक सरल उपाय बताया गया है। ॥श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय संपूर्ण॥ बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय। Satyanarayan Vrat Katha:सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा का दूसरा अध्याय सूत जी बोले, हे ऋषियों ! जिसने पहले समय में इस व्रत को किया था उसका इतिहास कहता हूं, ध्यान से सुनो! सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख प्यास से परेशान वह धरती पर घूमता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम से प्रेम करने वाले भगवान ने एक दिन

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why celebrated mahesh navami:महेश नवमी क्यों मनाई जाती है, पढ़ें कथा

महेश नवमी क्या है? (What is  Mahesh Navami) why celebrated mahesh navami:महेश नवमी (Mahesh Navami), ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि पर मनाया जाने वाला पर्व, महेश्वरी समुदाय के लिए महत्वपूर्ण है। यह भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा का दिन है और समुदाय की उत्पत्ति को चिन्हित करता है। इस दिन विशेष प्रार्थनाएं और अनुष्ठान होते हैं, और महेश्वरी समुदाय के सदस्य “बाबा की झांकी” भी करते हैं। महेश नवमी माहेश्वरी समाज का प्रमुख पर्व है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। माहेश्वरी समाज की उत्पति भगवान शिव के वरदान से इसी दिन हुई। महेश नवमी के दिन देवाधिदेव शिव व जगतजननी मां पार्वती की आराधना की जाती है। यहां पढ़ें महेश नवमी की कथा- कथा : एक खडगलसेन राजा थे। प्रजा राजा से प्रसन्न थी। राजा व प्रजा धर्म के कार्यों में संलग्न थे, पर राजा को कोई संतान नहीं होने के कारण राजा दु:खी रहते थे। राजा ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से कामेष्टि यज्ञ करवाया। why celebrated mahesh navami ऋषियों-मुनियों ने राजा को वीर व पराक्रमी पुत्र होने का आशीर्वाद दिया, लेकिन साथ में यह भी कहा 20 वर्ष तक उसे उत्तर दिशा में जाने से रोकना। नौवें माह प्रभु कृपा से पुत्र उत्पन्न हुआ। राजा ने धूमधाम से नामकरण संस्कार करवाया और उस पुत्र का नाम सुजान कंवर रखा। वह वीर, तेजस्वी व समस्त विद्याओं में शीघ्र ही निपुण हो गया। why celebrated mahesh navami एक दिन एक जैन मुनि उस गांव में आए। उनके धर्मोपदेश से कुंवर सुजान बहुत प्रभावित हुए। why celebrated mahesh navami उन्होंने जैन धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली और प्रवास के माध्यम से जैन धर्म का प्रचार-प्रसार करने लगे। धीरे-धीरे लोगों की जैन धर्म में आस्था बढ़ने लगी। स्थान-स्थान पर जैन मंदिरों का निर्माण होने लगा। एक दिन राजकुमार शिकार खेलने वन में गए और अचानक ही राजकुमार उत्तर दिशा की ओर जाने लगे। why celebrated mahesh navami सैनिकों के मना करने पर भी वे नहीं माने। उत्तर दिशा में सूर्य कुंड के पास ऋषि यज्ञ कर रहे थे। वेद ध्वनि से वातावरण गुंजित हो रहा था। यह देख राजकुमार क्रोधित हुए और बोले- ‘मुझे अंधरे में रखकर उत्तर दिशा में नहीं आने दिया’ और उन्होंने सभी सैनिकों को भेजकर यज्ञ में विघ्न उत्पन्न किया। इस कारण ऋषियों ने क्रोधित होकर उनको श्राप दिया और वे सब पत्थरवत हो गए। राजा ने यह सुनते ही प्राण त्याग दिए। उनकी रानियां सती हो गईं। why celebrated mahesh navami राजकुमार सुजान की पत्नी चन्द्रावती सभी सैनिकों की पत्नियों को लेकर ऋषियों के पास गईं और क्षमा-याचना करने लगीं। ऋषियों ने कहा कि हमारा श्राप विफल नहीं हो सकता, पर भगवान भोलेनाथ व मां पार्वती की आराधना करो। why celebrated mahesh navami सभी ने सच्चे मन से भगवान की प्रार्थना की और भगवान महेश व मां पार्वती ने अखंड सौभाग्यवती व पुत्रवती होने का आशीर्वाद दिया। चन्द्रावती ने सारा वृत्तांत बताया और सबने मिलकर 72 सैनिकों को जीवित करने की प्रार्थना की। महेश भगवान पत्नियों की पूजा से प्रसन्न हुए और सबको जीवनदान दिया। why celebrated mahesh navami भगवान शंकर की आज्ञा से ही इस समाज के पूर्वजों ने क्षत्रिय कर्म छोड़कर वैश्य धर्म को अपनाया। why celebrated mahesh navami समस्त माहेश्वरी समाज इस दिन श्रद्धा व भक्ति से भगवान शिव व मां पार्वती की पूजा-अर्चना करते हैं। इसलिए आज भी ‘माहेश्वरी समाज’ के नाम से इसे जाना जाता है।  महेश नवमी के फायदे (Mahesh Navami Benefits) 1.महेश नवमी (Mahesh Navami) हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण त्योहार है जो ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है।  2.इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करने से सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। 3.महेश नवमी के दिन शिवलिंग पर जल, दूध, भांग और बेलपत्र चढ़ाने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और बीमारियों से मुक्ति मिलती है।  3.इस दिन 21 बेलपत्र पर ‘ॐ’ लिखकर चढ़ाने से इच्छित फल प्राप्त होता है।  4.महेश नवमी का व्रत करने से शिव-पार्वती की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है।  5.इस दिन दान-पुण्य करने से भी पुण्य फल मिलता है। महेश नवमी व्रत (Mahesh Navami Vrat) को मनाने के प्रमुख नियम निम्नलिखित हैं | प्रातः स्नान करके साफ वस्त्र धारण करें। भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। निकटतम शिव मंदिर जाकर भगवान शिव को दूध, फूल, बेल पत्र अर्पित करें और ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप करें। व्रत के दौरान एक समय भोजन करें। भोजन में फलाहार या सात्विक आहार लें। प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा आदि का सेवन न करें। दिन भर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करें। शिव चालीसा, शिव पुराण आदि का पाठ करें। महेश नवमी की कथा सुनें। महेश नवमी की व्रत कथा सुनने से आपको भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होगी। सायंकाल शिव मंदिर जाकर महाआरती में शामिल हों। शिव जी की वंदना का गायन करें। रात्रि में जागरण करें। भगवान शिव के गुणों का स्मरण करते हुए भजन-कीर्तन करें। अगले दिन प्रातः स्नान के बाद व्रत का पारण करें। ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दान-दक्षिणा दें। महेश नवमी (Mahesh Navami) के दिन भगवान शिव (Lord Shiva) और माता पार्वती (Goddess Parvati) की विधिवत पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यह व्रत विशेष रूप से माहेश्वरी समाज के लिए महत्वपूर्ण है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव का आविर्भाव हुआ था, इसलिए इसे महाशिवजयंती भी कहा जाता है।

