UTTARAKHAND

माया देवी मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

माया देवी मंदिर भारत के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। माया देवी मंदिर:हरिद्वार का लोकप्रिय माया देवी मंदिर भारत के सबसे पुराने मंदिरों में से एक है। यह मंदिर हिंदू देवी माया को समर्पित है। इस मंदिर को तीन शक्तिपीठों में शामिल होने का गौरव भी प्राप्त है। माना जाता है कि देवी सती का हृदय और नाभि इसी स्थान पर स्थापित हैं। आदि शक्ति का एक रूप मानी जाने वाली देवी माया के दर्शनों के लिए बड़ी संख्या में भक्तों भीड़ एकत्रित होती है। खासकर नवरात्र और कुंभ मेले के दौरान इस मंदिर में ज्यादा भीड़ देखने को मिलती है। कई भक्तों का यह भी मानना है कि इस पवित्र स्थल पर प्रार्थना करने से व्यक्ति जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति और मोक्ष प्राप्त कर सकता है। लोगों का मानना है कि हरिद्वार की प्राथमिक देवी के रूप में मानी जाने वाली माया देवी का एक विशेष महत्त्व है। देवी माता की एक झलक देखे बिना कोई भी तीर्थ यात्रा पूरी नहीं मानी जाती है। हरिद्वार को पहले ‘मायापुरी’ भी कहा जाता था। प्राचीन मंदिर होने के कारण इस मंदिर की संरचना भी हरिद्वार के तीन सबसे पुराने मंदिरों में से एक है, जो अभी भी कायम है। इसके अलावा नारायण-शिला और भैरव मंदिर हैं। देवी माया के साथ, पवित्र मंदिर में देवी कामाख्या और देवी काली की मूर्तियाँ हैं – जिन्हें आदि पराशक्ति के विभिन्न रूप माना जाता है। माया देवी मंदिर का इतिहास 11वीं शताब्दी में माया देवी मंदिर का निर्माण किया गया था। क्योंकि हरिद्वार में 11वीं शताब्दी में यह मंदिर अस्तित्व में आया। माया देवी मंदिर धार्मिक महत्व के साथ साथ ऐतिहासिक महत्व भी रखता है। पवित्र गंगा के तट पर स्थित इस मंदिर द्वारा कई राजवंशों के उत्थान और पतन को देखा गया है। कई बार इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है। इस प्राचीन मंदिर में पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और भक्ति की भावना को जीवित रखा है। वर्षो बाद भी यह मंदिर नारायण-शिला मंदिर और भैरव मंदिर के साथ अभी भी मजबूती से खड़ा है। माया देवी मंदिर का महत्व माया देवी मंदिर में दर्शन करने श्रद्धालु दूर-दूर से हरिद्वार आते है। इस मंदिर में पूजा अर्चना करने की विशेष मान्यता यह है कि यहां पर मांगी गई समस्त मनोकामनाएं पूरी होती है। विशेषकर महिलाएं जो भी मनोकामना लेकर इस मंदिर में दर्शन को आती है। वह यहां से खाली नहीं जातीं। उनकी मनोकामना अवश्य ही पूरी होती है। माया देवी मंदिर 52 शक्तिपीठों में से पहला शक्तिपीठ है, जो हरिद्वार शहर के मध्य में स्थित है। इस मंदिर की कहानी भगवान शिव और माता सती से सम्बंधित है। समस्त शक्तिपीठों की उत्पत्ति का केंद्र हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी मायादेवी मंदिर है। माता सती ने यहीं बैठकर योगाग्नि से अपने शरीर का त्याग किया था। माया देवी मंदिर की वास्तुकला माया देवी मंदिर उत्तरी भारत की पारंपरिक वास्तुकला को दर्शाता है। इस मंदिर में पारंपरिक और आधुनिक शैलियों का एक अच्छा मिश्रण देखने को मिलता है। मंदिर की संरचना साधारण होने के बावजूद भी मंदिर में प्लास्टर वाली मूर्तियां है जो विभिन्न मुद्राओं को चित्रित करती हैं। मुख्य गर्भगृह के अंदर, तीन मूर्तियाँ स्थापित हैं। इसके केंद्र में माया देवी, बाईं ओर देवी काली, और दाईं ओर देवी कामाख्या विराजित हैं। इसके अलावा, मंदिर में दो अन्य देवियाँ भी हैं, जिन्हें देवी शक्ति का रूप माना जाता है। चामुंडा की एक धातु की मूर्ति और शीतला देवी को समर्पित एक उप-मंदिर भी है। भक्त मंदिर परिसर के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। वह हर देवी देवताओं से आशीर्वाद लेते हैं। माया देवी मंदिर का समय मंदिर का सुबह का समय 06:30 AM – 12:00 PM शाम को मंदिर खुलने का समय 03:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद माया देवी मंदिर में फल, नारियल, मिठाई, फूल और अगरबत्ती अर्पित की जाती है।

