RAMAYANA

Jay shree Ram:प्रभु श्रीराम के जन्म की पौराणिक कथा

प्रभु श्रीराम Ram का जन्म त्रेता युग में अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के घर हुआ था। महाराज दशरथ अयोध्या के महान राजा थे, लेकिन उन्हें कोई पुत्र नहीं था। वे पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाना चाहते थे। उन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ जी से सलाह ली और यज्ञ का आयोजन किया महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ आरंभ करने की ठानी। महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया गया। महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकाण्ड पण्डितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिये बुलावा भेज दिया। निश्‍चित समय आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा अपने परम मित्र अंग देश के अधिपति लोभपाद के जामाता ऋंग ऋषि को लेकर यज्ञ मण्डप में पधारे। इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया। सम्पूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने तथा समिधा की सुगन्ध से महकने लगा। समस्त पण्डितों, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद चरा(खीर) को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया। Shree Ram Bhagwan Story:भगवान राम के बारे में सुनी-अनसुनी 10 कथाएं यज्ञ के समापन पर, ब्रह्मा जी ने दशरथ को चार पुत्र प्राप्त होने का वरदान दिया। इसके बाद, कौशल्या ने चैत्र शुक्ल नवमी के दिन राम, कैकेयी ने भरत, सुमित्रा ने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया। जब चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ सम्पूर्ण राज्य में आनन्द मनाया जाने लगा। महाराज के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में गन्धर्व गान करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगीं। देवता अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे। महाराज ने उन्मुक्त हस्त से राजद्वार पर आए भाट, चारण तथा आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी। पुरस्कार में प्रजा-जनों को धन-धान्य तथा दरबारियों को रत्न, आभूषण प्रदान किए गए। चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ के द्वारा किया गया तथा उनके नाम रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गए। आयु बढ़ने के साथ ही साथ रामचन्द्र (Ram) गुणों में भी अपने भाइयों से आगे बढ़ने तथा प्रजा में अत्यंत लोकप्रिय होने लगे। उनमें अत्यन्त विलक्षण प्रतिभा थी जिसके परिणामस्वरू अल्प काल में ही वे समस्त विषयों में पारंगत हो गए। उन्हें सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों को चलाने तथा हाथी, घोड़े एवं सभी प्रकार के वाहनों की सवारी में उन्हें असाधारण निपुणता प्राप्त हो गई। वे निरन्तर माता-पिता और गुरुजनों की सेवा में लगे रहते थे। उनका अनुसरण शेष तीन भाई भी करते थे। गुरुजनों के प्रति जितनी श्रद्धा भक्ति इन चारों भाइयों में थी उतना ही उनमें परस्पर प्रेम और सौहार्द भी था। महाराज दशरथ का हृदय अपने चारों पुत्रों को देख कर गर्व और आनन्द से भर उठता था। Ram jay shree ram

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राम – लक्ष्मण की नागपाश से मुक्ति Ramayan katha in Hindi

श्री राम लक्ष्मण के नागपाश में बंधने के बाद युद्ध समाप्त हो जाता है और लंका की सेना अपने नगर में वापस लौट जाते हैं। श्री राम और लक्ष्मण के नागपाश में बंधने के बाद युद्ध समाप्त हो जाता है। लंका की सेना अपने नगर लौट जाती है और रावण अपनी जीत का जश्न मनाता है। इधर सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जामवंत और विभीषण सभी श्री राम और लक्ष्मण के इस हालत पर बहुत दुखी होते हैं। राम और लक्ष्मण के साथियों को उनकी हालत पर (Ramayan ) बहुत दुख होता है। वे सभी उनके लिए कोई उपाय खोजने की कोशिश करते हैं। क्योंकि जिनके के लिए पूरी वानर सेना समुंद्र लांघ कर युद्ध करने के लिए आई थी। आज वही श्री राम और लक्ष्मण भूमि पर नागपाश में बंधे मूर्छित पड़े है। और धीरे-धीरे नाग उनके शरीर से प्राण चूस रहे थे। वानर सेना ने राम और लक्ष्मण के लिए ही समुद्र पार किया था। अब जब वे दोनों Ramayan नागपाश में बंधे हैं, तो सभी वानर सेना के सदस्य बहुत दुखी हैं। वे जानते हैं कि अगर राम और लक्ष्मण को जल्दी से नागपाश से मुक्त नहीं किया गया, तो वे मर जाएंगे। श्री राम की सेना में पूरी तरह शौक सागर में डूब जाते हैं। किसी को भी श्री राम और लक्ष्मण को इस संकट से बाहर निकालने में का रास्ता नहीं सूझ रहा था। रावण के पुत्रो का अंत। लक्ष्मण द्वारा अतिकाय का वध | Atikai Vadh Ramayan Story in Hindi विभीषण द्वारा नागपाश अस्त्र की शक्ति का वर्णन ग्रीव के पूछने पर विभीषण बताते हैं कि इंद्रजीत ने घात लगाकर नागपाश अस्त्र का प्रयोग श्रीराम और लक्ष्मण पर किया है। सुग्रीव, हनुमान, अंगद, जामवंत और विभीषण सभी श्री राम और लक्ष्मण के नागपाश में बंधने के बाद बहुत दुखी होते हैं। वे सभी उन्हें बचाने के लिए कोई उपाय खोजने की कोशिश करते हैं। तब सुग्रीव विभीषण से नागपाश से मुक्त होने का कोई उपाय बताने के लिए कहते हैं। के दुनिया में ऐसा कौन सा अस्त्र है जिसका कोई उपाय नहीं है। सुग्रीव विभीषण से नागपाश से मुक्त होने का कोई उपाय पूछते हैं। वह जानता है कि नागपाश एक बहुत ही शक्तिशाली अस्त्र है और इससे मुक्त होना बहुत मुश्किल है। लेकिन विभीषण जी कहते हैं कि एक बार यमपाश से कोई मुक्त हो सकता है लेकिन नागपाश अस्त्र से प्राणी मृत्यु होने तक छूट नहीं सकता। विभीषण सुग्रीव को बताते हैं कि नागपाश अस्त्र एक बहुत ही घातक अस्त्र है। इससे मुक्त होना असंभव है। क्योंकि नागपाश अस्त्र स्वयं ब्रह्मदेव द्वारा प्रकट किया गया था। दुष्टों का संहार करने के लिए भगवान शिव ने ब्रह्मदेव से नागपाश अस्त्र मांग लिया था । और भगवान शिव की कड़ी तपस्या करके रावण पुत्र इंद्रजीत ने उनसे यह वरदान के रूप में प्राप्त किया। इंद्रजीत बहुत विकट परिस्थिति में ही इस अस्त्र का प्रयोग करता है। आज तक नागपाश से कोई भी बच नहीं पाया है। माता सीता का विलाप  वहीं दूसरी और लंका में अशोक वाटिका में बैठी माता सीता श्री राम और लक्ष्मण के नाग पाश में बंध जाने की सुचना पाकर शोकाकुल हो उठती है। और विलाप करते हुए माता जगदंबा से अपने पति और लक्ष्मण की रक्षा की प्रार्थना करती है । इधर रणभूमि में समय बीतता जा रहा था पूरी वानर सेना श्री राम और लक्ष्मण के इस हालत से मायूस हो चुकी थी। ऐसे में सुग्रीव देखते हैं कि बजरंगबली हनुमान वहां पर नहीं है, जोकि हमेशा श्री राम के कार्य सिद्ध करते है। सुग्रीव पूछते हैं कि संकट मोचन महाबली हनुमान कहां है? जब उनके आराध्य श्री राम पर इतना घनघोर संकट छाया है।   वही हनुमान श्री राम और लक्ष्मण के नागपाश में बंधने के बाद ही कुछ विचार करके पहले ही बिना समय गवाएं सीधे भगवान विष्णु के वाहन और पक्षी श्रेष्ठ गरुड़ के पास पहुंच जाते हैं। हनुमान को यह ज्ञात था कि नागपाश अस्त्र को छिन्न भिन्न करने की क्षमता केवल पक्षीराज गरुड़ में ही है। हनुमान और गरुड़ हनुमान शीघ्रता से गरुड़ के पास आते हैं और गरुड़ को लक्ष्मण और मेघनाथ के युद्ध का सारा वृतांत बताते हैं कि कैसे मेघनाथ द्वारा छल से श्री राम और लक्ष्मण को नागपाश में बांध दिया गया है। हनुमान जब गरुड़ के पास आते हैं, तो वे बहुत ही चिंतित होते हैं। वे गरुड़ को बताते हैं कि कैसे इंद्रजीत ने नागपाश अस्त्र का प्रयोग करके श्री राम और लक्ष्मण को बांध दिया है। हनुमान जानते हैं कि नागपाश अस्त्र एक बहुत ही शक्तिशाली अस्त्र है और इससे मुक्त होना बहुत मुश्किल है। हनुमान गरुड़ देव से प्रार्थना करते हैं कि वह शीघ्रता से उनके साथ चले और श्री राम और लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त करने की कृपा करें। हनुमान गरुड़ से कहते हैं कि श्री राम और लक्ष्मण उनके आराध्य हैं। वे उनका जीवन बचाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार हैं। वे गरुड़ से कहते हैं कि वह केवल पक्षीराज गरुड़ ही हैं जो नागपाश अस्त्र को छिन्न भिन्न कर सकते हैं। शुरुआत में तो गुरुदेव आनाकानी करते हैं लेकिन वहां पर देव ऋषि नारद भी आ जाते हैं। और वे भी गरुड़ को समझाते हैं कि इस समय भगवान विष्णु ने धरती से असुरों का नाश करने के लिए श्री राम के रूप में अवतार लिया है। इसलिए आपका परम धर्म यही है कि इस वक्त पवन पुत्र हनुमान की सहायता करें। देव ऋषि नारद गरुड़ को समझाते हैं कि भगवान विष्णु ने श्री राम के रूप में अवतार लेकर धरती पर असुरों का नाश करने का वचन दिया है। इसलिए गरुड़ का परम धर्म है कि वह श्री राम की सहायता करें। देव ऋषि नारद के समझाने के बाद गरुड़ उनसे सहमत होते हैं और हनुमान के साथ चलने के लिए मान जाते हैं। देव ऋषि नारद के समझाने के बाद गरुड़ हनुमान की सहायता करने के लिए तैयार हो जाते हैं। वे हनुमान के साथ शीघ्रता से लंका की ओर चल पड़ते हैं। इस प्रकार, हनुमान और गरुड़ दोनों मिलकर श्री राम और लक्ष्मण को नागपाश से मुक्त करते हैं और उन्हें युद्ध में विजय प्राप्त करने में मदद करते हैं। राम –

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लक्ष्मण-मेघनाद का युद्ध । राम-लक्ष्मण को नागपाश में बांधना |Lakshman or Meghnad ka Yudh

