UTTARAKHAND

श्री भरत मंदिर: ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

परम तेजस्वी भक्त रैभ्य मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने दिए थे दर्शन श्री भरत मंदिर उत्तराखंड के पवित्र शहर ऋषिकेश में स्थित है। यह मंदिर ऋषिकेश के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। श्री भरत मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर से ही ऋषिकेश शहर का अस्तित्व सामने आया है। इस मंदिर में बहुत सी प्राचीन कलाकृतियों को आज भी सुरक्षित रखा गया है। श्री भरत मंदिर का इतिहास श्री भरत मंदिर का उल्लेख हिन्दू धर्म के स्कन्द पुराण, श्रीमद्भागवत, महाभारत, नृसिंह पुराण और वराह पुराण में किया गया है। इसमें यह वह स्थान है जहाँ पर परम तेजस्वी भक्त रैभ्य मुनि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा था कि हृषीकेश नाम से मैं सदैव यहीं स्थित रहूँगा। इसलिए इस स्थान का नाम हृषीकेश भी है। इस मंदिर के इतिहास के विषय में बताया जाता है करीब 789 ई. में बसंत पंचमी के शुभ दिन पर, जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने मंदिर में भगवान की प्रतिमा को स्थापित किया गया है। प्रत्येक वर्ष इस दिन शालिग्राम को मायाकुंड में पवित्र स्नान के लिए ले जाते और फिर पुनर्स्थापना हेतु शहर में एक भव्य जुलूस के साथ वापस मंदिर लाया जाता है। श्री भरत मंदिर का महत्व इस मंदिर से सम्बंधित यह भी मान्यता है कि अक्षय तृतीया के दिन यदि कोई तीर्थयात्री इस मंदिर में भगवान श्री हृषिकेश नारायण की 108 परिक्रमा करता है और उनके चरणों में आशीर्वाद मांगता है तो उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं। ऐसा करना बद्रीनाथ की तीर्थयात्रा के बराबर माना गया है। भगवान विष्णु जी के इस स्थान पर दर्शन दिए जाने के कारण यह मंदिर बहुत ही पवित्र है जिस वजह से मंदिर के दर्शन मात्र से सभी भक्तों की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती है। श्री भरत मंदिर की वास्तुकला श्री भरत मंदिर के मुख्य गर्भ ग्रह के भीतर इस मंदिर में भगवान विष्णुजी जी कि ऐसी प्रतिमा है जिसे एक ही काले रंग का एक पत्थर यानी कि शालिग्राम पत्थर को काटकर बनाया गया है। मंदिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने एक प्राचीन पेड़ है। वास्तव में यह तीन अलग-अलग पेड़ों का एक संयोजन है जिनकी जड़ें इस तरह से आपस में जुड़ी हुई हैं कि उन्हें अलग अलग देखना लगभग असंभव है। इसमें बरगद के पेड़ यानी वट वृक्ष, पीपल के पेड़ और बेल के पेड़ शामिल हैं। ऐसा माना जाता है कि, ये तीन पेड़ त्रि देव, ब्रह्मा निर्माता, विष्णु, संरक्षक और महेश संहारक का प्रतिनिधित्व करते हैं। भक्त इन वृक्षों की अत्यंत श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा करते हैं। इस पेड़ के नीचे बुद्ध की एक खंडित मूर्ति रखी हुई है जो खुदाई के दौरान प्राप्त हुई थी। ऐसा माना जाता है कि यह प्रतिमा अशोक काल की है जब बौद्ध धर्म पूरे देश में फैल रहा था। श्री भरत मंदिर का समय सुबह भरत मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 11:00 AM सांयकाल भरत मंदिर खुलने का समय 01:00 PM – 09:00 PM मंदिर का प्रसाद भगवान विष्णु को पीली चीजों का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा सूखे मेवे, फल, फूल भी भगवान को अर्पित किये जाते है।

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लक्ष्मी नारायण मंदिर: हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

पूज्य संत श्री श्री कुमार स्वामी (गुरुदेव) द्वारा स्थापित मंदिर हरिद्वार में लक्ष्मी नारायण मंदिर अत्यधिक पवित्र महत्व रखता है। यह मंदिर पवित्र शहर हरिद्वार से केवल 10 किलोमीटर की दूरी पर है। यह हिन्दू मंदिर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को समर्पित है। लक्ष्मी नारायण मंदिर निरंजनी अखाड़ा मार्ग, देवपुरा, हरिद्वार पर स्थित है। लक्ष्मी नारायण मंदिर एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर की वास्तुकला कुरुक्षेत्र के समय के मंदिरों से मेल खाती है। हजारों की संख्या में भक्त इस मंदिर में दर्शनों के लिए आते है और भगवान के दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरी करने की कामना करते है। Laxmi Narayan Temple:लक्ष्मी नारायण मंदिर का इतिहास लक्ष्मी नारायण मंदिर की स्थापना श्रद्धेय संत श्री श्री कुमार स्वामी (गुरुदेव) द्वारा की गयी थी। 2001 में, गुरुदेव ने धार्मिक संगठन भगवान श्री लक्ष्मी नारायण धाम की स्थापना की। जिससे इस दिव्य पूजा स्थल का उदय हुआ। इस मंदिर निर्माण की प्रेरणा गुरुदेव ब्रह्मर्षि कुमार स्वामी से मिली और इसे गुरुदेव के बड़े बेटे भाईश्री मनदीप नागपाल जी के दूरदर्शी नेतृत्व में फलीभूत किया गया। मंदिर का महत्व मंदिर का विस्तार करने हेतु लक्ष्मी नारायण मंदिर हरिद्वार आने वाले लोगों को गेस्ट हाउस की सुविधाएं प्रदान करता है। जो साधकों के लिए एक स्वागत योग्य और शांतिपूर्ण निवास है। गुरुदेव के अनुसार मंदिर का दृश्य प्रतिष्ठित श्री यंत्र को दर्शाता है, जो दिव्य ब्रह्मांडीय ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करने वाला एक शक्तिशाली प्रतीक है। यह पवित्र दर्शन मंदिर के महत्व को बढ़ाता है। दूर-दूर से आये तीर्थयात्रियों को देखने और गहन आध्यात्मिकता का अनुभव करने के लिए यह यन्त्र आकर्षित करता है। लक्ष्मी नारायण मंदिर में प्रत्येक अमावस्या और पूर्णिमा को विशाल भंडारा कराने का चलन है। जो काफी लम्बे समय से किया जाता आ रहा है। इस दौरान यहाँ पर भक्तों की भीड़ दिखाई देती है। मंदिर की वास्तुकला लक्ष्मी नारायण मंदिर भक्तों को शांत वातावरण और विशाल क्षेत्र प्रदान करता है। यह वास्तव में इसके संस्थापकों और अनुयायियों की अटूट भक्ति और आध्यात्मिक आकांक्षाओं का एक प्रमाण है, जो मानवता और परमात्मा के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। मंदिर को जमीन से कुछ ऊंचाई पर बनाया गया है।सीढ़ियों से मंदिर तक पंहुचा जा सकता है। मंदिर के मुख्य कक्ष में भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और भगवान गणपति जी विराजमान है। मंदिर में कई झरोखे भी बने हुए है। यहाँ से हवा प्रवेश कर मंदिर के वातावरण को आनंदित कर देती है। इस मंदिर में भंडार गृह और बहुत सारे कक्ष है। इस मंदिर में हनुमान जी और गरुड़ जी की भी मूर्ति स्थापित है। लक्ष्मी नारायण मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद लक्ष्मी नारायण मंदिर में माखन मिश्री ,परमाल, चना चिरोंजी का भोग लगाया है। साथ ही भगवान को पुष्प भी अर्पित किये जाते हैं। भगवान को पीली वस्तुएं अर्पित की जाती है।

