EKADASHI

Indira Ekadashi 2023: कब है इंदिरा एकादशी व्रत? जानिए इसका महत्व और शुभ मुहूर्त

इंदिरा एकादशी श्राद्ध पक्ष की एकादशी है और इस एकादशी में भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है। इस व्रत के धार्मिक कर्म दशमी से ही शुरू हो जाते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार, अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को इंदिरा एकादशी व्रत रखा जाता है। इस साल ये एकादशी मंगलवार, 10 अक्टूबर को पड़ रही है। हिंदू धर्म में इस व्रत का काफी अधिक महत्व है। पितृ पक्ष के दौरान पड़ने वाली इंदिरा एकादशी को पितरों के उद्धार के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। ऐसा माना जाता है की इस व्रत के करने से हमारे पितरों के पाप धुलते हैं और उन्हें यम लोक से मुक्ति मिलती है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। तिथि एवं मुहूर्त एकादशी की तिथि 9 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 36 मिनट से शुरू होगी और 10 अक्टूबर को दोपहर 3 बजकर 8 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार एकादशी का व्रत 10 अक्टूबर को रखा जाएगा। 11 अक्टूबर को पारण होगा, जिसका मुहूर्त सुबह 06:19 बजे से 08:38 बजे तक है। व्रतियों को इस दो घंटों में पारण कर लेना चाहिए। कैसे करें व्रत? यह श्राद्ध पक्ष की एकादशी है और इस एकादशी में भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है। इस व्रत के धार्मिक कर्म दशमी से ही शुरू हो जाते हैं। दशमी के दिन नदी में तर्पण आदि कर ब्राह्मण भोज कराएं और उसके बाद स्वयं भी भोजन ग्रहण करें। दशमी पर सूर्यास्त के बाद भोजन न करें। एकादशी के दिन प्रात:काल उठकर व्रत का संकल्प लें और भगवान विष्णु का पूजन करने के बाद दोपहर में पुन: श्राद्ध-तर्पण कर ब्राह्मणों को भोजन कराएं। अगले दिन यानी द्वादशी को पूजन के बाद दान-दक्षिणा दें और पारण करें। इंदिरा एकादशी व्रत कथा जानिए इंदिरा एकादशी की व्रत कथा में क्या कहा गया है।  शास्त्रों के अनुसार महिष्मतिपुरी के राजा इन्द्रसेन एक धार्मिक व्यक्ति थे.वे हमेशा ही अपनी प्रजा के भले के बारे में सोचते थे और भले का कार्य ही करते थे। इसके साथ साथ उनकी ईश्वर में भी अटूट आस्था एवं श्रद्धा थी ,एक बार नारद मुनि भ्रमण  करते हुए उनके दरबार में पधारे ,राजा ने उन्हें देखते ही हाथ जोड़ कर उनका स्वागत किया और उनका पूजन किया।  राजा ने महर्षि के आने की वजह पूछी । तो नारद मुनि ने जवाब दिया ,हे राजन ! मेरे वचनो को ध्यान से सुनो, मैं एक समय ब्रह्म लोक से याम लोक गया। मैंने यमराज से सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की,उसी यमराज की सभा में धर्मात्मा एकादशी व्रत को भांग होने की वजह को देखा,उन्होंने संदेशा दिया पूर्व जन्म में कोई विघ्न हो जाने के कारण मै यमराज के निकट रहा ,इसीलिए पुत्र इंदिरा एकादशी – Indira Ekadashi का व्रत करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति होगी और मुझे मोक्ष भी मिल जायेगा।  नारद की बात को सुन कर राजा ने अपने बांधवो तथा दासों से साथ इस व्रत को किया जिसके पुण्य प्रभाव से राजा के पिता विष्णु लोक को गए। राजा इन्द्रसेन भी एकादशी का व्रत कर अपने पुत्र को बैठा कर स्वर्ग लोक गए ,राजा इन्द्रसेन के नाम पर ही इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी पड़ा।  इंदिरा एकादशी का महत्व पितृ पक्ष  में पड़ने वाकई इस एकादशी का एक विशिष्ठ प्रकार का महत्त्व मन जाता है यह एकादशी का व्रत अश्विनी मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है ऐसा माना जाता है की इस व्रत के करने से हमरे पितरो को उनके पाप कर्मो से मुक्ति मिलती है और उन्हें यम लोक से मुक्ति मिलती है और स्वर्ग की प्राप्ति होती है ,इस कृत के बारे में खुद भगवन श्री कृष्ण ने बतया की यह  व्रत धर्मराज युधिष्ठिर को बताया जाता है  इंदिरा एकादशी की पूजा विधि एकादशी व्रत में दिन में सिर्फ एक बार ही भोजन करना होता है  इस व्रत के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है  व्रत करने के लिया स्नानं कर खुद को व्रत के लिए संकापित करे  विधि पूर्वक श्राद्ध सम्पन करे एवं प्रत्येक ब्राह्मण को भोजन व दक्षिणा प्रदान करे  पितरो के नाम से दान दिया हुआ अन्न पिंड गाय को खिलाएं  भगवन विष्णु को धुप ,फूल,मिठाई फल चढ़ाएं  एकादशी के अगले दिन द्वादशी के दिन पूजा कर ब्राह्मणो को भोजन करवाएं  और अपने परिवार के साथ भोजन करते समय मौन रहे। 

Indira Ekadashi 2023: कब है इंदिरा एकादशी व्रत? जानिए इसका महत्व और शुभ मुहूर्त Read More »

Chandra Darshan 2023: आज कब और कैसे करें चंद्र दर्शन, जानें चंद्रमा की पूजा विधि और उपाय

ज्येष्ठ मास की अमावस्या के बाद चंद्र देवता के दर्शन का सौभाग्य कब प्राप्त होगा और क्या है इसकी पूजा विधि, मंत्र और धार्मिक महत्व, विस्तार से जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख. सनातन परंपरा में किसी भी मास की अमावस्या के बाद होने वाले चंद्र दर्शन का बहुत ज्यादा धार्मिक महत्व माना गया है. यही कारण है कि जीवन में शुभता और सौभाग्य की कामना लिए लोग इस दिन का बहुत बेसब्री से इंतजार करते हैं. ज्योतिष में जिस चंद्रमा को मन का कारक माना गया है, उसका दर्शन महीने की 20 तारीख को होगा. चंद्र दर्शन करना किस समय बहुत ज्यादा शुभ रहता है? चंद्र दर्शन की पूजा विधि और मंत्र क्या है? आइए इन सभी बातों के साथ चंद्र देवता की पूजा का पुण्य लाभ दिलाने वाला महाउपाय को विस्तार से जानते हैं. Vishwakarma Jayanti 2023 Date:  कब है विश्वकर्मा जयंती, जानें तारीख और पूजा का शुभ मुहूर्त चंद्र दर्शन की पूजा विधि हिंदू मान्यता के अनुसार चंद्र दर्शन करने के लिए व्यक्ति को शाम के समय तन और मन से पवित्र होकर इस पूजा को करना चाहिए. यदि संभव हो तो चंद्र दर्शन करते समय व्यक्ति को सफेद कपड़े पहनना चाहिए. चंद्र दर्शन की पूजा में सबसे पहले दूध और उसके बाद शुद्ध जल चंद्र देवता को अर्पित करें. इसके बाद उन्हें खीर का भोग लगाकर धूप-दीप दिखाएं और चंद्र देवता के मंत्र ‘ॐ सों सोमाय नम:’ अथवा ‘ॐ श्रीं श्रीं चन्द्रमसे नम:’का जप करें. मान्यता है कि यह पूजा और मंत्र जप पति और पत्नी दोनों साथ मिलकर करें तो वैवाहिक जीवन सुखमय बना रहता है. इसी तरह चंद्र दर्शन से व्यक्ति मन से जुड़ी चिंताएं दूर होती है और घर-परिवार में सुख-सौभाग्य बना रहता है. चंद्र दर्शन का महत्व चंद्र ग्रह को ज्ञान, बुद्धि और मन का स्वामी ग्रह माना जाता है. चंद्र दर्शन के दिन चंद्रमा के दर्शन से विशेष लाभ मिलते हैं. लोग भगवान की कृपा पाने के लिए कठोर व्रत और तपस्या करते हैं. चंद्र दर्शन और पूजा से भक्तों को सौभाग्य और समृद्धि प्राप्त होती है. जीवन से नकारात्मकता को कम करने के लिए चंद्र यंत्र की पूजा करनी चाहिए. ऐसा करने से लाभ मिलता है. इस दिन ब्रह्मणों को दान करने से भी लाभ मिलता है.

