GANESH MANTRA

Ganesha Mantra

Lord Ganesha Mantra: भगवान गणेश की पूजा के समय करें इन मंत्रों का जप, कारोबार में लग जाएंगे चार चांद

Lord Ganesha Mantra: भगवान गणेश को विघ्नहर्ता भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो साधक भगवान गणेश की पूजा-पाठ करते हैं, उनके जीवन में हमेशा सुख-समृद्धि बनी रहती है। चतुर्थी तिथि पर भगवान गणेश की पूजा और व्रत करने से साधक के सभी दुख और संकट दूर हो जाते हैं। पूजा के लाभ: करियर और कारोबार में सफलता (Benefits of Puja: Success in Career and Business) Lord Ganesha Mantra: गणाधिप चतुर्थी का व्रत और पूजन विशेष रूप से करियर और कारोबार में सफलता दिलाता है। भगवान गणेश की पूजा करने से करियर और कारोबार को नया आयाम मिलता है। अगर आप भी भगवान गणेश की विशेष कृपा पाना चाहते हैं, तो इस शुभ अवसर पर पूजा के दौरान उनके शक्तिशाली और चमत्कारी मंत्रों का जप अवश्य करना चाहिए। Lord Ganesha Mantra: भगवान गणेश की पूजा के समय करें इन मंत्रों का जप.. कारोबार और कार्य सिद्धि के लिए शक्तिशाली गणेश मंत्र (Powerful Ganesha Mantras for Business and Task Completion) भगवान गणेश की कृपा प्राप्त करने के लिए पूजा के समय इन मंत्रों का जप करना अत्यंत फलदायी होता है: 1. वक्रतुण्ड महाकाय मंत्र (Vakratunda Mahakaya Mantra) यह मंत्र सभी कार्यों को निर्विघ्न पूरा करने के लिए जाना जाता है। ऊँ वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटि समप्रभ । निर्विघ्नं कुरू मे देव, सर्व कार्येषु सर्वदा ॥ 2. गणेश गायत्री मंत्र (Ganesha Gayatri Mantra) इस मंत्र का जाप मन को शांति प्रदान करता है: ऊँ एकदन्ताय विहे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥ 3. मनोकामना पूर्ति मंत्र (Wish Fulfillment Mantra) मनवांछित इच्छाओं की पूर्ति के लिए इस मंत्र का जप किया जा सकता है: “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं चिरचिर गणपतिवर वर देयं मम वाँछितार्थ कुरु कुरु स्वाहा ।” 4. सौभाग्य गणेश मंत्र (Saubhagya Ganesha Mantra) सौभाग्य और समृद्धि के लिए यह मंत्र अत्यंत प्रभावी है: ॐ श्रीं गं सौभाग्य गणपतये वर्वर्द सर्वजन्म में वषमान्य नम:।। या ॐ श्रीं गं सौभ्याय गणपतये वर वरद सर्वजनं में वशमानय स्वाहा। 5. विघ्ननाशक मंत्र (Obstacle Removing Mantra) यह मंत्र सभी प्रकार के विघ्नों का नाश करता है: ॐ नमो सिद्धि विनायकाय सर्व कार्य कर्त्रे सर्व विघ्न प्रशमनाय सर्व राज्य वश्यकरणाय सर्वजन सर्वस्त्री पुरुष आकर्षणाय श्रीं ॐ स्वाहा ॥ कर्ज से मुक्ति के लिए ऋणमुक्ति श्री गणेश स्तोत्र (Rinamukti Shri Ganesha Stotra for Debt Relief) यदि आप लंबे समय से कर्ज (ऋण) की समस्या से जूझ रहे हैं, तो Ganesha Mantra गणाधिप चतुर्थी पर ‘ऋणमुक्ति श्री गणेश स्तोत्र’ का पाठ करना बेहद शुभ माना गया है। स्तोत्र की कुछ पंक्तियाँ: ॐ स्मरामि देवदेवेशंवक्रतुण्डं महाबलम्। षडक्षरं कृपासिन्धुंनमामि ऋणमुक्तये॥ लाभ: ऐसी मान्यता है कि जो व्यक्ति इस ऋणहरं स्तोत्रं का त्रिसन्ध्यं (दिन में तीन बार) पाठ करता है, उसका छह माह के भीतर ऋणच्छेद (कर्ज से मुक्ति) हो जाता है। 10,000 बार इस स्तोत्र का पाठ करने से व्यक्ति ऋणमुक्त होकर धनी बन सकता है।

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ShrI siddhi vinAyaka nAmAvali: श्रीसिद्धिविनायकनामावली