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हनुमान मंदिर ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

यहाँ पर हनुमान जी ने ऋषि मणि राम दास जी को दिए थे दर्शन हनुमान मंदिर पवित्र शहर ऋषिकेश में अनेक प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिर है। ऐसा ही प्राचीन और धार्मिक मंदिर है ऋषिकेश में राम झूला पर स्थित हनुमान मंदिर। इस मंदिर को मनोकामना पूर्ण हनुमान मंदिर भी कहा जाता है क्योंकि भगवान हनुमान जी यहाँ पर आने वाले सभी भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करते है। इस मंदिर में रोज संध्या काल के समय भजन कीर्तन का आयोजन किया जाता है। मंगलवार और शनिवार को इस मंदिर में भक्तों की भीड़ ज्यादा रहती है। साथ ही इन दिनों में विशेष पूजा अर्चना भी की जाती है। मंदिर का इतिहास हनुमान मंदिर के इतिहास के विषय में कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं है। परन्तु प्राचीन मंदिर होने के कारण इस मंदिर के पीछे पौराणिक कथाये आज भी चली आ रही है। जिसके अनुसार इस मंदिर में ऋषि मणि राम दास जी ने कठोर तपस्या की थी। उनकी इस घोर तपस्या से प्रसन्न होकर हनुमान जी ने राम दास जी यहीं पर दर्शन दिए थे। उसके बाद ऋषि मणि राम दास जी ने इसी स्थान पर हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना की और मंदिर का निर्माण भी किया। तभी से यह प्राचीन मंदिर हनुमान मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। मंदिर का महत्व हनुमान मंदिर के लिए भक्तों में विशेष आस्था है। इस प्राचीन मंदिर में सभी भक्त अपनी मनोकामना लेकर दरबार में आते है। और जब उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है तो यहाँ पर दोबारा आकर नारियल और चुनरी चढ़ाते है। ऐसा माना जाता है कि भगवान के इस दरबार में सभी इच्छाएं पूरी होती है। हनुमान जी के दर्शन से सभी कष्ट दूर हो जाते है। भक्तों को मंदिर में दर्शन कर परम शांति का अनुभव होता है। मंदिर की वास्तुकला मंदिर के वास्तुकला की बात करें तो यह मंदिर अति प्राचीन होने के कारण प्राचीन कला को दर्शाता है। यह मंदिर अन्य मंदिरों की भांति ही बना हुआ है परन्तु भक्तों के लिए विशेष आस्था को संजोये हुए है। हनुमान मंदिर के मुख्य मंदिर में हनुमान जी की प्राचीन मूर्ति विराजित है। हनुमान जी के साथ भगवान राम और माता सीता कि भी मूर्ति यहाँ पर स्थापित है। इस मंदिर में भक्तो को हनुमान जी के साथ साथ भगवान भोलेनाथ के भी दर्शन होते है। मंदिर का समय हनुमान मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 08:00 PM संध्या काल आरती 07:00 PM – 07:30 PM मंदिर का प्रसाद हनुमान मंदिर में फल, मिठाई, चना चिरोंजी, गुड़ और रोट का भोग लगाया जाता है।

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नीलकंठ महादेव मंदिर:ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

