MYTHOLOGICAL STORIES

सत्यनारायण की व्रत कथा – तृतीय अध्याय | Satyanarayan Vrat Katha (Chapter Three)

सूत जी आगे की कहानी सुनाते हुए कहते हैं कि सालों पहले उल्कामुख नामक एक राजा था। वह बुद्धिमान होने के साथ-साथ सत्यवादी और शांत स्वभाव का व्यक्ति था। वो रोजाना मंदिरों में जाकर गरीबों को धन दान करके उनके दुखों को दूर करता था। राजा उल्कामुख की पत्नी कमल के फूल के समान थी। उन्हें पवित्र स्त्री माना जाता था। एक बार राजा उल्कामुख और उसकी पत्नी ने भद्रशीला नदी के किनारे श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा की। तभी वहां साधु नाम का एक वैश्य पहुंचा। उस वैश्य के पास व्यवसाय करने के लिए काफी धन था। उसने जब राजा और उसकी पत्नी को व्रत करते देखा, तो वह वहीं रुक गया। फिर उनसे विनम्रतापूर्वक पूछा, “हे महराज! आप कौन-सा व्रत कर रहे हैं।” राजा ने जवाब दिया, “मैं अपने परिजनों के साथ पुत्र की प्राप्ति के लिए श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा कर रहा हूं। इस पर साधु ने पूछा, “क्या आप मुझे भी व्रत करने की विधि बताएंगे। मुझे भी संतान प्राप्ति की इच्छा है।” साधु की बात सुनकर राजा ने उसे सत्यनारायण भगवान के पूजा की सारी विधि बताई। इसके बाद साधु अपने घर को ओर निकल पड़ा। घर पहुंचकर साधु ने अपनी पत्नी लीलावती को श्री सत्यनारायण व्रत के बारे में बताया और कहा, “मुझे जब संतान की प्राप्ति होगी, तो मैं इस व्रत को करूंगा।” कुछ दिन बात सत्यनारायण भगवान की कृपा साधु की पत्नी लीलावती पर बरसी और वह गर्भवती हो गई। आगे चलकर उसने एक पुत्री को जन्म दिया। लीलावती की पुत्री कब बड़ी हो गई, यह पता ही नहीं चला। उसके माता-पिता ने उसका नाम कलावती रखा था। कुछ दिन बीतने के बाद कलावती की माता ने साधु को उसका वचन याद दिलाया, जिसमें उसने संतान प्राप्ति के बाद श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा करने की बात कही थी। लीलावती ने कहा, “हे स्वामी! अब आपको अपने वचन को पूरा करने का समय आ गया है।”इसपर साधु ने कहा, “हे प्राण प्रिय! मुझे अपना वचन अच्छी तरह से याद है। उस वचन को मैं अपनी पुत्री के विवाह के अवसर पर पूरे विधि विधान के साथ करूंगा।” पत्नी को पूजा का आश्वासन देकर अगले दिन साधु नगर की ओर चल पड़ा। कुछ समय बाद जब कलावती शादी योग्य हो गई, तो साधु ने एक दूत को बुलाया और उसे अपनी पुत्री कलावती के लिए एक योग्य वर ढूंढने का आदेश दिया। साधु का आदेश पाकर दूत कंचन नगर की ओर गया और वहां से एक योग्य वर लेकर आया। उस लड़के को देखकर साधु ने अपनी पुत्री का विवाह उससे कराने का फैसला किया। उसने तुरंत अपने प्रियजनों को आमंत्रित किया और अपनी पुत्री का विवाह उस योग्य लड़के से कर दिया। शादी के दौरान भी साधु ने श्री सत्यनारायण भगवान की पूजा नहीं की। साधु का यह रवैया देखकर श्री सत्यनारायण भगवान गुस्से में आ गए और उन्होंने साधु को अभिशाप दिया कि उसके जीवन से सब सुख-समृद्धि दूर हो जाएगी। इधर, अपने कार्यों में व्यस्त साधु अपने दामाद के साथ चंद्रकेतु राजा के नगर में व्यापार करने पहुंचा। तभी एक दिन अचानक एक चोर चंद्रकेतु राजा का धन चुराकर भागते-भागते उसी साधु की दुकान पर जा पहुंचा। यहां सिपाहियों को अपने पीछे आते देख चोर ने चुराया हुआ धन साधु की दुकान में छिपा दिया। राजा के सिपाही जब वहां पहुंचे, तो उन्हें राजा का धन साधु और उसके जमाई के पास दिखा। उन्होंने तुरंत दोनों को बंदी बनाया और उन्हें राजा के पास ले गए। सिपाहियों ने राजा से कहा, “महराज हमने दोनों चोरों को सामान के साथ पकड़ लिया है। आप बस आदेश दें कि इन दोनों को क्या सजा देनी है।” राजा ने सिपाहियों को आदेश दिया कि बिना देर किए दोनों को इसी वक्त कारावास में डाल दिया जाए। साथ ही उनके सारे धन को जब्त कर लिया जाए। दूसरी तरफ साधु की पत्नी भी दुखी थी। उसके घर में जो कुछ भी सामान था, उसे चोर ले गए थे। एक दिन साधु की बेटी कलावती भूख-प्यास से तड़पती हुई भोजन की तलाश में एक ब्राह्मण के घर पहुंची। वहां उसने श्री सत्यनारायण का व्रत होते हुआ देखा। फिर उसने भी उस ब्राह्मण से सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करके अपने घर चली आई। घर पहुंचते ही कलावती की मां ने उससे पूछा, “बेटी तुम अब तक कहां थी और तुम्हारे मन में क्या उथल-पुथल हो रही है।” इस पर कलावती ने अपनी मां से कहा, “हे माता! मैं अभी-अभी एक ब्राह्मण के घर से आ रही हूं। वहां मैंने श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनी।” अपनी पुत्री की बातों को सुनने के बाद लीलावती ने भी सत्यनारायण भगवान की पूजा की तैयारी शुरू कर दी। फिर उसने अपने परिजनों को बुलाया और पूरे विधि विधान के साथ सत्यनारायण भगवान की पूजा की। साथ ही लीलावती ने भगवान से अपने पापों के लिए माफी मांगी और अपने पति और जमाई को रिहा करने की प्रार्थना भी की। लीलावती के इस कार्य से श्री सत्यनारायण भगवान प्रसन्न हुए। उन्होंने राजा चंद्रकेतु को सपने में दर्शन दिए और कहा, “हे राजन! तुमने जिसे बंदी बनाकर रखा है, उसे तुरंत रिहा कर दो और उसकी धन संपत्ति भी लौटा दो। अगर तुमने ऐसा नहीं किया, तो तुम्हें भी मैं धन और संतान के सुख से वंचित कर दूंगा।” अगली सुबह राजा ने दरबार में अपने सपने के बारे में बताया और सिपाहियों को दोनों कैदियों को सभा में लाने के लिए कहा। इसके बाद सिपाही, साधु और उसके जमाई को लेकर दरबार पहुंचे। यहां दोनों ने राजा को प्रणाम किया। इसके बाद राजा ने उनसे कहा, “हमें गलतफहमी हो गई थी। अब वो दूर हो गई है, इसलिए हम आप लोगों को पूरे सम्मान और धन-दौलत के साथ छोड़ रहे हैं।” इतना कहकर सूत जी ने श्री सत्यनारायण कथा का तीसरा अध्याय पूरा किया।

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सत्यनारायण की व्रत कथा – पंचम अध्याय | Satyanarayan Vrat Katha (Chapter Five)

