MYTHOLOGICAL STORIES

श्राद्ध या पितृपक्ष में कौवों को भोजन क्यों कराते है ?

श्राद्ध के समय लोग अपने पूर्वजों को याद करके यज्ञ करते हैं और कौए को अन्न जल अर्पित करते हैं। दरअसल, कौए को यम का प्रतीक माना जाता है। गरुण पुराण के अनुसार, अगर कौआ श्राद्ध को भोजन ग्रहण कर लें तो पितरों की आत्मा को शांति मिलती है। साथ ही ऐसा होने से यम भी खुश होते हैं और उनका संदेश उनके पितरों तक पहुंचाते है। पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष में कौवों को पितरों का प्रतिक मानकर भोजन कराया जाता है। लेकिन भोजन कौए को ही क्यों दिया जाता है, इसका वर्णन हमे हमारे पुराणों और ग्रंथों में मिलता है। हमारे धर्म ग्रंथों में इससे सम्बंधित 2 प्रसंगों का वर्णन मिलता है जो इस प्रकार है। पहले प्रसंग के अनुसार मरूता नाम के राजा एक बार यज्ञ कर रहे थे। इसमें इंद्र सहित सभी देवता शामिल हुए। इसमें देवताओं का दुश्मन रवाना (कौए की तरह दिखने वाला एक पक्षी) भी यहां आ गया। फिर इंद्र ने मोर, कुबेर ने गिरगिट, वरुण ने श्वान और यम ने कौए का रूप धारण कर कर उसे भगाया और फिर मूल रूप में वापस लौट आए। उन्होंने अपनी जान की रक्षा करने के लिए कौए, गिरगिट और श्वान को वरदान भी दिया। यम ने कौए को वरदान दिया कि तुम्हें दिया भोजन पूर्वजों की आत्मा को भी शांत करेगा। दूसरे प्रसंग के अनुसार इन्द्र के पुत्र जयंत ने ही सबसे पहले कौए का रूप धारण किया था। त्रेता युग की घटना कुछ इस प्रकार हैं – जयंत ने कौऐ का रूप धर कर माता सीता को घायल कर दिया था। तब भगवान श्रीराम ने तिनके से ब्रह्मास्त्र चलाकर जयंत की आंख को क्षतिग्रस्त कर दिया था। जयंत ने अपने कृत्य के लिए क्षमा मांगी, तब राम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा। इसके अलावा गरुण पुराण में भी कौओं का जिक्र आया है। गरुड़ पुराण में बताया है कि कौएं यमराज के संदेश वाहक होते हैं। श्राद्ध पक्ष में कौएं घर-घर जाकर खाना ग्रहण करते हैं, इससे यमलोक में स्थित पितर देवताओं को तृप्ति मिलती है। कौओं के संबंध में एक रोचक बात यह है की कौएं KHA की आवाज निकालते है। मूल रूप से KHA एक संस्कृत शब्द हैं। इसके कई अर्थ है – सूर्य, वायु, स्वर्ग, आसमान, पृथ्वी, ख़ुशी, ब्रह्म आदि। विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं में भी कौओं का वर्णन मिलता है। ग्रीक माइथोलॉजी में रैवन (एक प्रकार का कौवा) को गुड लक का सिम्बल माना गया है। इसे गॉड का मैसेंजर कहा गया है। इसे दुनिया का निर्माण करने वालों में से एक बताया गया है। नोर्स माइथोलॉजी में दो रैवन (एक प्रकार का कौवा) हगिन और मुनिन का जिक्र मिलता है। इन्हें ईश्वर के प्रति उत्साह का प्रतीक बताया गया है। इजिप्शियन माइथोलॉजी में आत्मा के तीन रूप माने गए हैं। ये ‘का’, ‘बा’ और ‘अख’ होते हैं। इनमें ‘का’ को प्राणशक्ति बताया गया है। ‘का’ के निकलते ही व्यक्ति प्राणहीन हो जाता है।

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शिव आराधना सावन में

शिव आराधना सावन में, भोलेनाथ भगवान शिव की भक्ति का प्रमुख माह सावन है श्रावण जुलाई से प्रारंभ हो जाता है। यह काफी शुभ फलदायक है। पूरे माह भर भोलेनाथ की पूजा-अर्चना का दौर जारी रहता है। सभी शिव मंदिरों में श्रावण मास के अंतर्गत विशेष तैयारियां की जाती हैं। चारों ओर श्रद्धालुओं द्वारा ‘बम-बम भोले और ॐ नम: शिवाय’ की गूंज सुनाई देगी। सोमवार, सावन मास, वैधृति योग व आयुष्मान योग सभी के मालिक स्वत: शिव ही हैं। इस लिए इस बार का सावन खास है। पुराणों के अनुसार सावन में भोले शंकर की पूजा, अभिषेक, शिव स्तुति, मंत्र जाप का खास महत्व है। खासकर सोमवारी के दिन महादेव की आराधना से शिव और शक्ति दोनों प्रसन्न होते हैं।इनकी कृपा से दैविक, दैहिक और भौतिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। निर्धन को धन और नि:संतान को संतान की प्राप्ति होती है। कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर मिलता है। बाबा भोले की पूजा से भाग्य पलट सकता है। श्रावण का यह महीना भक्तों को अमोघ फल देने वाला है। माना जाता है कि भगवान शिव के त्रिशूल की एक नोक पर काशी विश्वनाथ की पूरी नगरी का भार है। उसमें श्रावण मास अपना विशेष महत्व रखता है। श्रावण मास शुरू होते ही कावड़ का मेला शुरू हो जाता है। श्रावण मास में जिस दिन भोलेनाथ पर जल चढ़ता है उस दिन का विशेष महत्व होता है। इस दौरान खास तौर पर महिलाएं श्रावण मास में विशेष पूजा-अर्चना और व्रत-उपवास रखकर पति की लंबी आयु की प्रार्थना भोलेनाथ से करती हैं। खास कर सभी व्रतों में सोलह सोमवार का व्रत श्रेष्ठ माना जाता है। इस व्रत को वैशाख, श्रावण मास, कार्तिक मास और माघ मास में किसी भी सोमवार से प्रारंभ किया जा सकता है। इस व्रत की समाप्ति पर सत्रहवें सोमवार को सोलह दंपति को भोजन व किसी वस्तु का दान उपहार देकर उद्यापन किया जाता है। पूजा में शिव परिवार को पंचामृत यानी दूध, दही, शहद, शक्कर, घी व जलधारा से स्नान कराकर, गंध, चंदन, फूल, रोली, वस्त्र अर्पित करें। शिव को सफेद फूल, बिल्वपत्र, सफेद वस्त्र और श्री गणेश को सिंदूर, दूर्वा, गुड़ व पीले वस्त्र चढ़ाएं। भांग-धतूरा भी शिव पूजा में चढ़ाएं। शिव को सफेद रंगे के पकवानों और गणेश को मोदक यानी लड्डूओं का भोग लगाएं। भगवान शिव व गणेश के जिन स्त्रोतों, मंत्र और स्तुति की जानकारी हो, उसका पाठ करें। श्री गणेश व शिव की आरती सुगंधित धूप, घी के पांच बत्तियों के दीप और कर्पूर से करें। अंत में गणेश और शिव से घर-परिवार की सुख-समृद्धि की कामनाएं करें।