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Apara Ekadashi Vrat Katha:अपरा एकादशी पर जरूर पढ़ें व्रत कथा, मिलेगा अपार धन और पापों से छुटकारा !

Apara Ekadashi Vrat Katha: ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी के नाम से जाना जाता है. Vrat Katha इस दिन पूजा के दौरान अपरा एकादशी व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए. आइए पढ़ें अपरा एकादशी व्रत की कथा. Apara Ekadashi Katha: हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है. एकादशी तिथि जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित मानी जाती है. हर महीने में 2 बार एकादशी व्रत रखा जाता है. एक कृष्ण पक्ष में और दूसरा शुक्ल पक्ष में. ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है. इस तिथि पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा-व्रत करने की मान्यता है. इस Vrat Katha व्रत को करने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं. एकादशी पूजा के दौरान एकादशी व्रत कथा का पाठ जरूर करना चाहिए. एकादशी (Vrat Katha) व्रत कथा पढ़ने से इस व्रत का पूर्ण फल मिलता है. ऐसी मान्यता है कि कथा का पाठ करने से पूजा सफल होती है और श्रीहरि विष्णु प्रसन्न होते हैं. आइए जानते हैं अपरा एकादशी व्रत कथा के बारे में. अपरा एकादशी व्रत कथा (Apara Ekadashi Vrat Katha) युधिष्ठिर ने पूछा- जनार्दन ! ज्येष्ठके कृष्णपक्षमें किस नामकी एकादशी होती है ? मैं उसका माहात्म्य सुनना चाहता हूं। उसे बताने की कृपा कीजिये । भगवान् श्रीकृष्ण बोले- राजन् ! तुमने सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये बहुत उत्तम बात पूछी है। राजेन्द्र ! इस एकादशीका नाम ‘अपरा’ है। यह बहुत पुण्य प्रदान करने वाली और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली है। Vrat Katha ब्रह्महत्यासे दबा हुआ, गोत्रकी हत्या करनेवाला, गर्भस्थ बालक को मारने वाला, परनिन्दक तथा परस्त्रीलम्पट पुरुष भी अपरा एकादशी के सेवन से निश्चय ही पाप रहित हो जाता है। जो झूठी गवाही देता, माप-तोलमें धोखा देता, बिना जाने ही नक्षत्रों की गणना करता और कूटनीति से आयुर्वेद का ज्ञाता बनकर वैद्य का काम करता है- ये सब नरकमें निवास करने वाले प्राणी हैं। परन्तु अपरा एकादशी के सेवनसे ये भी पापरहित हो जाते हैं। यदि व क्षत्रिय क्षात्रधर्मका परित्याग करके युद्धसे भागता है, तो वह क्षत्रियोचित धर्म से भ्रष्ट होनेके कारण घोर नरकमें पड़ता है। जो शिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही गुरुकी निन्दा करता है, वह भी महापातकों से युक्त होकर भयङ्कर नरक में गिरता है। किन्तु अपरा एकादशीके सेवनसे ऐसे मनुष्य भी सद्गतिको प्राप्त होते हैं। Apara Ekadashi 2025 Date:मई में कब रखा जाएगा अपरा एकादशी का व्रत? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व माघमें जब सूर्य मकर राशिपर स्थित हों, उस समय प्रयाग में स्नान करनेवाले मनुष्यों को जो पुण्य होता है, काशी में शिवरात्रिका व्रत करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, गया में पिण्डदान करके पितरों को तृप्ति प्रदान करनेवाला पुरुष जिस पुण्यका भागी होता है, बृहस्पति के सिंहराशिपर स्थित होनेपर गोदावरीमें स्रान करनेवाला मानव जिस फलको प्राप्त करता है, बदरिकाश्रमकी यात्रा के समय भगवान् केदार के दर्शन से तथा बदरीतीर्थ के सेवन से जो पुण्य फल उपलब्ध होता है तथा सूर्यग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में दक्षिणा सहित यज्ञ करके हाथी, घोड़ा और सुवर्ण-दान करनेसे जिस फलकी प्राप्ति होती है; Vrat Katha अपरा एकादशी के सेवनसे भी मनुष्य वैसे ही फल प्राप्त करता है। ‘अपरा’ को उपवास करके भगवान् वामन की पूजा करनेसे मनुष्य सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुल्लेकमें प्रतिष्ठित होता है। इसको पढ़ने और सुननेसे सहस्त्र गोदान का फल मिलता है। युधिष्ठिर ने कहा- जनार्दन । ‘अपरा’का सारा माहात्य मैंने सुन लिया, अब ज्येष्ठ के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी है उसका वर्णन कीजिये । भगवान् श्रीकृष्ण बोले- राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे; क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद-वेदाङ्गोंके पारङ्गत विद्वान् हैं। तब वेदव्यासजी कहने लगे – दोनों ही पक्षोंकी एकादशियोंको भोजन न करे । द्वादशीको स्त्रान आदि से पवित्र हो फूलों से भगवान् के शव की पूजा करके नित्य कर्म समाप्त होनेके पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्तमें स्वयं भोजन करे। राजन् ! जननाशौच और मरणा शौच में भी एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिये । यह सुनकर भीम सेन बोले- परम बुद्धिमान् पितामह । मेरी उत्तम बात सुनिये । राजा युधिष्ठिर, माता न कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव-ये एकादशीको कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी ने हमेशा यही कहते हैं कि ‘भीमसेन ! तुम भी एकादशी को न खाया करो।’ किन्तु मैं इन लोगों से यही कह दिया करता हूं कि ‘मुझसे भूख नहीं सही जाएगी ।’