एक ही दिन में अपने भाई कुंभकरण और अतिकाय, देवान्तक, नरान्तक, त्रिशिरा, निकुम्भ जैसे वीर पुत्रों की मृत्यु के बाद रावण शौक सागर में डूब जाता है। रावण अपने भाई कुंभकरण और अपने कई वीर पुत्रों की मृत्यु से बहुत दुखी था। वह सोच रहा था कि वह इतने शक्तिशाली योद्धाओं को कैसे हरा सकता है। वह अपने राज्य लंका की दुर्दशा से भी चिंतित था। रावण हैरान होता है कि अतिकाय जैसे महाबली योद्धा के साथ-साथ उसके इतने सारे पुत्रों का वध कोई कैसे कर सकता है। रावण को समझ नहीं आ रहा था कि राम और लक्ष्मण Lakshman इतने शक्तिशाली कैसे हो सकते हैं। वह सोच रहा था कि क्या उसके पास ऐसा कोई अस्त्र है जिससे वह राम और लक्ष्मण को मार सकता है। जिन लंकापति रावण के नाम से देवता असुर, नाग, किन्नर, मानव, सभी कांपते थे। आज वही दो मानव और कुछ वानर उनके नगर में आकर उन पर ही भारी पड़ रहे हैं। रावण को याद आया कि जब वह एक शक्तिशाली योद्धा था, तो उसके नाम से सभी कांपते थे। लेकिन अब वह राम और लक्ष्मण के सामने एक कमजोर योद्धा की तरह लग रहा था। जिन्होंने लंका के अधिकतर सेनानियों को परास्त कर दिया है। रावण को पता था कि अगर वह राम और लक्ष्मण ( Lakshman ) को नहीं हरा पाया, तो उसे अपने राज्य लंका को खोना पड़ेगा। लेकिन तब रावण के नाना माल्यवान और उसका पुत्र इंद्रजीत उसे धीरज बंधाते हैं। रावण के नाना माल्यवान ने उसे समझाया कि वह अभी भी एक शक्तिशाली योद्धा है। उन्होंने उसे आश्वासन दिया कि इंद्रजीत राम और लक्ष्मण को हरा देगा। रावण को हौसला देते हुए और प्रतिशोध की अग्नि में जलता हुआ मेघनाथ रावण को कहता है की मुझे युद्ध में जाने की आज्ञा दीजिए पिताजी ” मेरी भुजाएं अपने भाइयों और काका कुंभकरण के वध का प्रतिशोध लेने के लिए फड़क रही है। कुम्भकरण- रावण संवाद श्रीराम द्वारा कुम्भकरण का वध Ramayan- Kumbhkaran Vadh Story in Hindi इंद्रजीत भी अपने भाइयों और काका कुंभकरण की मृत्यु से बहुत दुखी था। वह राम और लक्ष्मण से बदला लेना चाहता था। मैं अपने सबसे घातक अस्त्रों को लेकर युद्ध भूमि में जाऊंगा और इस युद्ध को आज ही समाप्त कर दूंगा। जिस लक्ष्मण ने मेरे भाइयों का वध किया उसको आज मौत की गोद में सुला कर ही आऊंगा। इंद्रजीत अपने पिता से युद्ध में जाने की आज्ञा मांगता है। वह वादा करता है कि वह राम और लक्ष्मण को हरा देगा। इंद्रजीत रावण को अति प्रिय था इसलिए रावण स्वयं युद्ध में जाने की बात कहता है। रावण इंद्रजीत से बहुत प्यार करता था। वह नहीं चाहता था कि इंद्रजीत युद्ध में जाए और मारा जाए। लेकिन उसके नाना माल्यवान जी रावण को परामर्श देते हैं कि जब तक सेना में एक भी योद्धा जीवित हो तब तक स्वयं राजा का युद्ध में जाना उचित नहीं होता। माल्यवान ने रावण को समझाया कि जब तक सेना में एक भी योद्धा जीवित है, तब तक राजा का युद्ध में जाना उचित नहीं है। इंद्रजीत एक परम शक्तिशाली होता है, उसे युद्ध में जाने की आज्ञा दीजिए वह निश्चित ही आपको निराश नहीं करेगा। माल्यवान ने रावण को आश्वस्त किया कि इंद्रजीत एक परम शक्तिशाली योद्धा है। वह निश्चित ही राम और लक्ष्मण को हरा देगा। रावण अपने नाना माल्यवान जी का परामर्श मान लेता है और अपनी विशाल सेना के साथ अपने पुत्र इंद्रजीत को युद्ध में जाने की आज्ञा देता है। रावण अपने नाना माल्यवान के परामर्श को मानता है और इंद्रजीत को युद्ध में जाने की आज्ञा देता है। इंद्रजीत का युद्ध भूमि में प्रवेश indrjeet ka yuddh me prabesh लंका की बची हुई सेना लेकर इंद्रजीत युद्ध भूमि में आता है और आते ही अपने धनुष की प्रत्यंचा की डंकार बजाता है। उसके धनुष की प्रत्यंचा की डंकार से आसमान में बिजली कड़कने लगती है। इंद्रजीत अपने शक्तिशाली रूप और कौशल से सभी को प्रभावित करता है। वह अपने धनुष की प्रत्यंचा की डंकार से ही आसमान में बिजली कड़कने लगता है। इससे स्पष्ट होता है कि वह एक बहुत ही शक्तिशाली योद्धा है। इंद्रजीत लक्ष्मण को ललकारने लगता है और कहता है कि मेरे भाई अतिकाय का वध करने वाला लक्ष्मण कहां है? आज मैं अपने सभी भाइयों की मृत्यु का प्रतिशोध लेकर रहूंगा। इंद्रजीत अपने भाई अतिकाय की मृत्यु से बहुत दुखी है। वह लक्ष्मण से बदला लेने के लिए उत्सुक है। लेकिन तभी सुग्रीव इंद्रजीत को रोक लेता है और उससे युद्ध करने के को कहता है लेकिन इंद्रजीत सुग्रीव का उपवास करते हुए उसे बड़ी सरलता से दूर फेंक देते हैं। सुग्रीव इंद्रजीत का सामना करने के लिए आगे आता है, लेकिन इंद्रजीत उसे बड़ी आसानी से पराजित कर देता है। इससे स्पष्ट होता है कि इंद्रजीत एक बहुत ही शक्तिशाली योद्धा है। उसके बाद बजरंगबली हनुमान भी इंद्रजीत से युद्ध करने के लिए सामने आते हैं लेकिन इंद्रजीत उस समय उन पर भी भारी पड़ने लगते। हनुमान भी इंद्रजीत का सामना करने के लिए आगे आते हैं, लेकिन इंद्रजीत उन्हें भी पराजित करने की स्थिति में आ जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि इंद्रजीत एक बहुत ही शक्तिशाली योद्धा है। तब हुंकार भरते हुए इंद्रजीत कहता है कि क्या तुम्हारे लक्ष्मण में साहस नहीं है, मुझ से युद्ध करने का। कहां है लक्ष्मण?, क्या वह मेरे सामने आने से डरता है? यदि मृत्यु से इतना ही डर लगता है तो दोनों भाई मुंह में तिनका दबाकर मेरे सामने आत्मसमर्पण कर दो। इंद्रजीत लक्ष्मण Lakshman को ललकारता है और उन्हें डराने की कोशिश करता है। वह जानता है कि लक्ष्मण एक शक्तिशाली योद्धा है, इसलिए वह उन्हें डराकर युद्ध से पीछे हटाना चाहता है। इंद्रजीत की यह ललकार सुनकर लक्ष्मण भी आवेश में आकर श्री राम से युद्ध में जाने की आज्ञा मांगते हैं। लक्ष्मण इंद्रजीत की ललकार से आवेश में आ जाते हैं। वह इंद्रजीत से बदला लेने के लिए युद्ध में जाने का फैसला करते हैं। तब विभीषण जी लक्ष्मण जी को सावधान करते हुए सतर्क रहने के लिए कहते हैं, की भैया लक्ष्मण, इंदरजीत एक मायावी तथा विकट योद्धा है। वह

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रावण के पुत्रो का अंत। लक्ष्मण द्वारा अतिकाय का वध | Atikai Vadh Ramayan Story in Hindi