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श्री हनुमान जंयती

 हनुमान जंयती हनुमान जयंती पूरे भारतवर्ष में हर साल बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। इस दिन को भक्तगण हनुमान जी के जन्म दिवस के रूप में मनाई जाती है। भारतीय हिन्दी कैलेंडर के अनुसार यह त्यौहार हर साल चैत्र (चैत्र पूर्णिमा) माह के शुक्ल पक्ष में 15वें दिन मनाया जाता है। श्री हनुमान जी, भगवान श्रीराम के बहुत बड़े भक्त थे ये हम सभी जानते है तो इस दिन हनुमान जी के साथ साथ प्रभु श्रीराम की भी पूजा करते है, पूरे भारत में हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा प्रभु श्री राम में अपनी गहरी आस्था के कारण पूजे जाते हैं। हनुमान जयंती हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा हिन्दूओं के एक महत्वपूर्ण त्यौहार के रुप में बड़े उत्साह और जोश के साथ मनाई जाती है। यह एक महान हिन्दू पर्व है, जो सांस्कृतिक और परंपरागत तरीके से मनाया जाता है। लोग हनुमान जी की पूजा आस्था, जादूई शक्तियों, ताकत और ऊर्जा के प्रतीक के रुप में करते हैं। लोग हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, क्योंकि यह बुरी शक्तियों का विनाश करने और मन को शान्ति प्रदान करने की क्षमता रखती है। इस दिन हनुमान भक्त सुबह जल्दी नहाने के बाद श्री हनुमान जी के मंदिर जाते हैं, और हनुमान जी की मूर्ति पर लाल सिंदूर का चोला चढ़ाते हैं, हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं, लड्डू का प्रसाद चढ़ाते हैं, और मंत्रों का जाप करते हुए आरती करते हैं, मंदिर की परिक्रमा आदि करके बहुत सारी रस्में करते हैं। जैसा कि सभी जानते हैं, कि हनुमान जी का जन्म वानर समुदाय में लाल-नारंगी शरीर के साथ हुआ था, इसी कारण सभी हनुमान मंदिरों में लाल-नारंगी रंग की हनुमान जी की मूर्ति होती है। पूजा के बाद लोग अपने मस्तिष्क पर लाल सिन्दूर का टीका प्रसाद के रुप में लगाते हैं और अपनी मनोकामना पूरी करने के लिये लड्डुओं का भोग लगा कर प्रसाद वितरण करते हैं। कब मनाई जाती है हनुमान जयंती :- महाराष्ट्र में हनुमान जयंती हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र महीने की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यद्दपि अन्य हिन्दू कैलेंडर के अनुसार यह अश्विन माह के अंधेरे पक्ष में 14वें दिन पड़ती है। पूजा के बाद पूरा आशीर्वाद पाने के लिए लोगों में प्रसाद बाँटा जाता है। उड़ीसा में हनुमान जयंती वैशाख (अप्रैल) महीने के पहले दिन मनाई जाती है। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में हनुमान जयंती वैशाख महीने के 10वें दिन मनाई जाती है, जो चैत्र पूर्णिमा से शुरु होती है और वैशाख महीने के 10वें दिन कृष्ण पक्ष पर खत्म होती है। तमिलानाडु और केरल में हनुमान जयंती मार्ग शीर्ष माह (दिसम्बर और जनवरी के बीच में) में इस विश्वास के साथ मनाई जाती है, कि भगवान हनुमान इस महीने की अमावश्या को पैदा हुए थे। हनुमान जयंती मनाने का महत्व : प्रभु हनुमान वानर समुदाय से थे, और हिन्दू धर्म के लोग हनुमान जी को एक दैवीय जीव के रुप में पूजते हैं। यह त्यौहार सभी के लिए बहुत अधिक महत्व रखता है, हालांकि ब्रह्मचारी, पहलवान और बलवान इस समारोह की ओर से विशेष रुप से प्रेरित होते हैं। हनुमान जी अपने भक्तों के बीच में बहुत से नामों से जाने जाते हैं; जैसे- बजरंगबली, पवनसुत, पवन कुमार, महावीर, बालीबिमा, मारुतिसुत, संकट मोचन, अंजनिपुत्र, मारुति, आदि। हनुमान जी के अवतार को महान शक्ति, आस्था, भक्ति, ताकत, ज्ञान, दैवीय शक्ति, बहादुरी, बुद्धिमत्ता, निःस्वार्थ सेवा-भावना आदि गुणों के साथ भगवान शिव का 11वाँ रुद्र अवतार माना जाता है। इन्होंने अपना पूरा जीवन भगवान श्री राम और माता सीता की भक्ति में लगा दिया और बिना किसी उद्देश्य के कभी भी अपनी शक्तियों का प्रदर्शन नहीं किया। हनुमान भक्त हनुमान जी की प्रार्थना उनके जैसा बल, बुद्धि, ज्ञान का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए करते हैं। इनके भक्तों के द्वारा इनकी पूजा बहुत से तरीकों से की जाती है। कुछ लोग अपने जीवन में शक्ति, प्रसिद्धी, सफलता आदि प्राप्त करने के लिए बहुत समय तक इनके नाम का जाप करने के द्वारा ध्यान करते हैं, वहीं कुछ लोग इस सब के लिए हनुमान चालीसा का जाप करते हैं। हनुमान जयंती कथा : एकबार एक महान संत अंगिरा स्वर्ग के स्वामी इन्द्र से मिलने के लिए स्वर्ग गए, और उनका स्वागत स्वर्ग की अप्सरा पुंजीक्ष्थला के नृत्य के साथ किया गया। हालांकि संत को इस तरह के नृत्य में कोई रुचि नहीं थी, उन्होंने उसी स्थान पर उसी समय अपने प्रभु का ध्यान करना शुरु कर दिया। नृत्य के अन्त में इन्द्र ने उनसे नृत्य के प्रदर्शन के बारे में पूछा। तो संत उस समय चुप थे, और उन्होंने कहा कि, मैं अपने प्रभु के गहरे ध्यान में था, क्योंकि मुझे इस तरह के नृत्य प्रदर्शन में कोई रुचि नहीं है। यह इन्द्र और अप्सरा के लिए बहुत अधिक लज्जा का विषय था, उसने संत को निराश करना शुरु कर दिया और तब अंगिरा ने उसे शाप दिया कि, ‘देखो! तुमने स्वर्ग से पृथ्वी को नीचा दिखाया है। तुम पर्वतीय क्षेत्र के जंगलों में मादा बंदर के रुप में पैदा हो।’ उसे फिर अपनी गलती का अहसास हुआ और संत से क्षमा याचना की। तब उस संत को उस पर थोड़ी सी दया आई और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया कि, ‘प्रभु का एक महान भक्त तुमसे पैदा होगा। वह सदैव परमात्मा की सेवा करेगा।’ इसके बाद वह कुंजार (पृथ्वी पर बन्दरों के राजा) की बंटी बनी और उनका विवाह सुमेरु पर्वत के राजा केसरी से हुआ। उन्होंने पाँच दिव्य तत्वों जैसे- ऋषि अंगिरा का शाप और आशीर्वाद, उसकी पूजा, भगवान शिव का आशीर्वाद, वायु देव का आशीर्वाद और पुत्रश्रेष्ठी यज्ञ से हनुमान को जन्म दिया। यह माना जाता है, कि भगवान शिव ने पृथ्वी पर मनुष्य के रुप पुनर्जन्म 11वें रुद्र अवतार के रुप में हनुमान बनकर जन्म लिया, क्योंकि वे अपने वास्तविक रुप में भगवान श्री राम की सेवा नहीं कर सकते थे। सभी वानर समुदाय सहित मनुष्यों को बहुत खुशी हुई और महान उत्साह और जोश के साथ नाच, गाकर और बहुत सी अन्य खुशियों वाली गतिविधियों के साथ उनका जन्मदिन मनाया। तभी से यह दिन उनके भक्तों के द्वारा उन्हीं की तरह ताकत और बुद्धिमत्ता प्राप्त करने के लिए हनुमान जयंती के रूप में मनाया जाता है। साधना हेतु मंत्र

