MYTHOLOGICAL STORIES

हिरण्यकश्यप के बारे में संपूर्ण जानकारी: पूर्व जन्म से लेकर अगले जन्म तक

हिरण्यकश्यप सतयुग में जन्मा एक दैत्य राजा था जो अति-पराक्रमी तथा शक्तिशाली था। उसका जन्म महर्षि कश्यप के कुल में हुआ था। साथ ही उसको भगवान ब्रह्मा से विचित्र वरदान मिला था। भगवान ब्रह्मा से मिले इसी वरदान के कारण स्वयं नारायण को मृत्यु लोक में अपना अवतार लेकर उसका वध करना पड़ा था। हिरण्यकश्यप के कुल में ही उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु भक्त था जो उसकी मृत्यु के पश्चात उसका उत्तराधिकारी बना था। आज हम हिरण्यकश्यप की कथा के बारे में जानेंगे। हिरण्यकश्यप का जीवन परिचय हिरण्यकश्यप का पूर्व जन्म अपने पूर्व जन्म में हिरण्यकश्यप तथा उसका छोटा भाई हिरण्याक्ष भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम के प्रहरी थे जिनका नाम जय-विजय था। एक दिन उन्होंने भगवान ब्रह्मा के चार मानस पुत्रों का अपमान किया था तथा वैकुंठ में जाने से रोका था। तब उन्हें श्राप मिला था कि वे तीन जन्म तक असुर कुल में जन्म लेंगे तथा उनका वध भगवान विष्णु के हाथों होगा। इसलिये जय-विजय का अगला जन्म हिरण्यकश्यप तथा हिरण्याक्ष के रूप में हुआ था। हिरण्यकश्यप का जन्म हिरण्यकश्यप तथा उसके भाई हिरण्याक्ष के माता-पिता का नाम महर्षि कश्यप तथा दिति था। महर्षि कश्यप की कई पत्नियाँ थी जिसमें से एक दिति थी। उसी के गर्भ से दैत्यों का जन्म हुआ था। दरअसल एक दिन दिति किसी कारणवश कामातुर हो उठी थी और उसने गलत तिथि में महर्षि कश्यप को संभोग के लिए कहा था। महर्षि कश्यप के मना करने के बाद भी जब दिति नही मानी तो दोनों के बीच संभोग हो गया। इसके परिणामस्वरुप दो दैत्यों हिरण्यकश्यप तथा हिरण्याक्ष का जन्म हुआ। हिरण्यकश्यप की पत्नी का नाम हिरण्यकश्यप का विवाह कयाधु नाम की स्त्री से हुआ था जिससे उसे प्रह्लाद नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी। यही पुत्र उसकी मृत्यु का कारण बना था। दरअसल जब हिरण्यकश्यप भगवान ब्रह्मा की तपस्या करने में लीन था तो उस समय देवताओं ने उसकी नगरी पर आक्रमण करके वहां अपना शासन स्थापित कर लिया था। तब देवर्षि नारद मुनि ने कयाधु के रक्षा की थी और उसे अपने आश्रम में स्थान दिया था। वही पर हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद का जन्म हुआ था। देवर्षि नारद मुनि की संगत में रहने के कारण वह विष्णु भगवान का भक्त बन गया था। हिरण्यकश्यप के भाई का वध जब हिरण्यकश्यप के छोटे भाई हिरण्याक्ष ने अपने अहंकार में पृथ्वी को समुंद्र में डुबो दिया तब भगवान नारायण ने अपना तृतीय अवतार वराह लेकर उसका वध कर दिया तथा पृथ्वी को समुंद्र से निकाल दिया। अपने भाई की मृत्यु से हिरण्यकश्यप इतना ज्यादा क्रोधित हो गया था कि वह विष्णु से बदला लेना चाहता था, इस कारण उसने भगवान ब्रह्मा की कठिन तपस्या की। हिरण्यकश्यप को भगवान ब्रह्मा का वरदान लगभग सौ वर्षों तक कठिन तपस्या करने के पश्चात हिरण्यकश्यप को भगवान ब्रह्मा ने दर्शन दिए। उसने वरदान माँगा कि उसकी मृत्यु भगवान ब्रह्मा के बनाये हुए किसी भी प्राणी से ना हो फिर चाहे वह मनुष्य हो या पशु। इसके साथ जी उसकी मृत्यु न अस्त्र-शस्त्र से, ना दिन व रात में, ना भवन के बाहर और ना ही अंदर, न भूमि ना आकाश में हो। इस वरदान को पाकर वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया था। हिरण्यकश्यप का अत्याचार व प्रह्लाद भगवान ब्रह्मा से यह वरदान पाकर उसनें तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया तथा इंद्र का भी आसन छीन लिया। जगह-जगह उसने अधर्म के कार्य किये तथा ऋषि-मुनियों की हत्याएं करवा दी। वह स्वयं को भगवान मानने के लिए लोगों को बाध्य करने लगा लेकिन स्वयं उसका पांच वर्ष का पुत्र प्रह्लाद विष्णु भक्ति में लीन रहता। शुरू में तो उसने अपने छोटे से पुत्र को धमकियाँ दी लेकिन जब वह नहीं माना तब उसने उसकी हत्या के कई षड़यंत्र रचे। हिरण्यकश्यप के द्वारा प्रह्लाद को सांपों से भरे कक्ष में रखना, हाथियों के पैरों के सामने फेंकना, पर्वत से गिराना, अग्नि में जलाना इत्यादि सम्मिलित है। किंतु हर बार प्रह्लाद की भगवान विष्णु के द्वारा रक्षा कर ली जाती थी। हिरण्यकश्यप की बहन का नाम हिरण्यकश्यप की बहन का नाम होलिका था। होलिका को भगवान ब्रह्मा से वरदान प्राप्त था कि उसे कोई भी अग्नि में जला नही सकता। इसी का लाभ उठाकर हिरण्यकश्यप ने होलिका को कहा कि वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए ताकि प्रह्लाद वहां से भाग न सके और वह उसी अग्नि में जलकर ख़ाक हो जाए। चूँकि होलिका को वरदान प्राप्त था, इसलिये वह प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ गयी। किंतु आश्चर्यजनक बात यह रही कि उस अग्नि में होलिका जलकर ख़ाक हो गयी जबकि प्रह्लाद सकुशल बाहर आ गया। दरअसल भगवान ब्रह्मा ने होलिका को वरदान देते समय यह भी कहा था कि यदि वह इस वरदान का दुरूपयोग करेगी तो यह वरदान स्वयं ही निष्प्रभावी हो जायेगा। हिरण्यकश्यप का वध भगवान विष्णु वैकुंठ में बैठे अपने भक्त प्रह्लाद पर यह सब अत्याचार होते हुए देख रहे थे तथा धीरे-धीरे उनके क्रोध का घड़ा भरता जा रहा था। एक दिन हिरण्यकश्यप प्रह्लाद से विष्णु के होने का प्रमाण मांग रहा था। तब प्रह्लाद ने कहा कि वे तो कण-कण में हैं। इस पर हिरण्यकश्यप ने अपने भवन के एक स्तंभ की ओर ईशारा करते हुए कहा कि क्या वे इसमें भी हैं? तब प्रह्लाद ने इस पर हां में उत्तर दिया। यह सुनकर हिरण्यकश्यप ने क्रोध में वह स्तंभ तोड़ डाला। जैसे ही वह स्तंभ टूटा उसमें से भगवान विष्णु का अत्यंत क्रोधित रूप नरसिंह अवतार में प्रकट हुआ जिसका आधा शरीर सिंह का तथा बाकि का आधा शरीर मनुष्य का था। उस नरसिंह अवतार ने हिरण्यकश्यप को उसके भवन की चौखट पर ले जाकर, संध्या के समय, अपने गोद में रखकर नाखूनों की सहायता से उसका वध कर दिया। इस प्रकार भगवान विष्णु ने उसको मिले वरदान की काट ढूंढ़कर हिरण्यकश्यप का अंत किया तथा उसका उत्तराधिकारी भक्त प्रह्लाद को बनाया। हिरण्यकश्यप का अगला जन्म चूँकि जय-विजय को तीन बार राक्षस कुल में जन्म लेना था जिनका वध भगवान विष्णु के अवतार के हाथों ही होना था। हिरण्यकश्यप व हिरण्याक्ष तो उनका पहला जन्म था। इसलिये अपने दूसरे जन्म में दोनों फिर से राक्षस कुल में जन्मे। हिरण्यकश्यप का अगला जन्म महर्षि विश्रवा के कुल में रावण के रूप में हुआ

