MYTHOLOGICAL STORIES

कश्यप ऋषि के श्राप के कारण शिवजी ने काटा था बालक गणेश का मस्तक

कहते है की इंसान का वर्तमान, उसके पिछले कर्मो पर और भविष्य वर्तमान कर्मों पर आधारित होता है। लेकिन यह बात केवल इंसानो पर ही नहीं अपितु भगवानों पर भी लागू होती है।  हमारे पुराणों में अनेक ऐसी कथाएँ है जब भगवान द्वारा अतीत में किये गए अनुचित कार्यों के कारण उन्हें आने वाले समय में कष्ट उठाने पड़े।  ऐसी ही एक कहानी भगवान शंकर से सम्बंधित है जब उन्हें कश्यप ऋषि द्वारा दिए गए शाप के कारण अपने ही पुत्र गणेश का मस्तक काटना पड़ा। भगवान गणेश का जन्म की कहानी :देवी पार्वती ने एक बार शिवजी के गण नन्दी के द्वारा उनकी आज्ञा पालन में त्रुटि के कारण अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण डाल दिए और कहा कि तुम मेरे पुत्र हो। तुम मेरी ही आज्ञा का पालन करना और किसी की नहीं।  देवी पार्वती ने यह भी कहा कि मैं स्नान के लिए जा रही हूं। कोई भी अंदर न आने पाए। थोड़ी देर बाद वहां भगवान शंकर आए और देवी पार्वती के भवन में जाने लगे। यह देखकर उस बालक ने विनयपूर्वक उन्हें रोकने का प्रयास किया। बालक का हठ देखकर भगवान शंकर क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया। देवी पार्वती ने जब यह देखा तो वे बहुत क्रोधित हो गई। उनकी क्रोध की अग्नि से सृष्टि में हाहाकार मच गया। तब सभी देवताओं ने मिलकर उनकी स्तुति की और बालक को पुनर्जीवित करने के लिए कहा। तब भगवान शंकर के कहने पर विष्णुजी एक हाथी का सिर काटकर लाए और वह सिर उन्होंने उस बालक के धड़ पर रखकर उसे जीवित कर दिया। तब भगवान शंकर व अन्य देवताओं ने उस गजमुख बालक को अनेक आशीर्वाद दिए। देवताओं ने गणेश, गणपति, विनायक, विघ्नहरता, प्रथम पूज्य आदि कई नामों से उस बालक की स्तुति की। इस प्रकार भगवान गणेश का प्राकट्य हुआ। कश्यप ऋषि ने दिया था शिव जी को शाप :ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार एक बार नारद जी ने श्री नारायण से पूछा कि प्रभु आप बहुत विद्वान है और सभी वेदों को जानने वाले हैं। मैं आप से ये जानना चाहता हूं कि जो भगवान शंकर सभी परेशानियों को दूर करने वाले माने जाते हैं। उन्होंने क्यों अपने पुत्र गणेश की के मस्तक को काट दिया। यह सुनकर श्रीनारायण ने कहा नारद एक समय की बात है। शंकर ने माली और सुुमाली को मारने वाले सूर्य पर बड़े क्रोध में त्रिशूल से प्रहार किया। सूर्य भी शिव के समान तेजस्वी और शक्तिशाली था। इसलिए त्रिशूल की चोट से सूर्य की चेतना नष्ट हो गई। वह तुरंत रथ से नीचे गिर पड़ा। जब कश्यपजी ने देखा कि  मेरा पुत्र मरने की अवस्था में हैं। तब वे उसे छाती से लगाकर फूट-फूटकर विलाप करने लगे। उस समय सारे देवताओं में हाहाकार मच गया। वे सभी भयभीत होकर जोर-जोर से रुदन करने लगे। अंधकार छा जाने से सारे जगत में अंधेरा हो गया। तब ब्रह्मा के पौत्र तपस्वी कश्यप जी ने शिव जी को शाप दिया वे बोले जैसा आज तुम्हारे प्रहार के कारण मेरे पुत्र का हाल हो रहा है। ठीक वैसे ही तुम्हारे पुत्र पर भी होगा। तुम्हारे पुत्र का मस्तक कट जाएगा। यह सुनकर भोलेनाथ का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने सूर्य को फिर से जीवित कर दिया। सूर्य कश्यप जी के सामने खड़े हो गए। जब उन्हें कश्यप जी के शाप के बारे में पता चला तो उन्होंने सभी का त्याग करने का निर्णय लिया। यह सुनकर देवताओं की प्रेरणा से भगवान ब्रह्मा सूर्य के पास पहुंचे और उन्हें उनके काम पर नियुक्त किया।ब्रह्मा, शिव और कश्यप आनंद से सूर्य को आशीर्वाद देकर अपने-अपने भवन चले गए। इधर सूर्य भी अपनी राशि पर आरूढ़ हुए। इसके बाद माली और सुमाली को सफेद कोढ़ हो गया, जिससे उनका प्रभाव नष्ट हो गया। तब स्वयं ब्रह्मा ने उन दोनों से कहा-सूर्य के कोप से तुम दोनों का तेज खत्म हो गया है। तुम्हारा शरीर खराब हो गया है। तुम सूर्य की आराधना करो। उन दोनों ने सूर्य की आराधना शुरू की और फिर से निरोगी हो गए।

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शंख से नहीं चढ़ाते शिवलिंग पर जल, जानिए क्यों ?

