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29 जून को देवशयनी एकादशी, जानें क्यों इस बार 5 माह का होगा चातुर्मास

देवशयनी एकादशी 29 जून 2023 को है. ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास से जाने देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का महत्व, मुहूर्त उपाय और इसके नियम आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी या हरिशयनी एकादशी कहते हैं. इस साल देवशयनी एकादशी 29 जून 2023 को है. इस दिन श्रीहरि विष्णु की पूजा करने से कई गुना अधिक फल की प्राप्ति होती है. देवशयनी एकादशी के दिन से ही जगत के पालनहार भगवान विष्णु का निद्राकाल शुरू हो जाता है, यानी इसी दिन से चतुर्मास की शुरुआत होती है. चतुर्मास शुरू होने के बाद से सारे शुभ और मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. 5 माह का होगा चातुर्मास देवशयनी एकादशी से चार माह तक भगवान विष्णु देवोत्थानी एकादशी तक के लिए योग निद्रा में चले जाएंगे. फिर वे देवउठनी एकादशी को योग निद्रा से बाहर आएंगे, तब चातुर्मास का समापन होगा. देवउठनी एकादशी 23 नवंबर को है। इस तरह से चातुर्मास 30 जून से लगेगा और 23 नवंबर को खत्म हो जाएगा. इस बार श्रावण पुरुषोत्तम मास होने की वजह से दो माह तक है, इसलिए चातुर्मास की अवधि पांच माह होग. इस दौरान सभी मांगलिक कार्य बंद रहेंगे. हिंदू धर्म में चातुर्मास का बहुत अधिक महत्व माना जाता है. चातुर्मास की शुरुआत आषाढ़ माह से शुरू होती है और कार्तिक की एकादशी के दिन खत्म होते हैं. योग निद्रा से कब जागेंगे देव ज्योतिषाचार्य ने बताया कि चार माह की निद्रा के बाद कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी को जब भगवान विष्णु योग निद्रा से उठते हैं तब फिर से सभी मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं. इस बार चातुर्मास चार माह की बजाय पांच माह तक रहेंगे. देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के अलावा कुछ उपाय करने से जीवन में खुशियां आती हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवशयनी एकादशी से देवोत्थान एकादशी तक भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर विश्राम करते हैं. इन चार महीनों में सभी मांगलिक कार्यों पर रोक लग जाती है. चातुर्मास में ये कार्य हैं वर्जित इस दौरान मुंडन, उपनयन संस्कार, विवाह इत्यादि जैसे महत्वपूर्ण मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं. मान्यता है कि भगवान विष्णु के शयनकाल में मांगलिक कार्य करने से व्यक्ति को उनका आशीर्वाद नहीं प्राप्त होता है, जिस वजह से विघ्न उत्पन्न होने का खतरा बना रहता है. हर साल चातुर्मास सामान्‍य रूप से 4 महीने का होता है, लेकिन इस साल अधिक मास होने के कारण चातुर्मास 5 महीने का होगा. यानी कि इस दिन भगवान विष्णु पूरे 5 महीने के लिए योग निद्रा में चले जाएंगा और फिर इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी कि देवउठनी एकादशी के दिन योग निद्रा से जागेंगे. देवशयनी एकादशी का महत्व ज्योतिषाचार्य ने बताया कि देवशयनी एकादशी का विशेष महत्व होते हैं. देवशयनी एकादशी भगवान विष्णु के आराम का समय है, यानी एक दिन से भगवान विष्णु चार महीने के लिए शयन करने के लिए चले जाते हैं. इसी के साथ इस दिन से चातुर्मास का आरंभ भी हो जाता है. ऐसे में अगले 4 महीने तक कोई भी शुभ कार्य का आयोजन करना वर्जित माना जाता है. हर साल चातुर्मास सामान्‍य रूप से 4 महीने का होता है, लेकिन इस साल अधिक मास होने के कारण चातुर्मास 5 महीने का होगा, यानी कि इस दिन भगवान विष्णु पूरे 5 महीने के लिए योग निद्रा में चले जाएंगा और फिर इसके बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी कि देवउठनी एकादशी के दिन योग निद्रा से जागेंगे. देवशयनी एकादशी पूजा मुहूर्त ज्योतिषाचार्य ने बताया कि पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का शुभारंभ 29 जून 2023 सुबह 03:18 मिनट पर होगा और इस तिथि का समापन 30 जून सुबह 02:42 मिनट पर हो जाएगा. पूजा तिथि के अनुसार, देवशयनी एकादशी व्रत गुरुवार 29 जून 2023 को रखा जाएगा. इस विशेष दिन पर रवि योग का निर्माण हो रहा है, जो सुबह 05:26 मिनट से दोपहर 04:30 मिनट तक रहेगा. भगवान शिव करेंगे सृष्टि का संचालन ज्योतिषाचार्य ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु के विश्राम करने से सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं. इस दौरान सभी तरह के धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, बस विवाह समेत अन्य मांगलिक कार्य नहीं होते हैं. इस दौरान भगवान का अधिक से अधिक ध्यान करना चाहिए. 5 महीने नहीं बजेगी शहनाई ज्योतिषाचार्य ने बताया कि चतुर्मास का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार चतुर्मास आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होकर कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि तक रहता है. साल 2023 में चतुर्मास 29 जून से शुरू होगा, इस दिन देवशयनी एकादशी भी है. 23 नवंबर 2023 को देवोत्थान एकादशी है। कहा जाता है कि इस दिन से भगवान विष्णु विश्राम काल पूरा करने के बाद क्षीर सागर से निकल कर सृष्टि का संचालन करते हैं. देवशयनी और देवउठनी एकादशी ज्योतिषाचार्य ने बताया कि इस साल 29 जून को देवशयनी एकादशी और 23 नवंबर को देव उठनी एकादशी रहेगी, इसलिए चातुर्मास 148 दिनों का रहेगा। इन दिनों में भगवान विष्णु योग निद्रा में रहेंगे. पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इस अवधि में सृष्टि को संभालने और कामकाज संचालन का जिम्मा भगवान भोलेनाथ के पास रहेगा. इस दौरान धार्मिक अनुष्ठान किए जा सकेंगे पर विवाह समेत मांगलिक काम नहीं होंगे. चतुर्मास में नहीं होते विवाह ज्योतिषाचार्य ने बताया कि भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार कहा जाता है। श्रीहरि के विश्राम अवस्था में चले जाने के बाद मांगलिक कार्य जैसे- विवाह, मुंडन, जनेऊ आदि करना शुभ नहीं माना जाता है। मान्यता है कि इस दौरान मांगलिक कार्य करने से भगवान का आशीर्वाद नहीं प्राप्त होता है। शुभ कार्यों में देवी-देवताओं का आवाह्न किया जाता है। भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, इसलिए वह मांगलिक कार्यों में उपस्थित नहीं हो पाते हैं। जिसके कारण इन महीनों में मांगलिक कार्यों पर रोक होती है। पाताल में रहते हैं भगवान ज्योतिषाचार्य ने बताया कि ग्रंथों के अनुसार पाताल लोक के अधिपति राजा बलि ने भगवान विष्णु से पाताल स्थिति अपने महल में रहने का वरदान मांगा था, इसलिए माना जाता है कि देवशयनी एकादशी से अगले 4 महीने