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भक्त प्रह्लाद की कहानी

विष्णु पुराण में भक्त प्रह्लाद की कथा का उल्लेख है। प्रह्लाद भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक थे। विष्णु पुराण में भक्त प्रह्लाद की कथा का उल्लेख है। प्रह्लाद भगवान विष्णु के अनन्य भक्तों में से एक थे। आइये विस्तार से जानते हैं भक्त प्रह्लाद की कहानी जो अत्यंत रोचक और बच्चों के लिए प्रेरणादायक है। सनकादि ऋषियों के शाप के कारण भगवान विष्णु के पार्षद जय एवं विजय को दैत्ययोनि में जन्म लेना पड़ा था। भक्त प्रह्लाद का जन्म महर्षि कश्यप की पत्नी दक्षपुत्री दिति के गर्भ से दो महान पराक्रमी बालकों का जन्म हुआ। इनमें से बड़े का नाम हिरण्यकशिपु और छोटे का नाम हिरण्याक्ष था। दोनों भाइयों में बड़ी प्रीति थी। दोनों ही महाबलशाली, अमित पराक्रमी और आत्मबल संपन्न थे। दोनों भाइयों ने युद्ध में देवताओं को पराजित करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। एक समय जब हिरण्याक्ष ने पृथ्वी को रसातल में ले जाकर छिपा दिया तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर पृथ्वी की रक्षा के लिए हिरण्याक्ष का वध किया। अपने प्रिय भाई हिरण्याक्ष के वध से दुखी होकर हिरण्यकशिपु ने दैत्यों को प्रजा पर अत्याचार करने की आज्ञा देकर स्वयं महेन्द्राचल पर्वत पर चला गया। वह भगवान विष्णु द्वारा अपने भाई की हत्या का बदला लेने के लिए ब्रह्मा जी की घोर तपस्या करने लगा। इधर दैत्यों के राज्य को राजाविहीन देखकर देवताओं ने उनपर आक्रमण कर दिया। दैत्यगण इस युद्ध में पराजित हुए और पाताललोक को भाग गए। देवराज इन्द्र ने हिरण्यकशिपु के महल में प्रवेश करके उसकी पत्नी कयाधु को बंदी बना लिया। उस समय कयाधु गर्भवती थी, इसलिए इन्द्र उसे साथ लेकर अमरावती की ओर जाने लगे। रास्ते में उनकी देवर्षि नारद से भेंट हो गयी। नारद जी ने पुछा – ” देवराज ! इसे कहाँ ले जा रहे हो ? “ इन्द्र ने कहा – ” देवर्षे ! इसके गर्भ में हिरण्यकशिपु का अंश है, उसे मार कर इसे छोड़ दूंगा। “ यह सुनकर नारदजी ने कहा – ” देवराज ! इसके गर्भ में बहुत बड़ा भगवद्भक्त है, जिसे मारना तुम्हारी शक्ति के बाहर है, अतः इसे छोड़ दो। “ नारदजी के कथन का मान रखते हुए इन्द्र ने कयाधु को छोड़ दिया और अमरावती चले गए। नारदजी कयाधु को अपने आश्रम पर ले आये और उससे बोले – ” बेटी ! तुम यहाँ आराम से रहो जब तक तुम्हारा पति अपनी तपस्या पूरी करके नहीं लौटता। “ कयाधु उस पवित्र आश्रम में नारदजी के सुन्दर प्रवचनों का लाभ लेती हुई सुखपूर्वक रहने लगी जिसका गर्भ में पल रहे शिशु पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। समय होने पर कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। इधर हिरण्यकशिपु की तपस्या पूरी हुई और वह ब्रह्माजी से मनचाहा वरदान लेकर वापस अपनी राजधानी चला आया। कुछ समय के बाद कयाधु भी प्रह्लाद को लेकर नारदजी के आश्रम से राजमहल में आ गयी। भक्त प्रह्लाद की लीला जब प्रह्लाद कुछ बड़े हुए तब हिरण्यकशिपु ने उनके शिक्षा की व्यवस्था की। प्रह्लाद गुरु के सान्निध्य में शिक्षा ग्रहण करने लगे। एक दिन हिरण्यकशिपु अपने मंत्रियों के साथ सभा में बैठा हुआ था। उसी समय प्रह्लाद अपने गुरु के साथ वहाँ गए। प्रह्लाद को प्रणाम करते देखकर हिरण्यकशिपु ने उसे अपनी गोद में बिठाकर दुलार किया और कहा – ” वत्स ! तुमने अब तक अध्ययन में निरंतर तत्पर रहकर जो कुछ सीखा है, उसमें से कुछ अच्छी बात सुनाओ। “ तब प्रह्लाद बोले – ” पिताजी ! मैंने अब तक जो कुछ सीखा है उसका सारांश आपको सुनाता हूँ। जो आदि, मध्य और अंत से रहित, अजन्मा, वृद्धि-क्षय से शुन्य और अच्युत हैं, समस्त कारणों के कारण तथा जगत के स्थिति और अन्तकर्ता उन श्रीहरि को मैं प्रणाम करता हूँ। “ यह सुनकर दैत्यराज हिरण्यकशिपु के नेत्र क्रोध से लाल हो उठे, उसने कांपते हुए होठों से प्रह्लाद के गुरु से कहा – ” अरे दुर्बुद्धि ब्राह्मण ! यह क्या ? तूने मेरी अवज्ञा करके इस बालक को मेरे परम शत्रु की स्तुति से युक्त शिक्षा कैसे दी ? “ गुरूजी ने कहा – ” दैत्यराज ! आपको क्रोध के वशीभूत नहीं होना चाहिए। आपका पुत्र मेरी सिखाई हुई बात नहीं कह रहा है। “ हिरण्यकशिपु बोला – ” बेटा प्रह्लाद ! बताओ तुमको यह शिक्षा किसने दी है ? तुम्हारे गुरूजी कहते हैं कि मैंने तो इसे ऐसा उपदेश दिया ही नहीं है। “ प्रह्लाद बोले – ” पिताजी ! ह्रदय में स्थित भगवान विष्णु ही तो सम्पूर्ण जगत के उपदेशक हैं। उनको छोड़कर और कौन किसी को कुछ सीखा सकता है। “ हिरण्यकशिपु बोला – ” अरे मुर्ख ! जिस विष्णु का तू निश्शंक होकर स्तुति कर रहा है, वह मेरे सामने कौन है ? मेरे रहते हुए और कौन परमेश्वर कहा जा सकता है ? फिर भी तू मौत के मुख में जाने की इक्षा से बार-बार ऐसा बक रहा है। “ ऐसा कहकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेकों प्रकार से समझाया पर प्रह्लाद के मन से श्रीहरि के प्रति भक्ति और श्रद्धाभाव को कम नहीं कर पाया। तब अत्यंत क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने अपने सेवकों से कहा – ” अरे ! यह बड़ा दुरात्मा है। इसको मार डालो। अब इसके जीने से कोई लाभ नहीं है, क्योंकि यह शत्रुप्रेमी तो अपने कुल का ही नाश करने वाला हो गया है। “ हिरण्यकशिपु की आज्ञा पाकर उसके सैनिकों ने प्रह्लाद को अनेकों प्रकार से मारने की चेष्टा की पर उनके सभी प्रयास श्रीहरि की कृपा से असफल हो जाते थे। उन सैनिकों ने प्रह्लाद पर अनेक प्रकार के अस्त्र शस्त्रों से आघात किये पर प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। उन्होंने प्रह्लाद के हाथ-पैर बाँधकर समुद्र में डाल दिया पर प्रह्लाद फिर भी बच गए। उन सबने प्रह्लाद को अनेकों विषैले साँपों से डसवाया और पर्वत शिखर से गिराया पर भगवद्कृपा से प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। रसोइयों के द्वारा विष मिला हुआ भोजन देने पर प्रह्लाद उसे भी पचा गए। होलिका दहन जब प्रह्लाद को मारने के सब प्रकार के प्रयास विफल हो गए तब हिरण्यकशिपु के पुरोहितों ने अग्निशिखा के समान प्रज्ज्वलित शरीरवाली कृत्या उत्पन्न कर दी। उस अति भयंकरी कृत्या ने अपने पैरों से पृथ्वी को कम्पित करते हुए वहाँ प्रकट