हलाहल विष पान के बाद शिव जी ने इसी स्थान पर की थी साधना। नीलकंठ महादेव मंदिर उत्तराखंड के हिमालय पर्वतों के तल में पवित्र शहर ऋषिकेश बसा हुआ है और इस पवित्र व पावन शहर में स्थित है नीलकंठ महादेव मंदिर। यह मंदिर ऋषिकेश के सबसे पूजनीय मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। ऋषिकेश आने वाले भक्त इस मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने जरूर जाते है। विशेष अवसरों पर यहाँ पर भारी भीड़ भोलेनाथ के चरणों में माथा टेकने आती है। नीलकंठ महादेव मंदिर पहुंचना आसान नहीं है। यहाँ पहुंचने के लिए पहाड़ और नदियों से होकर जाना पड़ता है। नीलकंठ महादेव मंदिर का इतिहास नीलकंठ महादेव मंदिर के इतिहास के पीछे के पौराणिक कथा प्रचलित है। जिसमे बताया जाता है कि जब समुद्र मंथन हुआ तो उसमे कई वस्तुएँ बाहर आई, जो देवताओं और दानवों में बाँटी गई । फिर समुद्र में से हलाहल विष निकला। यह विष इतना जहरीला था कि कोई भी इसे नहीं चाहता था। यह विष पूरी सृष्टि का विनाश कर सकता था। सम्पूर्ण जगत में विष के कारण हाहाकार मच गया। तब भोलेनाथ ने इस विष का पान करने का निर्णय लिया। जब वह हलाहल विष को पी रहे थे तो माता पार्वती उनके पीछे खड़ी थी और उन्होंने शिव जी की गर्दन को अपने हाथों से पकड़ लिया। ताकि विष शरीर के अंदर ना जा सके और ना ही गले से बाहर आ सके। यह विष शंकर जी के गले में ही रह गया जिस कारण उनका गला नीला हो गया। इस वजह से भोलेनाथ ‘नीलकंठ’ के नाम से जाने जाने लगे। परन्तु इस विष में गर्मी बहुत ज्यादा थी। शिव जी शीतलता की तलाश करने लगे और हिमालय की ओर चल दिए। वह मणिकूट पर्वत पर पहुंचे। वहां मधुमती नदी की शीतलता को देखते हुए एक वृक्ष के नीचे बैठ गए। वह वहाँ समाधी में लीन हो गए। कई वर्ष होने के बाद माता पार्वती को चिंता होने लगी तो वह भी मणिकूट पर्वत पर जाकर शंकर जी के जगाने की प्रतीक्षा करने लगी। देवी-देवताओं की कई बार प्रार्थना करने के बाद भोलेनाथ ने आंख खोली और फिर उन्होंने कैलाश के लिए प्रस्थान किया। इस स्थान से जाने से पहले इसे नीलकंठ महादेव का नाम दिया। जिस वृक्ष के नीचे भगवान शिव समाधि में लीन थे, आज उस स्थान पर नीलकंठ महादेव मंदिर है। मंदिर का महत्व नीलकंठ महादेव मंदिर में भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने से सारी कामना पूर्ण होती है। ऐसी मान्यता है कि सावन सोमवार के दिनों में नीलकंठ महादेव के दर्शन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। नीलकंठ महादेव जी के दर्शन मात्र से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते है। सभी भक्त भगवान शिव को जल चढ़ाते है। साथ ही मंदिर परिसर में धागा बांध कर अपनी कामना कहते है। फिर जब उनकी मन्नतें पूरी हो जाती है तो वह उस धागे को खोलने आते है। मंदिर की वास्तुकला नीलकंठ महादेव मंदिर का जितना महत्त्व है, मंदिर की नक़्क़ाशी भी उतनी ही आकर्षक है। इस मंदिर के शिखर के तल पर समुद्र मंथन के दृश्य को दर्शाया गया है। गर्भ गृह के प्रवेश-द्वार पर एक विशाल पेंटिंग निर्मित है जिसमे भगवान भोलेनाथ को विष पीते हुए भी दिखाया गया है। इस मंदिर के सामने की पहाड़ी पर एक मंदिर है जो की माता पार्वती का मंदिर है। इस मंदिर में पानी का एक झरना भी है। भक्त दर्शन करने से पहले इस झरने में स्नान करते हैं और फिर भोलेनाथ के दर्शन करते है। नीलकंठ महादेव मंदिर का समय नीलकंठ महादेव मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 06:00 PM मंदिर का प्रसाद नीलकंठ महादेव मंदिर में फल, फूल, शहद, दूध, जल, नारियल, बेलपत्र, मिठाई, सूखा प्रसाद आदि का भोग लगाया जाता है।

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अवधूत हनुमान मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यह एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर है, जो एक सिद्धपीठ है। देवभूमि उत्तराखंड का हरिद्वार जिला चार धाम यात्रा का प्रवेश द्वार है। हरिद्वार को प्रभु हरि का द्वार कहा जाता है। यहां के ज्वालापुर में गंगा तट किनारे स्थित है अवधूत हनुमान मंदिर। यह एक दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर है, जो एक सिद्धपीठ है। इसे बाबा हीरादास हनुमान मंदिर या अवधूत मंडल आश्रम के नाम से भी जानते हैं। इस आश्रम में भक्तों को रहने व खाने की सुविधा मिलती है। हर मंगलवार को यहां विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। हरिद्वार आने वाले भक्त यहां दर्शन करना नहीं भूलते। मंदिर में बजरंगबली के अलावा राम दरबार, शंकर-पार्वती, गणेश जी, मां दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्ति स्थापित है। सबसे खास बात है कि राम दरबार में नेपाल की गंडक नदी से लाए गए दिव्य शालीग्राम पत्थरों के भी दर्शन होते हैं। आपको बता दें कि ऐसे ही शालीग्राम पत्थरों से अयोध्या में प्रभु श्रीराम मंदिर में मूर्तियों का निर्माण किया जा रहा है। अवधूत हनुमान मंदिर का इतिहास यह मंदिर रामानंदी निराकारी वैष्णव संप्रदाय से संबंधित है। इस संप्रदाय की स्थापना स्वर्गीय श्री आचार्य बाबा सरयूदासजी महाराज ने करीब 200 साल पहले की थी। मंदिर के नाम में अवधूत का अर्थ होता है कि जिसको घर या बाहर किसी से कोई मतलब नहीं होता, जो भगवान की भक्ति में लीन रहता है। कुछ ऐसे ही थे मूल रूप से पटियाला के रहने वाले बाबा सरयूदासजी। ये एक महान और आध्यात्मिक संत थे। बताया जाता है एक बार पटियाला के राजा को संतान नहीं हो रही थी। इसको लेकर राजा-रानी सहित पूरी प्रजा दुखी थी। बाबा सरयूदासजी के आशीर्वाद से राजा को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, जिसके बाद से बाबा की ख्याति और फैल गई। हरिद्वार में बाबा को उनके भक्तों ने ज्वालापुर गांव में गंगा नदी के तट ​पर एक जमीन दान में दी थी। बताया जाता है कि इसी जमीन पर सरयूदासजी के आदेश पर उनके अनुयायी बाबा हीरादास जी ने बसंत-पंचमी, दिनांक 13-04-1830 को यहां हनुमान मंदिर की नींव रखी। मंदिर में स्वामी हीरादास की मूर्ति भी लगी है। अवधूत हनुमान मंदिर का महत्व अवधूत हनुमान मंदिर में आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। इसी वजह से इस मंदिर को कुछ भक्त मनकामेश्वर भी कहते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां दर्शन करने से सभी प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। महिलाएं संतान प्राप्ति की कामना लेकर इस मंदिर में आती हैं। अवधूत हनुमान मंदिर की वास्तुकला अवधूत हनुमान मंदिर काफी सुंदर तरीके से बनाया गया है। इसमें प्रवेश करते ही यहां का दृश्य किसी का भी मन मोह लेता है। मुख्य द्वार पर सबसे ऊपर विष्णु भगवान की प्रतिमा लगाई गई है। मंदिर में मुख्य रूप से हनुमान जी की पूजा अर्चना की जाती है। यहां हनुमानजी की एक हाथ में पर्वत लिए विशाल मूर्ति स्थापित है। इसके निर्माण की कहानी बहुत रोचक है। बताया जाता है कि मूर्ति तैयार करते समय लाखों लोगों ने कागज पर 11.11 करोड़ बार राम-नाम मंत्र लिखा था, जिसे गंगाजी के पवित्र जल में मिला दिया गया। इसके बाद सीमेंट व रेत में गंगाजी के इसी पवित्र जल को मिलाकर लेप तैयार किय गया, जिसका उपयोग हनुमानजी की विशाल मूर्ति तैयार करने में किया गया। अवधूत हनुमान मंदिर में श्रद्धालुओं के रहने के लिए एक आश्रम है। इसके अलावा एक गौशाला भी हैं, जहां बड़ी अच्छे तरीके से गायों की देखरेख व सेवा की जाती है। अवधूत मंडल आश्रम जरूरतमंद व गरीब लोगों के लिए एक धर्मार्थ अस्पताल भी चलाता है। मंदिर परिसर में समय समय पर कथा व सत्संग का आयोजन भी होता रहता है। मंदिर परिसर में सत्यदेव पुरम कथा स्थल बना है। अवधूत हनुमान मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 10:00 PM सुबह आरती का समय 06:00 AM – 06:30 AM शाम को आरती का समय 06:30 PM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद अवधूत हनुमान मंदिर मेंं नारियल, बेसन के लड्डू, दूध के पेड़े, फल, फूल आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है।