सत्यनारायण कथा के पांचवें और अंतिम अध्याय में सर्व ज्ञाता सूत जी ऋषि और मुनि गणों को एक और कहानी सुनाते हैं। यह कहानी तुंगध्वज नामक एक राजा की थी, जो प्रजापालन में व्यस्त रहता था। कुछ समय बाद राजा तुंगध्वज अपने नगर के पास के जंगल में शिकार के लिए निकले। शिकार के बाद राजा एक पेड़ के पास विश्राम करने के लिए रुके जहां उनकी नजर कुछ लोगों पर पड़ी, जो पूरे विधि-विधान के साथ भक्ति में लीन होकर श्री सत्यनारायण भगवान की आराधना कर रहे थे। हमेशा की तरह अपने अभिमान में चूर राजा तुंगध्वज उस पूजा में शामिल नहीं हुआ और न ही भगवान को नमन करना जरूरी समझा। वहां मौजूद लोगों ने राजा को रोककर भगवान का प्रसाद भी दिया, लेकिन तुंगध्वज ने प्रसाद का अपमान करते हुए उसे लेने से मना कर दिया। कुछ समय बाद जब राजा तुंगध्वज अपनी नगरी पहुंचा, तो देखा कि उनके प्रदेश में सब कुछ बर्बाद हो चुका था। पूरा नगर तहस-नहस देख राजा तुरंत समझ गया कि यह सब सत्यनारायण भगवान के प्रसाद का अपमान करने का फल है। वह तुरंत उसी जंगल की ओर गया और बिना किसी देरी के उस पूजा में शामिल होकर भगवान का प्रसाद भी खाया। इसके बाद जब राजा तुंगध्वज दोबारा अपने नगर की ओर चल पड़े। वहां पहुंचकर उसने देखा कि श्री सत्यनारायण भगवान की कृपा से सब कुछ पहले जैसा व्यवस्थित हो चुका था। इसके बाद राजा तुंगध्वज ने लंबे समय तक सुख और समृद्धि के साथ अपना जीवन व्यतीत किया और फिर मृत्यु के बाद उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति हुई। इस कहानी के बाद सूत जी ऋषियों को कहते हैं, “हे मुनिगण! इस संसार में जो भी मनुष्य श्री सत्यनारायण भगवान के व्रत को करेगा उसकी सभी मनोकामना पूरी होगी। इस पूजा को करने से गरीब को धन की प्राप्ति, निसंतान को संतान का सुख प्राप्त होता है। वहीं, मनुष्य अपनी मनोकामना पूरी होने के बाद जीवन के आखिरी वक्त में बैकुंठ धाम चला जाता है।” आगे सूत जी कहते हैं, “मैं अब आप सभी को इस व्रत को करने वाले लोगों के दूसरे जन्म के बारे में भी बताता हूं। दूसरे अध्याय के वृद्ध ब्राह्मण ने अगले जन्म में सुदामा के रूप में जन्म लिया और मोक्ष की प्राप्ति की। वहीं, दूसरे अध्याय के लकड़हारे ने निषाद के रूप में जन्म लेकर मोक्ष की प्राप्ति की।” इसके अलावा, “तीसरे अध्याय के उल्कामुख राजा ने दशरथ के रूप में बैकुंठ की ओर प्रस्थान किया। चौथे अध्याय के साधु नामक वैश्य ने मोरध्वज के रूप में अपने पुत्र की तरफ से मोक्ष की प्राप्ति की। वहीं, पांचवें यानी अंतिम अध्याय के तुंगध्वज राजा ने भगवान की भक्ति में लीन होकर मोक्ष की प्राप्ति की।” इस प्रकार श्री सत्यनारायण कथा का पांचवा अध्याय संपन्न हुआ।

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हरतालिका तीज व्रत कथा | Hartalika Teej Vrat Katha In Hindi

मान्यता है कि भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म के बारे में याद दिलाने के लिए यह कथा सुनाई थी, जो कुछ इस प्रकार है। भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं: हे पार्वती! तुमने मुझे वर के रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की थी। तुमने अन्न-जल त्यागकर सूखे पत्ते खाए, सर्दी में तुमने लगातार पानी में रहकर तपस्या की। वैशाख की गर्मी में पंचाग्नि और सूर्य के ताप से खुद को तपाया। सावन की मूसलाधार बरसात में तुमने बिना अन्न-जल के, खुले आसमान तले दिन बिताए। तुम्हारे इस घोर कष्ट वाली तपस्या से तुम्हारे पिता गिरिराज काफी दुखी और बेहद नाराज थे। तुम्हारी इतनी घोर तपस्या और तुम्हारे पिता की नाराजगी को देखकर एक दिन नारद जी तुम्हारे घर आए। तुम्हारे पिता गिरिगाज ने जब उनके आने का कारण जानना चाहा तो नाराद जी बोले, ‘हे गिरिगाज! मैं भगवान विष्णुजी के कहने पर यहां आया हूं। आपकी पुत्री की घोर तपस्या से खुश होकर भगवान विष्णु को उनसे विवाह करने की इच्छा है। इस बारे में मैं आपकी सहमति जानना चाहता हूं।’ नारद मुनी की बात सुनकर तुम्हारे पिता अत्यंत खुश होकर बोलें, ‘श्रीमान, अगर स्वयं विष्णु भगवान मेरी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। भगवान विष्णु तो साक्षात ब्रह्म का रूप हैं। यह तो हर पिता चाहता है कि उसकी पुत्री सुखी रहे और अपने पति के घर में लक्ष्मी का रूप बनें। तुम्हारे पिता द्वारा स्वकृति पाकर नारद जी विष्णु जी के पास पहुंचे और उन्हें विवाह तय होने के बारे में समाचार दिया। इस बीच जब तुम्हें इस बात की जानकारी मिली तो तुम बहुत ज्यादा दुखी हो गई। तुम्हें दुखी देखकर तुम्हारी सहेली ने तुमसे दुख का कारण पूछा। तब तुमने कहा, ‘मैं सच्चे मन से भगवान शिव को ही अपना पति मान चुकी हूं, लेकिन मेरे पिताजी ने विष्णु जी के साथ मेरा विवाह तय कर दिया है। मैं इतनी धर्मसंकट में हूं कि मेरे पास जान देने के अलावा कोई और दूसरा उपाय नहीं है।’ तुम्हारी सहेली ने तुम्हें हिम्मत देते हुए कहा कि ‘संकट के समय धैर्य रखने की आवश्यकता होती है। तुम मेरे साथ घने जंगल में चलो जहां साधना भी की जाती है। वहां पर तुम्हें तुम्हारे पिता नहीं ढूंढ पाएंगे। मुझे पूरा भरोसा है कि भगवान तुम्हारी मदद अवश्य करेंगे।’ तुमने अपनी सहेली की बात सुनकर यही किया। तुम्हारे घर से यूं चले जाने पर तुम्हारे पिता बहुत दुखी और चिंतित हुए। वो उस दौरान ये सोचने लगे कि मैंने अपनी पुत्री का विवाह विष्णु जी से तय करा दिया है। अगर भगवान विष्णु बारात लेकर आएं और पुत्री यहां नहीं मिली तो बहुत अपमान सहना पड़ेगा। तुम्हारे पिता ने तुम्हें चारों ओर खोजना शुरू कर दिया। उधर तुम नदी किनारे एक गुफा में पूरे मन से मेरी आराधना में डूब गई। फिर तुमने रेत से एक शिवलिंग बनाई। रात भर तुमने मेरी स्तुति में भजन जागरण किया। तुमने बिना अन्न-जल ग्रहण किए मेरा ध्यान किया, तुम्हारी इस कठोर तपस्या से मेरा आसन हिल गया और मैं तुम्हारे पास पहुंचा। मैंने तुम्हें तुम्हारी इच्छा का कोई वर मांगने को कहा, तुमने तब मुझे अपने सामने पाकर कहा कि “मैं आपको सच्चे मन से अपना पति मान चुकी हूं। अगर आप सच में मेरी इस तपस्या से खुश होकर मेरे सामने आए हैं, तो मुझे अपनी पत्नी के रूप में अपना लीजिए।’ मैं तुम्हारी बात सुनकर तथास्तु कहकर कैलाश की ओर चला गया। तुमने प्रात: होते ही पूजा की सारी सामग्री नदी में प्रावहित करके अपनी सखी के साथ व्रत का वरण किया। उसी वक्त तुम्हारे पिता गिरिराज तुम्हें ढूंढते हुए वहां पहुंचे। तुम्हारी हालत देखकर तुम्हारे पिता दुखी होकर तुम्हारे इस कठिन तपस्या का कारण पूछे। तुमने अपने पिता को समझाते हुए कहा, ‘पिताजी, मैंने जीवन का ज्यादतर समय कठिन तपस्या करके बिताया है। मेरी इस कठोर तपस्या का केवल एक ही उद्देश्य था, शिव जी को पति रुप में प्राप्त करना। मैं आज अपनी तपस्या की परीक्षा में खरी उतरी हूं। आपने विष्णुजी से मेरा विवाह करने का निश्चय किया था, इसलिए मैं आराध्य की तलाश में घर से दूर हो गई। अब मैं घर आपके साथ एक ही शर्त पर चलूंगी, जब आप महादेव के साथ मेरा विवाह कराने के लिए तैयार होंगे।’ तुम्हारे पिता ने तुम्हारी इस इच्छा को मान लिया और तुम्हें अपने साथ वापस ले गएं। फिर कुछ समय बाद तुम्हारे पिता ने हमारा विधि-विधान के साथ विवाह करा दिया। भगवान शिव ने आगे कहा- हे’ पार्वती! तुमने भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को मेरी पूजा करके जो व्रत किया, उसी का फल है जो हमारा विवाह संभव हुआ। इस व्रत का ये महत्व है कि जो भी अविवाहित कन्या इस व्रत को करती है, उसे गुणी, विद्वान व धनवान वर पाने का सौभाग्य मिलता है। वहीं, विवाहित स्त्री जब इस व्रत को पूरी विधि से करती है, तो सौभाग्यवती होती है और पुत्र व धन सुख प्राप्त करती है।’ कहानी से सीख: अगर सच्चे मन और मेहनत से किसी चीज की इच्छा की जाए तो इच्छा जरूर पूरी होती है।