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हनुमान जयंती

मित्रो, हम दूरदर्शनपर अनेक मालिकाएं देखते हैं । उसमें शक्तिमान जैसी कोई कल्पित व्यक्तिरेखा दिखाई जाती है । वह देखकर हमें लगता है कि हम भी ऐसे शक्तिमान बनें । कई बच्चे इन व्यक्तिरेखाओं को सही मानकर वैसे कृत्य करने का प्रयास करते हैं; किंतु यह सब झूठा तथा काल्पनिक होता है । इनसे अपने देवता बहुत अधिक शक्तिशाली तथा सर्वांग आदर्श हैं । हनुमान बहुत शक्तिशाली थे । उन्होंने केवल एक हाथपर द्रोणागिरि पर्वत उठाया था, तथा समुद्र के ऊपर से उडान भरकर लंका में प्रवेश किया था । मित्रो, हमें ऐसे सर्वशक्तिशाली हनुमान जैसा बनना अच्छा लगेगा या झूठी व्यक्तिरेखा के रूप में शक्तिमान एवं स्पाइडरमैन बनना अच्छा लगेगा ?         आपके मन में यह प्रश्न आया होगा कि हनुमान इतने शक्तिशाली कैसे ? इसका उत्तर है, `हनुमान ने श्रीराम की उपासना की’ । भक्ति से ही शक्ति मिलती है । यदि हम भक्ति करें, तो हम भी हनुमान जैसे शक्तिशाली बनेंगे । विद्यार्थी मित्रो, हमें सर्वशक्तिशाली तथा महापराक्रमी होने की इच्छा है ना ? हम भी हनुमान का आदर्श अपने समक्ष रखकर राष्ट्र तथा धर्म की रक्षा करने हेतु सिद्ध होते हैं । आज हम हनुमान जयंती के अवसरपर सर्वशक्तिशाली हनुमान का जन्म तथा अन्य जानकारी प्राप्त कर समझ लेते हैं, उसी प्रकार किन गुणों के कारण वह भगवान श्रीराम के चहेते तथा परमभक्त बने, यह भी जान लेते हैं । मारुति के जन्म का इतिहास तथा उन्हें हनुमान नाम प्राप्त होने का कारण राजा दशरथ ने पुत्र की प्राप्ति हेतु यज्ञ किया था । यज्ञ से अग्निदेव प्रकट हुए तथा प्रसन्न होकर राजा दशरथ की रानियों को पायस अर्थात खीर का प्रसाद दिया । राजा दशरथ की रानियों समान तप करनेवाली अंजनी को अर्थात मारुति की माताजी को भी प्रसाद प्राप्त हुआ । अत: अंजनी को मारुति जैसा पुत्र प्राप्त हुआ । उस दिन चैत्र पूर्णिमा थी । वह दिन हनुमान जयंती के रूप में मनाया जाता है । मारुति ने जन्म के समय ही उदीयमान सूरज देखा तथा उसे फल मानकर, उन्होंने सूर्य की दिशा में उडान भरी । उस समय सूर्य को निगलने हेतु राहु आया था । इंद्रदेव को लगा मारुति ही राहु है, अत: उन्होंने मारुति की ओर वङ्का फेंका । वह मारुति की ठोढीपर लगा तथा उनकी ठोढी कट गई । तबसे उन्हें हनुमान नाम प्राप्त हुआ । २. कार्य तथा विशेषताएं २ अ. महापराक्रमी : हनुमंत ने जंबू, माली, अक्ष, धूम्राक्ष, निकुंभ जैसे बडेबडे वीरों का नाश किया । उन्होंने रावण को भी बेहोश किया । समुद्र के ऊपर से उडान भरकर लंका दहन किया तथा द्रोणागिरी पर्वत भी उठा लाया । मित्रो, इन सब बातों से हमें पता चलता है कि मारुति कितने पराक्रमी थे । २ आ. निस्सीम भक्त : मित्रो, मारुति केवल पराक्रमी ही नहीं थे , अपितु वे भगवान श्रीराम के परम भक्त भी थे । भगवान के लिए प्राण देने की उनकी सिद्धता थी वह निरंतर भगवान का नामस्मरण करते थे । भगवान के नाम में ही शक्ति होती है, यह बात वह जानते थे । आओ, हम भी निरंतर नामस्मरण कर के भगवान के भक्त बनते हैं तथा भगवान से शक्ति प्राप्त करते हैं । मारुति को भगवान की सेवा के आगे सब तुच्छ लगता था । ऐसा भक्त ही भगवान को अच्छा लगता है । हमें भी मारुति जैसा भक्त बनने का प्रयास करना चाहिए । २ इ. अखंड साधना : जब युद्ध होते रहता था, तब मारुति थोडी देर अलग बैठकर ध्यान लगाते थे तथा हर पल भगवान का स्मरण करते रहते थे २ ई. बुदि्धमान : मारुति सभी व्याकरण सूत्र जानते थे । उन्हें ग्यारहवां व्याकरणकार माना जाता है । वह इतने बुदि्धमान कैसे थे ? मित्रो, जो भक्ति करते हैं, उनकी बुदि्ध सात्ति्वक होती है । आजसे हम भी मारुति जैसी भक्ति करके बुदि्धमान बनने का प्रयास करें । २ उ. जितेंद्रिय : मारुति को अपनी इंद्रियोंपर नियंत्रण था । सीतामाता को ढूंढने हेतु वह लंका गए । वहां उन्होंने राक्षस कुल की अनेक स्त्रीयों को देखा; किंतु उनके मन में एक भी स्त्री के प्रति क्षणभर के लिए कोई बुरा विचार नहीं आया; क्योंकि उन्होंने अपने सारे विकारोंपर नियंत्रण प्राप्त कर लिया था । मित्रो, भगवान की भक्ति करनेवाला सच्चा भक्त ही अपने विकारोंपर, अर्थात बुरे विचारोंपर नियंत्रण प्राप्त करता है । वह विकारों का दास नहीं होता । आजकल हम बहुतसी बातें सीखते हैं; किंतु अपने विकार नहीं जाते, क्योंकि हम भगवान के भक्त नहीं हैं । २ ऊ. भाषणकला में प्रवीण : मारुति उत्तम वक्ता थे । रावण के दरबार में उनके द्वारा भाषण देनेपर सारा दरबार आश्चर्यचकित रह गया । मित्रो, ऊपर दिए सारे गुण अपने में आने हेतु हम मारुति की प्रार्थना करते हैं, हे मारुतिराय, हमें तुम्हारे जैसी भक्ति करने की शक्ति तथा बुद्धि दें । आपके सर्व गुण हम में आने हेतु हमसे प्रयास होने दे, आपके  चरणों में यही विनम्र प्रार्थना है । ३. मारुति की मूर्ति का रंग सिंदूरी होने तथा उन्हें सिंदूर लगाने का कारण ३ अ. प्रभु श्रीराम के प्रति निस्सीम भक्ति का प्रतीक होने के कारण पूरे शरीरपर सिंदूर लगाना : मारुति का रंग सिंदूरी होने के पीछे एक कथा है । एक बार माता सीता ने स्नानोपरांत माथेपर सिंदूर लगाया । तब हनुमान ने उसका कारण पूछा । सीतामाता ने कहा, भगवान श्रीरामा की आयु लंबी हो; इस हेतु मैं सिंदूर लगाती हूं । मित्रो, मारुतिराय श्रीराम के निस्सीम भक्त थे । उन्होंने कहा, ऐसा करने से यदि मेरे स्वामी की आयु लंबी होती हो, तो मैं पूरे शरीरपर सिंदूर लगा लेता हूं । ऐसा कहकर उन्होंने अपने पूरे शरीरपर सिंदूर लगा लिया । प्रभु श्रीराम को जब इस बात का पता चला तो अति प्रसन्न होकर वे बोले, `मारुतिराय, तुम्हारे जैसा मेरा अन्य कोई भी भक्त नहीं । उसके उपरांत ही मारुति का रंग सिंदूरी हो गया । ३ आ. मारुति को सिंदूर तथा तेल अर्पण करना : हनुमान द्रोणागिरि पर्वत लेकर जा रहे थे, तब भरत ने उन्हें बाण मार दिया । उससे उनके पांव में चोट लग गई तथा सिंदूर एवं तेल लगाने से वह ठीक हो गया, इसलिए हनुमान को सिंदूर लगाते हैं तथा तेल अर्पण करते हैं । ४. मारुति के रूप ४ अ. प्रताप मारुति : एक हाथ में द्रोणागिरी पर्वत तथा