रावण का दुख Ravan ka dukh कुंभकरण की मृत्यु की खबर सुनकर लंकापति रावण अत्यंत व्याकुल हो जाता है। वह अपने छोटे भाई की मृत्यु से इतना दुखी होता है कि उसका रोम-रोम कांपने लगता है। वह अपने सिंहासन से उठकर खड़ा हो जाता है और अपने हाथों को जोड़कर कहता है, “यह सत्य नहीं हो सकता, कुंभकरण स्वयं मृत्यु का दूसरा नाम है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी कुंभकरण की मृत्यु का कारण नहीं बन सकते फिर उसकी मृत्यु कैसे संभव हुई?” रावण के सभासदों में से एक मंत्री कहता है, “महाराज, कुंभकरण को श्री राम ने युद्ध में मारा है।” यह सुनकर रावण का क्रोध और भी बढ़ जाता है। वह कहता है, “अरे मूर्ख! श्री राम ने कुंभकरण को कैसे मारा? कुंभकरण तो एक अजेय योद्धा था। उसने अपनी सोलह हजार वर्ष की नींद से जागकर श्री राम और लक्ष्मण को परास्त करने का संकल्प लिया था। अब वह कैसे मारा जा सकता है?” कुम्भकरण- रावण संवाद श्रीराम द्वारा कुम्भकरण का वध Ramayan- Kumbhkaran Vadh Story in Hindi रावण का दूसरा मंत्री कहता है, “महाराज, श्री राम ने कुंभकरण को अपने बाण से मारा है। कुंभकरण ने श्री राम को मारने के लिए अपना त्रिशूल उठाया था, लेकिन श्री राम ने पहले ही उसे बाण मार दिया।” यह सुनकर रावण और भी अधिक दुखी हो जाता है। वह कहता है, “अब तो असुर जाति का विनाश निश्चित है। कुंभकरण के बिना हमें श्री राम का सामना करना बहुत मुश्किल होगा।” रावण का जेष्ठ पुत्र इंद्रजीत अपने पिता को धीरज बंधाते हुए कहता है, “नहीं पिताजी, केवल काका कुंभकरण के मृत्यु से असुर जाति का विनाश निश्चित हो यह आवश्यक नहीं है। कृपा करके मुझे युद्ध में जाने की आज्ञा दीजिए, मैं आज ही राम और लक्ष्मण के जीवन का अंत करके इस युद्ध को समाप्त कर दूंगा।” रावण इंद्रजीत की बात सुनकर कुछ शांत होता है। वह कहता है, “ठीक है, मैं तुम्हें युद्ध में जाने की आज्ञा देता हूं। जाओ और राम और लक्ष्मण को मारकर असुर जाति की रक्षा करो।” इंद्रजीत अपने पिता को प्रणाम करके युद्ध के मैदान में चला जाता है। रावण पुत्र देवांतक का वध Raavan putr devaantak ka vadh रावण के पुत्र देवांतक, जिन्हें नरांतक भी कहा जाता है, को युद्ध में हनुमान जी ने मारा था। देवांतक एक शक्तिशाली योद्धा था, लेकिन वह हनुमान जी के सामने टिक नहीं सका। रामायण (Ramayan) के विभिन्न संस्करणों में देवांतक के वध का वर्णन अलग-अलग तरीके से किया गया है, लेकिन कहानी का सार एक ही है: युद्ध में प्रवेश कुंभकरण के वध के बाद, रावण ने अपने योद्धाओं को युद्ध के मैदान में भेजा। इन योद्धाओं में देवांतक भी शामिल था। देवांतक ने वानर सेना पर जमकर वार किया और कई वानरों को मार डाला। हनुमान जी से युद्ध देवांतक के शौर्य को देखकर हनुमान जी उससे युद्ध करने के लिए आगे आए। दोनों योद्धाओं के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ। देवांतक ने हनुमान जी पर अपने शक्तिशाली हथियारों से प्रहार किया, लेकिन हनुमान जी ने उन सभी को रोक लिया। देवांतक का अंत हनुमान जी ने अपने गदा से देवांतक पर एक ऐसा प्रहार किया कि वह वहीं मूर्छित होकर गिर पड़ा। इसके बाद हनुमान जी ने देवांतक का सिर धड़ से अलग कर दिया। रावण पुत्र नरांतक का वध युद्ध के मैदान में दोनों योद्धाओं के बीच का युद्ध देखकर सभी हतप्रभ रह जाते हैं। दोनों योद्धा एक दूसरे पर प्रहार करने से पीछे नहीं हट रहे थे। नरांतक एक शक्तिशाली योद्धा था और उसने अंगद को परास्त करने के लिए अपना पूरा दम लगा दिया। लेकिन अंगद भी एक कुशल योद्धा था और वह नरांतक के सभी प्रहारों को विफल कर रहा था। अंत में, काफी समय तक युद्ध के पश्चात नरांतक भूमि पर गिर जाता है। अंगद उस पर लगातार वार पर वार करते हैं और अंत में नरांतक की मृत्यु हो जाती है। नरांतक की मृत्यु से रावण की सेना में हाहाकार मच जाता है। रावण के पुत्र की मृत्यु से वह स्वयं भी बहुत दुखी होता है। नरांतक की मृत्यु से रामायण के युद्ध का रुख बदल जाता है। इस युद्ध से यह स्पष्ट हो जाता है कि रावण की सेना अब राम और लक्ष्मण के सामने टिक नहीं सकती है। रावण पुत्र त्रिश्रा, निकुंभ तथा सेनापति अकम्पन का वध रावण की सेना के सेनापति अकंपन का वध रामायण Ramayan के युद्ध में, रावण की सेना के सेनापति अकंपन एक शक्तिशाली योद्धा थे। उन्होंने वानर सेना पर जमकर वार किया और कई वानरों को मार डाला। सुग्रीव को अकंपन के युद्ध कौशल से बहुत गुस्सा आया और उसने अकंपन से युद्ध करने के लिए आगे आया। दोनों योद्धाओं के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ। अकंपन ने अपनी गदा से सुग्रीव पर कई प्रहार किए, लेकिन सुग्रीव ने सभी प्रहारों को अपनी गदा से रोक लिया। अंत में, सुग्रीव ने अकंपन पर एक ऐसा प्रहार किया कि वह वहीं मूर्छित होकर गिर पड़ा। इसके बाद सुग्रीव ने अकंपन का सिर धड़ से अलग कर दिया। रावण पुत्र त्रिश्रा का वध हनुमान जी एक शक्तिशाली योद्धा थे और उन्होंने रावण की सेना के कई योद्धाओं को मार डाला था। रावण के पुत्र त्रिश्रा भी एक शक्तिशाली योद्धा था और उसने हनुमान जी को परास्त करने के लिए अपना पूरा दम लगा दिया। दोनों योद्धाओं के बीच एक भयंकर मल्लयुद्ध हुआ। त्रिश्रा ने अपनी तलवार से हनुमान जी पर कई प्रहार किए, लेकिन हनुमान जी ने सभी प्रहारों को अपने हाथों से रोक लिया। अंत में, हनुमान जी ने त्रिश्रा को अपने हाथों से पकड़ लिया और उसकी तलवार को छीन लिया। इसके बाद हनुमान जी ने उसी तलवार से त्रिश्रा का वध कर दिया। रावण पुत्र निकुंभ का वध बाली पुत्र अंगद भी एक शक्तिशाली योद्धा थे और उन्होंने रावण की सेना के कई योद्धाओं को मार डाला था। रावण के पुत्र निकुंभ भी एक शक्तिशाली योद्धा था और उसने अंगद को परास्त करने के लिए अपना पूरा दम लगा दिया। दोनों योद्धाओं के बीच एक भयंकर युद्ध हुआ। निकुंभ ने अपनी गदा से अंगद पर कई प्रहार किए, लेकिन अंगद ने सभी प्रहारों को अपनी गदा से

रावण के पुत्रो का अंत। लक्ष्मण द्वारा अतिकाय का वध | Atikai Vadh Ramayan Story in Hindi Read More »

कुम्भकरण- रावण संवाद श्रीराम द्वारा कुम्भकरण का वध Ramayan- Kumbhkaran Vadh Story in Hindi

प्रथम दिन के युद्ध में रावण श्रीराम से पराजित हो जाता है। यह पराजय रावण के लिए एक बड़ा झटका होती है। वह समझता है कि श्रीराम कोई साधारण योद्धा नहीं हैं। उनकी शक्ति ब्रह्मा, विष्णु, महेश की तरह है। रावण अपनी चिंता को दूर करने के लिए अपने गुप्तचरों को चारों दिशाओं में भेजता है। वह उन्हें आदेश देता है कि वह चारों दिशाओं से असुर शक्ति को संगठित करके लाएं। ताकि राम की वानर सेना को युद्ध में हराया जा सके। तभी रावण के नाना माल्यवान जी वहां पर आते हैं। वे रावण को चिंता में देखकर इसका कारण पूछते हैं। रावण की चिंता का कारण Raavan ki chinta ka kaaran रावण अपनी चिंता का कारण बताते हुए माल्यवान जी से कहता है कि, “नानाजी, मैंने राम को जितना साधारण सोचा था वह उतना साधारण शत्रु नहीं है। आज के युद्ध में उसने मुझे एक योद्धा की तरह नहीं बल्कि एक बालक की तरह परास्त करके भगा दिया है। राम की शक्ति ब्रह्मा, विष्णु, महेश की तरह है। इसलिए उससे युद्ध में जीतने के लिए हमें पृथ्वीलोक की सारी असुर शक्ति की आवश्यकता होगी। इसलिए हमने पृथ्वी के सभी भागों से असुर शक्ति को संगठित करने का आदेश दिया है।” माल्यवान जी की सलाह maalyavaan jee kee salaah माल्यवान जी रावण को समझाते हैं कि, “रावण, तुम चिंता मत करो। राम से युद्ध में जीतना तुम्हारे लिए संभव है। तुम एक शक्तिशाली योद्धा हो और तुम्हारे पास एक बड़ी सेना है। तुम यदि रणनीति से युद्ध करोगे तो तुम राम को पराजित कर सकते हो।” रावण की प्रतिक्रिया raavan kee pratikriya रावण माल्यवान जी की बातों से सहमत होता है। वह उन्हें आश्वासन देता है कि वह राम से युद्ध में जीतने के लिए पूरी तैयारी करेगा। रावण को माल्यवान का परामर्श Ravan ko maalyavaan ka paramarsh रावण प्रथम दिन के युद्ध में श्रीराम से पराजित होकर बहुत चिंतित हो गया। उसने अपने नाना माल्यवान जी को बताया कि वह श्रीराम के बारे में गलत सोचता था। वह कोई साधारण शत्रु नहीं है और उसकी शक्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान है। रावण ने पृथ्वी के सभी भागों से सारी असुर शक्ति को संगठित करने का आदेश दिया था ताकि राम की वानर सेना को हराया जा सके। रामायण युद्ध का पहला दिन। Ramayan Battale 1st Day story in Hindi माल्यवान जी ने रावण को समझाया कि उसे चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। वह एक शक्तिशाली योद्धा है और उसके पास एक बहुत बड़ी सेना है। अगर वह रणनीति के साथ युद्ध करेगा तो वह राम से युद्ध में जीत सकता है। कौन था कुंभकरण kaun tha kumbhakaran कुंभकरण रामायण Ramayan के एक प्रमुख पात्र हैं। वह रावण का छोटा भाई था। वह एक शक्तिशाली और कुशल योद्धा था। वह अपने भयंकर रूप और शक्ति के लिए जाना जाता था। वह एक विशालकाय राक्षस था, जिसके हाथों में दो विशाल तलवारें थीं। कुंभकरण का जन्म ऋषि व्रिश्रवा और राक्षसी कैकसी के पुत्र के रूप में हुआ था। वह रावण, विभीषण और शूर्पनखा का बड़ा भाई था। कुंभकरण को नींद का वरदान प्राप्त था। वह छह महीने तक सोता रहता था और फिर जागता था। वह अपने जीवन में केवल एक बार जागता था। रामायण युद्ध के दौरान, कुंभकरण 60 दिनों तक सोता रहा। जब वह जागा, तो उसने युद्ध में शामिल होने का फैसला किया। वह रावण की सेना का एक महत्वपूर्ण योद्धा था। उसने कई वानर योद्धाओं को मार डाला। अंत में, कुंभकरण का सामना हनुमान से हुआ। हनुमान ने कुंभकरण को मार डाला। कुंभकरण की मृत्यु से रावण की सेना को एक बड़ा झटका लगा। कुंभकरण के व्यक्तित्व के कुछ प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं: कुंभकरण की मृत्यु का महत्व निम्नलिखित है: कुंभकरण का जागना kumbhakaran ka jagana कुंभकरण का जागना रामायण युद्ध का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। कुंभकरण रावण का छोटा भाई था और वह एक शक्तिशाली और कुशल योद्धा था। उसे नींद का वरदान प्राप्त था। वह छह महीने तक सोता रहता था और फिर जागता था। वह अपने जीवन में केवल एक बार जागता था। रामायण Ramayan युद्ध के दौरान, कुंभकरण 60 दिनों तक सोता रहा। जब वह जागा, तो उसने युद्ध में शामिल होने का फैसला किया। वह रावण की सेना का एक महत्वपूर्ण योद्धा था। उसने कई वानर योद्धाओं को मार डाला। अंत में, कुंभकरण का सामना हनुमान से हुआ। हनुमान ने कुंभकरण को मार डाला। कुंभकरण की मृत्यु से रावण की सेना को एक बड़ा झटका लगा। कुंभकरण का जागना निम्नलिखित कारणों से महत्वपूर्ण था: कुंभकरण का जागना कैसे हुआ ऐसे समय में, कुंभकरण जागा। उसने देखा कि रावण की सेना हार रही है। वह अपने भाई, रावण का समर्थन करने के लिए युद्ध में शामिल होने का फैसला किया। कुंभकरण ने युद्ध में कई वानर योद्धाओं को मार डाला। उसने हनुमान को भी चुनौती दी। हनुमान और कुंभकरण का युद्ध बहुत ही भयंकर था। दोनों योद्धाओं ने अपनी पूरी ताकत झोंकी। अंत में, हनुमान ने कुंभकरण को मार डाला। कुंभकरण की मृत्यु से रावण की सेना को एक बड़ा झटका लगा। कुंभकरण द्वारा रावण को उपदेश  कुंभकरण का रावण से उपदेश कुंभकरण रावण का छोटा भाई था। वह एक शक्तिशाली और कुशल योद्धा था। उसे नींद का वरदान प्राप्त था। वह छह महीने तक सोता रहता था और फिर जागता था। वह अपने जीवन में केवल एक बार जागता था। रामायण युद्ध के दौरान, कुंभकरण 60 दिनों तक सोता रहा। जब वह जागा, तो उसने देखा कि रावण की सेना हार रही है। वानर सेना रावण की सेना पर बढ़त बना रही थी। कुंभकरण ने अपने भाई, रावण को उपदेश देते हुए कहा: “हे रावण! तुमने सीता का अपहरण करके एक बड़ा पाप किया है। तुमने धर्म का उल्लंघन किया है। तुम अब पराजय के कगार पर खड़े हो। मैं तुम्हें सलाह देता हूं कि तुम शीघ्र ही सीता को राम को लौटा दो और युद्ध विराम का प्रस्ताव रखो। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे, तो तुम्हारा और तुम्हारे राज्य का नाश हो जाएगा। मैं तुम्हें याद दिलाता हूं कि तुम मेरे पिता, ऋषि व्रिश्रवा के शिष्य हो। तुमने उनसे धर्म और न्याय की शिक्षा प्राप्त की है।

