MYTHOLOGICAL STORIES

कैसे बालक ध्रुव बना तारा? ध्रुव तारे की कहानी 

मरोज़ रात आसमान में जगमगाते असंख्य तारों को देखते हैं. उनमें से उत्तर दिशा में दिखाई देने वाला सबसे चमकदार तारा हम सबका ध्यान आकर्षित करता है. सदा स्थिर नज़र आने वाला वह तारा है – ध्रुव तारा है. ब्रह्माजी के मानस पुत्र स्वयंभू मनु ने दो पुत्र थे – प्रियवद और उत्तानपाद. राजा उत्तानपाद ने दो विवाह किये. उनकी पहली पत्नि का नाम सुनीति था और दूसरी का नाम सुरुचि. दोनों रानियों से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. सुनीति के पुत्र का नाम ध्रुव रखा गया और सुरुचि के पुत्र का नाम उत्तम. उत्तानपाद दोनों राजकुमारों के प्रति समान प्रेमभाव रखते थे. रानी सुनीति भी अपने पुत्र ध्रुव की तरह उत्तम को भी अपना ही पुत्र मान स्नेह किया करती थी. किंतु सुरुचि के मन में सुनीति और ध्रुव के प्रति ईर्ष्याभाव था. एक दिन उत्तम अपने पिता की गोद में बैठा खेल रहा था. उत्तानपाद उसे प्रेम से सहला रहे थे. जब ध्रुव वहाँ पहुँचा, तो उसका मन भी पिता की गोद में बैठने के लिए मचल उठा. वह भी जाकर अपने पिता की गोद में बैठ गया. उसी समय रानी सुरुचि वहाँ पहुँच गई. उसने जब ध्रुव को अपने पिता उत्तानपाद की गोद में बैठा देखा, तो चिढ़ गई और खींचकर ध्रुव को गोद से उतार दिया. फिर अपने कटु वचन से ध्रुव को आहत करते हुए बोली, “अपने पिता की गोद और इस राज्य के सिंहासन पर बैठने का अधिकार केवल मेरे पुत्र उत्तम का है.” सुरुचि के कटु वचन सुनकर ध्रुव का बालमन दु:खी हो गया. वह दौड़कर अपनी माता सुनीति के पास गया और रोते हुए सारी बात बता दी. सुनीति उसे समझाते हुए बोली, “पुत्र, दु:खी मत हो, ना ही उस मनुष्य के अमंगल की कामना करो, जिसने तुम्हें अपमानित किया है. अपने कर्मों का फल मनुष्य को भोगना ही पड़ता है. तुम अपना दुःख दूर करने के लिए भगवान विष्णु की आराधना करो. उनकी कृपा से ही तुम्हारे पितामह को मोक्ष की प्राप्ति हुई थी. वे दु:खहर्ता हैं. अब वे ही तुम्हारा दुःख दूर करेंगे.” माता की बात से बालक ध्रुव के कोमल मन में भगवान विष्णु के प्रति भक्ति भाव जागृत हो गया. तत्काल गृह त्यागकर वह वन की ओर प्रस्थान कर गया. मार्ग में उसे देवर्षि नारद मिले. उन्होंने ध्रुव को भगवान विष्णु की आराधना की विधि से अवगत करवाया. उसके उपरांत ध्रुव ने यमुना में स्नान किया और अन्न-जल त्यागकर पैर के अंगूठे के बल खड़ा होकर भगवान विष्णु की आराधना में लीन हो गया. समय व्यतीत होने के साथ उसके तप के तेज में वृद्धि होने लगी, जो तीनों लोक में पहुँच गई. उसके अंगूठे के भार से पृथ्वी दबने लगी. उसका कठोर तप देख भगवान विष्णु को उसके समक्ष प्रकट होना ही पड़ा. ध्रुव को दर्शन देकर भगवान विष्णु ने पूछा, “वत्स, तुम्हारी आराधना से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ. बोलो, क्या वरदान चाहते हो?” बालक ध्रुव कहने लगा, “भगवन! मुझे माता सुरुचि ने अपमानित कर पिता की गोद से उतार दिया था. उनका कहना था कि मैं अपने पिता की गोद का अधिकारी नहीं हूँ. माता सुरुचि की इस बात ने मेरे अंतर्मन को आहत कर दिया था और मैं भागा-भागा माता सुनीति के पास अपनी व्यथा सुनाने गया, तो उन्होंने मुझे आपकी शरण में आने का परामर्श दिया….” “…..मैंने आपकी आराधना आपकी स्नेह प्राप्ति के लिए की है प्रभुवर. आप जगत के तारणहार हैं. आपकी दृष्टि में सृष्टि के समस्त प्राणी समान हैं. पिता के गोद से उतारे जाने के बाद मैंने प्रण लिया था कि अब मैं केवल आपकी ही गोद में बैठूंगा. कृपा मुझे अपनी गोद में वह स्थान दे दीजिये, जहाँ से मुझे कोई उतार न सके.” भावविभोर होकर बालक ध्रुव बोला. ध्रुव की अभिलाषा जानकर भगवान विष्णु बोले, “वत्स, तुम्हारा निःस्वार्थ भक्ति भाव देख मैं तुम्हें अपनी गोद में स्थान देता हूँ. यह ब्रह्माण्ड मेरा अंश है और आकाश मेरी गोद. तुम मेरी गोद आकाश में ध्रुव तारे के रूप में स्थापित होगे. तुम्हारे प्रकाश से पूरा ब्रह्माण्ड जगमगायेगा. तुम्हारा स्थान सप्तऋषियों से भी ऊपर होगा. वे तुम्हारी परिक्रमा करेंगे. जब तक ब्रह्माण्ड है, तुम्हारा स्थान निश्चित है. तुम्हारे स्थान से तुम्हें कोई डिगा नहीं पायेगा. किंतु वर्तमान में तुम्हें अपना राज्य संभालना है. इसलिए तुम घर लौट जाओ. छत्तीस हजार वर्ष तक पृथ्वी पर राजकर तुम मेरी गोद में आओगे.” इतना कहकर भगवान विष्णु अंतर्ध्यान हो गए. ध्रुव वापस घर लौट गया. कुछ वर्ष उपरांत राजा उत्तानपाद अपना राजपाट ध्रुव को सौंपकर वन चले गए. भगवान विष्णु के वरदान अनुसार पृथ्वी पर छत्तीस हजार वर्ष तक धर्मपूर्वक राज करने के उपरांत ध्रुव आकाश में ध्रुव तारा बनकर सदा के लिए अमर हो गया.