हम सब जानते है की पूजन कार्य में शंख का उपयोग महत्वपूर्ण होता है। लगभग सभी देवी-देवताओं को शंख से जल चढ़ाया जाता है लेकिन शिवलिंग पर शंख से जल चढ़ाना वर्जित माना गया है। आखिर क्यों शिवजी को शंख से जल अर्पित नहीं करते है ? इस संबंध में शिवपुराण में एक कथा बताई गई है। शिवपुराण की कथा शिवपुराण के अनुसार शंखचूड नाम का महापराक्रमी दैत्य हुआ। शंखचूड दैत्यराम दंभ का पुत्र था। दैत्यराज दंभ को जब बहुत समय तक कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई तब उसने भगवान विष्णु के लिए कठिन तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर विष्णु प्रकट हुए। विष्णुजी ने वर मांगने के लिए कहा तब दंभ ने तीनों लोको के लिए अजेय एक महापराक्रमी पुत्र का वर मांगा। श्रीहरि तथास्तु बोलकर अंतध्र्यान हो गए। तब दंभ के यहां एक पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम शंखचूड़ पड़ा। शंखचुड ने पुष्कर में ब्रह्माजी के निमित्त घोर तपस्या की और उन्हें प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने वर मांगने के लिए कहा तब शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने तथास्तु बोला और उसे श्रीकृष्णकवच दिया। साथ ही ब्रह्मा ने शंखचूड को धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी। फिर वे अंतध्र्यान हो गए। ब्रह्मा की आज्ञा से तुलसी और शंखचूड का विवाह हो गया। ब्रह्मा और विष्णु के वरदान के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया। देवताओं ने त्रस्त होकर विष्णु से मदद मांगी परंतु उन्होंने खुद दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था अत: उन्होंने शिव से प्रार्थना की। तब शिव ने देवताओं के दुख दूर करने का निश्चय किया और वे चल दिए। परंतु श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहे थे तब विष्णु ने ब्राह्मण रूप बनाकर दैत्यराज से उसका श्रीकृष्णकवच दान में ले लिया। इसके बाद शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के शील का हरण कर लिया। अब शिव ने शंखचूड़ को अपने त्रिशुल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ। चूंकि शंखचूड़ विष्णु भक्त था अत: लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अति प्रिय है और सभी देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है। परंतु शिव ने चूंकि उसका वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है। इसी वजह से शिवजी को शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है।

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पौराणिक कहानी – शिव पूजा में क्यों काम में नहीं लेते केतकी के फूल (केवड़े के पुष्प)

हिन्दू धर्म में देवी – देवताओं के पूजन में सुगन्धित फूलो का बड़ा महत्व है, हम सभी देवी – देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पूजन में सुगंधित पुष्प काम में लेते है। पर क्या आपको पता है कि शिवजी कि पूजा में केतकी (केतकी संस्कृत का शब्द है हिंदी में इसे केवड़ा कहते है) के फूल का प्रयोग वर्जित है।  आखिर ऐसा क्यों है? इसके बारे में हमारे धर्म ग्रंथो में एक कथा प्रचलित है जो इस प्रकार है :-एक बार ब्रह्माजी व विष्णुजी में विवाद छिड़ गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है। ब्रह्माजी सृष्टि के रचयिता होने के कारण श्रेष्ठ होने का दावा कर रहे थे और भगवान विष्णु पूरी सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में स्वयं को श्रेष्ठ कह रहे थे। तभी वहां एक विराट ज्योतिर्मय लिंग प्रकट हुआ। दोनों देवताओं ने सर्वानुमति से यह निश्चय किया गया कि जो इस लिंग के छोर का पहले पता लगाएगा, उसे ही श्रेष्ठ माना जाएगा।अत: दोनों विपरीत दिशा में शिवलिंग का छोर ढूढंने निकले। छोर न मिलने के कारण विष्णुजी लौट आए। ब्रह्माजी भी सफल नहीं हुए, परंतु उन्होंने आकर विष्णुजी से कहा कि वे छोर तक पहुँच गए थे। उन्होंने केतकी के फूल को इस बात का साक्षी बताया। केतकी के पुष्प ने भी ब्रह्माजी के इस झूठ में उनका साथ दिया।  ब्रह्माजी के असत्य कहने पर स्वयं भगवान शिव वहां प्रकट हुए और उन्होंने ब्रह्माजी की आलोचना की।दोनों देवताओं ने महादेव की स्तुति की, तब शिवजी बोले कि मैं ही सृष्टि का कारण, उत्पत्तिकर्ता और स्वामी हूँ। मैंने ही तुम दोनों को उत्पन्न किया है। शिव ने केतकी पुष्प को झूठा साक्ष्य देने के लिए दंडित करते हुए कहा कि यह फूल मेरी पूजा में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इसीलिए शिव के पूजन में कभी केतकी का पुष्प नहीं चढ़ाया जाता।

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महाभारत की 10 अनसुनी कहानियाँ 