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मासिक कालाष्टमी व्रत 2023

महत्वपूर्ण जानकारी आषाढ़, कृष्ण अष्टमी, जून 2023 शनिवार, 10 जून 2023 अष्टमी तिथि प्रारंभ : 10 जून 2023 को दोपहर 2 बजकर 02 मिनट पर अष्टमी तिथि समाप्त : 11 जून 2023 को दोपहर 12 बजकर 06 मिनट पर कालाष्टमी व्रत भगवान भैरव के भक्तों के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन होता है। यह व्रत प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन भगवान भैरव के भक्त पूरे दिन उपवास रखते है और वर्ष में सभी कालाष्टमी के दिन उनकी पूजा करते हैं। कालाष्टमी, जिसे काला अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। सबसे महत्वपूर्ण कालाष्टमी, जिसे कालभैरव जयंती के रूप में जाना जाता है। यह माना जाता है कि भगवान शिव उसी दिन भैरव के रूप में प्रकट हुए थे। कालभैरव जयंती को भैरव अष्टमी के रूप में भी जाना जाता है। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि कालाष्टमी व्रत सप्तमी तीथ पर मनाया जा सकता है। धार्मिक पाठ के अनुसार व्रतराज कालाष्टमी का व्रत उस दिन मनाया जाना चाहिए जब अष्टमी तिथि रात्रि के समय रहती है। कालाष्टमी व्रत तिथि 2023 इस प्रकार है :- कालाष्टमी व्रत दिनांक 2023 इस प्रकार है:- कालाष्टमी व्रत जनवरी में शनिवार, 14 जनवरी 2023माघ, कृष्ण अष्टमी14 जनवरी 2023 शाम 7:23 बजे – 15 जनवरी 2023 शाम 7:45 बजे कालाष्टमी व्रत फरवरी में सोमवार, 13 फरवरी 2023फाल्गुन, कृष्ण अष्टमी13 फरवरी 2023 सुबह 9:46 बजे – 14 फरवरी 2023 सुबह 9:04 बजे मार्च में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 14 मार्च 2023चैत्र, कृष्ण अष्टमी14 मार्च 2023 को रात 8:22 बजे – 15 मार्च 2023 को शाम 6:46 बजे कालाष्टमी व्रत अप्रैल में गुरुवार, 13 अप्रैल 2023वैशाख, कृष्ण अष्टमी13 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 3:44 – 14 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 1:34 बजे मई में कालाष्टमी व्रत शुक्रवार, 12 मई 2023ज्येष्ठ, कृष्ण अष्टमी12 मई 2023 सुबह 9:07 बजे – 13 मई 2023 सुबह 6:51 बजे जून में कालाष्टमी व्रत शनिवार, 10 जून 2023आषाढ़, कृष्ण अष्टमी10 जून 2023 दोपहर 2:02 बजे – 11 जून 2023 दोपहर 12:06 बजे कालाष्टमी व्रत जुलाई में रविवार, 09 जुलाई 2023श्रवण, कृष्ण अष्टमी09 जुलाई 2023 रात 8:00 बजे – 10 जुलाई 2023 शाम 6:44 बजे अगस्त में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 08 अगस्त 2023श्रवण, कृष्ण अष्टमी08 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 4:14 बजे – 09 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 3:52 बजे कालाष्टमी व्रत सितंबर में बुधवार, 06 सितंबर 2023भाद्रपद, कृष्ण अष्टमी06 सितंबर 2023 अपराह्न 3:38 बजे – 07 सितंबर 2023 अपराह्न 4:14 बजे कालाष्टमी व्रत अक्टूबर में शुक्रवार, 06 अक्टूबर 2023अश्विना, कृष्ण अष्टमी06 अक्टूबर 2023 सुबह 6:35 बजे – 07 अक्टूबर 2023 सुबह 8:08 बजे कालाष्टमी व्रत नवंबर में रविवार, 16 नवंबर 2023कार्तिका, कृष्ण अष्टमी05 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 1:00 बजे – 06 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 3:18 बजे दिसंबर में कालाष्टमी व्रत मंगलवार, 05 दिसंबर 2023मार्गशीर्ष, कृष्ण अष्टमी04 दिसंबर 2023 रात 10:00 बजे – 06 दिसंबर 2023 पूर्वाह्न 12:37 बजे