कैसे बालक ध्रुव बना तारा? ध्रुव तारे की कहानी  Read More »

जब देवर्षि नारद बने बंदर : पौराणिक कथा

माता पार्वती देवर्षि नारद के तपोबल और ज्ञान से अत्यंत प्रभावित थी. वे सदा उनकी प्रशंषा करती रहती थी. एक बार बातों-बातों में वे भगवान शिव के समक्ष नारद मुनि की प्रशंषा करने लगी. तब शिव जी ने उन्हें बताया कि नारद ज्ञान के अथाह सागर हैं. किंतु एक बार उन्हें अपने ज्ञान और तपोबल का अहंकार हो गया और इस अहंकार के कारण उन्हें बंदर बनना पड़ गया देवर्षि नारद के बंदर बनने की बात से माता पार्वती पूर्णतः अनभिज्ञ थी. उनके मन में इस कथा को जानने की जिज्ञासा जाग उठी. उनकी जिज्ञासा शांत करने भगवान शिव ने उन्हें पूरी कथा सुनाई, जो इस प्रकार है – हिमालय पर्वत पर एक पवित्र गुफ़ा स्थित थी. उस गुफ़ा के आस-पास का वातावरण बड़ा ही मनमोहक था. समीप ही गंगा नदी प्रवाहित होती थी. ऊँचे पर्वत और हरे-भरे वन से आच्छादित वह स्थान देवलोक जैसा रमणीय प्रतीत होता था.एक दिन नारद भ्रमण करते हुए उस स्थान पर पहुँच गए. वहाँ का मनोरम दृश्य देख वे मुग्ध हो गए. वहाँ उन्होंने अपनी तपोस्थली बनाई और भगवान विष्णु की तपस्या में लीन हो गए. जब नारद की तपस्या के बारे में देवराज इंद्रा को पता चला, तो वे चिंतित हो उठे. उन्हें अपना इंद्रलोक का सिंहासन डोलता दिखाई पड़ने लगा. वे भयभीत हो गए कि कहीं अपने तपोबल से नारद उनका सिंहासन न छीन ले. देवराज इंद्र ने नारद की तपस्या भंग करने की ठान ली. उन्होंने कामदेव को उनके पास भेजा. जब कामदेव नारद के पास पहुँचे, तब वे तपस्या में लीन थे. कामदेव ने अपनी माया से उनकी कामाग्नि भड़काने का प्रयास प्रारंभ किया. सर्वप्रथम उन्होंने ऋतु परिवर्तित कर बसंत ऋतु उत्पन्न कर दी. बसंत ऋतु होते ही पेड़-पौधे रंग-बिरंगे पुष्प से आच्छादित हो गए. कोयल कूकने लगी और भंवरे गुंजन करने लगे. शीतल और सुगंधित पवन बहने लगी. कामदेव ने नारद के पास अप्सरायें भेंजी, जो नृत्य कर उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करने लगी. किंतु कामदेव का संपूर्ण प्रयास विफल रहा. नारद की तपस्या भंग न हो सकी. यह देख कामदेव भयभीत हो उठे. उन्हें भय था कि कहीं इस कृत्य के लिए नारद उन्हें श्राप न दें दे. वे उनसे क्षमा मांगने लगे. नारद ने उन्हें तो क्षमा कर दिया, किंतु काम को जीत लेने के कारण उनका मन अहंकार से भर उठा. मन में अहंकार लिए हुए वे भगवान शिव के पास पहुँचे और उनके सामने स्वयं का बखान करने लगे. शिवजी समझ गए कि नारद अहंकार में चूर है. उन्होंने नारद को परामर्श दिया कि यह बात भगवान विष्णु को न बताये. शिवजी जानते थे कि भगवान विष्णु यदि नारद के अहंकार को समझ गए, तो इसका परिणाम नारद को किसी न किसी रूप में भुगतना पड़ेगा. किंतु अपने अहं में चूर नारद ने शिवजी की बात नहीं मानी और क्षीरसागर पहुँचकर भगवान विष्णु के समक्ष कामदेव की माया विफ़ल करने का वृतांत सुना दिया. भगवान विष्णु को नारद का अहंकार समझते देर न लगी. नारद से वे कुछ न बोले, किंतु उनका अहंकार तोड़ने अपनी लीला रच दी. कुछ देर उपरांत नारद भगवान विष्णु से आज्ञा लेकर प्रस्थान कर गए. वे जिस मार्ग से जा रहे थे, वहाँ भगवान विष्णु ने अपनी माया से एक सुंदर नगर का निर्माण कर दिया. उस नगर का राजा शीलनिधि था. उसकी पुत्री विश्वमोहिनी थी, जो सौंदर्य की प्रतिमूर्ति थी. उसके सौंदर्य पर रीझकर कई राज्यों के राजकुमारों ने उससे विवाह करने का प्रस्ताव राजा के पास भिजवाया था. किंतु किसी राजकुमार का प्रस्ताव स्वीकार करने के स्थान पर राजा शीलनिधि ने राजकुमारी विश्वमोहिनी के स्वयंवर का आयोजन कर दिया. कई सुंदर, सुयोग्य और प्रतापी राजकुमार स्वयंवर हेतु नगर में उपस्थित हुए. नारद नगर में पहुंचकर राजा शीलनिधि से मिलने पहुँचे. राजा शीलनिधि ने उन्हें राजकुमारी विश्वमोहिनी के स्वयंवर के बारे में बताया तथा उसकी हस्तरेखा देख उसके भविष्य के बारे में जानकारी देने का निवेदन किया. राजकुमारी विश्वमोहिनी जब नारद के समक्ष उपस्थित हुई, तो वे उसका रूप देख मोहित हो गए. उसकी हस्तरेखा में लिखा था कि जो व्यक्ति उससे विवाह करेगा, वह अजेय और अमर हो जायेगा. नारद ने हस्तरेखा में लिखी यह बात पढ़ तो ली, किंतु राजा और राजकुमारी को नहीं बताई. वे उन्हें कुछ और ही बताकर वहाँ से चले आये. नारद मुनि अपना वैराग्य भूल चुके थे. वे राजकुमारी से विवाह करना चाहते थे. उन्होंने भगवान विष्णु का ध्यान किया. जब भगवान विष्णु प्रकट हुए, तो नारद ने उनसे सुंदर रूप की मांग की, ताकि सुंदर रूप के बल पर राजकुमारी विश्वमोहिनी से विवाह कर सकें. भगवान विष्णु ने कहा, “नारद, तुम्हारा कल्याण हो और अंतर्ध्यान हो गए.” अपनी माया से उन्होंने नारद को बंदर का रूप दे दिया. नारद मुनि प्रसन्न मुद्रा में स्वयंवर के लिए निकल पड़े. वे इस बात से पूर्णतः थे कि उनका मुख बंदर के समान हो गया है. एक पेड़ के पीछे छिपे दो शिवगण यह सारी माया देख रहे थे. वे भी नारद मुनि के पीछे-पीछे स्वयंवर में पहुँच गए. स्वयंवर में वे नारद के निकट ही बैठे और आपस में उनके रूप की प्रशंषा करने लगे. यह प्रशंषा नारद ने सुन ली और उनका अहंकार अपने चरम पर पहुँच गया. वे यह मान बैठे थे कि राजकुमारी विश्वमोहिनी उनको ही वरमाला पहनाएगी. किंतु जब राजकुमारी विश्वमोहिनी वरमाला लेकर आयी, तो नारद को देखे बिना ही एक अन्य राजकुमार के गले में वरमाला डाल दी. यह राजकुमार और कोई नहीं, बल्कि भगवान विष्णु ही थे. भगवान विष्णु रूपी राजकुमार के गले में वरमाला देख अहंकार में चूर नारद के मन में क्रोध और ईर्ष्या का भाव जाग गया. उसी समय शिवगणों ने उनका परिहास करते हुए कहा, “ऐसे मुख को राजकुमारी क्या उसके दासी भी न देखे. तनिक जल में अपना मुख तो देखो.” नारद ने जब जल में अपना वानर मुख देखा, तो उनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया. क्रोध के आवेश में उन्होंने दोनों शिवगणों को राक्षस बन जाने का श्राप दिया और वहाँ से भगवान विष्णु से मिलने निकल गए. तब तक उनका मुख समान्य हो चुका था. मार्ग में ही उन्हें भगवान विष्णु मिल गए. उनके साथ माता लक्ष्मी और विश्वमोहिनी भी थी. नारद को भगवान