महाभारत की कहानियाँ हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, टेलीविज़न पर देखते आ रहे है फिर भी हम सब महाभारत के बारे में बहुत कुछ नहीं जानते है क्योकि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत बहुत ही बड़ा ग्रंथ है, इसमें एक लाख श्लोक है। आज हम आपको महाभारत की कुछ ऐसी ही कहानियां पढ़ाएंगे  जो आपने शायद पहले कभी नहीं पढ़ी होगी। तो आइये शुरुआत करते है मामा शकुनि से।  हम सब मानते है की शकुनि कौरवों का सबसे बड़ा हितैषी था जबकि है इसका बिलकुल विपरीत। शकुनि ही कौरवों के विनाश का सबसे बड़ा कारण था, उसने ही कौरवों का वंश समाप्त करने के लिए महाभारत के युद्ध की पृष्टभूमि तैयार की थी।  पर उसने ऐसा किया क्यों ? इसका उत्तर जानने के लिए हमे ध्रतराष्ट्र और गांधारी के विवाह से कथा प्रारम्भ करनी पड़ेगी। शकुनि ही थे कौरवों के विनाश का कारण : से एक साधु के कहे अनुसार उसका विवाह पहले एक बकरे के साथ किया गया था। बाद मैं उस बकरे की बलि दे दी गयी थी। यह बात गांधारी के विवाह के समय छुपाई गयी थी. जब ध्रतराष्ट्र को इस बात का पता चला तो उसने गांधार नरेश सुबाला और उसके 100 पुत्रों को कारावास मैं डाल दिया और काफी यातनाएं दी। एक एक करके सुबाला के सभी पुत्र मरने लगे। उन्हैं खाने के लिये सिर्फ मुट्ठी भर चावल दिये जाते थे। सुबाला ने अपने सबसे छोटे बेटे शकुनि को प्रतिशोध के लिये तैयार किया। सब लोग अपने हिस्से के चावल शकुनि को देते थे ताकि वह जीवित रह कर कौरवों का नाश कर सके। मृत्यु से पहले सुबाला ने ध्रतराष्ट्र से शकुनि को छोड़ने की बिनती की जो ध्रतराष्ट्र ने मान ली। सुबाला ने शकुनि को अपनी रीढ़ की हड्डी क पासे बनाने के लिये कहा, वही पासे कौरव वंश के नाश का कारण बने। शकुनि ने हस्तिनापुर मैं सबका विश्वास जीता और 100 कौरवों का अभिवावक बना। उसने ना केवल दुर्योधन को युधिष्ठिर के खिलाफ भडकाया बल्कि महाभारत के युद्ध का आधार भी बनाया। एक वरदान के कारण द्रोपदी बनी थी पांच पतियों की पत्नी : द्रौपदी अपने पिछले जन्म मैं इन्द्र्सेना नाम की ऋषि पत्नी थी। उसके पति संत मौद्गल्य का देहांत जल्दी ही हो गया था। अपनी इच्छाओं की पूर्ति की लिये उसने भगवान शिव से प्रार्थना की। जब शिव उसके सामने प्रकट हुए तो वह घबरा गयी और उसने 5 बार अपने लिए वर मांगा। भगवान शिव ने अगले जन्म मैं उसे पांच पति दिये। एक श्राप के कारण धृतराष्ट्र जन्मे थे अंधे : धृतराष्ट्र अपने पिछले जन्म मैं एक बहुत दुष्ट राजा था। एक दिन उसने देखा की नदी मैं एक हंस अपने बच्चों के साथ आराम से विचरण कर रहा हे। उसने आदेश दिया की उस हंस की आँख फोड़ दी जायैं और उसके बच्चों को मार दिया जाये। इसी वजह से अगले जन्म मैं वह अंधा पैदा हुआ और उसके पुत्र भी उसी तरह मृत्यु को प्राप्त हुये जैसे उस हंस के। अभिमन्यु था कालयवन राक्षस की  आत्मा : कहा जाता हे की अभिमन्यु एक कालयवन नामक राक्षस की आत्मा थी। कृष्ण ने कालयवन का वध कर, उसकी आत्मा को अपने अंगवस्त्र मैं बांध लिया था। वह उस वस्त्र को अपने साथ द्वारिका ले गये और एक अलमारी मैं रख दिया। सुभद्रा (अर्जुन की पत्नी) ने गलती से जब वह अलमारी खोली तो एक ज्योति उसके गर्भ मैं आगयी और वह बेहोश हो गयी। इसी वजह से अभिमन्यु को चक्रव्यूह भेदने का सिर्फ आधा ही तरीका बताया गया था। एकलव्य ही बना था द्रोणाचार्ये की मृत्यु का कारण : एकलव्य देवाश्रवा का पुत्र था। वह जंगल मैं खो गया था और उसको एक निषद हिरण्यधनु ने बचाया था। एकलव्य रुक्मणी स्वंयवर के समय अपने पिता की जान बचाते हुए मारा गया।  उसके इस बलिदान से प्रसन्न होकर श्री कृष्ण ने उसे वरदान दिया की वह अगले जन्म मैं द्रोणाचर्य से बदला ले पायेगा। अपने अगले जन्म मैं एकलव्य द्रष्टद्युम्न बनके पैदा हुआ और द्रोण की मृत्यु का कारण बना। पाण्डु की इच्छा अनुसार पांडवो ने खाया था अपने पिता के मृत शरीर को : पाण्डु ज्ञानी थे।  उनकी अंतिम इच्छा थी की उनके पांचो बेटे उनके म्रत शरीर को खायैं ताकि उन्होने जो ज्ञान अर्जित किया वो उनके पुत्रो मैं चला जाये। सिर्फ सहदेव ने पिता की इच्छा का पालन करते हुए उनके मस्तिष्क के तीन हिस्से खाये। पहले टुकड़े को खाते ही सहदेव को इतिहास का ज्ञान हुआ, दूसरे टुकड़े को खाने पे वर्तमान का और तीसरे टुकड़े को खाते ही भविष्य का।  हालांकि ऐसी मान्यता भी है की पांचो पांडवो ने ही मृत शरीर को खाया था पर सबसे ज्यादा हिस्सा सहदेव ने खाया था। कुरुक्षेत्र में आज भी है मिट्टी अजीब : कुरुक्षेत्र मैं एक जगह हे, जहां माना जाता हे की महाभारत का युध् हुआ था। उस जगह कुछ 30 किलोमीटर के दायरे में  मिट्टी संरचना बहुत अलग हे। वैज्ञानिक समझ नहीं पा रहे की यह कैसे संभव हे क्यूंकि इस तरह की मिट्टी सिर्फ तब हो सकती हे अगर उस जगह पे बहुत ज़्यादा तेज़ गर्मी हो। बहुत से लोगों का मानना हे की लड़ाई की वजह से ही मिट्टी की प्रवर्ती बदली हे। श्री कृष्ण ने ले लिया था बर्बरीक का शीश दान में : बर्बरीक भीम का पोता और घटोत्कच का पुत्र था।  बर्बरीक को कोई नहीं हरा सकता था क्योंकि उसके पास कामाख्या देवी से प्राप्त हुए तीन तीर थे, जिनसे वह कोई भी युध् जीत सकता था। पर उसने शपथ ली थी की वह सिर्फ कमज़ोर पक्ष के लिये ही लड़ेगा। अब चुकी बर्बरीक जब वहां पहुंचा तब कौरव कमजोर थे इसलिए उसका उनकी तरफ से लड़ना तय था।  जब यह बात श्री कृष्ण को पता चली तो उन्होंने उसका शीश ही दान में मांग लिया।  तथा उसे वरदान दिया की तू कलयुग  में मेरे नाम से जाना जाएगा। इसी बर्बरीक का मंदिर राजस्थान के सीकर जिले के खाटूश्यामजी में है जहाँ उनकी बाबा श्याम के नाम से पूजा होती है। हर योद्धा का अलग था शंख : सभी योधाओं के शंख बहुत शक्तिशाली होते थे। भागवत गीता के एक श्लोक मैं सभी शंखों के नाम हैं। अर्जुन के शंख का नाम देवदत्त था। भीम के शंख का

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कैसे खत्म हुआ श्रीकृष्ण सहित पूरा यदुवंश?