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आज राम नवमी पर इस सरल विधि से करें हवन, प्रभु श्री राम के साथ मां सिद्धिदात्री भी होंगी प्रसन्न

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रामनवमी के दिन ही भगवान राम ने राजा दशरथ के घर जन्म लिया था. राम नवमी पर हवन करने का विधान है. माना जाता है कि कन्या पूजन के साथ राम नवमी पर हवन करने से प्रभु श्री राम के साथ साथ माँ सिद्धिदात्री भी अत्यंत प्रसन्न हो जाती हैं. हवन करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं व सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद प्राप्त होता है. ऐसे में चलिए जानते हैं हवन करनेका शुभ मुहूर्त और सरल हवन विधि हवन सामग्रीरामनवमी पर हवन सामग्री में नीम, पंचमेवा, जटा वाला नारियल, गोला, जौ, आम की लकड़ी, गूलर की छाल, चंदन की लकड़ी, अश्वगंधा, मुलेठी की जड़, कपूर, तिल, चावल, लौंग, गाय की घी, इलायची, शक्कर, नवग्रह की लकड़ी, आम के पत्ते, पीपल का तना, छाल, बेल, आदि को शामिल करना चाहिए. हवन विधि– राम नवमी के दिन व्रती को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर साफ- स्वच्छ वस्त्र पहनने चाहिए.– इसके बाद हवन के लिए साफ-सुथरे स्थान पर हवन कुंड का निर्माण कर करना चाहिए.– अब गंगाजल का छिड़काव कर सभी देवताओं का आवाहन करें.– अब हवन कुंड में आम की लकड़ी और कपूर से अग्नि प्रज्जवलित करें.– इसके बाद हवन कुंड में सभी देवी- देवताओं के नाम की आहुति डालें.– धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हवनकुंड में कम से कम 108 बार आहुति डालनी चाहिए. – हवन समाप्त होने के बाद भगवान राम और माता सीता की आरती उतारनी चाहिए. राम नवमी के दिन स्थापित करें घर में राम यंत्र, होंगे ये अचूक लाभ राम यंत्र बनाते समय करें ये काम   सबसे पहले पूर्व दिशा में श्री राम का स्मरण करते हुए अपनी आंखों को बंद करके, दोनों भौहों के बीच त्रिपुटी पर अपना ध्यान केंद्रित करें और ऊँ शब्द का सस्वर 6 बार उच्चारण करें. फिर, दाहिनी नाक से सांस खींचिए, रोकिए और श्री राम का स्मरण करके बाईं नाक से निकाल दीजिए. ऐसा 6 बार करना है. फिर ‘राम’ शब्द का सस्वर 108 बार उच्चारण करके अपनी आंखें खोलिए. इस तरह आपका यंत्र तैयार हो जागा.  राम यंत्र से मिलने वाले लाभ  बिजनेस में लाभ अगर आप बिजनेस में, घर में, स्पोर्ट्स में, राजनीति में, किसी मुकदमे में या जीवन के किसी दूसरे क्षेत्र में अपनी जीत सुनिश्चित करना चाहते हैं तो, आज राम यंत्र को अपने सामने रखकर आपको 108 बार ये मंत्र पढ़ना चाहिए. इसके लिए मंत्र – क्लीं रामाय नमः है.  आर्थिक स्थिति को करे मजबूतअगर आप अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं. इसके साथ ही अपनी इनकम में बढ़ोतरी करना चाहते हैं, तो आज आपको राम यंत्र सामने रखकर इस मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए. इसके लिए मंत्र – श्रीं रामाय (strong financial condition) नमः है. दाम्पत्य जीवन में खुशहालीअगर आप अपनी शादी-शुदा जिंदगी में खुशियां चाहते हैं. अपने सुख-सौभाग्य में बढ़ोतरी करना चाहते हैं, तो आज आपको राम यंत्र सामने रखकर इस मंत्र का 108 बार जप करें. इसके लिए मन्त्र ह्रीं रामाय नमः है.  विद्या के क्षेत्र में मिलेगा लाभ अगर आप विद्या के क्षेत्र में लाभ पाना चाहते हैं, तो आज राम यंत्र को अपने सामने रखकर 108 बार ये मंत्र पढ़ना चाहिए. इसके लिए मंत्र – ऐं रामाय नमः है. 

