EKADASHI

बलदेव षष्ठी या हल छठ आज या कल? नोट करें पूजन साम्रगी, इस सरल विधि से करें पूजा, जानें महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार, बलदेव षष्ठी या हल छठ की शुरुआत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि यानी आज (4 सितंबर 2023) शाम 04:41 बजे हो जाएगी. वहीं, इसका समापन अगले दिन 5 सितंबर 2023 को दोपहर 03:46 बजे होगा. हर छठ या हल छठ व्रत सनातन धर्म में पुत्रवती स्त्रियों द्वारा रखा जाता है. यह पर्व मुख्य तौर पर उत्तर भारत में मनाया जाता है. इस व्रत में महिलाएं अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए भगवान गणेश और माता पार्वती से प्रार्थना करती है. बलराम जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला हल छठ किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है. बलदेव भगवान कृष्ण के बड़े भाई थे, जिनका प्रिय शास्त्र हल था. इन्हें हलधर के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन किसानों और बैलों की पूजा की जाती है. बलदेव षष्ठी या हल छठ का त्योहार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है पूजन सामग्री 1. भैंस का दूध, घी, दही गोबर.2. महुए का फल, फूल, पत्ते3. जवार की धानी4. ऐपण5. मिट्टी के छोटे कुल्हड़6 देवली छेवली. हल छठ पूजा विधि इस दिन माताएं महुआ पेड़ की डाली का दातून कर स्नान कर व्रत धारण करती हैं। इस दिन व्रती महिलाएं कोई अनाज नहीं खाती हैं। भैंस के दूध की चाय पीती हैं। तालाब बेर, पलाश, गूलर आदि पेड़ों की टहनियों तथा कांस के फूल को लगाकर सजाते हैं। सामने एक चौकी या पाटे पर गौरी-गणेश, कलश रखकर हलषष्ठी देवी की मूर्ति की पूजा करते हैं। साड़ी आदि सुहाग की सामग्री भी चढ़ाते हैं तथा हलषष्ठी माता की छह कहानी सुनते हैं। इस पूजन की सामग्री में पचहर चांउर (बिना हल जुते हुए जमीन से उगा हुआ धान का चावल, महुआ के पत्ते, धान की लाई, भैंस का दूध-दही व घी आदि रखते हैं। बच्चों के खिलौनों जैसे-भौरा, बाटी आदि भी रखा जाता है।  भगवान श्रीकृष्ण की जन्म कथा हलछठ व्रत महत्व- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। इस महिलाएं अपने पुत्र की लंबी आयु और समृद्धि की कामना के लिए उपवास रखती हैं। 

बलदेव षष्ठी या हल छठ आज या कल? नोट करें पूजन साम्रगी, इस सरल विधि से करें पूजा, जानें महत्व Read More »

2023: संकष्टी चतुर्थी कब ? नोट करें डेट, मुहूर्त और चंद्रोदय समय

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हेरंब संकष्टी चतुर्थी है. इस दिन बहुला चौथ भी मनाई जाती है. जानते हैं हेरंब संकष्टी चतुर्थी की डेट, मुहूर्त और महत्व. हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हेरंब संकष्टी चतुर्थी है इसे महा स्कंद हर चतुर्थी भी कहते हैं. इस दिन बहुला चौथ भी मनाई जाती है. संकष्टी चतुर्थी व्रत गणपति जी को समर्पित है लेकिन बहुला चौथ व्रत में श्रीकृष्ण और बहुला गाय की पूजा की जाती है. ऐसे में व्रती को इस दिन बप्पा और बाल गोपाल दोनों का आशीर्वाद मिलेगा. आइए जानते हैं हेरंब संकष्टी चतुर्थी और बहुला चौथ की डेट, मुहूर्त और महत्व. 2023:जन्माष्टमी कब है, जानें सही तारीख, पूजा विधि, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त और महत्व हेरंब संकष्टी चतुर्थी 2023 डेट भाद्रपद माह की हेरंब संकष्टी चतुर्थी 3 सितंबर 2023 रविवाह को है.संकष्टी के दिन बुद्धि, विद्या के दाता गणपति जी की उपसाना करने से समस्त विघ्न दूर होते हैं. मांगलिक कार्य में बाधाएं नहीं आती. हेरंब संकष्टी चतुर्थी 2023 मुहूर्त  पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह की चतुर्थी तिथि 02 सितंबर 2023 को रात 08 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 03 सिंतबर 2023 को शाम 06 बजकर 24 मिनट पर खत्म होगी. गणपति की पूजा का मुहूर्त – सुबह 07.35 – सुबह 10.45 शाम का मुहूर्त – शाम 06.41 – रात 09.31 बहुला चौथ की पूजा – शाम 06.28 – शाम 06.54 चंद्रोदय समय – रात 08:57 हेरंब संकष्टी चतुर्थी महत्व  भविष्य पुराण में बताया गया है कि हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर उपवास करने से बुध, राहु-केतु के दुष्प्रभाव नहीं झेलने पड़ते. भगवान गणेश की पूजा करने से हर तरह की परेशानियां दूर होती हैं और बुद्धि, बल और विवेक की प्राप्ति होती है. इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है. हेरंब संकष्टी चतुर्थी मंत्र ‘ॐ नमो हेरम्ब मद मोहित मम् संकटान निवारय-निवारय स्वाहा।’ ‘ॐ श्रीं गं सौभाग्य गणपतये। वर्वर्द सर्वजन्म में वषमान्य नम:।’  ‘ॐ गं गणपतये नम:।’ भाद्रपद चतुर्थी 2023 तिथि और पूजा विधि  इस दिन श्री गणेश की पूजा की जाती है और फिर चांद को अर्घ्य देते हैं.  दिन भर महिलाएं निराहार रहकर इस व्रत को करती हैं. शाम के वक्त गणेश की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें फूल, पांच तरह के फल, नारियल, पान, सुपारी, दही, दूध, शहद, इत्र, सिंदूर, अक्षत और चंदन चढ़ाएं. इस दिन भगवान को मोतीचूर के लड्डू चढ़ाने चाहिए.

2023: संकष्टी चतुर्थी कब ? नोट करें डेट, मुहूर्त और चंद्रोदय समय Read More »

2023:जन्माष्टमी कब है, जानें सही तारीख, पूजा विधि, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त और महत्व