अठारह दिन चले महाभारत के युद्ध में रक्तपात के सिवाय कुछ हासिल नहीं हुआ। इस युद्ध में कौरवों के समस्त कुल का नाश हुआ, साथ ही पाँचों पांडवों को छोड़कर पांडव कुल के अधिकाँश लोग मारे गए। लेकिन इस युद्ध के कारण, युद्ध के पश्चात एक और वंश का खात्मा हो गया वो था ‘श्री कृष्ण जी का यदुवंश’। गांधारी ने दिया था यदुवंश के नाश का श्राप : महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद जब युधिष्ठर का राजतिलक हो रहा था तब कौरवों की माता गांधारी ने महाभारत युद्ध के लिए श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हुए श्राप दिया की जिस प्रकार कौरवों के वंश का नाश हुआ है ठीक उसी प्रकार यदुवंश का भी नाश होगा। गांधारी के श्राप से विनाशकाल आने के कारण श्रीकृष्ण द्वारिका लौटकर यदुवंशियों को लेकर प्रयास क्षेत्र में आ गये थे। यदुवंशी अपने साथ अन्न-भंडार भी ले आये थे। कृष्ण ने ब्राह्मणों को अन्नदान देकर यदुवंशियों को मृत्यु का इंतजार करने का आदेश दिया था। कुछ दिनों बाद महाभारत-युद्ध की चर्चा करते हुए सात्यकि और कृतवर्मा में विवाद हो गया। सात्यकि ने गुस्से में आकर कृतवर्मा का सिर काट दिया। इससे उनमें आपसी युद्ध भड़क उठा और वे समूहों में विभाजित होकर एक-दूसरे का संहार करने लगे। इस लड़ाई में श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न और मित्र सात्यकि समेत सभी यदुवंशी मारे गये थे, केवल बब्रु और दारूक ही बचे रह गये थे। यदुवंश के नाश के बाद कृष्ण के ज्येष्ठ भाई बलराम समुद्र तट पर बैठ गए और एकाग्रचित्त होकर परमात्मा में लीन हो गए। इस प्रकार शेषनाग के अवतार बलरामजी ने देह त्यागी और स्वधाम लौट गए। बहेलिये का तीर लगने से हुई श्रीकृष्ण की मृत्यु बलराम जी के देह त्यागने के बाद जब एक दिन श्रीकृष्ण जी  पीपल के नीचे ध्यान की मुद्रा में बैठे हुए थे, तब उस क्षेत्र में एक जरा नाम का बहेलिया आया हुआ था। जरा एक शिकारी था और वह हिरण का शिकार करना चाहता था। जरा को दूर से हिरण के मुख के समान श्रीकृष्ण का तलवा दिखाई दिया। बहेलिए ने बिना कोई विचार किए वहीं से एक तीर छोड़ दिया जो कि श्रीकृष्ण के तलवे में जाकर लगा। जब वह पास गया तो उसने देखा कि श्रीकृष्ण के पैरों में उसने तीर मार दिया है। इसके बाद उसे बहुत पश्चाताप हुआ और वह क्षमायाचना करने लगा। तब श्रीकृष्ण ने बहेलिए से कहा कि जरा तू डर मत, तूने मेरे मन का काम किया है। अब तू मेरी आज्ञा से स्वर्गलोक प्राप्त करेगा। बहेलिए के जाने के बाद वहां श्रीकृष्ण का सारथी दारुक पहुंच गया। दारुक को देखकर श्रीकृष्ण ने कहा कि वह द्वारिका जाकर सभी को यह बताए कि पूरा यदुवंश नष्ट हो चुका है और बलराम के साथ कृष्ण भी स्वधाम लौट चुके हैं। अत: सभी लोग द्वारिका छोड़ दो, क्योंकि यह नगरी अब जल मग्न होने वाली है। मेरी माता, पिता और सभी प्रियजन इंद्रप्रस्थ को चले जाएं। यह संदेश लेकर दारुक वहां से चला गया। इसके बाद उस क्षेत्र में सभी देवता और स्वर्ग की अप्सराएं, यक्ष, किन्नर, गंधर्व आदि आए और उन्होंने श्रीकृष्ण की आराधना की। आराधना के बाद श्रीकृष्ण ने अपने नेत्र बंद कर लिए और वे सशरीर ही अपने धाम को लौट गए। श्रीमद भागवत के अनुसार जब श्रीकृष्ण और बलराम के स्वधाम गमन की सूचना इनके प्रियजनों तक पहुंची तो उन्होंने भी इस दुख से प्राण त्याग दिए। देवकी, रोहिणी, वसुदेव, बलरामजी की पत्नियां, श्रीकृष्ण की पटरानियां आदि सभी ने शरीर त्याग दिए। इसके बाद अर्जुन ने यदुवंश के निमित्त पिण्डदान और श्राद्ध आदि संस्कार किए। इन संस्कारों के बाद यदुवंश के बचे हुए लोगों को लेकर अर्जुन इंद्रप्रस्थ लौट आए। इसके बाद श्रीकृष्ण के निवास स्थान को छोड़कर शेष द्वारिका समुद्र में डूब गई। श्रीकृष्ण के स्वधाम लौटने की सूचना पाकर सभी पाण्डवों ने भी हिमालय की ओर यात्रा प्रारंभ कर दी थी। इसी यात्रा में ही एक-एक करके पांडव भी शरीर का त्याग करते गए। अंत में युधिष्ठिर सशरीर स्वर्ग पहुंचे थे। वानर राज बाली ही था ज़रा बहेलिया संत लोग यह भी कहते हैं कि प्रभु ने त्रेता में राम के रूप में अवतार लेकर बाली को छुपकर तीर मारा था। कृष्णावतार के समय भगवान ने उसी बाली को जरा नामक बहेलिया बनाया और अपने लिए वैसी ही मृत्यु चुनी, जैसी बाली को दी थी।