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गंगा घाट:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

यहां डुबकी लगाने से मिलेगी पापों से मुक्ति गंगा घाट पवित्र शहर हरिद्वार में प्रसिद्ध तीर्थ स्थान हर की पौड़ी के नौ गंगा घाट बहुत ही पावन और महत्वपूर्ण महत्त्व रखते है। ये गंगा घाट हैं -विष्णु घाट, ब्रह्मकुंड घाट, कुशावर्त घाट, नाई घाट, बिरला घाट, सती घाट, गऊ घाट, नीलेश्वर घाट और बिल्केश्वर घाट। इन गंगा घाटों पर स्नान करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। जो गंगा नदी में डुबकी लगाकर अपने पापों से मुक्ति पाने के लिए आते है। ज्यादातर भक्त महाकुम्भ के समय इन घाटों पर आते है। गंगा स्नान करने से सभी दुःख दूर होते है। और आत्म को शांति मिलती है। मंदिर का इतिहास हर की पौड़ी पर निर्मित घाटों के विषय में कई किद्वन्तियाँ है जिसमे बताया जाता है कि इसका निर्माण विक्रमादित्य ने अपने भाई भृतहरि की याद में करवाया था। क्योंकि वह इन्ही गंगा घाट पर ध्यान किया करते थे। एक अन्य कथा के अनुसार कुछ इतिहासकारों ने इसका इतिहास राजा अकबर के शासन काल के समय का बताया है। कहा जाता है कि हर की पैड़ी पर स्थित ब्रह्मकुंड का घाट ब्रह्मकुंड न होकर प्राचीन समय का छत्रि स्थल था। यहीं पर राजा मानसिंह की अस्थियां विसर्जित की गयी थी। Ganga Ghat मंदिर का महत्व हर की पौड़ी पर स्थित कुछ गंगा घाट का विशेष महत्त्व है जैसे – 1)विष्णु घाट – हर की पौड़ी पर स्थित विष्णु घाट की अपनी महत्वता है। इस गंगा घाट पर यहां भगवान विष्णु का मंदिर निर्मित है। कहा जाता है कि इस घाट पर गंगा स्नान करने मात्रा से ही मनोकामना पूर्ण होती है। इस घाट पर स्नान करते हुए भगवान विष्णु का जाप करने का विशेष महत्त्व है। 2)ब्रह्मकुंड घाट – ब्रह्मकुंड घाट का उल्लेख धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। बताया जाता है कि अमृत की कुछ बूंदें इसी ब्रम्ह कुंड में गिरी थी। इस कारण इस कुंड का बहुत महत्त्व है। इस घाट पर गंगा स्नान करने से सभी दुखों से मुक्ति मिलती है। 3)गऊ घाट – हर की पौड़ी पर स्थित गऊ घाट भी महत्वपूर्ण है। इस घाट पर बहुत सी गाय देखने को मिलती है। यहाँ स्नान करने के बाद उन्हें चारा, खाना आदि दान देने का महत्त्व है। हिंदू धर्म में अस्थि विसर्जित के उपरांत मुंडन संस्कार और गऊ दान का विशेष महत्व माना गया है। गाय को चारा देने ,रोटी खिलाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है । इस कारण इस घाट पर बड़ी संख्या में भक्तों की भीड़ मिलती है। 4)बिरला घाट – बिरला घाट का भी अपना विशेष महत्व है। बिरला घाट की मान्यता है कि इसके धरातल में हनुमान जी की प्रतिमा स्थित है। इस घाट पर गंगा स्नान करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। बिरला घाट को “हनुमान घाट” भी कहा जाता है। ऐसा भी कहा जाता है कि इसी घाट पर पांडव रुके थे। 5)नाई घाट – हर की पौड़ी के इस घाट पर मुंडन संस्कार किया जाता है। मृतक की अस्थि विसर्जन के बाद परिवार के सदस्यों का मुंडन संस्कार यहीं किया जाता है। इस घाट की ऐसी मान्यता है कि मुंडन संस्कार कराने के बाद यहाँ गंगा स्नान करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है। 6)कुशावर्त घाट – हर की पौड़ी का यह घाट विश्व विख्यात है। धार्मिक ग्रंथों में इस घाट का भी वर्णन किया गया है। कहा जाता है कि यहाँ पर भगवान दत्तात्रेय की तपोस्थली है। इस कारण यहाँ पर भगवान दत्तात्रेय का मंदिर भी है। इस घाट पर पूर्वजों की आत्मा शांति हेतु क्रियाकर्म किया जाता है। 7)नीलेश्वर घाट – धार्मिक ग्रंथों में नीलेश्वर घाट का वर्णन भी मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस घाट पर गंगा स्नान करने से पुण्य प्राप्त होता है। 8)बिल्केश्वर घाट – बिल्केश्वर घाट पर गंगा स्नान करने का बहुत महत्त्व है। यहाँ स्नान करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है। महाकुंभ और स्नान पर्वों पर यहाँ भारी संख्या में लोग आते है। 9)सती घाट – धार्मिक ग्रंथों में वर्णित सती घाट पर जिस भी व्यक्ति की कम उम्र में मृत्यु हो जाती थी , उसकी पत्नी भी साथ में दाह संस्कार करती थी। उनकी स्मृति में इस घाट पर छोटे छोटे मंदिर बनाये गए है। दूर दूर से लोग इस घाट पर अस्थि विसर्जित करने आते है। इस कारण इस घाट को ‘अस्थि प्रवाह घाट’ के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ पर अस्थि विसर्जन के बाद गंगा स्नान करने से पितरों को शांति प्रदान होती है। मंदिर की वास्तुकला गंगा घाट की वास्तुकला की बात की जाए तो यह घाट गंगा नदी के किनारे बने हुए है। प्रत्येक घाट पर गंगा नदी में स्नान करने के लिए कुछ दूरी तक सीढ़ियां बनाई गयी हैं। यहाँ पर जाकर आसानी से स्नान किया जा सकता है। प्रत्येक घाट पर मंदिर भी बने हुए जहाँ पर गंगा स्नान करने के बाद पूजा अर्चना की जा सकती है। घाट का सुन्दर दृश्य सुबह और शाम के समय बहुत ही मनोरम होता है। गंगा घाट मंदिर का समय गंगा घाट का समय 12:00 AM – 12:00 AM मंदिर का प्रसाद गंगा घाट पर प्रसाद के रूप में दीपक प्रज्वलित किया जाता है। साथ ही गंगा मैया को पुष्प भी अर्पित किये जाते है।