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शनि त्रयोदशी व्रत कथा, पूजा विधि

जब त्रयोदशी तिथि शनिवार के दिन आती है तो वो शनि त्रयोदशी या शनि प्रदोष कहलाती है। सभी त्रयोदशी तिथि में शनि त्रयोदशी त्रयोदशी सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। शनि त्रयोदशी का व्रत संतान प्राप्ति के लिए किया जाता है। साथ ही इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। शनि त्रयोदशी व्रत कथा प्राचीन समय की बात है। एक नगर सेठ धन-दौलत और वैभव से सम्पन्न था। वह अत्यन्त दयालु था। उसके यहां से कभी कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को जी भरकर दान-दक्षिणा देता था। लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्‍नी स्वयं काफी दुखी थे। दुःख का कारण था- उनके सन्तान का न होना। सन्तानहीनता के कारण दोनों घुले जा रहे थे। एक दिन उन्होंने तीर्थयात्र पर जाने का निश्‍चय किया और अपने काम-काज सेवकों को सोंप चल पडे। अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति-पत्‍नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गई, लेकिन साधु की समाधि नही टूटी। मगर सेठ पति-पत्‍नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे। अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे । सेठ पति-पत्‍नी को देख वह मन्द-मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले- ‘मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूं वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं।’ साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि त्रयोदशी व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई हे रुद्रदेव शिव नमस्कार । शिव शंकर जगगुरु नमस्कार ॥हे नीलकंठ सुर नमस्कार । शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार ॥हे उमाकान्त सुधि नमस्कार । उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥ईशान ईश प्रभु नमस्कार । विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार ॥ तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि त्रयोदशी व्रत करने लगे । कालान्तर में सेठ की पत्‍नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया । शनि त्रयोदशी व्रत के प्रभाव से उनके यहां छाया अन्धकार लुप्त हो गया । दोनों आनन्दपूर्वक रहने लगे। शनि त्रयोदशी व्रत विधि शनि त्रयोदशी व्रत के दिन व्रती को प्रात:काल उठकर नित्य क्रम से निवृत हो स्नान कर शिव जी का पूजन करना चाहिये। पूरे दिन मन ही मन “ऊँ नम: शिवाय ” का जप करें। पूरे दिन निराहार रहें। त्रयोदशी के दिन प्रदोष काल में यानी सुर्यास्त से तीन घड़ी पूर्व, शिव जी का पूजन करना चाहिये। शनि प्रदोष व्रत की पूजा शाम 4:30 बजे से लेकर शाम 7:00 बजे के बीच की जाती है। व्रती को चाहिये की शाम को दुबारा स्नान कर स्वच्छ श्वेत वस्त्र धारण कर लें । पूजा स्थल अथवा पूजा गृह को शुद्ध कर लें। यदि व्रती चाहे तो शिव मंदिर में भी जा कर पूजा कर सकते हैं। पांच रंगों से रंगोली बनाकर मंडप तैयार करें। पूजन की सभी सामग्री एकत्रित कर लें। कलश अथवा लोटे में शुद्ध जल भर लें। कुश के आसन पर बैठ कर शिव जी की पूजा विधि-विधान से करें। “ऊँ नम: शिवाय ” कहते हुए शिव जी को जल अर्पित करें। इसके बाद दोनों हाथ जो‌ड़कर शिव जी का ध्यान करें। ध्यान का स्वरूप- करोड़ों चंद्रमा के समान कांतिवान, त्रिनेत्रधारी, मस्तक पर चंद्रमा का आभूषण धारण करने वाले पिंगलवर्ण के जटाजूटधारी, नीले कण्ठ तथा अनेक रुद्राक्ष मालाओं से सुशोभित, वरदहस्त, त्रिशूलधारी, नागों के कुण्डल पहने, व्याघ्र चर्म धारण किये हुए, रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान शिव जी हमारे सारे कष्टों को दूर कर सुख समृद्धि प्रदान करें। ध्यान के बाद, शनि त्रयोदशी व्रत की कथा सुने अथवा सुनायें। कथा समाप्ति के बाद हवन सामग्री मिलाकर 11 या 21 या 108 बार “ऊँ ह्रीं क्लीं नम: शिवाय स्वाहा ” मंत्र से आहुति दें । उसके बाद शिव जी की आरती करें। उपस्थित जनों को आरती दें। सभी को प्रसाद वितरित करें । उसके बाद भोजन करें । भोजन में केवल मीठी सामग्रियों का उपयोग करें।