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वटपूर्णिमा पूजा

बच्चो, वटपूर्णिमा के दिन अपने में परोपकारी वृक्षों के गुण लाने का निश्चय करें  बालमित्रो, महान हिंदू धर्म एवं संस्कृति ने हमें बहुत बडा उत्तरदायित्व दिया है । आदर्श एवं आनंदमय जीवन जीने हेतु तथा चराचर में ईश्वर है, इसका आंतरिक बोध प्रत्येक जीव को निरंतर होता रहे, इस हेतु हमें ऋषिमुनियों ने हिंदू धर्मशास्त्र में अनेक व्रत बताए हैं । पूर्व में इन व्रतों का अचूक पालन करने के लिए प्रत्येक हिंदू परिश्रम करता था । उससे, जो विविध अनुभूतियां होती थीं, उसके कारण उसकी इन व्रतोंपर दृढ श्रद्धा होती थी तथा चराचर में प्रत्येक वस्तु में ईश्वर का अस्तित्व है, ऐसा भाव उसमें निर्मित होता था । वर्तमान में भी यदि हम वैसी श्रद्धा के साथ आचरण करेंगे, तो हमें भी वैसी अनुभूतियां होकर भाव निर्मित होगा एवं समाज में दिखाई देनेवाला रक्तपात, बलात्कार, विध्वंस, आगजनी, लूटपाट जैसी कोई समस्या शेष नहीं रहेगी । बालमित्रो, ज्येष्ठ पूर्णिमा को वटपूर्णिमा यह व्रत मनाते है!इस अवसरपर हमें जीवन के नैतिक मूल्यों का संवर्धन कर संस्कारित, आदर्श तथाआनंदमय जीवन जीना सीखना है । १. सौभाग्य अखंड रहें, इस हेतु हिंदू स्त्रियोंद्वारा वटवृक्ष की पूजा होना हम वर्ष में एक बार वटपूर्णिमा मनाते हैं । उस दिन प्रत्येक विवाहित हिंदू स्त्री अपना सौभाग्य अखंडबना रहे, इस हेतु वटवृक्ष की पूजा करती है । ऋषिमुनियों ने हमें इससे यही संदेश दिया है कि प्रत्येक वृक्ष में देवता हैं तथा उनकी ईश्वर समान पूजा करें ! २. प्रत्येक वृक्ष में ईश्वर का वास है, यह मानना आवश्यक बालमित्रो, हमें पाठशाला में पर्यावरण का विषय पढाया जाता है । इसमें पेड लगाएं एवं पेड बचाएं !उसी प्रकार वृक्ष हमारा मित्र है, ऐसा बताया जाता है; परंतु क्या हमें इस बात का आंतरिक बोध होता है ? नहीं ना ? पूर्वकाल में पेड लगाओ एवं पेड बचाओ तथा वृक्ष हमारा मित्र है, यह हमारे हिंदू बंधुओं को बताने की आवश्यकता नहीं होती थी । उस समय सभी हिंदुओं की ऐसी श्रद्धा होती थी कि प्रत्येक वृक्ष में ईश्वर है । इसलिए वे प्रतिदिन वृक्षों को नमस्कार करते थे । उनके मन में ऐसा कृतज्ञता का भाव होता था कि वृक्षों के कारण हम जीवित हैं । वटपूर्णिमा के अवसरपर आज से ही ईश्वर के चरणों में हम ऐसी प्रार्थना करेंगे कि प्रत्येक वृक्ष में ईश्वर हैं, यह अनुभव हमें नित्य होता रहे । ३. पर्यावरण का विषय केवल परीक्षा में अंक प्राप्त करने के लिए न पढकर वृक्षों में विद्यमान गुण अपने में लाने के लिए अभ्यास करेंगे हमें पाठशाला में पर्यावरण का विषय पढाया जाता है । किंतु, यह विषय क्यों पढाया जाता है, कभी इस बात का विचारआप करते हैं ? आजकल के विद्यार्थी वार्षिक परीक्षा में केवल अंक अर्जित करने के लिए यह विषय पढते हैं, यह उचित है क्या ? नहीं न ! तो आज वटपूर्णिमा के दिन आपको निश्चय करना है कि ‘मैं परीक्षा में केवल अंक बढाने के लिए पर्यावरण विषय की पढाई नहीं करूंगा, अपितु प्रत्येक वृक्ष में देवता हैं, इसका अनुभव लेकर वृक्षों के उपयोगी गुणअपनाने का प्रयास करूंगा ।’ ४. वृक्षों में गुण ४ अ. परोपकारी : मित्रो, वृक्ष तेज धूप सहकर अन्यों को छाया देते हैं । वर्षाऋतु में पानी की शीतल और तेज बौछारें सहकर अपने नीचे आनेवाले सभी जीवों की वर्षा से रक्षा करते हैं तथा हमें फल-फूल देते हैं । इनसे हमे यह सीखने के लिए मिलता है कि हमें भी निरंतर दूसरों की सहायता करना चाहिए । हम से लोगों को आनंद मिलना चाहिए । ध्यान रखिए, हमारे धर्म ने कभी ऐसा आचरण करने के लिए नहीं कहा है, जिससे दूसरों को कष्ट हो । ४ आ. अहंकारशून्य : वृक्ष हमें सदैव कुछ-न-कुछ देते रहते हैं; परंतु उनमें यह सबकरनेका घमंड नहीं होता । सबकुछ ईश्वर ही करते हैं, ऐसा उनका विचार अथवा भावहोता है । परंतु हम क्या करते हैं ? थोडा भी किया, तो घमंडके साथ कहते हैं, मैंने येकिया, मैंने वो किया । बच्चो, आगेसे हम भी इन वृक्षोंके समान भाव रखकर कार्यकरेंगे कि ईश्वर ही सबकुछ करते हैं । ४ इ. दूसरों को आनंद देना : वृक्षों से प्राप्त फल-फूल-पत्तों आदि से हम अनेक प्रकार कीऔषधियां बनाते हैं । वृक्षों से हमें बहुत आनंद मिलता है । आगे से हम भी अपने प्रत्येक कार्य से  दूसरों को आनंद देने का प्रयास करेंगे । ४ ई. नत्रवायु (नाइट्रोजन वायु) सोखकर प्राणि-मात्र के लिए उपयुक्त प्राणवायु(ऑक्सीजन) उपलब्ध करवाना : प्राणि-मात्र के लिए वातावरण में विद्यमान घातकनत्रवायु वृक्ष सोख लेते हैं तथा हमारे लिए उपयुक्त प्राणवायु देते हैं । मनुष्य, प्राणी,पक्षी, कीट तथा लताएं, इन सबको वृक्ष आधार देते हैं । हमें इनके प्रति निरंतर कृतज्ञ होना चाहिए । बच्चो, अब बताओ, वृक्षों में ईश्वर हैं अथवा नहीं ? ५. आनंदमय तथा आदर्श जीवन जीने के लिए वृक्षों के समान त्याग करना सीखिए! हिंदू धर्म में ऐसा कहा गया है कि त्याग में आनंद है । बच्चो, वृक्ष हमें त्याग करना सिखाते हैं । हानि सहकर भी दूसरों को लाभ पहुंचाना और आनंद देना सिखाते हैं ।परोपकार करना, दूसरों की सहायता करना, ये सब गुण हमें वृक्षों से सिखने के लिए मिलते हैं । इसलिए, हिदू धर्मशास्त्र में वृक्षों की पूजा करने के लिए कहा गया है । वृक्षों के गुण हम अपनाएंगे, तो आनंदमय तथा आदर्श जीवन निश्चित जी सकेंगे । बालमित्रो, आज से हम सब वृक्ष के सभी गुण अपने में लाकर अपना तथा दूसरों का जीवन आनंदमय बनाने का प्रयास करेंगे । इसके लिए हम ईश्वर से प्रार्थना करेंगे कि वे हमें शक्ति तथा बुदि्ध दें ।

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इस पौराणिक कथा के पीछे छिपी है होली की कहानी, जानिए क्यों किया जाता है होलिका दहन 

हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक भाई दूज भी माना जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, साल में दो बार भाई दूज का पर्व मनाया जाता है , जो होली और दीपावली के बाद पड़ता है। इस दिन बहनें भाई की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए तिलक लगाकर रक्षा सूत्र बांधती हैं। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज का पर्व मनाते हैं। इसे भ्रातृ द्वितीया नाम से भी जानते हैं। जानिए होली भाई दूज की तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व। भाई दूज 2023 की तिथि और शुभ मुहूर्त चैत्र मास की द्वितीया तिथि आरंभ- 8 मार्च को रात 7 बजकर 42 मिनट से शुरू चैत्र मास की द्वितीया तिथि समाप्त- 9 मार्च को रात 8 बजकर 54 मिनट तक होली भाई दूज तिथि- 9 मार्च 2023, गुरुवार अभिजीत मुहूर्त – सुबह 11 बजकर 55 मिनट से दोपहर 12 बजकर 42 मिनट तक हस्त नक्षत्र- 9 मार्च को सुबह 4 बजकर 20 मिनट से 10 मार्च को सुबह 5 बजकर 57 मिनट तक होली  भाई दूज 2023 महत्व भाई दूज हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। दिवाली में होने वाली भाई दूज का अधिक महत्व है। लेकिन होली के अगले दिन पड़ने वाले भाई दूज का विशेष महत्व है। ये पर्ल भाई-बहन को एक-दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करने का अवसर देता है। इस दिन बहनें अपने भाईयों के लिए सुख, स्वस्थ और समृद्ध जीवन की कामना करती हैं। इसके साथ ही भाई अपनी बहनों को प्यार सा उपहार देते हैं।  कब है होली भाई दूज? जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक भाई दूज भी माना जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के प्यार का प्रतीक है। हिंदू कैलेंडर के अनुसार, साल में दो बार भाई दूज का पर्व मनाया जाता है , जो होली और दीपावली के बाद पड़ता है। इस दिन बहनें भाई की लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए तिलक लगाकर रक्षा सूत्र बांधती हैं। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को भाई दूज का पर्व मनाते हैं। इसे भ्रातृ द्वितीया नाम से भी जानते हैं। जानिए होली भाई दूज की तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व। भाई दूज 2023 की तिथि और शुभ मुहूर्त चैत्र मास की द्वितीया तिथि आरंभ- 8 मार्च को रात 7 बजकर 42 मिनट से शुरू चैत्र मास की द्वितीया तिथि समाप्त- 9 मार्च को रात 8 बजकर 54 मिनट तक होली भाई दूज तिथि- 9 मार्च 2023, गुरुवार अभिजीत मुहूर्त – सुबह 11 बजकर 55 मिनट से दोपहर 12 बजकर 42 मिनट तक होली  भाई दूज 2023 महत्व भाई दूज हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। दिवाली में होने वाली भाई दूज का अधिक महत्व है। लेकिन होली के अगले दिन पड़ने वाले भाई दूज का विशेष महत्व है। ये पर्ल भाई-बहन को एक-दूसरे के प्रति सम्मान और प्रेम प्रकट करने का अवसर देता है। इस दिन बहनें अपने भाईयों के लिए सुख, स्वस्थ और समृद्ध जीवन की कामना करती हैं। इसके साथ ही भाई अपनी बहनों को प्यार सा उपहार देते हैं। 

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होलिका के रंगोत्सव परंपरा की 5 पौराणिक कथाएं

होली का त्योहार क्यों मनाया जाता है इसके पीछे कुछ कारण या परंपरा प्राचीनकाल से चली आ रही है, परंतु 5 ऐसी पौराणिक कथाएं हैं जिनके कारण होली का पर्व या रंगोत्सव मनाया जाता है। आओ जानते हैं कि आखिर इस त्योहार को मनाने की क्या है कथा। 1. आर्यों का होलका : प्राचीनकाल में होली को होलाका के नाम से जाना जाता था और इस दिन आर्य नवात्रैष्टि यज्ञ करते थे। इस पर्व में होलका नामक अन्य से हवन करने के बाद उसका प्रसाद लेने की परंपरा रही है। होलका अर्थात खेत में पड़ा हुआ वह अन्न जो आधा कच्चा और आधा पका हुआ होता है। संभवत: इसलिए इसका नाम होलिका उत्सव रखा गया होगा। प्राचीन काल से ही नई फसल का कुछ भाग पहले देवताओं को अर्पित किया जाता रहा है। इस तथ्य से यह पता चलता है कि यह त्योहार वैदिक काल से ही मनाया जाता रहा है। सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेषों में भी होली और दिवाली मनाए जाने के सबूत मिलते हैं। 2. होलिका दहन : होलिका दहन और होली के रंग के उत्सव की प्राचीन कथा भक्त प्रहलाद और उनकी बुआ होलिका और पिता हिरण्यकश्यप से जुड़ी हुई है। हिरण्यकश्यप खुद को भगवान समझता है और वह अपने पुत्र को विष्णु की पूजा और भक्ति से रोकता है। परंतु प्रहलाद इससे इनकार कर देता है। तब प्रहलाद को कई तरह से मारने का उपक्रम किया जाता है परंतु श्रीहरि विष्णु उसे बचा लेते हैं। अंत में होलिका प्रहलाद को गोदी में लेकर अग्नि में बैठ जाती हैं क्योंकि उसे अग्नि नहीं जलने का वरदान था। इसीलिए इस दिन असुर हरिण्याकश्यप की बहन होलिका दहन हुआ था। प्रहलाद बच गए थे। इसी की याद में होलिका दहन किया जाता है। यह होली का प्रथम दिन होता है। संभव: इसकी कारण इसे होलिकात्वस कहा जाता है। 3. कामदेव को किया था भस्म : इस दिन शिव ने कामदेव को भस्म करने के बाद जीवित किया था। कामदेव ने सभी देवताओं के कहने पर शिवजी की तपस्या को भंग कर दिया था क्योंकि सभी देवता चाहते थे कि शिवजी अपनी तपस्या से जागकर मां पार्वती से विवाह करें और उनसे जो पुत्र होगा वह हमारी तारकासुर से रक्षा करेगा। परंतु शिवजी ने कामदेव को भस्म कर दिया और बाद में रति को यह वचन दिया कि तुम्हारा यह पति द्वापर में श्रीकृष्‍ण का पुत्र प्रद्युम्न बनकर जन्मेगा।  4. राक्षसी ढुंढी और राजा पृथु : यह भी कहते हैं कि इसी दिन राजा पृथु ने राज्य के बच्चों को बचाने के लिए राक्षसी ढुंढी को लकड़ी जलाकर आग से मार दिया था। इसीलिए होली को ‘वसंत महोत्सव’ या ‘काम महोत्सव’ भी कहते हैं। 5. पूतना वध : जिस दिन राक्षसी पूतना का वध हुआ था उस दिन फाल्गुन पूर्णिमा थी। अत: बुराई का अंत हुआ और इस खुशी में समूचे नंदगांववासियो ने खूब जमकर रंग खेला, नृत्य किया और जमकर उत्सव मनाया। तभी से होली में रंग और भंग का समावेश होने लगा। फाग उत्सव : त्रैतायुग के प्रारंभ में विष्णु ने धूलि वंदन किया था। इसकी याद में धुलेंडी मनाई जाती है। होलिका दहन के बाद ‘रंग उत्सव’ मनाने की परंपरा भगवान श्रीकृष्ण के काल से प्रारंभ हुई। तभी से इसका नाम फगवाह हो गया, क्योंकि यह फागुन माह में आती है। कृष्ण ने राधा पर रंग डाला था। इसी की याद में रंग पंचमी मनाई जाती है। श्रीकृष्ण ने ही होली के त्योहार में रंग को जोड़ा था। पहले होली के रंग टेसू या पलाश के फूलों से बनते थे और उन्हें गुलाल कहा जाता था। वो रंग त्वचा के लिए बहुत अच्छे होते थे क्योंकि उनमें कोई रसायन नहीं होता था। लेकिन समय के साथ रंगों में नए नए प्रयोग किए जाने लगे।

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विश्वकर्मा जयंती कब है, क्यों कलयुग में इनकी पूजा मानी गई है जरूरी