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सुरेश्वरी देवी मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

हरिद्वार का सुरेश्वरी देवी मंदिर दुर्गा देवी को समर्पित है सुरेश्वरी देवी मंदिर:हरिद्वार का सुरेश्वरी देवी मंदिर दुर्गा देवी और माँ भगवती को समर्पित है और राजाजी राष्ट्रीय उद्यान के अंदर सुरकूट पर्वत के ऊपर स्थित है। थोड़ी चढ़ाई पर स्थित मंदिर के आसपास जंगल का एक रमणीय दृश्य दिखाई देता है। मंदिर परिसर में मोरों को आते देखना आम बात है, जो इस पवित्र स्थान के मनमोहक माहौल को और भी बढ़ा देता है। मानसून के दौरान, मंदिर तक का रास्ता चुनौतीपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहां बहने वाली धारा में आमतौर पर बाढ़ आ जाती है। हालाँकि अन्य मौसमों के दौरान जलधारा इस स्थान के प्राकृतिक आकर्षण को बढ़ा देती है। sureshwari devi mandir:का इतिहास सुरेश्वरी देवी मंदिर के इतिहास की कोई पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। परन्तु इस मंदिर की उत्पत्ति का उल्लेख धार्मिक ग्रंथ स्कंद पुराण के केदारखंड में किया गया है। उसमे बताया गया है कि देवराज इंद्र के स्वर्ग लोक से निष्कासित होने पर राजा रजी के पुत्र से भयभीत होकर वह क्षीर सागर में छुप गए। वहां उन्होंने देव गुरु बृहस्पति की आराधना की। तब इंद्र को गुरु बृहस्पति ने विष्णु भगवान की स्तुति करने का परामर्श दिया। भगवान विष्णु की स्तुति के उपरांत विष्णु जी ने इंद्र को गंगा के दक्षिण भाग में “सूरकूट पर्वत” पर जा कर माता की आराधना करने को कहा। तब देवराज इन्द्र ने इस सूरकूट पर्वत पर एक साधारण मानव की भांति माता की आराधना की। देवराज इन्द्र की तपस्या से प्रसन्न होकर मां भगवती ने इसी स्थल पर इंद्र को दर्शन दिए। साथ ही विजय होने का वरदान भी दिया। तब इंद्र को पुनः स्वर्ग लोक प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि इंद्र का नाम सुरेश भी है। इस कारण यहाँ पर माता का नाम सुरेश्वरी पड़ा। और यह स्थान सुरेश्वरी माता मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। सुरेश्वरी देवी मंदिर का महत्व ऐसा माना जाता है कि माता के दर्शन मात्र से ही चर्म रोग और कुष्ठ रोग का नाश हो जाता है। माता भक्तों के सभी कष्टों का हरण करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार सुरेश्वरी देवी माता के दर्शन करने से पुत्र की कामना करने वालो को पुत्र, धन की कामना करने वालो को धन, मोक्ष चाहने वालो को मोक्ष प्राप्त हो जाते हैं। नवरात्रि के दौरान अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी के दिन माता के दर्शन का विशेष महत्व बताया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि देवता भी इस दिन मां भगवती के दर्शन करने के लिए यहाँ आते है। सुरेश्वरी देवी मंदिर की वास्तुकला सुरेश्वरी मंदिर एक समृद्ध पारंपरिक पृष्ठभूमि वाला एक प्राचीन और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है। एक छोटी पहाड़ी के ऊपर स्थित मंदिर तक पहुँचने के लिए कुछ सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। मंदिर तक पहुंचने पर प्रवेश द्वार पर एक खुला प्रांगण है। मुख्य मंदिर के केंद्र में माता सुरेश्वरी देवी की एक शानदार मूर्ति स्थापित है। जबकि बाहरी प्रांगण में भगवान शिव और उनके परिवार को समर्पित एक मंदिर है, जिसमें प्रतिष्ठित शिवलिंग भी शामिल है। प्रांगण की प्रमुख विशेषताओं में से एक राजसी बरगद का पेड़ है, जो उम्र और ज्ञान की आभा बिखेरते हुए अनगिनत पीढ़ियों से वहाँ खड़ा है। इसके अतिरिक्त, पहाड़ी के शिखर पर एक और उल्लेखनीय पूजा स्थल है – काली माता मंदिर। पहाड़ के किनारे सावधानीपूर्वक बनाई गई कई सीढ़ियों पर चढ़कर पहुंचा जा सकने वाला यह मंदिर आसपास के लुभावने दृश्य को दर्शाता है। सुरेश्वरी देवी मंदिर का समय सुरेश्वरी देवी मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद सुरेश्वरी देवी मंदिर में लड्डू, पेड़ा, मिठाई और सूखा प्रसाद चढ़ाया जाता है। माता को चुनरी भी चढ़ाई जाती है। पुष्प भी अर्पित किये जाते है।

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त्रयंबकेश्वर मंदिर (तेरह मंजिल) :ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