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संकष्टी चतुर्थी का व्रत, जानिए पूजा विधि और महत्व

हिन्दू धर्म में संकष्टी चतुर्थी को प्रमुख त्यौहार के रूप में माना जाता है। इस दिन विशेष रूप से विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है। भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए उनकी एक खास पूजा-व्रत का विधान बताया गया है जिसे संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। इस लेख में हम आपको संकष्टी चतुर्थी के महत्व और इस दिन की जाने वाली पूजा अर्चना की संपूर्ण विधि के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं। आइये जानते हैं कि आखिर हिन्दू धर्म में संकष्टी चतुर्थी को क्यों महत्वपूर्ण माना गया है। क्यों मनाई जाती है संकष्टी चतुर्थी? यह पौराणिक कथा जानकर रह जाएंगे हैरान पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह में दो चतुर्थी तिथि पड़ती है। कृष्ण पक्ष की चतुर्थी संकष्टी चतुर्थी और शुक्ल पक्ष की चतुर्थी विनायक चतुर्थी कहलाती है। दोनों ही तिथियां भगवान गणेश को समर्पित हैं। इस दिन विघ्नहर्ता गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है। आषाढ़ माह की शुरुआत हो चुकी है और इस माह के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी को कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी व्रत इस बार 07 जून 2023, बुधवार के दिन रखा जाएगा। इस दिन विधि-विधान से गणेश जी की पूजा करने से जीवन में आ रही समस्याएं दूर हो जाती हैं। चलिए जानते हैं कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी की पूजा विधि और महत्व कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी तिथि और मुहूर्त  पंचांग के अनुसार आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि 06 जून मंगलवार को देर रात 12 बजकर 50 मिनट से प्रारंभ हो रही है। यह तिथि अगले दिन 7 जून बुधवार को रात 09 बजकर 50 मिनट पर खत्म होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी व्रत 7 जून बुधवार को रखा जाएगा। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी चंद्रोदय समय इस साल कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन चंद्रोदय का समय प्राप्त नहीं है, क्योंकि इस दिन चंद्रमा रात 10 बजकर 50 मिनट पर उदय होगा। जबकि चतुर्थी तिथि 07 जून को रात 09 बजकर 50 मिनट पर ही समाप्त हो रही है। इसके बाद पंचमी तिथि शुरू हो जाएगी। इसलिए आपको चतुर्थी खत्म होने से पहले पूजा कर लेनी चाहिए। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी के दिन प्रातः काल उठकर स्नानादि करने के पश्चात पूजा स्थान की साफ-सफाई करें और गंगाजल छिड़कें।  फिर भगवान गणेश को वस्त्र पहनाएं और मंदिर में दीप प्रज्वलित करें। गणेश जी का तिलक करें  और पुष्प अर्पित करें।  इसके बाद भगवान गणेश को 21 दूर्वा की गांठ अर्पित करें।  गणेश जी को घी के मोतीचूर के लड्डू या मोदक का भोग लगाएं।  पूजा समाप्त होने के बाद आरती करें और पूजन में हुई भूल-चूक के लिए क्षमा मांगे। कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी महत्व आषाढ़ माह का कृष्णपिङ्गल संकष्टी चतुर्थी का व्रत सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्ति के लिए अचूक माना गया है। जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखता है उसकी संतान संबंधी समस्याएं दूर होती हैं। साथ ही धन और कर्ज संबंधी समस्याओं का भी समाधान होता है। 

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3 जून को वट पूर्णिमा व्रत, जानें पूजा के लिए शुभ मुहूर्त