इस साल कृष्ण जन्माष्टमी सितंबर में मनाई जाएगी. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को आमतौर पर लगातार दो दिन समर्पित होते हैं. पहला स्मार्त सम्प्रदाय के लिए और दूसरा वैष्णव सम्प्रदाय के लिए. इस साल कृष्ण जन्माष्टी का पर्व 6 और 7 सितंबर को मनाई जाएगी. हिंदू धर्म में कृष्ण जन्माष्टमी को महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है. कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद मास में मनाई जाती है. फिलहाल सावन का महीना चल रहा है. सावन के बाद भाद्रपद का महीना 31 अगस्त 2023 से शुरू हो जाएगा. भादो माह भगवान कृष्ण की उपासना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है. इसी महीने में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद (चंद्रमा के अंधेरे पखवाड़े) के महीने में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है. इस साल कृष्ण जन्माष्टमी की डेट को लेकर लोगों में कंफ्यूजन बना हुआ है.  गृहस्थ कब रखेंगे जन्माष्टमी व्रत 2023 पंचांग के अनुसार, इस साल कृष्ण जन्माष्टमी सितंबर में मनाई जाएगी. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को आमतौर पर लगातार दो दिन समर्पित होते हैं. पहला स्मार्त सम्प्रदाय के लिए और दूसरा वैष्णव सम्प्रदाय के लिए. इस साल कृष्ण जन्माष्टी का पर्व 6 और 7 सितंबर को मनाई जाएगी. गृहस्थ जीवन वालों के लिए 06 सितंबर 2023 को जन्माष्टमी व्रत रखना शुभ रहेगा. जबकि वैष्णव संप्रदाय को मनाने वाले लोग कान्हा का जन्मोत्सव 07 सितंबर 2023 को मनाएंगे. जन्माष्टमी 2023 शुभ मुहूर्त भाद्रपद माह के कृष्ण जन्माष्टमी तिथि 06 सितंबर 2023 को दोपहर 03 बजकर 37 मिनट पर शुरू हो रही है. अष्टमी तिथि का समापन 07 सितंबर 2023 को शाम 04 बजकर 14 मिनट पर होगा. रोहिणी नक्षत्र 06 सितंबर 2023 की सुबह 09 बजकर 20 मिनट पर शुरू होगा. वहीं रोहिणी नक्षत्र की समाप्ति 07 सितंबर 2023 की सुबह 10 बजकर 25 मिनट पर होगा. जन्माष्टमी 2023 मुहूर्त धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण जी का जन्म भाद्रपद मास के अष्टमी तिथि की रात 12 बजे रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. गृहस्थ जीवन वाले 6 सितंबर को जन्मोत्सव मनाएंगे. इसी दिन रोहिनी नक्षत्र का संयोग भी बन रहा है. वहीं वैष्णव संप्रदाय में श्रीकृष्ण की पूजा का अलग विधान है. ऐसे में वैष्णव संप्रदाय में 07 सिंतबर को जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाएगा. रोहिणी नक्षत्र शुरू- 06 सितंबर 2023, सुबह 09 बजकर 20 मिनट पर रोहिणी नक्षत्र समाप्त – 07 सितंबर 2023, सुबह 10 बजकर 25 मिनट पर श्रीकृष्ण पूजा का समय – मध्यरात्रि 12 बजकर 02 से मध्यरात्रि 12 बजकर 48 मिनट पूजा अवधि – 46 मिनट व्रत पारण समय – 7 सिंतबर 2023, सुबह 06 बजकर 09 तक जन्माष्टमी व्रत कथा जन्माष्टमी व्रत कथा में हम आपको बताने जा रहे है कि क्यों हम जन्माष्टमी के दिन व्रत रखते है। जन्माष्टमी के दिन बड़े ही धूमधाम से पूरे भारतवर्ष में जन्माष्टमी व्रत रखा जाता है। भारत के मथुरा शहर में असुर राज कंस वहां के लोगों पर बहुत अत्याचार करता था। एक समय की बात है जब कंस देवकी की शादी वसुदेव से करवा कर मथुरा से कहीं जा रहा था। रास्ते में एक आकाशवाणी होती है जिसमें बताया जाता है कि देवकी का आठवां पुत्र कंस के मृत्यु का कारण बनेगा। इसके बाद कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया। हर एक पुत्र को कंस ने मारा मगर भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रोहिणी नक्षत्र में अष्टमी तिथि को आठवीं संतान का जन्म हुआ। आठवीं संतान के रूप में भगवान विष्णु दसवें अवतार में श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिए थे। भगवान का अवतार होने के कारण उन्होंने स्वयं को कारागार से मुक्त करके मथुरा के नंद बाबा के घर पहुंचा लिया। वहां से यशोदा माता के साथ भगवान कृष्ण का बालकांड शुरू होता है। बचपन से ही कंस के सभी प्रकार के माया जाल को विफल करते हुए एक निश्चित समय पर उन्होंने कंस का वध करके मथुरा के सभी लोगों को अत्याचार से मुक्त करवाया। इसके बाद भगवान कृष्ण ने द्वापर युग को सभी प्रकार के पाप से मुक्त किया और गीता जैसे उपदेश से लोगों का उद्धार किया। जन्माष्टमी व्रत विधि न्माष्टमी का व्रत बिल्कुल एकादशी के व्रत की तरह रखा जाता है। जन्माष्टमी के त्यौहार के दिन सुबह-सुबह नंद, यशोदा, बलराम, देवकी, कृष्ण, इन सबके नाम का बार बार उच्चारण करते हुए पूजा किया जाता है। सुबह सुबह पूजा करने के बाद अब जन्माष्टमी का उपवास शुरू कर सकते है। इस दिन अन्न नहीं खाया जाता है, जन्माष्टमी के व्रत को एक निश्चित अवधि में तोड़ा जाता है। जैसा कि हम सब जानते है भाद्रपद के कृष्ण पक्ष और रोहिणी नक्षत्र के अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन उपवास को एक निश्चित अवधि पर तोड़ा जाता है जिसे पारण मुहूर्त कहते है। हर साल जन्माष्टमी के अर्धरात्रि को अर्थात 2023 में 06 सितंबर के रात 12:00 बजे भगवान श्री कृष्ण का जन्म होगा उसके बाद जन्माष्टमी का पारण मुहूर्त होता है। भारत के कुछ जगहों पर पारण मुहूर्त अगले दिन सूर्य उदय के बाद माना जाता है। जानिये श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा जन्माष्टमी व्रत में क्या खाना चाहिए हिंदू धर्म के अलग-अलग त्योहार में अलग अलग तरीके से व्रत रखने और पारण करने की परंपरा बनाई गई है। जन्माष्टमी के दिन घर में बहुत काम रहता है लोग अपने घर को सजाते है, बाल गोपाल की पूजा अर्चना की तैयारी की जाती है, और कान्हाजी का विशेष भोग बनाया जाता है। ऐसे में अगर आप व्रत करते है तो शारीरिक रूप से कमजोर पड़ सकते है। जन्माष्टमी के व्रत में कुछ लोग 24 घंटे का निर्जला उपवास करते है, जिसमें वह पानी तक नहीं पीते मगर कुछ लोग दिनभर उपवास करके शाम को फलाहार करते है। जिनका तबीयत ठीक नहीं रहता है वह दिन में दो बार फलाहार भी करते है। आपको जन्माष्टमी व्रत में क्या खाना चाहिए यह जानना आवश्यक है ताकि आप शारीरिक रूप से कमजोर ना पड़े और रात तक उपवास करते हुए भगवान की सही तरीके से पूजा अर्चना कर सके। कृष्ण जन्माष्टमी पूजा व्रत नियम अविवाहित लोग व्रत के एक दिन पहले और जन्माष्टमी के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें. व्रत के दिन मध्याहन के वक्त तिल के पानी से स्नान करें. रात में श्रीकृष्ण की पूजा के समय नए

2023:जन्माष्टमी कब है, जानें सही तारीख, पूजा विधि, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त और महत्व Read More »