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शत्रुघ्न मंदिर:ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न ने यहाँ की थी मौन तपस्या देवभूमि ऋषिकेश के गंगा नदी के किनारे राम झूला के पास स्थित है शत्रुघ्न मंदिर। यह मंदिर प्राचीन और प्रसिद्ध है। यह मंदिर भगवान राम के छोटे भाई शत्रुघ्न के नाम पर बनाया गया है। मंदिर शत्रुघ्न को समर्पित है। इस मंदिर में मुख्य रूप से बद्री नारायण की मूर्ती विराजमान है। इस कारण इस मंदिर को “बद्री नारायण मंदिर” के नाम से भी जानते है। आपको बता दे कि भारत में केवल 2 ही स्थानों पर शत्रुघ्न के मंदिर हैं। एक तो केरल के थ्रिसूर जिले में है और दूसरा उत्तराखंड के ऋषिकेश में। शत्रुघ्न मंदिर का इतिहास शत्रुघ्न मंदिर को 8 वीं सदी में अदि गुरु शंकराचार्य ने बनवाया था। ऋषिकेश में मुनि के रेती को मुनियों की तपोभूमि कहते है। पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शत्रुघ्न ने इसी स्थान पर मौन तपस्या की थी। जिस कारण इस स्थान को मौन की रेती के नाम से जानते थे। और अब इस जगह को मुनी की रेती के नाम से जाना जाता है। रावण के परिवार के लवणासुर का वध भगवान शत्रुघ्न द्वारा हुआ था। जिससे शत्रुघ्न को ब्रह्म दोष लग गया था। इस ब्रह्म दोष के निवारण के लिए वह ऋषिकेश आए थे और ऋषिकेश के इस स्थल पर उन्होंने मौन तपस्या की। तभी से यह मंदिर शत्रुघ्न मंदिर के नाम से जाना जाने लगा। मंदिर का महत्व मंदिर में प्रत्येक पर्व को बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है। परन्तु जन्माष्टमी और रामनवमी दो मुख्य पर्व है जिसे इस मंदिर में बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। इस विशेष अवसर पर लोग दूर दूर से मंदिर में दर्शनों के लिए आते है। शत्रुघ्न का मंदिर कम होने के कारण भी यह पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है। इस मंदिर के दर्शन और यहाँ के शांत वातावरण का अनुभव करने के लिए भी भक्त इस मंदिर में आते है। मंदिर की वास्तुकला मुख्य मंदिर में शत्रुघ्न के रूप में बद्री नारायण जी विराजित है। उनके साथ भगवान राम – सीता और लक्ष्मण की परतिमएं भी स्थापित है। इस मंदिर में भगवान विष्णु जी भी विराजमान है। मंदिर के ठीक सामने ही गंगा घाट है। इस घाट को शत्रुघ्न घाट भी कहा जाता है। इस घाट की गंगा आरती अपने आप में बहुत अद्भुत है। यह घाट रामझूला और जानकी सेतु के मध्य स्थित है। गंगा आरती के समय ये ओर राम झूला रौशनी से जगमगाता है और इस घाट के दूसरी तरफ जानकी सेतु का दृश्य बहुत ही सुन्दर दिखाई देता है। मंदिर का समय शत्रुघ्न मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 07:30 AM मंदिर का प्रसाद शत्रुघ्न मंदिर में फल, फूल, सूखा मेवा, मिठाई आदि का भोग लगाया जाता है।

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दक्षिण काली मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यह एक ऐसा मंदिर है जहां स्थापित माता की मूर्ति का मुख तो पूरब की ओर है, लेकिन मंदिर का नाम दक्षिण काली है। दक्षिण काली मंदिर आमतौर पर किसी मंदिर का नाम वहां स्थापित भगवान या उस स्थान के नाम पर रखा जाता है। लेकिन उत्तराखंड के हरिद्वार में एक ऐसा मंदिर है जहां स्थापित माता की मूर्ति का मुख तो पूरब की ओर है, लेकिन मंदिर का नाम दक्षिण काली है। शहर के नील धारा क्षेत्र में चंडी देवी मंदिर मार्ग पर स्थित प्राचीन दक्षिण काली मंदिर सिद्धपीठ है। इसकी महिमा कोलकाता में स्थित दक्षिणेश्वर मंदिर से कम नहीं है। देश में ऐसे सिर्फ 2 ही मंदिर हैं। मंदिर के नाम के साथ यहां की एक और खास बात है। पूरे देश में नवरात्रि 9 दिन की होती है, लेकिन यहां नवरात्रि पूरे 