वट पूर्णिमा का व्रत रा ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन यानी 3 जून को रखा जाएगा। वट पूर्णिमा का व्रत महाराष्ट्र, गुजरात सहित दक्षिण भारत के कई राज्यों में रखा जाएगा। आइए जानते हैं वट पूर्णिमा व्रत का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि। वट सावित्री का व्रत साल में 2 बार रखा जाता है। पहला ज्येष्ठ अमावस्या और दूसरा ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन रखा जाता है। सुहागिन महिलाएं अपनी पति की लंबी आयु के लिए इस व्रत को रखती है। इस बार दूसरे ज्येष्ठ अमावस्या के दिन यानी 3 जून को वट पूर्णिमा का व्रत किया जाएगा। इस दिन वट वृक्ष की पूजा कर महिलाएं अपनी पति की लंबी उम्र की कामना करते हैं। साथ ही दांपत्य जीवन में खुशहाली बनी रहती है। पूजा के लिए शुभ मुहूर्त हिंदू पंचांग के अनुसार, वट पूर्णिमा का व्रत शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के दिन रखा जाता है। वट पूर्णिमा व्रत की पूजा के लिए 3 जून को सुबह और दोपहर में अच्छा मुहूर्त है। सुबह के समय पूजा के लिए 7 बजकर 7 मिनट से 8 बजकर 51 मिनट तक मुहूर्त रहेगा। इसके बाद दोपहर में 12 बजकर 20 मिनट से 2 बजकर 2 मिनट तक रहेगा। बता दें कि वट पूर्णिमा का व्रत मुख्य रूप से गुजरात, महाराष्ट्र समेत दक्षिण भारत के राज्यों में मनाया जाता है। वट पूर्णिमा पूजन विधि वट पूर्णिमा के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठने और स्नान आदि के बाद सुहागन महिलाएं पूजा के लिए अपनी थाली में रोली, चंदन, फूल, धूप, दीप आदि सब रख लें। इसके बाद सभी सामग्री वट वृक्ष पर अर्पित कर दें। साथ ही कच्चे सूत स वट की परिक्रमा करें। इसके बाद वट वृक्ष के नीचे बैठकर सत्यवान सावित्री की कथा पढ़ें। इस व्रत का पारण अगले दिन सात चने के दाने और पानी के साथ किया जाता है।

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कामिका एकादशी व्रत कथा व्रत विधि महत्व