पुत्रदा एकादशी व्रत कब? जानें तारीख महत्व और मुहूर्त

साल में आने वाली हर एक एकादशी का अपना अलग ही महत्व है। सावन शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है पुत्रदा एकादशी साल में वैसे 2 बार आती है। पुत्रदा एकादशी को लेकर मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान की सुख की प्राप्ति होती है साथ ही संतान की उन्नति होती है। आइए जानते हैं कब है सावन शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी। इसका महत्व और पूजा विधि। कब है पुत्रदा एकादशी पंचांग के अनुसार, सावन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 26 अगस्त देर रात 12 बजकर 9 मिनट पर प्रारंभ होगी और अगले दिन यानी 27 अगस्त की रात 9 बजकर 33 मिनट तक रहेगी। उदय तिथि में एकादशी तिथि होने के कारण यह व्रत 27 अगस्त को ही रखा जाएगा। वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा व कथा 27 अगस्त को बहुत ही शुभ सर्वार्थ सिद्धि योग भी है। सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 5 बजकर 56 मिनट से आरंभ होगा और 7 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। इसलिए इस शुभ मुहूर्त में पूजा करना अति उत्तम फलदायी रहेगा। पुत्रदा एकादशी का महत्व मान्यताओं के अनुसार, पुत्रदा एकादशी का व्रत उत्तम फल देने वाला है। अगर किसी को संतान सुख में बाधा आ रही है तो वह इस व्रत को रख सकते हैं। साथ ही इस व्रत को रखने से संतान के सभी कष्ट भी दूर होता है। साथ ही संतान को स्वास्थ्य और अच्छी आयु का वरदान मिलता है। पुत्रदा एकादशी पूजा विधि सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि के बाद घर के मंदिर में देसी घी का दीपक जलाएं। इसके बाद भगवान विष्णु को गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। साथ ही तुलसी माला से 108 बार ओम वासुदेवाय नम: का जप करें। अंत में भगवान विष्णु की आरती करें। इस दिन भगवान को भी सात्विक चीजों का ही भोग लगाएं। साथ ही भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। इस दिन रविवार है तो तुलसी के पत्ते पहले ही तोड़ कर रख दें। पुत्रदा एकादशी व्रत कथा  द्वापर युग के आरंभ में महिरूपति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन राज्य के सभी ऋषि-मुनियों, सन्यासियों और विद्वानों को बुलाकर संतान प्राप्ति के उपाय पूछे। राजा की बात सुनकर सभी ने कहा कि ‘हे राजन तुमने पूर्व जन्म में सावन माह की एकादशी के दिन अपने तालाब से एक गाय को जल नहीं पीने दिया था। जिसके कारण गाय ने तुम्हे संतान न होने का श्राप दिया था। इसके बाद सभी ऋषि-मुनियों ने कहा कि हे राजन यदि तुम और तुम्हारी पत्नी पुत्रदा एकादशी का व्रत रखें तो इस श्राप से मुक्ति पा सकते हो। जिसके बाद तुम्हें संतान की प्राप्ति हो सकती है। यह सुनकर राजा ने पत्नी के साथ मिलकर पुत्रदा एकादशी का व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद राजा ने सावन माह में आने वाली पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा और इस व्रत के प्रभाव से वह शाप से मुक्त हो गया। जिसके बाद उसकी पत्नी गर्भवती हुई और एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। राजा काफी प्रसन्न हुए और तब से वह प्रत्येक पुत्रदा एकादशी का व्रत करने लगे। कहते हैं जो कि साधक पूरे मन व श्रद्धा के साथ यह व्रत करता है भगवान विष्णु उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

पुत्रदा एकादशी व्रत कब? जानें तारीख महत्व और मुहूर्त Read More »

हरियाली तीज व्रत पूजा कथा, जानें क्यों और कैसे शुरू हुई इस व्रत को रखने की परंपरा

इस दिन मनाई जाएगी हरियाली तीज  हिंदू पंचांग के अनुसार इस बार सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 18 अगस्त को रात 08 बजकर 01 मिनट पर होगी. वहीं इसका समापन अगले दिन 19 अगस्त को रात 10 बजकर 19 मिनट पर होगा. इसलिए उदया तिथि के अनुसार हरियाली तीज 19 अगस्त को मनाई जाएगी.  सावन महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का व्रत पर्व मनाया जाता है। इस व्रत की कथा में यह रहस्य बताया गया है कि क्यों और कैसे इस व्रत की परंपरा शुरू हुई और किसलिए यह व्रत सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं में खूब प्रचलित है। शिवजी ने देवी पार्वती को जो बताया था हरियाली तीज के बारे में आप भी जानिए। सावन मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का व्रत पर्व मनाया जाता है। हरियाली तीज का त्योहार सुहागन महिलाओं के लिए विशेष महत्वपूर्ण होता है। इस पर्व का संबंध भगवान शिव और देवी पार्वती से है। मान्यता है कि देवी पार्वती की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए थे और इसी दिन ही माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म की कथा भी सुनाई थी। इसलिए इस व्रत का संबंध शिव पार्वती के मिलन से है। आइए जानें हरियाली तीज की पौराणिक कथा में क्या कहा गाय है। हरियाली तीज की पौराणिक कथा हरियाली तीज से जुड़ी एक कथा बहुत प्रचलित है। एक समय की बात है माता पार्वती अपने पूर्वजन्म के बारे में याद करना चहती थीं लेकिन उन्हें कुछ याद नहीं आ रहा था। ऐसे में भोलेनाथ देवी पार्वती से कहते हैं कि हे पार्वती! तुमने मुझे प्राप्त करने के लिए 107 बार जन्म लिया था लेकिन तुम मुझे पति रूप में न पा सकीं। लेकिन 108वें जन्म में तुमने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया और मुझे वर रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की। नारद आए विवाह का प्रस्ताव लेकर भगवान शिव कहते हैं कि हे पार्वती! तुमने अन्न-जल का त्यागकर पत्ते खाए और सर्दी-गर्मी एवं बरसात में हजारों कष्टकर सहकर भी अपने व्रत में लीन रही। तुम्हारे कष्टों को देखकर तुम्हारे पिताजी बहुत दुखी थे, तब नारद मुनि तुम्हारे घर पधारे और कहा कि मुझे भगवान विष्णु ने भेजा है। भगवान विष्णु आपकी कन्या से अत्यंत प्रसन्न हैं और वह उनसे विवाह करना चाहते हैं, मैं भगवान विष्णु का यही संदेश लेकर आपके पास आया हूं। शिव भक्ति में लीन पार्वती हुईं गुम नारदजी के प्रस्ताव को सुनकर पार्वती के पिता खुशी से भगवान विष्णु के साथ विवाह के लिए तैयार हो गए। नारदमुनि ने भी भगवान विष्णु को यह शुभ संदेश सुना दिया। लेकिन जब यह बात पार्वती को पता चली तब वह बहुत दुखी हुईं। पार्वती ने अपने मन की बात अपनी सखी को सुनाई। तब सखी ने माता पार्वती को घने जंगल में छुपा दिया। जब पार्वती के गायब होने की खबर हिमालय को पता चली तब उन्होंने खोजने में धरती-पाताल एक कर दिया लेकिन पार्वती का कहीं पता नहीं चला। क्योंकि देवी पार्वती तो जंगल में एक गुफा के अंदर रेत से शिवलिंग बनाकर शिवजी की पूजा कर रही थी। शिवजी ने बताया पार्वती से विवाह का रहस्य शिवजी ने कहा, हे पार्वती! इस प्रकार तुम्हारी पूजा से मैं बहुत प्रसन्न हुआ और तुम्हारी मनोकामना पूरी की। जब हिमालयराज गुफा में पहुंचे तब तुमने अपने पिता को बताया कि मैंने शिवजी को पतिरूप में चयन कर लिया और उन्होंने मेरी मनोकामना पूरी कर दी है। शिवजी ने मेरा वरण कर लिया है। मैं आपके साथ केवल एक शर्त पर चलूंगी कि आप मेरा विवाह भोलेनाथ से करवाने के लिए तैयार हो जाएं। तब हे पार्वती! तुम्हारे पिताजी मान गए और विधि-विधान सहित हमारा विवाह हुआ। हे पार्वती! तुम्हारे कठोर तप और व्रत से ही हमारा विवाह हो सका। हरियाली तीज की परंपरा ऐसे शुरू हुई भगवान शिव देवी पार्वती से कहते हैं, हे पार्वती! इस हरियाली तीज को जो भी निष्ठा के साथ करेगा, मैं उसको मनोवांधित फल प्रदान करूंगा। उसे तुम जैसा सुहाग मिलेगा। तबसे कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की कामना हेतु यह व्रत रखती है। वहीं सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए इस व्रत को रखती हैं। भव‌िष्य पुराण में देवी पार्वती ने खुद बताया है क‌ि हरियाली तीज का व्रत करने पर महिलाओं को सुहाग और सौभाग्य की प्राप्त‌ि होती है। सावन महीने में तृतीया त‌िथ‌ि के दिन कई वर्षों की कठिन तपस्या के बाद देवी पार्वती ने भगवान श‌िव को पत‌ि रूप में पाने का वरदान प्राप्त क‌िया था इसलिए इस व्रत का बड़ा ही महत्व है। हरियाली तीज का महत्व  हरियाली तीज आमतौर पर नाग पंचमी के दो दिन पूर्व यानी श्रावण मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, यह वह दिन है जब देवी ने शिव की तपस्या में 107 जन्म बिताने के बाद पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इस दिन महिलाएं 16 श्रृंगार करके भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। सुखी वैवाहिक जीवन के साथ ही घर में सुख शांति समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। साथ ही इस दिन हरे रंग के कपड़े पहनने का विशेष महत्व है। इस दिन महिलाओं के बीच झूला झूलने का भी प्रचलन है। साथ ही महिलाएं तीज के गीत गाती हैं। भगवान श्रीराम के 10 प्रमुख मंदिर हरियाली तीज की पूजा विधि हरियाली तीज का व्रत रखने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और साफ- सुथरे कपड़े पहनकर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करना चाहिए. इसके बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इस दिन बालू के भगवान शंकर व माता पार्वती की मूर्ति बनाकर पूजन किया जाता है. चौकी पर प्रतिमा स्थापित करने के बाद माता को श्रृंगार का सामान अर्पित करें.  भगवान शिव, माता पार्वती का आवाह्न करें. माता-पार्वती, शिव जी और उनके साथ गणेश जी की पूजा करें. शिव जी को वस्त्र अर्पित करें. इस दिन हरियाली तीज की कथा सुनना शुभ माना जाता है. 