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Mahalaxmi Vrat Katha: महालक्ष्मी व्रत के दिन जरूर पढ़ें यह व्रत कथा, बनी रहेगी मां लक्ष्मी की कृपा दृष्टि

Mahalaxmi Vrat Katha:महालक्ष्मी व्रत की शुरूआत राधा अष्टमी से शुरू होता है और 16वें दिन इस व्रत का समापन किया जाता है। इस दिन महालक्ष्मी व्रत कथा का पाठ करने से भक्तों पर मां की कृपा दृष्टि बनी रहती है। महालक्ष्मी व्रत भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के साथ शुरू हो जाता है। इस दिन राधारानी के जन्मदिन के रूप में राधा अष्टमी का पर्व भी मनाया जाता है। Mahalaxmi Vrat Katha आज के दिन विधिपूर्वक और श्रद्धा से महालक्ष्मी व्रत रखा जाता है। इससे देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और भक्तों पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखती हैं। पूजा-अर्चना के साथ ही इस दिन महालक्ष्मी व्रत कथा का भी पाठ करना चाहिए। तो आइए पढ़ते हैं महालक्ष्मी व्रत कथा……. Mahalaxmi Vrat Katha:महालक्ष्मी व्रत कथा प्राचीन काल की बात है, एक गाँव में एक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मण नियमानुसार भगवान विष्णु का पूजन प्रतिदिन करता था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे दर्शन दिये और इच्छा अनुसार वरदान देने का वचन दिया। ब्राह्मण ने माता लक्ष्मी का वास अपने घर मे होने का वरदान मांगा। ब्राह्मण के ऐसा कहने पर भगवान विष्णु ने कहा यहाँ मंदिर मैं प्रतिदिन एक स्त्री आती है और वह यहाँ गोबर के उपले थापति है। वही माता लक्ष्मी हैं, Mahalaxmi Vrat Katha तुम उन्हें अपने घर में आमंत्रित करो। देवी लक्ष्मी के चरण तुम्हारे घर में पड़ने से तुम्हारा घर धन-धान्य से भर जाएगा। Laxmi Mata Aarti:लक्ष्मीजी आरती ऐसा कहकर भगवान विष्णु अदृश्य हो गए। अब दूसरे दिन सुबह से ही ब्राह्मण देवी लक्ष्मी के इंतजार मे मंदिर के सामने बैठ गया। जब उसने लक्ष्मी जी को गोबर के उपले थापते हुये देखा, तो उसने उन्हे अपने घर पधारने का आग्रह किया। ब्राह्मण की बात सुनकर लक्ष्मी जी समझ गयीं कि यह बात ब्राह्मण को विष्णुजी ने ही कही है। तो उन्होने ब्राह्मण को महालक्ष्मी व्रत करने की सलाह दी। लक्ष्मी जी ने ब्राह्मण से कहा कि तुम 16 दिनों तक महालक्ष्मी व्रत करो और व्रत के आखिरी दिन चंद्रमा का पूजन करके अर्ध्य देने से तुम्हारा व्रत पूर्ण होजाएगा। ब्राह्मण ने भी महालक्ष्मी के कहे अनुसार व्रत किया और देवी लक्ष्मी ने भी उसकी मनोकामना पूर्ण की। उसी दिन से यह व्रत श्रद्धा से किया जाता है। शुक्रवार के ये उपाय बदल देंगे आपकी किस्मत! घर में दौड़ी आएंगी मां लक्ष्मी Mahalaxmi Vrat Katha:द्वतीय कथा एक बार महाभारत काल में हस्तिनापुर शहर में महालक्ष्मी व्रत के दिन महारानी गांधारी ने नगर की सारी स्त्रियों को पूजन के लिए आमंत्रित किया, परंतु उन्होने कुंती को आमंत्रण नहीं दिया। गांधारी के सभी पुत्रों ने पूजन के लिए अपनी माता को मिट्टी लाकर दी और इसी मिट्टी से एक विशाल हाथी का निर्माण किया गया और उसे महल के बीच मे स्थापित किया गया। Laxmi prapti upay : रूठी लक्ष्मी को मनाकर घर कैसे लाऐं, लक्ष्मी आओ हमारे द्वार, दूर करो दरिद्रता, भर दो घर को धन-धान्य से नगर की सारी स्त्रियाँ जब पूजन के लिए जाने लगी, तो कुंती उदास हो गयीं। Mahalaxmi Vrat Katha जब कुंती के पुत्रों ने उनकी उदासी का कारण पूछा तो उसने सारी बात बताई। इस पर अर्जुन ने कहा माता आप पूजन की तैयारी कीजिये मैं आपके लिए हाथी लेकर आता हूँ। ऐसा कहकर अर्जुन इन्द्र देव के पास गये और अपनी माता के पूजन के लिए ऐरावत को ले आए। इसके पश्चात कुंती ने सारे विधि-विधान से पूजन किया। जब नगर की अन्य स्त्रियों को पता चला, कि कुंती के यहाँ इन्द्र देव की सारी ऐरावत आया है। Mahalaxmi Vrat Katha तो वे भी पूजन के लिए उमड़ पड़ी और सभी ने सविधि पूजन सम्पन्न किया। Diwali 2025 Date: दिवाली 2025 में कब है ? अभी से जान लें डेट, लक्ष्मी पूजा मुहूर्त दीपावली पर धन प्राप्ति के लिए माँ लक्ष्मी के शक्तिशाली मंत्र – DIWALI MANTRA