श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम कामिका एकादशी है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से हर बिगड़े काम बनते हैं। व्रत करने से उपासकों के साथ-साथ उनके पित्रों के कष्ट भी दूर हो जाते हैं और उपासकों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। संसार सागर तथा पापों में फँसे हुए मनुष्यों को इनसे मुक्ति के लिये कामिका एकादशी का व्रत करना चाहिये। कामिका एकादशी के उपवास से भी पाप नष्ट हो जाते हैं, संसार में इससे अधिक पापों को नष्ट करने वाला कोई और उपाय नहीं है। कामिका एकादशी व्रत कथा एक नगर में एक ठाकुर और एक ब्राह्मण रहते थे। दोनों की एक दूसरे से बनती नहीं थी। आपसी झगड़े के कारण ठाकुर ने ब्राह्मण को मार डाला। इस पर नाराज ब्राह्मणों ने ठाकुर के घर खाना खाने से मना कर दिया। ठाकुर अकेला पड़ गया और वह खुद को दोषी मानने लगा। ठाकुर को अपनी गलती महसूस हुई और उसने एक मुनी से अपने पापों का निवारण करने का तरीका पूछा। इस पर, मुनी ने उन्हें कामिका एकादशी का उपवास करने के लिए कहा। निर्जला एकादशी व्रत की पूजा में जरुर शामिल करें ये 4 खास चीज, इनके बिना अधूरी है विष्णु पूजा ठाकुर ने ऐसा ही किया। ठाकुर ने व्रत करना शुरू कर दिया। एक दिन कामिका एकादशी के दिन जब ठाकुर भगवान की मूर्ति के निकट सोते हुए एक सपना देखा, भगवान ने उसे बताया, “ठाकुर, सभी पापों को हटा दिया गया है और अब आप ब्राह्मण हटिया के पाप से मुक्त हैं”।इसलिए, इस एकादशी को आध्यात्मिक साधकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यह चेतना से सभी नकारात्मकता को नष्ट करता है और मन और हृदय को दिव्य प्रकाश से भर देता है। कामिका एकादशी व्रत विधि एकादशी के दिन स्नानादि से पवित्र होने के पश्चात संकल्प करके श्री विष्णु के विग्रह की पूजन करना चाहिए। भगवान विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत आदि नाना पदार्थ निवेदित करके, आठों प्रहर निर्जल रहकर विष्णु जी के नाम का स्मरण एवं कीर्तन करना चाहिए। एकादशी व्रत में ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा का बड़ा ही महत्व है अत: ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात ही भोजना ग्रहण करें। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी के दिन किया जाता है। अतः द्वादशी के दिन घर पर ब्राह्मण को बुलाएं और उन्हें खाना खिलाएं और सामर्थ्य अनुसार उन्हें दान दक्षिणा दें। उसके बाद स्वयंं पारण करें। ध्यान रहे कि पारण के समय के दौरान ही पारण किया जाना चाहिए। अगर ब्राह्मण को घर बुलाकर भोजन कराने का सामर्थ्य नहीं है तो आप एक व्यक्ति के भोजन के बराबर अनाज किसी गरीब को या मंदिर में दान कर दें। यह भी आपको उतना ही फल प्रदान करेगा। इस प्रकार जो कामिका एकादशी का व्रत रखता है उसकी कामनाएं पूर्ण होती हैं। कामिका एकादशी व्रत के नियम एकादशी व्रत का तीन दिन का नियम होता है। यानी दशमी, एकादश और द्वादशी को कामिका एकादशी के नियमों का पालन होता है। इन तीन दिनों के दौरान जातकों को चावल नहीं खाने चाहिए। इसके साथ ही लहसुन, प्याज और मसुर की दाल का सेवन वर्जित है। मांस और मदिरा का सेवन भूल कर भी नहीं करना चाहिए। दशमी के दिन एक समय भोजन ग्रहण करना चाहिए और सूर्यास्त के बाद कुछ भी नहीं खाना चाहिए। एकादशी के दिन प्रात: काल उठकर भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए और व्रत का संकल्प लेना चाहिए। एकादशी की रात को जागरण करना चाहिए। एकादशी के दिन जागरण करना भी व्रत का ही हिस्सा है। द्वादशी के दिन पूजा कर पंडित को यथाशक्ति दान देना चाहिए और उसके बाद पारण करना चाहिए। एकादशी के दिन दातुन नहीं करना चाहिए। अपनी उंगली से ही दांत साफ करें। क्योंकि एकादशी के दिन पेड़ पौधों को तोड़ते नहीं है। इस दिन किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए। कामिका एकादशी महत्व इस एकादशी की कथा सुनने मात्र से ही वाजपेय यज्ञ के फल की प्राप्ति होती है। कामिका एकादशी के उपवास में शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु का पूजन होता है। जो मनुष्य इस एकादशी को धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन्हें गंगा स्नान के फल से भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है। सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण में केदार और कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जिस पुण्य की प्राप्ति होती है, वह पुण्य कामिका एकादशी के दिन भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करने से प्राप्त हो जाता है। आभूषणों से युक्त बछड़ा सहित गौदान करने से जो फल प्राप्त होता है, वह फल कामिका एकादशी के उपवास से मिल जाता है। जो उत्तम द्विज श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की कामिका एकादशी का उपवास करते हैं तथा भगवान विष्णु का पूजन करते हैं, उनसे सभी देव, नाग, किन्नर, पितृ आदि की पूजा हो जाती है, इसलिये पाप से डरने वाले व्यक्तियों को विधि-विधान सहित इस उपवास को करना चाहिये। संसार सागर तथा पापों में फँसे हुए मनुष्यों को इनसे मुक्ति के लिये कामिका एकादशी का व्रत करना चाहिये। कामिका एकादशी के उपवास से भी पाप नष्ट हो जाते हैं, संसार में इससे अधिक पापों को नष्ट करने वाला कोई और उपाय नहीं है। इस कामिका एकादशी की रात्रि को जो मनुष्य जागरण करते हैं और दीप-दान करते हैं, उनके पुण्यों को लिखने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं।

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निर्जला एकादशी व्रत की पूजा में जरुर शामिल करें ये 4 खास चीज, इनके बिना अधूरी है विष्णु पूजा