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3 पौराणिक कहानियां- इसलिए भगवान विष्णु ने लिया राम अवतार

पहला प्रसंग- जय-विजय को दिया था सनकादि मुनि ने श्राप एक बार सनकादि मुनि भगवान विष्णु के दर्शन करने वैकुंठ आए। उस समय वैकुंठ के द्वार पर जय-विजय नाम के दो द्वारपाल पहरा दे रहे थे। जब सनकादि मुनि द्वार से होकर जाने लगे तो जय-विजय ने हंसी उड़ाते हुए उन्हें बेंत अड़ाकर रोक लिया। क्रोधित होकर सनकादि मुनि ने उन्हें तीन जन्मों तक राक्षस योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया। क्षमा मांगने पर सनकादि मुनि ने कहा कि तीनों ही जन्म में तुम्हारा अंत स्वयं भगवान श्रीहरि करेंगे। इस प्रकार तीन जन्मों के बाद तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। पहले जन्म में जय-विजय ने हिरण्यकशिपु व हिरण्याक्ष के रूप में जन्म लिया। भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर हिरण्याक्ष का तथा नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकशिपु का वध कर दिया। दूसरे जन्म में जय-विजय ने रावण व कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया। इनका वध करने के लिए भगवान विष्णु को राम अवतार लेना पड़ा। तीसरे जन्म में जय-विजय शिशुपाल और दंतवक्र के रूप में जन्मे। इस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण ने इनका वध किया। दूसरा प्रसंग- मनु-शतरूपा को भगवान विष्णु ने दिया था वरदान मनु और उनकी पत्नी शतरूपा से ही मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। इन दोनों पति-पत्नी के धर्म और आचरण बहुत ही पवित्र थे। वृद्ध होने पर मनु अपने पुत्र को राज-पाठ देकर वन में चले गए। वहां जाकर मनु और शतरूपा ने कई हजार साल तक भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की। प्रसन्न होकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और वर मांगने के लिए कहा। मनु और शतरूपा ने श्रीहरि से कहा कि हमें आपके समान ही पुत्र की अभिलाषा है। उनकी इच्छा सुनकर श्रीहरि ने कहा कि संसार में मेरे समान कोई और नहीं है। इसलिए तुम्हारी अभिलाषा पूरी करने के लिए मैं स्वयं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूंगा। कुछ समय बाद आप अयोध्या के राजा दशरथ के रूप में जन्म लेंगे, उसी समय मैं आपका पुत्र बनकर आपकी इच्छा पूरी करूंगा। इस प्रकार मनु और शतरूपा को दिए वरदान के कारण भगवान विष्णु को राम अवतार लेना पड़ा। तीसरा प्रसंग- नारद मुनि को हो गया था घमंड देवर्षि नारद को एक बार इस बात का घमंड हो गया कि कामदेव भी उनकी तपस्या और ब्रह्मचर्य को भंग नहीं कर सके। नारदजी ने यह बात शिवजी को बताई। देवर्षि के शब्दों में अहंकार भर चुका था। शिवजी यह समझ चुके थे कि नारद अभिमानी हो गए हैं। भोलेनाथ ने नारद से कहा कि भगवान श्रीहरि के सामने अपना अभिमान इस प्रकार प्रदर्शित मत करना। इसके बाद नारद भगवान विष्णु के पास गए और शिवजी के समझाने के बाद भी उन्होंने श्रीहरि को पूरा प्रसंग सुना दिया। नारद भगवान विष्णु के सामने भी अपना घमंड प्रदर्शित कर रहे थे। तब भगवान ने सोचा कि नारद का घमंड तोड़ना होगा, यह शुभ लक्षण नहीं है। जब नारद कहीं जा रहे थे, तब रास्ते में उन्हें एक बहुत ही सुंदर नगर दिखाई दिया, जहां किसी राजकुमारी के स्वयंवर का आयोजन किया जा रहा था। नारद भी वहां पहुंच गए और राजकुमारी को देखते ही मोहित हो गए। यह सब भगवान श्रीहरि की माया ही थी। राजकुमारी का रूप और सौंदर्य नारद के तप को भंग कर चुका था। इस कारण उन्होंने राजकुमारी के स्वयंवर में हिस्सा लेने का मन बनाया। नारद भगवान विष्णु के पास गए और कहा कि आप अपना सुंदर रूप मुझे दे दीजिए, जिससे कि वह राजकुमारी स्वयंवर में मुझे ही पति रूप में चुने। भगवान ने ऐसा ही किया, लेकिन जब नारद मुनि स्वयंवर में गए तो उनका मुख वानर के समान हो गया। उस स्वयंवर में भगवान शिव के दो गण भी थे, वे यह सभी बातें जानते थे और ब्राह्मण का वेष बनाकर यह सब देख रहे थे। जब राजकुमारी स्वयंवर में आई तो बंदर के मुख वाले नारदजी को देखकर बहुत क्रोधित हुई। उसी समय भगवान विष्णु एक राजा के रूप में वहां आए। सुंदर रूप देखकर राजकुमारी ने उन्हें अपने पति के रूप में चुना लिया। यह देखकर शिवगण नारदजी की हंसी उड़ाने लगे और कहा कि पहले अपना मुख दर्पण में देखिए। जब नारदजी ने अपने चेहरा वानर के समान देखा तो उन्हें बहुत गुस्सा आया। नारद मुनि ने उन शिवगणों को राक्षस योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया। शिवगणों को श्राप देने के बाद नारदजी भगवान विष्णु के पास गए और क्रोधित होकर उन्हें बहुत भला-बुरा कहने लगे। माया से मोहित होकर नारद मुनि ने श्रीहरि को श्राप दिया कि- जिस तरह आज मैं स्त्री के लिए व्याकुल हो रहा हूं, उसी प्रकार मनुष्य जन्म लेकर आपको भी स्त्री वियोग सहना पड़ेगा। उस समय वानर ही तुम्हारी सहायता करेंगे। भगवान विष्णु ने कहा-ऐसा ही हो और नारद मुनि को माया से मुक्त कर दिया। तब नारद मुनि को अपने कटु वचन और व्यवहार पर बहुत ग्लानि हुई और उन्होंने भगवान श्रीहरि से क्षमा मांगी। भगवान श्रीहरि ने कहा कि- ये सब मेरी ही इच्छा से हुआ है अत: तुम शोक न करो। उसी समय वहां भगवान शिव के गण आए, जिन्हें नारद मुनि ने श्राप दिया था। उन्होंने नारद मुनि ने क्षमा मांगी। तब नारद मुनि ने कहा कि- तुम दोनों राक्षस योनी में जन्म लेकर सारे विश्व को जीत लोगे, तब भगवान विष्णु मनुष्य रूप में तुम्हारा वध करेंगे और तुम्हारा कल्याण होगा।नारद मुनि के इन्हीं श्रापों के कारण उन शिव गणों ने रावण व कुंभकर्ण के रूप में जन्म लिया और श्रीराम के रूप में अवतार लेकर भगवान विष्णु को स्त्री वियोग सहना पड़ा।