जब देवर्षि नारद बने बंदर : पौराणिक कथा Read More »

कैसे मूषक बना भगवान गणेश का वाहन? पौराणिक कथा

सभी हिंदू देवी-देवताओं के अपने-अपने वाहन हैं. आपने अवश्य गौर किया होगा कि ये वाहन कोई न कोई पशु या पक्षी हैं. पशु या पक्षियों के देवी-देवताओं के वाहन बनने के पीछे के कारण में जाएँ, तो उनका उत्तर कुछ पौराणिक कथाओं में मिलता है. शिव और पार्वती के पुत्र गणेश जी मूषक पर विराजमान होते हैं. उनका वाहन ‘डिंक’ नामक मूषक है. गणेश जी की विशाल शारीरिक संरचना के समक्ष मूषक आकार में अत्यंत छोटा है. ऐसे में प्रश्न उठता है कि गणेश जी छोटे से जीव पर क्यों विराजमान होते हैं? उन्होंने इतने छोटे से जीव को अपना वाहन क्यों चुना है? इन प्रश्नों का उत्तर भी दो पौराणिक कथाओं में वर्णित है. आइये जानते हैं मूषक के गणेश जी का वाहन बनने के पीछे की कथा : प्रथम कथा यह घटना द्वापर युग की है और इस कथा का विवरण गणेश पुराण में मिलता है. एक दिन देवराज इंद्र के दरबार में गहन चर्चा चल रही थी. दरबार में उपस्थित समस्त देवगण चर्चा में लीन थे. किंतु क्रौंच नामक गंधर्व अप्सराओं के साथ हँसी-ठिठोली कर रहा था. जब देवराज इंद्र की दृष्टि क्रौंच पर पड़ी, तो वे क्रोधित हो उठे और उसे मूषक बन जाने का श्राप दे दिया. मूषक बना क्रौंच स्वर्गलोक से पृथ्वीलोक में पराशर ऋषि के आश्रम में आ गिरा. स्वभाव से चंचल क्रौंच ने ऋषि आश्रम में उत्पात मचा दिया. उसने मिट्टी के समस्त पात्र तोड़ डाले, उसमें रखे अन्न का भक्षण कर लिया, ऋषियों के वस्त्र कुतर दिए और आश्रम की सुंदर वाटिका उजाड़ दी. मूषक के इस उत्पात से पराशर ऋषि चिंतित हो गए और उससे छुटकारा दिलाने की प्रार्थना लिए गणेश जी की शरण में पहुँचे. गणेश जी ने पराशर ऋषि की प्रार्थना स्वीकार कर ली और मूषक रूपी क्रौंच को पकड़ने एक तेजस्वी पाश फेंका. पाश के बंधन से बचने क्रौंच पाताल लोक भाग गया. किंतु पाश ने पाताल लोक तक उसका पीछा किया और उसे बांधकर गणेश जी के समक्ष ला खड़ा किया. साक्षात गणेश जी को अपन समक्ष देख क्रौंच भयभीत हो गया और अपने प्राणों की भिक्षा मांगने लगा. तब गणेश जी बोले, “तूने पराशर ऋषि के आश्रम में बहुत उत्पात मचाया है, जो क्षमायोग्य तो नहीं है. किंतु मैं शरणागत की रक्षा अपना परम धर्म मानता हूँ. तुम्हें जो वरदान चाहिए मांग लो.” गणेश जी की इस बात पर क्रौंच का अहंकार जाग उठा और वह बोला, “मुझे किसी वरदान की आवश्यकता नहीं है. आप चाहे तो मुझसे कोई वर मांग लें.” अहंकारी क्रौंच के इस कथन पर गणेश जी मंद-मंद मुस्कुराये और बोले, “ऐसा ही सही. मैं तुझसे अपना वाहन बन जाने का वर मांगता हूँ.” क्रौंच के पास कोई अन्य विकल्प न था. अपने कथन अनुसार वह गणेश जी का वाहन बन गया. गणेश जी जैसे ही मूषक रुपी क्रौंच पर आरूढ़ हुए, उनके भारी शरीर से वह दबने लगा और उसकी प्राणों पर बन आई. उसका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया. उसने गणेश जी से याचना की कि वे अपना वजन वहन करने योग्य कर लें. गणेश जी ने वैसा ही किया. उस दिन से मूषक गणेश जी का वाहन बन गया और सदा उनकी सेवा में लगा रहा. गणेश जी के वाहन के रूप में उसका नाम ‘डिंक’ पड़ा. गणेश जी की मूषक पर सवारी स्वार्थ पर विजय का संकेत है.     दूसरी कथा गजमुखासुर नामक दैत्य ने देव लोक में उत्पात मचा रखा था. समस्त देवता उससे तंग थे. एक दिन सभी देवगण एकत्रित होकर गणेश जी की शरण में पहुँचे और उनसे गजमुखासुर दैत्य से मुक्ति दिलाने हेतु प्रार्थना करने लगे. देवताओं की रक्षा के लिए गणेश जी ने गजमुखासुर से युद्ध किया. इस युद्ध में गणेश जी का एक दांत टूट गया. इसी दांत से गणेश जी ने गजमुखासुर पर प्रहार किया, जिससे बचने के लिए गजमुखासुर में मूषक का रूप धारण किया और युद्धस्थल से भाग खड़ा हुआ. किंतु गणेश जी ने उसे पकड़ लिया. तब गजमुखासुर गणेश जी से क्षमायाचना करते हुए अपने प्राणों की भीख मांगने लगा. गणेश जी ने उसे क्षमा कर अपना वाहन बना लिया. 