हरियाली तीज व्रत पूजा कथा, जानें क्यों और कैसे शुरू हुई इस व्रत को रखने की परंपरा Read More »

रोहिणी व्रत की पूरी

रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लिए महत्वपूर्ण दिनों में से एक है, क्योंकि इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं. हालांकि, इस महीने ये व्रत 10 अगस्त, 2023 को मनाया जाएगा. रोहिणी व्रत कथा प्राचीन कथा के अनुसार चंपापुरी राज्य में राजा माधवा, और रानी लक्ष्मीपति का राज्य था। उनके सात बेटे और एक बेटी थी। एक बार राजा ने बेटी रोहिणी के बारे में ज्योतिषी से जानकारी ली तो उसने बताया कि रोहिणी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ होगा। इस पर इसके बाद राजा ने स्वयंवर का आयोजन किया, इसमें रोहिणी-अशोक का विवाह करा दिया गया। बाद में रोहिणी-अशोक राजा रानी बने। एक समय हस्तिनापुर के वन में श्री चारण मुनिराज आए, उनके दर्शन के लिए राजा पहुंचे और धर्मोपदेश ग्रहण किया। बाद में पूछा कि उनकी रानी शांतचित्त क्यों है, तब उन्होंने बताया कि इसी नगर में एक समय में वस्तुपाल नाम का राजा था, जिसका धनमित्र नाम का मित्र था, जिसकी दुर्गंधा नाम की कन्या पैदा हुई। लेकिन धनमित्र परेशान रहता था कि उसकी बेटी से विवाह कौन करेगा। लेकिन बाद में उसने धन का लालच देकर वस्तुपाल के बेटे श्रीषेण से दुर्गंधा का विवाह कर दिया। इधर दुर्गंधा की दुर्गंध से परेशान होकर श्रीषेण एक माह में ही कहीं चला गया। पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में राजा माधव अपनी रानी लक्ष्मीपति के साथ चंपापुरी नामक नगर में राज्य करते थे। उनके 7 पुत्र और 1 पुत्री का नाम रोहिणी था। एक बार राजा ने निमित्ज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा। तो उन्होंने कहा कि तुम्हारी पुत्री का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ होगा। यह सब सुनने के बाद राजा ने कन्या का ऐलान किया और स्वयंवर में कन्या रोहिणी ने राजकुमार अशोक को वरमाला पहनाई पहनाई और इस प्रकार दोनों की शादी हो गई एक बार नगरी हस्तिनापुर के वनों में श्री चरण मुनिराज आए। राजा स्वजनों सहित उनके दर्शन को गए और प्रणाम कर के उपदेश ग्रहण किया। सपने में रुपये-पैसे देखना शुभ या अशुभ, जानें क्या कहता है स्वप्न शास्त्र इसके बाद राजा जी ने मुनिराज से एक प्रश्न पूछा कि मेरी रानी इतनी  शांत क्यों है तब गुरुवर ने उत्तर देते हुए कहा कि इस नगर में वास्तुपाल नाम का एक राजा रहता था जिसके मित्र का नाम धनमित्र था । उस धनमित्र के एक दुर्गंधयुक्त कन्या उत्पन्न हुई। धनमित्र को हमेशा यही चिंता रहती थी कि इस कन्या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लालच देकर उसका विवाह अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से करा दिया, लेकिन दुर्गंध से पीड़ित होकर उसने एक महीने के भीतर ही उसे छोड़ देता है। उसी समय नगर में मुनिराज जी विहार करते हुए आ गए तब धनमित्र जी अपनी बेटी दुर्गंध के साथ पूजा करने के लिए गए और मुनिराज से अपनी बेटी दुर्गंध के भविष्य के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि गिरनार पर्वत के समीप एक नगर में राजा भूपाल राज्य करते थे। उसकी सिंधुमती नाम की एक रानी थी। एक दिन राजा रानी सहित वन क्रीड़ा के लिए गया तो रास्ते में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के भोजन की व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली गई, लेकिन क्रोधित होकर उसने मुनिराज को करेले का आहार दिया, जिससे मुनिराज को बड़ी पीड़ा हुई और उन्होंने तुरंत अपने प्राण त्याग दिए। जब राजा को इस बात का पता चला तो उसने रानी को नगर से बाहर निकाल दिया और इस पाप के कारण रानी के शरीर में कोढ़ हो गया। अत्यंत पीड़ा और दु:ख को भोगती हुई वह क्रोध से मरकर नरक में चली गई। वह अनंत दु:खों को भोगकर पशु योनि में उत्पन्न हुई और फिर तुम्हारे घर में दुर्गंधयुक्त कन्या बनी। इस पूरी कथा को सुनकर धनमित्र ने पूछा- मुझे कोई व्रत-विधि आदि धार्मिक कार्य बताओ जिससे यह पाप दूर हो जाए। तब स्वामी ने कहा – रोहिणी व्रत सम्यग्दर्शन सहित करें अर्थात् जिस दिन प्रत्येक मास में रोहिणी नक्षत्र आता हो, उस दिन चारों प्रकार के अन्नों का त्याग कर श्री जिन चैत्यल के पास जाकर धर्मध्यान अर्थात् सामायिक, स्वाध्याय सहित 16 प्रहर व्यतीत करें। धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय व्यतीत करें और आत्मबल का दान करें। इस प्रकार 5 वर्ष 5 माह तक इस व्रत को करें। दुर्गन्धा ने भक्तिपूर्वक व्रत किया और अपने जीवन के अंत में सन्यास लेकर मरकर पहले स्वर्ग में देवी बनी। वहाँ से तेरी प्यारी रानी आई। इसके बाद राजा अशोक ने उसका भविष्य पूछा तो स्वामी ने कहा- भील होकर तुमने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, अत: तुम मरकर नरक में गये और फिर अनेक कुयोनियों में भटकते हुए एक व्यापारी के घर में जन्म लिया, अत: बहुत निराशाजनक। आपको शरीर मिला, तब आपने मुनिराज के कहने पर रोहिणी व्रत किया। फलस्वरूप स्वर्ग में जन्म लेकर अशोक नाम का एक राजा हुआ। इस प्रकार रोहिणी व्रत के प्रभाव से राजा अशोक और रानी रोहिणी ने स्वर्गलोक का सुख भोगकर मोक्ष प्राप्त किया।