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राधा के कहने पर श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाई, फिर तोड़कर फेंक दी, पढ़ें राधा-कृष्ण के प्रेम के अंत की कहानी

श्रीकृष्ण और राधा की प्रेम कहानी हम अक्सर सुनते हैं। राधा-कृष्ण की कहानी सिर्फ प्रेम ही नहीं बल्कि त्याग की सीख भी देती है। क्या आपको पता है कि राधा के अंतिम समय में श्रीकृष्ण ने उन्हें अपनी बांसुरी की मधुर धुन सुनाई। फिर राधा की मृत्यु के बाद अपनी बांसुरी तोड़कर फेंक दी। पढ़िए राधा-कृष्ण के प्रेम के अंत की ये अनोखी कहानी। श्रीकृष्ण भले ही राधा से प्रेम करते थे लेकिन उनका मिलन नहीं हो पाया। कृष्ण द्वारिका में जाकर बस गए। राधा भी ज्यादा समय तक कृष्ण से दूर नहीं रह सकीं और एक दिन द्वारिका पहुंच गई। श्रीकृष्ण ने जब उन्हें देखा तो वह बहुत खुश हुए। दोनों ने संकेतों से ढेर सारी बातें कीं। हालांकि राधा को वहां कोई नहीं जानता था।  राधा के कहने पर श्रीकृष्ण ने उनको महल में काम पर रख लिया। राधा महल में ही रहने लगीं। वह जब भी मौका मिलता चुपके से कृष्ण को देखतीं और खुश हो लेतीं। ऐसा लंबे समय तक चलता रहा। एक दिन राधा अचानक महल से चली गईं। उन्होंने किसी को नहीं बताया कि वह कहां जा रही हैं। मगर श्रीकृष्ण जानते थे कि वह कहां जा रही हैं। राधा का शरीर अब जवाब दे रहा था। उनका अंतिम समय निकट आ रहा था। इसलिए वह श्रीकृष्ण से दूर रहने लगीं। एक दिन उन्हें श्रीकृष्ण की बहुत याद आई। वह बस अपने कान्हा की एक झलक पाना चाहती थीं। जब कृष्ण को पता चला तो वे तुरंत राधा के पास पहुंच गए। राधा अपने कृष्ण को सामने देखकर बहुत खुश हुई। राधा की मृत्यु को करीब देखते हुए श्रीकृष्ण ने उनसे कुछ मांगने के लिए कहा। मगर राधा ने इनकार कर दिया। राधा बोलीं कि आप मेरे सामने हैं, इसके अलावा मुझे और कुछ नहीं चाहिए। कृष्ण के बार-बार कहने पर राधा ने कहा कि वे उन्हें एक बार बांसुरी की धुन सुनाएं। राधा के कहने पर श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाई। बांसुरी की मधुर धुन सुनते हुए ही राधा ने अपने प्राण त्याग दिए। राधा की मृत्यु पर श्रीकृष्ण को गहरा आघात लगा। उन्होंने दुख में अपनी प्रिय बांसुरी को तोड़कर फेंक दिया।

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आखिरी सांस ले रही राधा के लिए श्रीकृष्ण ने अंतिम बार बजाई थी बांसुरी