Chandra Darshan 2023: आज कब और कैसे करें चंद्र दर्शन, जानें चंद्रमा की पूजा विधि और उपाय Read More »

करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए यहां

प्रत्येक वर्ष कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन करवा चौथ का व्रत रखा जाता है। करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन सुहागिन महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रहने के बाद शाम को चांद देखकर व्रत  का पारण करती हैं। इस बार करवा चौथ का व्रत 13 अक्टूबर 2022 को रखा जाएगा। इस दिन सोलह श्रृंगार करने का बहुत महत्व माना जाता है। महिलाएं हाथों में मेहंदी रचाती हैं, सोलह श्रृंगार करके पूजा करती हैं। हिंदू धर्म में करवा चौथ का व्रत सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। इसलिए कहा जाता है कि इस दिन व्रत रखने वाली महिलाओं को कुछ काम को करने से बचना चाहिए, क्योंकि इसे शुभ नहीं माना जाता है। चलिए जानते हैं उन कार्यों के बारे में करवा चौथ व्रत के दौरान क्या करें? करवा चौथ के दिन पूजा के समय मां पार्वती को श्रृंगार का सामान अर्पित करें। मान्यता है कि ऐसा करने से मां पार्वती प्रसन्न होती हैं और आपका दांपत्य जीवन खुशियों से भर देती हैं। करवा चौथ के दिन लाल रंग के ही कपड़े पहनें, क्योंकि लाल रंग सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। करवा चौथ की पूजा से पहले और बाद में भजन-कीर्तन जरूर करें।  करवा चौथ व्रत के दिन क्या न करें? करवा चौथ व्रत के दौरान दिन में न सोएं। व्रत के दौरान झूठ बोलने से बचें।  सुहागिन महिलाएं इस दिन अपनी श्रृंगार की चीजें किसी को भी न दें।  करवा चौथ के दिन व्रत रखने वाली महिलाओं को किसी भी नुकीली चीज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। करवा चौथ के दिन किसी भी महिला को अपनी सास, मां या फिर दूसरी महिला का अपमान नहीं करना चाहिए।  इस दिन महिलाएं काले, नीले और भूरे रंग के कपड़े पहन कर पूजा न करें। नव विवाहिता के हाथों पर नहीं रचती मेंहदी करवा चौथ पर्व पर यहां सबसे ज्यादा करवा चौथ न मनाने की टीस नव विवाहिता के मन में होती है। करवा चौथ पर्व पर नव विवाहिता न हाथों में मेंहदी रचाती हैं और न ही श्रृंगार करती हैं। नव विवाहिता रेखा ने बताया कि उसका पहला करवा चौथ है मन में बहुत आस थी। लेकिन जब ससुराल आई तब पता चला कि करवा चौथ का व्रत नहीं रखते। यह सुनकर मन में उदासी छा गयी। इस त्योहार पर हाथों में मेंहदी नहीं लगाते न शृंगार करते। किसने रखा था सबसे पहले करवा चौथ का व्रत? जानें पौराणिक कथा सती का बनाया मंदिर बघा मोहल्ले में हो रही अनहोनी रोकने के लिए गांव के बुजुर्गों ने निर्णय लिया कि मोहल्ले में सती का मंदिर बनाया जाये और उनकी पूजा अर्चना कर माफ़ी मांगी जाये। मोहल्ले में सती का मंदिर बनाया गया और शुरू कर दी पूजा अर्चना। जिसका नतीजा यह हुआ कि मोहल्ले में हो रही अनहोनी घटनाओं में कमी आई। ग्रामीणों ने सती का श्राप मानते हुए करवा चौथ पर सुहागिन महिलाओं के व्रत न रखने और उस दिन शृंगार न करने की बात कही। इसके अलावा करवा चौथ पर सती की पूजा करने का निर्णय लिया। 250 वर्षों से नहीं मनाया जाता करवा चौथ सुरीर कस्वे के बघा मोहल्ले में 250 वर्षों से सती के श्राप के कारण सुहागिन महिला करवा चौथ का व्रत नहीं रखतीं। गांव की वृद्ध महिला सरोज ने बताया कि पहले सती के श्राप को अनदेखा कर सुहागिन महिला व्रत रखती लेकिन उनका सुहाग एक वर्ष तक जीवित नहीं रहे। मोहल्ले में अनहोनी होने लगी। जिसके बाद महिलाओं ने शृंगार बंद कर दिया और करवा चौथ का व्रत नहीं रहने लगी। यह है सती का श्राप सुरीर कस्बे में करवा चौथ का पर्व क्यों नहीं मनाया जाता तो पता चला कि इसका कारण सती का श्राप है। करीब ढाई सौ वर्ष पूर्व राम नगला का एक युवक अपनी पत्नी को भैंसा गाड़ी से विदा कराकर लौट रहे थे। सुरीर कस्वे के बघा मोहल्ले में जब पहुंचे तो वहां के लोगों ने भैंसा को अपना बताते हुए युवक से झगड़ा करना शुरू कर दिया। वाद विवाद के दौरान लाठी डंडे चले जिसमें युवक की मौत हो गयी। जिसके बाद युवक की पत्नी ने मोहल्ले वालों को श्राप दिया कि यहां की महिलाएं कभी शृंगार नहीं करेंगी और न ही करवा चौथ का व्रत रखेंगी। इसके बाद विवाहिता पति की चिता पर लेट गयीं और सती हो गयी। चांद तो निकलेगा पर नहीं खिलेगी चांदनी गुरुवार को करवा चौथ पर चांद निकलेगा महिलाएं अर्घ देंगी और कामना करेंगी अपने पति की लम्बी आयु की। लेकिन मथुरा के सुरीर में महिलाओं की चांद को अर्घ देने की ख्वाशिस अधूरी है। यहां तो चांद तो निकलेगा लेकिन गांव की परंपरा के बंधन में बंधी चांदनी पर मायूसी ही छाई रहेगी। नव विवाहिताएं गांव की इस रूढ़िवादी परम्परा के कारण बिना शृंगार के रहेंगी। सुरीर में नहीं मनातीं महिलाएं करवा चौथ मथुरा से करीब 40 किलोमीटर दूर मांट तहसील में स्थित है क़स्बा सुरीर। यहां करवा चौथ पर्व पर अजीब सा सन्नाटा पसर जाता है,महिलाएं अनजाने डर से सहमी नजर आती हैं। यहां के बघा मोहल्ले में करवा चौथ पर महिलाएं न व्रत रखती हैं और न ही शृंगार करती हैं। नव विवाहिता हो या फिर शादी के 50 वर्ष गुजार चुकीं महिलाएं। यहां सुहागिन महिला छोटे से मंदिर में बने सती के मंदिर में पूजा करती हैं और उनसे मांगती हैं अपने जीवन साथी की लंबी उम्र की कामना।

करवा चौथ के दिन सुहागिन महिलाएं क्या करें, क्या नहीं? जानिए यहां Read More »

इस दिन रखा जाएगा भौम प्रदोष व्रत, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व