रोहिणी व्रत की पूरी Read More »

Kamika Ekadashi 2023: कामिका एकादशी व्रत आज, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय

प्रत्येक माह में दो एकादशी व्रत रखे जाते हैं। सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को कामिका एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस बार कामिका एकादशी व्रत 13 जुलाई को है। सावन माह में पड़ने वाली एकादशी तिथि की कई विशेषताएं होती हैं। इस दिन भगवान विष्णु के साथ ही तुलसी जी की भी विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से भगवान विष्णु हर मनोकामना पूरी करते हैं। मान्यता है कि कामिका एकादशी का व्रत रखने वाले जातक को जीवन में किए गए समस्त पाप कर्मों से मुक्ति मिलती है और भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही व्यक्ति के जीवन में धन धान्य की कमी नहीं होती है। तो चलिए जानते हैं कामिका एकादशी की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त के बारे में… कामिका एकादशी व्रत कथा एक गांव में एक बहुत ही बलवान क्षत्रिय रहता था। एक दिन उसकी किसी ब्राह्मण से हाथापाई हो गई और ब्राह्मण की मृत्यु हो गई। अपने हाथों से ब्राह्मण की मृत्यु होने के बाद उसकी क्रिया करना का विचार उसके मन में आया। लेकिन, बाकी पंडितों ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। साथ ही उसे बताया की तुम पर ब्रह्म हत्या का दोष है। पहले तुम्हें इस पाप से मुक्ति पानी होगी। इसके लिए तुम्हें प्रायश्चित करना होगा। इस पर क्षत्रिय ने पूछा की पाप से मुक्त होने के क्या उपाय हैं। तब ब्राह्मणों ने बताया कि सावन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को भक्ति भाव से भगवान विष्णु का व्रत और पूजन कर ब्राह्मणों को भोजन कराके दक्षिणा के साथ आशीर्वाद प्राप्त करने से इस पाप से मुक्ति मिल जाएगी। क्षत्रिय ने पंडितों के बताए तरीके से व्रत किया।तब भगवान विष्णु ने उस क्षत्रिय को दर्शन दिए और उससे कहा कि तुम्हें ब्राह्मण हत्या से मुक्ति मिल गई है। अद्भुत पौराणिक कथा : शिव और सती का प्रेम कामिका एकादशी पूजा विधि मान्यताओं के अनुसार, इस दिन शंख, चक्र, गदा धारण किए हुए भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करनी चाहिए। पुराणों के अनुसार, कामिका एकादशी के दिन जो व्यक्ति भगवान के सामने घी अथवा तिल के तेल का दीपक जलाता है तो उनके पितर स्वर्गलोक में अमृत का पान करते हैं। साथ ही इस दिन जो व्यक्ति मंदिर, तुलसी के नीचे, केले के पेड़ के नीचे, पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाता है तो उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

Kamika Ekadashi 2023: कामिका एकादशी व्रत आज, जानिए पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत पारण का समय Read More »