15 दिन तक मनाई जाती है। मां काली को समर्पित इस मंदिर में शनिवार को विशेष पूजा अर्चना ​की जाती है, जिससे माता प्रसन्न होकर अपने भक्तों के सारे कष्ट दूर कर देती हैं। नवरात्रि के दिनों में यहां भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। इस मंदिर में आए बिना तंत्र साधकों की साधना को पूरा नहीं माना जाता है। दक्षिण काली मंदिर का इतिहास बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना विक्रम संवत 351 में हुई। इसका विवरण स्कंध पुराण में भी किया गया है। कलकत्ता के काली व शिवभक्त गुरु कमराज ने मां की मूर्ति को यहां स्थापित किया था। इसलिए इस धाम को कमराज पीठ, अमरा गुरु और दक्षिण काली के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, नील धारा क्षेत्र में ही माता कमराज के सपने में आईं और 108 नरमुंडों से मंदिर निर्माण की स्थापना की बात कही। जब कमराज ने पूछा कि इतने सारे नरमुंड वह कहां से लाएंगे, तो माता ने बताया कि इस जगह पर महामशान है। यहां आने वाले मुर्दों को जीवित कर उनकी इच्छा से 108 नरमुंडों की बलि दो। बताया जाता है कि 108 नरमुंडों के ऊपर ही मंदिर का निर्माण किया गया है। हालांकि, माता की मूर्ति कहां से आई, इसकी कोई जानकारी नहीं है। कहा जाता है कि माता की यह प्रतिमा लाखों सालों से यहां है, जोकि स्वयंभू है। यानी अपने आप प्रकट हुई है। इस मंदिर का सागर मंथन से भी कनेक्शन है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, सागर मंथन के दौरान जब कालकूट विष निकला तब महादेव ने संसार की रक्षा के लिए पूरा विष अपने कंठ में धारण कर लिया। जिसके बाद महादेव ने विष के असर को कम करने के लिए कजरीवन में बह रह गंगा जी में स्नान किया था। बताया जाता है कि भगवान के स्नान के बाद विष के कारण कजरीवन में गंगा जी की धारा नीली हो गई। गंगा की इसी धारा को ही नीलधारा कहा गया। इसी नीलधारा के तट पर विराजमान हैं मां काली। दक्षिण काली मंदिरका महत्व माना जाता है कि खुद काल भैरव दक्षिण काली मंदिर की रक्षा करते हैं। कहा जाता है कि मंदिर के आसपास काले व सफेद रंग के नाग-नागिन के जोड़े रहते हैं, जोकि सिर्फ सावन के दिनों में दिखाई देते हैं। शनिवार के दिन इस मंदिर में मां काली की अराधना करने से बड़े से बड़ा विघ्न दूर हो जाता है। ऐसी मान्‍यता है कि इस मंदिर में तंत्र साधक विशेष साधना करते हैं जिससे प्रसन्‍न होकर मां काली उन्‍हें अपना आशीर्वाद देती हैं। यहां नील धारा क्षेत्र में गंगा की धारा में स्‍नान करने पर सभी प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। दक्षिण काली मंदिरकी वास्तुकला गंगा की धारा मंदिर के दक्षिण की ओर से बहती है, इसलिए मंदिर का नाम दक्षिण काली मंदिर पड़ा। नील पर्वत माला व गंगा की तलहटी में मां काली विराजमान है। मंदिर के आसपास का वातावरण काफी शांत है। इसी वजह से यहां आने वाले भक्तों का तनाव व परेशानी दूर हो जाती है। मंदिर के गर्भगृह में मां काली की मूर्ति विराजमान है। गर्भगृह के कोने में ही एक प्राचीन त्रिशूल लगा है, जोकि 2700 साल पुराना बताया जाता है। मंदिर के एक ओर नील पर्वत है तो दूसरी ओर मां गंगा की नील धारा। दक्षिण काली मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 10:00 PM सुबह की आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM शाम की आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद दक्षिण काली मंदिर में शनिवार को माता को पसंदीदा खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। इसके अतिरिक्त माता को नारियल, गुलाब के फूल, काला जामुन, मीठा पान आदि अर्पित किया जाता है।

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वीरभद्र मंदिर:ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