हर माह में दो बार प्रदोष व्रत रखा जाता है। इस तरह से साल में कुल 24 प्रदोष व्रत पड़ते हैं। शिव भक्तों के लिए यह व्रत बहुत खास माना जाता है। इस दिन भगवान शंकर और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है। यह व्रत मां पार्वती और भगवान शिव के व्रतों में सर्वोत्तम माना गया है। मान्यता है जो भक्त पूरी श्रद्धा से भगवान शिव का यह प्रदोष व्रत रखता है, उसके जीवन के समस्त कष्टों का निवारण होता है। इस समय भाद्रपद का महीना चल रहा है और इस माह का पहला प्रदोष व्रत 12 सितंबर 2023, मंगलवार के दिन रखा जा रहा है, जिसे भौम प्रदोष व्रत कहा जाएगा। ऐसे में चलिए जानते है भौम प्रदोष व्रत की पूजा विधि और शुभ मुहूर्त भौम प्रदोष व्रत 2023 तिथिभाद्रपद माह का पहला प्रदोष व्रत 12 सितंबर 2023, मंगलवार को रखा जा रहा है। इसकी शुरुआत 11 सितंबर 2023 को रात 11 बजकर 52 मिनट पर शुरू हो रही है और समापन 13 सितंबर 2023 को प्रात: 02 बजकर 21 मिनट पर होगा। नवरात्रि की शुरूआत के पीछे की पौराणिक कथा क्या है भौम प्रदोष व्रत 2023 पूजा का मुहूर्तभौम प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 06 बजकर 30 मिनट से रात 08 बजकर 49 मिनट तक है। प्रदोष व्रत की पूजा सामग्रीपांच फल, पांच मेवा, दक्षिणा, पूजा के बर्तन, कुश से बने आसन, दही, शुद्ध देशी घी, शहद, गंगाजल, धूप दीप, रोली, मौली, पांच मिष्ठान्न, बिल्वपत्र, धतूरा, भांग, तुलसी दल, मंदार पुष्प, गाय का कच्चा दूध, कपूर, चंदन, शिव व माता पार्वती के श्रृंगार की सामग्री आदि भौम प्रदोष व्रत की पूजा विधि भौम प्रदोष व्रत दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर लें। इसके उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके उपरांत घर के मंदिर में दीप जलाएं और व्रत लेने का संकल्प लें। फिर सायं काल में पुनः मंदिर में दीप जलाएं। इसके उपरांत सर्वप्रथम भगवान भोलेनाथ का गंगा जल से अभिषेक करें, उन्हें पुष्प अर्पित करें। भौम प्रदोष व्रत के दिन भगवान भोलेनाथ के साथ माता पार्वती और भगवान गणेश की भी आराधना करें। भगवान शिव को पांच फल, पंच मेवा और पंच मिष्ठान का भोग लगाएं। आखिर में भगवान शिव की आरती करें। संभव हो तो पूजन और अभिषेक के दौरान भगवान शिव के पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय का जाप करते रहें। भौम प्रदोष व्रत का महत्व भाद्रपद में पड़ने वाले प्रदोष व्रत का खास महत्व होता है. भाद्रपद मास भगवान विष्णु को समर्पित है. ऐसे में इस माह में प्रदोष व्रत करने से भोलेनाथ के साथ-साथ भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है. वहीं भौम प्रदोष व्रत में भगवान शंकर के साथ हनुमान जी की पूजा करना भी बेहद शुभ माना जाता है. दरअसल हनुमान जी को भगवान शिव का रुद्रावतार माना जाता है. ऐसे में भौम प्रदोष व्रत के दिन हनुमान जी और भगवान शिव की पूजा करने से हर कष्ट से मुक्ति मिलती है. कुंडली में मांगलिक दोष वाले लोगों के लिए ये व्रत काफी लाभदायक है. इसके अलावा मंगल ग्रह शांति के लिए भी ये व्रत काफी शुभ है. इस व्रत को करने से बीमारियों से भी छुटकारा मिलता है. पूजा विधि भौम प्रदोष व्रत के दिन सुबह उठकर स्नान करें और हनुमान जी की विधि विधान से पूजा करें. इसके बाद मंदिर में जाकर चोला चढ़ाएं. प्रदोष व्रत की पूजा शाम को होती है, ऐसे में शाम को एक बार फिर नहाएं और भगवान शिव की पूजा करें. शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक करें और फूल अर्पित करें. भगवान शिव के साथ-साथ मां पार्वती और भगवान गणेश की भी पूजा करें.

इस दिन रखा जाएगा भौम प्रदोष व्रत, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व Read More »

अजा एकादशी पर बन रहे हैं 2 शुभ संयोग, जानें मुहूर्त, महत्व, पारण का समय और पूजा विधि

हिंदू शास्त्रों के अनुसार हर व्रत का अपना महत्व और लाभ होता है। ऐसा माना जाता है कि व्रत रखने से भगवान का दिव्य आशीर्वाद मिलता है और भक्तों पर सुख और समृद्धि की वर्षा होती है। सभी व्रतों में एकादशी व्रत का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। हर वर्ष 24 एकादशियां  होती हैं। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी या 11वें दिन को अजा एकादशी मनाई जाती है। इस बार 10 सितंबर, रविवार को अजा एकादशी पड़ रही है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और उन्हें समर्पित व्रत रखा जाता है। इस व्रत को करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है और सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। दृक पंचांग के अनुसार, इस साल अजा एकादशी के दिन 2 खास संयोग बनने जा रहा है। आइए जानते हैं कि अजा एकादशी का व्रत कब रखा जाएगा? व्रत के नियम क्या हैं और इसके लिए शुभ मुहूर्त क्या है। किसने रखा था सबसे पहले करवा चौथ का व्रत? जानें पौराणिक कथा अजा एकादशी 2023 कब है?साल 2023 में अजा एकादशी व्रत 10 सितंबर, रविवार को है।एकादशी तिथि प्रारंभ: 09 सितंबर 2023 को शाम 07:17 बजे सेएकादशी तिथि समाप्त: 10 सितंबर 2023 को रात 09:28 बजेपारण का समय 11 सितंबर: प्रातः 06:04 बजे से प्रातः 08:33 बजे तक अजा एकादशी 2023 पर बन रहे ये 2 शुभ संयोगइस साल अजा एकादशी के दिन दो शुभ संयोग बन रहे हैं। पहला रवि पुष्य योग और दूसरा सर्वार्थसिद्धि योग है। रवि पुष्य योग: सायं 05: 06 मिनट से अगले दिन  प्रातः  06:0 4 मिनट तक सर्वार्थ सिद्धि योग: सायं 05: 06 मिनट से 11 सितंबर प्रातः 06 बजकर 04 मिनट तक  अजा एकादशी व्रत का महत्व और लाभअजा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है और इससे उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस व्रत को करने से भक्तों को भूत-प्रेतों के भय से मुक्ति मिलती है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि इस दिन अजा एकादशी व्रत कथा सुनने और व्रत रखने से अश्वमेघ यज्ञ करने से मिलने वाले लाभ के समान लाभ मिलता है। अजा एकादशी पूजा विधि अजा एकादशी एक ऐसा त्योहार है जिसमें व्रत नियम और अनुष्ठान के साथ रखा जाता है। एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले स्नान कर लें। पूजा स्थल को साफ करें और भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करें। पूरी श्रद्धा से व्रत करने का संकल्प लें। कुछ पूजा सामग्री जैसे फूल, नारियल, सुपारी, फल, लौंग, अगरबत्ती, घी, पंचामृत भोग, तेल का दीपक तुलसी, दाल, चंदन आदि रखना जरूरी है। फिर भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएं। सुबह-शाम आरती करें। अजा एकादशी अत्यंत फलदायी मानी गई है इसलिए इसकी व्रत कथा पढ़ें। कुछ भक्त पूरी रात जागते हैं और भगवान को समर्पित भक्ति गीत, भजन और कीर्तन गाते हैं। द्वादशी के दिन सुबह गरीबों और ब्राह्मणों को भोजन कराएं और दक्षिणा दें। इसके बाद फल कहकर व्रत का पारण करें।  अजा एकादशी व्रत कथा ऐसा कहा जाता है कि राजा हरिश्चन्द्र अपनी सत्यनिष्ठा और ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। एक बार देवताओं ने इनकी परीक्षा लेने की योजना बनाई। राजा ने स्वप्न में देखा कि ऋषि विश्वामित्र को उन्होंने अपना राजपाट दान कर दिया है। जब अगले दिन राजा हरिश्चन्द्र विश्वामित्र को अपना समस्त राज-पाठ को सौंप कर जाने लगे तो विश्वामित्र ने राजा हरिश्चन्द्र से दक्षिणा स्वरुप 500 स्वर्ण मुद्राएं दान में मांगी। राजा ने उनसे कहा कि पांच सौ क्या, आप जितनी चाहे स्वर्ण मुद्राएं ले लीजिए। इस पर विश्वामित्र हँसने लगे और राजा को याद दिलाया कि राजपाट के साथ राज्य का कोष भी वे दान कर चुके हैं और दान की हुई वस्तु को दोबारा दान नहीं की जाती। तब राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेचकर स्वर्ण मुद्राएं हासिल की, लेकिन वो भी पांच सौ नहीं हो पाईं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को भी बेच डाला और सोने की सभी मुद्राएं विश्वामित्र को दान में दे दीं। राजा हरिश्चंद्र ने खुद को जहां बेचा था वह श्मशान का चांडाल था। चांडाल ने राजा हरिश्चन्द्र को श्मशान भूमि में दाह संस्कार के लिए कर वसूली का काम दे दिया। एक दिन राजा हरिश्चंद्र ने एकादशी का व्रत रखा हुआ था। आधी रात का समय था और राजा श्मशान के द्वार पर पहरा दे रहे थे। बेहद अंधेरा था, इतने में ही वहां एक लाचार और निर्धन स्त्री बिलखते हुए पहुंची जिसके हाथ में अपने पुत्र का शव था। राजा हरिश्चन्द्र ने अपने धर्म का पालन करते हुए पत्नी से भी पुत्र के दाह संस्कार हेतु कर मांगा। पत्नी के पास कर चुकाने के लिए धन नहीं था इसलिए उसने अपनी साड़ी का आधा हिस्सा फाड़कर राजा का दे दिया। उसी समय भगवान प्रकट हुए और उन्होंने राजा से कहा, “हे हरिश्चंद्र, इस संसार में तुमने सत्य को जीवन में धारण करने का उच्चतम आदर्श स्थापित किया है। तुम्हारी कर्त्तव्यनिष्ठा महान है, तुम इतिहास में अमर रहोगे।” इतने में ही राजा का बेटा रोहिताश जीवित हो उठा। ईश्वर की अनुमति से विश्वामित्र ने भी हरिश्चंद्र का राजपाट उन्हें वापस लौटा दिया।