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तारा रानी की कथा | Tara Rani Ki Katha In Hindi

मां भगवती को मानने वालों में से एक राजा स्पर्श भी थे। वो दिन-रात उनकी पूजा-अर्चना में लीन रहते थे। राजा को किसी चीज की कमी नहीं थी। बस उन्हें बच्चे की ख्वाहिश थी। सालों से बच्चा न होने के कारण राजा कुछ निराश रहा करते थे। एक दिन राजा की भक्ति से खुश होकर मां भगवती ने सपने में आकर उसे दो बेटी होने का वरदान दिया। आशीर्वाद मिलने के कुछ समय बाद राजा के घर एक बेटी पैदा हुई। बेटी पैदा होने की खुशी में राजा ने सबको दावत दी और बेटी की कुंडली बनवाने के लिए पंडितों को बुलवाया। सबने राजा से एक ही बात कही कि यह साक्षत देवी का रूप है। जहां भी इसके कदम पड़ेंगे वहां खुशियां ही खुशियां होंगीं। यह भगवती देवी की भक्तन होगी। इतना सब कहकर पंडितों ने लड़की का नाम तारा रख दिया। कुछ समय के बाद मंगलवार के दिन राजा के घर एक और बेटी पैदा हुई। ज्योतिषों ने उसकी भी कुंडली बनाई और उदास हो गए। राजा ने जब उनसे उदासी का कारण पूछा, तो ज्योतिषों ने बताया कि ये लड़की आपके जीवन में खूब सारा दुख लेकर आएगी। राजा ने ज्योतिषों से पूछा कि आखिर मैंने ऐसे कौन-से खराब कर्म किए थे कि इसने मेरे घर जन्म लिया है। ज्योतिषों ने बताया कि आपकी दोनों बेटियां राजा इंद्र की अप्सराएं हुआ करती थीं। इनमें से बड़ी बहन का नाम तारा और छोटी का रुक्मन था। एक दिन ये दोनों मिलकर धरती की सैर करने के लिए गईं। दोनों ने ही वहां पहुंचकर एकादशी के दिन का व्रत रखा। तारा ने अपनी छोटी बहन से कहा कि आज एकादशी का व्रत है, इसलिए बाजार जाकर कुछ ताजे फल ले आओ, लेकिन वहां कुछ खाना मत। रुक्मन बाजार फल लेने के लिए चली गई। वहां उसे मछली के पकौड़े दिखे। उसने झट से उन्हें खा लिया और अपनी दीदी के लिए कुछ फल ले लिए। रुक्मन से तारा ने पूछा कि तुम अपने लिए फल क्यों नहीं लाई? उसने जवाब दिया कि वो मछली के पकौड़े खाकर आई है। तारा ने गुस्से में कहा कि तुम पापीन हो। एकदशी के दिन तुमने मछली खा ली। ऐसे खराब कर्म के लिए मैं तुम्हें छिपकली बनने का श्राप देती हूं। अब उसी जंगल में तारा की बहन छिपकली बनकर रहने लगी। वहां एक जाने-माने ऋषि गुरु गोरख भी अपने कुछ शिष्यों के साथ रहते थे। उनके शिष्यों में से एक बहुत ही घमंडी था। अपने घमंड के चलते वो शिष्य कमंडल में पानी भरकर एकान्त में बैठकर तपस्या करने लगा। तभी एक प्यासी गाय वहां आ गई। उसने सीधे अपना मुंह उस कमंडल में डाला और पानी पी लिया। पानी पीने के बाद जैसे ही गाय अपना मुंह बाहर को निकालने लगी, तो कमंडल नीचे गिर गया और ऋषि का ध्यान भंग हो गया। ऋषि ने देखा कि गाय पानी पी गई है। अब गुस्से में ऋषि ने गाय को एक चिमटे से बुरी तरह घायल कर दिया। इस बात की जानकारी जब गुरु गोरख को पड़ी, तो वो तुरंत गाय को देखने के लिए गए। जैसे ही उन्होंने गाय की हालत देखी वैसे ही अपने उस घमंडी शिष्य को आश्रम से बाहर निकाल दिया। कुछ दिनों के बाद गौ-माता पर किए गए उस अत्याचार से होने वाले पाप को कम करने के लिए उन्होंने एक यज्ञ करवाया। इस यज्ञ के बारे में गाय को चिमटे से मारने वाले घमंडी शिष्य को भी पता चला। वो सीधे पक्षी का रूप धारण करके यज्ञ स्थल पर गया और भोजन में अपनी चोंच से मरा हुआ सांप डाल दिया। किसी को इस बात की खबर नहीं हुई। ये सब होते हुए तारा से श्राप मिलने वाली छिपकली रुक्मन देख रही थी। उसके मन में हुआ कि इसे खाकर सारे लोग मर जाएंगे। सबकी जान बचाने के लिए छिपकली बनी रुक्मन सभी लोगों के सामने भोजन पर गिर गई।लोगों ने छिपकली को खूब कोसा और बर्तन को खाली करने लगे। उसी वक्त भंडारा करने वालों को खाने में मारा हुआ सांप भी दिखा। तब कहीं जाकर सबको समझ आया कि छिपकली सबकी जान बचाने के लिए जानबूझकर भोजन में गिरी थी। एक छिपकली होने के बावजूद भी इतने अच्छे विचार होने की वजह से यज्ञ में मौजूद सारे महत्वपूर्ण लोगों ने कहा कि हमें इस छिपकली की मुक्ति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। पंडित ने आगे बताया कि सबकी प्रार्थना से ही वो छिपकली तीसरे जन्म में आप जैसे प्रतापी राजा के घर बेटी के रूप में पैदा हुई है। वहीं, तारा ने दूसरे जन्म ‘तारामती“ के रूप में लिया और अयोध्या के राजा हरिश्चन्द्र से शादी की। इतनी सब बातें कहने के बाद पंडितों ने राजा स्पर्श को रुक्मन को मारने की सलाह दी। इस बात पर राजा बोले, “मैं किसी बेटी को कैसे मार सकता हूं। ऐसा करना पाप होगा। फिर ज्योतिषों ने कहा कि एक संदूक में सोना-चांदी लगवाकर उसके अंदर लड़की को रख देना और संदूक को पानी में बहा देना। उसमें लगा हुआ सोना-चांदी देखकर लोग नदी से संदूक जरूर निकालेंगे और लड़की की जान बच जाएगी। राजा ने ज्योतिषों ने जैसा बताया ठीक वैसा ही किया। नदी में सोना-चांदी जड़ा हुआ संदूक देखकर काशी के पास ही एक भंगी ने उसे बाहर निकाल लिया। उसके कोई बच्चे नहीं थे, इसलिए उसने संदूक के अंदर की लड़की को पालने का फैसला लिया। उसे भंगी व उसकी पत्नी ने खूब प्यार से पाला और रुक्को नाम रख दिया। बड़ी होते ही दोनों ने रुक्को की शादी करवा दी। रुक्को की सासु मां तारामती और राजा हरिशचंद्र के महल में साफ-सफाई करने का काम किया करती थी। कुछ दिनों के बाद रुक्को की सासु मां बीमार हो गई। उनकी जगह रुक्को वहां काम करने लगी। तारामती ने उसे देखा और पुराने जन्म के पुण्य के कारण पहचान लिया और उसे कहा कि तुम मेरे साथ बैठ जाओ। रुक्को ने बोला कि मैं तो भंगिन हूं, इसलिए आपके पास नहीं बैठ सकती। तब तारामती ने उसे बताया कि तुम पूर्व जन्म में मेरी ही बहन थी। तुमने एकादशी के व्रत के दिन मछली खा ली थी और मैंने तुम्हें दंड देते

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ब्रह्म देव की पूजा क्यों नहीं होती ? | Brahma Ji Ko Na Puje Jane Ki Kahani 