भगवान शिव के क्रोध से हुयी थी वीरभद्र की उत्पत्ति वीरभद्र मंदिर:उत्तराखंड के ऋषिकेश में स्थित है वीरभद्र मंदिर। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर में भगवान शिव के अवतार वीरभद्र की पूजा अर्चना की जाती है। इस मंदिर में शिवरात्रि और सावन के अवसर पर रात्रि जागरण और विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। जिसमे भक्तों की काफ़ी भीड़ रहती है। इन विशेष अवसरों पर यहाँ पर मेले का भी आयोजन किया जाता है। यह मंदिर ऋषिकेश राजमार्ग से 2 किमी दूर स्थित है। यह मंदिर प्राचीन सिद्धपीठ भी है। Veerabhadra Temple:मंदिर का इतिहास वीरभद्र मंदिर एक प्राचीन मंदिर है जो कि 1,300 साल पुराना है। वीरभद्र मंदिर के बारें में किद्वंती है कि वीरभद्र भगवान शिव के अवतार हैं। जो भोलेशंकर के क्रोध से उत्पन्न हुए है। स्कन्द पुराण में इसका उल्लेख है की एक बार राजा दक्ष प्रजापति ने एक भव्य यज्ञ का आयोजन करवाया । इस भव्य यज्ञ में भगवान शिव को छोड़कर शेष सभी देवी देवताओं को आमंत्रित किया गया। जब यह बात माता सती को पता चला की मेरे पिता ने इस भव्य यज्ञ का आयोजन करवाया है और उसमे मेरे पति को आमंत्रित नहीं किया। तो वह अपने पिता के पास गईं। परन्तु वहां पर उन्हें अपमानित महसूस हुआ। पिता द्वारा पति का यह अपमान देख कर माता सती ने उसी यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी। जब इस बात का पता भगवान शिव को लगा तो वह बहुत क्रोधित हो गए और अपने बालो की जटा को खींच कर जमीन पर गिरा दिया। जिससे वीरभद्र उत्पन्न हुए।वीरभद्र ने भव्य यज्ञ को नष्ट कर राजा दक्ष का सिर काट दिया। तब सभी देवताओं के भगवान शिव से राजा दक्ष को पुनः जीवित करने के लिए याचना की। शिव जी ने उन्हें जीवन दान दिया और उस पर बकरे का सिर लगा दिया। राजा दक्ष को अपनी गलतियों का पश्च्याताप भी हुआ और उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी। भगवान शिव ने इसी स्थान पर वीरभद्र को अपने गले से लगा लिया। तभी वीरभद्र भगवान शिव के शरीर में समाहित हो गए और इसी स्थान पर एक शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए। इस कारण यह मंदिर बहुत ही पवित्र और धार्मिक महत्त्व रखता है। मंदिर का महत्व सावन के महीने में इस मंदिर में पूजा अर्चना करने से विशेष फल मिलता है। इस लिए यहाँ पर भक्तों की भीड़ रहती है। कहा जाता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से भोलेनाथ से जो मांगता है उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। ऐसा माना जाता है कि विशेष अवसरों पर इस मंदिर में देवता भी भगवान का पूजन करने आते है। क्योंकि मंदिर में लगी घंटियां अपने आप ही बजने लगती है। मंदिर की वास्तुकला वीरभद्र मंदिर की वास्तुकला अद्भुत है। मंदिर का मुख्य द्वार लाल रंग से निर्मित है। जो देखने में बहुत ही सुन्दर दिखता है। मुख्य द्वार पर ॐ को बहुत ही शानदार तरीके से सुसज्जित किया गया है। मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में वीरभद्र महादेव एक शिवलिंग के रूप में विराजित है। शिवलिंग के ठीक सामने मंदिर के प्रांगण में नंदी जी की विशाल प्रतिमा विराजित है। साथ ही माता का मंदिर है यहाँ स्थापित है। मंदिर का समय वीरभद्र मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद भगवान शिव को दूध, दही, घी, जल, शहद, पुष्प, फल आदि अर्पित किये जाते है।

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बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