अजा एकादशी पर बन रहे हैं 2 शुभ संयोग, जानें मुहूर्त, महत्व, पारण का समय और पूजा विधि Read More »

2023: जानिए कब है गोगा नवमी, इस दिन किस चीज का लगाया जाता है भोग

मान्यता है कि संतान सुख की प्राप्ति के लिए और घर में सुख समृद्धि लाने के लिए गोगा नवमी का दिन मनाया जाता है. सावन खत्म होने के साथ ही भाद्रपद माह की शुरुआत हो जाती है और भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि को गोगा नवमी मनाई जाती है. गोगा नवमी वाल्मीकि समाज का एक प्रसिद्ध त्योहार है, इस दिन वाल्मीकि समाज के आराध्य गोगा देव यानी की जाहरवीर का जन्मोत्सव होता है. इस दिन विधि विधान से पूजा अर्चना की जाती है और नागों की पूजा भी होती है. इस दिन लोग व्रत रखकर गोगा देव से अपनी संतान की लंबी उम्र की कामना करते हैं, उसकी सुख समृद्धि और संतान सुख प्राप्ति के लिए भी यह व्रत किया जाता है. इस साल कब मनाई जाएगी गोगा नवमी 2023  अगर आप गोगा नवमी की पूजा करना चाहते हैं या व्रत रखना चाहते हैं तो इस साल गोगा नवमी 8 सितंबर 2023 को आएगी. गोगा नवमी का शुभ मुहूर्त सुबह 7:36 से सुबह 10:45 तक रहेगा, इसके बाद दोपहर का मुहूर्त 12:19 से 1:53 तक रहेगा, तो वहीं शाम की पूजा के लिए 5:01 से 6:35 तक शुभ मुहूर्त है. गोगा नवमी का महत्व भारत में खास तौर पर राजस्थान में गोगा नवमी धूमधाम से मनाई जाती है. इसके अलावा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी इसका खासा प्रभाव देखा जाता है. कहा जाता है कि गोगा देव को सांपों का देव भी कहा जाता है और इनकी पूजा करने से निसंतान दंपत्ति को संतान सुख की प्राप्ति होती है. इतना ही नहीं ये भी माना जाता है कि गोगादेव के पास जहरीले से जहरीले सांपों को वश में करने की शक्ति होती है और उनकी पूजा करने से सर्प दोष और सांपों के डसने का डर भी दूर हो सकता है. गोगा नवमी पूजा विधि और भोग गोगा नवमी की पूजा करने के लिए सुबह सबसे पहले उठकर स्नान करें, मिट्टी से गोगादेव की मूर्ति बनाएं या फिर उनकी तस्वीर की पूजा करें. उन्हें चावल, रोली, वस्त्र आदि अर्पित करें. गोगा देव के भोग की बात की जाए तो उन्हें खीर, चूरमा के लड्डू या गुलगुला का भोग लगाया जाता है. इतना ही नहीं गोगा नवमी के दिन घोड़े को चने की दाल खिलाने की परंपरा भी है. गुलगुला बनाने के लिए आटे के साथ गड़ को मिलाकर गूंद लें और तेल में छोटा-छोटा गुलगुला तल लें.  नाग पूजा और उपचार गोगा जी को विशेष रूप से साँप के काटने और संबंधित बीमारियों से बचाने वाले के रूप में पूजा जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में सांपों को दिव्य प्राणी माना जाता है, और गोगा जी की सांप के काटने को नियंत्रित करने और ठीक करने की क्षमता स्थानीय परंपराओं में उनके महत्व को मजबूत करती है। भक्त सांप से संबंधित खतरों से बचने के लिए उनका आशीर्वाद मांगते हैं। सांस्कृतिक उत्सव गोगा नवमी धार्मिक अनुष्ठानों तक ही सीमित नहीं है; इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम भी शामिल हैं। लोक संगीत, नृत्य और प्रदर्शन गोगा जी के जीवन और किंवदंतियों को दर्शाते हैं, जो उत्सव में एक जीवंत सांस्कृतिक आयाम जोड़ते हैं। श्रीकृष्ण की 16108 पत्नियाँ क्यों थीं?’इसके पीछे की सच्ची कहानी भक्तिपूर्ण प्रसाद भक्त गोगा जी की मूर्ति या चित्र पर दूध, मिठाई और बेसन चढ़ाते हैं। अनुष्ठानिक चढ़ावे श्रद्धा का प्रतीक हैं और सुरक्षा, कल्याण और बीमारियों के निवारण के लिए उनका आशीर्वाद मांगते हैं। आध्यात्मिक महत्व गोगा नवमी उस वीरता और करुणा की याद के रूप में आध्यात्मिक महत्व रखती है जो गोगा जी के चरित्र के केंद्र में हैं। यह व्यक्तियों को बहादुरी, निस्वार्थता और मानवता की सेवा के गुणों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। पूजा विधान इस दिन दीवार पर गेरू से पोतकर दूध में कोयला पीसकर चाकोर घर बनाकर उसमें पांच सर्व बनाते हैं। इसके बाद इन सर्पों पर जल, कच्चा दूध, रोली-चावल, बाजरा, आटा, घी, चीनी मिलाकर चढ़ाना चाहिए और पण्डित को दक्षिणा देनी चाहिए। गुगा मारी मंदिरों में इस दिन विभिन्न पूजाओं और जुलूसों का आयोजन किया जाता है। गोगा नवमी पर, हिंदू भक्त किसी भी चोट या नुकसान से सुरक्षा के आश्वासन के रूप में भगवान गोगा को राखी या रक्षा स्तोत्र भी बांधते हैं। इस व्रत के करने से स्त्रियाँ सौभाग्यवती होती हैं। पति की विपत्तियों से रक्षा होती है और मनोकामना पूरी होती है। बहने भाइयों को टीका लगाती हैं तथा मिठाई खिलाती हैं। बदेल में भाई यथाशक्ति बहनों को रुपया देते हैं। गोगा नवमी क्या है और गोगा जी कौन हैं? गोगा नवमी एक हिंदू त्योहार है जो योद्धा-संत गोगा जी की याद में मनाया जाता है, जिन्हें गुग्गा जी या जाहर वीर गोगा के नाम से भी जाना जाता है। गोगा जी को उनकी बहादुरी, करुणा और लोगों को सांप के काटने और बीमारियों से बचाने की पौराणिक क्षमता के लिए सम्मानित किया जाता है। गोगा नवमी कब मनाई जाती है और इसमें क्या अनुष्ठान शामिल हैं? गोगा नवमी हिंदू माह भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) के शुक्ल पक्ष (शुक्ल पक्ष) के नौवें दिन (नवमी) को मनाई जाती है। भक्त गोगा जी के मंदिरों में इकट्ठा होते हैं, पूजा-अर्चना, फूल और भोजन चढ़ाते हैं। वे गोगा जी के भजन भी सुनाते हैं और उनके पौराणिक कार्यों को दोहराते हैं। गोगा नवमी के दौरान किस प्रकार का प्रसाद चढ़ाया जाता है? भक्त गोगा जी की मूर्ति या चित्र पर दूध, मिठाई और बेसन चढ़ाते हैं। ये प्रसाद श्रद्धा का प्रतीक हैं और सुरक्षा, कल्याण और बीमारियों के निवारण के लिए उनका आशीर्वाद मांगते हैं।