दुनिया के सबसे पहले सिविल इंजीनियर भगवान विश्‍वकर्मा पौराणिक काल के सबसे बड़ी सिविल इंजीनियर माने जाने वाले भगवान विश्‍वकर्मा की जयंती हर साल मनाई जाती है। मान्‍यताओं के अनुसार हर साल कन्‍या संक्रांति के दिन विश्‍वकर्मा जयंती मनाई जाती है और यह लगभग प्रत्‍येक वर्ष 17 सितंबर को ही होती है। इस साल भी 17 सितंबर को ही कन्‍या संक्रांति है और इसी दिन विश्‍वकर्मा जयंती के साथ ही पद्म एकादशी भी पड़ रही है। भगवान विश्‍वकर्मा को दुनिया का सबसे पहला इंजीनियर और वास्‍तुकार माना जाता है। आइए आपको बताते हैं विश्‍वकर्मा जयंती का महत्‍व और क्‍यों कलयुग में इनकी पूजा करनी मानी जाती है जरूरी पौराणिक काल में कर चुके हैं इनकी रचना माना जाता है कि भगवान विश्‍वकर्मा ने ही इंद्रपुरी, द्वारिका, हस्तिनापुर, स्‍वर्गलोक, लंका और जगन्‍नाथपुरी का निर्माण करवाया था। उन्‍होंने ही भगवान शिव का त्रिशूल और विष्‍णु भगवान का सुदर्शन चक्र तैयार किया था। यही वजह है कि सभी इंजीनियर और तकनीकी क्षेत्र से जुडे़ लोग विश्‍वकर्माजी को अपना भगवान मानते हैं और हर साल विश्‍वकर्मा जयंती पर उनकी पूजा करते हैं। विश्‍वकर्मा पूजा का महत्‍व विश्‍वकर्मा जयंती के दिन सभी कारखानों और औद्योगिक संस्थानों में भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान विश्वकर्मा की पूजा-अर्चना करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। साथ ही व्यापार में तरक्की और उन्नति होती है। मान्‍यता है तकनीकी क्षेत्र से जुड़े जो भी लोग हर साल विश्‍वकर्मा जयंती पर अपने औजारों और अस्‍त्रों की पूजा करते हैं, पूरे साल उनके हथियार और औजार बिना किसी बाधा के अच्‍छी तरह से काम करते हैं। कलयुग में इसलिए जरूरी मानी गई है विश्‍वकर्मा पूजा कलयुग में भगवान विश्‍वकर्मा की पूजा हर व्‍यक्ति के लिए जरूरी और लाभप्रद बताई गई है। कलयुग का संबंध कलपुर्जों से माना जाता है और आज के युग में कलपुर्जे का प्रयोग हर शख्‍स कर रहा है। लैपटॉप, मोबाइल फोन और टैबलेट भी एक प्रकार की मशीन हैं और इनके बिना आज के युग में रह पाना बहुत मुश्किल है। इसलिए भगवान विश्‍वकर्मा की पूजा करना हम सबके लिए बेहद शुभफलदायी मानी जा रही है।

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भगवान विश्‍वकर्मा की जयंती : जानें महत्व, पूजन विधि एवं मंत्र

माना जाता है भगवान ब्रह्मा जी के कहने पर विश्वकर्मा ने ये दुनिया बनाई थी। हस्तिनापुर, द्वारका से लेकर, शिव जी का त्रिशूल भी विश्वकर्मा जी ने बनाया है। भगवान विश्वकर्मा इस ब्रह्मांड के रचयिता हैं, आज हम जो कुछ भी देखते हैं वो सब भगवान विश्वकर्मा ने ही बनाया है। माघ शुक्ल त्रयोदशी तिथि को विश्वकर्मा जी के पूजन का विशेष महत्व है। माना जाता है कि अगर पूरे विधि-विधान के साथ पूजा- अर्चना की जाए तो जीवन के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं, व्यापार में आने वाली कठिनाई दूर होकर घर धन-संपदा से भरने लगता है।  विश्वकर्मा जयंती के दिन स्नान करने के बाद एक चौकी पर नीले रंग का कपड़ा बिछाएं और उस पर विश्वकर्मा जी की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद अपने काम में इस्तेमाल होने वाले औजारों को उनके सामने रखें। फिर उन्हें फल, फूल, मिठाई और अक्षत अर्पित करें। उनकी आरती उतारे और मंत्रों का जाप करें। पूजा विधि सबसे पहले सुबह जल्दी उठ कर स्नान करें। – पूजा स्थान को साफ करके प्रतिमा रखें। – हाथ में पुष्म, और अक्षत लेकर ध्यान लगाएं। – भगवान को भोग लगाएं। – विधिपूर्वक आरती उतारें। – अपने औजारों और यंत्र की पूजा कर हवन करें। भगवान विश्वकर्मा मंत्र ॐ आधार शक्तपे नम:, ॐ कूमयि नम:, ॐ अनंतम नम:, ॐ पृथिव्यै नम: का जाप करें।

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उपांग ललिता पंचमी व्रत कथा, पूजा विधि, महत्व

हिन्दू पंचांग के अनुसार शारदीय नवरात्रि के आश्विन शुक्‍ल पंचमी को ललिता पंचमी पर्व या उपांग ललिता पर्व मनाया जाता है। यह पर्व शक्तिस्वरूपा देवी ललिता को समर्पित है। ललिता देवी को माता सती पार्वती का ही एक रूप माना जाता हैं। यह पर्व पूरे भारतभर में मनाया जाता है। इस सुअवसर पर भक्तजन व्रत रखते हैं जिसे ललिता पंचमी व्रत या उपांग ललिता व्रत के नाम से जाना जाता है। ललिता देवी को ‘त्रिपुर सुंदरी’ के नाम से भी जाना जाता है। उपांग ललिता पंचमी व्रत कथा पुराणों के अनुसार जब माता सती अपने पिता दक्ष द्वारा अपमान किए जाने पर यज्ञ अग्नि में अपने प्राण त्‍याग देती हैं तब भगवान शिव उनके शरीर को उठाए घूमने लगते हैं, ऐसे में पूरी धरती पर हाहाकार मच जाता है। जब विष्‍णु भगवान अपने सुदर्शन चक्र से माता सती की देह को विभाजित करते हैं, तब भगवान शंकर को हृदय में धारण करने पर इन्हें ‘ललिता’ के नाम से पुकारा जाने लगा। कालिका पुराण के अनुसार देवी ललिता की दो भुजाएं हैं। यह माता गौर वर्ण होकर रक्तिम कमल पर विराजित हैं। दक्षिणमार्गी शाक्तों के मतानुसार देवी ललिता को ‘चण्डी’ का स्थान प्राप्त है। इनकी पूजा पद्धति देवी चण्डी के समान ही है। नवरात्रि में दुर्गा देवी के 9 रूपों की पूजा की जाती है तथा नवरात्रि के 5वें दिन स्कंदमाता के पूजन के साथ-साथ ललिता पंचमी व्रत तथा शिवशंकर की पूजा भी की जाती है। इस संबंध में ऐसी मान्‍यता है कि मां ललिता 10 महाविद्याओं में से ही एक हैं, अत: पंचमी के दिन यह व्रत रखने से भक्त के सभी कष्‍ट दूर होकर उन्हें मां ललिता का विशेष आशीर्वाद मिलता है। देवी ललिता का ध्यान रूप बहुत ही उज्ज्वल व प्रकाशवान है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन माता ललिता कामदेव के शरीर की राख से उत्पन्न हुए ‘भांडा’ नामक राक्षस को मारने के लिए प्रकट हुई थीं। इस दिन देवी मंदिरों पर भक्तों का तांता लगता है। यह व्रत समस्त सुखों को प्रदान करने वाला होता है अत: इस दिन मां ललिता की पूजा-आराधना का विशेष महत्व है। इस दिन ललितासहस्रनाम, ललितात्रिशती का पाठ विशेष तौर पर किया किया जाता है। जल झुलनी एकादशी व्रत कथा | व्रत विधि | महत्व हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को जलझूलनी एकादशी कहते हैं। इसे परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi), पदमा एकादशी (Padma Ekadashi), वामन एकादशी (Vaman Ekadashi) एवं डोल ग्यारस (Dol Ekadashi) आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान वामन की पूजा की जाती है। कुछ स्थानों पर ये दिन भगवान श्रीकृष्ण की सूरज पूजा (जन्म के बाद होने वाला मांगिलक कार्यक्रम) के रूप में मनाया जाता है। शिशु के जन्म के बाद जलवा पूजन, सूरज पूजन या कुआं पूजन का विधान है। उसी के बाद अन्य संस्कारों की शुरूआत होती है। यह पर्व उसी का एक रूप माना जा सकता है। शाम के वक्त भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को झांकी के रूप में मन्दिर के नजदीक किसी पवित्र जलस्रोत पर ले जाया जाता है और वहां उन्हें स्नान कराते है एवं वस्त्र धोते है और फिर वापस आकर उनकी पूजा की जाती है। इस दिन व्रत किया जाता है। कई जगह भगवान की इस झांकी को देखने के बाद व्रत खोलने की परम्परा है। झांकी में भगवान को पालकी यानि डोली में ले जाया जाता है इसलिए इसे डोल एकादशी (Dol Ekadashi) भी कहते है। एक मान्यता यह भी है कि भगवान विष्णु इस दिन करवट बदलते है। इस बदलाव के कारण इसे परिवर्तिनी एकादशी (Parivartani Ekadashi) कहते है। देखा जाए तो यह मौसम में बदलाव का भी सूचक होता है। इस दिन भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा होती है इसलिए वामन एकादशी (Vaman Ekadashi) भी कहा जाता है। जल झुलनी एकादशी व्रत विधि जल झुलनी एकादशी व्रत का नियम पालन दशमी तिथि की रात से ही शुरू करें व ब्रह्मचर्य का पालन करें। एकादशी के दिन सुबह स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनकर भगवान वामन की प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत का संकल्प लें। इस दिन यथासंभव उपवास करें उपवास में अन्न ग्रहण नहीं करें संभव न हो तो एक समय फलाहारी कर सकते हैं। इसके बाद भगवान वामन की पूजा विधि-विधान से करें (यदि आप पूजन करने में असमर्थ हों तो पूजन किसी योग्य ब्राह्मण से भी करवा सकते हैं।) भगवान वामन को पंचामृत से स्नान कराएं। स्नान के बाद उनके चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़कें और उस चरणामृत को पीएं। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें।विष्णु सहस्त्रनाम का जाप एवं भगवान वामन की कथा सुनें। रात को भगवान वामन की मूर्ति के समीप हो सोएं और दूसरे दिन यानी द्वादशी के दिन वेदपाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करें जो मनुष्य यत्न के साथ विधिपूर्वक इस व्रत को करते हुए रात्रि जागरण करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट होकर अंत में वे स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं। इस एकादशी की कथा के श्रवणमात्र से वाजपेयी यज्ञ का फल प्राप्त होता है। जलझूलनी एकादशी व्रत का महत्व धर्म ग्रंथों के अनुसार, परिवर्तिनी एकादशी पर व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। पापियों के पाप नाश के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं है। जो मनुष्य इस एकादशी को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। इस व्रत के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर से कहा है कि जो इस दिन कमलनयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद शुक्ल एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। जलझूलनी एकादशी व्रत की कथा कथा इस प्रकार है सूर्यवंश में मान्धाता नामक चक्रवर्ती राजा हुए उनके राज्य में सुख संपदा की कोई कमी नहीं थी, प्रजा सुख से जीवन्म व्यतीत कर रही थी परंतु एक समय उनके राज्य में तीन वर्षों तक