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राम नवमी के दिन पढ़ें ये व्रत कथा, भगवान राम की बरसेगी कृपा

हिंदुओं के लिए चैत्र का महीना बहुत ही शुभ और पवित्र होता है. इस महीने में मां दुर्गा के साथ-साथ भगवान श्री राम की भी पूजा-आराधना की जाती है. आपको बता दें, चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव यानी कि रामनवमी मनाया जाता है. इस दिन मां सिद्धिदात्री माता के साथ-साथ भगवान श्री राम की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है.  रामनवमी व्रत कथा पौराणिक कथा की मानें तो भगवान श्री राम, माता सीता और भगवान लक्ष्मण वनवास जा रहे थे. उस वक्त प्रभु श्रीराम विश्राम करने के लिए थोड़ी देर रुके. जहां भगवान विश्राम कर रहे थे वहीं पास में एक बुढ़िया रहती थी. भगवान श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता उस बुढ़िया के घर गए. उस वक्त बुढ़िया सूत काट रही थी. बुढ़िया ने श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता का आदर पूर्वक स्वागत किया और उन्हें स्नान ध्यान करवाकर भोजन करने के कहा. ये सुनकर श्रीराम ने उस बुढ़िया से कहा कि ‘माता’ मेरा हंस भी बहुत भूखा है, इसके लिए पहले मोती ला दो. फिर मैं बाद में भोजन करूंगा. ये सुनकर बुढ़िया बहुत परेशान हो गई. लेकिन, बुढ़िया अपने घर आए मेहमानों का निरादर नहीं करना चाहती थी. इसी वजह से वे दौड़ते-दौड़ते अपने नगर के राजा के पास गई और उससे उधार में मोती देने को कहा. बुढ़िया की हैसियत राजा को मोती लौट आने की नहीं थी लेकिन, फिर भी बुढ़िया पर तरस खाकर राजा ने उसे मोती दे दी. बुढ़िया दौड़ते हुए उस मोती को लाकर भगवान श्री राम के हंस को खिला दिया.  हंस को खाना खिलाने के बाद बुढ़िया ने भगवान श्रीराम को भी भोजन कराया. भोजन करने के बाद भगवान श्रीराम जाते समय बुढ़िया के आंगन में एक मूर्ति का पेड़ लगा गए. जब पेड़ बड़ा हो गया तो उसमें बहुत सारे मोती होने लगें. लेकिन, बुढ़िया को इस मोती के बारे में कुछ पता नहीं था. जब पेड़ से मोती गिरता था, तो उसकी पड़ोसी उसे उठाकर ले जाती थी.  एक दिन जब बुढ़िया उस पेड़ के नीचे बैठकर सूत काट रही थी. तो, पेड़ से एक मोती गिरा. बुढ़िया ने मोती के गिरते ही उसे उठा लिया और उसे राजा के पास ले गई. बुढ़िया के पास इतने सारे मोती देखकर राजा को बड़ी हैरानी हुई. राजा ने बुढ़िया से पूछा कि तुम्हारे पास इतने मोती कहां से आएं. तब बुढ़िया ने अपने राजा को बताया कि उसके आंगन में एक मोती का पेड़ हैं.  ये सुनकर राजा ने तुरंत उस पेड़ को अपने आंगन में लगवा लिया. लेकिन, भगवान श्री राम की कृपा से राजा के आंगन में लगा हुआ मोती का पेड़ में मोती के बजाय कांटे लगने लगें. एक दिन उसी पेड़ का एक कांटा रानी के पैर में चुभ गया. रानी के पैर में कांटा चुभने के बाद उन्हें बहुत पीड़ा हुई. वो चिल्लाते-चिल्लाते राजा के पास गई. ये देखकर राजा ने उस पेड़ को फिर से बुढ़िया के आंगन में लगवा दिया. प्रभु श्री राम की कृपा से पेड़ में फिर से मोती लगने लगें. अब जब पेड़ से मोती गिरता बुढ़िया उसे उठाकर प्रभु के प्रसाद के रूप में सभी को बांट देती थी. 

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नवरात्रि में मां दुर्गा को पसंद हैं ये 9 भोग, जानें किस दिन कौन-सा लगाएं भोग

चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन से नवरात्रि का पर्व शुरू होता है। यूं तो मां दुर्गा की पूजा से हमेशा लाभ होता है लेकिन नवरात्र के दौरान ग्रहों के योग संयोग कुछ ऐसे होते हैं जिनमें देवी की पूजा अधिक फलदायी होती है। क्योंकि नवरात्र के नौ दिनों में मां के नौ रूपों की आराधना की जाती है। वैसे तो माता को सच्चे मन से जो भी भोग लगाओ, वह ग्रहण कर लेती है लेकिन माता दुर्गा को नवरात्र को यह 9 भोग पसंद हैं। मान्यता है कि जगत जननी को इनका भोग लगाने से मनोकामना की पूर्ति होती है। साथ ही बुद्धि व धन-संपदा की भी वृद्धि होती है। आइए जानते हैं किस दिन माता को कौन सा भोग लगाएं माता का पहला स्वरूप नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप शैलपुत्री की पूजा की जाती है। इस दिन मां शैलपुत्री को गाय के घी भोग लगाने चाहिए। इससे आरोग्य लाभ की प्राप्ति होती है। माता का दूसरा स्वरूप नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के द्वितीय स्वरूप देवी ब्रह्मचारिणी की पूजा जाती है। इस दिन देवी ब्रह्मचारिणी को शक्कर का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से चिरायु का वरदान प्राप्त होता है। माता का तीसरा स्वरूप नवरात्र के तीसरे दिन मां दुर्गा के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। इस दिन मां चंद्रघंटा को दूध का भोग चढ़ाएं और उसे जरूरतमंद को दान कर देना चाहिए। ऐसा करने से धन-वैभव और ऐशवर्य की प्राप्ति होती है माता का चौथा स्वरूप नवरात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप कुष्मांडा की पूजा की जाती है। इस दिन माता को मालपुआ का नैवेध अर्पण करना चाहिए और उसे जरूरतमंद को दान कर देना चाहिए। ऐसा करने से मनोबल बढ़ता है। माता का पांचवा स्वरूप नवरात्र के पांचवे दिन मां दुर्गा के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा होती है। इस दिन मां भवानी को केले का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से बुद्धि का विकास होता है और करियर में ग्रोथ मिलती है। माता का छठवां स्वरूप नवरात्र के छठवें दिन मां दुर्गा के षष्टम स्वरूप मां कात्यानी की पूजा होती है। इस दिन मां कात्यानी को शहद का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से सौंदर्य की प्राप्ति होती है और घर से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है। माता का सातवां स्वरूप नवरात्र के सातवें दिन मां दुर्गा के सप्तम स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा होती है। इस दिन मां कालरात्रि को गुड़ से निर्मित भोग अर्पित करना चाहिए। ऐसा करने से रोग-शोक से मुक्ति मिलती है और परिवार भी स्वस्थ्य रहता है। माता का आठवां स्वरूप नवरात्र के आठवें दिन मां दुर्गा के अष्टम स्वरूप मां महागौरी की पूजा की जाती है। इस दिन देवी महागौरी को नारियल का भोग लगाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और माता का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। माता का नौंवा स्वरूप नवरात्र के नौवें दिन मां दुर्गा के नवम् स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस दिन मां भवानी को घर में बने हुए हलवा-पूड़ी और खीर का भोग लगाकर कंजक पूजा करें। ऐसा करने से मनुष्य के जीवन में सुख-शांति मिलती है।