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रामायण युद्ध का पहला दिन। Ramayan Battale 1st Day story in Hindi

युद्ध की शुरुआत में, रावण ने अपनी सेना का नेतृत्व अपने सेनापति प्रहस्त को सौंपा। प्रहस्त एक शक्तिशाली योद्धा था और उसने वानर सेना में कोहराम मचा दिया। वह एक-एक करके वानर सेना के योद्धाओं को मारने लगा। Sugreev dwara vajramushti ka vadh सुग्रीव द्वारा वज्रमुष्टि का वध  सुग्रीव द्वारा वज्रमुष्टि का वध रामायण युद्ध के प्रथम दिन की एक महत्वपूर्ण घटना थी। इस घटना से रावण की सेना में भगदड़ मच गई और वानर सेना को एक बड़ी जीत मिली। वज्रमुष्टि रावण का एक शक्तिशाली योद्धा था। वह अपने भयंकर रूप और शक्ति के लिए जाना जाता था। वह एक विशाल वृक्ष की तरह लंबा था और उसके हाथों में दो विशाल गदाएँ थीं। युद्ध के प्रथम दिन, वज्रमुष्टि ने वानर सेना में कोहराम मचा दिया। वह एक-एक करके वानर सेना के योद्धाओं को मारने लगा। उसकी शक्ति और भयंकर रूप से वानर सेना के योद्धा घबरा गए थे। सुग्रीव ने वज्रमुष्टि को रोकने के लिए आगे बढ़े। उन्होंने वज्रमुष्टि से युद्ध किया और अंत में उसे मार डाला। सुग्रीव ने अपने शक्तिशाली वार से वज्रमुष्टि की एक गदा को तोड़ दिया और दूसरी गदा से उसे मार डाला। वज्रमुष्टि के वध से रावण की सेना में भगदड़ मच गई। वानर सेना के योद्धाओं को विश्वास हो गया कि वे रावण की सेना को परास्त कर सकते हैं। Rawan रावण द्वारा शांति प्रस्ताव अस्वीकार करना। रामायण युद्ध का आरंभ। Battle of Ramayan in Hindi सुग्रीव द्वारा वज्रमुष्टि के वध के परिणाम sugreev dwara vajramushti ke vadh ke parinaam सुग्रीव द्वारा वज्रमुष्टि का वध एक महत्वपूर्ण घटना थी। इस घटना से रावण की सेना में भगदड़ मच गई और वानर सेना को एक बड़ी जीत मिली। हनुमान के हाथो सेनानायक दुर्मुख का वध (Hanumaan ke haatho senaanaayak durmukh ka vadh) रामायण (Ramayan ) युद्ध के प्रथम दिन, हनुमान ने रावण के सेनापति दुर्मुख का वध किया। यह एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने युद्ध के रुख को बदल दिया। दुर्मुख रावण का एक शक्तिशाली और कुशल योद्धा था। वह अपने भयंकर रूप और शक्ति के लिए जाना जाता था। वह एक विशाल वृक्ष की तरह लंबा था और उसके हाथों में एक विशाल तलवार थी। युद्ध के प्रथम दिन, दुर्मुख ने वानर सेना में कोहराम मचा दिया। वह एक-एक करके वानर सेना के योद्धाओं को मारने लगा। उसकी शक्ति और भयंकर रूप से वानर सेना के योद्धा घबरा गए थे। हनुमान ने दुर्मुख को रोकने के लिए आगे बढ़े। उन्होंने दुर्मुख से युद्ध किया और अंत में उसे मार डाला। हनुमान ने अपने शक्तिशाली वार से दुर्मुख की तलवार को तोड़ दिया और उसे मार डाला। दुर्मुख के वध से रावण की सेना में भगदड़ मच गई। वानर सेना के योद्धाओं को विश्वास हो गया कि वे रावण की सेना को परास्त कर सकते हैं। हनुमान द्वारा दुर्मुख के वध के परिणाम Hanumaan dwara durmukh ke vadh ke parinaam हनुमान द्वारा दुर्मुख का वध एक महत्वपूर्ण घटना थी। इस घटना से युद्ध के रुख को बदल दिया और वानर सेना को एक बड़ी जीत मिली। हनुमान और दुर्मुख का युद्ध Hanuman or durmukh ka yudh हनुमान और दुर्मुख का युद्ध एक भयंकर युद्ध था। दोनों योद्धाओं ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। हनुमान ने अपने शक्तिशाली वार से दुर्मुख के कई अस्त्र-शस्त्रों को नष्ट कर दिया। दुर्मुख भी हनुमान को घायल करने में सफल रहा। युद्ध बहुत ही लंबा और कठिन था। अंत में, हनुमान ने अपने शक्तिशाली वार से दुर्मुख को मार डाला। दुर्मुख की मृत्यु से रावण की सेना में भगदड़ मच गई। हनुमान द्वारा दुर्मुख के वध का महत्व Hanumaan dvaara durmukh ke vadh ka mahatv दुर्मुख रावण का एक शक्तिशाली और कुशल योद्धा था। उसका वध रावण की सेना के लिए एक बड़ा झटका था। इस घटना से वानर सेना को विश्वास हो गया कि वे रावण की सेना को परास्त कर सकते हैं। हनुमान द्वारा दुर्मुख का वध एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने युद्ध के रुख को बदल दिया। इस घटना से वानर सेना को एक बड़ी जीत मिली और रावण की सेना में भगदड़ मच गई। लक्ष्मण के द्वारा रावण-पुत्र प्रहस्थ का वध Lakshman ke dvaara raavan-putr prahasth ka vadh रामायण Ramayan युद्ध के प्रथम दिन, लक्ष्मण ने रावण के पुत्र प्रहस्त का वध किया। यह एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने युद्ध के रुख को बदल दिया। प्रहस्त रावण का एक शक्तिशाली और कुशल योद्धा था। वह अपने भयंकर रूप और शक्ति के लिए जाना जाता था। वह एक विशाल वृक्ष की तरह लंबा था और उसके हाथों में एक विशाल तलवार थी। युद्ध के प्रथम दिन, प्रहस्त ने वानर सेना में कोहराम मचा दिया। वह एक-एक करके वानर सेना के योद्धाओं को मारने लगा। उसकी शक्ति और भयंकर रूप से वानर सेना के योद्धा घबरा गए थे। लक्ष्मण ने प्रहस्त को रोकने के लिए आगे बढ़े। उन्होंने प्रहस्त से युद्ध किया और अंत में उसे मार डाला। लक्ष्मण ने अपने शक्तिशाली वार से प्रहस्त की तलवार को तोड़ दिया और उसे मार डाला। प्रहस्त के वध से रावण की सेना में भगदड़ मच गई। वानर सेना के योद्धाओं को विश्वास हो गया कि वे रावण की सेना को परास्त कर सकते हैं। लक्ष्मण द्वारा प्रहस्त के वध के परिणाम Lakshman dvaara prahast ke vadh ke parinaam लक्ष्मण और प्रहस्त का युद्ध Battle of Lakshman and Prahastha लक्ष्मण और प्रहस्त का युद्ध एक भयंकर युद्ध था। दोनों योद्धाओं ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। लक्ष्मण ने अपने शक्तिशाली वार से प्रहस्त के कई अस्त्र-शस्त्रों को नष्ट कर दिया। प्रहस्त भी लक्ष्मण को घायल करने में सफल रहा। युद्ध बहुत ही लंबा और कठिन था। अंत में, लक्ष्मण ने अपने शक्तिशाली वार से प्रहस्त को मार डाला। प्रहस्त की मृत्यु से रावण की सेना में भगदड़ मच गई। लक्ष्मण द्वारा प्रहस्त के वध का महत्व Lakshman dvaara prahast ke vadh ka mahatv प्रहस्त रावण का एक शक्तिशाली और कुशल योद्धा था। उसका वध रावण की सेना के लिए एक बड़ा झटका था। इस घटना से वानर सेना को विश्वास हो गया कि वे रावण की सेना को परास्त कर सकते हैं। लक्ष्मण द्वारा प्रहस्त का वध एक महत्वपूर्ण घटना थी जिसने युद्ध के रुख को

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Rawan रावण द्वारा शांति प्रस्ताव अस्वीकार करना। रामायण युद्ध का आरंभ। Battle of Ramayan in Hindi