एक बार धरती की भलाई के लिए ब्रह्मा जी के मन में यज्ञ करने का विचार आया। इसके बाद उन्होंने यज्ञ की जगह की तलाश शुरू की। फिर उन्होंने अपनी बांह से निकले हुए एक कमल के फूल को धरती पर गिराया। मान्यता है कि ब्रह्मा जी का फूल जिस जगह पर गिरा वहीं पर उनका मंदिर बनवाया गया। यह मंदिर राजस्थान के पुष्कर में स्थित है। कथा के मुताबिक ब्रह्मा जी पुष्कर यज्ञ करने पहुंचे। इस दौरान सभी देवी-देवता भी यज्ञ स्थल पर पहुंच गए। जबकि उनकी पत्नी सावित्री ठीक वक्त पर नहीं पहुंच पाई। शुभ मुहूर्त का वक्त निकला जा रहा था। इस यज्ञ को पूरा करने के लिए एक स्त्री की आवश्यकता थी। वक्त निकला जा रहा था, लेकिन सावित्री का उस समय कुछ पता नहीं था। वहीं, यज्ञ अगर समय पर नहीं संपन्न होता तो इसका लाभ नहीं मिलता। इसलिए ब्रह्मा जी ने उस दौरान एक स्थानीय ग्वाला से विवाह कर लिया और यज्ञ की शुरुआत की। यज्ञ शुरु होने के थोड़ी देर बाद ही जब सावित्री वहां पहुंची तब उन्होंने अपनी जगह पर एक अन्य स्त्री को ब्रह्मा जी के साथ बैठा देखा। यह देखकर सावित्री बहुत क्रोधित हो गईं। उन्होंने उसी वक्त ब्रह्ना जी को श्राप दिया की इस पूरे संसार में कभी उनकी पूजा नहीं होगी और कोई भी व्यक्ति पूजा के समय उन्हें याद नहीं करेगा। सावित्री को इतने ग़ुस्से में देखते हुए उस वक्त सभी देवी-देवता डर गएं। सभी देवताओं ने सावित्री को समझाते हुए उन्हें अपना श्राप वापस लेने के लिए कहा। सावित्री का ग़ुस्सा जब ठंडा हुआ, तब उन्होंने यह कहा कि जिस स्थान में ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया है, केवल उसी स्थान पर उनका मंदिर बनेगा। इसके बाद कहा जाता है कि देवी सावित्री पास में ही एक पहाड़ी पर तपस्या में लीन हो गईं और आज भी वहां उपस्थित हैं। कहानी से सीख – कभी भी कोई भी फैसला जल्दबाजी में नहीं लेना चाहिए।

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हनुमान जी व्रत कथा | Mangalwar Vrat Katha In Hindi

केशवदत्त नाम का एक ब्राह्मण था, जो अपनी पत्नी अंजली के साथ ऋषिनगर गांव में खुशी से रहता था। गांव के सभी लोग ब्राह्मण परिवार का बहुत सम्मान करते थे। उनके पास खूब धन-संपत्ति थी, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण दोनों पति-पत्नी दुखी थे। पुत्र प्राप्ति के लिए दोनों हनुमान जी की पूजा करने लगे। ब्राह्मण हर मंगलवार जंगल में हनुमान जी की पूजा करने के लिए जाता था। पत्नी घर में ही महावीर का व्रत रखा करती थी। दोनों शाम को बजरंग बली को भोग लगाकर व्रत खोलते थे। ब्राह्मण और उसकी पत्नी को हनुमान जी की पूजा करते-करते कई साल बीत गए, लेकिन उन्हें संतान नहीं हुई। एक समय आया जब ब्राह्मण निराश हो गया, परंतु उसने बजरंग बली पर विश्वास नहीं छोड़ा। दोनों पति-पत्नी विधिवत व्रत रखते रहे। एक मंगलवार अंजली हनुमान जी को भोग लगाना भूल गई और दिन ढलने के बाद खुद भी बिना भोजन किए सो गई। उस दिन ब्राह्मण की पत्नी ने प्रण लिया कि वो अब अगले मंगलवार को भोग लगाने के बाद ही अन्न का दाना खाएगी। बिना कुछ खाए-पिए किसी तरह से छह दिन निकले। मंगलवार का दिन आया और कमजोरी के चलते वो घर में ही बेहोश हो गई। हनुमान जी अंजली की निष्ठा देखकर प्रसन्न हो गए। बेहोशी में ही ब्राह्मणी को हनुमान जी ने दर्शन दिए और कहा, “पुत्री उठो, तुम हर मंगलवार पूरी निष्ठा के साथ मेरा व्रत करती हो। मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत खुश हूं। इस बात से खुश होकर मैं तुम्हारी मनोकामना पूरी करने का वरदान देता हूं। तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी, जो तुम्हारा खूब ध्यान रखेगा। इतना कहकर बजरंगबली वहां से अंतर्धान हो गए।” तभी अंजलि उठी और भोजन तैयार करके उसने सबसे पहले हनुमान जी को भोग लगाया। इसके बाद खुद भी भोजन किया। केशवदत्त घर लौटा, तो ब्राह्मणी ने उसे पूरी बात बताई। पुत्र वरदान की बात सुनकर ब्राह्मण को यकीन नहीं हुआ और वह अपनी पत्नी पर शक करने लगा। उसने अपनी पत्नी को बोला, “तुम झूठ बोल रही हो। तुमने मेरे साथ धोखा किया है।” कुछ समय बाद ब्राह्मण के घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ। दोनों ने उसका नाम हनुमान जी के नाम पर मंगल प्रसाद रखा। ब्राह्मण को हमेशा यही लगता था कि उसकी पत्नी ने उसे झूठी कहानी सुनाई और उसके साथ छल किया है। यह सोचकर वो बच्चे को मारने की साजिश रचने लगा। एक दिन मौका देखकर ब्राह्मण कुएं पर नहाने जाते समय बच्चे को अपने साथ ले गया। वहां उसने बच्चे को कुएं में फेंक दिया। ब्राह्मण के घर लौटने पर पत्नी ने उससे पूछा, “मंगल कहा रह गया। वो भी तो आपके साथ गया था।” पत्नी के सवाल सुनकर ब्राह्मण पहले थोड़ा घबराया और फिर बोला कि मंगल उसके साथ नहीं था। तभी पीछे से मंगल मुस्कराते हुए सामने आया। यह देखकर ब्राह्मण दंग रह गया। केशवदत्त को रात को यह सोच सोचकर नींद नहीं आई कि मंगल दास कैसे घर वापस आया। उसी रात बजरंगबली ने ब्राह्मण को सपने में दर्शन दिए। हनुमान जी ने कहा, “मेरे प्रिय पुत्र! यह तुम दोनों का ही बेटा है। मैंने तुम्हारी और तुम्हारी पत्नी की भक्ति से खुश होकर तुम्हारी मनोकामना को पूरा किया था। अपने पुत्र मंगल दास को अपना लो और अपनी पवित्र पत्नी पर शक करना छोड़ दो।” सुबह उठकर ब्राह्मण ने सबसे पहले अपने बेटे को गले लगाया। फिर अपनी पत्नी से माफी मांगी। उसके बाद ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को बताया कि वो किस तरह उसपर शक किया करता था और मंगल दास को अपना पुत्र नहीं मानता था। ब्राह्मण की पत्नी ने उसे माफ कर दिया और तीनों साथ में खुशी-खुशी रहने लगे। कहानी से सीख : हर चीज को शक भरी निगाहों से न देखें। ऊपर वाले पर भरोसा रखने के साथ ही मंगलवार व्रत कथा अच्छे कर्म करने की सीख देती है।

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राधा अष्‍टमी व्रत की कहानी  | Radha Ashtami Vrat Katha In Hindi