13 मंजिला ईमारत में विभिन्न देवी देवताओं के साथ विराजित है भोलेनाथ त्रयंबकेश्वर मंदिर:उत्तराखंड के पवित्र शहर ऋषिकेश में गंगा नदी के तट पर लक्ष्मण झूला के पार स्थित है त्रयंबकेश्वर मंदिर। यह बहुमंजिला मंदिर है जो कि एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है। इस मंदिर को तेरह मंजिल के नाम से भी जानते है। क्योंकि इस मंदिर में 13 मंजिल है। इन 13 मंजिलों में हिंदू देवी-देवताओं की कई मूर्तियाँ स्थापित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। त्र्यंबकेश्वर का अर्थ है त्रिनेत्र। भगवान शिव को त्रिनेत्र भी कहते है। मंदिर का इतिहास Trimbakeshwar Temple:त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर के मूल इतिहास की कोई भी पुख्ता जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर भी मतभेद है। बताया जाता है कि लगभग तीन दशक पूर्व इस मंदिर को स्वामी कैलाशानंद महाराज ने बनवाया था। इसके अलावा लोगों का मानना है कि मंदिर की स्थापना 8वीं और 9वीं शताब्दी के बीच आदि शंकराचार्य ने की थी। मंदिर का महत्व त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में सावन के महीने और महाशिव रात्रि पर भक्तों की भारी भीड़ रहती है। शिव भक्त यहाँ पर भोलेनाथ के दर्शन करने आते है साथ ही अपनी मन्नते भी भोले शम्भू के समक्ष रखते हैं। इस मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियां है। इस कारण भक्त एक ही स्थान पर सभी देवी देवताओं के दर्शन आसानी से कर सकते हैं। लक्ष्मण झूला से इस मंदिर का दृश्य बहुत ही सुन्दर दिखाई देता है। जो लोग लक्ष्मण झूला देखने जाते है उन्हें यह मंदिर अपनी ओर आकर्षित करता है। इस मंदिर में होने वाली गंगा आरती का मनोरम नजारा ऐसा होता है कि कोई भी भक्त इसे भूल ही नहीं सकता है। त्रयंबकेश्वर मंदिर की वास्तुकला त्रयंबकेश्वर मंदिर की वास्तुकला देखते ही बनती है। जो भी भक्त ऋषिकेश दर्शन के लिए आते है वह इस मंदिर की भव्यता को देख कर यहाँ पर जरूर जाते है। यह मंदिर पिरामिड के आकार में तरह मंजिल ईमारत है। सबसे ऊपरी मंजिल पर भगवान शिव का मंदिर है। मंदिर को इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि आप ऊपर जाते समय अधिकांश भगवानों की परिक्रमा करते हुए जाते हैं। इस मंदिर में माता लक्ष्मी, देवी दुर्गा, देवी सरस्वती, हनुमान जी, भगवान कृष्ण और विष्णु भगवान के मंदिर भी स्थित हैं। त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में देवी-देवताओं की प्रतिमाओं के साथ यहाँ पर छोटी छोटी दुकानें भी है। जिसमें तुलसी – रुद्राक्ष से निर्मित मालाएं मिलती है। इसके अलावा विभिन्न धातुओं की अंगूठियां भी इन दुकानों पर मिलती है। जिन्हे भक्त खरीदकर अपने अपने घर ले जाते है। त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में एक बड़ी लाइब्रेरी भी है जिसमे हिन्दू धर्म के वैदिक और धार्मिक ग्रन्थ रखे गए है जो पढ़ने के लिए उपलब्ध हैं। हिन्दू देवी और देवताओं के आकृतियां मंदिर के दीवारों पर उकेरी गई हैं जो मंदिर की भव्यता को बढ़ाती है। त्रयंबकेश्वर मंदिर का समय त्रयंबकेश्वर मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद त्रयंबकेश्वर (तेरह मंजिल) मंदिर में फल, फूल, नारियल, मिठाई, बेलपत्र, दूध, दही, घी आदि का भोग लगाया जाता है।

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भीमगोड़ा कुंड मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

इस मंदिर का नाम पांच पांडवों में दूसरे भाई भीम के नाम पर रखा गया है। भीमगोड़ा कुंड मंदिर:भीमगोड़ा कुंड, हरिद्वार में स्थित एक प्रतिष्ठित तालाब है, जिसका बहुत आध्यात्मिक महत्व है क्योंकि हजारों भक्त शुद्धिकरण हेतु इसके पवित्र जल में स्नान करने के लिए यहाँ आते हैं। इस पवित्र कुंड का नाम पांडव भाइयों के दूसरे बहादुर योद्धा ‘भीम’ के नाम पर रखा गया है। यह कुंड प्रसिद्ध हर की पौड़ी से लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। भीमगोड़ा के निकट, भगवान विष्णु की चौबीस मूर्तियों से सुसज्जित एक मंदिर है – जो इस प्रतिष्ठित हिंदू देवता के अवतारों को दर्शाता है। यह पवित्र स्थल तीर्थयात्रियों और आगंतुकों को समान रूप से आकर्षित करता है, जो शांत वातावरण के बीच आशीर्वाद और शांति की तलाश में इसकी दिव्य आभा का आनंद लेने आते हैं। भीमगोड़ा आध्यात्मिक संतुष्टि और शांति की तलाश करने वालों के लिए एक पसंदीदा गंतव्य बना हुआ है। मंदिर का इतिहास भीमगोड़ा कुंड मंदिर के इतिहास से जुडी एक पौराणिक कथा है जिसके अनुसार हिमालय की अपनी यात्रा के समय पांडव भाई एक ऐसे स्थान पर पहुंचे जहां उन्हें प्यास लगी। उसी क्षण भीम जो अपनी अपार ताकत के लिए जाने जाते थे उन्होंने अपने घुटने से जमीन पर प्रहार किया। जिससे एक पवित्र कुंड का निर्माण हुआ। उनके सम्मान में इस जलाशय का नाम ‘भीमगोड़ा’ रखा गया। यह कुंड एक भव्य पर्वत के नीचे स्थित है। भीमगोड़ा कुंड को गंगा नदी के पवित्र जल से पानी मिलता है। जिससे इसकी पवित्रता और महत्व बढ़ जाता है। आज भी, यह पूजनीय स्थल असंख्य भक्तों को आकर्षित करता है जो इसका दिव्य आशीर्वाद चाहते हैं और पवित्र जल से स्नान करने के लिए यहाँ आते है। मंदिर का महत्व भीमगोड़ा कुंड मंदिर को “गुप्त गंगा” भी कहते है। इस स्थान को भीमगोड़ा टेंक के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भीमगोड़ा कुंड मंदिर के कुंड में स्नान करने से शरीर का दर्द ठीक हो जाता है। भीमगोड़ा कुंड मंदिर के विषय में ऐसी मान्यता है कि भीमगोड़ा कुंड में स्नान नहीं करने से गंगा स्नान पूर्ण नहीं माना जाता है। प्राचीन समय में बद्रिनाथ जी की यात्रा के लिए इसी रास्ते से होकर गुजरना पड़ता था। परन्तु वर्तमान में इस रास्ते को बंद कर दिया गया है। मंदिर की वास्तुकला हर की पौड़ी के समीप ही भीमगोड़ा कुंड है और इस कुंड के पास भीमगोड़ा कुंड मंदिर भी निर्मित है। इस मंदिर में पांडवों की प्रतिमाएं बनी हुयी है। ऐसा भी बताया जाता है कि यहाँ पर ही पांडवों ने एक रुद्राक्ष को रखा और ध्यान किया था। बाद में उस रुद्राक्ष में से ग्यारह शिवलिंग निर्मित हुए थे। यह शिवलिंग आज भी भीमगोड़ा मंदिर में स्थापित है। भीमगोड़ा कुंड मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 07:00 AM – 07:00 PM मंदिर का प्रसाद भीमगोड़ा कुंड मंदिर में आप अपनी श्रद्धानुसार प्रसाद ले जा सकते है। साथ ही पुष्प भी चढ़ा सकते है।