कृष्ण की बांसुरी की तान पर गोपियों समेत पूरा गोकुल झूम उठता था. श्रीकृष्ण ने अंतिम बार राधा के लिए बांसुरी की तान छेड़ी थी, जिनके निधन के बाद कृष्ण ने बांसुरी का पूरी उम्र के लिए त्याग कर दिया. कृष्ण की कल्पना उनकी मुरली बिना मुश्किल है. इसकी तान पर गोपियां सुध-बुध खोकर खिचीं चली आती थीं. प्रेम और श्रृंगार की प्रतीक बांसुरी कृष्ण को तोहफे में मिली थी. कृष्ण ने भी अपनी बांसुरी अपनी याद के तौर पर भेंट स्वरूप दे दी. द्वापरयुग में जब श्री कृष्ण जन्मे तो सभी देवी-देवता भेष बदल-बदलकर उनके दर्शन को आ रहे थे. भोलेनाथ भी उनके दर्शन के लिए आना चाहते थे, लेकिन अब प्रभु के दर्शन को आना था तो भला वो खाली हाथ कैसे जा सकते हैं? शंकरजी के पास दधीचि ऋषि की अस्थि थी, जिससे उन्हें एक बांसुरी बनाई. कृष्ण से मिलते हुए उन्होंने कृष्ण को यह बांसुरी भेंट स्वरूप दी. इसके बाद कृष्ण ने बांसुरी को जिंदगी का अहम हिस्सा बना लिया और इस तरह वह मुरलीधर बन गए. कृष्ण गोकुल से जब मथुरा जा रहे थे, इससे पहले महारास हुई. इसके बाद कृष्ण ने अपनी बांसुरी प्रेयसी राधा को देते हुए बांसुरी बजाना छोड़ दिया.  आखिरी बार द्वारिका में मिले थे राधा-कृष्णकहा जाता है कि राधा कृष्ण की आखिरी मुलाकात द्वारिका में हुई. तब राधा ने अंतिम इच्छा के तौर पर कृष्ण से बांसुरी बाजने का आग्रह किया. राधा के अनुरोध को कृष्ण ने मान लिया और एक बार फिर बांसुरी की मधुर तान छेड़ी. कृष्ण की बांसुरी की धुन में खोकर राधा ने वहीं अपनी देह त्याग दी. यह अंतिम मौका था, जब कृष्ण ने बांसुरी बजाई थी. राधा वियोग के चलते दुखी होकर कृष्ण ने अपनी बांसुरी सदा के लिए तोडक़र झाडिय़ों में फेंक दी.

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फूलों संग राधा-कृष्ण ने खेली होली

11 दिवसीय रासलीला का गुरुवार की रात चोपन बैरियर स्थित रामलीला मैदान में समापन हो गया। वृंदावन से पधारे रासलीला के कलाकारों ने भगवान श्रीकृष्ण के लीलाओं का सजीव मंचन कर लोगों को भक्ति सागर में गोते लगवाए। नगर सहित आस पास के इलाकों से भारी संख्या में लोग उपस्थित रहकर भगवान के लीला का रसपान देर रात तक करते रहे।खचाखच भरे पंडाल में जैसे ही बरसाने की प्रसिद्ध लट्ठमार होली की शुरुआत हुई पूरा पंडाल राधे-राधे के नारों के साथ गुंजायमान हो गया। श्रीकृष्ण और राधारानी के बीच होली खेलने को लेकर दर्शाए गए अनेक प्रकार के नोकझोंक पर दर्शकों ने खूब आनंद उठाया। दो कुंतल फूलों संग श्रीकृष्ण और राधारानी के साथ जमकर होली खेली गई। इस मनोहारी दृश्य को देख सभी लोग बाग-बाग हो गए। इस दौरान आनंद अग्रवाल, रामसुंदर, राजेश साहनी, विमल साह, सत्यप्रकाश तिवारी, सुनील सिंह, अजयलक्ष्मी श्रीवास्तव, मीना देवी आदि रहीं।

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राधा-कृष्ण की रासलीला के गवाह बनते हैं तुलसी के पौधे, रात होते ही बदल लेते हैं रूप

नई दिल्ली। भारत को मान्यताओं और आस्था का केंद्र माना जाता है। ऐसे में देश में कई ऐसी रहस्यमयी जगह हैं जहां आज भी भगवान के अस्तित्व की झलक देखने को मिलती हैं। इन्हीं जगहों में से एक है वृंदावन का निधि वन। जानकारों के मुताबिक इस जगह राधा और कृष्ण (Radha- Krishna) शाम के अंधेरे में रास रचाने आते हैं और उनका साथ देने के लिए वन में मौजूद पेड़ गोपियां बन जाती हैं। कोबरा सांप के पास मिली नागमणि, सिर से निकल रही थी लाल रंग की रौशनीपौराणिक मान्यता के तहत हर शाम आरती के बाद निधिवन (NIdhivan) को बंद कर दिया जाता है, उसके बाद वहां कोई नहीं रहता। यहां तक कि पशु-पक्षी भी अपना ठिकाना कहीं और बसा लेते हैं। कहा जाता है कि जो भी मनुष्य रासलीला देखने की कोशिश करता है, वह या तो पागल हो जाता है या उसकी मौत हो जाती है।निधिवन की एक और बात बेहत आश्चर्यजनक है, वो है यहां लगे तुलसी के पौधे। निधिवन में तुलसी का हर पौधा जोड़े में है। कहते हैं जब राधा-कृष्ण वन में रास रचाते हैं तब यही जोड़ेदार पेड़ गोपियां बन जाती हैं। जैसे ही सुबह होती है तो सब फिर ये तुलसी के पौधे में बदल जाती हैं।

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जब श्रीकृष्ण से नाराज़ होकर राधा रानी ने बोल दिए ये वचन