Rawan Dwara shree ram रावण द्वारा श्रीराम के शांति प्रस्ताव को अस्वीकार करना । राम अंगद संवाद। युद्ध का आरंभ (रामायण की संपूर्ण कहानी) रावण को शांति प्रस्ताव पर विचार करने के लिए एक रात का समय देकर युवराज अंगद वापस आ जाते हैं युवराज अंगद रावण के दरबार में शांति प्रस्ताव लेकर जाते हैं। वे रावण को बताते हैं कि श्री राम चाहते हैं कि सीता को वापस कर दिया जाए और युद्ध से बचा जा सके। रावण अंगद की बात सुनकर हंसता है और कहता है कि वह सीता को कभी नहीं छोड़ेगा। रावण के दरबार में हुई सभी गतिविधियों के कारण लंका के सभी प्रियजन सोचने पर मजबूर हो जाते हैं रावण के दरबार में हुई सभी गतिविधियों के कारण लंका के सभी प्रियजन सोचने पर मजबूर हो जाते हैं। वे सोचते हैं कि श्री राम का एक दूत हनुमान पूरी लंका को जला कर चला गया था और दूसरा दूत अंगद सभी योद्धाओं को चुनौती देकर चला गया था, लेकिन कोई उसकी चुनौती का सामना नहीं कर पाया और वह पूरी सभा को लज्जित करके चला गया। अंगद रावण संवाद तथा अंगद का पैर। Angad’s Foot Story in Hindi लंका के प्रियजनों को चिंता होती है लंका के प्रियजनों को चिंता होती है कि श्री राम की सेना बहुत शक्तिशाली है और रावण को पराजित करना बहुत मुश्किल होगा। वे रावण को समझाते हैं कि वह सीता को वापस कर दे और युद्ध से बच जाए। रावण हार मानने को तैयार नहीं होता लेकिन रावण हार मानने को तैयार नहीं होता। वह कहता है कि वह सीता को कभी नहीं छोड़ेगा और वह श्री राम से युद्ध करके ही दम लेगा। लंका में युद्ध की आशंका बढ़ जाती है रावण के इस कथन से लंका में युद्ध की आशंका बढ़ जाती है। सभी लोग भयभीत हो जाते हैं। लंका के प्रियजनों की चिंता का कारण लंका के प्रियजनों की चिंता का कारण यह था कि श्री राम की सेना बहुत शक्तिशाली थी। हनुमान ने पूरी लंका को जला दिया था और अंगद ने सभी योद्धाओं को चुनौती देकर लज्जित कर दिया था। इससे स्पष्ट था कि श्री राम की सेना रावण की सेना से कहीं अधिक शक्तिशाली थी। Rawan रावण के हार मानने से इंकार रावण हार मानने को तैयार नहीं था। वह सीता को कभी नहीं छोड़ना चाहता था। वह जानता था कि श्री राम से युद्ध करना बहुत मुश्किल होगा, लेकिन वह हार मानने वाला नहीं था। लंका में युद्ध की आशंका रावण के हार मानने से इंकार करने से लंका में युद्ध की आशंका बढ़ गई। सभी लोग भयभीत थे। वे नहीं जानते थे कि युद्ध में क्या होगा। नाना माल्यवान द्वारा रावण को समझाना इसी विचार से महाराजा रावण के नानाजी माल्यवान ने रावण को समझाने का प्रयत्न किया कि, हे दशानन,  जिनके केवल दो दूत लंका के सभी योद्धाओं का सर शर्म से झुका कर चले गए हो वह कोई साधारण मानव तो नहीं हो सकता। इसलिए मेरा मत आपको यही है कि इस युद्ध का जो मुख्य कारण आपका सीता को अपनी पत्नी बनाने हठ है, उसे त्याग दीजिए। इसी में लंका तथा असुर जाति की भलाई है । एक सफल राजा वही होता है जो को केवल अपने हित के स्थान पर अपनी प्रजा का हित सर्वोपरी रखे। साथ ही यह भी सोचने योग्य बात है कि शांति प्रस्ताव शत्रु की तरफ से आया है इसलिए तुम्हारा पलड़ा अभी भी भारी माना जाएगा यदि तुम शांति प्रस्ताव स्वीकार कर लेते हो । लेकिन अहंकार के वश में लंकेश रावण तथा उनका पराक्रमी पुत्र इंद्रजीत माल्यवान जी के परामर्श को नकार देते हैं। Rawan रावण का उसके ससुर से संवाद (मय दानव) वहीं दूसरी ओर रावण की पत्नी मंदोदरी अपने पति को लेकर बहुत चिंतित थी इसलिए उन्होंने अपने पिता मय दानव से रावण को समझाने का आग्रह किया। अपनी पुत्री के आग्रह पर रावण के ससुर, मय दानव,  रावण को आने वाली विपत्ति से सचेत करते हुए कहते है की, हे रावण, श्रीराम कोई साधारण मानव नहीं है स्वयं नारायण का अवतार है जोकि असुरों का अंत करने के लिए इस पृथ्वी पर आए हैं। आप यह सपष्ट देख चुके हैं कि समुद्र पर सेतु बंधन जैसे असंभव कार्य को भी उन्होंने संभव करके दिखाया है। उनका केवल एक वानर दूत हनुमान लंका को जलाकर तथा आपके पुत्र अक्षय कुमार का अंत करके चला गया। उनका एक वानर अंगद आपके सभी योद्धाओं के मस्तक अपने पैरों में झुका कर चला गया और कोई कुछ भी नहीं कर पाया। आपको सुमति देने वाला आपका छोटा भाई विभीषण आपके त्याग के कारण आपके शत्रुओं से जा मिला है। यह कोई छोटी बात नहीं है। इसीलिए अभी भी समय है हम चाहे तो स्थिति को सुधार सकते हैं। सीता का मोह त्याग कर उसे उसके पति के पास पहुंचा दीजिए तो यह आने वाला संकट टल जाएगा। अन्यथा उनका सर्वनाश होने को है। लेकिन  अपने अहंकार के कारण रावण ने उनके परामर्श को भी ठुकरा दिए ।  अंत में रावण की माता कैकसी ने भी उसे समझाने का बहुत प्रयत्न किया और कहां की तुम्हारे पिता ने भविष्यवाणी की थी कि भगवान विष्णु एक मानव का अवतार लेकर पृथ्वी पर आयेंगे तब तुम्हारे पुत्र रावण का अहंकार टूट जाएगा किंतु विभीषण के कारण असुर जाति का पूर्ण नाश होने से बच जाएगा। लेकिन अपने प्रतिष्ठा और शान के खिलाफ समझकर रावण ने अपने नाना माल्यवान, ससुर मय दानव और अपनी माताजी कैकसी के परामर्श को ठुकरा दिया। Rawan राम अंगद संवाद । युद्ध का निश्चय  वहीं दूसरी ओर श्रीराम अंगद की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि तुमने एक दूत के कुशल गुणों को सार्थक किया है किस तरह तुमने अपने प्रभावी संचार कौशल द्वारा रावण के सभी योद्धाओं को चुनौती दी तथा अपने स्वामी का संदेश इतने प्रभावी तरीके से उन्हें सुनाया की उनके सभी योद्धाओं को लज्जित करके अपने पैरो में उनके सर झुका दिए। यहां तक लंकापति रावण सबसे उसका मुकुट उसके मस्तक से उतारकर हमारे चरणों में ले आए। लक्ष्मण जी ने भी अंगद के इस साहसपूर्ण कार्य कि बहुत सराहना की। वही सभा में विभीषण के गुप्तचरो द्वारा दिए गए

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अंगद रावण संवाद तथा अंगद का पैर। Angad’s Foot Story in Hindi

अंगद का पैर। रावण और अंगद का संवाद। रावण को अंतिम शांति प्रस्ताव। Ram setu राम सेतु निर्माण के बाद समस्त वानर सेना लंका पहुंचती है राम सेतु निर्माण के बाद समस्त वानर सेना समुद्र को पार करके लंका तक पहुंच जाती है। लंका पहुंचने के बाद श्री राम सुग्रीव को आदेश देते हैं कि वह अपने-अपने पड़ाव यहां डालें। वानर सैनिक वहां पर अपने-अपने तंबू खड़े करने में व्यस्त हो जाते हैं। Rawan रावण अपने गुप्तचरों को श्री राम की सेना में भेजता है राम की सेना लंका में प्रवेश कर चुकी है यह खबर सुनकर लंका के राजा रावण भी आश्चर्य में पड़ जाता है। वह अपने गुप्तचरों को श्री राम की सेना में भेजकर उनके भेद जानने के लिए कहता है। सुख और सारन भेष बदलकर श्री राम की सेना में घुसते हैं रावण के दो गुप्तचर, जिनमें एक रावण का खास सैनिक था जिनके नाम सुख और सारन था, भेष बदलकर श्री राम की सेना में घुस जाते हैं। वे स्वयं को वानर सेना के दो सैनिक के रूप में पेश करते हैं और श्री राम की सेना में घुसने में सफल हो जाते हैं। सुख और सारन श्री राम की सेना का भेद जानने की कोशिश करते हैं सुख और सारन श्री राम की सेना के बीच घूमते हुए उनका दल बल और युद्ध की रणनीति का पता लगाने की कोशिश करते हैं। वे वानर सैनिकों से बात करते हैं और उनसे उनके बल और पराक्रम के बारे में पूछते हैं। सुख और सारन को श्री राम की सेना का भेद नहीं मिल पाता लेकिन वानर सैनिक सुख और सारन को कोई भी महत्वपूर्ण जानकारी नहीं देते हैं। वे उन्हें बताते हैं कि श्री राम और उनकी सेना बहुत शक्तिशाली है और वे रावण को निश्चित रूप से पराजित करेंगे। वानर सेना का लंका प्रस्थान तथा राम सेतु निर्माण । Ram Setu Nirman Story in Hindi सुख और सारन वापस लंका जाते हैं और रावण को रिपोर्ट करते हैं अंत में, सुख और सारन लंका वापस जाते हैं और रावण को रिपोर्ट करते हैं कि श्री राम और उनकी सेना बहुत शक्तिशाली है। वे रावण को बताते हैं कि श्री राम को पराजित करना बहुत मुश्किल होगा। रावण सुख और सारन की रिपोर्ट सुनकर चिंतित हो जाता है रावण सुख और सारन की रिपोर्ट सुनकर चिंतित हो जाता है। वह जानता है कि श्री राम और उनकी सेना को पराजित करना बहुत मुश्किल होगा। लेकिन वह हार मानने वाला नहीं है। वह श्री राम और उनकी सेना से युद्ध करने के लिए तैयार हो जाता है। Rawan रावण के गुप्तचर  रावण के गुप्तचर सुख और सारन वानर सैनिकों का वेश धारण करके श्री राम की सेना में इधर-उधर घूम रहे थे ताकि उनकी पूरी छावनी की व्युह्रचना रचना का भेद जान सकें। लेकिन विभीषण उन दोनों को पहचान जाते हैं और उन्हें पकड़कर श्री राम के समक्ष लेकर आते हैं। लक्ष्मण, जामवंत, अंगद, और सुग्रीव आदि सभी श्रीराम से आग्रह करते हैं कि उन दोनों गुप्तचरों को मृत्युदंड दिया जाए क्योंकि युद्ध नीति यही कहती है । एक गुप्त चर यदि पकड़ा जाए तो उसके लिए मृत्युदंड का ही विधान है। लेकिन श्री राम, रावण के दोनों को गुप्तचरों का छोड़ने का आदेश देते हैं और कहते हैं कि युद्ध में विजय और पराजय केवल गुप्तचरों पर निर्भर नहीं करते और यदि ऐसा है तो योद्धा का रण कौशल और पराक्रमी होने व्यर्थ है। इसलिए श्रीराम दोनों लोग गुप्तचरों को मुक्त करने का आदेश देते हैं उन दोनों को यह भी कहते हैं कि, यदि तुमने हमारी पूरी छावनी का अवलोकन न किया हो तो तुम अभी भी पूरी छावनी का अवलोकन कर सकते हो बल्कि महाराज विभीषण तुम्हें खुद अवलोकन करवाएंगे। श्रीराम के मुख से ऐसे वाक्य सुनकर दोनों गुप्तचर उनके पैरों में गिर जाते हैं और बोलते हैं कि हे कृपा निधान, हम तो मृत्यु के पात्र हैं, लेकिन फिर भी आप हमें मुक्त कर रहे हैं । वाकई में आप जैसा उदार और दयालु शत्रु हमने आज तक नहीं देखा। यह कहकर दोनों गुप्तचर चले जाते हैं। जब यह खबर रावण को पता चलती है तो वह अपने दोनों गुप्तचरों को धिक्कारता है और कहता है कि तुमने अपने प्राणों के भय से आत्मसमर्पण कर दिया।  Angad अंगद को दूत बनाकर भेजना  अगले दिन श्रीराम की सेना लंका पर चढ़ाई करने के लिए तैयार थी। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अंतिम बार रावण को अवसर देने का विचार किया। इसलिए उन्होंने एक बार फिर रावण के पास शांति प्रस्ताव भेजने का निश्चय किया। श्री राम की तरफ से रावण को शांति प्रस्ताव देने के लिए बाली पुत्र अंगद को चुना जाता है। जबकि लक्ष्मण जी बजरंगबली हनुमान को दूत बनाकर भेजने का परामर्श देते है लेकिन श्रीराम ने यह सोच कर उन्हें दूत बनाकर नहीं भेजा क्योंकि वह पहले भी रावण के दरबार में जा चुके हैं। इससे रावण को यही लगेगा कि हमारी  सेना में हनुमान के अतिरिक्त कोई वीर वानर नही है। युवराज अंगद को शांति प्रस्ताव लेकर लंका में भेजा जाता है। लंका के द्वार रक्षक अंगद को महाराज रावण के दरबार में ले जाते हैं। रावण के दरबार में अंगद का एक दूत की तरह सम्मान न होने के कारण वह बोलता है।  Angad or Rawan अंगद रावण संवाद हे रावण, मैं श्रीराम का दूत हु इसलिए आपका कर्तव्य था की मुझे एक दूत की तरह सम्मान देकर मेरे लिए एक आसन की व्यवस्था होनी चाहिए थी । किंतु आपने ऐसा नहीं किया इसलिए मेरा यह धर्म बनता है की मैं यहां से लौट जाऊं। लेकिन मेरे ऐसा करने से श्रीराम प्रभु का संदेश आप तक नहीं पहुंच पाएगा। इसीलिए मैं स्वयं ही अपने लिए एक उचित आसन का प्रबंध करता हूं। इतना कहकर अंगद अपनी पूंछ से रावण के सिंहासन जितना ऊंचा आसन बना लेता है , और इस पर बैठकर बोलता है… हे लंकापति रावण, मैं महाराज बाली का पुत्र अंगद हूं। मेरे प्रभु श्री राम ने मुझे आपको अंतिम अवसर के रूप में शांति प्रस्ताव सुनाने के लिए भेजा है । अतः श्रीराम का संदेश ध्यान से सुने ।  हे रावण, आप त्रिलोक विजयी, अत्यंत शक्तिशाली,