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पावन धाम मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

पावन धाम मंदिर को ‘कांच का मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है। पावन धाम मंदिर:चारों तरफ पहाड़ों से घिरे उत्तराखंड राज्य में हर साल हजारों की संख्या में पर्यटक आते हैं। प्रदेश का हरिद्वार जिला पूरे विश्व में धार्मिक व आस्था की दृष्टि से प्रसिद्ध है। यहां की गंगा आरती व कुंभ मेले में भाग लेने दुनिया के कोने-कोने से लोग आते हैं। हरिद्वार में कई ऐसे मंदिर हैं, जोकि आस्था का केंद्र माने जाते हैं, इन्हीं में से एक है पावन धाम मंदिर। यह कांच का मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर का मुख्य आकर्षण बिंदु है इसे बनाने में प्रयोग किया गया कांच। मंदिर की दीवारों पर शीशे से सुंदर चित्रण व कलाकृतियां बनाई गई हैं। सप्त सरोवर रोड पर भगीरथी नगर में स्थित यह मंदिर बेहद खूबसूरत व लोकप्रिय है। हरिद्वार आने वाले भक्त इस मंदिर में दर्शन करना नहीं भूलते, क्योंकि यहां जाए बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है। मंदिर का इतिहास इस मंदिर की स्थापना साल 1970 में स्वामी वेदांत जी महाराज द्वारा की गई थी। पावन धाम एक गैर लाभकारी संस्था है, यानी इस मंदिर का उद्देश्य समाज कल्याण है। वेदांत जी महाराज ने दूसरों की मदद की सोच रखते हुए ही इस मंदिर की नींव रखी थी। यह मंदिर न सिर्फ मनुष्यों की सेवा बल्कि जानवरों की भी मदद करने के लिए जाना जाता है। संत सेवा, गौ सेवा, जरूरतमंद को मुफ्त भोजन आदि पावन धाम मंदिर की मुख्य गतिविधियों में शामिल है। आज भी यह संस्था सक्रिय रूप से सेवा भाव से कार्य कर रही है। वेदांत जी महाराज मोगा के स्कूलों के साथ ऋषिकेष मेंं स्थित प्रतिष्ठित संस्थान गीता भवन के भी संस्थापक हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन अत्यंत करुणा के साथ दूसरों की सेवा व मदद में ही समर्पित कर दिया। मंदिर का महत्व माना जाता है कि पावन धाम मंदिर में दर्शन मात्र से ही सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। इस मंदिर में दर्शन न करने पर हरिद्वार आने वाले भक्तों की यात्रा पूरी नहीं मानी जाती। भक्तों का मानना है कि इस पावन धाम में मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। इस मंदिर में आपको महाभारत और रामायण के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों के चित्र दीवारों पर मिल लगे जाएंगे। मंदिर की वास्तुकला कांच से बना यह मंदिर बाहर से देखने में भले ही आम इमारतों जैसा प्रतीत हो लेकिन अंदर से यह किसी के भी मन को मंत्रमुग्ध कर देता है। इसकी स्थापत्य कला बेहद आकर्षक व अनोखी है। इस मंदिर की वास्तुकला जैसी सुंदरता देश के अन्य किसी हिंदू मंदिरों में देखने को नहीं मिलती। मंदिर में प्रवेश करते ही दाएं व बाएं तरफ देवी-देवताओं की मूर्तियां स्थापित की गई हैं। जबकि सामने कांच से बना मुख्य मंदिर का प्रवेश द्वार है। यह देखने में काफी आकर्षक लगता है। मंदिर में भगवान राधा-कृष्ण, भगवान शंकर-पार्वती, गणेशजी व अन्य देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों की प्रतिमाओं के दर्शन होते हैं। कांच से बनी दीवारों में प्रतिमाओं का दर्पण अद्भुत लगता है। मंदिर परिसर की दीवारों पर कांच से महाभारत व रामायण के कई महत्वपूर्ण प्रसंगों का चित्रण किया गया है। यही नहीं मंदिर की छत पर भी छोटे-छोटे व रंग-बिरंगे कांचों का प्रयोग कर सुंदर कलाकृतियां बनाई गई हैं। पावन धाम मंदिर का समय मंदिर खुलने का समय 06:00 AM – 06:00 PM मंदिर का प्रसाद मंदिर में लईया, मीठा दाना का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसके अलावा भक्त अपनी श्रृद्धा अनुसार मंदिर में पैसे दान कर सकते हैं।

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चंडी देवी मंदिर:हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