ShrI siddhi vinAyaka nAmAvali: श्रीसिद्धिविनायकनामावली अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजितो यः सुरैरपि । सर्वविघ्नच्छिदे तस्मै गणाधिपतये नमः ॥ गणानामधिपश्चण्डो गजवक्त्रस्तिलोचनः । प्रीतो भवतु मे नित्यं वरदाता विनायकः ॥ गजाननं गणपतिं गुणानामालयं परम् । तं देवं गिरिजासूनुं वन्देऽहम् अमरार्चितम् ॥ गजवदनम् अचिन्त्यं तीक्ष्णदन्तं त्रिनेत्रम् बृहदुदरम् अशेषं पूतरूपं पुराणम् ।अमरवरसुपूज्यं रक्तवर्णं सुरेशम् पशुपतिसुतम् ईशं विघ्नराजं नमामि ॥ हरिहरविरिञ्चिवासवाद्यैः अपि कृतपूजमुपक्रमे क्रियायाःसकलदुरितहरम् अम्बिकायायाः प्रथमसुतं प्रणमामि विघ्नराजम् ॥ ध्यायेन्नित्यं गणेशं परमगुणयुतं ध्यानसंस्थं त्रिनेत्रम् एकं देवं त्वनेकं परमसुखयुतं देवदेवं प्रसन्नम् ।शुण्डादण्डाढ्यगण्डोद्गलितमदजलोल्लोलमत्तालिमालं श्रीमन्तं विघ्नराजं सकलसुखकरं श्रीगणेशं नमामि ॥ बीजापूरगदेक्षुकार्मुकरुजाचक्राब्जपाशोत्पल- व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशप्रोद्यत्कराम्भोरुहः ।ध्येयो वल्लभया सपद्मकरया श्लिष्टोज्वलद्भूषया विश्वोत्पत्तिविपत्तिसंस्थितिकरो विघ्नो विशिष्टार्त्थदः ॥ ॐ विनायकाय नमः ।ॐ विघ्नराजाय नमः ।ॐ गौरीपुत्राय नमः ।ॐ गणेश्वराय नमः ।ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः ।ॐ अव्ययाय नमः ।ॐ पूताय नमः ।ॐ दक्षाध्यक्ष्याय नमः ।ॐ द्विजप्रियाय नमः ।ॐ अग्निगर्भच्छिदे नमः । १०ॐ इन्द्रश्रीप्रदाय नमः ।ॐ वाणीबलप्रदाय नमः ।ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः ।ॐ शर्वतनयाय नमः ।ॐ गौरीतनूजाय नमः ।ॐ शर्वरीप्रियाय नमः ।ॐ सर्वात्मकाय नमः ।ॐ सृष्टिकर्त्रे नमः ।ॐ देवोऽनेकार्चिताय नमः ।ॐ शिवाय नमः । २०ॐ शुद्धाय नमः ।ॐ बुद्धिप्रियाय नमः ।ॐ शान्ताय नमः ।ॐ ब्रह्मचारिणे नमः ।ॐ गजाननाय नमः ।ॐ द्वैमातुराय नमः ।ॐ मुनिस्तुत्याय नमः ।ॐ भक्त विघ्न विनाशनाय नमः ।ॐ एकदन्ताय नमः ।ॐ चतुर्बाहवे नमः । ३०ॐ शक्तिसंयुताय नमः ।ॐ चतुराय नमः ।ॐ लम्बोदराय नमः ।ॐ शूर्पकर्णाय नमः ।ॐ हेरम्बाय नमः ।ॐ ब्रह्मवित्तमाय नमः ।ॐ कालाय नमः ।ॐ ग्रहपतये नमः ।ॐ कामिने नमः ।ॐ सोमसूर्याग्निलोचनाय नमः । ४०ॐ पाशाङ्कुशधराय नमः ।ॐ छन्दाय नमः ।ॐ गुणातीताय नमः ।ॐ निरञ्जनाय नमः ।ॐ अकल्मषाय नमः ।ॐ स्वयंसिद्धार्चितपदाय नमः ।ॐ बीजापूरकराय नमः ।ॐ अव्यक्ताय नमः ।ॐ गदिने नमः ।ॐ वरदाय नमः । ५०ॐ शाश्वताय नमः ।ॐ कृतिने नमः ।ॐ विद्वत्प्रियाय नमः ।ॐ वीतभयाय नमः ।ॐ चक्रिणे नमः ।ॐ इक्षुचापधृते नमः ।ॐ अब्जोत्पलकराय नमः ।ॐ श्रीधाय नमः ।ॐ श्रीहेतवे नमः ।ॐ स्तुतिहर्षताय नमः । ६०ॐ कलाद्भृते नमः ।ॐ जटिने नमः ।ॐ चन्द्रचूडाय नमः ।ॐ अमरेश्वराय नमः ।ॐ नागयज्ञोपवीतिने नमः ।ॐ श्रीकान्ताय नमः ।ॐ रामार्चितपदाय नमः ।ॐ वृतिने नमः ।ॐ स्थूलकान्ताय नमः ।ॐ त्रयीकर्त्रे नमः । ७०ॐ सङ्घोषप्रियाय नमः ।ॐ पुरुषोत्तमाय नमः ।ॐ स्थूलतुण्डाय नमः ।ॐ अग्रजन्याय नमः ।ॐ ग्रामण्ये नमः ।ॐ गणपाय नमः ।ॐ स्थिराय नमः ।ॐ वृद्धिदाय नमः ।ॐ सुभगाय नमः ।ॐ शूराय नमः । ८०ॐ वागीशाय नमः ।ॐ सिद्धिदाय नमः ।ॐ दूर्वाबिल्वप्रियाय नमः ।ॐ कान्ताय नमः ।ॐ पापहारिणे नमः ।ॐ कृतागमाय नमः ।ॐ समाहिताय नमः ।ॐ वक्रतुण्डाय नमः ।ॐ श्रीप्रदाय नमः ।ॐ सौम्याय नमः । ९०ॐ भक्ताकाङ्क्षितदाय नमः ।ॐ अच्युताय नमः ।ॐ केवलाय नमः ।ॐ सिद्धाय नमः ।ॐ सच्चिदानन्दविग्रहाय नमः ।ॐ ज्ञानिने नमः ।ॐ मायायुक्ताय नमः ।ॐ दन्ताय नमः ।ॐ ब्रह्मिष्ठाय नमः ।ॐ भयावर्चिताय नमः । १००ॐ प्रमत्तदैत्यभयदाय नमः ।ॐ व्यक्तमूर्तये नमः ।ॐ अमूर्तये नमः ।ॐ पार्वतीशङ्करोत्सङ्गखेलनोत्सवलालनाय नमः ।ॐ समस्तजगदाधाराय नमः ।ॐ वरमूषकवाहनाय नमः ।ॐ हृष्टस्तुताय नमः ।ॐ प्रसन्नात्मने नमः ।ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः । १०८ (१०९) ॥ इति श्रीसिद्धिविनायकाष्टोत्तरशतनामावलिः ॥

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ShrI SiddhivinAyaka stotram:श्रीसिद्धिविनायकस्तोत्रम्