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kaal Bhairav Jayanti 2024:काल भैरव जयंती कब है? नोट कर लें डेट, शुभ मुहूर्त और पूजा-विधि

kaal Bhairav :हर साल मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर काल भैरव जयंती मनाई जाती है। धार्मिक कथाओं के अनुसार इसी दिन काल भैरव का अवतरण हुआ था। इस साल 22 नवंबर, शुक्रवार को काल भैरव जयंती है। kaal Bhairav :काल भैरव जयंती, जिसे महाकाल या भैरव अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण पर्व है। इसे भगवान शिव के उग्र रूप kaal Bhairav काल भैरव के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान शिव ने स्वयं काल भैरव का रूप धारण किया था, जो उनके विनाशकारी रूप का प्रतीक है। यह तिथि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आती है और इस वर्ष 2024 में काल भैरव जयंती 22 नवंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी। आइए जानते हैं इस पर्व का महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में। 1. kaal Bhairav काल भैरव जयंती 2024 का शुभ मुहूर्त काल भैरव जयंती पर विशेष पूजा का आयोजन शुभ मुहूर्त में करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। इस दिन काल भैरव की पूजा रात्रि के समय करना उत्तम होता है। आइए जानते हैं इस बार का शुभ मुहूर्त: अष्टमी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 22, 2024 को 06:07 पी एम बजे अष्टमी तिथि समाप्त – नवम्बर 23, 2024 को 07:56 पी एम बजे 2. काल भैरव का महत्व भगवान काल भैरव को हिंदू धर्म में समय, शक्ति और न्याय के देवता के रूप में पूजा जाता है। kaal Bhairav उनका स्वरूप अत्यंत भयंकर है, जो अन्याय और अधर्म का नाश करने के लिए विख्यात हैं। कहा जाता है कि भगवान शिव ने काल भैरव को बुराइयों को समाप्त करने और शत्रुओं का संहार करने के लिए अवतरित किया था। इस दिन की पूजा से: 3. काल भैरव जयंती पर पूजा विधि kaal Bhairav काल भैरव जयंती पर पूजा की विधि का विशेष महत्व होता है। kaal Bhairav पूजा विधि का पालन सही तरीके से करने पर भगवान काल भैरव प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद प्रदान करते हैं। इस पर्व पर की जाने वाली पूजा विधि इस प्रकार है: 3.1. संकल्प लें 3.2. दीपक जलाएं 3.3. फूल, अक्षत और भोग चढ़ाएं 3.4. काल भैरव स्तोत्र और मंत्र जाप 3.5. पान और शराब का भोग 3.6. रात्रि जागरण और भैरव भजन 4. kaal Bhairav काल भैरव जयंती का पुण्यफल और लाभ इस दिन काल भैरव की पूजा करने से जीवन में आने वाली हर प्रकार की समस्याओं से छुटकारा मिलता है। काल भैरव की कृपा से भक्तों को हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और बुरी शक्तियों से रक्षा मिलती है। इसके अतिरिक्त इस दिन पूजा करने से: निष्कर्ष काल भैरव जयंती को भगवान शिव के क्रोध और शक्ति के रूप के रूप में मनाया जाता है। इस दिन की पूजा विधि और मान्यताओं के अनुसार, भक्तों को काल भैरव के आशीर्वाद से जीवन में सुरक्षा, साहस और सभी समस्याओं से मुक्ति प्राप्त होती है। काल भैरव जयंती पर विधिपूर्वक पूजा करने से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं और भगवान की कृपा सदैव बनी रहती है।

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Bhadrapad Sankashti Chaturthi 2024: हेरंब संकष्टी चतुर्थी कब ? भाद्रपद माह में बप्पा की पूजा का विशेष महत्व, जानें डेट, मुहूर्त