अंगद रावण संवाद तथा अंगद का पैर। Angad’s Foot Story in Hindi Read More »

वानर सेना का लंका प्रस्थान तथा राम सेतु निर्माण । Ram Setu Nirman Story in Hindi

रामायण ( Ramayana) के अनुसार, भगवान राम की पत्नी सीता को रावण ने लंका ले जाकर कैद कर लिया था। भगवान राम ने सीता को बचाने के लिए लंका पर आक्रमण करने का फैसला किया। लेकिन लंका भारत से बहुत दूर थी। भगवान राम की सेना को लंका तक पहुंचने के लिए एक पुल की जरूरत थी। भगवान राम ने समुद्र देवता से पुल बनाने की अनुमति मांगी। समुद्र देवता ने पुल बनाने की अनुमति दी, लेकिन उन्होंने कहा कि पुल बनाने के लिए केवल पत्थर ही इस्तेमाल किए जा सकते हैं। विभीषण तथा श्रीराम की पहली भेंट | श्रीराम तथा समुंद्र का संवाद  |वानर सेना का लंका प्रस्थान Ram Setu Nirman राम सेतु का निर्माण | (सम्पूर्ण रामायण की कहानी )अपने जलती हुई पूंछ की आग बुझाने के बाद बजरंगबली हनुमान अंतिम बार माता सीता से मिलने के लिए जाते हैं। माता सीता गहरी चिंता में डूबी हुई थी । जब से उन्हें खबर मिली थी कि रावण ने हनुमान की पूंछ में आग लगा देने का आदेश दिया है। इसलिए माता सीता ने अग्नि देव से प्रार्थना की थी कि वह हनुमान की पूंछ का एक बाल भी ना जलाएं। और हुआ भी यही, के अपने जलती हुए पूंछ से बजरंगबली हनुमान ने रावण की पूरी लंका जला दी लेकिन उनकी पूंछ का एक बाल भी नहीं जला। राम सेतु निर्माण (Ram Setu Nirman ) अतः हनुमान आकर माता सीता को प्रणाम करते हैं और श्री राम के लिए कोई अपना संदेश देने के लिए कहते हैं। माता सीता हनुमान को भेंट के प्रमाण के रूप में यह बात बताती है कि जब इंद्र के पुत्र जयंत ने एक कौवे का रूप लेकर उनके पैर पर चोट मारी थी तब श्रीराम ने कुशा के एक तिनके को मंत्र उपचार के द्वारा उसके पीछे छोड़ा था कि वह तीनों लोगों में घूम कर भी उससे बच नहीं पाया था। अंत में वह खुद श्री राम की शरण में आया तब उसके प्राण बचे थे और तब श्री राम ने उसे एक आंख से काना करके छोड़ दिया था। Shree ram ko sita ki bhet श्रीराम को सीता से भेंट की शुभ समाचार मिलना हनुमान जी माता सीता से मिलने के बाद उनके वचनों को ध्यान से सुनते हैं। माता सीता उनसे बताती हैं कि वे लंका में कैद हैं, लेकिन उनका मन और शरीर स्वस्थ है। वे श्री राम के प्रति अपनी निष्ठा और प्रेम व्यक्त करती हैं। हनुमान जी माता सीता का संदेश सुनकर प्रसन्न होते हैं। वे तुरंत उड़कर श्री राम के पास लौट आते हैं। shree ram or Hanuman श्री राम को हनुमान जी का संदेश सुनाकर प्रसन्न होते हैं हनुमान जी श्री राम के सामने आते हैं और उन्हें माता सीता का संदेश सुनाते हैं। यह सुनकर श्री राम बहुत प्रसन्न होते हैं। वे हनुमान जी को अपने हृदय से लगा लेते हैं और कहते हैं, “हनुमान, तुमने आज मेरा सबसे प्रिय कार्य किया है। अगर तुम सीता का पता नहीं लगाते तो अपने कुल की मर्यादा की रक्षा न कर पाने के कारण मैं अपने पूर्वजों को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहता। आज केवल तुम्हारे कारण ही मुझे सीता के सकुशल होने का संदेश मिला है।” श्री राम लंका पर आक्रमण का निर्णय लेते हैं श्री राम माता सीता के संदेश से यह जान जाते हैं कि रावण ने सीता को कैद कर रखा है। वे लंका पर आक्रमण करने का निर्णय लेते हैं। वे सुग्रीव को आदेश देते हैं कि वह अपनी सेना को तैयार करे। सुग्रीव और वानर सेना श्री राम को सेनापति बनाना चाहते हैं सुग्रीव और वानर सेना श्री राम को सेनापति बनाना चाहते हैं। वे कहते हैं कि श्री राम ही हमारे सेनापति हो सकते हैं। श्री राम के नेतृत्व में हम रावण को हरा सकते हैं। श्री राम सुग्रीव के आग्रह को स्वीकार करते हैं और वानर सेना के सेनापति बन जाते हैं। लंका पर आक्रमण का मार्ग प्रशस्त होता है हनुमान जी के आगमन और श्री राम के सेनापति बनने से लंका पर आक्रमण का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। श्री राम और उनकी वानर सेना लंका पर आक्रमण करने के लिए तैयार हो जाती है। वानर सेना का लंका के लिए प्रस्थान अगले दिन श्रीराम तथा सुग्रीव की पूरी वानर सेना बड़े जोश के साथ लंका के लिए कूच करती है। “हर हर महादेव” के नारे लगाते हुए सारी सेना उत्साह तथा उमंग के साथ आगे बढ़ती है। लंका के लिए प्रस्थान के कुछ ही दिनों बाद सुग्रीव की पूरी वानर सेना समुद्र तट पर पहुंच जाते हैं जहां से लंका तथा उनके बीच केवल सौ योजन का समुद्र लहरा रहा था। समुद्र की लहरों को देखकर जामवंत जी श्री राम से कहते हैं कि, हे प्रभु। सीता माता की खोज के समय भी हम इसी स्थान पर आकर ठहर गए थे । उस समय बजरंगबली हनुमान की शक्तियों के कारण हमारा कार्य सिद्ध हो गया था, लेकिन अब परिस्थिति अलग है क्योंकि इतनी बड़ी वानर सेना का एक साथ समुद्र पार करना असंभव है।  वानर सेना का लंका प्रस्थान तथा राम सेतु निर्माण । Ram Setu Nirman Story in Hindi वहीं दूसरी ओर लंका में रावण का छोटा भाई विभीषण भरी सभा में रावण को यह सन्मति देने का प्रयास करता है कि वह देवी सीता को श्री राम के पास आदर के साथ पहुंचा दें, इसी में सबकी भलाई है । इस पर रावण उसकी हंसी उड़ाते हुए उसका अनादर करता है तथा लात मारकर उसका मुकुट गिरा देता है। विभीषण का मुकुट गिरते ही पूरी सभा उसपर हंसने लगती हैं तब विभीषण कहता है कि, मैं तुम्हारे ऊपर मंडराते हुए काल को देख रहा हूं। स्वयं महाराज द्वारा मेरा समान मेरी मृत्यु के समान है। इसलिए मैं आज से लंका को छोड़कर जा रहा हूं। ShreeRam श्रीराम तथा विभीषण की भेंट यह कहकर विभीषण अपनी माता से भेंट करके श्रीराम के शरण में आने का फैसला करते हैं तथा वह अपने चार मंत्रियों के साथ वायु मार्ग से होते हुए समुंदर के इस पार बसी श्रीराम के छावनी में आते हैं उनसे शरण मांगते हैं। शरणागत वत्सल श्री राम अपने शत्रु के छोटे भाई को

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लंका दहन तथा हनुमान – रावण संवाद । Lanka Dahan Story in Hindi