shrI siddhivinAyaka stotram:श्रीसिद्धिविनायकस्तोत्रम् जयोऽस्तु ते गणपते देहि मे विपुलां मतिम् ।स्तवनम् ते सदा कर्तुं स्फूर्ति यच्छममानिशम् ॥ १॥ प्रभुं मंगलमूर्तिं त्वां चन्द्रेन्द्रावपि ध्यायतः ।यजतस्त्वां विष्णुशिवौ ध्यायतश्चाव्ययं सदा ॥ २॥ विनायकं च प्राहुस्त्वां गजास्यं शुभदायकम् ।त्वन्नाम्ना विलयं यान्ति दोषाः कलिमलान्तक ॥ ३॥ त्वत्पदाब्जाङ्कितश्चाहं नमामि चरणौ तव ।देवेशस्त्वं चैकदन्तो मद्विज्ञप्तिं श‍ृणु प्रभो ॥ ४॥ कुरु त्वं मयि वात्सल्यं रक्ष मां सकलानिव ।विघ्नेभ्यो रक्ष मां नित्यं कुरु मे चाखिलाः क्रियाः ॥ ५॥ गौरिसुतस्त्वं गणेशः शॄणु विज्ञापनं मम ।त्वत्पादयोरनन्यार्थी याचे सर्वार्थ रक्षणम् ॥ ६॥ त्वमेव माता च पिता देवस्त्वं च ममाव्ययः ।अनाथनाथस्त्वं देहि विभो मे वांछितं फलम् ॥ ७॥ लम्बोदरस्वम् गजास्यो विभुः सिद्धिविनायकः ।हेरम्बः शिवपुत्रस्त्वं विघ्नेशोऽनाथबांधवः ॥ ८॥ नागाननो भक्तपालो वरदस्त्वं दयां कुरु ।सिन्दूरवर्णः परशुहस्तस्त्वं विघ्ननाशकः ॥ ९॥ विश्वास्यं मङ्गलाधीशं विघ्नेशं परशूधरम् ।दुरितारिं दीनबन्धूं सर्वेशं त्वां जना जगुः ॥ १०॥ नमामि विघ्नहर्तारं वन्दे श्रीप्रमथाधिपम् ।नमामि एकदन्तं च दीनबन्धू नमाम्यहम् ॥ ११॥ नमनं शम्भुतनयं नमनं करुणालयम् ।नमस्तेऽस्तु गणेशाय स्वामिने च नमोऽस्तु ते ॥ १२॥ नमोऽस्तु देवराजाय वन्दे गौरीसुतं पुनः ।नमामि चरणौ भक्त्या भालचन्द्रगणेशयोः ॥ १३॥ नैवास्त्याशा च मच्चित्ते त्वद्भक्तेस्तवनस्यच ।भवेत्येव तु मच्चित्ते ह्याशा च तव दर्शने ॥ १४॥ अज्ञानश्चैव मूढोऽहं ध्यायामि चरणौ तव ।दर्शनं देहि मे शीघ्रं जगदीश कृपां कुरु ॥ १५॥ बालकश्चाहमल्पज्ञः सर्वेषामसि चेश्वरः ।पालकः सर्वभक्तानां भवसि त्वं गजानन ॥ १६॥ दरिद्रोऽहं भाग्यहीनः मच्चित्तं तेऽस्तु पादयोः ।शरण्यं मामनन्यं ते कृपालो देहि दर्शनम् ॥ १७॥ इदं गणपतेस्तोत्रं यः पठेत्सुसमाहितः ।गणेशकृपया ज्ञानसिध्धिं स लभते धनम् ॥ १८॥ पठेद्यः सिद्धिदं स्तोत्रं देवं सम्पूज्य भक्तिमान् ।कदापि बाध्यते भूतप्रेतादीनां न पीडया ॥ १९॥ पठित्वा स्तौति यः स्तोत्रमिदं सिद्धिविनायकम् ।षण्मासैः सिद्धिमाप्नोति न भवेदनृतं वचःगणेशचरणौ नत्वा ब्रूते भक्तो दिवाकरः ॥ २०॥ इति श्री सिद्धिविनायक स्तोत्रम् ।

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Lord Ganesha Mantra: गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए करें इन शक्तिशाली मंत्रों का जाप…

Lord Ganesha Mantra in Hindi: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो साधक भगवान गणेश की पूजा-पाठ करते हैं उसके जीवन में हमेशा सुख-समृद्धि बना रहता है। ऐसे में यदि आप रोजाना इन गणेश मंत्रों का जाप करेंगे तो इससे आपको जीवन में विशेष लाभ देखने को मिल सकता है। Lord Ganesha Mantra in Hindi: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गणेश जी की उपासना करने से साधक के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। वहीं,हिंदू धर्म में बुधवार का दिन भगवान गणेश की आराधना के लिए समर्पित माना गया है। सनातन धर्म में भगवान गणेश के कई ऐसे मंत्र हैं जो व्यक्ति को कई तरह के लाभ पहुंचा सकते हैं। ऐसे में आइए यहां जानते हैं कि रोजाना किन मंत्रों के जाप से गणेश जी की कृपा प्राप्त की जा सकती है। भगवान गणेश के शक्तिशाली मंत्र (Lord Ganesha Mantra in Hindi) ॐ गं गणपतये नम:। वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धितायं।नागाननाथ श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥ एकदन्ताय शुद्घाय सुमुखाय नमो नमः ।प्रपन्न जनपालाय प्रणतार्ति विनाशिने ॥ ॐ एकदन्ताय विद्धमहे, वक्रतुण्डाय धीमहि,तन्नो दन्ति प्रचोदयात्॥ ॐ नमो सिद्धि विनायकाय सर्व कार्य कर्त्रे सर्व विघ्न प्रशमनायसर्व राज्य वश्यकरणाय सर्वजन सर्वस्त्री पुरुष आकर्षणाय श्रीं ॐ स्वाहा ॥ महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।। ॐ ग्लौम गौरी पुत्र, वक्रतुंड, गणपति गुरु गणेश।ग्लौम गणपति, ऋद्धि पति, सिद्धि पति. करो दूर क्लेश ।। गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥ ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मे वशमानय स्वाहा॥ एकदन्ताय विद्महे । वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॐ लम्बोदराय नमः

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Brahmakrita Ganapativandana:ब्रह्माकृता गणपतिवन्दना

Brahmakrita Ganapativandana:ब्रह्माकृता गणपतिवन्दना (शिवरहस्यान्तर्गते ईशाख्ये) ब्रह्मोवाच । देवीसुतं करधृताङ्कुशपाशदीप्तं विघ्नाद्रिनाशकवरोदरनागबन्धम् । शुण्डाधृतोरुवरमोदकविघ्नसङ्घ- सन्नोदकं प्रणमताद्य गणाधिनाथम् ॥ २५॥ जगत्त्रयेऽपि सर्वत्र त्वं हि विश्वगणेश्वरः । सम्पूज्यः सर्वकार्येषु निर्विघ्नार्थं गजानन ॥ २६॥ त्वामादौ सर्वकार्येषु पूजयन्तु सुरासुराः । अनभ्यर्चयतां विघ्नं भवत्येव पदे पदे ॥ २७॥ ॥ इति शिवरहस्यान्तर्गते ब्रह्माकृता गणपतिवन्दना सम्पूर्णा ॥ – ॥ श्रीशिवरहस्यम् । ईशाख्यः द्वादशमांशः । अध्यायः १६ विधिसंविधानम् । २५-२७ ॥

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Shri Mahaganapati Vajrapa njara Kavacham: श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचम्