बुधवार व्रत और कथा

बुधवार व्रत, यह व्रत हिन्दू धर्म में विशेष महत्व रखता है। बुधवार का व्रत बुधदेवता की कृपा व आर्शीवाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यदि कोई व्यक्ति अपने घर में शांति तथा सर्व सुखों की इच्छा रखता है तो उसके बुधवार का व्रत करना चाहिए। बुधवार के व्रत में दिन व रात में एक ही बार भोजन करना चाहिए। इस व्रत के दौरान हरी वस्तुओं का उपयोग करना चाहिए – जैसे भोजन में हरी सब्जी, हरे रंग के वस्त्र इत्यादि। पूरे दिन का उपवास करने के बाद अंत में भगवान शिव की पूजा, धूप, बेल-पत्र आदि के साथ करनी चाहिए और बुधवार व्रत कथा सुनकर और बुधदेव की आरती के बाद प्रसारद ग्रहण करना चाहिए। प्रासरद में गुड़, भात और दही होना चाहिए और इस दिन भगवान को सफेद फूल चढ़ाने चाहिए। गणेश जी का दिन बुधवार को भगवान गणेश की पूजा का भी विधान है अतः बुधवार का दिन को भगवान गणेश का दिन भी माना जाता है। यदि की व्यक्ति की कुंडली में बुध ग्रह कमजोर होता है तो उसे बुधवार के भगवान गणेश की पूजा व व्रत करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है बुधवार के दिन कोई भी शुभ कार्य आरम्भ करना चाहिए। पौराणिक मान्यता के अनुसार जब भगवान गणेश का जन्म हुआ था तो उस समय बुध देवता कैलाश में उपस्थित थे। बुध देव की उपस्थिति के कारण श्रीगणेश जी की आराधना के लिए वह प्रतिनिधि वार हुए यानी बुधवार के दिन गणेश जी पूजा का विधान बन गया। बुधवार व्रत कथा समतापुर नगर में मधुसूदन नामक एक व्यक्ति रहता था। वह बहुत धनवान था। मधुसूदन का विवाह बलरामपुर नगर की सुंदर लड़की संगीता से हुआ था। एक बार मधुसूदन अपनी पत्नी को लेने बुधवार के दिन बलरामपुर गया। मधुसूदन ने पत्नी के माता-पिता से संगीता को विदा कराने के लिए कहा। माता-पिता बोले- ‘बेटा, आज बुधवार है। बुधवार को किसी भी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करते।’ लेकिन मधुसूदन नहीं माना। उसने ऐसी शुभ-अशुभ की बातों को न मानने की बात कही।दोनों ने बैलगाड़ी से यात्रा प्रारंभ की। दो कोस की यात्रा के बाद उसकी गाड़ी का एक पहिया टूट गया। वहां से दोनों ने पैदल ही यात्रा शुरू की। रास्ते में संगीता को प्यास लगी। मधुसूदन उसे एक पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने चला गया। थोड़ी देर बाद जब मधुसूदन कहीं से जल लेकर वापस आया तो वह बुरी तरह हैरान हो उठा क्योंकि उसकी पत्नी के पास उसकी ही शक्ल-सूरत का एक दूसरा व्यक्ति बैठा था। संगीता भी मधुसूदन को देखकर हैरान रह गई। वह दोनों में कोई अंतर नहीं कर पाई।मधुसूदन ने उस व्यक्ति से पूछा ‘तुम कौन हो और मेरी पत्नी के पास क्यों बैठे हो?’ मधुसूदन की बात सुनकर उस व्यक्ति ने कहा- ‘अरे भाई, यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं अपनी पत्नी को ससुराल से विदा करा कर लाया हूं। लेकिन तुम कौन हो जो मुझसे ऐसा प्रश्न कर रहे हो?’ सपने में भगवान शिव का आना, देता है ये खास संकेत मधुसूदन ने कहा ‘तुम जरूर कोई चोर या ठग हो। यह मेरी पत्नी संगीता है। मैं इसे पेड़ के नीचे बैठाकर जल लेने गया था।’ इस पर उस व्यक्ति ने कहा- ‘अरे भाई! झूठ तो तुम बोल रहे हो।संगीता को प्यास लगने पर जल लेने तो मैं गया था। मैंने तो जल लाकर अपनी पत्नी को पिला भी दिया है। अब तुम चुपचाप यहां से चलते बनो। नहीं तो किसी सिपाही को बुलाकर तुम्हें पकड़वा दूंगा।’ दोनों एक-दूसरे से लड़ने लगे। उन्हें लड़ते देख बहुत से लोग वहां एकत्र हो गए। नगर के कुछ सिपाही भी वहां आ गए। सिपाही उन दोनों को पकड़कर राजा के पास ले गए। सारी कहानी सुनकर राजा भी कोई निर्णय नहीं कर पाया। संगीता भी उन दोनों में से अपने वास्तविक पति को नहीं पहचान पा रही थी।राजा ने दोनों को कारागार में डाल देने के लिए कहा। राजा के फैसले पर असली मधुसूदन भयभीत हो उठा। तभी आकाशवाणी हुई- ‘मधुसूदन! तूने संगीता के माता-पिता की बात नहीं मानी और बुधवार के दिन अपनी ससुराल से प्रस्थान किया। यह सब भगवान बुधदेव के प्रकोप से हो रहा है।’ मधुसूदन ने भगवान बुधदेव से प्रार्थना की कि ‘हे भगवान बुधदेव मुझे क्षमा कर दीजिए। मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई। भविष्य में अब कभी बुधवार के दिन यात्रा नहीं करूंगा और सदैव बुधवार को आपका व्रत किया करूंगा।’मधुसूदन के प्रार्थना करने से भगवान बुधदेव ने उसे क्षमा कर दिया। तभी दूसरा व्यक्ति राजा के सामने से गायब हो गया। राजा और दूसरे लोग इस चमत्कार को देख हैरान हो गए। भगवान बुधदेव की इस अनुकम्पा से राजा ने मधुसूदन और उसकी पत्नी को सम्मानपूर्वक विदा किया। कुछ दूर चलने पर रास्ते में उन्हें बैलगाड़ी मिल गई। बैलगाड़ी का टूटा हुआ पहिया भी जुड़ा हुआ था। दोनों उसमें बैठकर समतापुर की ओर चल दिए। मधुसूदन और उसकी पत्नी संगीता दोनों बुधवार को व्रत करते हुए आनंदपूर्वक जीवन-यापन करने लगे। इस तरह भगवान बुधदेव की कृपा से उनके यहां खुशियां बरसने लगीं। इस तरह जो स्त्री-पुरुष विधिवत बुधवार का व्रत करके व्रतकथा सुनते हैं, भगवान बुधदेव उनके सभी कष्ट दूर करते है।

बुधवार व्रत और कथा Read More »