चंडी देवी का यह मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है। चंडी देवी मंदिर उत्तराखंड राज्य के पवित्र शहर हरिद्वार में चंडी देवी मंदिर स्थित है। हिन्दुओं का यह प्रसिद्ध मंदिर हिमालय के सबसे दक्षिणी पर्वत श्रृंखला शिवालिक पहाड़ियों के पूर्वी भाग वाले शिखर पर नील पर्वत पर स्थित है। हरिद्वार के अंदर स्थित पांच तीर्थों में इस धार्मिक मंदिर का भी स्थान है। चंडी देवी का यह मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है। देवी चंडी को समर्पित इस मंदिर के दर्शन के लिए देश के हर कोने से लोग अपनी कामना लेकर माता के दरबार में आते है। विशेष अवसरों पर मंदिर में भारी भीड़ भी देखने को मिलती है। चंडी देवी मंदिर का इतिहास चंडी देवी मंदिर के इतिहास को लेकर कई किद्वन्तियाँ हैं। जिसमे कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कश्मीर के राजा सुच्चत सिंह ने सन 1929 में करवाया था। इसके अलावा दूसरी किद्वंती के अनुसार मंदिर में जो मूर्तियां स्थापित है वह आठवीं सदी की मानी जाती है। चंडी देवी का यह मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में जाना जाता है। जिन्हे आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित करवाया गया था। वह हिन्दू धर्म के पूजनीय संतों में से एक थे। इस मंदिर से जुडी एक और पौराणिक कथा है जिसके अनुसार कुछ समय पहले देवता इंद्र के राज्य पर शुंभ और निशुंभ नामक राक्षसों ने कब्जा कर लिया था। सभी देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। देवताओं अपनी इस समस्या को लेकर माता पार्वती के पास पहुंचे। तब माता ने चंडी के रूप को धारण किया और राक्षसों के समक्ष प्रकट हुईं। जब शुंभ ने उस असाधारण महिला की सुंदरता को देखा वो मोहित हो गया और माता चंडी से विवाह करने की इच्छा जताई। जब माता ने इनकार किया तो शुंभ ने अपने राक्षस चंद और मुंड को उन्हें मारने के लिए भेजा। परन्तु माता ने उनका वध कर दिया। इसके बाद शुंभ और निशुंभ दोनों ने माता को मरने का प्रयास किया लेकिन यह दोनों भी माता ने हाथों मारे गया। इसके बाद माता ने नील पर्वत के ऊपर थोड़ी देर विश्राम किया। ऐसा माना जाता है कि माता के इसी स्थान पर चंडी देवी का मंदिर बनाया गया। इस पर्वत श्रृंखला में स्थित 2 चोटियों को शुंभ और निशुंभ कहते है। मंदिर का महत्व चंडी देवी मंदिर के लिए माना जाता है कि इस मंदिर में सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। इस कारण यहाँ पर भक्तों का ताँता लगा रहता है। चंडी देवी मंदिर में माता पार्वती के उग्र रूप की पूजा अर्चना की जाती है। इनका यह रूप माँ काली से समान है। कुम्भ मेले के समय श्रद्धालु माता के दर्शन करने जरूर आते है। हरिद्वार में तीन सिद्ध पीठ मंदिर स्थापित है जिसमे से एक पीठ माँ चंडी देवी को समर्पित है। दूसरा पीठ माँ मनसा देवी को समर्पित है और तीसरा माता माया देवी को समर्पित है। मंदिर की वास्तुकला चंडीदेवी मंदिर ऊँचाई पर स्थित होने के कारण मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां है। यदि आप रोप वे से जाते है तो भी आपको जो की लगभग 350 चढ़ना होगा। मंदिर तक पहुंचते समय चारों तरफ जंगल का नजारा बहुत ही मनमोहक रहता है। मंदिर की वास्तुकला उत्तर भारतीय शैली में है। मंदिर के समीप हनुमानजी की माँ अंजना माता का मंदिर भी स्थित है। जो भक्त चंडी देवी मंदिर में आते है वह इस मंदिर में भी दर्शन के लिए जरूर जाते हैं। चंडी देवी मंदिर का समय चंडी देवी मंदिर खुलने का समय 05:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद चंडी देवी मंदिर में सूखा मेवा, चना चिरौंजी का भोग लगाया जाता है। साथ ही चुनरी चढ़ाई जाती है। माता को फूल भी अर्पित किये जाते है

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गीता भवन:ऋषिकेश, उत्तराखंड, भारत

गीता भवन स्वर्गाश्रम जहाँ से दिखता है गंगा आरती का अद्भुत नज़ारा देवभूमि उत्तराखंड के ऋषिकेश में पावन गंगा नदी के किनारे स्थित है ‘गीता भवन स्वर्गाश्रम’। यह एक बहुत बड़ा परिसर है। यहाँ पर भक्तों को रखने के लिए निःशुल्क व्यवस्था की जाती है। गीता भवन में 1000 से भी ज्यादा कक्ष उपलब्ध है। गंगा नदी में स्नान करने और गंगा आरती में शामिल होने के लिए दूर- दूर से भक्त आते हैं और में रुकते है। यहाँ पर भक्तों के ध्यान और प्रवचन सुनने के लिए भी सुविधाएं दी जाती है। मंदिर का इतिहास गीता भवन की स्थापना आज़ादी से पूर्व सन 1944 में गंगा नदी के किनारे की गई थी। यह आश्रम यहाँ गीता प्रेस गोरखपुर की शाखा के रूप में कार्यरत है। गीता प्रेस द्वारा यहाँ पर पुस्तकों की भी सुविधा है। गीताभवन को ऋषिकेश आने वाले भक्तों को निशुल्क रहने,खाने ,ध्यान – साधना करने और प्रवचन के लिए अच्छी सुविधाएं मिल सके। इस उदेश्य से इस भवन की स्थापना की गई थी। मंदिर का महत्व गीताभवन में एक बार में 2000 से ज्यादा भक्तों को रहने की व्यवस्था है। यहाँ पर निशुल्क रहा जा सकता है। इस जगह पर वैसे तो साल भर ही भीड़ रहती है। परन्तु यहाँ गर्मियों के समय में ज्यादा सत्संग होते है जिस कारण भक्त ज्यादा संख्या में आते है। गीताभवन के ठीक सामने ही गंगा घाट है जिस कारण भक्त गंगा आरती का आनंद भी ले सकते है। आप परिसर में ध्यान लगा सकते हैं और संतों के प्रवचन भी सुन सकते हैं। गंगा घाट पर स्नान के लिए यहाँ पर समय को लेकर किसी भी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। भक्त अपने समयानुसार स्नान के लिए जा सकते है। यहाँ पर चलने वाले प्रवचनों को सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आते है। और अपने साथ एक अत्याधमिक ऊर्जा लेकर ही जाते हैं। मंदिर की वास्तुकला गीता भवन ऋषिकेश के सबसे प्राचीन तीर्थ परिसरों में से एक है। इस भवन की दीवारों पर सुप्रसिद्ध महाकाव्य श्री गीताजी और रामायण की रचनाएं अंकित हैं। इसके अलावा परिसर में एक ध्यान कक्ष है। यहाँ पर भक्त प्रार्थना करने के लिए एकत्रित होते है। परिसर में मिठाइयां, शाकाहारी भोजन, खाने के सामान की भी दुखने है। जहाँ पर सस्ती कीमतों पर सामान मिलता है। इसके अलावा आयुर्वेदिक दवाएं भी यहाँ मिलती है। जो कि गंगा जल से बनाईं जाती है। परिसर में लक्ष्मी-नारायण मंदिर भी है। गीता भवन मंदिर का समय गीता भवन खुलने का समय 04:00 AM – 08:00 PM मंदिर का प्रसाद गीता भवन में लक्ष्मी नारायण का मंदिर है। इस मंदिर में फल, फूल ,मिठाई आदि का भोग लगाया जाता है।

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