रामायण के अनुसार, माता सीता को रावण ने लंका ले जाकर कैद कर लिया था। श्री राम और लक्ष्मण अपनी पत्नी सीता की खोज में निकल पड़े। अपनी यात्रा के दौरान, श्री राम और लक्ष्मण कई बाधाओं का सामना करते हैं। उन्हें राक्षसों का सामना करना पड़ता है, जंगलों में भटकना पड़ता है और कई आश्चर्यजनक घटनाओं का सामना करना पड़ता है। माता सीता से आज्ञा लेकर हनुमान जी अशोक वाटिका के फल तोड़कर खाने लगते हैं। वाटिका में हलचल देखकर वहां के पहरेदार आ जाते हैं और हनुमान जी से युद्ध करने लगते हैं। बजरंगबली हनुमान अपनी शक्ति द्वारा खेल खेल में ही पछाड़ देते हैं।  पहरेदार  जाकर अशोक बगिया के रक्षक जम्बूमाली को बुला कर लाते हैं और कहते हैं कि अशोक वाटिका में एक वानर घुस आया है, वह बड़ा ही बलशाली है। जंबूमाली कुछ सैनिकों के साथ आता है और हनुमान जी उसे भी पूरी तरह से पछाड़कर कर भगा देते हैं। जम्बुमाली तथा उस के सैनिकों को एहसास हो जाता है वह कोई साधारण वानर नहीं है। तब जंबू माली महाराज रावण की सभा में जाकर उनको यह सूचना देता है कि अशोक वाटिका में एक हनुमान नाम का वानर घुस आया है जो कि बहुत अधिक शक्तिशाली है जिसने हमारे सभी सैनिकों को पछाड़ दिया है। वह खुद को श्रीराम का दूत कहता है।  Hanumaan Dvaara Raavan-putr Akshay Kumaar ka Vadh हनुमान द्वारा रावण-पुत्र अक्षय कुमार का वध  तब लंकापति Lanka Dahan रावण जम्बूमली को धिक्कारते हुए कहता है कि तुम एक वानर को नहीं पकड़ सके। उसी सभा में बैठे रावण के पुत्र अक्षय कुमार अत्यधिक अभिमान और क्रोध में जम्बू माली को डांटते हैं और अपने पिता रावण से आज्ञा लेकर रावण पुत्र अक्षय कुमार स्वयं हनुमान को पकड़ने के लिए अशोक वाटिका में आता है। रावण के पुत्र अक्षय कुमार तथा हनुमान के बीच युद्ध शुरू हो जाता है। हनुमान जी अक्षय कुमार के सारे प्रहार विफल कर देते हैं। अक्षय कुमार अपने आसुरी विद्या का प्रयोग करके आकाश में जाकर युद्ध करने लगते हैं लेकिन शायद उसे  बजरंगबली हनुमान की शक्ति का अनुमान नहीं था। अंत में हनुमान जी ने आकाश में ही अक्षय कुमार के पैर पकड़कर उसे इतनी जोर से घुमाया कि उसका शरीर टूटकर दो हिस्सो मे बिखर गया। अपने पुत्र अक्षय कुमार की मृत्यु की खबर सुनकर रावण को भी अहसास हो गया था कि हनुमान कोई साधारण वानर नहीं है।  Hanumaan Aur Indrajeet ka Yuddh हनुमान और इंद्रजीत का युद्ध  इस पर रावण का सबसे प्रिय पुत्र इंद्रजीत जो कि सबसे महापराक्रमी  योद्धा था वह प्रतिशोध लेने की बात कहता है और अपने पिता रावण से कहता है कि वह जाकर उस धूर्त वानर को पकड़ेगा। लंकापति रावण अपने प्रिय पुत्र इंद्रजीत पर अधिक विश्वास करते थे इसलिए उन्होंने कहा कि अगर संभव हो तो उस वानर को जीवित ही पकड़ कर लाना। मैं  देखना चाहता हु की ऐसा कौन सा वानर है जिसे लंकेश की शक्ति का भय नहीं। तब इंद्रजीत अपने दल बल के साथ अशोक वाटिका में आ जाते हैं उन्हें देखकर हनुमान जी भी सचेत हो जाते है। हनुमान और रावण के पुत्र इंद्रजीत में युद्ध शुरू हो जाता है दोनों के बीच घमासान युद्ध होता है इंद्रजीत यह  देखता है कि उसके किसी भी बाण का असर महाबली हनुमान पर नहीं हो रहा है, वह खुद विचलित हो जाता है। अंत में इंद्रजीत ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करता है। हालांकि हनुमान जी को स्वयं ब्रह्मदेव से वरदान प्राप्त था कि ब्रह्मास्त्र या कोई भी अस्त्र उन्हें बांध नहीं सकता, लेकिन हनुमान जी यह देखना चाहते थे कि लंका का राजा रावण कौन है जिसने माता सीता का हरण किया है। इसीलिए हनुमान  ब्रह्मास्त्र को प्रणाम करके अपनी इच्छा से उसमें बंध जाते है।  Hanumaan-raavan sanvaad हनुमान -रावण संवाद  तब हनुमान को बांधकर लंकापति रावण के दरबार में लाया जाता है। हनुमान को देखकर लंकापति रावण आश्चर्य में पड़ जाते हैं कि एक साधारण सा  दिखने वाला वानर उनके महाबली पुत्र अक्षय कुमार का वध कर सकता है। लंकापति रावण पूछता है, बोल वानर तू कौन है? किसने तुझे भेजा है? किस उद्देश्य से हमारे राज्य में प्रवेश किया, अशोक वाटिका को उजाड़ा, और किस वजह से तुमने हमारे पुत्र अक्षय कुमार को मार दिया। तब हनुमान जी ने विद्वान की तरह  उत्तर देते हुए रावण से कहा” महाराज मैं तो केवल अशोक वाटिका में लगे हुए फलों को देखकर अपनी भूख को मिटाने आया था, लेकिन आपके  सैनिकों ने मुझ पर हमला किया और मैंने भी उनका उत्तर दिया। आपके जिस  सैनिक ने मुझ पर प्रहार नहीं किया मैंने उसको कुछ भी नहीं किया केवल उन्हीं का संहार किया जिन्होंने मेरे ऊपर आक्रमण किया और इसी वजह से मुझे आपके पुत्र अक्षय कुमार को परलोक भेजना पड़ा। रावण कहता है की “वानर तुम बहुत चतुर हो तुमने अभी तक अपना परिचय नहीं दिया।  विभीषण-हनुमत मिलन | हनुमान तथा माता सीता का संवाद | Vibhishan or Hanumat Milan in Hindi अपना परिचय देते हुए हनुमान जी ने कहा कि मैं वायुपुत्र हनुमान हूं। मैं अपने स्वामी श्री राम का दूत बनकर उनकी पत्नी सीता की खोज में 400 योजन समुद्र लाँघ  कर आया हूँ । मैं सीता माता से भेंट कर चुका हूं।  मैं तो केवल आपके दर्शन हेतु राज दरबार में आया हूं। वरना कोई भी ब्रह्मास्त्र या पाश मुझे बांध नहीं सकता। हनुमान ने यह भी कहा कि मैं चाहता तो अशोक वाटिका से फल खाकर वापस जा सकता था लेकिन मैं यह देखना चाहता था कि महर्षि पुलत्स के वंश में ऐसा कौन है जिसने भगवती सीता नामक पराई स्त्री का हरण करके अपने कुल को कलंकित किया है।  हनुमान द्वारा इस तरह का आक्षेप सुनकर रावण को क्रोध आ जाता है और वह हनुमान को दंडित करने के लिए मृत्युदंड देने के लिए कहता है। तभी सभा से विभीषण जी उठते हैं और महाराजा रावण से निवेदन करते हैं कि महाराज हनुमान एक दूत बनकर आया है और इसका वध नीति और धर्म के अनुसार उचित नहीं है।   लंका दहन | (Lanka Dahan ) कुछ देर विचार करके रावण कहता है कि वानरों को अपनी पूंछ से बहुत लगा

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विभीषण-हनुमत मिलन | हनुमान तथा माता सीता का संवाद | Vibhishan or Hanumat Milan in Hindi