29 जून को देवशयनी एकादशी, जानें क्यों इस बार 5 माह का होगा चातुर्मास

देवशयनी एकादशी 29 जून 2023 को है. ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास से जाने देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का महत्व, मुहूर्त उपाय और इसके नियम आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहते हैं. इस साल देवशयनी एकादशी 29 जून 2023 को है. इस दिन श्रीहरि विष्णु की पूजा करने से कई गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है. देवशयनी एकादशी के दिन से ही जगत के पालनहार भगवान विष्णु का निद्राकाल शुरू हो जाता है, यानी इसी दिन से चतुर्मास की शुरुआत होती है. चतुर्मास शुरू होने के बाद से सारे शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. 5 माह का होगा चातुर्मास देवशयनी एकादशी से चार माह तक भगवान विष्णु देवोत्थानी एकादशी तक के लिए योग निद्रा में चले जाएंगे. फिर वे देवउठनी एकादशी को योग निद्रा से बाहर आएंगे, तब चातुर्मास का समापन होगा. देवउठनी एकादशी 23 नवंबर को है। इस तरह से चातुर्मास 30 जून से लगेगा और 23 नवंबर को खत्म हो जाएगा. इस बार श्रावण पुरुषोत्तम मास होने की वजह से दो माह तक है, इसलिए चातुर्मास की अवधि पांच माह होग. इस दौरान सभी मांगलिक कार्य बंद रहेंगे. हिंदू धर्म में चातुर्मास का बहुत अधिक महत्व माना जाता है. चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ माह से शुरू होती है और कार्तिक की एकादशी के दिन खत्म होते हैं. योग निद्रा से कब जागेंगे देव ज्योतिषाचार्य ने बताया कि चार माह की निद्रा के बाद कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को जब भगवान विष्णु योग निद्रा से उठते हैं तब फिर से सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं. इस बार चातुर्मास चार माह की बजाय पांच माह तक रहेंगे. देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के अलावा कुछ उपाय करने से जीवन में खुशियां आती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करते हैं. इन चार महीनों में सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. चातुर्मास में ये कार्य हैं वर्जित इस दौरान मुंडन, उपनयन संस्कार, विवाह इत्यादि जैसे महत्वपूर्ण मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं. मान्यता है कि भगवान विष्णु के शयनकाल में मांगलिक कार्य करने से व्यक्ति को उनका आशीर्वाद नहीं प्राप्त होता है, जिस वजह से विघ्न उत्पन्न होने का खतरा बना रहता है. हर साल चातुर्मास सामान्‍य रूप से 4 महीने का होता है, लेकिन इस साल अधिक मास होने के कारण चातुर्मास 5 महीने का होगा. यानी कि इस दिन भगवान विष्णु पूरे 5 महीने के लिए योग निद्रा में चले जाएंगा और फिर इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी कि देवउठनी एकादशी के दिन योग निद्रा से जागेंगे. देवशयनी एकादशी का महत्व ज्योतिषाचार्य ने बताया कि देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व होते हैं. देवशयनी एकादशी भगवान विष्णु के आराम का समय है, यानी एक दिन से भगवान विष्णु चार महीने के लिए शयन करने के लिए चले जाते हैं. इसी के साथ इस दिन से चातुर्मास का आरंभ भी हो जाता है. ऐसे में अगले 4 महीने तक कोई भी शुभ कार्य का आयोजन करना वर्जित माना जाता है. हर साल चातुर्मास सामान्‍य रूप से 4 महीने का होता है, लेकिन इस साल अधिक मास होने के कारण चातुर्मास 5 महीने का होगा, यानी कि इस दिन भगवान विष्णु पूरे 5 महीने के लिए योग निद्रा में चले जाएंगा और फिर इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी कि देवउठनी एकादशी के दिन योग निद्रा से जागेंगे. देवशयनी एकादशी पूजा मुहूर्त ज्योतिषाचार्य ने बताया कि पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का शुभारंभ 29 जून 2023 सुबह 03:18 मिनट पर होगा और इस तिथि का समापन 30 जून सुबह 02:42 मिनट पर हो जाएगा. पूजा तिथि के अनुसार, देवशयनी एकादशी व्रत गुरुवार 29 जून 2023 को रखा जाएगा. इस विशेष दिन पर रवि योग का निर्माण हो रहा है, जो सुबह 05:26 मिनट से दोपहर 04:30 मिनट तक रहेगा. भगवान शिव करेंगे सृष्टि का संचालन ज्योतिषाचार्य ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के विश्राम करने से सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं. इस दौरान सभी तरह के धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, बस विवाह समेत अन्य मांगलिक कार्य नहीं होते हैं. इस दौरान भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करना चाहिए. 5 महीने नहीं बजेगी शहनाई ज्योतिषाचार्य ने बताया कि चतुर्मास का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार चतुर्मास आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होकर कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि तक रहता है. साल 2023 में चतुर्मास 29 जून से शुरू होगा, इस दिन देवशयनी एकादशी भी है. 23 नवंबर 2023 को देवोत्थान एकादशी है। कहा जाता है कि इस दिन से भगवान विष्णु विश्राम काल पूरा करने के बाद क्षीर सागर से निकल कर सृष्टि का संचालन करते हैं. देवशयनी और देवउठनी एकादशी ज्योतिषाचार्य ने बताया कि इस साल 29 जून को देवशयनी एकादशी और 23 नवंबर को देव उठनी एकादशी रहेगी, इसलिए चातुर्मास 148 दिनों का रहेगा। इन दिनों में भगवान विष्णु योग निद्रा में रहेंगे. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इस अवधि में सृष्टि को संभालने और कामकाज संचालन का जिम्मा भगवान भोलेनाथ के पास रहेगा. इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान किए जा सकेंगे पर विवाह समेत मांगलिक काम नहीं होंगे. चतुर्मास में नहीं होते विवाह ज्योतिषाचार्य ने बताया कि भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार कहा जाता है। श्रीहरि के विश्राम अवस्था में चले जाने के बाद मांगलिक कार्य जैसे- विवाह, मुंडन, जनेऊ आदि करना शुभ नहीं माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान मांगलिक कार्य करने से भगवान का आशीर्वाद नहीं प्राप्त होता है। शुभ कार्यों में देवी-देवताओं का आवाह्न किया जाता है। भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, इसलिए वह मांगलिक कार्यों में उपस्थित नहीं हो पाते हैं। जिसके कारण इन महीनों में मांगलिक कार्यों पर रोक होती है। पाताल में रहते हैं भगवान ज्योतिषाचार्य ने बताया कि ग्रंथों के अनुसार पाताल लोक के अधिपति राजा बलि ने भगवान विष्णु से पाताल स्थिति अपने महल में रहने का वरदान मांगा था, इसलिए माना जाता है कि देवशयनी एकादशी से अगले 4 महीने

29 जून को देवशयनी एकादशी, जानें क्यों इस बार 5 माह का होगा चातुर्मास Read More »

मासिक कालाष्टमी व्रत 2023

महत्वपूर्ण जानकारी आषाढ़, कृष्ण अष्टमी, जून 2023 शनिवार, 10 जून 2023 अष्टमी तिथि प्रारंभ : 10 जून 2023 को दोपहर 2 बजकर 02 मिनट पर अष्टमी तिथि समाप्त : 11 जून 2023 को दोपहर 12 बजकर 06 मिनट पर कालाष्टमी व्रत भगवान भैरव के भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है। यह व्रत प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान भैरव के भक्त पूरे दिन उपवास रखते है और वर्ष में सभी कालाष्टमी के दिन उनकी पूजा करते हैं। कालाष्टमी, जिसे काला अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण कालाष्टमी, जिसे कालभैरव जयंती के रूप में जाना जाता है। यह माना जाता है कि भगवान शिव उसी दिन भैरव के रूप में प्रकट हुए थे। कालभैरव जयंती को भैरव अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कालाष्टमी व्रत सप्तमी तीथ पर मनाया जा सकता है। धार्मिक पाठ के अनुसार व्रतराज कालाष्टमी का व्रत उस दिन मनाया जाना चाहिए जब अष्टमी तिथि रात्रि के समय रहती है। कालाष्टमी व्रत तिथि 2023 इस प्रकार है :- कालाष्टमी व्रत दिनांक 2023 इस प्रकार है:- कालाष्टमी व्रत जनवरी में शनिवार, 14 जनवरी 2023माघ, कृष्ण अष्टमी14 जनवरी 2023 शाम 7:23 बजे – 15 जनवरी 2023 शाम 7:45 बजे कालाष्टमी व्रत फरवरी में सोमवार, 13 फरवरी 2023फाल्गुन, कृष्ण अष्टमी13 फरवरी 2023 सुबह 9:46 बजे – 14 फरवरी 2023 सुबह 9:04 बजे मार्च में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 14 मार्च 2023चैत्र, कृष्ण अष्टमी14 मार्च 2023 को रात 8:22 बजे – 15 मार्च 2023 को शाम 6:46 बजे कालाष्टमी व्रत अप्रैल में गुरुवार, 13 अप्रैल 2023वैशाख, कृष्ण अष्टमी13 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 3:44 – 14 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 1:34 बजे मई में कालाष्टमी व्रत शुक्रवार, 12 मई 2023ज्येष्ठ, कृष्ण अष्टमी12 मई 2023 सुबह 9:07 बजे – 13 मई 2023 सुबह 6:51 बजे जून में कालाष्टमी व्रत शनिवार, 10 जून 2023आषाढ़, कृष्ण अष्टमी10 जून 2023 दोपहर 2:02 बजे – 11 जून 2023 दोपहर 12:06 बजे कालाष्टमी व्रत जुलाई में रविवार, 09 जुलाई 2023श्रवण, कृष्ण अष्टमी09 जुलाई 2023 रात 8:00 बजे – 10 जुलाई 2023 शाम 6:44 बजे अगस्त में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 08 अगस्त 2023श्रवण, कृष्ण अष्टमी08 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 4:14 बजे – 09 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 3:52 बजे कालाष्टमी व्रत सितंबर में बुधवार, 06 सितंबर 2023भाद्रपद, कृष्ण अष्टमी06 सितंबर 2023 अपराह्न 3:38 बजे – 07 सितंबर 2023 अपराह्न 4:14 बजे कालाष्टमी व्रत अक्टूबर में शुक्रवार, 06 अक्टूबर 2023अश्विना, कृष्ण अष्टमी06 अक्टूबर 2023 सुबह 6:35 बजे – 07 अक्टूबर 2023 सुबह 8:08 बजे कालाष्टमी व्रत नवंबर में रविवार, 16 नवंबर 2023कार्तिका, कृष्ण अष्टमी05 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 1:00 बजे – 06 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 3:18 बजे दिसंबर में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 05 दिसंबर 2023मार्गशीर्ष, कृष्ण अष्टमी04 दिसंबर 2023 रात 10:00 बजे – 06 दिसंबर 2023 पूर्वाह्न 12:37 बजे