निर्जला एकादशी 31 मई 2023 को है. इस व्रत-पूजा में कोई अवरोध न हो इसलिए आज ही पूजा की सामग्री एकत्रित कर लें. आइए जानते हैं निर्जला एकादशी की पूजा सामग्री और विधि. निर्जला एकादशी को सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि ये व्रत किसी भी प्रकार के भोजन और पानी के बिना किया जाता है. निर्जला एकादशी साल की चौबीस एकादशियों के तुल्य है. द्वापर युग में भीम ने भी निर्जला एकादशी का व्रत किया था, इस वजह से इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं. इस साल निर्जला एकादशी 31 मई 2023 को है. ये व्रत आत्म संयम सिखाता है. निर्जला एकादशी व्रत में विष्णु जी की पूजा करने से सभी 24 एकादशियों का फल मिलता है, ऐसे में व्रत-पूजा में कोई अवरोध न हो इसलिए आज ही पूजा की सामग्री एकत्रित कर लें. आइए जानते हैं निर्जला एकादशी की पूजा सामग्री और विधि. निर्जला एकादशी पूजा सामग्री भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र, पूजा की चौकी, पीला कपड़ा पीले फूल, पीले वस्त्र, फल (केला, आम, ऋतुफल), कलश, आम के पत्ते पंचामृत (दूध, दही, घी, शक्कर, शहद), तुलसी दल, केसर, इत्र, इलायची पान, लौंग, सुपारी, कपूर, पानी वाली नारियल, पीला चंदन, अक्षत, पंचमेवा कुमकुम, हल्दी, धूप, दीप, तिल, आंवला, मिठाई, व्रत कथा पुस्तक, मौली दान के लिए- मिट्‌टी का कलश, सत्तू, फल, तिल, छाता, जूते-चप्पल निर्जला एकादशी पूजा विधि निर्जला एकादशी की पूजा तिल, गंगाजल, तुलसी पत्र, श्रीफल बहुत महत्वपूर्ण माने जाते हैं. इस दिन श्रीहरि विष्णु की पूजा के साथ मां लक्ष्मी और तुलसी की उपासना भी जरुर करें. मान्यता है तुलसी पूजा के बिना एकादशी का व्रत-पूजन अधूरा रहता है. इस दिन विष्णु जी का जल में तिल मिलाकर ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप हुए विष्णु जी का अभिषेक करें. समस्त पूजन सामग्री लक्ष्मी-नारायण को अर्पित करें. मिठाई में तुलसी दल डालकर विष्णु जी को चढ़ाएं. किसी गौशाला में गायों की देखभाल के लिए दान-पुण्य करें. गरीबों को गर्मी से राहत पाने की चीजों का दान करें. शाम को तुलसी में घी का दीपक लगाकर उसमें काला या सफेद तिल डालें. मान्यता है इससे लक्ष्मी जी प्रसन्न रहती हैं और साधक को धन-धान्य से परिपूर्ण रहने का आशीर्वाद देती है. निर्जला एकादशी 2023 मुहूर्त  ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि शुरू – 30 मई 2023, दोपहर 01.09 ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि समाप्त – 31 मई 2023, दोपहर 01.47 लाभ (उन्नति) – सुबह 05.24 – सुबह 07.08 अमतृ (सर्वोत्तम) – सुबह 07.08 – सुबह 08.51 शुभ (उत्तम) – सुबह 10.35 – दोपहर 12.19 व्रत पारण समय – सुबह 05.23 – सुबह 08.09 (1 जून 2023)

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निर्जला एकादशी पढ़ें पौराणिक व्रत कथा

निर्जला एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है- भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूं कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूं, दान भी दे सकता हूं परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता। निर्जला एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है- भीमसेन व्यासजी से कहने लगे कि हे पितामह! भ्राता युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रोपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव आदि सब एकादशी का व्रत करने को कहते हैं, परंतु महाराज मैं उनसे कहता हूं कि भाई मैं भगवान की शक्ति पूजा आदि तो कर सकता हूं, दान भी दे सकता हूं परंतु भोजन के बिना नहीं रह सकता। इस पर व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यदि तुम नरक को बुरा और स्वर्ग को अच्छा समझते हो तो प्रति मास की दोनों एक‍ा‍दशियों को अन्न मत खाया करो। भीम कहने लगे कि हे पितामह! मैं तो पहले ही कह चुका हूं कि मैं भूख सहन नहीं कर सकता। यदि वर्षभर में कोई एक ही व्रत हो तो वह मैं रख सकता हूँ, क्योंकि मेरे पेट में वृक नाम वाली अग्नि है सो मैं भोजन किए बिना नहीं रह सकता। भोजन करने से वह शांत रहती है, इसलिए पूरा उपवास तो क्या एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है। अत: आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए जो वर्ष में केवल एक बार ही करना पड़े और मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो जाए। श्री व्यासजी कहने लगे कि हे पुत्र! बड़े-बड़े ऋषियों ने बहुत शास्त्र आदि बनाए हैं जिनसे बिना धन के थोड़े परिश्रम से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है। इसी प्रकार शास्त्रों में दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत मुक्ति के लिए रखा जाता है। व्यासजी के वचन सुनकर भीमसेन नरक में जाने के नाम से भयभीत हो गए और कांपकर कहने लगे कि अब क्या करूं? मास में दो व्रत तो मैं कर नहीं सकता, हां वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य कर सकता हूं। अत: वर्ष में एक दिन व्रत करने से यदि मेरी मुक्ति हो जाए तो ऐसा कोई व्रत बताइए। यह सुनकर व्यासजी कहने लगे कि वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम निर्जला है। तुम उस एकादशी का व्रत करो। इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। आचमन में छ: मासे से अधिक जल नहीं होना चाहिए अन्यथा वह मद्यपान के सदृश हो जाता है। इस दिन भोजन नहीं करना चाहिए, क्योंकि भोजन करने से व्रत नष्ट हो जाता है। यदि एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल ग्रहण न करे तो उसे सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों का दान आदि देना चाहिए। इसके पश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर फिर आप भोजन कर लेना चाहिए। इसका फल पूरे एक वर्ष की संपूर्ण एकादशियों के बराबर होता है। व्यासजी कहने लगे कि हे भीमसेन! यह मुझको स्वयं भगवान ने बताया है। इस एकादशी का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य निर्जल रहने से पापों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं उनकी मृत्यु के समय यमदूत आकर नहीं घेरते वरन भगवान के पार्षद उसे पुष्पक विमान में बिठाकर स्वर्ग को ले जाते हैं। अत: संसार में सबसे श्रेष्ठ निर्जला एकादशी का व्रत है। इसलिए यत्न के साथ इस व्रत को करना चाहिए। उस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और गौदान करना चाहिए। इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीमसेन ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को भीमसेनी या पांडव एकादशी भी कहते हैं। निर्जला व्रत करने से पूर्व भगवान से प्रार्थना करें कि हे भगवन! आज मैं निर्जला व्रत करता हूं, दूसरे दिन भोजन करूंगा। मैं इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करूंगा, अत: आपकी कृपा से मेरे सब पाप नष्ट हो जाएं। इस दिन जल से भरा हुआ एक घड़ा वस्त्र से ढंक कर स्वर्ण सहित दान करना चाहिए। जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं उनको करोड़ पल सोने के दान का फल मिलता है और जो इस दिन यज्ञादिक करते हैं उनका फल तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। इस एकादशी के व्रत से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है। जो मनुष्य इस दिन अन्न खाते हैं, ‍वे चांडाल के समान हैं। वे अंत में नरक में जाते हैं। जिसने निर्जला एकादशी का व्रत किया है वह चाहे ब्रह्म हत्यारा हो, मद्यपान करता हो, चोरी की हो या गुरु के साथ द्वेष किया हो मगर इस व्रत के प्रभाव से स्वर्ग जाता है। हे कुंतीपुत्र! जो पुरुष या स्त्री श्रद्धापूर्वक इस व्रत को करते हैं उन्हें अग्रलिखित कर्म करने चाहिए। प्रथम भगवान का पूजन, फिर गौदान, ब्राह्मणों को मिष्ठान्न व दक्षिणा देनी चाहिए तथा जल से भरे कलश का दान अवश्य करना चाहिए। निर्जला के दिन अन्न, वस्त्र, उपाहन (जूती) आदि का दान भी करना चाहिए।  जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस कथा को पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