कहा जाता है सावन का महीना अपने साथ कई त्यौहार लेकर आता है। ये अपने साथ सावन  की झड़ी के साथ-साथ त्यौहारों की भी झड़ी लेकर आता है। कल यानि 15 अगस्त पूर्णिमा के दिन श्रावण के महीने का तो समापन हो जाएगा। लेकिन त्यौहारों की झड़ी अभी लगी रहेगी। इस महीने की 24 अगस्त को श्री कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। इस पर्व को श्री कृष्ण के जन्म दिवस के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन देश का माहौल बहुत ही अद्भुत होता ह। श्री कृष्ण के मंदिरों में उन्हें माक्खन खिलाने के लिए उनकी भक्तों की लंबी कतारे देखने को मिलती हैं। इसके अलावा सड़कों पर राधा-कृष्ण की झांकियां निकाली जाती हैं।जन्माष्टमी के आने से पहले आज हम आपको श्रीकृष्ण व राधा से जुड़ी एक कथा बताने जा रहे हैं। राध-कृष्ण के प्रेम की अनोखी गाथा सब जानते हैं। बल्कि कहा जाता था कि राधा-कृष्ण के केवल शरीर दो थे लेकिन उनकी आत्मा एक ही थी। एक-दूसरे से ज़रा सी भी दूरी इन्हें बर्दाश नहीं होती थी। लेकिन क्या आपको पता है कि एक बार श्री कृष्ण ने कुछ ऐसा कर दिया था कि राधा समेत सभी गोपियां उनसे नाराज़ हो गई थी। बल्कि राधा रानी ने उन्हें ये तक कह दिया था कि मुझ छूना मत। आइए जानते हैं क्या था ये किस्सा-कहा जाता है इस घटना के बाद श्री कृष्ण ने जो किया उसकी निशानी आज भी गोवर्धन पर्वत की तलहटी में कृष्ण कुंड के रूप में मौजूद है। माना जाता है राधा-कृष्ण का ये संवाद ही कुंड के निर्माण का मुख्य कारण था। राधा रानी द्वारा श्री कृष्ण को उनको स्पर्श करने से मना कर देने की वजह थी भगवान श्री कृष्ण द्वारा कंस के भेजे हुए असुर अरिष्टासुर का वध करना। शास्त्रों के अनुसार अरिष्टासुर बैल के रूप में व्रजवासियों को कष्ट देने आया था। मगर इस सब से अंजान राधा व सभी गोपियां बैल की हत्या करने के कारण श्री कृष्ण को गौ का हत्यारा मान रही थी।  जिसके बाद श्री कृष्ण ने राधा को खूब समझाने की कोशिश की उन्होंने बैल की मृत्यु नहीं बल्कि असुर का वध किया है। जब खूब समझाने के बाद भी राधा रानी नहीं मानी तो श्री कृष्ण ने जोर ज़मीन पर अपनी ऐड़ी पटकी, जिससे वहां जल की धारा बहने लगी।कहा जाता है इस जलधारा से एक कुंड बन गया। श्री कृष्ण ने सभी तीर्थों को गोवर्धन पर्वत की तलहटी में बने इस जलकुंड में आने को कहा। इनके आदेश पर सभी तीर्थ राधा कृष्ण के सामने उपस्थिति हो गए, और सभी कुंड में प्रवेश कर गए। जिसके बाद श्री कृष्ण ने इस कुंड में स्नान किया और कहा कि जो भी इस कुंड में स्नान करेगा उसे एक ही बार में सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त होगा।

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जान‍िए, धरती पर राधा-कृष्‍ण का प्रेम कहां से और कब शुरू हुआ था?

राधा-कृष्‍ण के अलौक‍िक प्रेम को तो सभी जानते हैं। यह उनके प्रेम की ही पराकाष्‍ठा है कि चोट कान्‍हा को लगे तो पीर राधा को होती है। पुराणों में श्री राधारानी को कृष्‍ण की शाश्‍वत जीवन संग‍िनी कहा जाता है। लेकिन क्‍या आप जानते कि इस प्रेम की शुरुआत धरती पर कब और कहां से हुई? 11 माह में हुई थी कान्‍हा से पहली मुलाकात कथा मिलती है कि श्रीराधा रानी की कान्‍हा से पहली मुलाकात तब हुई थी जब वह स्‍वयं 11 महीने की थीं। तब श्रीकृष्‍ण महज एक द‍िन के थे। उस समय उनका जन्‍मोत्‍सव मनाया जा रहा था। कहा जाता है क‍ि उस समय राधाजी अपनी मां कीर्ती के साथ नंदगांव आई थीं। तब वह अपनी माता की गोद में थीं और कन्‍हैया पालने में। तो ऐसे राधाजी की गोद में पहुंच गए कान्‍हा गर्ग संहिता में उल्‍लेख मिलता है कि जन्‍मोत्‍सव के बाद कान्‍हा दूसरी बार राधाजी से तब मिले तब वह अपने पिता नंद बाबा के भांडीर वन से गुजर रहे थे। कहा जाता है कि उसी समय नंदबाबा जी के सामने एक द‍िव्‍य ज्‍योति प्रकट हुई। बताया जाता है कि जो स्वयं श्री राधारानी थीं। उन्‍होंने नंदबाबा से कहा क‍ि वह कन्‍हैया को उन्‍हें दे दें। तब नंदबाबा ने कान्‍हाजी को राधा रानी की गोद में डाल द‍िया। कहा जाता है कि यह मुलाकात लौकिक नहीं बल्कि अलौकिक थी। राधा रानी के पास जाकर त्‍याग दिया बाल रूप कथा के अनुसार, जब नंदबाबा ने राधाजी की गोद में कन्‍हैया को सौंपा तब कान्‍हा ने अपना बाल रूप त्‍याग द‍िया। कुछ ही देर में वह किशोर रूप में आ गए। उसी समय ब्रह्माजी उपस्थित हुए और उन्‍होंने कृष्‍ण-राधा का व‍िवाह संपन्‍न कराया। कथा के अनुसार कुछ द‍िनों तक राधा-कृष्‍ण एक साथ उसी वन में रहे और फिर राधारानी ने पुन: बालरूप के श्रीकृष्‍ण को नंदबाबा को सौंप द‍िया। तो यहां से शुरू हुई थी कन्‍हैया की प्रेम कहानी कहा जाता है कि वन की मुलाकात के बाद राधाजी और कान्‍हा संकेत नाम की जगह पर हुई थी। यह स्‍थान नंद गांव और बरसाना जो कि राधा जी की जन्‍मस्‍थली थी उसके बीच में है। यह एक छोटा सा गांव है। मान्‍यता है कि इसी स्‍थान पर मुरलीधर और राधा की अद्भुद प्रेम कहानी शुरू हुई थी। बता दें क‍ि हर साल भाद्र शुक्‍ल अष्‍टमी से चतुर्दशी तिथ‍ि तक संकेत गांव में राधा-कृष्‍ण के प्रेम को याद‍ किया जाता है। उनकी याद में उत्‍सव का आयोजन क‍िया

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