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नवरात्र का आठवां दिन: जानें मां महागौरी की पूजा विधि, मंत्र, भोग और कथा

शारदीय नवरात्र अब अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुका है। आज मां दुर्गा के आठवें स्वरूप महागौरी की पूजा की जाती है। आठवें दिन महागौरी की पूजा देवी के मूल भाव को दर्शाता है। देवीभागवत पुराण के अनुसार, मां के नौ रूप और 10 महाविद्याएं सभी आदिशक्ति के अंश और स्वरूप हैं लेकिन भगवान शिव के साथ उनकी अर्धांगिनी के रूप में महागौरी सदैव विराजमान रहती हैं। इनकी शक्ति अमोघ और सद्यः फलदायिनी है। नवरात्र की अष्टमी तिथि को विशेष महत्व रखती है क्योंकि कई लोग इस दिन कन्या पूजन कर अपना व्रत खोलते हैं। आइए जानते हैं कि मां महागौरी के बारे में विशेष बाते इस तरह मां का नाम पड़ा महागौरी देवीभागवत पुराण के अनुसार, देवी पार्वती का जन्म राजा हिमालय के घर हुआ था। देवी पार्वती को मात्र 8 वर्ष की उम्र में अपने पूर्वजन्म की घटनाओं का आभास हो गया है और तब से ही उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए तपस्या शुरू कर दी थी। अपनी तपस्या के दौरान माता केवल कंदमूल फल और पत्तों का आहार करती थीं। बाद में माता ने केवल वायु पीकर तप करना आरंभ कर दिया। तपस्या से देवी पार्वती को महान गौरव प्राप्त हुआ था इसलिए उनका नाम महागौरी पड़ा। इस दिन दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित्र का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। कल्याणकारी हैं मां महागौरी माता की तपस्या की प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे गंगा स्नान करने के लिए कहा। जिस समय मां पार्वती स्नान करने गईं तब देवी का एक स्वरूप श्याम वर्ण के साथ प्रकट हुईं, जो कौशिकी कहलाईं और एक स्वरूप उज्जवल चंद्र के समान प्रकट हुआ, जो महागौरी कहलाईं। गौरी रूप में माता अपने हर भक्त का कल्याण करती हैं और उनको समस्याओं से मुक्त करती हैं। जो व्यक्ति किन्हीं कारणों से नौ दिन तक उपवास नहीं रख पाते हैं, उनके लिए नवरात्र में प्रतिपदा और अष्टमी तिथि को व्रत रखने का विधान है। इससे नौ दिन व्रत रखने के समान फल मिलता है। ऐसा है मां का स्वरूप देवीभागवत पुराण के अनुसार, महागौरी वर्ण पूर्ण रूप से गौर अर्थात सफेद हैं और इनके वस्त्र व आभूषण भी सफेद रंग के हैं। मां का वाहन वृषभ अर्थात बैल है। मां के दाहिना हाथ अभयमुद्रा में है और नीचे वाला हाथ में दुर्गा शक्ति का प्रतीक त्रिशुल है। महागौरी के बाएं हाथ के ऊपर वाले हाथ में शिव का प्रतीक डमरू है। डमरू धारण करने के कारण इन्हें शिवा भी कहा जाता है। मां के नीचे वाला हाथ अपने भक्तों को अभय देता हुआ वरमुद्रा में है। माता का यह रूप शांत मुद्रा में ही दृष्टिगत है। इनकी पूजा करने से सभी पापों का नष्ट होता है। भोग में मां को चढ़ाएं यह चीज देवीभागवत पुराण के अनुसार, नवरात्र की अष्टमी तिथि को मां को नारियल का भोग लगाने की पंरपरा है। भोग लगाने के बाद नारियल को या तो ब्राह्मण को दे दें अन्यथा प्रशाद रूप में वितरण कर दें। जो भक्त आज के दिन कन्या पूजन करते हैं, वह हलवा-पूड़ी, सब्जी और काले चने का प्रसाद विशेष रूप से बनाया जाता है। महागौरी को गायन और संगती अतिप्रिय है। भक्तों को पूजा करते समय गुलाबी रंग के वस्त्र पहनना चाहिए। गुलाबी रंग प्रेम का प्रतीक है। एक परिवार को प्रेम के धागों से ही गूथकर रखा जा सकता हैं, इसलिए नवरात्र की अष्टमी को गुलाबी रंग पहनना शुभ माना जाता है। मां का ध्यान मंत्र श्वेते वृषेसमारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः।महागौरी शुभं दद्यान्महादेव प्रमोददा॥ या देवी सर्वभू‍तेषु माँ महागौरी रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ पूजा करने से होती है सौभाग्य की प्राप्ति जो भक्त इस दिन कन्या पूजन करते हैं, वह माता को हलवा व चना के प्रसाद का भोग लगाना चाहिए। इस दिन कन्याओं को घर पर बुलाकर उनके पैरों को धुलाकर मंत्र द्वारा पंचोपचार पूजन करना चाहिए। रोली-तिलक लगाकर और कलावा बांधकर सभी कन्याओं को हलाव, पूरी, सब्जी और चने का प्रशाद परोसें। इसके बाद उनसे आशीर्वाद लें और समार्थ्यनुसार कोई भेंट व दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। ऐसा करने से भक्त की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मां का यह रूप मोक्षदायी है इसलिए इनकी आराधना करने से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

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वेदव्यास जी की जन्म कथा | पौराणिक कथाएं 