Sankashti Chaturthi 2024: भाद्रपद हेरंब संकष्टी चतुर्थी अगस्त में ही मनाई जाएगी. गणपति जी (ganesh ji) की कृपा से सारे बिगड़े काम बन जाते हैं. बप्पा के आशीर्वाद से जीवन में खुशहाली आती है भाद्रपद संकष्टी चतुर्थी हिंदू धर्म में एक महत्वपूर्ण व्रत है जो गणेश जी को समर्पित है। इस दिन भक्त गणेश जी की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं। यह व्रत विशेष रूप से भाद्रपद माह में मनाया जाता है और इसे “हेरंब संकष्टी चतुर्थी” के नाम से भी जाना जाता है। Bhadrapada Sankashti Chaturthi 2024:  भगवान गणेश (Ganesh ji) को साक्षात् बुद्धि का स्वरूप,  ज्ञान का देवता एवम् सभी बाधाओं या कष्टों को दूर करने वाला देवता माना जाता है. इसे भगवान गणेश की पूजा करने का एक महत्वपूर्ण दिन माना जाता है.  हर साल भाद्रपद (Bhado chaturthi) के महीने में आने वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन हेरंब संकष्टी चतुर्थी (Heramba Sankashti Chaturthi) का पर्व मनाया जाता है, जो भगवान गणेश के 32 स्वरूपों में से एक हेरम्ब देवता को समर्पित है. इस साल भाद्रपद माह की हेरंब संकष्टी चतुर्थी 2024 में कब है, जान लें डेट, पूजा मुहूर्त. Sankashti Chaturthi क्यों है खास भाद्रपद संकष्टी चतुर्थी? भाद्रपद हेरंब संकष्टी चतुर्थी 2024 डेट (Bhadrapada Sankashti Chaturthi 2024 Date) भाद्रपद माह की हेरंब संकष्टी चतुर्थी 22 अगस्त 2024 को है. इसी दिन बहुला चौथ (Bahula Chauth) भी मनाई जाएगी. भगवान गणेश को किसी भी पूजा या अनुष्ठान का आरम्भ करने से पहले देवताओं में सर्वप्रथम गणेश जी की पूजा की जाती है. हेरंब संकष्टी चतुर्थी 2024 मुहूर्त (Heramba Sankashti Chaturthi 2024 Time) पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 22 अगस्त  2024 को दोपहर 01 बजकर 46 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 23 अगस्त 2024 को सुबह 10 बजकर 38 मिनट पर इसका समापन होगा. Dahi Handi 2024: दही हांडी उत्सव कब? जानिए तिथि और इससे जुड़ी पौराणिक कथा Sankashti Chaturthi हेरंब संकष्टी चतुर्थी पूजा मंत्र हे हेरंब त्वमेह्योहि ह्माम्बिकात्र्यम्बकात्मज सिद्धि-बुद्धि पते त्र्यक्ष लक्षलाभ पितु: पित: नागस्यं नागहारं त्वां गणराजं चतुर्भुजम् भूषितं स्वायुधौदव्यै: पाशांकुशपरश्र्वधै: भाद्रपद संकष्टी चतुर्थी महत्व (Bhadrapada Sankashti Chaturthi Importance) Sankashti Chaturthi भाद्रपद माह में गणपति जी (Ganpati ji) की पूजा का विशेष महत्व है क्योंकि इसी महीने में बप्पा का जन्म हुआ था. भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी मनाई जाती है और ये उत्सव 10 दिन तक चलता है. भादो में बप्पा की पूजा से संकट, कष्ट, रोग, दोष दूर होते हैं. हेरम्ब संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि (Heramba Sankashti Chaturthi Puja vidhi) ध्यान रखने योग्य बातें Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि  KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें. 

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Dahi Handi 2024: दही हांडी उत्सव कब? जानिए तिथि और इससे जुड़ी पौराणिक कथा