कैसे मूषक बना भगवान गणेश का वाहन? पौराणिक कथा Read More »

कैसे शेर बना माँ दुर्गा का वाहन

मित्रों, इस पोस्ट में हम माँ दुर्गा और शेर की कहानी (Maa Durga Aur Sher Ki Kahani) शेयर कर रहे हैं. हिंदू देवी-देवताओं के वाहनों के बारे में अपने अवश्य सुना होगा. हर देवी-देवता का अपना एक वाहन है. जैसे शिव शंकर का वाहन नंदी है, भगवान विष्णु का गरूड़, श्री गणेश का मूषक, तो माँ दुर्गा का शेर. कैसे ये पशु इन देवी-देवताओं के वाहन बने और इसके पीछे क्या कारण था?  इन प्रश्नों के उत्तर में जो कहानी छुपी हुई है, वो बड़ी ही रोचक हैं. ये तो अवश्य है कि हर पशु वाहन की अपनी एक पृथक महत्ता है. शक्ति स्वरूपा माँ दुर्गा का वाहन शेर है, ये संपूर्ण जगत जानता है. उन्हें ‘माँ शेरावाली’ भी कहा जाता है. आज हम आपको ये बताने जा रहे हैं कि कैसे शेर माँ दुर्गा का वाहन बना. इसके पीछे दो कथायें प्रचलित हैं. प्रथम कथा माँ दुर्गा आदि शक्ति देवी पार्वती का ही प्रतिरूप है. देवी पार्वती हिमालय राज की पुत्री थी. बचपन में ही उन्होंने भगवान शिव को अपना पति चुन लिया था. अतः वह सदा उनकी भक्ति और आराधना में लीन रहती थी. विवाह योग्य होने पर भोले शंकर को पति के रूप में पाने की कामना में वह एक ऊँचे पर्वत पर जाकर तप करने लगी. वहाँ उन्होंने कई वर्षों तप किया. उनके तप से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें दर्शन दिया और स्वयं को पति के रूप में प्राप्त करने का वरदान उन्हें प्रदान किया. इसके उपरांत दोनों का विवाह बड़ी ही धूम-धाम से संपन्न हुआ, जिसमें सारे देवी-देवता, ऋषिगण और शिवगण सम्मिलित हुए. विवाह उपरांत उनके दो पुत्र श्री गणेश और कार्तिकेय हुए. भगवान शिव (Lord Shiva) को पति स्वरुप प्राप्ति के लिए कई वर्षों तक किये गए कठोर तप के फलस्वरूप देवी पार्वती का गौर वर्ण सांवला हो गया था. एक दिन कैलाश पर्वत पर बैठकर हास-परिहास करते समय भगवान शिव ने माता पार्वती को ‘काली’ कह दिया. स्वयं के लिए ‘काली’ संबोधन सुन देवी पार्वती रुष्ट हो गई और गौर वर्ण की प्राप्ति के लिए कैलाश छोड़कर तपस्या करने वन में चली गई. वन में एक वृक्ष ने नीचे बैठकर वे कठोर तप करने लगी. इस बीच एक दिन एक भूखा शेर भटकते हुए वहाँ आ पहुँचा. देवी पार्वती को देख उनका भक्षण कर अपनी क्षुधा शांत करने की मंशा से वह उनके समीप पहुँचा. किंतु देवी पार्वती के तप का तेज इतना था कि वह शेर उनका भक्षण न कर सका और वहीँ बैठकर उनकी तपस्या समाप्ति की प्रतीक्षा करने लगा. माता पार्वती को तप करते हुए कई वर्ष बीत गए. इतने वर्षों तक वह शेर वहीं उनके समीप बैठा रहा. एक क्षण को भी वह अपने स्थान से नहीं हिला. अंततः देवी पार्वती के तप से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें दर्शन दिए और गौर वर्ण का वरदान प्रदान किया. वरदान प्राप्ति उपरांत शिव जी के निर्देशानुसार देवी पार्वती गंगा के तट पर पहुँची. गंगा में स्नान उपरांत उनके भीतर का काला स्वरुप देवी के रूप में बाहर निकल गया और उन्हें गौर वर्ण प्राप्त हुआ. तब से उन्हें “माँ गौरी” भी कहा जाता है. उनके काले स्वरुप को “देवी कौशकी” कहा जाता है. जब माता पार्वती स्नान कर बाहर आई, तो अपने तप स्थल पर एक शेर को बैठा हुआ पाया. बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका भक्षण करने आये शेर ने उन्हें अपना ग्रास नहीं बनाया और इतने वर्षों तक उनके समीप बैठा रहा. इस तरह वह भी उनके तप में सम्मिलित रहा. प्रसन्न होकर वर्षों तक तप में साथ देने वाले शेर को उन्होंने अपना वाहन बना किया. तब से ही माँ दुर्गा का वाहन शेर है और उन्हें माँ ‘शेरावाली” भी कहा जाता है. द्वितीय कथा इस कथा का उल्लेख स्कंधपुराण में मिलता है. इसके अनुसार भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय और राक्षस तारक तथा और उसके दो भाइयों सिंहमुखम और सुरापदमन के मध्य एक बार युद्ध हुआ. जिसमें कार्तिकेय ने उन्हें पराजित कर दिया. पराजय उपरांत सिंहमुखम कार्तिकेय से क्षमा याचना करने लगा. कार्तिकेय ने उसे क्षमा कर शेर बना दिया और माँ दुर्गा के वाहन बनने का आशीर्वाद दिया. तब से सिंहमुखम शेर के रूप में माँ दुर्गा की सवारी है.

कैसे शेर बना माँ दुर्गा का वाहन Read More »