राजा उपरिचर एक महान प्रतापी राजा था| वह बड़ा धर्मात्मा और बड़ा सत्यव्रती था | उसने अपने तप से देवराज इंद्र को प्रसन्न करके एक विमान और न सूखने वाली सुंदर माला प्राप्त की थी | वह माला धारण करके, विमान पर बैठकर आकाश में परिभ्रमण किया करता था | उसे आखेट का बड़ा चाव था| वह प्राय: वनों में आखेट के लिए जाया करता था | उपरिचर की रानी का नाम गिरिका था | गिरिका भी बड़ी सुंदर और पवित्र हृदया थी | वह अपने पति को प्रेम तो करती ही थी, ईश्वर के प्रति भी बड़ी आस्थालु थी| निरंतर भजन और चिंतन में लगी रहती थी | एक बार गिरिका ऋतुमती हुई | तीन दिनों के पश्चात जब वह शुद्ध हुई, तो उपरिचर उसके साथ रमण करने से पूर्व ही वन में आखेट के लिए चला गया | राजा आखेट के लिए चला तो गया, किंतु उसका ध्यान रानी के साथ रमण करने की ओर ही लगा रहा | दोपहर का समय था| राजा वन में एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठा हुआ था| शीतल और सुगंधित हवा चल रही थी| मृदुल स्वरों में पक्षी गान कर रहे थे | राजा का ध्यान रानी की ओर चला गया | वह रमण के संबंध में मन ही मन सोचने लगा | राजा कामातुर हो उठा और उसका वीर्य स्खलित हो गया | राजा ने सोचा, उसका वीर्य व्यर्थ नहीं जा सकता अत: उसने अपने वीर्य को एक दोने में रखकर विमान में बैठे हुए बाज पक्षी को बुलाकर उससे कहा, “तुम इस दोने को ले जाकर मेरी रानी को दे दो| वह इसे अपने गर्भ में धारण कर लेगी। बाज दोने को मुख में दबाकर राजा के भवन की ओर उड़ चला| वह यमुना नदी के ऊपर से उड़ता हुआ चला जा रहा था| सहसा एक दूसरे बाज की दृष्टि उस पर पड़ी | इसने सोचा, यह अपने मुख में खाने की कोई वस्तु दबाए हुए है। अत: उसने उस बाज पर आक्रमण कर दिया | दोनों बाजों में घमासन युद्ध करने लगा | परिणाम यह हुआ कि पहले बाज के मुख से दोना छूटकर, यमुना के जल में गिर पड़ा | दोने में रखा वीर्य पानी में मिल गया| एक मछली की वीर्य पर दृष्टि पड़ी | उसने सोचा यह खाने की वस्तु है। अत: वह उसको पानी के साथ निगल गई। फलत: मछली गर्भवती हो गई। दासराज नामक मल्लाह को वह मछली शिकार में मिली | जब उसने मछली के पेट को बीचो बीच से काटा तो उसके पेट से एक बालक और एक बालिका निकली | दासराज ने दोनों को उपरिचर को भेंट कर दिया | उपरिचर ने बालक को तो अपने पास रख लिया, पर बालिका को दासराज को लौटा दिया। दासराज उस बालिका को अपने घर ले जाकर उसका पालन-पोषण करने लगा | दासराज ने बालिका का नाम सत्यवती रखा| वह मछली के पेट से उत्पन्न थी, इसलिए उसके शरीर से मछली की सी गंध निकला करती थी| अत: लोग उसे मत्स्यगंधा भी कहा करते थे मत्स्यगंधा धीरे-धीरे बड़ी हुई| वह बड़ी रूपवती थी | वह रात्रियों को अपनी नाव पर बैठाकर इस पार से उस पार पहुंचाया करती थी | एक दिन दोपहर के समय महर्षि पराशर वहां जा पहुंचे| वे मत्स्यगंधा को देखकर उस पर मुग्ध हो गए| उन्होंने उससे कहा, “सुंदरी, तुम्हें अपूर्व सुख मिलेगा | मैं तुम्हारे साथ रमण करना चाहता हूं।” मत्स्यगंधा ने उत्तर दिया, “महर्षे, आप यह कैसी बातें कर रहे हैं ? दोपहर का समय है। आसपास लोग बैठे हुए हैं, मैं आपके साथ रमण कैसे कर सकती हूं ?” पराशर जी ने योगशक्ति से चारों ओर कुहरा पैदा करदिया| और बोले, “अब हमें कोई नहीं देख सकेगा| तू निश्चिंत होकर मेरे प्रस्ताव को स्वीकार कर ले|” मत्स्यगंधा पुनः बोल उठी, “महर्षे, मैं कुमारी हूं| पिता की आज्ञा के अधीन हूं | आपके साथ रमण करने से मेरा कौमार्य नष्ट हो जाएगा | मैं समाज में लांछित बन जाऊंगी।” पराशर जी ने उत्तर दिया, “तुम चिंता मत करो | मुझसे रमण करने के पश्चात भी तुम्हारा कौमार्य बना रहेगा| गर्भवती होने पर भी गर्भ का चिह्न प्रकट नहीं होगा | ” मत्स्यगंधा फिर बोली, “एक बात और मेरे शरीर से मछली की सी गंध निकलती है| आप मुझे वरदान दें कि वह गंध के रूप में बदल जाए और चार कोस तक फैली रहे। ” पराशर जी ने तथास्तु कह दिया। फलतः मत्स्यगंधा के शरीर से कस्तूरी की सी गंध निकलने लगी| वह गंध चार कोस तक फैली रहती थी अत: अब वह योजनगंधा भी कही जाने लगी | पराशर जी ने मत्स्यगंधा के साथ रमण किया | उनके साथ रमण के फलस्वरूप वह गर्भवती हुई। समय पर यमुना के द्वीप में एक बालक ने उसके गर्भ से जन्म लिया| वह बालक जन्म लेते ही बड़ा हो गया, वह तप करने के लिए वन में चला गया। वही बालक जगत में वेदव्यास जी के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वेदव्यास जी का पूरा नाम कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास था| वे श्याम वर्ण के थे, इसलिए उनका नाम कृष्ण पड़ा| वे दो द्वीपों के बीच में पैदा हुए थे, इसलिए द्वैपायन कहे जाते थे। वेदों के पंडित होने से वेदव्यास कहे जाते थे| वेदव्यास जी अमर हैं, वे आज भी धरती पर विद्यमान हैं और किसी-किसी को दर्शन देकर कृतार्थ करते हैं।

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नवरात्रि के सातवें दिन होती है मां कालरात्रि की पूजा, नोट करें पूजा विधि, मंत्र और प्रसाद

नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा के सातवें स्‍वरूप कालरात्र‍ि की पूजा का विधान है. नवरात्रि में सप्तमी तिथि का विशेष महत्व बताया गया है. नवरात्रि के सातवें दिन मां दुर्गा के सातवें स्‍वरूप कालरात्र‍ि की पूजा का विधान है.. मां कालरात्रि ने असुरों का वध करने के लिए यह रूप लिया था. मान्यता है कि मां कालरात्रि की पूजा करने वाले भक्तों को भूत, प्रेत या बुरी शक्ति का भय नहीं सताता. मां कालरात्रि की नाक से आग की भयंकर लपटें निकलती हैं. मां कालरात्रि (Maa Kalratri) की सवारी गर्धव यानि गधा है. शक्ति का यह रूप शत्रु और दुष्‍टों का संहार करने वाला है. मान्‍यता है कि मां कालरात्रि ही वह देवी हैं, जिन्होंने मधु कैटभ जैसे असुर का वध किया था. माना जाता है कि महा सप्‍तमी के दिन पूरे विध‍ि-व‍िधान से मां कालरात्रि की पूजा करने पर मां अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं.  मां कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बनी चीजों का भोग लगाया जाता है. मां कालरात्रि पूजा विधि नवरात्रि के सातवें दिन स्नान आदि से निवृत हो जाएं और मां कालरात्रि की पूजा आरंभ करने से पहले कुमकुम, लाल पुष्प, रोली लगाएं. माला के रूप में मां को नींबुओं की माला पहनाएं और उनके आगे तेल का दीपक जलाएं. मां को लाल फूल अर्पित करें. मां कालरात्रि मंत्र या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थितानमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: गुड़ से बना मालपुआ नवरात्रि के सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है. सभी राक्षसों के लिए कालरूप बनकर आई मां दुर्गा कालरात्रि रूप में प्रकट हुई थीं. मान्यता है कि मां कालरात्रि अपने भक्तों को काल से बचाती हैं यानी मां के उपासक की अकाल मृत्यु नहीं होती है. और उन्हें भूत, प्रेत या बुरी शक्तियों का भय नहीं सताता. मां कालरात्रि को आप गुड़ से बने मालपुआ का भोग लगा सकते हैं