Shri Mahaganapati Vajrapa njara Kavacham: श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचम् ॥ पूर्वपीठिका ॥ महादेवि गणेशस्य वरदस्य महात्मनः ।कवचं ते प्रवक्ष्यामि वज्रपञ्जरकाभिधम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ ॐ अस्य श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचस्य श्रीभैरव ऋषिः,गायत्रं छन्दः, श्रीमहागणपति देवता, गं बीजं, ह्रीं शक्तिः,कुरु कुरु कीलकं, वज्रविद्यादिसिद्ध्यर्थेमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचपाठे विनियोगः ॥ ॥ ऋष्यादिन्यासः ॥ श्रीभैरवर्षये नमः शिरसि । गायत्रछन्दसे नमो मुखे ।श्रीमहागणपतिदेवतायै नमो हृदि । गं बीजाय नमो गुह्ये ।ह्रींशक्तये नमो नाभौ । कुरु कुरु कीलकाय नमः पादयोः ।वज्रविद्यादिसिद्ध्यर्थे महागणपतिवज्रपञ्जरकवचपाठेविनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ॥ करन्यासः ॥ गां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । गीं तर्जनीभ्यां नमः ।गूं मध्यमाभ्यां नमः । गैं अनामिकाभ्यां नमः ।गौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । गः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ ॥ अङ्गन्यासः ॥ गां हृदयाय नमः । गीं शिरसे स्वाहा । गूं शिखायै वषट् ।गैं कवचाय हुम् । गौं नेत्रत्रयाय वौषट् । गः अस्त्राय फट् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ विघ्नेशं विश्ववन्द्यं सुविपुलयशसं लोकरक्षाप्रदक्षंसाक्षात्सर्वापदासु प्रशमनसुमतिं पार्वतीप्राणसूनुम् ।प्रायः सर्वासुरेन्द्रैः ससुरमुनिगणैः साधकैः पूज्यमानंकारुण्येनान्तरायामितभयशमनं विघ्नराजं नमामि ॥ ॥ कवचपाठः ॥ ॐ श्रीं ह्रीं गं शिरः पातु महागणपतिः प्रभुः ।विनायको ललाटं मे विघ्नराजो भ्रुवौ मम ॥ १॥ पातु नेत्रे गणाध्यक्षो नासिकां मे गजाननः ।श्रुती मेऽवतु हेरम्बो गण्डौ मे मोदकाशनः ॥ २॥ द्वैमातुरो मुखं पातु चाधरौ पात्वरिन्दमः ।दन्तान्ममैकदन्तोऽव्याद्वक्रतुण्डोऽवताद्रसाम् ॥ ३॥ गाङ्गेयो मे गलं पातु स्कन्धौ सिंहासनोऽवतु ।विघ्नान्तको भुजौ पातु हस्तौ मूषकवाहनः ॥ ४॥ ऊरू ममावतान्नित्यं देवस्त्रिपुरघातनः ।हृदयं मे कुमारोऽव्याज्जयन्तः पार्श्वयुग्मकम् ॥ ५॥ प्रद्युम्नो मेऽवतात्पृष्ठं नाभिं शङ्करनन्दनः ।कटिं नन्दिगणः पातु शिश्नं विश्वेश्वरोऽवतु ॥ ६॥ मेढ्रे मेऽवतु सौभाग्यो भृङ्गिरीटी च गुह्यकम् ।विराटकोऽवतादूरू जानू मे पुष्पदन्तकः ॥ ७॥ जङ्घे मम विकर्तोऽव्याद्गुल्फावन्त्यगणोऽवतु ।पादौ चित्तगणः पातु पादाधो लोहितोऽवतु ॥ ८॥ पादपृष्ठं सुन्दरोऽव्यान्नूपुराढ्यो वपुर्मम ।विचारो जठरं पातु भूतानि चोग्ररूपकः ॥ ९॥ शिरसः पादपर्यन्तं वपुः सप्तगणोऽवतु ।पादादिमूर्धपर्यन्तं वपुः पातु विनर्तकः ॥ १०॥ विस्मारितं तु यत्स्थानं गणेशस्तत्सदाऽवतु ।पूर्वे मां ह्रीं करालोऽव्यादाग्नेये विकरालकः ॥ ११॥ दक्षिणे पातु संहारो नैरृते रुरुभैरवः ।पश्चिमे मां महाकालो वायौ कालाग्निभैरवः ॥ १२॥ उत्तरे मां सितास्योऽव्यादैशान्यामसितात्मकः ।प्रभाते शतपत्रोऽव्यात्सहस्रारस्तु मध्यमे ॥ १३॥ दन्तमाला दिनान्तेऽव्यान्निशि पात्रं सदाऽवतु ।कलशो मां निशीथेऽव्यान्निशान्ते परशुस्तथा ।सर्वत्र सर्वदा पातु शङ्खयुग्मं च मद्वपुः ॥ १४॥ ॐ ॐ राजकुले हौं हौं रणभये ह्रीं ह्रीं कुद्यूतेऽवतात्श्रीं श्रीं शत्रुगृहे शौं शौं जलभये क्लीं क्लीं वनान्तेऽवतु ।ग्लौं ग्लूं ग्लैं ग्लं गुं सत्त्वभीतिषु महाव्याध्यार्तिषु ग्लौं गं गौंनित्यं यक्षपिशाचभूतफणिषु ग्लौं गं गणेशोऽवतु ॥ १५॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ इतीदं कवचं गुह्यं सर्वतन्त्रेषु गोपितम् ।वज्रपञ्जरनामानं गणेशस्य महात्मनः ॥ १॥ अङ्गभूतं मनुमयं सर्वाचारैकसाधनम् ।विनानेन न सिद्धिः स्यात्पूजनस्य जपस्य च ॥ २॥ तस्मात्तु कवचं पुण्यं पठेद्वा धारयेत्सदा ।तस्य सिद्धिर्महादेवि करस्था पारलौकिकी ॥ ३॥ यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोति पाठतः ।अर्धरात्रे पठेन्नित्यं सर्वाभीष्टफलं लभेत् ॥ ४॥ इति गुह्यं सुकवचं महागणपतेः प्रियम् ।सर्वसिद्धिमयं दिव्यं गोपयेत्परमेश्वरि ॥ ॥ श्रीरुद्रयामले तन्त्रे श्रीमहागणपतिवज्रपञ्जरकवचं सम्पूर्णम् ॥

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Shri Gajanana Stuti Dandakaranyamkrita:दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः

Shri Gajanana Stuti Dandakaranyamkrita:दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥दण्डकारण्यमुवाच ।नमस्ते गजवक्त्राय गणेशाय महोदर ।ब्रह्मणे ब्रह्मपालाय विघ्नेशाय नमो नमः ॥ ३८॥हेरम्बाय चतुर्बाहुधराय कञ्जपाणये ।पाशाङ्कुशधरायैव परेशाय नमो नमः ॥ ३९॥अनादये च सर्वेषामादिरूपाय ते नमः ।ज्येष्ठानां ज्येष्ठरूपाय ज्येष्ठाय वै नमो नमः ॥ ४०॥स्वानन्दवासिने तुभ्यं सिद्धिबुद्धिवराय च ।सिद्धिबुद्धिप्रदात्रे ते मूषकध्वजिने नमः ॥ ४१॥मूषकोपरिसंस्थाय गणेशाय परात्मने ।नानामायाप्रचालाय मयूरेशाय ते नमः ॥ ४२॥नायकानां विशेषेण नायकाय विनायक ।नायकैर्वर्जितायैव नायकत्वप्रदायिने ॥ ४३॥विघ्नेशाय महाविघ्नधारिणे सर्वदायिने ।पददात्रे तथा हन्त्रे विघ्नेशैस्ते नमो नमः ॥ ४४॥अमेयशक्तये तुभ्यं सर्वपूज्याय ते नमः ।किं स्तौमि त्वां गणाधीश योगाकारस्वरूपिणम् ॥ ४५॥अधुना वरदोऽसि त्वं तदा मे नाम सार्थकम् ।कुरु नित्यं वस स्वामिन् मम देहे गजानन ॥ ४६॥भक्तिं देहि त्वदीयां मे सदा ब्रह्मप्रकाशिनीम् ।तेनाऽहं कृतकृत्यश्च भविष्यामि गजानन ॥ ४७॥एवमुक्त्वा गणेशानं प्रणनाम कृताञ्जलिः ।भक्तिभावसमायुक्तं तञ्जगाद गजाननः ॥ ४८॥(फलश्रुतिः)श्रीगजानन उवाच ।त्वया कृतमिदं स्तोत्रं मदीयं सर्वसिद्धिदम् ।भविष्यति महारण्य भुक्तिमुक्तिप्रदं परम् ॥ ४९॥त्वयोक्तं सफलं सर्वं भविष्यति सदा प्रियम् ।मामेव सर्वभावेन भजिष्यसि न संशयः ॥ ५०॥नानावतारवांश्चैव त्वद्देहस्थोऽहमञ्जसा ।भविष्यामि गणेशोक्त्वांऽतर्दधे देवसत्तमाः ॥ ५१॥अतो गणेशक्षेत्रं तु दण्डकारण्यमुत्तमम् ।सकलं तत्र सेवार्थं देवास्तस्य समाययुः ॥ ५२॥तेषां क्षेत्राणि देवेशा दण्डकारण्यगानि तु ।तेषु स्थिता विशेषेण भजन्ते गणनायकम् ॥ ५३॥सर्वेष्वरण्यदेशेषु गणेशः प्रतितिष्ठति ।दण्डकारण्यमध्ये स विशेषेणावतारकृत् ॥ ५४॥दण्डकारण्यकं सर्वं गणेशक्षेत्रमुच्यते ।मयूरक्षेत्रं तन्मध्ये भिन्नं स्वानन्दवाचकम् ॥ ५५॥ इति दण्डकारण्यम्कृता श्रीगजाननस्तुतिः सम्पूर्णा ॥एकादशस्तोत्रं– ॥ मुद्गलपुराणं षष्टः खण्डः । अध्यायः १३ । ६.१३ ३८-५५॥

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Shri Gajananastotram: श्रीगजाननस्तोत्रम्

Shri Gajananastotram: श्रीगजाननस्तोत्रम् श्रीगणेशाय नमः । जय देव गजानन प्रभो जय सर्वासुरगर्वभेदक ।जय सङ्कटपाशमोचन प्रणवाकार विनायकाऽव माम् ॥ १॥ तव देव जयन्ति मूर्तयः कलितागण्यसुपुण्यकीर्तयः ।मनसा भजतां हतार्तयः कृतशीघ्राधिककामपूर्तयः ॥ २॥ तव रम्यकथास्वनादरः स नरो जन्मलयैकमन्दिरम् ।न परत्र न चेह सौख्यभाङ् निजदुष्कर्मवशाद्विमोहभाक् ॥ ३॥ गजवक्त्र तवाङ्घ्रिपङ्कजे ध्वजवज्राङ्कयुते सदा भजे ।तव मूर्तिमहं परिष्वजे त्वयि हृन्मेऽस्तु सुमूषकध्वजे ॥ ४॥ त्वदृते हि गजानन प्रभो न हि भक्तौघसुखौघदायकः ।सुदृढा मम भक्तिरस्तु ते चरणाब्जे विबुधेश विश्वपाः ॥ ५॥ फलपूरगदेक्षुकार्मुकैर्युत रुक्चक्रधराब्जपाशधृक् ।अव वारिजशालिमञ्जरीरदधृग्रत्नघटाढ्यशुण्ड माम् ॥ ६॥ करयुग्मसुहेमश‍ृङ्खल द्विजराजाढ्यक तुन्दिलोदर ।शशिसुप्रभ विद्यया युत स्तनभारानमितेड्य रक्ष माम् ॥ ७॥ शशिभास्करवीतिहोत्रदृक् शुभसिन्दूररुचे विनायक ।द्विपवक्त्र महाहिभूषण त्रिदिवेशासुरवन्द्य पाहि माम् ॥ ८॥ सृणिपाशवरद्विजैर्युत द्विजराजार्धक मूषकध्वज ।शुभलोहितचन्दनोक्षित श्रुतिवेद्याभयदायकाऽव माम् ॥ ९॥ स्मरणात्तव शम्भुविध्यजेन्द्विनशक्रादिसुराः कृतार्थताम् ।गणपाऽऽपुरघौघभञ्जन द्विपराजास्य सदैव पाहि माम् ॥ १०॥ शरणं भगवान्विनायकः शरणं मे सततं च सिद्धिका ।शरणं पुनरेव तावुभौ शरणं नान्यदुपैमि दैवतम् ॥ ११॥ गलद्दानगण्डं महाहस्तितुण्डं सुपर्वप्रचण्डं धृतार्धेन्दुखण्डम् ।करास्फोटिताण्डं महाहस्तदण्डं हृताढ्यारिमुण्डं भजे वक्रतुण्डम् ॥ १२॥ गणनाथ निबन्धसंस्तवं कृपयाङ्गीकुरु मत्कृतं ह्यमुम् ।इदमेव सदा प्रदीयतां करुणा मय्यतुलाऽस्तु सर्वदा ॥ १३॥ इति गजाननस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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Shri Kalpakaganeshapancharatna Stava: श्रीकल्पकगणेशपञ्चरत्नस्तवः