2023: जानिए कब है गोगा नवमी, इस दिन किस चीज का लगाया जाता है भोग Read More »

बलदेव षष्ठी या हल छठ आज या कल? नोट करें पूजन साम्रगी, इस सरल विधि से करें पूजा, जानें महत्व

हिंदू पंचांग के अनुसार, बलदेव षष्ठी या हल छठ की शुरुआत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि यानी आज (4 सितंबर 2023) शाम 04:41 बजे हो जाएगी. वहीं, इसका समापन अगले दिन 5 सितंबर 2023 को दोपहर 03:46 बजे होगा. हर छठ या हल छठ व्रत सनातन धर्म में पुत्रवती स्त्रियों द्वारा रखा जाता है. यह पर्व मुख्य तौर पर उत्तर भारत में मनाया जाता है. इस व्रत में महिलाएं अपने पुत्र की लंबी आयु के लिए भगवान गणेश और माता पार्वती से प्रार्थना करती है. बलराम जयंती के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला हल छठ किसानों के लिए विशेष महत्व रखता है. बलदेव भगवान कृष्ण के बड़े भाई थे, जिनका प्रिय शास्त्र हल था. इन्हें हलधर के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन किसानों और बैलों की पूजा की जाती है. बलदेव षष्ठी या हल छठ का त्योहार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है पूजन सामग्री 1. भैंस का दूध, घी, दही गोबर.2. महुए का फल, फूल, पत्ते3. जवार की धानी4. ऐपण5. मिट्टी के छोटे कुल्हड़6 देवली छेवली. हल छठ पूजा विधि इस दिन माताएं महुआ पेड़ की डाली का दातून कर स्नान कर व्रत धारण करती हैं। इस दिन व्रती महिलाएं कोई अनाज नहीं खाती हैं। भैंस के दूध की चाय पीती हैं। तालाब बेर, पलाश, गूलर आदि पेड़ों की टहनियों तथा कांस के फूल को लगाकर सजाते हैं। सामने एक चौकी या पाटे पर गौरी-गणेश, कलश रखकर हलषष्ठी देवी की मूर्ति की पूजा करते हैं। साड़ी आदि सुहाग की सामग्री भी चढ़ाते हैं तथा हलषष्ठी माता की छह कहानी सुनते हैं। इस पूजन की सामग्री में पचहर चांउर (बिना हल जुते हुए जमीन से उगा हुआ धान का चावल, महुआ के पत्ते, धान की लाई, भैंस का दूध-दही व घी आदि रखते हैं। बच्चों के खिलौनों जैसे-भौरा, बाटी आदि भी रखा जाता है।  भगवान श्रीकृष्ण की जन्म कथा हलछठ व्रत महत्व- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। इस महिलाएं अपने पुत्र की लंबी आयु और समृद्धि की कामना के लिए उपवास रखती हैं। 

बलदेव षष्ठी या हल छठ आज या कल? नोट करें पूजन साम्रगी, इस सरल विधि से करें पूजा, जानें महत्व Read More »

2023: संकष्टी चतुर्थी कब ? नोट करें डेट, मुहूर्त और चंद्रोदय समय

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हेरंब संकष्टी चतुर्थी है. इस दिन बहुला चौथ भी मनाई जाती है. जानते हैं हेरंब संकष्टी चतुर्थी की डेट, मुहूर्त और महत्व. हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को हेरंब संकष्टी चतुर्थी है इसे महा स्कंद हर चतुर्थी भी कहते हैं. इस दिन बहुला चौथ भी मनाई जाती है. संकष्टी चतुर्थी व्रत गणपति जी को समर्पित है लेकिन बहुला चौथ व्रत में श्रीकृष्ण और बहुला गाय की पूजा की जाती है. ऐसे में व्रती को इस दिन बप्पा और बाल गोपाल दोनों का आशीर्वाद मिलेगा. आइए जानते हैं हेरंब संकष्टी चतुर्थी और बहुला चौथ की डेट, मुहूर्त और महत्व. 2023:जन्माष्टमी कब है, जानें सही तारीख, पूजा विधि, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त और महत्व हेरंब संकष्टी चतुर्थी 2023 डेट भाद्रपद माह की हेरंब संकष्टी चतुर्थी 3 सितंबर 2023 रविवाह को है.संकष्टी के दिन बुद्धि, विद्या के दाता गणपति जी की उपसाना करने से समस्त विघ्न दूर होते हैं. मांगलिक कार्य में बाधाएं नहीं आती. हेरंब संकष्टी चतुर्थी 2023 मुहूर्त  पंचांग के अनुसार भाद्रपद माह की चतुर्थी तिथि 02 सितंबर 2023 को रात 08 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 03 सिंतबर 2023 को शाम 06 बजकर 24 मिनट पर खत्म होगी. गणपति की पूजा का मुहूर्त – सुबह 07.35 – सुबह 10.45 शाम का मुहूर्त – शाम 06.41 – रात 09.31 बहुला चौथ की पूजा – शाम 06.28 – शाम 06.54 चंद्रोदय समय – रात 08:57 हेरंब संकष्टी चतुर्थी महत्व  भविष्य पुराण में बताया गया है कि हेरंब संकष्टी चतुर्थी पर उपवास करने से बुध, राहु-केतु के दुष्प्रभाव नहीं झेलने पड़ते. भगवान गणेश की पूजा करने से हर तरह की परेशानियां दूर होती हैं और बुद्धि, बल और विवेक की प्राप्ति होती है. इस दिन चंद्रमा को अर्घ्य देने से मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है. हेरंब संकष्टी चतुर्थी मंत्र ‘ॐ नमो हेरम्ब मद मोहित मम् संकटान निवारय-निवारय स्वाहा।’ ‘ॐ श्रीं गं सौभाग्य गणपतये। वर्वर्द सर्वजन्म में वषमान्य नम:।’  ‘ॐ गं गणपतये नम:।’ भाद्रपद चतुर्थी 2023 तिथि और पूजा विधि  इस दिन श्री गणेश की पूजा की जाती है और फिर चांद को अर्घ्य देते हैं.  दिन भर महिलाएं निराहार रहकर इस व्रत को करती हैं. शाम के वक्त गणेश की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें फूल, पांच तरह के फल, नारियल, पान, सुपारी, दही, दूध, शहद, इत्र, सिंदूर, अक्षत और चंदन चढ़ाएं. इस दिन भगवान को मोतीचूर के लड्डू चढ़ाने चाहिए.

2023: संकष्टी चतुर्थी कब ? नोट करें डेट, मुहूर्त और चंद्रोदय समय Read More »

2023:जन्माष्टमी कब है, जानें सही तारीख, पूजा विधि, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त और महत्व