Dahi Handi 2024 Date: कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार हर साल भाद्रपद महीने की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इसके साथ भगवान श्री कृष्ण के जन्ममोत्सव के रूप में दही हांडी उत्सव भी मनाया जाता है। Dahi Handi 2024 यह उत्सव मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र और गोवा में धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्यौहार हमेशा कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है। इस बार जन्माष्टमी 26 अगस्त को और दही हांडी उत्सव 27 अगस्त को मनाया जाएगा।  आइए जानते हैं इस वर्ष कब मनाई जाएगी दही हांडी? Dahi Handi 2024: दही हांडी जिसे गोपालकला (Gopal kala) के नाम से भी जाना जाता है, ये मुख्य रूप से श्रीकृष्ण (Krishna) की लीलाओं से जुड़ा त्योहार है. हर साल कृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन दही हांडी का पर्व मनाया जाता है. Dahi Handi 2024 दही हांडी के उत्सव में एक मिट्टी के बर्तन में दही भरकर रस्सी पर लटका दिया जाता है और गोविंदाओं की टोली पिरामिड बनाकर उस हांडी को तोड़ते हैं. आइए जानें इस साल दही हांडी 2024 में कब मनाया जाएगा. दही हांडी 2024 तिथिदही हांडी का त्योहार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष जन्माष्टमी 26 अगस्त को मनाई जाएगी और दही हांडी का त्योहार 27 अगस्त के दिन मनाया जाएगा। Dahi Handi 2024 दही हांडी क्यों मनाई जाती है ? (Why Dahi Handi Celebrate) दही हांडी की परंपरा में भगवान कृष्ण के बचपन की लीलाओं को सामने रखा जाता है. दही हांडी के आयोजन को गोपाल कला या दहिकला भी कहा जाता है. हिंदु धर्म में मान्यता है कि प्राचीन काल में कान्हा घर-घर जाकर चुपके से लोगों की मटकी से माखन चुराकर खाया करते थे. मटकी (हांडी) ऊपर लटकी हो तो उसे फोड़कर माखन चुराते थे. कहते हैं कि जिस घर में कान्हा के कदम पड़ते थे उनके सारे दुख दूर हो जाते थे. मान्यता है कि घर में माखन चोरी के लिए मटकी फोड़ने से घर के दुख दूर हो जाते हैं और खुशियों का वास होता है. Dahi Handi 2024 कैसे मनाई जाती है दही हांडी ? Dahi Handi 2024 दही हांडी उत्सव के दौरान मिट्टी के बर्तन में दही या मक्खन को ऊंचाई पर लटकाया जाता है। फिर पुरुषों और महिलाओं का एक समूह एक मानव पिरामिड बनाता है और मटके को तोड़ने का प्रयास करता है। Dahi Handi 2024 दही हांडी का प्रदर्शन कई स्थानों पर प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं। इस प्रतियोगिता में भाग लेने वाले लोगों को गोविंदा कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो भी समूह मटकी तोड़ता है उसे भगवान कृष्ण का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। Dahi Handi 2024 दही हांडी का इतिहास (Dahi Handi History) पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में भगवान कृष्ण बचपन में अपने दोस्तों के साथ माखन मिश्री की चोरी करते थे और अपने मित्रों में बांट देते थे. माखन चोरी से परेशान होकर गोपियां माखन को ऊंचे स्थान पर लटकाना शुरू कर दिया था लेकिन गोपियों का यह प्रयास भी असफल हो गया. नटखट कान्हा अपने दोस्तों की टोली के साथ वहां से भी माखन चुरा लेते थे और बड़े चाव के साथ सबके साथ खाते हैं. भगवान कृष्ण की इन्हीं बाल लीलाओं को दहीं हांडी के उत्सव के रूप में मनाया जाता है. Dahi Handi कृष्ण जन्माष्टमी महत्वभारत में जन्माष्टमी के पर्व को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन पूरे विधि-विधान से कृष्ण जी के बाल रूप की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण को विष्णु जी का 8वां अवतार माना जाता है। ऐसे में जन्माष्टमी का व्रत रखने से विष्णु जी की कृपा भी बनी रहती है। Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि KARMASU.IN किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.