महादेव का यह एक ऐसा मंदिर है जहां सिर्फ एक बेलपत्र से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर देवभूमि उत्तराखंड में वैसे तो भगवान शिव के कई मंदिर हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर लेकिन आज हम महादेव के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां सिर्फ एक बेलपत्र से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं व कुंवारी कन्याओं को विवाह का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माता पार्वती ने इसी स्थान पर कठोर तपस्या कर भोलेनाथ को पति के रूप में पाया था। हरिद्वार में बिल्व पर्वत पर स्थित है बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर। बिल्वकेश्वर महादेव बिल्व का अर्थ होता है (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के रूप में फल देने वाला स्थल। इसी पर्वत के नाम पर मंदिर का नाम पड़ा। नीम के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है,बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर जिसकी अराधना बिल्वकेश्वर या बिल्केश्वर महादेव के रूप में की जाती है। चारों तरफ हरे-भरे जंगलों से घिरे इस प्राचीन मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। सावन महीने में यहां जल चढ़ाने के लिए कांवड़ियों की भारी भीड़ आती है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास स्कंद पुराण के केदारखंड में इस मंदिर का सबसे पहले जिक्र आया है। इसे माता पार्वती की तपोस्थली भी माना जाता है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर जैसा की प्रचलित है कि माता पार्वती दो बार भगवान शिव की अर्द्धांगिनी बनीं थीं, यानी 2 बार इनका विवाह हुआ था। पहला जब भगवान ने दक्षेश्वर के राजा दक्ष की पुत्री सती को पत्नी रूप में स्वीकार किया था। बिल्वकेश्वर महादेव जिसके बाद माता सती ने यज्ञ कुंड में भस्म होकर हिमालय राजा के घर पार्वती रूप में जन्म लिया था। माता पार्वती ने ऋषि नारद मुनि की सलाह पर बिल्व पर्वत पर आकर कठोर तपस्या की और भगवान शिव को प्रसन्न कर दोबारा उनकी अर्द्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया। बताया जाता है कि माता पार्वती ने बिल्व पर्वत पर 3000 साल तक तपस्या की थी, जिसमें 1 हजार साल वो बिना अन्न व जल पीये रहीं थीं। माता की कठोर तपस्या देख महादेव ने उन्हें वृक्ष की शाखा के रूप में दर्शन दिए और माता पार्वती को विवाह का वरदान दिया। बेलपत्रों से घिरे मनोरम बिल्व पर्वत पर बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर के पास एक गौरी कुंड है। इसको लेकर बताया जाता है बिल्वकेश्वर महादेव कि भगवान शिव की उपासना के दौरान माता पार्वती बेलपत्र खाकर अपनी भूख शांत की थी। लेकिन जब उन्हें प्यास लगी तो स्वयं ब्रह्मा जी ने उन्हें अपने कमंडल से पानी दिया, जोकि एक कुंड के रूप में आज भी है। बिल्वकेश्वर महादेव माता पार्वती के इस कुंड से पानी पीने के कारण इसका नाम गौरी कुंड पड़ा। कहते हैं कि इस कुंड का जल गंगा की तरह पवित्र है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर का महत्व माना जाता है कि कुंवारी कन्याओं द्वारा इस मंदिर में बेलपत्र चढ़ाने से उनके विवाह की मनोकामना पूरी होती है। मंदिर के पास बने गौरी कुंड के जल को छू लेने मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। कहा जाता है कि मंदिर में मणिधारक अश्वतर नाम का महानाग रहता है, जो कभी कभी शिवलिंग के पास दिखाई देता है। माना जाता है कि महानाग के दर्शन से हर मनोकामना पूरी होती है। ऐसी भी मान्यता है कि यहां बेलपत्र चढ़ाने से एक करोड़ साल तक स्वर्ग में निवास करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। बिल्वकेश्वर महादेव मंदिर की वास्तुकला बिल्व पर्वत पर स्थित यह मंदिर काफी सुंदर तरीके से बनाया गया है। मंदिर में नीम के वृक्ष के नीचे शिवलिंग स्थापित है। बताया जाता है कि यह स्वयंभू शिवलिंग है। यानी इसे कहीं से लाकर स्थापित नहीं किया गया बल्कि यह अपने आप यहां प्रकट हुआ। नीम के पेड़ को काटे बिना मंदिर के गर्भगृह को बनाया गया है। कई एकड़ में फैले इस मंदिर में भगवान शंकर पार्वती के अलावा गणेश जी, हनुमानजी व अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के पीछे करीब 50 कदम पर गौरी कुंड है। उसी के ठीक बगल में एक गुफा भी है। बताया जाता है कि इसी गुफा में माता पार्वती विश्राम करती थीं। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM सुबह की आरती का समय 05:30 AM – 06:30 AM शाम को आरती का समय 06:00 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद महादेव की इस मंदिर में मुख्य रूप से बेलपत्र चढ़ाया जाता है। इसके अतिरिक्त भक्त पंचामृत, धतूरा, दूध, घी, शहर, फल व फूल भगवान को अर्पित करते हैं।