राधा माता गोलोक में श्रीकृष्ण के साथ रहती थीं। एक दफा कृष्ण भगवान को गोलोक में राधा रानी कहीं नजर नहीं आईं। कुछ देर बाद कन्हैया अपनी सखी विराजा के साथ घूमने चले गए। यह बात जब राधा रानी को मालूम हुई, तो उन्हें गुस्सा आया और वो सीधे कन्हैया के पास पहुंची। वहां पहुंचकर उन्होंने श्रीकृष्ण को काफी भला-बुरा कहा। राधा रानी का यह रवैया भगवान श्रीकृष्ण के प्यारे मित्र श्रीदामा को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा। श्रीदामा ने उसी वक्त बिना कुछ सोचे समझे राधा रानी को पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप दे दिया। राधा को इतने गुस्से में देखकर कृष्ण भगवान की सखी विराजा भी नदी के रूप में वहां से चली गईं। राधा ने श्रीदामा से श्राप पाने के बाद उन्हें राक्षस कुल में पैदा होने का श्राप दिया। राधा जी द्वारा दिए गए श्राप की वजह से ही श्रीदामा का जन्म शंखचूड़ दानव के रूप में हुआ। आगे चलकर वही दानव, भगवान विष्णु का परम भक्त बना। दूसरी तरफ, राधा रानी ने पृथ्वी पर वृषभानु के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया। राधा रानी का जन्म वृषभानुजी के घर तो हुआ, लेकिन उनकी पत्नी देवी कीर्ति के गर्भ से नहींं। दरअसल, जिस समय राधा मैया और श्रीदामा ने एक दूसरे को श्राप दिया था, तभी भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था कि राधा आपको वृषभानुजी और देवी कीर्ति की पुत्री बनकर पृथ्वी पर रहना होगा। मनुष्य के अवतार में आपका एक वैश्य से विवाह होगा। वो मेरे अंशावतारों में से ही एक होगा। इस तरह आप पृथ्वी पर भी मेरी ही बनकर रहेंगी। परंतु, हम दोनों को बिछड़ने का दुख सहना होगा। इसके बाद कृष्ण भगवान ने राधा जी को मनुष्य योनी के रूप में जन्म लेने की तैयारी करने के लिया कहा। संसार के सामने वृषभानुजी की पत्नी गर्भवती हुईं। जिस तरह एक बच्चा दुनिया में आता है, ठीक वैसे ही देवी कीर्ति का भी प्रसव हुआ, लेकिन असल में राधा माता का जन्म देवी कीर्ति के गर्भ से नहीं हुआ था। भगवान की माया से उनके गर्भ में वायु भर गई थी। देवी कीर्ती ने उसी वायु को जन्म दिया। इस दौरान उन्हें प्रसव पीड़ा हो रही थी और वहां राधा माता के रूप में एक प्यारी सी कन्या ने जन्म लिया। भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन राधा मैया का धरती पर जन्म हुआ था। तभी से हर साल इस दिन को राधा अष्टमी के रूप में मनाया जाता है। कहानी से सीख : क्रोध एक बुराई है। क्रोध का जवाब क्रोध में ही देने से बातें और खराब हो जाती हैं। इसके कारण कई दुविधाओं का सामना करना पड़ सकता है।

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सत्यनारायण की व्रत कथा – चतुर्थ अध्याय | Satyanarayan Vrat Katha (Chapter Four)

सर्व शास्त्र ज्ञाता सूत जी ऋषियों और मुनियों को आगे की कहानी सुनाते हुए कहते हैं, “राजा की आज्ञा के बाद वो साधु अपने दामाद के साथ घर की तरफ निकल पड़ा। कुछ दूर जाने के बाद रास्ते में उसे एक व्यक्ति मिला, जो डंडे के सहारे चल रहा था। वो व्यक्ति असल में खुद सत्यनारायण भगवान जी थे। उन्होंने उससे पूछा, “हे साधु! तुम्हारी नौका में क्या है?’ यह सुनकर वैश्य हंस पड़ा और अभिमान भरे स्वर में उसने कहा, “हे सज्जन! आप मुझसे ये प्रश्न क्यों कर रहे हो? कहीं आपको मुझसे धन लेने की इच्छा तो नहीं? अगर ऐसा है, तो मैं बता दूं कि मेरे नाव में तो आपको केवल बेल और पत्ते ही मिलेंगे।” वैश्य की इस कठोर बोली को सुनकर भगवान ने कहा, “ईश्वर करे तुम्हारी वाणी सच हो जाए। ऐसा कहकर वे कुछ दूर समुद्र किनारे जाकर बैठ गए।” अब उस वैश्य साधु ने जब अपनी नाव की ओर देखा तो वह दंग रह गया। उसकी नाव में रखे सारे वस्त्र और आभूषण बेल और पत्तों में बदल गए। यह देख वैश्य बेहोश हो गया। कुछ समय बाद जब उसे होश आया, तो वह बहुत दुखी हो गया। तभी वैश्य के दामाद ने कहा, “पिताजी आप चिंतित न हो। यह सब उसी व्यक्ति के अभिशाप की वजह से हुआ है। हमें बिना देर किए उनके चरणों में गिरकर माफी मांग लेनी चाहिए। तभी जाकर हमारा यह दुख दूर हो सकेगा।” अपने जमाई की बात मानकर वैश्य उस व्यक्ति के पास जा पहुंचा और विनम्र स्वर में बोला, “मेरे अपराध के लिए मुझे माफ कर दो। इतना कहकर वैश्य जोर-जोर से रोने लगा।” इस पर सत्यनारायण भगवान ने कहा, “हे साधु! तुम्हें जो भी दुख मिले हैं, वो सभी मेरी ही आज्ञा से मिले हैं, क्योंकि तुमने अपने वचन के अनुसार एक भी बार मेरी पूजा नहीं की, जिससे मेरा अपमान हुआ है।” इसपर वैश्य ने कहा, “हे भगवन! आप तो सर्व शक्तिशाली हैं। आपके रूपों को कई देवता भी नहीं पहचानते, तो भला मैं कैसे आपको पहचान पाता। अब मैं समझ गया हूं और अपनी भूल को सुधारने के लिए मैं आपका व्रत जरूर करूंगा। आप कृपा करके मुझे माफ कर दें और मेरा धन मुझे लौटा दें।” साधु की बात सुनकर भगवान सत्यनारायण खुश हुए और उसे आशीर्वाद देकर ओझल हो गए। इसके बाद वैश्य अपने जमाई के साथ नाव की ओर लौटा। वहां पहुंचते ही उसने देखा कि उसकी नाव में पहले की तरह धन भरा हुआ था। इसके बाद उसी जगह पर वैश्य ने दामाद व अन्य साथियों के साथ मिलकर सत्यनारायण भगवान की पूजा की और फिर अपने घर की तरफ चल पड़ा। वैश्य जब अपने जमाई के साथ नगर के पास पहुंचा, तो उसने एक दूत के माध्यम से अपने और दामाद के वापस आने की सूचना पत्नी को भिजवाई। दूत ने उनके घर जाकर वैश्य की पत्नी लीलावती को नमस्कार करते हुए कहा, “मालकिन! साहब और दामाद दोनों नगर के पास पहुंच गए हैं।” वैश्य की पत्नी लीलावती उस दूत की बात सुनकर काफी प्रसन्न हो गई। उसने तुरंत सत्यनारायण भगवान का व्रत पूरा कर अपनी पुत्री कलावती से कहा, “मैं तुम्हारे पिता के दर्शन के लिए जा रही हूं। तुम भी अपना काम पूरा कर तुरंत दर्शन के लिए आ जाना।” अपनी माता की बातें सुन कलावती भी प्रसन्न हो गई और जल्दबाजी में सत्यनारायण भगवान की कथा का प्रसाद छोड़कर अपने पति और पिता से मिलने चली गई। कलावती द्वारा प्रसाद का अनादर देख भगवान सत्यनारायण एक बार फिर से नाराज हो गए। क्रोध में आकर उन्होंने नाव सहित कलावती के पति को पानी में डुबो दिया। जैसे ही कलावती वहां पहुंची उसने देखा कि उसका पति वहां नहीं है, तो वह बेहद दुखी हुई और जोर-जोर से रोने लगी। इधर, वैश्य अपने जमाई को डूबता देख एक बार फिर से सत्यनारायण भगवान का स्मरण करने लगा। उसने प्रभु से प्रार्थना की और कहा, “हे ईश्वर! कृपा कर मेरे परिवार से हुई भूल को माफ कर दें।” साधु की प्रार्थना सुनकर सत्यनारायण भगवान ने कहा, “हे साधु! तुम्हारी बेटी ने मेरे प्रसाद का अपमान किया है। यही कारण है कि उसका पति यह दंड झेल रहा है। अगर वह वापस घर लौटकर मेरे प्रसाद का सेवन करती है, तो उसका पति सकुशल वापस लौट आएगा।” इतना सुनते ही कलावती तुरंत घर के अंदर जाती है और प्रसाद का सेवन करती है। प्रसाद खाने के बाद जब कलावती दोबारा अपने घर के बाहर गई, अपने पति को सही सलामत पाया। इसके बाद साधु एक बार फिर से अपने परिजनों के साथ मिलकर पूरे विधि विधान के साथ श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत करता है। पूजा के बाद वह सुखी-सुखी अपना जीवन व्यतीत करता है और अंत में वह इस लोक का सुख प्राप्त कर स्वर्गलोक चला जाता है।” इस प्रकार श्री सत्यनारायण भगवान की चौथा अध्याय समाप्त हुआ।

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सोलह सोमवार व्रत कथा | Solah Somvar Vrat Katha In Hindi