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Durga ashtami 2024:अगस्त माह में कब रखा जाएगा मासिक दुर्गाष्टमी व्रत? जानें तिथि और मां दुर्गा की पूजा विधि

Durga Ashtami 2024: दुर्गा अष्टमी को माता की अराधना से हर मनोकामना पूरी होती है. माता की कृपा से जीवन में आने वाले सभी प्रकार के कष्ट टल जाते हैं. इस दिन मां दुर्गा की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस व्रत का विशेष महत्व होता है और इसे रखने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। Masik Durgashtami Vrat 2024: धार्मिक मान्यता के अनुसार, हर एक माह की प्रत्येक तिथि किसी न किसी देवी-देवताओं को समर्पित होती है, जिस दिन खासतौर पर उनकी उपासना की जाती है। वैदिक पंचांग के अनुसार, प्रत्येक मास में आने वाली शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत रखा जाता है। Durga ashtami 2024 मासिक दुर्गाष्टमी के दिन मां दुर्गा की पूजा की जाती है। इसी के साथ व्रत भी रखा जाता है। चलिए जानते हैं मासिक दुर्गाष्टमी के दिन मां दुर्गा की पूजा विधि और माता को प्रसन्न करने के उपायों के बारे में। Durga Ashtami 2024 मां दुर्गा की पूजा का शुभ मुहूर्त अगस्त महीने में मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत 13 अगस्त, मंगलवार को मनाया जायेगा। अष्टमी तिथि का समय 12 अगस्त 07:55 पूर्वाह्न से शुरू होकर 13 अगस्त को सुबह 09:31 तक है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत 13 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन देवी दुर्गा के हथियारों की पूजा की जाती है और इस उत्सव को ‘अस्त्र पूजा’ के रूप में जाना जाता है। हथियारों और मार्शल आर्ट के अन्य रूपों के प्रदर्शन के कारण इस दिन को लोकप्रिय रूप से ‘विराष्टमी’ भी कहा जाता है। हिंदू भक्त देवी दुर्गा की पूजा करते हैं और उनका दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए सख्त उपवास रखते हैं। भारत के उत्तरी और पश्चिमी क्षेत्रों में दुर्गा अष्टमी व्रत पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आंध्र प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में, दुर्गा अष्टमी को ‘बथुकम्मा पांडुगा’ के रूप में मनाया जाता है। दुर्गा अष्टमी व्रत हिंदू धर्म के अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। Durga ashtami 2024 मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत का महत्व संस्कृत भाषा में ‘दुर्गा’ शब्द का अर्थ है ‘अपराजेय’ और ‘अष्टमी’ का अर्थ है ‘आठवां दिन’। हिंदू किंवदंतियों के अनुसार देवी दुर्गा का उग्र और शक्तिशाली रूप, जिसे ‘देवी भद्रकाली’ के नाम से जाना जाता है, Durga ashtami 2024 अवतरित हुई थीं। दुर्गा अष्टमी का दिन ‘महिषासुर’ नामक राक्षस पर देवी दुर्गा की जीत के रूप में मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी पूर्ण समर्पण के साथ दुर्गा अष्टमी व्रत का पालन करता है उसे जीवन में खुशी और सौभाग्य प्राप्त होता है। Durga ashtami 2024 मासिक दुर्गा अष्टमी व्रत के दौरान अनुष्ठान मासिक दुर्गा अष्टमी के दिन भक्त देवी दुर्गा से प्रार्थना करते हैं। वे सुबह जल्दी उठते हैं और देवी को फूल, चंदन और धूप के रूप में कई चीजें अर्पित करते हैं। कुछ स्थानों पर दुर्गा अष्टमी व्रत के दिन कुमारी पूजा भी की जाती है। हिंदू 6-12 वर्ष की आयु की लड़कियों को देवी दुर्गा के कन्या रूप के रूप में पूजते हैं। देवी को अर्पित करने के लिए विशेष ‘नैवेद्यम’ तैयार किया जाता है। उपवास दिन का एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। दुर्गा अष्टमी व्रत का पालनकर्ता पूरे दिन खाने या पीने से परहेज करता है। यह व्रत पुरुषों और महिलाओं द्वारा समान रूप से रखा जाता है। दुर्गा अष्टमी व्रत आध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने और देवी दुर्गा का आशीर्वाद पाने के लिए मनाया जाता है। Durga ashtami 2024 कुछ भक्त केवल दूध पीकर या फल खाकर व्रत रखते हैं। इस दिन मांसाहारी भोजन और शराब का सेवन सख्त वर्जित है। दुर्गा अष्टमी व्रत करने वाले को फर्श पर सोना चाहिए और आराम और विलासिता से दूर रहना चाहिए। आश्विन शुक्ल पक्ष की दुर्गाष्टमी सबसे लोकप्रिय है और इसे महाअष्टमी के नाम से जाना जाता है पश्चिमी भारत के कुछ क्षेत्रों में जौ के बीज बोने की भी प्रथा है। जब बीज 3-5 इंच की ऊंचाई तक पहुंच जाते हैं तो उन्हें देवी को अर्पित किया जाता है और बाद में परिवार के सभी सदस्यों के बीच वितरित किया जाता है। इस दिन भक्त विभिन्न देवी मंत्रों का जाप करते हैं। इस दिन दुर्गा चालीसा का पाठ करना भी फलदायी माना जाता है। पूजा के अंत में, भक्त दुर्गा अष्टमी व्रत कथा भी पढ़ते हैं। हिंदू भक्त पूजा अनुष्ठान पूरा करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन और संतर्पण या दक्षिणा प्रदान करते हैं। Durga ashtami 2024 मासिक दुर्गाष्टमी व्रत की पूजा विधि मासिक दुर्गाष्टमी के दिन प्रात: काल उठने के बाद स्नान आदि करके शुद्ध कपड़े धारण करें। घर और मंदिर में गंगाजल का छिड़काव करके शुद्ध करें। मंदिर में माता दुर्गा को फोटो या मूर्ति को स्थापित करें। मां का रोली या हल्दी से तिलक करें। साथ ही उन्हें माला, फूल, फल और श्रृंगार के पांच सामान अर्पित करें। इसी के साथ माता को पूरी, चने और हलवे का भोग लगाएं। इस दौरान मां दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। अंत में माता दुर्गा के सामने घी का दीपक जलाएं और आरती करें। मां दुर्गा के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र: माता दुर्गा को प्रसन्न करने के उपाय Durga ashtami 2024 माता दुर्गा का लाल रंग अति प्रिय है। इसलिए मासिक दुर्गाष्टमी के दिन लाल रंग के कपड़े धारण करें। इससे आपको मां की विशेष कृपा प्राप्त होगी। मासिक दुर्गाष्टमी के दिन माता दुर्गा को बर्फी, पूरी, चने और हलवे का भोग लगाना शुभ होता है। इससे मां प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों की सभी इच्छाओं को पूरा करती हैं। दुर्गाष्टमी के दिन मां दुर्गा को एक चांदी का सिक्का जरूर अर्पित करें। Durga ashtami 2024 व्रत का पारण करने के बाद उस सिक्के को घर की तिजोरी में छुपाकर रख दें। इस उपाय को करने से आपको व आपके परिवारवालों को माता दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होगी, जिससे आर्थिक तंगी धीरे-धीरे दूर होने लगेगी। माता दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए मासिक दुर्गाष्टमी के दिन मिट्टी से बना घर खरीदकर घर लाएं। इससे घर में सुख-शांति, समृद्धि, धन-धान्य और खुशहाली का वास होगा। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. KARMASU.IN इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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वट सावित्री व्रत कथा: सच्चे प्रेम और पतिव्रता का प्रतीक