नंदी कैसे बने भगवान शिव के वाहन

फ्रेंड्स, इस पॉट में हम भगवान शिव और नंदी की कहानी (Lord Shiva And Nandi Story In Hindi) शेयर कर रहे हैं. जब भी हम शिवालय जाते हैं, तो देखते हैं कि शिवलिंग के पास माता पार्वती, कार्तिकेय और गणेशजी के साथ नंदी भी विराजमान है. हिन्दू धर्म में नंदी भगवान शिव के निवास कैलाश के द्वारपाल हैं. साथ ही बैल के रूप में वे उनके वाहन भी हैं. उन्हें हर शिव मंदिर में भोले- शंकर के साथ प्रतिष्ठित किया जाता है. संस्कृत में नंदी का अर्थ है – प्रसन्नता या आनंद. नंदी को शक्ति, समर्थता और कर्मठता का प्रतीक माना जाता है. शैव परंपरा में नंदी को नंदीनाथ संप्रदाय का मुख्य गुरु भी माना जाता है. नंदी शिव के वाहन होने के साथ ही उनके साथी और उनके गणों में सर्वोच्च हैं. क्या आप जानते हैं कि नंदी का जन्म कैसे हुआ? उनके माता पिता कौन थे? कैसे नंदी शिव के परम प्रिय हो गए? कैसे नंदी भगवान शिव के वाहन बने? क्यों वे शिवलिंग के साथ विराजते हैं? आज हम आपको इस बारे में विस्तार से जानकारी देंगे. नंदी के जन्म के पीछे एक पौराणिक कथा प्रचलित है. पौराणिक कथा कथानुसार ब्रम्हचारी व्रत का पालन करते हुए एक बार शिलाद ऋषि को भय सताने लगा कि उनकी मृत्यु के बाद उनका संपूर्ण वंश समाप्त हो जायेगा. वे एक शिशु को गोद लेना चाहते थे. लेकिन वे चाहते थे कि जिस शिशु को वे गोद लें, वह अध्यात्मिक हो तथा उस पर भगवान शिव की विशेष कृपा और आशीर्वाद हो. अपनी कामना की पूर्ति के लिए उन्होंने भगवान शिव का कठोर तप प्रारंभ किया. कई वर्षों तक वे तप में लीन रहे. जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा. शिलाद ऋषि ने पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा. भगवान शिव शिलाद ऋषि को उनका मनचाहा वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए. भगवान शिव के अंतर्ध्यान होने के बाद शिलाद ऋषि ने जब अपनी आँखें खोली, तो उनकी गोद में एक शिशु था. उस शिशु के चेहरे पर एक अलौकिक तेज था. शिलाद ऋषि ने उसका नाम नंदी रखा और उसका पालन-पोषण करने लगे. वे उससे बहुत स्नेह करते थे. किंतु नियति ने नंदी के लिए कुछ और ही लिख रखा था. एक दिन मित्र और वरुण नामक दो संत शिलाद ऋषि के आश्रम में पधारे. शिलाद ऋषि ने उनका खूब आदर-सत्कार किया. नंदी ने भी उनकी बहुत सेवा की. प्रस्थान करते समय शिलाद ऋषि और नंदी ने दोनों संतों का आशीर्वाद लिया. संतो ने शिलाद ऋषि को दीर्घायु और खुशहाली का आशीर्वाद दिया. किंतु जब नंदी को आशीर्वाद देने की बारी आई, तो उनके माथे पर चिंता की लकीरे खिंच गई. शिलाद ऋषि ने यह तुरंत भांप लिया. जब वे मित्र और वरुण ऋषि को आश्रम के बाहर तक छोड़ने गये, तो उनसे पूछ लिया कि उन्होंने नंदी को यह सुनकर शिलाद ऋषि चिंताग्रस्त हो गये. नंदी ने जब पिता को चिंतित देखा, तो उसका कारण पूछा. शिलाद ऋषि ने नंदी को पूरी सच्चाई बता दी. पिता की बात सुन नंदी हंसने लगे. आश्चर्यचकित पिता ने जब कारण पूछा, तो नंदी बोले, “पिताश्री, आपने मुझे भगवान शिव की कृपा से प्राप्त किया है. जिन पर शिवजी की कृपा होती हैं, उन्हें कोई संकट छू नहीं सकता. यह कहकर वे पिता का आशीर्वाद प्राप्त कर भगवान शिव की तपस्या करने वन चले गए और तप करने लगे. नंदी का तप इतना कठोर, ध्यान इतना प्रबल और आस्था इतनी मजबूत थी कि भगवान शिव को प्रकट होने में अधिक समय नहीं लगा. शिव ने प्रकट होकर नंदी से वरदान मांगने को कहा. नंदी के पूरी उम्र उनका सानिध्य मांग लिया. तब शिव ने उन्हें बैल का चेहरा प्रदान कर अपने वाहन के रूप में स्वीकार किया और अपने गणों में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया.  ध्रुव तारे की कहानी शिव ने आशीर्वाद से नंदी मृत्यु के भय से मुक्त होकर अजर-अमर हो गये. भगवन शिव ने गणों के अधिपति के रूप में नंदी का अभिषेक करवाया. इस तरह नंदी नंदीश्वर हो गये. भगवान शिव ने नंदी को वरदान दिया था कि जहाँ उनका निवास होगा, वहाँ नंदी का भी निवास होगा. माना जाता है कि तबसे शिव मंदिर में शिवलिंग के साथ नंदी की भी स्थापना की जाती हैं. नंदी पवित्रता, विवेक, बुद्धि और ज्ञान के प्रतीक हैं. उनका हर क्षण भगवान को समर्पित है. वे मनुष्य को शिक्षा देते हैं कि वे अपना हर क्षण परमात्मा की सेवा में अर्पित करें, ताकि वे भगवान की कृपा के पात्र बन जाएँ.

नंदी कैसे बने भगवान शिव के वाहन Read More »

महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर चढ़ाएं ये चीजें, मंगल और शनि दोष से मिलेगी निजात

हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का पर्व प्रमुख त्योहारों में से एक माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की विधिवत पूजा करने का विधान है। माना जाता है कि श्रावण मास के अलावा फाल्गुन मास में पड़ने वाली शिवरात्रि के दिन भगवान शिव की विधिवत पूजा करने और व्रत रखने से कई गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही हर तरह के दुखों से निजात मिल जाती है। महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की पूजा करने के साथ शिवलिंग में कुछ चीजें जरूर अर्पित करनी चाहिए। ऐसा करने से शुभ फलों की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर चढ़ाएं ये चीजें दुधाभिषेक करें भगवान शिव को जल के अलावा दूध से भी अभिषेक कर सकते हैं। माना जाता है कि भगवान शिव को दूध चढ़ाने से हर तरह के रोगों से छुटकारा मिल सकता है। दही चढ़ाएं शिवलिंग में दही चढ़ाना भी शुभ माना जाता है। मान्यता है कि दही चढ़ाने से भगवान शिव का स्वभाव गंभीर होता है। ऐसे में व्यक्ति के जीवन में आने वाली हर समस्या से निजात मिल जाती है। घी चढ़ाएं भगवान शिव को घी चढ़ाने से व्यक्ति की सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है, जिससे वह क्षेत्र में सफलता पा लेता है। इसके साथ ही कुंडली से शनि की साढ़े साती और ढैय्या का दुष्प्रभाव कम हो जाता है। चावल से करें श्रृंगार महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग का चावल से श्रृंगार करने से मंगल दोष से निजात मिलती है। इसके साथ ही कर्ज से मुक्ति मिलती है। तिल चढ़ाएं हर रोग से निजात पाने के साथ संतान प्राप्ति के लिए तिल चढ़ाना चाहिए। इसके लिए दूध में थोड़ा सा तिल मिलाकर अभिषेक करें। जनेऊ अर्पित करें महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर सफेद वस्त्र और जनेऊ अर्पित करें। ऐसा करने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होगी और लंबी आयु का वरदान मिलेगा।

महाशिवरात्रि पर शिवलिंग पर चढ़ाएं ये चीजें, मंगल और शनि दोष से मिलेगी निजात Read More »