Shri Kalpakaganeshapancharatna Stava: श्रीकल्पकगणेशपञ्चरत्नस्तवः श्रीमदुमापतिशिवप्रणीतःश्रीमत्तिल्ववने सभेशसदन-प्रत्यक्ककुब्गोपुरा-धोभागस्थित चारुसद्मवसतिर्भक्तेष्टकल्पद्रुमः ।नृत्तानन्दमदोत्कटो गणपतिः संरक्षताद्वोऽनिशंदूर्वासः प्रमुखाखिलर्षि विनुतः सर्वेश्वरोऽग्र्योऽव्ययः ॥ १॥ श्रीमत्तिल्लवनाभिधं पुरवरं क्षुल्लावुकं प्राणिनांइत्याहुर्मुनयः किलेति नितरां ज्ञातुं च तत्सत्यताम् ।आयान्तं निशि मस्करीन्द्रमपि यो दूर्वाससं प्रीणयन्नृत्तं दर्शयति स्म नो गणपतिः कल्पद्रुकल्पोऽवतात् ॥ २॥ देवान् नृत्तदिदृक्षया पशुपतेरभ्यागतान् कामिनःशक्रादीन् स्वयमुद्धृतं निजपदं वामेतरं दर्शयन् ।दत्वा तत्तदभीष्टवर्गमनिशं स्वर्गादिलोकान्विभुःनिन्ये यः शिवकामिनाथतनयः कुर्याच्छिवं वोऽन्वहम् ॥ ३॥ अस्माकं पुरतश्चकास्तु भगवान् श्रीकल्पकाख्योऽग्रणीःगोविन्दादि सुरार्चितोऽमृतरसप्राप्त्यै गजेन्द्राननः ।वाचं यच्छतु निश्चलां श्रियमपि स्वात्मावबोधं परंदारान् पुत्रवरांश्च सर्वविभवं कात्यायनीशात्मजः ॥ ४॥ वन्दे कल्पक कुञ्जरेन्द्रवदनं वेदोक्तिभिस्तिल्वभू-देवैः पूजितपादपद्मयुगलं पाशच्छिदं प्राणिनाम् ।दन्तादीनपि षड्भुजेषु दधतं वाञ्छाप्रदत्वाप्तयेस्वाभ्यर्णाश्रयिकामधेनुमनिशं श्रीमुख्यसर्वार्थदम् ॥ ५॥ औमापत्यमिमं स्तवं प्रतिदिनं प्रातर्निशं यः पठेत्श्रीमत्कल्पककुञ्जरानन-कृपापाङ्गाव लोकान्नरः ।यं यं कामयते च तं तमखिलं प्राप्नोति निर्विघ्नतःकैवल्यं च तथाऽन्तिमे वयसि तत्सर्वार्थसिद्धिप्रदम् ॥ ६॥ इति श्रीमदुमापतिशिवप्रणीतः श्रीकल्पकगणेशपञ्चरत्नस्तवः सम्पूर्णः ।

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Ekakshara Ganapati Kavacham: एकाक्षरगणपतिकवचम्

Ekakshara Ganapati Kavacham: एकाक्षरगणपतिकवचम् त्रैलोक्यमोहनकवचम् ।एकार्णकवचम् । श्रीगणेशाय नमः ।नमस्तस्मै गणेशाय सर्वविघ्नविनाशिने ।कार्यारम्भेषु सर्वेषु पूजितो यः सुरैरपि ॥ १॥ पार्वत्युवाच ।भगवन् देवदेवेश लोकानुग्रहकारकः ।इदानी श्रोतृमिच्छामि कवचं यत्प्रकाशितम् ॥ २॥ एकाक्षरस्य मन्त्रस्य त्वया प्रीतेन चेतसा ।वदैतद्विधिवद्देव यदि ते वल्लभास्म्यहम् ॥ ३॥ ईश्वर उवाच ।श‍ृणु देवि प्रवक्ष्यामि नाख्येयमपि ते ध्रुवम् ।एकाक्षरस्य मन्त्रस्य कवचं सर्वकामदम् ॥ ४॥ (एकार्णगणनाथस्य कवचं) यस्य स्मरणमात्रेण न विघ्नाः प्रभवन्ति हि । (प्रभवन्ति च निर्विघ्नास्स्मरणेनान्यमानवाः)त्रिकालमेककालं वा ये पठन्ति सदा नराः ॥ ५॥ तेषां क्वापि भयं नास्ति सङ्ग्रामे सङ्कटे गिरौ ।भूतवेतालरक्षोभिर्ग्रहैश्चापि न बाध्यते ॥ ६॥ इदं कवचमज्ञात्वा यो जपेद् गणनायकम् ।न च सिद्धिमाप्नोति मूढो वर्षशतैरपि ॥ ७॥ अघोरो मे यथा मन्त्रो मन्त्राणामुत्तमोत्तमः ।तथेदं कवचं देवि दुर्लभं भुवि मानवैः ॥ ८॥ गोपनीयं प्रयत्नेन नाज्येयं यस्य कस्यचित् ।तव प्रीत्या महेशानि कवचं कथ्यतेऽद्भुतम् ॥ ९॥ एकाक्षरस्य मन्त्रस्य गणकश्चर्षिरीरितः ।त्रिष्टुप्छन्दस्तु विघ्नेशो देवता परिकीर्तिता ॥ १०॥ गँ बीजं शक्तिरोङ्कारः सर्वकामार्थसिद्धये ।सर्वविघ्नविनाशाय विनियोगस्तु कीर्तितः ॥ ११॥ ध्यानम् ।रक्ताम्भोजस्वरूपं लसदरुणसरोजाधिरूढं त्रिनेत्रं पाशंचैवाङ्कुशं वा वरदमभयदं बाहुभिर्धारयन्तम् ।शक्त्या युक्तं गजास्यं पृथुतरजठरं नागयज्ञोपवीतं देवंचन्द्रार्धचूडं सकलभयहरं विघ्नराजं नमामि ॥ १२॥ अथ कवचम् ।गणेशो मे शिरः पातु भालं पातु गजाननः ।नेत्रे गणपतिः पातु गजकर्णः श्रुती मम ॥ १३॥ कपोलौ गणनाथस्तु घ्राणं गन्धर्वपूजितः ।मुखं मे सुमुखः पातु चिबुकं गिरिजासुतः ॥ १४॥ जिह्वां पातु गणक्रीडो दन्तान् रक्षतु दुर्मुखः ।वाचं विनायकः पातु कष्टं पातु महोत्कटः ॥ १५॥ स्कन्धौ पातु गजस्कन्धो बाहू मे विघ्ननाशनः ।हस्तौ रक्षतु हेरम्बो वक्षः पातु महाबलः ॥ १६॥ हृदयं मे गणपतिरुदरं मे महोदरः ।नाभि गम्भीरहृदयः पृष्ठं पातु सुरप्रियः ॥ १७॥ कटिं मे विकटः पातु गुह्यं मे गुहपूजितः ।ऊरु मे पातु कौमारं जानुनी च गणाधिपः ॥ १८॥ जङ्घे गजप्रदः पातु गुल्फौ मे धूर्जटिप्रियः ।चरणौ दुर्जयः पातुर्साङ्गं गणनायकः ॥ १९॥ आमोदो मेऽग्रतः पातु प्रमोदः पातु पृष्ठतः ।दक्षिणे पातु सिद्धिशो वामे विघ्नधरार्चितः ॥ २०॥ प्राच्यां रक्षतु मां नित्यं चिन्तामणिविनायकः ।आग्नेयां वक्रतुण्डो मे दक्षिणस्यामुमासुतः ॥ २१॥ नैरृत्यां सर्वविघ्नेशः पातु नित्यं गणेश्वरः ।प्रतीच्यां सिद्धिदः पातु वायव्यां गजकर्णकः ॥ २२॥ कौबेर्यां सर्वसिद्धिशः ईशान्यामीशनन्दनः ।ऊर्ध्वं विनायकः पातु अधो मूषकवाहनः ॥ २३॥ दिवा गोक्षीरधवलः पातु नित्यं गजाननः ।रात्रौ पातु गणक्रीडः सन्ध्योः सुरवन्दितः ॥ २४॥ पाशाङ्कुशाभयकरः सर्वतः पातु मां सदा ।ग्रहभूतपिशाचेभ्यः पातु नित्यं गजाननः ॥ २५॥ सत्वं रजस्तमो वाचं बुद्धिं ज्ञानं स्मृतिं दयाम् ।धर्मचतुर्विधं लक्ष्मीं लज्जां कीर्तिं कुलं वपुः ॥ २६॥ धनं धान्यं गृहं दारान् पौत्रान् सखींस्तथा ।एकदन्तोऽवतु श्रीमान् सर्वतः शङ्करात्मजः ॥ २७॥ सिद्धिदं कीर्तिदं देवि प्रपठेन्नियतः शुचिः ।एककालं द्विकालं वापि भक्तिमान् ॥ २८॥ न तस्य दुर्लभं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।सर्वपापविनिर्मुक्तो जायते भुवि मानवः ॥ २९॥ यं यं कामयते नित्यं सुदुर्लभमनोरथम् ।तं तं प्राप्नोति सकलं षण्मासान्नात्र संशयः ॥ ३०॥ मोहनस्तम्भनाकर्षमारणोच्चाटनं वशम् ।स्मरणादेव जायन्ते नात्र कार्या विचारणा ॥ ३१॥ सर्वविघ्नहरं देवं ग्रहपीडानिवारणम् ।सर्वशत्रुक्षयकरं सर्वापत्तिनिवारणम् ॥ ३२॥ धृत्वेदं कवचं देवि यो जपेन्मन्त्रमुत्तमम् ।न वाच्यते स विघ्नौघैः कदाचिदपि कुत्रचित् ॥ ३३॥ भूर्जे लिखित्वा विधिवद्धारयेद्यो नरः शुचिः ।एकबाहो शिरः कण्ठे पूजयित्वा गणाधिपम् ॥ ३४॥ एकाक्षरस्य मन्त्रस्य कवचं देवि दुर्लभम् ।यो धारयेन्महेशानि न विघ्नैरभिभूयते ॥ ३५॥ गणेशहृदयं नाम कवचं सर्वसिद्धिदम् ।पठेद्वा पाठयेद्वापि तस्य सिद्धिः करे स्थिता ॥ ३६॥ न प्रकाश्यं महेशानि कवचं यत्र कुत्रचित् ।दातव्यं भक्तियुक्ताय गुरुदेवपराय च ॥ ३७॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले एकाक्षरगणपतिकवचं अथवात्रैलोक्यमोहनकवचं सम्पूर्णम् ॥