भगवान शिव अपनी पत्नी पार्वती के साथ एक बार घूमते हुए धरती के अमरावती शहर पहुंचे। वहां शिव जी का एक बड़ा-सा मंदिर राजा ने बनवाया था। शिव-पार्वती दोनों को वह मंदिर पसंद आया, इसलिए दोनों वहीं रहने लगे। कुछ दिनों बाद मां पार्वती ने भोले नाथ से कहा, “प्रभु! मुझे चौसर खेलने की इच्छा है।” भगवान ने सारा इंतजाम किया और दोनों आराम से चौसर खेलने लगे। तभी वहां मंदिर के पुजारी आ गए। पुजारी को आता देख मां पार्वती ने पूछा, “आप बताइए हम दोनों में से कौन यह खेल जीतेगा?” जवाब में उन्होंने कहा, “महादेव ही जीतेंगे।” जैसे ही चौसर का खेल खत्म होने लगा, तो पार्वती मां जीत गईं। माता पार्वता ने पुजारी की बात गलत साबित होने पर उन्हें झूठ बोलने की सजा के रूप में श्राप देकर कोढ़ी बना दिया। फिर पार्वती शिव जी के साथ कैलाश लौट गईं। अब लोग उस कोढ़ी पुजारी से दूर भागने लगे। राजा ने भी उसे मंदिर के कार्य से मुक्त करके किसी दूसरे ब्राह्मण को मंदिर का पुजारी नियुक्त कर दिया। कोढ़ी पुजारी भी उसी मंदिर के बाहर बैठकर अपने लिए भिक्षा मांगने लगा। कुछ दिनों बाद उस मंदिर में स्वर्ग से अप्सराएं आईं। पुजारी को देखकर उन्होंने उसकी हालत का कारण पूछा। उसने मां पार्वती द्वारा मिले श्राप के बारे में उन्हें बता दिया। सारी बातें जानने के बाद अप्सराओं ने पुजारी को पूरे सोलह सोमवार तक विधिवत व्रत रखने के लिए कहा। पुजारी को इस पूजा की विधि नहीं पता थी, तो उसने अप्सराओं से इसके बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि हर सोमवार को सूर्योदय से पहले उठना होगा। फिर नहाकर साफ कपड़े पहनने के बाद गेहूं के आटे से तीन अंग बनाना। उसके बाद घी से दीप चलाते हुए गुड़, बेलपत्र, अक्षत, नैवेद्य, फूल, चंदन, जनेऊ लेकर संध्या के समय सूर्यास्त से पहले प्रदोष काल में भोले बाबा की पूजा करना। पूजा करने के बाद एक अंग शिव संभू को अर्पण करना और एक खुद ग्रहण करना। उसके बाद बचे हुए अंग को आसपास के लोगों में प्रसाद के रूप से बांट देना। इस तरह पूरे सोलह सोमवार करने के बाद 17वें सोमवार को आटा लेकर उसकी बाटी बनाना। फिर उसमें घी के साथ गुड़ डालकर चूरमा तैयार करना। इसका शिव जी को भोग लगाकर इसे आसपास मौजूद सभी लोगों को प्रसाद के रूप में बांट देना। इस तरह से व्रत करने से भगवान शिव तुमपर प्रसन्न होकर कोढ़ की समस्या दूर कर देंगे। ये सारी बातें बताकर सभी अप्सराएं स्वर्ग लौट गईं। उनके लौटने के बाद पुजारी ने हर सोमवार को विधिवत व्रत और पूजन किया। सोलह सोमवार पूरे करने के बाद 17वें सोमवार को सबको प्रसाद बांटते ही उसके कोढ़ की समस्या दूर हो गई। पुजारी के ठीक होने पर राजा ने दोबारा उस मंदिर में पूजा-पाठ करने का जिम्मा उसे सौंप दिया। होते-होते एक दिन दोबारा भोले नाथ अपनी पत्नी पार्वती जी के साथ उसी मंदिर में पहुंचे। पार्वती जी ने जब देखा कि वो कोढ़मुक्त हो गए हैं, जो उन्होंने पुजारी से पूछा कि ऐसा कैसे हुआ। जवाब में पंडित ने उन्हें सोलह सोमवार व्रत करने की अपनी कथा के बारे में बताया। पुजारी की बात सुनकर मां पार्वती काफी खुश हुईं। उन्होंने भी सोलह सोमवार व्रत रखने की ठान ली। इसके लिए मां पार्वती ने पुजारी से पूरी विधि जानी और अपने नाराज बेटे कार्तिकेय को वापस पाने के लिए नियम से व्रत करने लगीं। 17वें सोमवार को जब उन्होंने सबको प्रसाद बांटा, तो उसके कुछ दिनों बाद ही कार्तिकेय लौट आए। उन्होंने मां पार्वती के पास पहुंचकर पूछा, “माता! अचानक कुछ हुआ कि मेरा सारा गुस्सा ही खत्म हो गया। क्या आपने कोई उपाय किया था?” जवाब में पार्वती जी ने सोलह सोमवार के व्रत की कथा सुनाई। यह सुनकर कार्तिकेय को भी सोलह सोमवार का व्रत करने का मन हुआ, क्योंकि वो अपने मित्र ब्रह्मदत्त के दूर जाने से दुखी थे। माता पार्वती से सोलह सोमवार व्रत की विधि जानकर उन्होंने परदेस गए अपने दोस्त ब्रह्मादत्त की वापसी की मनोकामना के साथ व्रत शुरू किया। पूरे सोलह सोमवार व्रत करने और उसके विधिविधान से समापन करने के कुछ ही दिन बाद कार्तिकेय का दोस्त लौट आया। वापस आने के बाद ब्रह्मदत्त ने कार्तिकेय से पूछा, “आखिर ऐसा क्या किया तुमने कि मेरा मन बदल गया। मैं बिल्कुल भी वापस आना नहीं चाहता था, लेकिन एकदम तुम्हारा ख्याल आया और मैं लौट आया।” कार्तिकेय ने भी अपने दोस्त ब्रह्मादत्त को सोलह सोमवर व्रत की महीमा के बारे में बताया। इसके बारे में जानने के बाद ब्रह्मादत्त ने भी व्रत रखना शुरू कर दिया। व्रत खत्म होते ही वह अपने दोस्त कार्तिकेय से विदा लेकर यात्रा पर निकल गया। दूसरे नगर पहुंचते ही ब्रहादत्त को पता चला कि राजा हर्षवर्धन ने अपनी बेटी गुंजन के विवाह के लिए स्वयंवर रखा है। राजा की प्रतिज्ञा है कि उनकी हथिनी जिस भी लड़के के गले में माला डालेगी, वही उसकी बेटी से विवाह करेगा। उत्सुक होकर ब्राह्मण भी महल पहुंच गए। वहां कई सारे राजकुमार थे। उसी वक्त हथिनी ने अपने सूंड में माला उठाई और ब्रह्मादत्त के गले में डाल दी। राजा ने अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए ब्राह्मण ब्रह्मादेत्त से अपनी बेटी का विवाह करवा दिया। शादी के बाद ब्राह्मण से उसकी पत्नी ने पूछा, “आखिर आपने ऐसा कौन-सा अच्छा कार्य किया था कि हथिनी ने सबको छोड़कर आपको मेरे लिए चुना।” ब्रह्मादत्त ने उसे सोलह सोमवार व्रत के बारे में बताया। राजकुमारी ने यह सब जानने के बाद अपने पति से विधि पूछकर व्रत करना शुरू कर दिया। व्रत के समापन के बाद उसे एक सुंदर सा बेटा हुआ, जिसका नाम गोपाल रखा गया। गोपल जब बड़ा हुआ, तो उसने अपनी मां से पूछा, “आखिर मैं आपके ही घर पैदा क्यों हुआ? कौन-सा शुभकर्म आपने किया था?” गोपाल को उसकी मां गुंजन ने सोलह सोमवार व्रत कथा सुनाई। गोपल ने भी शिव भगवान की महीमा जानने के बाद बड़े से राज्य को पाने की चाह में सोलह सोमवार व्रत रखना शुरू कर दिया। व्रत पूरा होते ही एक दिन पास के ही राजा को गोपाल पसंद आ गया। उन्होंने अपनी बेटी मंगला से उसकी

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शिव व्रत कथा | Sawan Somvar Vrat Katha In Hindi