आखिर कहां-कहां जाता है व्यक्ति का पाप, पढ़ें यह पौराणिक कथा

आज की पौराणिक कथा का सार है कि आखिर पाप कहां-कहां जाता है। इसी संदर्भ में एक बार एक ऋषि ने सोचा की लोग पाप धोने के लिए सभी लोग गंगा जाते हैं। ऐसे में सारे पार गंगा में ही समा जाते हैं। इस तरह तो गंगा भी पापी हो जाएगी। उस ऋषि ने यह जानने के लिए आखिर पाप जाता कहां है, तपस्या की। तपस्या करने के फलस्वरूप देवगण प्रकट हुए। तब ऋषि ने उनसे पूछा कि गंगा में जो पापा धोया जाता है वह कहां जाता है। तब भगवान ने कहा कि चलो गंगा जी से ही पूछते हैं इस बारे में। ऋषि और भगवान दोनों ने ही गंगा जी से पूछा कि हे गंगे! सब लोग तुम्हारे यहां पाप धोते हैं तो इसका मतलब क्या आप भी पापी हुईं? तब गंगा ने कहा कि मैं कैसे पापी हो गई। मैं तो सभी पाप लेकर समुद्र को अर्पित कर देती हूं। इसके बाद ऋषि और भगवान समुद्र के पास गए और उनसे पूछा कि हे सागर! गंगा सभी पाप आपको अर्पित कर देती है तो क्या ऐप आप पापी हो गए? तब समुद्र ने कहा कि वो कैसे पापी हुआ। वो सभी सभी पाप को भाप बनाकर बादल बना देता है। अब ऋषि और भगवान दोनों ही बाद के पास गए। उनसे पूछा कि हे बादल! समुद्र पापों को भाप बनाकर बादल बना देते हैं तो क्या आप पापी हुए? बादलों ने कहा, मैं कैसे पापी हुआ। मैं तो सभी पाप को वापस पानी बना देता हूं और धरती पर गिरा देता हूं। इससे ही अन्न उपजता है। इसे ही मानव खाता है। उस अन्न में जो अन्न जिस मानसिक स्थिति से उगाया जाता है और जिस वृत्ति से प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है उसी के आधार पर मानव की मानसिकता बनती है। यही कारण है कि कहा जाता है कि ‘जैसा खाए अन्न, वैसा बनता मन।’ जिस वृत्ति से अन्न प्राप्त किया जाता है और जिस मानसिक अवस्था में खाया जाता है, वैसा ही विचार मानव का बन जाता है। ऐसे में हमेशआ भोजन शांत रहकर ही ग्रहण करना चाहिए। अन्न जिस धन से खरीदा जाए वह धन भी श्रम का होना चाहिए। 

आखिर कहां-कहां जाता है व्यक्ति का पाप, पढ़ें यह पौराणिक कथा Read More »

महाशिवरात्रि व्रत की प्रामाणिक और पौराणिक कथा

पूर्व काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था। जानवरों की हत्या करके वह अपने परिवार को पालता था। वह एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी। शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार खोजता हुआ वह बहुत दूर निकल गया। जब अंधकार हो गया तो उसने विचार किया कि रात जंगल में ही बितानी पड़ेगी। वह वन एक तालाब के किनारे एक बेल के पेड़ पर चढ़ कर रात बीतने का इंतजार करने लगा। बिल्व वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढंका हुआ था। शिकारी को उसका पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गई। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बिल्वपत्र भी चढ़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी हिरणी तालाब पर पानी पीने पहुंची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, हिरणी बोली- ‘मैं गर्भिणी हूं। शीघ्र ही प्रसव करूंगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे समक्ष प्रस्तुत हो जाऊंगी, तब मार लेना।’  शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और हिरणी जंगली झाड़ियों में लुप्त हो गई। प्रत्यंचा चढ़ाने तथा ढीली करने के वक्त कुछ बिल्व पत्र अनायास ही टूट कर शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार उससे अनजाने में ही प्रथम प्रहर का पूजन भी सम्पन्न हो गया। कुछ ही देर बाद एक और हिरणी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख हिरणी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया- ‘हे शिकारी! मैं थोड़ी देर पहले ऋतु से निवृत्त हुई हूं। कामातुर विरहिणी हूं। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूं। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी।’ शिकारी ने उसे भी जाने दिया।  दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। इस बार भी धनुष से लग कर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर जा गिरे तथा दूसरे प्रहर की पूजन भी सम्पन्न हो गई। तभी एक अन्य हिरणी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली। शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर नहीं लगाई। वह तीर छोड़ने ही वाला था कि हिरणी बोली- ‘हे शिकारी! मैं इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके लौट आऊंगी। इस समय मुझे मत मारो।’  शिकारी हंसा और बोला- ‘सामने आए शिकार को छोड़ दूं, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूं। मेरे बच्चे भूख-प्यास से व्यग्र हो रहे होंगे।’  उत्तर में हिरणी ने फिर कहा- जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी। हे शिकारी! मेरा विश्वास करो, मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूं। हिरणी का दुखभरा स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के अभाव में तथा भूख-प्यास से व्याकुल शिकारी अनजाने में ही बेल-वृक्ष पर बैठा बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्य करेगा। शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला- ‘ हे शिकारी! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है, तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि मुझे उनके वियोग में एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन हिरणियों का पति हूं। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण का जीवन देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे समक्ष उपस्थित हो जाऊंगा।’  मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटनाचक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा- ‘मेरी तीनों पत्नियां जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएंगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूं।’  शिकारी ने उसे भी जाने दिया। इस प्रकार प्रात: हो आई। उपवास, रात्रि-जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ने से अनजाने में ही पर शिवरात्रि की पूजा पूर्ण हो गई। पर अनजाने में ही की हुई पूजन का परिणाम उसे तत्काल मिला। शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया। उसमें भगवद्शक्ति का वास हो गया। थोड़ी ही देर बाद वह मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसने मृग परिवार को जीवनदान दे दिया। अनजाने में शिवरात्रि के व्रत का पालन करने पर भी शिकारी को मोक्ष की प्राप्ति हुई। जब मृत्यु काल में यमदूत उसके जीव को ले जाने आए तो शिवगणों ने उन्हें वापस भेज दिया तथा शिकारी को शिवलोक ले गए। शिवजी की कृपा से ही अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म को याद रख पाए तथा महाशिवरात्रि के महत्व को जानकर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए। शिव कथा का यह है संदेश शिकारी की कथानुसार महादेव तो अनजाने में किए गए व्रत का भी फल दे देते हैं। पर वास्तव में महादेव शिकारी की दया भाव से प्रसन्न हुए। अपने परिवार के कष्ट का ध्यान होते हुए भी शिकारी ने मृग परिवार को जाने दिया। यह करुणा ही वस्तुत: उस शिकारी को उन पंडित एवं पुजारियों से उत्कृष्ट बना देती है

महाशिवरात्रि व्रत की प्रामाणिक और पौराणिक कथा Read More »