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Ekavimshati Ganeshamantrah 21 Ganesha Mantras: एकविंशतिगणेशमन्त्राः

Ekavimshati Ganeshamantrah 21 Ganesha Mantras: एकविंशतिगणेशमन्त्राः अथातः सम्प्रवक्ष्यामि चैकविंशतिसङ्ख्यकान् ।गणेशान्राजमातङ्ग्या सम्बद्धान् योगिनीयुतान् ॥ १॥ बीजषट्कं गणेशस्य ङेऽन्तं तन्नाम चोच्चरेत् ।नमोऽन्ता मनवस्तेषां क्रमान्नामानि वच्म्यहम् ॥ २॥ अग्रे पृष्ठे द्विदन्तादिद्वितुण्डाक्षो विनायकः ।ज्येष्ठो विनायकश्चैव तथा गजविनायकः ॥ ३॥ विनायकः कालसंज्ञो नागेशाख्यो विनायकः ।अथान्तर्गृहमावृत्य स्थिताञ्छृणु विनायकान् ॥ ४॥ तथा सृष्टिगणेशश्च यक्षविघ्नेश एव च ।गजकर्णश्चित्रघण्टः स्यान्मङ्गलविनायकः ॥ ५॥ विनायकश्च मित्रादिरथ वानन्दकानने ।व्यवस्थिता गणेशा ये ते वक्ष्यन्ते मयाधुना ॥ ६॥ मोदः प्रमोदः सुमुखो दुर्मुखो गणनायकः ।विनायको ज्ञानपूर्वो द्वारविघ्नेश एव च ॥ ७॥ अविमुक्तेशनिकटे त्वविमुक्तविनायकः ।योगिन्यश्च क्रमादेषां कीर्त्यन्ते प्रेतवाहनाः ॥ ८॥ दन्दशूककरा रौद्री मृगशीर्षा वृषानना ।व्यालास्या धूर्तविश्वासा व्योमैकचरणार्धदृक् ॥ ९॥ तापिनी तुष्टिपूर्वा च शोषिणी कोटरी तथा ।विद्युत्प्रभा स्थूलनासा मार्जारी कण्ठपूरणा ॥ १०॥ कामाक्ष्यट्टाट्टहासा च बलाका गतिपुण्यदा ।मूकास्या चेति योगिन्यो ङेऽन्तं नाम नमोऽन्तकम् ॥ ११॥ स्वबीजाद्यं भवेन्मन्त्रो यथानामार्थकारकः । इति श्रीमहामायामहाकालानुमते मेरुतन्त्रे शिवप्रणीतेपश्चिमाम्नायगणपतिमन्त्रकथने एकोनविंशे प्रकाशेप्रोक्ताः एकविंशतिगणेशमन्त्राः सम्पूर्णाः । अथ नामावलिः –ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः द्विदन्तविनायकाय नमः । १ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः द्वितुण्डविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः द्व्यक्षविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः ज्येष्ठविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः गजविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः कालविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः नागेशविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः सृष्टिगणेशाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः यक्षविघ्नेशाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः गजकर्णाय नमः । १०ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः चित्रघण्टाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः मङ्गलविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः मित्रादिविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः मोदगणेशाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः प्रमोदगणेशाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः सुमुखाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः दुर्मुखाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः गणनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः ज्ञानविनायकाय नमः ।ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः द्वारविघ्नेशाय नमः । २०ॐ गां गीं गूं गैं गौं गः अविमुक्तेशविनायकाय नमः । २१ श्लोकानि ४९३-५०३