इस साल कृष्ण जन्माष्टमी सितंबर में मनाई जाएगी. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को आमतौर पर लगातार दो दिन समर्पित होते हैं. पहला स्मार्त सम्प्रदाय के लिए और दूसरा वैष्णव सम्प्रदाय के लिए. इस साल कृष्ण जन्माष्टी का पर्व 6 और 7 सितंबर को मनाई जाएगी. हिंदू धर्म में कृष्ण जन्माष्टमी को महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है. कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद मास में मनाई जाती है. फिलहाल सावन का महीना चल रहा है. सावन के बाद भाद्रपद का महीना 31 अगस्त 2023 से शुरू हो जाएगा. भादो माह भगवान कृष्ण की उपासना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है. इसी महीने में कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है. हिंदू पंचांग के अनुसार, कृष्ण जन्माष्टमी भाद्रपद (चंद्रमा के अंधेरे पखवाड़े) के महीने में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाई जाती है. इस साल कृष्ण जन्माष्टमी की डेट को लेकर लोगों में कंफ्यूजन बना हुआ है.  गृहस्थ कब रखेंगे जन्माष्टमी व्रत 2023 पंचांग के अनुसार, इस साल कृष्ण जन्माष्टमी सितंबर में मनाई जाएगी. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को आमतौर पर लगातार दो दिन समर्पित होते हैं. पहला स्मार्त सम्प्रदाय के लिए और दूसरा वैष्णव सम्प्रदाय के लिए. इस साल कृष्ण जन्माष्टी का पर्व 6 और 7 सितंबर को मनाई जाएगी. गृहस्थ जीवन वालों के लिए 06 सितंबर 2023 को जन्माष्टमी व्रत रखना शुभ रहेगा. जबकि वैष्णव संप्रदाय को मनाने वाले लोग कान्हा का जन्मोत्सव 07 सितंबर 2023 को मनाएंगे. जन्माष्टमी 2023 शुभ मुहूर्त भाद्रपद माह के कृष्ण जन्माष्टमी तिथि 06 सितंबर 2023 को दोपहर 03 बजकर 37 मिनट पर शुरू हो रही है. अष्टमी तिथि का समापन 07 सितंबर 2023 को शाम 04 बजकर 14 मिनट पर होगा. रोहिणी नक्षत्र 06 सितंबर 2023 की सुबह 09 बजकर 20 मिनट पर शुरू होगा. वहीं रोहिणी नक्षत्र की समाप्ति 07 सितंबर 2023 की सुबह 10 बजकर 25 मिनट पर होगा. जन्माष्टमी 2023 मुहूर्त धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रीकृष्ण जी का जन्म भाद्रपद मास के अष्टमी तिथि की रात 12 बजे रोहिणी नक्षत्र में हुआ था. गृहस्थ जीवन वाले 6 सितंबर को जन्मोत्सव मनाएंगे. इसी दिन रोहिनी नक्षत्र का संयोग भी बन रहा है. वहीं वैष्णव संप्रदाय में श्रीकृष्ण की पूजा का अलग विधान है. ऐसे में वैष्णव संप्रदाय में 07 सिंतबर को जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाएगा. रोहिणी नक्षत्र शुरू- 06 सितंबर 2023, सुबह 09 बजकर 20 मिनट पर रोहिणी नक्षत्र समाप्त – 07 सितंबर 2023, सुबह 10 बजकर 25 मिनट पर श्रीकृष्ण पूजा का समय – मध्यरात्रि 12 बजकर 02 से मध्यरात्रि 12 बजकर 48 मिनट पूजा अवधि – 46 मिनट व्रत पारण समय – 7 सिंतबर 2023, सुबह 06 बजकर 09 तक जन्माष्टमी व्रत कथा जन्माष्टमी व्रत कथा में हम आपको बताने जा रहे है कि क्यों हम जन्माष्टमी के दिन व्रत रखते है। जन्माष्टमी के दिन बड़े ही धूमधाम से पूरे भारतवर्ष में जन्माष्टमी व्रत रखा जाता है। भारत के मथुरा शहर में असुर राज कंस वहां के लोगों पर बहुत अत्याचार करता था। एक समय की बात है जब कंस देवकी की शादी वसुदेव से करवा कर मथुरा से कहीं जा रहा था। रास्ते में एक आकाशवाणी होती है जिसमें बताया जाता है कि देवकी का आठवां पुत्र कंस के मृत्यु का कारण बनेगा। इसके बाद कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में डाल दिया। हर एक पुत्र को कंस ने मारा मगर भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की रोहिणी नक्षत्र में अष्टमी तिथि को आठवीं संतान का जन्म हुआ। आठवीं संतान के रूप में भगवान विष्णु दसवें अवतार में श्री कृष्ण के रूप में जन्म लिए थे। भगवान का अवतार होने के कारण उन्होंने स्वयं को कारागार से मुक्त करके मथुरा के नंद बाबा के घर पहुंचा लिया। वहां से यशोदा माता के साथ भगवान कृष्ण का बालकांड शुरू होता है। बचपन से ही कंस के सभी प्रकार के माया जाल को विफल करते हुए एक निश्चित समय पर उन्होंने कंस का वध करके मथुरा के सभी लोगों को अत्याचार से मुक्त करवाया। इसके बाद भगवान कृष्ण ने द्वापर युग को सभी प्रकार के पाप से मुक्त किया और गीता जैसे उपदेश से लोगों का उद्धार किया। जन्माष्टमी व्रत विधि न्माष्टमी का व्रत बिल्कुल एकादशी के व्रत की तरह रखा जाता है। जन्माष्टमी के त्यौहार के दिन सुबह-सुबह नंद, यशोदा, बलराम, देवकी, कृष्ण, इन सबके नाम का बार बार उच्चारण करते हुए पूजा किया जाता है। सुबह सुबह पूजा करने के बाद अब जन्माष्टमी का उपवास शुरू कर सकते है। इस दिन अन्न नहीं खाया जाता है, जन्माष्टमी के व्रत को एक निश्चित अवधि में तोड़ा जाता है। जैसा कि हम सब जानते है भाद्रपद के कृष्ण पक्ष और रोहिणी नक्षत्र के अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन उपवास को एक निश्चित अवधि पर तोड़ा जाता है जिसे पारण मुहूर्त कहते है। हर साल जन्माष्टमी के अर्धरात्रि को अर्थात 2023 में 06 सितंबर के रात 12:00 बजे भगवान श्री कृष्ण का जन्म होगा उसके बाद जन्माष्टमी का पारण मुहूर्त होता है। भारत के कुछ जगहों पर पारण मुहूर्त अगले दिन सूर्य उदय के बाद माना जाता है। जानिये श्री कृष्ण जन्माष्टमी की पौराणिक कथा जन्माष्टमी व्रत में क्या खाना चाहिए हिंदू धर्म के अलग-अलग त्योहार में अलग अलग तरीके से व्रत रखने और पारण करने की परंपरा बनाई गई है। जन्माष्टमी के दिन घर में बहुत काम रहता है लोग अपने घर को सजाते है, बाल गोपाल की पूजा अर्चना की तैयारी की जाती है, और कान्हाजी का विशेष भोग बनाया जाता है। ऐसे में अगर आप व्रत करते है तो शारीरिक रूप से कमजोर पड़ सकते है। जन्माष्टमी के व्रत में कुछ लोग 24 घंटे का निर्जला उपवास करते है, जिसमें वह पानी तक नहीं पीते मगर कुछ लोग दिनभर उपवास करके शाम को फलाहार करते है। जिनका तबीयत ठीक नहीं रहता है वह दिन में दो बार फलाहार भी करते है। आपको जन्माष्टमी व्रत में क्या खाना चाहिए यह जानना आवश्यक है ताकि आप शारीरिक रूप से कमजोर ना पड़े और रात तक उपवास करते हुए भगवान की सही तरीके से पूजा अर्चना कर सके। कृष्ण जन्माष्टमी पूजा व्रत नियम अविवाहित लोग व्रत के एक दिन पहले और जन्माष्टमी के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें. व्रत के दिन मध्याहन के वक्त तिल के पानी से स्नान करें. रात में श्रीकृष्ण की पूजा के समय नए

2023:जन्माष्टमी कब है, जानें सही तारीख, पूजा विधि, व्रत नियम, शुभ मुहूर्त और महत्व Read More »