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राधाष्टमी व्रत कथा | व्रत विधि | महत्व

भाद्र पद माह की शुक्ल अष्टमी को राधाष्टमी मनाई जाती है। शास्त्रों में इस तिथि को श्री राधाजी का प्राकट्य दिवस माना गया है। में राधा अष्टमी 6 सितम्बर को मनाई जाएगी। पद्म पुराण के अनुसार राधा जी राजा वृषभानु की पुत्री थीं एवं राधा जी के माता का नाम कीर्ति था। कथानुसार एक बार जब राजा वृषभानु यज्ञ के लिए भूमि की साफ-सफाई कर रहे थे तब उनको भूमि पर कन्या के रूप में राधा जी मिलीं थीं।जिसका वृषभानु अपनी पुत्री मानकर लालन-पालन करने लगे। राधा जी जब बड़ी हुई तो उनका जीवन सर्वप्रथम कृष्ण जी के सानिध्य में बीता। किन्तु राधा जी का विवाह रापाण नामक व्यक्ति के साथ सम्पन्न हुआ था। पुराणों के अनुसार राधा जी माँ लक्ष्मी की अवतार थी। जब कृष्ण जी द्वापर युग में जन्म लिया तो माँ लक्ष्मी जी भी राधा रूप में प्रकट हुई थी। श्री राधाष्टमी व्रत विधि अन्य व्रतों की भांति इस दिन भी प्रात: सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि क्रियाओं से निवृत होकर श्री राधा जी का विधिवत पूजन करना चाहिए । इस दिन श्री राधा कृष्ण मंदिर में ध्वजा, पुष्पमाला,वस्त्र, पताका, तोरणादि व विभिन्न प्रकार के मिष्ठान्नों एवं फलों से श्री राधा जी की स्तुति करनी चाहिए। मंदिर में पांच रंगों से मंडप सजाएं, उनके भीतर षोडश दल के आकार का कमलयंत्र बनाएं, उस कमल के मध्य में दिव्य आसन पर श्री राधा कृष्ण की युगलमूर्ति पश्चिमाभिमुख करके स्थापित करें। बंधु बांधवों सहित अपनी सामर्थ्यानुसार पूजा की सामग्री लेकर भक्तिभाव से भगवान की स्तुति गाएं। दिन में हरिचर्चा में समय बिताएं तथा रात्रि को नाम संकीर्तन करें। एक समय फलाहार करें। मंदिर में दीपदान करें। श्री राधाष्टमी व्रत का महत्व श्री राधा कृष्ण जिनके इष्टदेव हैं, उन्हें राधाष्टमी का व्रत अवश्य करना चाहिए क्योंकि यह व्रत श्रेष्ठ है। श्री राधाजी सर्वतीर्थमयी एवं ऐश्वर्यमयी हैं। इनके भक्तों के घर में सदा ही लक्ष्मी जी का वास रहता है। जो भक्त यह व्रत करते हैं उन साधकों की जहां सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं मनुष्य को सभी सुखों की प्राप्ति होती है। माना जाता है कि इस दिन राधा जी से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है। जो मनुष्य श्री राधा जी के नाम मंत्र का स्मरण एवं जाप करता है वह धर्मार्थी बनता है। अर्थार्थी को धन की प्राप्ति होती है, मोक्षार्थी को मोक्ष मिलता है। राधा जी की पूजा के बिना श्रीकृष्ण जी की पूजा अधूरी रहती है। राधाष्टमी कथा राधा का पृथ्वी पर आना एक सामान्य घटना नहीं है। गोलोक में रहने वाली राधा को एक शाप के कारण पृथ्वी पर आकर कृष्ण का वियोग सहना पड़ा। इस संदर्भ में ब्रह्मवैवर्त पुराण में एक कथा आई है। एक बार राधा गोलोक से कहीं बाहर गयी थी उस समय श्री कृष्ण अपनी विरजा नाम की सखी के साथ विहार कर रहे थे। संयोगवश राधा वहां आ गई। विरजा के साथ कृष्ण को देखकर राधा क्रोधित हो गईं और कृष्ण एवं विरजा को भला बुरा कहने लगी। लज्जावश विरजा नदी बनकर बहन लगी। कृष्ण के प्रति राधा के क्रोधपूर्ण शब्दों को सुनकर कृष्ण का मित्र सुदामा आवेश में आ गया। सुदामा कृष्ण का पक्ष लेते हुए राधा से आवेशपूर्ण शब्दों में बात करने लगा। सुदामा के इस व्यवहार को देखकर राधा नाराज हो गई। राधा ने सुदामा को दानव रूप में जन्म लेने का शाप दे दिया। क्रोध में भरे हुए सुदामा ने भी हित अहित का विचार किए बिना राधा को मनुष्य योनि में जन्म लेने का शाप दे दिया। राधा के शाप से सुदामा शंखचूर नाम का दानव बना जिसका वध भगवान शिव ने किया। सुदामा के शाप के कारण राधा को मनुष्य रूप में जन्म लेकर धरती पर आना पड़ा।

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भारत के प्रसिद्ध 16 हनुमान मंदिर