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नीलेश्वर महादेव मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव यहां पर लंबे समय तक रहे थे। नीलेश्वर महादेव मंदिर भारत के सबसे पवित्र स्थानों में से एक है हरिद्वार। यह स्थान आध्यात्मिक और धार्मिक भक्तों के लिए अत्यधिक महत्व रखता है। यह वह जगह है जहां पवित्र गंगा नदी पहाड़ों से आने के बाद सबसे पहले हरिद्वार में अवतरित होती है। यह शहर आश्रमों, मंदिरों और राजसी घाटों से सुशोभित है। पवित्र शहर ऋषिकेश निकट होने के कारण इसका आध्यात्मिक आकर्षण और भी बढ़ जाता है। हरिद्वार और ऋषिकेश में कई शिव मंदिर है। परन्तु नीलेश्वर महादेव मंदिर भगवान शिव के सबसे महत्वपूर्ण और पूजनीय स्थानों में से एक है। नील पर्वत की पहाड़ी पर स्थित यह मंदिर न केवल ऐतिहासिक महत्व रखता है बल्कि आसपास की प्राकृतिक सुंदरता के मनमोहक दृश्य को भी प्रदर्शित करता है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, जो नील पर्वत के रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। सभी भक्तों की इस मंदिर के प्रति अपार आस्था और विश्वास है। शिव भक्तों के के लिए यह स्थान बहुत ही महत्त्व रखता है। यह मंदिर चंडी देवी मंदिर के करीब स्थित है। मंदिर का इतिहास हरिद्वार के नील पर्वत पर नीलेश्वर महादेव मंदिर का अस्तित्व आदिकाल से माना गया है। इस मंदिर का उल्लेख शिव महापुराण में मिलता है। प्राचीन किंवदंतियों के अनुसार, इस मंदिर का इतिहास सत्य युग से मिलता है। ऐसा कहा जाता है कि उत्तराखंड के त्रियुगीनारायण मंदिर में भगवान शिव और देवी पार्वती के पवित्र विवाह के दौरान, बारात नीलेश्वर महादेव मंदिर में रुकी थी। इसके अतिरिक्त ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव यहां लंबे समय तक रहे थे, जिससे मंदिर की पवित्रता और बढ़ गई। मंदिर का महत्व नीलेश्वर महादेव मंदिर में उपस्थित स्वयंभू शिवलिंग को एक हजार शिवलिंग का रूप मानते है। सावन के महीनों में श्रद्धालु बड़ी संख्या में यहाँ गंगा नदी से जल लाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता के अनुसार सावन में जलाभिषेक करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मान्यता के अनुसार भगवान भोलेनाथ ने समुद्र मंथन से निकले विष को इसी स्थान पर पीया था। विष पीने के बाद यहीं से भोलेनाथ ने नीलकंठ में जाकर विश्राम किया था। ऐसा बताया जाता है कि भोलेनाथ ने जब समुद्र मंथन से निकाला विष पीया, तो यह पर्वत और गंगा का जल भी नीला हो गया था। इस कारण आज भी इस पर्वत को नील पर्वत और गंगा को नील गंगा के नाम से जानते हैं। मंदिर की वास्तुकला वास्तुकला की दृष्टि से यह मंदिर पारंपरिक भारतीय शैली में बना हुआ है। यहाँ पर भक्तों को परम शांति का अनुभव होता है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक नंदी बैल जी की मूर्ति है। इसके बाद एक विशाल प्रांगण है जहाँ शांतिपूर्ण वातावरण का अनुभव होता है। आंतरिक गर्भगृह में एक स्वयं निर्मित शिवलिंग और एक अन्य नंदी जी की मूर्ति स्थापित है। इसके अलावा यहां एक बड़ा सभा कक्ष भी है जहां भक्त विभिन्न त्योहारों और पवित्र अवसरों को मनाने के लिए एकत्रित होते हैं। नीलेश्वर महादेव मंदिर से चंडी देवी मंदिर की निकटता तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाजनक है। मंदिर का समय नीलेश्वर महादेव मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद नीलेश्वर महादेव मंदिर में भगवान को नारियल, चना चिरौंजी, परमल आदि का भोग लगाया जाता है।