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नवरात्रि का छठा दिन है मां कात्यायनी को समर्पित, जानिए पूजा विधि, आरती, मंत्र और प्रिय भोग

इस दिन मां दुर्गा के छठें स्वरूप देवी कात्यायनी की पूजा करने का विधान है। कहा जाता है कि मां कात्यायनी की पूजा करने से भक्तों को आसानी से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। मां कात्यायनी का स्वरूप चमकीला और तेजमय है। इनकी चार भुजाएं हैं। दाईं तरफ का ऊपर वाला हाथ अभयमुद्रा में रहता है। वहीं नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में है। मां कात्यायनी के बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार धारण करती हैं व नीचे वाले हाथ में कमल का फूल सुशोभित रहता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो भी जातक देवी कात्यायनी की पूजा पूरी श्रद्धा से करता है, उसे परम पद की प्राप्ति होती है। यहां जानिए मां कात्यायनी की पूजा विधि, आरती, मंत्र और प्रिय भोग के बारे में मां कात्यायनी की पूजा विधिनवरात्रि के छठे दिन इस दिन प्रातः काल में स्नान आदि से निवृत्त होकर मां का गंगाजल से आचमन करें। फिर देवी कात्यायनी का ध्यान करते हुए उनके समक्ष धूप दीप प्रज्ज्वलित करें। रोली से मां का तिलक करें अक्षत अर्पित कर पूजन करें। इस दिन मां कात्यायानी को गुड़हल या लाल रंग का फूल चढ़ाना चाहिए। अंत में मां कात्यायनी की आरती करें और क्षमायाचना करें। मां कात्यायनी प्रिय भोगइस दिन मां कात्यायनी को पूजन में शहद का को भोग लगाना चाहिए। इससे मां प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करती हैं। मां कात्यायनीआराधना मंत्र1.या देवी सर्वभूतेषु माँ कात्यायनी रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। 2.चंद्र हासोज्जवलकरा शार्दूलवर वाहना|कात्यायनी शुभंदद्या देवी दानवघातिनि|| मां कात्यायनी की आरती जय-जय अम्बे जय कात्यायनीजय जगमाता जग की महारानीबैजनाथ स्थान तुम्हारावहा वरदाती नाम पुकाराकई नाम है कई धाम हैयह स्थान भी तो सुखधाम हैहर मंदिर में ज्योत तुम्हारीकही योगेश्वरी महिमा न्यारीहर जगह उत्सव होते रहतेहर मंदिर में भगत हैं कहतेकत्यानी रक्षक काया कीग्रंथि काटे मोह माया कीझूठे मोह से छुडाने वालीअपना नाम जपाने वालीबृहस्पतिवार को पूजा करिएध्यान कात्यायनी का धरिएहर संकट को दूर करेगीभंडारे भरपूर करेगीजो भी मां को ‘चमन’ पुकारेकात्यायनी सब कष्ट निवारे।।

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जानिए नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कन्दमाता की पूजा विधि और उपासना का फल

स्कंदमाता की पूजा में पीले फूल अर्पित करें और पीली चीजों का भोग लगाएं। संतान संबंधी कष्टों को दूर करने के लिए इस दिन बच्चों को फल-मिठाई बांटना भी बहुत अच्छा माना गया है। पौराणिक मान्यता है कि इनकी पूजा से भगवान कार्तिकेय की पूजा स्वयं ही हो जाती है एवं स्कंदमाता की आराधना से सूनी गोद भर जाती है। नवरात्र के पांचवें दिन भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाली मां दुर्गा के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा करने का विधान है। ये देवी पार्वती का ही स्वरूप है। नवरात्र के पांचवें दिन भक्तों को अभीष्ट फल प्रदान करने वाली मां दुर्गा के पंचम स्वरूप मां स्कंदमाता की पूजा करने का विधान है। ये देवी पार्वती का ही स्वरूप है। कौन हैं स्कंदमाता भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता होने के कारण देवी के इस पांचवें स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है । भगवान स्कंद ‘कुमार कार्तिकेय’नाम से भी जाने जाते हैं । ये प्रसिद्ध देवासुर संग्राम में देवताओं के सेनापति बने थे। पुराणों में इन्हें कुमार और शक्तिधर कहकर इनकी महिमा का वर्णन किया गया है ,इनका वाहन मयूर है। स्कंदमाता के विग्रह में भगवान स्कंदजी बालरूप में इनकी गोद में बैठे हुए हैं। दिव्य है इनका स्वरूपशास्त्रानुसार सिंह पर सवार स्कन्दमातृस्वरूपणी देवी की चार भुजाएं हैं,जिसमें देवी अपनी ऊपर वाली दांयी भुजा में बाल कार्तिकेय को गोद में उठाए उठाए हुए हैं और नीचे वाली दांयी भुजा में कमल पुष्प लिए हुए हैं ऊपर वाली बाईं भुजा से इन्होने जगत तारण वरद मुद्रा बना रखी है व नीचे वाली बाईं भुजा में कमल पुष्प है।इनका वर्णन पूर्णतः शुभ्र है और ये कमल के आसान पर विराजमान रहती हैं इसलिए इन्हें पद्मासन देवी भी कहा जाता है ।नवरात्र पूजन के पांचवे दिन का शास्त्रों में पुष्कल महत्व बताया गया है। पूजा विधिमां के श्रृंगार के लिए खूबसूरत रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। स्कंदमाता और भगवान कार्तिकेय की पूजा भक्ति-भाव और विनम्रता के साथ करनी चाहिए। पूजा में कुमकुम,अक्षत,पुष्प,फल आदि से पूजा करें। चंदन लगाएं ,माता के सामने घी का दीपक जलाएं। आज के दिन भगवती दुर्गा को केले का भोग लगाना चाहिए और यह प्रसाद ब्राह्मण को दे देना चाहिए ऐसा करने से मनुष्य की बुद्धि का विकास होता है। बच्चों को होगा फायदास्कंदमाता की पूजा में पीले फूल अर्पित करें और पीली चीजों का भोग लगाएं। संतान संबंधी कष्टों को दूर करने के लिए इस दिन बच्चों को फल-मिठाई बांटना भी बहुत अच्छा माना गया है। उपासना का फलपौराणिक मान्यता है कि इनकी पूजा से भगवान कार्तिकेय की पूजा स्वयं ही हो जाती है एवं स्कंदमाता की आराधना से सूनी गोद भर जाती है। इनकी साधना से साधकों को आरोग्य,बुद्धिमता तथा ज्ञान की प्राप्ति होती है। इनकी उपासना से समस्त इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं व भक्तों को परम शांति एवं सुख का अनुभव होने लगता है। सूर्यमण्डल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक आलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। संतान सुख एवं रोगमुक्ति के लिए स्कंदमाता की पूजा करनी चाहिए। इस मंत्र से करें आराधना 1.सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥ 2.या देवी सर्वभूतेषु माँ स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता।नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