एक समय की बात है, अमरपुर नामक नगर में एक धनवान व्यवसायी रहता था। उसका व्यापार बहुत दूर तक फैला हुआ था। यहां के सभी नगरवासी उसका बहुत आदर करते थे। उस व्यापारी के पास किसी भी चीज की कमी नहीं थी, लेकिन फिर भी वह अपने जीवन में सुखी नहीं था। दरअसल, उस व्यापारी का एक भी बेटा नहीं था, जिस कारण हर समय उसे यही चिंता सताती थी कि उसके मरने के बाद उसकी संपत्ति की देखभाल कौन करेगा। वह व्यापारी बेटे की चाहत में हर सोमवार को बाबा भोले नाथ की पूजा करता और शाम ढलते ही मंदिर जाकर शंकर भगवान के सामने दीप जलाता था। एक दिन मां पार्वती उसकी श्रद्धा-भक्ती से खुश हो गईं। उन्होंने बाबा भोले नाथ से उस व्यवसायी की इच्छा पूरी करने के लिए प्रार्थना की। इस पर भगवान शिव ने कहा, “इस दुनिया में हर किसी को उसके कार्यों के आधार पर फल मिलता है।” भगवान शंकर के समझाने पर भी पार्वती जी नहीं मानीं। वह लगातार बाबा भोले नाथ से यही कहती रहीं कि उस व्यापारी की इच्छा पूरी कर दीजिए। अंत में शिवजी ने मां पार्वती के अनुरोध पर उस व्यापारी को बेटे का वरदान दे दिया। आशीर्वाद देने के बाद भगवान शंकर ने पार्वती माता से कहा, “मैंने आपके अनुरोध पर उस व्यापारी को बेटे की प्राप्ति का आशीर्वाद तो दे दिया, लेकिन उसका बेटा केवल 16 साल की उम्र तक ही जीवित रहेगा।” यही बात भगवान शिव ने उस व्यापारी के सपने में जाकर उसे भी बताई। वरदान पाकर व्यापारी प्रसन्न था, लेकिन बेटे की उम्र 16 साल ही होगी सोचकर वह फिर दुखी हो गया। वह पहले की तरह फिर से हर सोमवार को भगवान शंकर की पूजा करने लगा। कुछ महीने बीतने के बाद उसके घर में एक बच्चे ने जन्म लिया, जो बहुत सुंदर था। उसका नाम अमर रखा गया। बेटे के जन्म के साथ ही व्यापारी के घर में खुशियां छा गईं। बेटे के जन्म की खुशी में एक समारोह का भी आयोजन किया गया। इस जश्न के माहौल में व्यापारी अभी भी दुखी था। हर समय उसे यह डर लगा रहता था कि उसका बेटा अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकेगा। धीरे-धीरे समय बीतता गया और उसका बेटा अमर 12 साल का हो गया। एक दिन व्यापारी ने अपने बेटे को अपनी पत्नी के भाई दीपचंद के साथ पढ़ाई के लिए बनारस भेज दिया। वाराणसी जाते समय रास्ते में जहां भी अमर और दीपचंद आराम करने के लिए रुकते, वहां वो यज्ञ और ब्राह्मणों के लिए भोजन की व्यवस्था करते जाते थे। कुछ दूर जाने के बाद अमर और दीपचंद एक नगरी पहुंचे। यहां नगर के महाराज की बेटी चंद्रिका की शादी थी, जिसके लिए पूरे नगर को दुल्हन की तरह सजाया गया था। ठीक उसी समय बारात भी आ गई। इस समय लड़के का पिता परेशान था, क्योंकि उसके बेटे की एक आंख खराब थी। उन्हें डर था कि अगर लड़की वालों को यह बात पता चल गई तो वह शादी तोड़ देंगे। तभी उसकी नजर अमर और दीपचंद पर पड़ी। लड़के के पिता के मन में तुरंत ये ख्याल आया कि क्यों न अमर को ही दूल्हा बनाकर शादी के मंडप में बैठा दिया जाए। एक बार जब उसका विवाह राजकुमारी से हो जाएगा, तो फिर उसके बाद उसे कुछ पैसे देकर वहां से विदा कर देंगे। फिर राजकुमारी और अपने बेटे को अपने घर ले आएंगे। लड़के के पिता ने बिना देरी किए दीपचंद से इस बारे में बात की और धन का प्रस्ताव रखा। दीपचंद ने पैसों के लालच में आकर तुरंत हां बोल दिया और अमन को दूल्हा बनाकर मंडप में बैठा दिया। यहां राजा ने राजकुमारी का कन्यादान कर विवाह संपन्न कराया और बहुत सारी संपत्ति के साथ अपनी बेटी को विदा किया। शादी के बाद जब अमर वहां से लौट रहा था तो उसे लगा कि झूठ बोलना सही नहीं है और उसने राजकुमारी चंद्रिका के दुपट्टे पर सारी सच्चाई लिख दी। अमर ने लिखा, “प्रिय राजकुमारी चंद्रिका! तुम्हारे साथ छल हुआ है। तुम्हारा विवाह मेरे साथ कराया गया। मैं एक व्यापारी का पुत्र हूं और फिलहाल पढ़ाई के लिए वाराणसी जा रहा हूं। तुम्हारी शादी जिससे तय हुई थी उसकी एक आंख खराब है।” राजकुमारी ने यह सच जानने के बाद उस लड़के के साथ जाने से इनकार कर दिया और अपने पिता के साथ ही रहने लगी। उधर, अमर वाराणसी के गुरुकुल में पहुंचकर पढ़ाई करने लगा। धीरे-धीरे समय बीतता गया और अमर 16 साल का हो गया। इस दौरान उसने एक महायज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ समाप्त होने के बाद अमर ने सभी ब्राह्मणों को खाना खिलाया और उन्हें कपड़े दिए। सारे काम खत्म करने के बाद अमर रात में अपने कमरे में सोने चला गया। भगवान शंकर के वरदान के मुताबिक, उसी रात अमर के प्राण चले गए। अगली सुबह जब दीपचंद उसके कमरे में पहुंचा, तो उसने देखा कि अमर जीवित नहीं है। वह जोर-जोर से रोने लगा। उसकी रोने की आवाज सुनकर आसपास के लोग भी इकट्ठा हो गए और अपना दुख जताने लगे। दीपचंद के रोने की आवाज, भगवान शिव और मां पार्वती के कानों तक भी पहुंची। यह सुन माता पार्वती ने कहा, “हे स्वामी! मैं दीपचंद के रोने की इस आवाज को बर्दाश्त नहीं कर पा रही हूं। कृपा करके इसके दुख को दूर करें।” पार्वती जी की बात सुनकर बाबा भोले नाथ अमर के पास पहुंचे। यहां उन्होंने देखा कि यह तो वही बालक है, जिसे केवल 16 साल की उम्र तक ही जीवित रहने का आशीर्वाद मिला था। इसके बाद भगवान शिव सीधे मां पार्वती के पास पहुंचे और कहा, “हे गौरी! मरने वाला बालक उसी व्यापारी का पुत्र है। इसने अपनी उम्र पूरी कर ली है।” यह सुन माता पार्वती ने भगवान शिव से एक बार फिर से आग्रह किया। उन्होंने कहा, “स्वामी! आप कृपा करके इस बालक को दोबारा जीवित कर दें। इसे मृत देख इसके माता-पिता भी अपने प्राण त्याग देंगे।” माता पार्वती ने बाबा भोले नाथ को याद दिलाया कि अमर के पिता उनके सबसे बड़े भक्त हैं। कई सालों से वह हर सोमवार को उनकी पूजा करते

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बृहस्पति व्रत कथा | Brihaspati Vrat Katha In Hindi