पुत्रदा एकादशी व्रत कब? जानें तारीख महत्व और मुहूर्त

साल में आने वाली हर एक एकादशी का अपना अलग ही महत्व है। सावन शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है पुत्रदा एकादशी साल में वैसे 2 बार आती है। पुत्रदा एकादशी को लेकर मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान की सुख की प्राप्ति होती है साथ ही संतान की उन्नति होती है। आइए जानते हैं कब है सावन शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी। इसका महत्व और पूजा विधि। कब है पुत्रदा एकादशी पंचांग के अनुसार, सावन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि 26 अगस्त देर रात 12 बजकर 9 मिनट पर प्रारंभ होगी और अगले दिन यानी 27 अगस्त की रात 9 बजकर 33 मिनट तक रहेगी। उदय तिथि में एकादशी तिथि होने के कारण यह व्रत 27 अगस्त को ही रखा जाएगा। वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा व कथा 27 अगस्त को बहुत ही शुभ सर्वार्थ सिद्धि योग भी है। सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 5 बजकर 56 मिनट से आरंभ होगा और 7 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। इसलिए इस शुभ मुहूर्त में पूजा करना अति उत्तम फलदायी रहेगा। पुत्रदा एकादशी का महत्व मान्यताओं के अनुसार, पुत्रदा एकादशी का व्रत उत्तम फल देने वाला है। अगर किसी को संतान सुख में बाधा आ रही है तो वह इस व्रत को रख सकते हैं। साथ ही इस व्रत को रखने से संतान के सभी कष्ट भी दूर होता है। साथ ही संतान को स्वास्थ्य और अच्छी आयु का वरदान मिलता है। पुत्रदा एकादशी पूजा विधि सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि के बाद घर के मंदिर में देसी घी का दीपक जलाएं। इसके बाद भगवान विष्णु को गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद भगवान विष्णु को पुष्प और तुलसी अर्पित करें। इसके बाद व्रत का संकल्प लें। साथ ही तुलसी माला से 108 बार ओम वासुदेवाय नम: का जप करें। अंत में भगवान विष्णु की आरती करें। इस दिन भगवान को भी सात्विक चीजों का ही भोग लगाएं। साथ ही भगवान विष्णु के भोग में तुलसी को जरूर शामिल करें। इस दिन रविवार है तो तुलसी के पत्ते पहले ही तोड़ कर रख दें। पुत्रदा एकादशी व्रत कथा  द्वापर युग के आरंभ में महिरूपति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महीजित नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन राज्य के सभी ऋषि-मुनियों, सन्यासियों और विद्वानों को बुलाकर संतान प्राप्ति के उपाय पूछे। राजा की बात सुनकर सभी ने कहा कि ‘हे राजन तुमने पूर्व जन्म में सावन माह की एकादशी के दिन अपने तालाब से एक गाय को जल नहीं पीने दिया था। जिसके कारण गाय ने तुम्हे संतान न होने का श्राप दिया था। इसके बाद सभी ऋषि-मुनियों ने कहा कि हे राजन यदि तुम और तुम्हारी पत्नी पुत्रदा एकादशी का व्रत रखें तो इस श्राप से मुक्ति पा सकते हो। जिसके बाद तुम्हें संतान की प्राप्ति हो सकती है। यह सुनकर राजा ने पत्नी के साथ मिलकर पुत्रदा एकादशी का व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद राजा ने सावन माह में आने वाली पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा और इस व्रत के प्रभाव से वह शाप से मुक्त हो गया। जिसके बाद उसकी पत्नी गर्भवती हुई और एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। राजा काफी प्रसन्न हुए और तब से वह प्रत्येक पुत्रदा एकादशी का व्रत करने लगे। कहते हैं जो कि साधक पूरे मन व श्रद्धा के साथ यह व्रत करता है भगवान विष्णु उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।

पुत्रदा एकादशी व्रत कब? जानें तारीख महत्व और मुहूर्त Read More »

हरियाली तीज व्रत पूजा कथा, जानें क्यों और कैसे शुरू हुई इस व्रत को रखने की परंपरा

इस दिन मनाई जाएगी हरियाली तीज  हिंदू पंचांग के अनुसार इस बार सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरुआत 18 अगस्त को रात 08 बजकर 01 मिनट पर होगी. वहीं इसका समापन अगले दिन 19 अगस्त को रात 10 बजकर 19 मिनट पर होगा. इसलिए उदया तिथि के अनुसार हरियाली तीज 19 अगस्त को मनाई जाएगी.  सावन महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का व्रत पर्व मनाया जाता है। इस व्रत की कथा में यह रहस्य बताया गया है कि क्यों और कैसे इस व्रत की परंपरा शुरू हुई और किसलिए यह व्रत सुहागिन महिलाओं और कुंवारी कन्याओं में खूब प्रचलित है। शिवजी ने देवी पार्वती को जो बताया था हरियाली तीज के बारे में आप भी जानिए। सावन मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का व्रत पर्व मनाया जाता है। हरियाली तीज का त्योहार सुहागन महिलाओं के लिए विशेष महत्वपूर्ण होता है। इस पर्व का संबंध भगवान शिव और देवी पार्वती से है। मान्यता है कि देवी पार्वती की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए थे और इसी दिन ही माता पार्वती को उनके पूर्व जन्म की कथा भी सुनाई थी। इसलिए इस व्रत का संबंध शिव पार्वती के मिलन से है। आइए जानें हरियाली तीज की पौराणिक कथा में क्या कहा गाय है। हरियाली तीज की पौराणिक कथा हरियाली तीज से जुड़ी एक कथा बहुत प्रचलित है। एक समय की बात है माता पार्वती अपने पूर्वजन्म के बारे में याद करना चहती थीं लेकिन उन्हें कुछ याद नहीं आ रहा था। ऐसे में भोलेनाथ देवी पार्वती से कहते हैं कि हे पार्वती! तुमने मुझे प्राप्त करने के लिए 107 बार जन्म लिया था लेकिन तुम मुझे पति रूप में न पा सकीं। लेकिन 108वें जन्म में तुमने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लिया और मुझे वर रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की। नारद आए विवाह का प्रस्ताव लेकर भगवान शिव कहते हैं कि हे पार्वती! तुमने अन्न-जल का त्यागकर पत्ते खाए और सर्दी-गर्मी एवं बरसात में हजारों कष्टकर सहकर भी अपने व्रत में लीन रही। तुम्हारे कष्टों को देखकर तुम्हारे पिताजी बहुत दुखी थे, तब नारद मुनि तुम्हारे घर पधारे और कहा कि मुझे भगवान विष्णु ने भेजा है। भगवान विष्णु आपकी कन्या से अत्यंत प्रसन्न हैं और वह उनसे विवाह करना चाहते हैं, मैं भगवान विष्णु का यही संदेश लेकर आपके पास आया हूं। शिव भक्ति में लीन पार्वती हुईं गुम नारदजी के प्रस्ताव को सुनकर पार्वती के पिता खुशी से भगवान विष्णु के साथ विवाह के लिए तैयार हो गए। नारदमुनि ने भी भगवान विष्णु को यह शुभ संदेश सुना दिया। लेकिन जब यह बात पार्वती को पता चली तब वह बहुत दुखी हुईं। पार्वती ने अपने मन की बात अपनी सखी को सुनाई। तब सखी ने माता पार्वती को घने जंगल में छुपा दिया। जब पार्वती के गायब होने की खबर हिमालय को पता चली तब उन्होंने खोजने में धरती-पाताल एक कर दिया लेकिन पार्वती का कहीं पता नहीं चला। क्योंकि देवी पार्वती तो जंगल में एक गुफा के अंदर रेत से शिवलिंग बनाकर शिवजी की पूजा कर रही थी। शिवजी ने बताया पार्वती से विवाह का रहस्य शिवजी ने कहा, हे पार्वती! इस प्रकार तुम्हारी पूजा से मैं बहुत प्रसन्न हुआ और तुम्हारी मनोकामना पूरी की। जब हिमालयराज गुफा में पहुंचे तब तुमने अपने पिता को बताया कि मैंने शिवजी को पतिरूप में चयन कर लिया और उन्होंने मेरी मनोकामना पूरी कर दी है। शिवजी ने मेरा वरण कर लिया है। मैं आपके साथ केवल एक शर्त पर चलूंगी कि आप मेरा विवाह भोलेनाथ से करवाने के लिए तैयार हो जाएं। तब हे पार्वती! तुम्हारे पिताजी मान गए और विधि-विधान सहित हमारा विवाह हुआ। हे पार्वती! तुम्हारे कठोर तप और व्रत से ही हमारा विवाह हो सका। हरियाली तीज की परंपरा ऐसे शुरू हुई भगवान शिव देवी पार्वती से कहते हैं, हे पार्वती! इस हरियाली तीज को जो भी निष्ठा के साथ करेगा, मैं उसको मनोवांधित फल प्रदान करूंगा। उसे तुम जैसा सुहाग मिलेगा। तबसे कुंवारी कन्याएं अच्छे वर की कामना हेतु यह व्रत रखती है। वहीं सुहागन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए इस व्रत को रखती हैं। भव‌िष्य पुराण में देवी पार्वती ने खुद बताया है क‌ि हरियाली तीज का व्रत करने पर महिलाओं को सुहाग और सौभाग्य की प्राप्त‌ि होती है। सावन महीने में तृतीया त‌िथ‌ि के दिन कई वर्षों की कठिन तपस्या के बाद देवी पार्वती ने भगवान श‌िव को पत‌ि रूप में पाने का वरदान प्राप्त क‌िया था इसलिए इस व्रत का बड़ा ही महत्व है। हरियाली तीज का महत्व  हरियाली तीज आमतौर पर नाग पंचमी के दो दिन पूर्व यानी श्रावण मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, यह वह दिन है जब देवी ने शिव की तपस्या में 107 जन्म बिताने के बाद पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। इस दिन महिलाएं 16 श्रृंगार करके भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करती हैं। सुखी वैवाहिक जीवन के साथ ही घर में सुख शांति समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। साथ ही इस दिन हरे रंग के कपड़े पहनने का विशेष महत्व है। इस दिन महिलाओं के बीच झूला झूलने का भी प्रचलन है। साथ ही महिलाएं तीज के गीत गाती हैं। भगवान श्रीराम के 10 प्रमुख मंदिर हरियाली तीज की पूजा विधि हरियाली तीज का व्रत रखने के लिए ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और साफ- सुथरे कपड़े पहनकर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करना चाहिए. इसके बाद व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इस दिन बालू के भगवान शंकर व माता पार्वती की मूर्ति बनाकर पूजन किया जाता है. चौकी पर प्रतिमा स्थापित करने के बाद माता को श्रृंगार का सामान अर्पित करें.  भगवान शिव, माता पार्वती का आवाह्न करें. माता-पार्वती, शिव जी और उनके साथ गणेश जी की पूजा करें. शिव जी को वस्त्र अर्पित करें. इस दिन हरियाली तीज की कथा सुनना शुभ माना जाता है. 