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दक्ष महादेव हरिद्वार उत्तराखंड,भारत

इसे दक्षेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। दक्ष महादेव उत्तराखंड का हरिद्वार जिला भारत के 7 पवित्र स्थानों में से एक है। यहां की हर की पौड़ी को ब्रह्मकुंड कहा जाता है। गंगा आरती व कुंभ मेले के लिए विश्व प्रसिद्ध हरिद्वार में भगवान शिव के कई मंदिर हैं, लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां स्थापित शिवलिंग धरती लोक के साथ पाताल लोक में भी स्थित है। हम बात कर रहे हैं हरिद्वार के कनखल में स्थित दक्ष महादेव मंदिर की। इसे दक्षेश्वर महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इसी मंदिर में माता सती ने यज्ञ की अग्नि में कूदकर अपने प्राणों की आहूति दे दी थी। दक्ष महादेव यहां स्थापित अनोखे शिवलिंग के दर्शन को दूर-दूर से लोग आते हैं। हरिद्वार के 5 पवित्र स्थलों की सूची में इस मंदिर का नाम शामिल है। दक्ष महादेव मंदिर का इतिहास कनखल में स्थित यह मंदिर हरिद्वार के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती के पिता राजा दक्ष ने कनखल में एक यज्ञ का आयोजन किया था। राजा ने इसमें सभी देवी-देवताओं, ऋषियों व संतों को आमंत्रित किया, लेकिन अपने दामाद यानी महादेव को आमंत्रण नहीं भेजा, जिससे उनका बहुत अपमान हुआ। ​पति का यह अपमान देख माता सती बहुत दुखी हो गईं और उन्होंने अपने पिता द्वारा किए जा रहे यज्ञ में कूदकर आहूति दे दी। माता के प्राणों की आहूति देख महादेव क्रोधित हो गए और अपनी जटाओं से वीरभद्र को पैदा किया। भगवान ने वीरभद्र को आदेश दिया कि राजा दक्ष का सिर काटकर यज्ञ को ध्वस्त कर दो। कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु, ब्रह्मा व अन्य देवी-देवताओं ने महादेव को शांत कराने का प्रयास किया, लेकिन भगवान का क्रोध शांत नहीं हुआ। जिसके बाद सिर कटे राजा दक्ष ने प्रभु से क्षमा मांगी। महादेव ने माफी स्वीकार कर ली और दक्ष महादेव भगवान विष्णु, ब्रह्मा व देवी-देवताओं के आग्रह पर राजा दक्ष को बकरे का सिर लगाकर पुन: जीवित कर दिया। यही नहीं, राजा दक्ष के आग्रह पर भगवान शिव ने कहा कि कनखल दक्षेश्वर महादेव के नाम से जाना जाएगा। सावन के महीने में प्रभु यहीं वास करेंगे। 1810 ई में रानी धनकौर ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। दक्ष महादेव मंदिर का महत्व दक्ष मंदिर में शिवलिंग के दर्शन के बिना हरिद्वार की यात्रा अधूरी मानी जाती है। ऐसी मान्यता है कि सावन महीने में मंदिर में दक्षेश्वर महादेव के नाम से गंगाजल चढ़ाने पर हर मनोकामना पूरी होती है। इसके साथ ही वैवाहिक जोड़े यहां भगवान से जन्म जन्मांतर का आशीर्वाद लेने आते है। दक्ष महादेव मंदिर की वास्तुकला माता सती के प्राणों का गवाह है दक्षेश्वर मंदिर। मंदिर के मुख्य द्वार के सामने दक्ष महादेव भगवान शिव और माता सती की एक बहुत बड़ी प्रतिमा है। भगवान ने माता के मृत शरीर को अपने हाथों में उठाया हुआ है, जोकि यज्ञ में दिए माता के प्राणों को दर्शाता है। मुख्य द्वारा के दोनों तरफ बड़े-बड़े शेरों की प्रतिमा लगी है। मंदिर में सबसे खास है यहां स्थापित शिवलिंग। दक्ष महादेव पूरे विश्व में यहां स्थापित एकमात्र ऐसा शिवलिंग है, जो आकाशमुखी नहीं बल्कि पातालमुखी है। यानी शिवलिंग का ऊपरी हिस्सा जमीन के नीचे है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में सती कुंड, शिवलिंग व नंदी जी विराजमान हैं। मंदिर परिसर में गणेश जी, मां दुर्गा व अन्य देवी देवताओं के मंदिर भी बने हुए हैं। मंदिर के ठीक सामने गंगा की धारा बह रही है। मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 09:00 PM शाम की आरती का समय 07:00 PM – 08:00 PM सुबह की आरती का समय 06:00 AM – 07:00 AM मंदिर का प्रसाद महादेव के इस मंदिर में मुख्य रूप से बेलपत्र, दूध, केला, शहद, घी, फूल आर्पित किया जाता है