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गोवर्धन पूजा व्रत कथा, पूजन विधि व महत्व

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। हिन्दू मान्यतानुसार महाभारत काल में इसी दिन भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत की पूजा की थी। तभी से यह परंपरा कायम है। यहां जानिए गोवर्धन पूजा की सरल विधि गोवर्धन पूजन विधि गोवर्धन पूजा का पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस दिन सुबह शरीर पर तेल की मालिश करके स्नान करना चाहिए। फिर घर के द्वार पर गोबर से प्रतीकात्मक गोवर्धन पर्वत बनाएं। इस पर्वत के बीच में पास में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति रख दें। अब गोवर्धन पर्वत व भगवान श्रीकृष्ण को विभिन्न प्रकार के पकवानों व मिष्ठानों का भोग लगाएं। साथ ही देवराज इंद्र, वरुण, अग्नि और राजा बलि की भी पूजा करें। पूजा के बाद कथा सुनें। प्रसाद के रूप में दही व चीनी का मिश्रण सब में बांट दें। इसके बाद किसी योग्य ब्राह्मण को भोजन करवाकर उसे दान-दक्षिणा देकर प्रसन्न करें। गोवर्धन पूजा व्रत कथा एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपने सखाओं, गोप-ग्वालों के साथ गाएं चराते हुए गोवर्धन पर्वत की तराई में जा पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि नाच-गाकर खुशियां मनाई जा रही हैं। जब श्रीकृष्ण ने इसका कारण पूछा तो गोपियों ने कहा- आज मेघ व देवों के स्वामी इंद्र का पूजन होगा। पूजन से प्रसन्न होकर वे वर्षा करते हैं, जिससे अन्न पैदा होता है तथा ब्रजवासियों का भरण-पोषण होता है। तब श्रीकृष्ण बोले- इंद्र में क्या शक्ति है? उससे अधिक शक्तिशाली तो हमारा गोवर्धन पर्वत है। इसी के कारण वर्षा होती है। हमें इंद्र से भी बलवान गोवर्धन की ही पूजा करना चाहिए। तब सभी श्रीकृष्ण की बात मानकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने लगे। यह बात जाकर नारद ने देवराज इंद्र को बता दी। यह सुनकर इंद्र को बहुत क्रोध आया। इंद्र ने मेघों को आज्ञा दी कि वे गोकुल में जाकर मूसलधार बारिश करें। बारिश से भयभीत होकर सभी गोप-ग्वाले श्रीकृष्ण की शरण में गए और रक्षा की प्रार्थना करने लगे। गोप-गोपियों की पुकार सुनकर श्रीकृष्ण बोले- तुम सब गोवर्धन-पर्वत की शरण में चलो। वह सब की रक्षा करेंगे। सब गोप-ग्वाले पशुधन सहित गोवर्धन की तराई में आ गए। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन को अपनी उंगली पर उठाकर छाते-सा तान दिया। गोप-ग्वाले सात दिन तक उसी की छाया में रहकर अतिवृष्टि से बच गए। सुदर्शन चक्र के प्रभाव से ब्रजवासियों पर एक जल की एक बूंद भी नहीं पड़ी। यह चमत्कार देखकर ब्रह्माजी द्वारा श्रीकृष्णावतार की बात जान कर इंद्रदेव अपनी मूर्खता पर पश्चाताप करते हुए कृष्ण से क्षमा याचना करने लगे। श्रीकृष्ण ने सातवें दिन गोवर्धन को नीचे रखा और ब्रजवासियों से कहा कि- अब तुम प्रतिवर्ष गोवर्धन पूजा कर अन्नकूट का पर्व मनाया करो। तभी से यह पर्व गोवर्धन पूजा के रूप में प्रचलित है। गोवर्धन पूजा का महत्व | Importance of Govardhan Puja |हमारे कृषि प्रधान देश में गोवर्धन पूजा जैसे प्रेरणाप्रद पर्व की अत्यंत आवश्यकता है। इसके पीछे एक महान संदेश पृथ्वी और गाय दोनों की उन्नति तथा विकास की ओर ध्यान देना और उनके संवर्धन के लिए सदा प्रयत्नशील होना छिपा है। अन्नकूट का महोत्सव भी गोवर्धन पूजा के दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को ही मनाया जाता है। यह ब्रजवासियों का मुख्य त्योहार है। अन्नकूट या गोवर्धन पूजा का पर्व यूं तो अति प्राचीनकाल से मनाया जाता रहा है, लेकिन आज जो विधान मौजूद है वह भगवान श्रीकृष्ण के इस धरा पर अवतरित होने के बाद द्वापर युग से आरंभ हुआ है। उस समय जहां वर्षा के देवता इंद्र की ही उस दिन पूजा की जाती थी, वहीं अब गोवर्धन पूजा भी प्रचलन में आ गई है। धर्मग्रंथों में इस दिन इंद्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं की पूजा करने का उल्लेख मिलता है।ये पूजन पशुधन व अन्न आदि के भंडार के लिए किया जाता है। बालखिल्य ऋषि का कहना है कि अन्नकूट और गोवर्धन उत्सव श्रीविष्णु भगवान की प्रसन्नता के लिए मनाना चाहिए। इन पर्वों से गायों का कल्याण होता है, पुत्र, पौत्रादि संततियां प्राप्त होती हैं, ऐश्वर्य और सुख प्राप्त होता है। कार्तिक के महीने में जो कुछ भी जप, होम, अर्चन किया जाता है, इन सबकी फल प्राप्ति हेतु गोवर्धन पूजन अवश्य करना चाहिए।

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