हरियाली तीज व्रत पूजा कथा, जानें क्यों और कैसे शुरू हुई इस व्रत को रखने की परंपरा Read More »

रोहिणी व्रत की पूरी

रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लिए महत्वपूर्ण दिनों में से एक है, क्योंकि इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं. हालांकि, इस महीने ये व्रत 10 अगस्त, 2023 को मनाया जाएगा. रोहिणी व्रत कथा प्राचीन कथा के अनुसार चंपापुरी राज्य में राजा माधवा, और रानी लक्ष्मीपति का राज्य था। उनके सात बेटे और एक बेटी थी। एक बार राजा ने बेटी रोहिणी के बारे में ज्योतिषी से जानकारी ली तो उसने बताया कि रोहिणी का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ होगा। इस पर इसके बाद राजा ने स्वयंवर का आयोजन किया, इसमें रोहिणी-अशोक का विवाह करा दिया गया। बाद में रोहिणी-अशोक राजा रानी बने। एक समय हस्तिनापुर के वन में श्री चारण मुनिराज आए, उनके दर्शन के लिए राजा पहुंचे और धर्मोपदेश ग्रहण किया। बाद में पूछा कि उनकी रानी शांतचित्त क्यों है, तब उन्होंने बताया कि इसी नगर में एक समय में वस्तुपाल नाम का राजा था, जिसका धनमित्र नाम का मित्र था, जिसकी दुर्गंधा नाम की कन्या पैदा हुई। लेकिन धनमित्र परेशान रहता था कि उसकी बेटी से विवाह कौन करेगा। लेकिन बाद में उसने धन का लालच देकर वस्तुपाल के बेटे श्रीषेण से दुर्गंधा का विवाह कर दिया। इधर दुर्गंधा की दुर्गंध से परेशान होकर श्रीषेण एक माह में ही कहीं चला गया। पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में राजा माधव अपनी रानी लक्ष्मीपति के साथ चंपापुरी नामक नगर में राज्य करते थे। उनके 7 पुत्र और 1 पुत्री का नाम रोहिणी था। एक बार राजा ने निमित्ज्ञानी से पूछा कि मेरी पुत्री का वर कौन होगा। तो उन्होंने कहा कि तुम्हारी पुत्री का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार अशोक के साथ होगा। यह सब सुनने के बाद राजा ने कन्या का ऐलान किया और स्वयंवर में कन्या रोहिणी ने राजकुमार अशोक को वरमाला पहनाई पहनाई और इस प्रकार दोनों की शादी हो गई एक बार नगरी हस्तिनापुर के वनों में श्री चरण मुनिराज आए। राजा स्वजनों सहित उनके दर्शन को गए और प्रणाम कर के उपदेश ग्रहण किया। सपने में रुपये-पैसे देखना शुभ या अशुभ, जानें क्या कहता है स्वप्न शास्त्र इसके बाद राजा जी ने मुनिराज से एक प्रश्न पूछा कि मेरी रानी इतनी  शांत क्यों है तब गुरुवर ने उत्तर देते हुए कहा कि इस नगर में वास्तुपाल नाम का एक राजा रहता था जिसके मित्र का नाम धनमित्र था । उस धनमित्र के एक दुर्गंधयुक्त कन्या उत्पन्न हुई। धनमित्र को हमेशा यही चिंता रहती थी कि इस कन्या से कौन विवाह करेगा? धनमित्र ने धन का लालच देकर उसका विवाह अपने मित्र के पुत्र श्रीषेण से करा दिया, लेकिन दुर्गंध से पीड़ित होकर उसने एक महीने के भीतर ही उसे छोड़ देता है। उसी समय नगर में मुनिराज जी विहार करते हुए आ गए तब धनमित्र जी अपनी बेटी दुर्गंध के साथ पूजा करने के लिए गए और मुनिराज से अपनी बेटी दुर्गंध के भविष्य के बारे में पूछा। उन्होंने बताया कि गिरनार पर्वत के समीप एक नगर में राजा भूपाल राज्य करते थे। उसकी सिंधुमती नाम की एक रानी थी। एक दिन राजा रानी सहित वन क्रीड़ा के लिए गया तो रास्ते में मुनिराज को देखकर राजा ने रानी से घर जाकर मुनि के भोजन की व्यवस्था करने को कहा। राजा की आज्ञा से रानी चली गई, लेकिन क्रोधित होकर उसने मुनिराज को करेले का आहार दिया, जिससे मुनिराज को बड़ी पीड़ा हुई और उन्होंने तुरंत अपने प्राण त्याग दिए। जब राजा को इस बात का पता चला तो उसने रानी को नगर से बाहर निकाल दिया और इस पाप के कारण रानी के शरीर में कोढ़ हो गया। अत्यंत पीड़ा और दु:ख को भोगती हुई वह क्रोध से मरकर नरक में चली गई। वह अनंत दु:खों को भोगकर पशु योनि में उत्पन्न हुई और फिर तुम्हारे घर में दुर्गंधयुक्त कन्या बनी। इस पूरी कथा को सुनकर धनमित्र ने पूछा- मुझे कोई व्रत-विधि आदि धार्मिक कार्य बताओ जिससे यह पाप दूर हो जाए। तब स्वामी ने कहा – रोहिणी व्रत सम्यग्दर्शन सहित करें अर्थात् जिस दिन प्रत्येक मास में रोहिणी नक्षत्र आता हो, उस दिन चारों प्रकार के अन्नों का त्याग कर श्री जिन चैत्यल के पास जाकर धर्मध्यान अर्थात् सामायिक, स्वाध्याय सहित 16 प्रहर व्यतीत करें। धर्मचर्चा, पूजा, अभिषेक आदि में समय व्यतीत करें और आत्मबल का दान करें। इस प्रकार 5 वर्ष 5 माह तक इस व्रत को करें। दुर्गन्धा ने भक्तिपूर्वक व्रत किया और अपने जीवन के अंत में सन्यास लेकर मरकर पहले स्वर्ग में देवी बनी। वहाँ से तेरी प्यारी रानी आई। इसके बाद राजा अशोक ने उसका भविष्य पूछा तो स्वामी ने कहा- भील होकर तुमने मुनिराज पर घोर उपसर्ग किया था, अत: तुम मरकर नरक में गये और फिर अनेक कुयोनियों में भटकते हुए एक व्यापारी के घर में जन्म लिया, अत: बहुत निराशाजनक। आपको शरीर मिला, तब आपने मुनिराज के कहने पर रोहिणी व्रत किया। फलस्वरूप स्वर्ग में जन्म लेकर अशोक नाम का एक राजा हुआ। इस प्रकार रोहिणी व्रत के प्रभाव से राजा अशोक और रानी रोहिणी ने स्वर्गलोक का सुख भोगकर मोक्ष प्राप्त किया।

रोहिणी व्रत की पूरी Read More »