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हर की पौड़ी:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

‘हर की पौड़ी’ या ब्रह्मकुंड के एक पत्थर में श्रीहरि के पदचिह्न स्थापित है। उत्तराखंड के शहर हरिद्वार में स्थित हर की पौड़ी एक अत्यंत प्रतिष्ठित और पवित्र स्थल है। इस स्थान का हिंदू पौराणिक कथाओं में अत्यधिक धार्मिक महत्व है। ‘हर की पौरी’ नाम का सामान्य अर्थ है “भगवान श्री हरि विष्णु के चरण” । इसे पवित्र गंगा नदी के तट पर सबसे पवित्र स्नान घाटों में से एक माना जाता है। इस धार्मिक स्थल को वह बिंदु भी माना जाता है जहां पवित्र गंगा पहाड़ों से निकलकर मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है। प्राचीन वैदिक काल के अनुसार, माना जाता है कि भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों ही हर की पौरी आये थे। जिस कारण यह स्थान अत्यधिक पवित्र स्थान के रूप में परिवर्तित हो गया है। मंदिर का इतिहास किंवदंतियों के अनुसार, बताया जाता है कि हर की पौड़ी का निर्माण पहली शताब्दी ईसा पूर्व में राजा विक्रमादित्य द्वारा किया गया था। राजा विक्रमादित्य ने इस घाट को अपने भाई भतृहरि की श्रद्धांजलि के रूप में निर्मित करवाया था। क्योंकि भतृहरि पवित्र गंगा के तट पर ध्यान करते थे। हर की पौड़ी की सीढ़ियों पर कई मंदिर बनाए गए जिनका निर्माण 19वीं सदी में हुआ। 1938 में, घाटों का प्रारंभिक विस्तार किया गया, जिसे उत्तर प्रदेश के आगरा के जमींदार पंडित हरज्ञान सिंह कटारा द्वारा बनवाया गया था। इसके बाद, 1986 में, घाटों का नवीनीकरण भी हुआ। ऐसा भी बताया जाता है कि हर की पौड़ी पर राजा श्वेत ने भगवान् ब्रह्मा की तपस्या की थी। उनकी तपस्या से खुश होकर ब्रह्मा जी ने वरदान मांगने को कहा। इस पर राजा ने इच्छा रखी कि इस स्थान को भगवान के नाम से जाना जाए। तब से हर की पौड़ी को ‘ब्रह्म कुण्ड’ भी कहा जाता है। मंदिर का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार समुद्र मन्थन होने के बाद अमृत के लिए देव और दानव झगड़ रहे थे तब उनसे बचाकर धन्वंतरी अमृत ले जा रहे थे तो अमृत की कुछ बूँदें पृथ्वी पर गिर गई और वह जगहें धार्मिक स्थान बन गए। हरिद्वार में भी अमृत की बूँदे गिरी थीं वह स्थान हर की पौड़ी था। ऐसा माना जाता है कि यहाँ पर स्नान करने से मोक्ष प्राप्त होता है। यहाँ से ही भक्त जल भरकर अपने घर ले जाते हैं जिसे गंगा जल कहते हैं। मंदिर की वास्तुकला हर की पौड़ी एक बहुत ही सुन्दर घाट है। जो गंगा नदी के तट पर बना हुआ है। यहाँ पर भक्त गंगा स्नान के लिए आते हैं। घाट के पास ही बहुत छोटे छोटे मंदिर बने हुए हैं। हर की पौड़ी के घाट पर ही प्रसिद्ध ” ब्रह्म कुंड” बना हुआ है। इस घाट के एक पत्थर की दीवार पर एक बड़ा पदचिह्न है, जिसके बारे में माना जाता है कि यह भगवान विष्णु के चरण है। बहुचर्चित शाम की गंगा आरती भी यहां आयोजित की जाती है, जो दुनिया भर से हजारों भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करती है। घाट के थोड़ी थोड़ी दूरी पर नारंगी और सफ़ेद रंग के जीवन रक्षक टावर भी लगाए गए है। जो कि निगरानी के लिए है। ताकि गंगा के तेज बहाव में कोई श्रद्धालु बह न जाएँ। मंदिर का समय गर्मियों के दौरान सुबह की आरती का समय 05:30 AM – 06:30 AM सर्दियों के दौरान सुबह की आरती का समय 06:30 AM – 07:30 AM गर्मियों के दौरान शाम की आरती का समय 06:30 PM – 07:30 PM सर्दियों के दौरान शाम की आरती का समय। गंगा आरती में उपस्थित रहने के लिए आपको आरती से कम से कम आधे घंटे पहले पहुंचना चाहिए। ताकि आप सरलता से आरती के दर्शन कर सकें। 05:30 PM – 06:30 PM

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