घर के दरवाजे पर लटका दीजिए ये छोटी सी चीज, आर्थिक तंगी हो जाएगी दूर

आर्थिक परेशानी और नकारात्मकता को घर से दूर करने के लिए ज्योतिष और वास्तु में कई उपायों के बारे में बताया गया है। ज्योतषशास्त्र के नियम घर पर सुख-समृद्धि व संपन्नता के लिए बहुत ही कारगर माने जाते हैं। ज्योतिष में भी ऐसी छोटी-छोटी चीजों से जुड़े उपायों के बारे में बताया गया है जिसे करने के बाद आप बड़ी से बड़ी समस्या से मुक्ति पा सकते हैं। इसी तरह घोड़े की नाल को कर्ज मुक्ति और आर्थिक तंगी से छुटकारा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। यदि तमाम कोशिशों के बाद भी आप कर्ज से मुक्त नहीं हो पाते या नौकरी व्यापार में खूब तरक्की के बाद भी घर पर आर्थिक समस्या बनी रहती है तो इसके लिए घोड़े की नाल को लाभकारी माना गया है। जानते हैं पैसों से जुड़ी समस्या से मुक्ति के लिए कैसे करें घोड़े की नाल का इस्तेमाल। घोड़े के नाल के उपाय और लाभ घोड़े के नाल को लोग मुख्य द्वार पर टांगते हैं। इससे हर समस्या से मुक्ति मिलती है और घर पर नकारात्मक शक्तियों से बचाव होता है। जिस घर पर हमेशा ही पैसों की तंगी बनी रहती है, वहां घर के दरवाजे पर घोड़े की नाल लटकाना चाहिए। इससे घर पर बरकत बनी रहती है। घोड़े की नाल को काले रंग के कपड़े में लपेटकर यदि आप तिजोरी या धन रखने वाले स्थान पर रखते हैं तो इससे धन का अभाव दूर होता है और तिजोरी कभी खाली नहीं रहती है। घोड़े की नाल शनि के प्रकोप से भी बचाती है। जो लोग शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से परेशान होते हैं उन्हें काले घोड़े की नाल का छल्ला (अंगूठी) दाएं हाथ की मध्यमा उंगली में पहनना चाहिए। घोड़े की नाल का महत्व घोड़े की नाल मजबूत लोहे की होती है, जिसका कार्य होता है घोड़े के पैरों की सुरक्षा करना। वास्तु में माना जाता है कि जिस तरह घोड़े की नाल से घोड़े के पैरों की सुरक्षा होती है।

घर के दरवाजे पर लटका दीजिए ये छोटी सी चीज, आर्थिक तंगी हो जाएगी दूर Read More »

द‍िवाली की व्रत कथा, दीपावली की पौराणिक कहानी-कार्तिक मास की अमावस्या को क्यों होता है पर्व?

भारत देश में रोशनी का पर्व दीपावली का पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन का लोग बेसब्री से इंतजार करते हैं। इसे खुशियों का त्योहार माना जाता है। शास्त्र के अनुसार इसी दिन भगवान श्री राम 14 वर्ष का वनवास काट कर अयोध्या लौटे थे। दीपावली के दिन सभी घरों में मां लक्ष्मी और भगवान श्री गणेश की पूजा अर्चना श्रद्धा पूर्वक की जाती हैं। हिन्दू धर्म में मां लक्ष्मी को धन और वैभव की देवी के रूप में पूजा जाता हैं। ऐसी मान्यता है कि मां लक्ष्मी की सच्चे मन से दीपावली के दिन पूजा करने से जीवन में धन का अभाव कभी नहीं होता।  हिन्दू शास्त्र के अनुसार इस दिन मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करने आती है। लोग मुख्य द्वार पर तरह-तरह की रंगोली बनाकर मां लक्ष्मी का स्वागत करते हैं। भारत में यह त्योहार हर साल कार्तिक माह की अमावस्या तिथि को मनाई जाती है। यहां जानें दीपावली हर साल कार्तिक माह की अमावस्या तिथि को ही क्यों मनाई जाती है।  एक बार की बात है एक जंगल में एक साहूकार रहता था। उसकी बेटी प्रतिदिन पीपल पर जल चढ़ाया करती थी। जिस पीपल के पेड़ पर वह जल चढ़ाया करती थी उस पर पर मां लक्ष्मी निवास करती थी। एक दिन मां लक्ष्मी ने साहूकार की बेटी से कहा मैं तुम्हारी मित्र बनना चाहती हूं। यह सुनकर साहूकार की बेटी ने कहा मैं अपने पिता से पूछकर आपको बताऊंगी।  बाद में साहूकार की बेटी अपने पिता के पास गई और अपने पिता से सारी बात कह डाली। दूसरे दिन साहूकार की बेटी है मां लक्ष्मी से दोस्ती करने के लिए हां कर दी। दोनों अच्छे मित्र भी बन गए। दोनों एक दूसरे के साथ खूब बातचीत करने लगे। एक दिन मां लक्ष्मी साहूकार की बेटी को अपने घर ले गई। मां लक्ष्मी ने साहूकार की बेटी का खूब स्वागत किया। उन्होंने उसे अनेकों तरह का भोजन खिलाया। जब साहूकार की बेटी मां लक्ष्मी के घर से वापस लौटी तो, मां लक्ष्मी ने उससे एक प्रश्न पूछा कि अब तुम मुझे कब अपने घर ले जाओगी। यह सुनकर साहूकार की बेटी ने मां लक्ष्मी को अपने घर आने को तो कह दिया लेकिन अपने घर की आर्थिक स्थिति को देखकर वह उदास हो गई। उसे डर लगने लगा कि क्या वह अपने दोस्त का अच्छे से स्वागत कर पाएगी। यह सोचकर वह मन ही मन दुखी हो गई। सहूकार अपनी बेटी के उदास चेहरे को देखकर समझ गया। तब उसने अपनी बेटी को समझाया कि तुम फौरन मिट्टी से चौका बनाकर साफ सफाई करो। चार बत्ती के मुख वाला दिया जलाकर मां लक्ष्मी का नाम लेकर वहां उनका स्मरण करों। पिता की यह बात सुनकर  उसने वैसा ही किया। उसी समय एक चील किसी रानी का नौलखा हार लेकर उड़ रहा था। अचानक वह हार सहूकार की बेटी के सामने गिर गया। तब साहूकार की बेटी ने जल्दी से वह हार बेचकर भोजन की तैयारी की। थोड़ी देर बाद भगवान श्री गणेश के साथ मां लक्ष्मी साहूकार की बेटी के घर आई। साहूकार की बेटी ने दोनों की खूब सेवा की। उसकी सेवा को देखकर मां लक्ष्मी बहुत प्रसन्न हुई और उन्होंने उसकी सारी पीड़ा को दूर कर दिया। इस तरह से साहूकार और उसकी बेटी अमीरों की तरह जीवन व्यतीत करने लगी।

द‍िवाली की व्रत कथा, दीपावली की पौराणिक कहानी-कार्तिक मास की अमावस्या को क्यों होता है पर्व? Read More »

दिवाली से पहले शनि देव इन 3 राशि वालों की चमका सकते हैं किस्मत, धनलाभ के साथ तरक्की के प्रबल योग