विवाहित महिलाओं के बीच अत्यधिक प्रचलित ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन आने वाले सावित्री व्रत कथा निम्न प्रकार से है: भद्र देश के एक राजा थे, जिनका नाम अश्वपति था। भद्र देश के राजा अश्वपति के कोई संतान न थी। उन्होंने संतान की प्राप्ति के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम जारी रहा। इसके बाद सावित्रीदेवी ने प्रकट होकर वर दिया कि: राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या पैदा होगी। सावित्रीदेवी की कृपा से जन्म लेने के कारण से कन्या का नाम सावित्री रखा गया। कन्या बड़ी होकर बेहद रूपवान हुई। योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे, क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में उनका वरण किया। ऋषिराज नारद को जब यह बात पता चली तो वह राजा अश्वपति के पास पहुंचे और कहा कि हे राजन! यह क्या कर रहे हैं आप? सत्यवान गुणवान हैं, धर्मात्मा हैं और बलवान भी हैं, पर उसकी आयु बहुत छोटी है, वह अल्पायु हैं। एक वर्ष के बाद ही उसकी मृत्यु हो जाएगी। ऋषिराज नारद की बात सुनकर राजा अश्वपति घोर चिंता में डूब गए। सावित्री ने उनसे कारण पूछा, तो राजा ने कहा, पुत्री तुमने जिस राजकुमार को अपने वर के रूप में चुना है वह अल्पायु हैं। तुम्हे किसी और को अपना जीवन साथी बनाना चाहिए। इस पर सावित्री ने कहा कि पिताजी, आर्य कन्याएं अपने पति का एक बार ही वरण करती हैं, राजा एक बार ही आज्ञा देता है और पंडित एक बार ही प्रतिज्ञा करते हैं और कन्यादान भी एक ही बार किया जाता है। वट सावित्री सावित्री हठ करने लगीं और बोलीं मैं सत्यवान से ही विवाह करूंगी। राजा अश्वपति ने सावित्री का विवाह सत्यवान से कर दिया।सावित्री अपने ससुराल पहुंचते ही सास-ससुर की सेवा करने लगी। समय बीतता चला गया। नारद मुनि ने सावित्री को पहले ही सत्यवान की मृत्यु के दिन के बारे में बता दिया था। वह दिन जैसे-जैसे करीब आने लगा, सावित्री अधीर होने लगीं। उन्होंने तीन दिन पहले से ही उपवास शुरू कर दिया। नारद मुनि द्वारा कथित निश्चित तिथि पर पितरों का पूजन किया। हर दिन की तरह सत्यवान उस दिन भी लकड़ी काटने जंगल चले गये साथ में सावित्री भी गईं। जंगल में पहुंचकर सत्यवान लकड़ी काटने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गये। तभी उसके सिर में तेज दर्द होने लगा, दर्द से व्याकुल सत्यवान पेड़ से नीचे उतर गये। सावित्री अपना भविष्य समझ गईं। सत्यवान के सिर को गोद में रखकर सावित्री सत्यवान का सिर सहलाने लगीं। तभी वहां यमराज आते दिखे। यमराज अपने साथ सत्यवान को ले जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल पड़ीं। यमराज ने सावित्री को समझाने की कोशिश की कि यही विधि का विधान है। लेकिन सावित्री नहीं मानी। सावित्री की निष्ठा और पतिपरायणता को देख कर यमराज ने सावित्री से कहा कि हे देवी, तुम धन्य हो। तुम मुझसे कोई भी वरदान मांगो। सत्यवान जीवंत हो गया और दोनों खुशी-खुशी अपने राज्य की ओर चल पड़े। दोनों जब घर पहुंचे तो देखा कि माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। इस प्रकार सावित्री-सत्यवान चिरकाल तक राज्य सुख भोगते रहे। अतः पतिव्रता सावित्री के अनुरूप ही, प्रथम अपने सास-ससुर का उचित पूजन करने के साथ ही अन्य विधियों को प्रारंभ करें। वट सावित्री व्रत करने और इस कथा को सुनने से उपवासक के वैवाहिक जीवन या जीवन साथी की आयु पर किसी प्रकार का कोई संकट आया भी हो तो वो टल जाता है।

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Mokshada Ekadashi :क्यों करते हैं मोक्षदा एकादशी व्रत? जानिए व्रत कथा और इसका महत्व

Mokshada Ekadashi: हिन्दू कलैंडर के मुताबिक, मार्गशीर्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी Mokshada Ekadashi कहा जाता हैं. इस दिन गीता जयंती भी मनाई जाती हैं साथ ही यह धनुर्मास की एकादशी कहलाती हैं, जिस कारण इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता हैं.  Mokshada Ekadashi ka mahatv मोक्षदा एकादशी का महत्व Mokshada Ekadashi 2023: इस साल कब है मोक्षदा एकादशी? जानें पूजा विधि, मुहूर्त का सही समय मोक्षदा एकादशी व्रत कथा mokshada Ekadashi vrat katha एक समय की बात है, एक धर्मात्मा राजा था जिसका नाम वैखानस था। एक दिन राजा को स्वप्न में अपने पिता के दर्शन हुए। पिता ने बताया कि वे नरक में हैं और कष्ट भोग रहे हैं। राजा ने अपने विद्वानों से इस बारे में पूछा। विद्वानों ने बताया कि राजा के पिता ने अपने जीवनकाल में कई पाप किए थे, जिसके कारण उन्हें नरक में कष्ट भोगना पड़ रहा है। राजा ने अपने पिता को नरक से मुक्त कराने का संकल्प लिया। राजा आश्रम गए. वहाँ कई सिद्ध गुरु थे, सभी अपनी तपस्या में लीन थे. महाराज पर्वत मुनि के पास गए उन्हें प्रणाम किया और समीप बैठ गए. पर्वत मुनि ने मुस्कुराकर आने का कारण पूछा. राजा अत्यंत दुखी थे उनकी आंखों से अश्रु की धार लग गई. तब पर्वत मुनि ने अपनी दिव्य दृष्टी से सम्पूर्ण सत्य देखा और राजा के सर पर हाथ रखा और यह भी कहा तुम एक पुण्य आत्मा हो, जो अपने पिता के दुःख से इतने दुखी हो. तुम्हारे पिता को उनके कर्मो का फल मिल रहा हैं. उन्होंने तुम्हारी माता को तुम्हारी सौतेली माता के कारण बहुत यातनाएं दी. इसी कारण वे इस पाप के भागी बने और नरक भोग रहे हैं. राजा ने पर्वत मुनि से इस दुविधा के हल पूछा इस पर मुनि ने उन्हें मोक्षदा एकादशी व्रत पालन करने एवम इसका फल अपने पिता को देने का कहा राजा ने मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi )का व्रत रखा और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की। व्रत के प्रभाव से राजा के पिता को नरक से मुक्ति मिल गई और वे स्वर्गलोक में चले गए। राजा ने भी व्रत के प्रभाव से मोक्ष की प्राप्ति की।

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