अशोक वाटिका में सीता माता तथा हनुमान संवाद – रामायण हनुमान विभीषण संवाद श्री राम की आज्ञा का पालन करते हुए, हनुमान जी लंका पहुँचते हैं और अशोक वाटिका में सीता माता को ढूंढते हैं। वे माता सीता को अशोक वाटिका के एक गुप्त स्थान पर पाते हैं। सौ योजन की दुरी तय करने के बाद हनुमान जी लंका पहुंच जाते है। लंका पहुँचने  के बाद हनुमान की पहली भेंट लंका के द्वार पर पहरेदार एक राक्षसी से होती है जोकि स्वयं लंका नगरी होती है। लंका में घुसने के लिए हनुमान जी अति सूक्ष्म रूप धारण करते हैं लेकिन उसके बाद भी वह राक्षसी हनुमान को देख लेती है। वह हनुमान जी को लंका में प्रवेश करने से रोकती है लेकिन हनुमान जी विराट रूप धारण करके अपने मुक्के के प्रहार द्वारा उसके नाक को तोड़ देते हैं। हनुमान जी के प्रहार से वह अधमरी हो जाती  हैं और उनका रास्ता छोड़ देती है। हनुमान जी दोबारा सूक्षम रूप धरकर नगर के फाटक के निचे से लंका में प्रवेश कर जाते हैं और रात्रि के समय हवाई मार्ग से उड़ते हुए लंका के राज महल में सीता माता की खोज करने लगते हैं। लंकापति रावण के कक्ष में हनुमान जी सूक्ष्म रूप धारण कर के जाते हैं जहां पर रावण की पत्नी का रानी मंदोदरी सो रही थी उन्हें देखकर हनुमान जी सोचने लगते है कही ये तो सीता माता नही। लेकिन फिर वह सोचते है की हरण करके लाई गयी सीता माता इस प्रकार महल में नहीं सो सकती।  हनुमान-विभीषण Vibhishan संवाद | विभीषण-हनुमत मिलन  कुछ देर बाद हनुमान जी को एक भवन नजर आता है जिस पर भगवान विष्णु के  सुदर्शन चक्र का निशान बना हुआ था तथा शंख का निशान बना हुआ था। हनुमान जी को आश्चर्य हुआ कि असुरों की नगरी लंका में ऐसा कौन है जिसके घर पर भगवान विष्णु के चिन्ह दिखाई पड़ रहे है। आश्चर्यचकित होकर हनुमान जी निचे उतरते हैं। वह एक ब्राह्मण का वेश धारण करके  चौखट पर अलख जगाते हैं। तब घर के अंदर से विभीषण (Vibhishan ) जी बाहर निकलते हैं जोकि  लंकापति रावण के छोटे भाई थे। बातचीत के दौरान पता चलता है कि विभीषण भगवान विष्णु और श्री राम के परम भक्त है । असुरो की नगरी  लंका में राम भक्त का परिचय पाकर हनुमान जी बहुत प्रसन्न होते हैं और अपना वास्तविक परिचय बताकर विभीषण जी से सीता माता के बारे में पूछते हैं। तब विभीषण Vibhishan हनुमान को बताते हैं कि सीता माता राज महल में नहीं बल्कि लंकापति रावण की अति प्रिय बगिया अशोक वाटिका में है। बहुत से राक्षस पहरेदार उनकी निगरानी करते रहते हैं। सीता माता का पता  पाकर हनुमान जी निश्चय करते हैं कि वह रात्रि के समय सीता माता से भेंट करने के लिए जाएंगे।  अगले ही दिन हनुमान जी रात्रि के समय सूक्ष्म रूप धारण करके लंका की अशोक वाटिका में पहुंच जाते हैं और एक पेड़ के ऊपर छुप कर देखने लगते हैं। तभी उन्हें लंका के राजा के आने की उद्घोषणा सुनाई देती हैं। लंका का राजा रावण अशोक वाटिका में आता है और अशोक वाटिका के बीचो बीच  एक पेड़ के नीचे साधारण वस्त्रों में बैठी एक स्त्री नजर आती है जिसके पास जाकर लंका का राजा रावण विवाह का प्रस्ताव रखता है। रावण की बातों से हनुमान जी को यह ज्ञात हो जाता है कि वह स्त्री ही सीता माता है, जिससे रावण विवाह का प्रस्ताव स्वीकारने के लिए कह रहा है। हनुमान जी कुछ समय तक रावण के जाने की प्रतीक्षा करते हैं तथा रावण क जाने के बाद हनुमान जी पेड़ पर बैठे बैठे ही  श्री राम और सीता विवाह की कहानी कथा के रूप में गाने लगते हैं। लेकिन सीता जी को लगता है कि यह उनका कोई भ्रम है इसलिए वह इस पर अधिक ध्यान नहीं देती । तब हनुमान जी श्रीराम द्वारा निशानी के तौर पर दी गई मुद्रिका नीचे गिरा देते हैं जिसे देखकर सीता जी को यह आभास होता है कि वाकई में कोई श्रीराम का दूत उनका संदेशा लेकर आया है। क्योंकि यह वही मुद्रिका थी जो सीता जी ने स्वयं श्री राम को खेवट को देने के लिए दी थी।  सीता माता से पहली भेंट | हनुमान तथा माता सीता का संवाद   तब माता सीता पूछने लगते हैं कि कौन है जो उनके पति श्री राम का संदेश लेकर आया है कृपया करके मेरे सामने आइए। तब हनुमानजी पेड़ से कूदकर नीचे आते हैं तथा सीता माता को प्रणाम करके कहते हैं की हे माता, मैं प्रभु श्री राम का दूत हूं। अपने सामने एक छोटे आकर के वानर को देखकर सीता जी को यह लगता है कि यह रावण की कोई चाल है क्योंकि अगर श्रीराम का कोई दूत होता तो वह मनुष्य रूप में होता। हनुमान जी के वानर रुप में होने के कारण सीता माता को भ्रम हो रहा था। तब हनुमान  श्रीराम द्वारा दी गई मुद्रिका की बात उनको बताते है जोकि केवल श्रीराम और सीता जी को पता थी। हनुमान के इस कथन से सीता जी को हनुमान पर विश्वास हो जाता है की वह वास्तव में ही श्रीराम के कोई दूत है। फिर वह हनुमान से अपने पति श्री राम और लक्ष्मण के कुशलतापूर्वक होने के बारे में पूछती है और कहती है कि वे कब मुझे इस रावण की कैद से मुक्त कराने के लिए आएंगे ,क्या वह मुझे भूल गए हैं। हनुमान जी  उन्हें धीरज बांधते हुए कहते हैं कि श्री राम को आपके ठिकाने का पता नहीं ना इसलिए अब तक इतना विलंब हुआ है। यदि श्रीराम को पता होता तो वह कब कि आपको यहां से मुक्त करा कर ले गए होते। तब हनुमान जी सीता माता को अपने साथ चलने के लिए कहते हैं लेकिन देवी सीता अपने पत्नी धर्म के पालन हेतु पर पुरुष के साथ स्वेच्छा से जाने के लिए मना कर देती है। तब वह हनुमान को अपनी चूड़ा मणि निशानी के तौर पर देती है और कहती है की श्रीराम ने मुझे यह विवाह के समय दी थी। हनुमान की जाने से पहले सीता जी से यह अनुरोध करते है

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सीता की खोज । हनुमान द्वारा समुंदर लांघना। Search of Sita in Hindi

रामायण के अनुसार, माता सीता ( Sita ) को रावण ने लंका ले जाकर कैद कर लिया था। श्री राम और लक्ष्मण अपनी पत्नी सीता की खोज में निकल पड़े। अपनी यात्रा के दौरान, श्री राम और लक्ष्मण कई बाधाओं का सामना करते हैं। उन्हें राक्षसों का सामना करना पड़ता है, जंगलों में भटकना पड़ता है और कई आश्चर्यजनक घटनाओं का सामना करना पड़ता है। lakshman ka sugreev par krodh लक्ष्मण का सुग्रीव पर क्रोध  लगभग चार माह बीत जाने के बाद भी सुग्रीव श्री राम के पास नहीं आया और ना ही उसने अपने किसी दूत के द्वारा उनको कोई संदेश भेजा। सुग्रीव के इस रवैया से श्रीरम को लगने लगा कि शायद सुग्रीव अपने मित्रता के वचन को भूल गया है और वह अपना वचन मानने से चूक रहा है यही सोचकर श्री राम ने सुग्रीव को चेतावनी देने के लिए लक्ष्मण जी को भेजा कि वह किष्किंधा नगरी जाकर सुग्रीव को उनकी मित्रता के वचन की याद दिलाए और सीता माता की खोज में सहायता करने की जो उन्होंने शपथ ली थी उसे पूरा करें। श्रीराम के इन वचनों से लक्ष्मण जी आग बबूला होकर किष्किंधा नगरी के लिए प्रस्थान करते है। उनके किष्किंदा जाते ही सारी वानर सेना इधर-उधर डर कर भागने लगती हैं, नगरवासी अपने-अपने घरों में छुप जाते हैं। तब हनुमान तथा सुग्रीव के मित्रगण लक्ष्मण जी को युक्ति से शांत करवाते हैं और सुग्रीव के लिए क्रोध ना करने का अनुरोध करते हैं। लक्ष्मण जी द्वारा श्री राम का संदेश पाकर सुग्रीव को अपने भूल पर पछतावा होता है और वह श्री राम की सेवा में अपने वानर दल को एकत्रित करके चले जाते हैं। श्री राम के पास जाकर सुग्रीव अपने वचन पूर्ति में विलंब होने के लिए क्षमा मांगते हैं और कहते हैं कि हम आज से ही अपने वानर दल की सहायता से सीता Sita माता की खोज के इस अभियान का श्रीगणेश करेंगे। Search of Sita सीता की खोज अभियान की शुरुआत  ऋषि मुख पर्वत के शिखर पर एक सभा आयोजित की जाती है जहां पर वानरराज सुग्रीव द्वारा अपने वानर दलों को चारों दिशाओं में सीता माता की खोज के लिए संगठित करके भेजा जाता है। उन्हीं में से दक्षिण दिशा की तरफ वानर दल जाता है जिसमें युवराज अंगद, जामवंत, नल, नील, हनुमान तथा बहुत से वानर सैनिक होते हैं। वे दक्षिण दिशा की तरफ भारत देश के अंतिम छोर तक चले जाते हैं जहां पर आगे प्रशांत महासागर था। लेकिन अथाह समुंदर के अतिरिक्त उन्हें सीता माता की खोज के बारे में तनिक भी संकेत नहीं मिला था। इसलिए सभी निराश होकर वही समुद्र तट पर अपने स्वामी का कार्य पूरा न कर पाने के निराशा में आत्मदाह की इच्छा से वहीं पर बैठ जाते हैं। Jatau ka bhai जटायु का भाई संपाति  वानर दल को ऐसे निराश होते देख वही पत्थर की गुफा के पास बैठा संपाती नाम का गिद्ध जोर जोर से हंसने लगता है और कहता है कि आज मुझे खाने के लिए बहुत सारे वानर मिल गए हैं। गिद्ध संपाती को देखकर हनुमान गिद्ध जटायु के बलिदान और उसकी महिमा का बखान करने लगते हैं जिसे सुनकर संपाती गिद्ध को अपने छोटे भाई जटायु का स्मरण हो आता है। गिद्ध संपाती उनसे पूछता है कि तुम लोग कौन हो और जटायु को कैसे जानते हो जटायु तो मेरा छोटा भाई है।  तब हनुमानजी संपाती को  बताते है की रावण द्वारा सीता के हरण के समय सीता माता को रावण से बचाने के लिए युद्ध करते हुए महात्मा जटायु वीर गति को प्राप्त हो गए। श्री राम और लक्ष्मण ने एक  पिता के भांति उनका संस्कार किया था। अपने भाई जटायु की मृत्यु की खबर सुनकर संपाती शौक में डूब जाता है रोने लगता है। तब बाद में संपाती कहता है कि मैंने भी एक दिन एक राक्षस को विमान में एक रूपवती स्त्री को ले जाते हुए देखा था शायद वह रावण ही था अगर मुझे पता होता कि वह दुष्ट राक्षस मेरे भाई जटायु को मारकर जा रहा है तो मैं उस पापी का वही अंत कर देता।  गिद्ध संपाती सभी वानर दल को कहते हैं कि वह सीता माता को देख सकता है क्योंकि एक गिद्ध की दृष्टि अपार होती है। उन्होंने बताया कि सीता माता यहां समुंद्र पार एक द्वीप है जहां पर वह एक पेड़ के नीचे मायूस बैठी हुई है। इस तरह गिद्ध संपाती की वजह से हनुमान तथा अन्य मानव दल को सीता माता का पता चल जाता है कि वह समुद्र के उस पार लंका नामक द्वीप पर है। सीता माता का पता तो लग गया था लेकिन अब सबके सामने यही प्रश्न था कि 400 कोस का समुंदर पार करके लंका तक कैसे पहुंचा जाए और सीता माता की सुध ली जाए।  Hanuman ka lanka prasthan हनुमान का लंका प्रस्थान   बहुत देर तक विचार-विमर्श करने के बाद जामवंत जी हनुमान को उनकी शक्तियों का स्मरण कराते हैं कि कैसे उन्होंने अपने बाल्यकाल में सूर्य तक को निगल लिया था। और वह स्वयं भगवान शिव के रूद्र अवतार हैं इसलिए केवल उन्हीं के पास वह शक्ति है जिसके द्वारा हनुमान सौ योजन का समुद्र लांघ कर सीता माता की सुध लेकर आ सकते हैं। तब युवराज अंगद, जामवंत, नल और नील तथा समस्त वानरर दल हनुमान जी की स्तुति करता है और उनको उनकी शक्तियों का स्मरण हो जाता है । जय श्री राम का नारा बोलते हुए हनुमान जी उड़कर लंका की तरफ चल देते हैं। लंका तक जाने के समुद्र मार्ग में हनुमान जी की भेंट मैनाद पर्वत, एक राक्षसी तथा नागमाता से होती है जिनसे हनुमान जी अपने शक्ति तथा बुद्धि के बल पर निजात पा लेते हैं और सौ योजन का समुंद्र लांघकर लंकापुरी तक सफलतापूर्वक पहुंच जाते हैं।

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