मासिक कालाष्टमी व्रत 2023 Read More »

शनि त्रयोदशी व्रत कथा, पूजा विधि

जब त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन आती है तो वो शनि त्रयोदशी या शनि प्रदोष कहलाती है। सभी त्रयोदशी तिथि में शनि त्रयोदशी त्रयोदशी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। शनि त्रयोदशी का व्रत संतान प्राप्ति के लिए किया जाता है। साथ ही इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शनि त्रयोदशी व्रत कथा प्राचीन समय की बात है। एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था। वह अत्यन्त दयालु था। उसके यहां से कभी कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को जी भरकर दान-दक्षिणा देता था। लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्‍नी स्वयं काफी दुखी थे। दुःख का कारण था- उनके सन्तान का न होना। सन्तानहीनता के कारण दोनों घुले जा रहे थे। एक दिन उन्होंने तीर्थयात्र पर जाने का निश्‍चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सोंप चल पडे। अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति-पत्‍नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की समाधि नही टूटी। मगर सेठ पति-पत्‍नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे। अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे । सेठ पति-पत्‍नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले- ‘मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूं वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं।’ साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि त्रयोदशी व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई हे रुद्रदेव शिव नमस्कार । शिव शंकर जगगुरु नमस्कार ॥हे नीलकंठ सुर नमस्कार । शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार ॥हे उमाकान्त सुधि नमस्कार । उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥ईशान ईश प्रभु नमस्कार । विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार ॥ तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि त्रयोदशी व्रत करने लगे । कालान्तर में सेठ की पत्‍नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया । शनि त्रयोदशी व्रत के प्रभाव से उनके यहां छाया अन्धकार लुप्त हो गया । दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे। शनि त्रयोदशी व्रत विधि शनि त्रयोदशी व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिये। पूरे दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सुर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करना चाहिये। शनि प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है। व्रती को चाहिये की शाम को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें । पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें। यदि व्रती चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। “ऊँ नम: शिवाय ” कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिव जी का ध्यान करें। ध्यान का स्वरूप- करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगलवर्ण के जटाजूटधारी, नीले कण्ठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुण्डल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किये हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान शिव जी हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख समृद्धि प्रदान करें। ध्यान के बाद, शनि त्रयोदशी व्रत की कथा सुने अथवा सुनायें। कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार “ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा ” मंत्र से आहुति दें । उसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें। सभी को प्रसाद वितरित करें । उसके बाद भोजन करें । भोजन में केवल मीठी सामग्रियों का उपयोग करें।

शनि त्रयोदशी व्रत कथा, पूजा विधि Read More »

संकष्टी चतुर्थी का व्रत, जानिए पूजा विधि और महत्व

हिन्दू धर्म में संकष्टी चतुर्थी को प्रमुख त्यौहार के रूप में माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है। भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए उनकी एक खास पूजा-व्रत का विधान बताया गया है जिसे संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। इस लेख में हम आपको संकष्टी चतुर्थी के महत्व और इस दिन की जाने वाली पूजा अर्चना की संपूर्ण विधि के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं। आइये जानते हैं कि आखिर हिन्दू धर्म में संकष्टी चतुर्थी को क्यों महत्वपूर्ण माना गया है। क्यों मनाई जाती है संकष्टी चतुर्थी? यह पौराणिक कथा जानकर रह जाएंगे हैरान पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह में दो चतुर्थी तिथि पड़ती है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी संकष्टी चतुर्थी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी विनायक चतुर्थी कहलाती है। दोनों ही तिथियां भगवान गणेश को समर्पित हैं। इस दिन विघ्नहर्ता गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है। आषाढ़ माह की शुरुआत हो चुकी है और इस माह के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी को कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी व्रत इस बार 07 जून 2023, बुधवार के दिन रखा जाएगा। इस दिन विधि-विधान से गणेश जी की पूजा करने से जीवन में आ रही समस्याएं दूर हो जाती हैं। चलिए जानते हैं कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि और महत्व कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी तिथि और मुहूर्त  पंचांग के अनुसार आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 06 जून मंगलवार को देर रात 12 बजकर 50 मिनट से प्रारंभ हो रही है। यह तिथि अगले दिन 7 जून बुधवार को रात 09 बजकर 50 मिनट पर खत्म होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत 7 जून बुधवार को रखा जाएगा। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी चंद्रोदय समय इस साल कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन चंद्रोदय का समय प्राप्त नहीं है, क्योंकि इस दिन चंद्रमा रात 10 बजकर 50 मिनट पर उदय होगा। जबकि चतुर्थी तिथि 07 जून को रात 09 बजकर 50 मिनट पर ही समाप्त हो रही है। इसके बाद पंचमी तिथि शुरू हो जाएगी। इसलिए आपको चतुर्थी खत्म होने से पहले पूजा कर लेनी चाहिए। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातः काल उठकर स्नानादि करने के पश्चात पूजा स्थान की साफ-सफाई करें और गंगाजल छिड़कें।  फिर भगवान गणेश को वस्त्र पहनाएं और मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। गणेश जी का तिलक करें  और पुष्प अर्पित करें।  इसके बाद भगवान गणेश को 21 दूर्वा की गांठ अर्पित करें।  गणेश जी को घी के मोतीचूर के लड्डू या मोदक का भोग लगाएं।  पूजा समाप्त होने के बाद आरती करें और पूजन में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा मांगे। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी महत्व आषाढ़ माह का कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी का व्रत सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्ति के लिए अचूक माना गया है। जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखता है उसकी संतान संबंधी समस्याएं दूर होती हैं। साथ ही धन और कर्ज संबंधी समस्याओं का भी समाधान होता है। 

संकष्टी चतुर्थी का व्रत, जानिए पूजा विधि और महत्व Read More »