ज्योतिष शास्त्र अनुसार हर ग्रह एक निश्चित समय अवधि पर राशि परिवर्तन करता है। साथ ही ग्रह समय- समय पर वक्री और मार्गी भी होते हैं। आपको बता दें कि शनि देव दिवाली से पहले मतलब 23 अक्टूबर को मार्गी होने जा रहे हैं। मार्गी होने का मतलब है कि वह अपनी सीधी चाल चलेंगे।  जिसका प्रभाव सभी राशियों पर पड़ेगा, लेकिन 3 राशियां ऐसीं हैं, जिनको शनि का मार्गी होना लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। आइए जानते हैं ये 3 राशियां कौन सीं हैं। मेष शनि देव का मार्गी होना आप लोगों को लाभप्रद साबित हो सकता है। क्योंकि शनि ग्रह आपकी गोचर कुंडली से दशम भाव में मार्गी होने जा रहे हैं, जिसे बिजनेस और नौकरी का भाव माना जाता है। इसलिए इस दौरान आपको व्यापार में अच्छा लाभ होने की संभावना है। साथ ही अगर आप स्टॉक मार्केट, सट्टा और लॉटरी में निवेश करना चाहते हैं तो कर सकते हैं। साथ ही दौरान आपको नई जॉब का ऑफर आ सकता है या फिर आपका प्रमोशन और इंक्रीमेंट भी हो सकता है। वहीं व्यापार में आपको इस दौरान अच्छा मुनाफा होने योग हैं। इस दौरान आपकी काम करने की शैली में भी निखार देखने को मिलेगा। आप ऑफिस में टारगेट को अचीव कर सकते हैं। जिससे कार्यस्थल पर आपकी तारीफ हो सकती है। मीन राशि:  शनि देव के दिवाली से मार्गी होने से आपको जबरदस्त धनलाभ हो सकता है। क्योंकि आपकी राशि से शनि ग्रह 11वें स्थान में मार्गी होंगे। जिसे आय और लाभ का स्थान माना गया है। इसलिए इस दौरान आपकी इनकम में अच्छी बढ़ोतरी होने की संभावना है। साथ ही इस समय इनकम के नए- नए माध्यम से आप धन कमाने में कामयाब रहेंगे। वहीं इस समय आपके नए व्यापारिक संबंध बन सकते हैं। इस दौरान आप व्यापार में नई डील फाइनल कर सकते हैं। जिससे आपको भविष्य में विशेष लाभ होने के आसार हैं। साथ ही इस दौरान नए ऑर्डर आने से कारोबार में धनलाभ अच्छा होगा। वहीं शेयर बाजार, सट्टा या लॉटरी में इस समय आपको अच्छा धनलाभ हो सकता है। वहीं अगर आपका कारोबार शराब, पेट्रोल, खनिज और लोहा से संबंधित है तो आपको अच्छा धनलाभ हो सकता है। धनु राशि: शनि देव के मार्गी होने से आप लोगों के अच्छे दिन शुरू हो सकते हैं। क्योंकि शनि देव आपकी गोचर कुंडली से दूसरे भाव में मार्गी होंंगे। जिसे ज्योतिष में धन और वाणी का स्थान माना गया है। इसलिए इस दौरान आपको आकस्मिक धनलाभ हो सकता है। साथ ही आपको इस दौरान अटका हुआ धन भी प्राप्त हो सकता है। बिजनेस में अच्छा धनलाभ होने की संभावना है। इस समय आपकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत होगी। वहीं जिन लोगों का कार्यक्षेत्र और करियर वाणी और मार्केटिंग से जुड़ा हुआ है। उन लोगों के लिए समय बेहतर रहने वाला है। अगर आप राजनीति में सक्रिय हैं तो आपको सफलता मिलने के आसार हैं। हालांकि आपके ऊपर साढ़ेसाती का तीसरा चरण चल रहा है। इसलिए आप लोगों को थोड़ा स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए। लेकिन शनि देव के मार्गी होने से आपको साढ़ेसाती में कुछ राहत जरूर मिलेगी।

दिवाली से पहले शनि देव इन 3 राशि वालों की चमका सकते हैं किस्मत, धनलाभ के साथ तरक्की के प्रबल योग Read More »

इस धनतेरस इन 5 राशि के लोगों पर लक्ष्मी जी रहेंगी मेहरबान, जानिये क्या कहता है ज्योतिष शास्त्र

धार्मिक मान्यता के अनुसार धनतेरस कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को हर वर्ष मनाया जाता है। इस दिन धन की देवी मां लक्ष्मी और कुबेर की पूजा की जाती है। मान्यता के अनुसार इन दिन कोई भी नया सामान खरीदने से घर में बढ़ोतरी होती है और सुख-समृद्धि का वास होता हैवहीं इस दिन शनि देव मकर राशि में मार्गी हो रहे हैं। जिसका प्रभाव सभी राशि के जातकों पर पड़ेगा। वहीं इस दौरान कई राशि के लोगों की आर्थिक बढ़ोतरी भी हो सकती है। आइए जानते हैं इस दौरान किन-किन राशि के लोगों पर धन की देव मां लक्ष्मी की विशेष कृपा होने वाली है और किन्हें आर्थिक बढ़ोतरी मिल सकती है। मिथुन राशिमिथुन राशि के जातकों के लिए शनि देव आठवें और नौवें भाव के स्वामी होते हैं। इस अवधि में इस राशि के जातकों को पैतृक संपत्ति से लाभ हो सकता है। निवेश से भी धन लाभ हो सकता है। मेष राशिजातकों को करियर में सफलता मिल सकती है। सामाजिक पद-प्रतिष्ठा भी बढ़ सकती है। विदेश जमीन आदि से भी लाभ मिल सकता है। साझेदारी में कोरोबार करने के लिए यह समय उत्तम हो सकता है। पेशेवर जीवन में समय आपके लिए अनुकूल हो सकता है। धनु राशिइस राशि के जातकों के लिए शनि देव दूसरे और तीसरे भाव के स्वामी हैं। जातकों के आय बढ़ सकते हैं और बचत करने भी सफलता मिल सकती है। लंबति कार्य भी पूरे हो सकते हैं। सामाजित छवि में इस दौरान सुधर सकती है और मान-सम्मान में भी बढ़ोतरी हो सकती है। मीन राशिइस राशि के जातकों पर भी शनि देव की कृपा रहेगी। आर्थिक कमी जैसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। कार्यस्थल पर भी समय आपके पक्ष में रहेगा। व्यवसाय में भी सफलता मिल सकती है। तुला राशिइस राशि के जातकों के पुराने विवाद खत्म हो सकते हैं। कई जातकों को भौतिक लाभ भी मिल सकता है। जमीन भी इस अवधि में कई जातकों खरीद सकते हैं।

इस धनतेरस इन 5 राशि के लोगों पर लक्ष्मी जी रहेंगी मेहरबान, जानिये क्या कहता है ज्योतिष शास्त्र Read More »