इस लेख में आप सब भारत के विभिन्न हिस्सों में स्तिथ 16 प्रसीद्ध हनुमान मंदिरों की बारे में जानकारी पाएंगे। इनमे से हर मंदिर की अपनी एक विशेषता है कोई मंदीर अपनी प्राचीनता की लिये फेमस है तो कोइ मंदीर अपनी भव्यता के लिए। जबकि कई मंदिर अपनी अनोखी हनुमान मूर्त्तियों के लिए जैसे की इलाहबाद का हनुमान मंदीर जहां की भारत की एक मात्र लेटे  हुए हनूमान की प्रतिमा है जबकि इंदौर के उलटे हनुमान मंदिर में भारत कि एक मात्र उलटे हनुमान कि प्रतीमा  हैं इसी तरह रतनपुर के गिरिजाबंध हनुमान मंदिर में स्त्री रुप में हनुमान प्रतीमा है।  इन सबसे अलग गुजरात के जामनगर के बाल हनूमान मंदीर का नाम एक अनोखे रिकॉर्ड क़े कारण गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है। 1. हनुमान मंदिर, इलाहबाद, उत्तर प्रदेश  इलाहबाद किले से सटा यह मंदिर लेटे हुए हनुमान जी की प्रतिमा वाला एक छोटा किन्तु प्राचीन मंदिर है। यह सम्पूर्ण भारत का केवल एकमात्र मंदिर है जिसमें हनुमान जी लेटी हुई मुद्रा में हैं। यहां पर स्थापित हनुमान जी की प्रतिमा 20 फीट लम्बी है। जब वर्षा के दिनों में बाढ़ आती है और यह सारा स्थान जलमग्न हो जाता है, तब हनुमानजी की इस मूर्ति को कहीं ओर ले जाकर सुरक्षित रखा जाता है। उपयुक्त समय आने पर इस प्रतिमा को पुन: यहीं लाया जाता है। 2. हनुमानगढ़ी, अयोध्या धर्म ग्रंथों के अनुसार अयोध्या भगवान श्रीराम की जन्मस्थली है। यहां का सबसे प्रमुख श्रीहनुमान मंदिर हनुमानगढ़ी के नाम से प्रसिद्ध है। यह मंदिर राजद्वार के सामने ऊंचे टीले पर स्थित है। इसमें 60 सीढिय़ां चढऩे के बाद श्रीहनुमानजी का मंदिर आता है। यह मंदिर काफी बड़ा है। मंदिर के चारों ओर निवास योग्य स्थान बने हैं, जिनमें साधु-संत रहते हैं। हनुमानगढ़ी के दक्षिण में सुग्रीव टीला व अंगद टीला नामक स्थान हैं। इस मंदिर की स्थापना लगभग 300 साल पहले स्वामी अभयारामदासजी ने की थी। 3. सालासर बालाजी हनुमान मंदिर, सालासर, राजस्थान हनुमानजी का यह मंदिर राजस्थान के चूरू जिले में है। गांव का नाम सालासर है, इसलिए सालासर वाले बालाजी के नाम यह मंदिर प्रसिद्ध है। हनुमानजी की यह प्रतिमा दाड़ी व मूंछ से सुशोभित है। यह मंदिर पर्याप्त बड़ा है। चारों ओर यात्रियों के ठहरने के लिए धर्मशालाएं बनी हुई हैं। दूर-दूर से श्रद्धालु यहां अपनी मनोकामनाएं लेकर आते हैं और मनचाहा वरदान पाते हैं। इस मंदिर के संस्थापक श्री मोहनदासजी बचपन से श्री हनुमान जी के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। माना जाता है कि हनुमान जी की यह प्रतिमा एक किसान को जमीन जोतते समय मिली थी, जिसे सालासर में सोने के सिंहासन पर स्थापित किया गया है। यहाँ हर साल भाद्रपद, आश्विन, चैत्र एवं वैशाख की पूर्णिमा के दिन विशाल मेला लगता है। 4. हनुमान धारा, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश  उत्तर प्रदेश के सीतापुर नामक स्थान के समीप यह हनुमान मंदिर स्थापित है। सीतापुर से हनुमान धारा की दूरी तीन मील है। यह स्थान पर्वतमाला के मध्यभाग में स्थित है। पहाड़ के सहारे हनुमानजी की एक विशाल मूर्ति के ठीक सिर पर दो जल के कुंड हैं, जो हमेशा जल से भरे रहते हैं और उनमें से निरंतर पानी बहता रहता है। इस धारा का जल हनुमानजी को स्पर्श करता हुआ बहता है। इसीलिए इसे हनुमान धारा कहते हैं। धारा का जल पहाड़ में ही विलीन हो जाता है। उसे लोग प्रभाती नदी या पातालगंगा कहते हैं। इस स्थान के बारे में एक कथा इस प्रकार प्रसिद्ध है- श्रीराम के अयोध्या में राज्याभिषेक होने के बाद एक दिन हनुमानजी ने भगवान श्रीरामचंद्र से कहा- हे भगवन। मुझे कोई ऐसा स्थान बतलाइए, जहां लंका दहन से उत्पन्न मेरे शरीर का ताप मिट सके। तब भगवान श्रीराम ने हनुमानजी को यह स्थान बताया। 5. श्री संकटमोचन मंदिर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश यह मंदिर उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर में स्थित है। इस मंदिर के चारों ओर एक छोटा सा वन है। यहां का वातावरण एकांत, शांत एवं उपासकों के लिए दिव्य साधना स्थली के योग्य है। मंदिर के प्रांगण में श्रीहनुमानजी की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। श्री संकटमोचन हनुमान मंदिर के समीप ही भगवान श्रीनृसिंह का मंदिर भी स्थापित है। ऐसी मान्यता है कि हनुमानजी की यह मूर्ति गोस्वामी तुलसीदासजी के तप एवं पुण्य से प्रकट हुई स्वयंभू मूर्ति है। इस मूर्ति में हनुमानजी दाएं हाथ में भक्तों को अभयदान कर रहे हैं एवं बायां हाथ उनके ह्रदय पर स्थित है। प्रत्येक कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमानजी की सूर्योदय के समय विशेष आरती एवं पूजन समारोह होता है। उसी प्रकार चैत्र पूर्णिमा के दिन यहां श्रीहनुमान जयंती महोत्सव होता है। इस अवसर पर श्रीहनुमानजी की बैठक की झांकी होती है और चार दिन तक रामायण सम्मेलन महोत्सव एवं संगीत सम्मेलन होता है। 6. बेट द्वारका हनुमान दंडी मंदिर, गुजरात बेट द्वारका से चार मील की दूरी पर मकर ध्वज के साथ में हनुमानजी की मूर्ति स्थापित है। कहते हैं कि पहले मकरध्वज की मूर्ति छोटी थी परंतु अब दोनों मूर्तियां एक सी ऊंची हो गई हैं। अहिरावण ने भगवान श्रीराम लक्ष्मण को इसी स्थान पर छिपा कर रखा था। जब हनुमानजी श्रीराम-लक्ष्मण को लेने के लिए आए, तब उनका मकरध्वज के साथ घोर युद्ध हुआ। अंत में हनुमानजी ने उसे परास्त कर उसी की पूंछ से उसे बांध दिया। उनकी स्मृति में यह मूर्ति स्थापित है। कुछ धर्म ग्रंथों में मकरध्वज को हनुमानजी का पुत्र बताया गया है, जिसका जन्म हनुमानजी के पसीने द्वारा एक मछली से हुआ था। 7. मेहंदीपुर बालाजी मंदिर, मेहंदीपुर, राजस्थान राजस्थान के दौसा जिले के पास दो पहाडिय़ों के बीच बसा हुआ मेहंदीपुर नामक स्थान है। यह मंदिर जयपुर-बांदीकुई-बस मार्ग पर जयपुर से लगभग 65 किलोमीटर दूर है। दो पहाडिय़ों के बीच की घाटी में स्थित होने के कारण इसे घाटा मेहंदीपुर भी कहते हैं। जनश्रुति है कि यह मंदिर करीब 1 हजार साल पुराना है। यहां पर एक बहुत विशाल चट्टान में हनुमान जी की आकृति स्वयं ही उभर आई थी। इसे ही श्री हनुमान जी का स्वरूप माना जाता है। इनके चरणों में छोटी सी कुण्डी है, जिसका जल कभी समाप्त नहीं होता। यह मंदिर तथा यहाँ के हनुमान जी का विग्रह काफी शक्तिशाली एवं चमत्कारिक माना जाता है तथा इसी वजह से यह स्थान न केवल राजस्थान में बल्कि पूरे देश में विख्यात है। कहा

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12 ज्योतिर्लिंग 

हिन्दू धर्म में पुराणों के अनुसार शिवजी जहाँ-जहाँ स्वयं प्रगट हुए उन बारह स्थानों पर स्थित शिवलिंगों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है। ये संख्या में 12 है। हिंदुओं में मान्यता है कि जो मनुष्य प्रतिदिन प्रात:काल और संध्या के समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों के स्मरण मात्र से मिट जाता है। आइए जानते है भारत में स्तिथ 12 ज्योतिर्लिंगों के बारे में 1- सोमनाथ ज्योतिर्लिंग सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। शिवपुराण के अनुसार जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने क्षय रोग होने का श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चंद्रदेव ने की थी। विदेशी आक्रमणों के कारण यह 17 बार नष्ट हो चुका है। हर बार यह बिगड़ता और बनता रहा है। 2- मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं। 3- महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग  यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है। उज्जैन वासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं। 4- ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग  ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है। 5- केदारनाथ ज्योतिर्लिंग  केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है। 6- भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रृद्धा से इस मंदिर के प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद दर्शन करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं। 7- काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है, कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे। 8- त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरूहोती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा। 9- वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखण्ड प्रान्त, पूर्व में बिहार प्रान्त के संथाल परगना के दुमका नामक जनपद में पड़ता है। 10- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 17 मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। 11- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथ पुरं नामक स्थान में स्थित है।  भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है, कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है। 12- घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों

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