सालों पहले एक गांव में ऐसा गरीब धार्मिक ब्राह्मण रहता था, जिसकी को‌ई संतान नहीं थी। वह रोज नहा-धोकर मन से देवताओं की पूजा करते हुए संतान की मांग करता, लेकिन ब्राह्मण की पत्नी खूब आलसी थी। वह न स्नान करती थी और न ही पूजा-पाठ। पत्नी की इस आदत से ब्राह्मण दुखी रहता था। ब्राह्मण के धार्मिक गुणों से उसके घर में जल्द ही संतान के रूप में एक पुत्री ने जन्म लिया। उसकी पुत्री भी ब्राह्मण की ही तरह धार्मिक थी। जैसे-जैसे वो बड़ी हो रही थी, पूजा-पाठ में उसका मन भी उतना ही लगने लगा। वह हर रोज सुबह उठती, स्नान करती और भगवान विष्णु का ध्यान व जप करती थी। इसी तरह वो बृहस्पतिवार का उपवास भी करने लगी। इससे ब्राह्मण के घर की गरीबी भी दूर होती गई। हर दिन पूजा-पाठ करने के बाद वह पढ़ने के लिए स्कूल भी जाती थी। स्कूल जाते समय वह अपनी हाथों की मुट्ठियों में जौ भरकर स्कूल के रास्ते में गिराती थी। जब वह स्कूल से वापस घर के लिए आती, तो गिराए गए जौ के दाने सोने में बदल जाते थे, जिन्हें उठाकर वह घर लेकर चली आती थी। एक दिन ब्राह्मण की बेटी सोने के जौ सूप से साफ कर रही थी। तभी वहां आकर उसकी मां ने कहा, “बेटी, सोने के जौ को साफ करने के लिए सोने का सूप होना चाहिए।” ब्राह्मण की बेटी को मां की बात एकदम सही लगी। उसके अगले बृहस्पतिवार को उपवास रखने के बाद उस लड़की ने बृहस्पति देव से सोने का सूप मांगा। ब्राह्मण की बेटी हर बार पूरे विधि-विधान से बृहस्पति देव की पूजा-अर्चना करती थी। इससे प्रसन्न होकर भगवान उसकी सारी इच्छाएं भी पूरी कर देते थे। इसी तरह उन्होंने सोने के सूप वाली प्रार्थना को भी स्वीकार कर लिया। अगले दिन हर रोज की तरह ब्राह्मण की बेटी पूजा-पाठ करके स्कूल गई और रास्ते में जौ के दाने बोते हुए गई। वापस आते समय जब वह जौ के दाने बिन रही थी, तो उसे सोने का सूप भी मिल गया। सोने का सूप लेकर वह घर आई, जिससे उसने सोने के जौ साफ किए। एक दिन इसी तरह ब्राह्मण की बेटी घर के बाहर बैठ कर सोने के जौ को सोने के सूप से साफ कर रही थी। तभी उसके घर के सामने से एक राजकुमार गुजर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण की बेटी को देखते ही उस पर मोहित हो गया। जब वह अपने महल पहुंचा, तो ब्राह्मण की बेटी के मोह में उसने खान-पीना त्याग दिया। जब राजा को यह पता चला, तो उन्होंने राजकुमार से इसका कारण पूछा। राजकुमार ने अपने दिल का सारा हाल राजा को बताया। अगले ही दिन राजा अपने मंत्री के साथ ब्राह्मण के घर गया और ब्राह्मण के सामने उसकी बेटी का विवाह अपने राजकुमार से करवाने का प्रस्ताव रखा। राजा का प्रस्ताव सुनकर ब्राह्मण काफी खुश हो गया। उसने तुरंत ही विवाह करने के लिए हां कर दी। कुछ ही दिनों में राजकुमार और ब्राह्मण की बेटी की शादी हो गई। इधर, ब्राह्मण की बेटी शादी होने के बाद अपने ससुराल चली गई। उधर, ब्राह्मण फिर से गरीब होने लगा। उसके बुरे दिन दोबारा वापस आ गए। एक दिन ब्राह्मण अपनी बेटी से मिलने के लिए उसके ससुराल गया। पिता की हालत देखकर उसने बहुत सारा धन देकर ब्राह्मण को विदा किया। बेटी का दिया हुआ धन कुछ ही दिनों में खत्म हो गया और ब्राह्मण गरीबी की वजह से परेशान हो गया। ब्राह्मण फिर से अपनी बेटी से मिलने के लिए महल गया और उसने बेटी को सारी समस्याएं बताई। अपने गरीब ब्राह्मण पिता की बात सुनकर उसकी बेटी ने कहा, “पिताजी, कल आप मां को लेकर मेरे पास आएं। मैं उन्हें बृहस्पति देव के उपवास और पूजन की विधि बताऊंगी। इसे करने से सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी।” ब्राह्मण ने ऐसा ही किया। अगले दिन वह अपनी पत्नी को लेकर महल में बेटी से मिलने के लिए गया। पुत्री ने अपनी मां को बहुत समझाया कि उन्हें आसल त्याग कर सुबह स्नान करना चाहिए और भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए, लेकिन ब्राह्मण की पत्नी ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी। वह अभी भी पहले की ही तरह रहती थी। मां की ऐसी हरकतों से तंग आकार एक दिन उसकी पुत्री ने मां को एक कोठरी में बंद कर दिया। उसे जबरन सुबह स्नान करवाया और भगवान विष्णु की पूजा करवाई। इससे उसकी मां की बुद्धी में सुधार हो गया। अगले ही दिन से ब्राह्मण की पत्नि सुबह उठती, स्नान करती और भगवान विष्णु की पूजा करती। साथ ही बेटी के बताए अनुसार हर बृहस्पतिवार के दिन वह उपवास भी करने लगी। इससे प्रसन्न होकर बृहस्पति देव ने उनकी सारी गरीबी और सम्याएं दूर कर दी। फिर वह एक सुखी और संपन्न जीवन जीने लगे। इस व्रत के प्रभाव से मृत्यु के बाद ब्राह्मण और उसकी पत्नी को स्वर्ग का द्वार भी मिला। कहानी से सीख – आलस्य करने से किसी भी तरह का काम नहीं बनता है। आलस्य को छोड़कर सुबह जल्दी उठकर पूजा-पाठ की जाए, तो मन भी शांत रहता है और मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं।

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राम जन्म की कथा |  Ram Janam Katha In Hindi

एक समय की बात है, अयोध्या के महाराज दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ रखा। इस यज्ञ के लिए राजा दशरथ ने अपनी चतुरंगिणी सेना को काले कान वाले घोड़े को छोड़ने का आदेश भेजा। उनकी इच्छा थी कि इस महान यज्ञ में हर कोई शामिल हो, इसलिए राजा ने सभी ऋषि-मुनियों व विद्वान पंडितों को आमंत्रण भेजा। निर्धारित दिन पर महाराज दशरथ अपने दोस्त, गुरु वशिष्ठ, ऋंग ऋषि व अन्य विद्वानों के साथ यज्ञ मंडप में पहुंचे। इसके बाद विधिवत रूप से यज्ञ की शुरुआत हुई। मंत्र उच्चारण और पाठ जैसे सभी विधि-विधान के साथ कुछ घंटों में यज्ञ पूरा हुआ। राजा दशरथ ने फिर सभी ब्राह्मणों, विद्वानों व अतिथियों को उपहार में धन और गाय आदि देकर आदरपूर्वक विदा गया। उस यज्ञ में प्रसाद के रूप में खीर बनी थी। उस प्रसाद में पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद था, जिसे खाने के बाद तीनों रानियां गर्भवती हो गईं। कुछ समय बाद चैत्र माह में शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि के दिन राजा दशरथ की पहली पत्नी यानी रानी कौशल्या ने एक बच्चे को जन्म दिया। उस बच्चे के चेहरे में इतनी रोनक थी कि हर कोई देखकर समझ जाता था कि वह आम बच्चा नहीं है। इसी तरह राजा की दूसरी रानी कैकेयी ने एक पुत्र और तीसरी रानी सुमित्रा ने दो पुत्र को शुभ नक्षत्रों में जन्म दिया। राजा दशरथ का महल और नगर चार पुत्रों के जन्म से खिलखिला उठा। चारों तरफ आनंद और जश्न का माहौल था। पूरी प्रजा खुशी से गा व झूम रही थी। इस खुशी को देखकर देवता भी फूलों की वर्षा करने लगे। इस जश्न में शामिल होने के लिए कई ब्राह्मण भी पहुंचे और राजा दशरथ के बेटों को आर्शीवाद दिया। खुशी से झूम रहे राजा दशरथ ने ब्राह्मणों को खूब दान दिया। फिर अपनी खुशी जाहिर करने के लिए उन्होंने प्रजा व दरबारियों में भी धन, रत्न और आभूषण बंटवाए। समय आने पर सबकी मौजूदगी में चारों बालकों का नामकरण भी किया गया। महर्षि वशिष्ठ ने उनका नाम रामचन्द्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखा। वक्त बीतता गया और धीरे-धीरे ये चारों बालक बड़े हुए। इन चारों में राम अपने तेजस्वी गुणों के कारण प्रजा को अधिक प्रिय लगने लगे। अपनी प्रतिभा के चलते वो कम उम्र में ही सभी विषयों में महारथ हासिल कर चुके थे। राम में सभी गुण थे। चाहे शस्त्र चलाने की बात हो या हाथी व घोड़े की सवारी, हर चीज में वो अव्वल थे। साथ ही वो माता-पिता व गुरुओं का भी खूब सम्मान करते थे। उनके गुणों के कारण बाकी के तीन भाई भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी उनसे काफी कुछ सीखते थे। जब भी महराज अपने चारों पुत्रों को एकसाथ देखते उनका मन आनंद से भर उठता था। राम में मौजूद गुणों के कारण उन्हें श्री राम और भगवान राम तक कहा जाने लगा। आगे चलकर राम के जीवन पर दो पवित्र ग्रंथ लिखे गए, रामचरित मानस और रामायण। कहानी से सीख: व्यक्ति के गुण ही उसे पहचान दिलाते हैं। अगर गुण और संस्कार अच्छे हों, तो वह भगवान तुल्य हो जाता है।

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