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Ganesh Chaturthi

Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी 2025: तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और बप्पा की कृपा पाने के 5 महाउपाय

Ganesh Chaturthi: भगवान गणेश, जिन्हें बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य का देवता माना जाता है, के जन्मोत्सव को गणेश चतुर्थी के रूप में पूरे देश में बड़े उत्साह और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर मनाया जाता है। इस वर्ष, गणेश चतुर्थी का महापर्व 27 अगस्त 2025 को मनाया जाएगा। Ganesh Chaturthi भक्तजन इस दौरान घरों, दफ्तरों, दुकानों और मंदिरों में गणपति जी की मूर्ति स्थापित करते हैं और पूरे 10 दिनों तक उनकी विधिनुसार उपासना करते हैं, Ganesh Chaturthi जो अनंत चतुर्दशी के दिन समाप्त होती है। वैसे तो भगवान गणेश की पूजा-अर्चना रोजाना की जाती है, लेकिन भादों माह को उनकी उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। आइए जानते हैं गणेश चतुर्थी 2025 से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथियां, शुभ मुहूर्त और बप्पा की कृपा पाने के सरल उपाय। Ganesh Chaturthi date and auspicious time 2025: गणेश चतुर्थी तिथि और शुभ मुहूर्त 2025 • चतुर्थी तिथि का प्रारंभ: भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि 26 अगस्त को दोपहर 1 बजकर 54 मिनट पर शुरू होगी। • चतुर्थी तिथि का समापन: 27 अगस्त की दोपहर 3 बजकर 44 मिनट पर होगा। • पर्व का दिन: उदया तिथि के अनुसार, गणेश चतुर्थी का पर्व 27 अगस्त को ही मनाया जाएगा। • गणेश मूर्ति स्थापना का शुभ मुहूर्त: ज्योतिषियों के अनुसार, 27 अगस्त को सुबह 11 बजकर 05 मिनट से लेकर दोपहर 01 बजकर 40 मिनट तक का समय गणपति जी की मूर्ति स्थापना के लिए अत्यंत शुभ रहेगा। Ganesh Chaturthi आप इस शुभ अवधि में भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर सकते हैं। गणेश चतुर्थी 2025 पर बन रहे दुर्लभ संयोग:Rare coincidences are happening on Ganesh Chaturthi 2025 इस वर्ष गणेश चतुर्थी पर कई शुभ और दुर्लभ योग बन रहे हैं, जो इस तिथि की महत्ता को कई गुना बढ़ा रहे हैं: • प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि और रवि योग: गणेश चतुर्थी पर प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि और रवि योग का अद्भुत संयोग रहेगा। • इंद्र-ब्रह्म योग: इन योगों के साथ इंद्र-ब्रह्म योग भी उपस्थित रहेगा। • लक्ष्मी नारायण योग: कर्क राशि में बुध और शुक्र की युति से लक्ष्मी नारायण योग का निर्माण होगा, Ganesh Chaturthi जो धन-संपदा के लिए बहुत शुभ माना जाता है। • बुधवार का महासंयोग: गणेश चतुर्थी बुधवार के दिन पड़ रही है, और बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित है, जिससे इस पर्व का महत्व और भी बढ़ जाता है। Offer this special offering to Lord Ganesha on Ganesh Chaturthi:गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश को लगाएं ये विशेष भोग भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए विशेष भोग लगाए जाते हैं, जिन्हें बेहद शुभ माना जाता है। गणेश चतुर्थी 2025: कब है गणेश महोत्सव का प्रारंभ? जानें शुभ मुहूर्त, योग और मंगल प्रवेश की विधि • मोदक और लड्डू: भगवान गणेश को मोदक और लड्डू अति प्रिय हैं। मान्यता है कि इन्हें अर्पित करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। • खीर और मालपुआ: मोदक और लड्डू के अलावा, खीर और मालपुआ जैसे भोग भी प्रभु को चढ़ाए जाते हैं। Do these 5 great measures for happiness and prosperity on Ganesh Chaturthi: गणेश चतुर्थी पर सुख-समृद्धि के लिए करें ये 5 महाउपाय गणेश चतुर्थी के दिन कुछ विशेष उपायों को करने से भगवान गणेश की कृपा से जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। 1. मोदक और लड्डू का भोग: गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश को मोदक और लड्डू का भोग लगाएं। ऐसा करने से उनकी कृपा बनी रहती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। 2. दूर्वा और शुद्ध घी अर्पित करें: भगवान गणेश को 21 दूर्वा (घास) के जोड़े और शुद्ध घी अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे धन की स्थिति में सुधार होता है और कर्ज से मुक्ति मिलती है। 3. पीले रंग की गणपति प्रतिमा स्थापित करें: यदि संभव हो, तो गणेश चतुर्थी के दिन घर में पीले रंग की गणपति जी की प्रतिमा स्थापित करें। यह माना जाता है कि ऐसा करने से गणेश जी की कृपा से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और धन-धान्य में वृद्धि होती है। 4. हाथी को हरा चारा खिलाएं: गणेश चतुर्थी के दिन हाथी को हरा चारा खिलाना बहुत शुभ होता है। इस उपाय से कार्यों में आने वाली सभी विघ्न-बाधाएं दूर होती हैं। 5. गणपति मंदिर के दर्शन: भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए गणेश चतुर्थी के दिन गणपति मंदिर जाकर उनके दर्शन अवश्य करें। यह उपाय जीवन में सुख-समृद्धि लाने में सहायक माना जाता है। गणेश चतुर्थी 2025 का पंचांग:Ganesh Chaturthi 2025 calendar 27 अगस्त 2025 के लिए पंचांग की महत्वपूर्ण जानकारी: • सूर्योदय: सुबह 05 बजकर 57 मिनट पर। • सूर्यास्त: शाम 06 बजकर 48 मिनट पर। • चंद्रोदय: सुबह 09 बजकर 28 मिनट पर। • ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04 बजकर 28 मिनट से 05 बजकर 12 मिनट तक। • विजय मुहूर्त: दोपहर 02 बजकर 31 मिनट से 03 बजकर 22 मिनट तक। • गोधूलि मुहूर्त: शाम 06 बजकर 48 मिनट से 07 बजकर 10 मिनट तक। • निशिता मुहूर्त: रात 12 बजे से 12 बजकर 45 मिनट तक। निष्कर्ष:conclusion गणेश चतुर्थी का पर्व हमें भगवान गणेश के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का अवसर देता है। इन शुभ मुहूर्तों और उपायों का पालन करके आप भी गणपति बप्पा की कृपा से अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि ला सकते हैं। डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहाँ दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। अमर उजाला या लाइव हिंदुस्तान, यहाँ दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। इन्हें अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

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