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कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा | कार्तिक मास संकष्टी गणेश चतुर्थी की कहानी

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है । कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाने वाला व्रत, कार्तिक संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कहलाता है। इसे करवा चतुर्थी भी कहते हैं । इस दिन ‘पिंग’ गणेश की पूजा की जाती है । सौभाग्यवती स्त्रियाँ इस दिन अपने पति के लम्बी उम्र के लिये व्रत रखती है। गणेश जी को करवा अर्पित करती हैं। यह व्रत स्त्रियों को अखण्ड सौभाग्य प्रदान करती है। इस व्रत से मनुष्य को सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। भविष्य पुराण में कहा गया है कि जब मन संकटों से घिरा महसूस करे, तो गणेश चतुर्थी का व्रत करें । इससे कष्ट दूर होते हैं और धर्म, अर्थ, मोक्ष, विद्या, धन व आरोग्य की प्राप्ति होती है । कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा  पार्वती जी कहती है कि हे भाग्यशाली! लम्बोदर! भाषणकर्ताओं में श्रेष्ठ! कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को किस नाम वाले गणेश जी की पूजा किस भांति करनी चाहिए। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि अपनी माता की बात सुनकर गणेश जी ने कहा कि कार्तिक कृष्ण चतुर्थी का नाम संकटा है। उस दिन पिंग नामक गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। पूजन पूर्वोक्त विधि से करना उचित हैं। भोजन एक बार करना चाहिए। व्रत और पूजन के बाद ब्राह्मण भोजन कराकर स्वयं मौन होकर भोजन करना चाहिए। मैं इस व्रत का महात्म्य कह रहा हूँ, सावधानी पूर्वक श्रवण कीजिये। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी को घी और उड़द मिलाकर हवन करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को सर्वसिद्धि प्राप्त होती हैं। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि वृत्रासुर दैत्य ने त्रिभुवन को जीत करके सम्पूर्ण देवों को परतंत्र कर दिया। उसने देवताओं को उनके लोकों से निष्काषित कर दिया। परिणामस्वरूप देवता लोग दसों दिशाओं में भाग गए। तब सभी देव इंद्र के नेतृत्व में भगवान विष्णु के शरणागत हुए। देवों की बात सुनकर विष्णु ने कहा कि समुद्री द्वीप में बसने के कारण वे निरापद होकर बलशाली हो गए हैं। पितामह ब्रह्मा जी से किसी देवों के द्वारा न मरने का उन्होंने वर प्राप्त कर लिया हैं। अतः आप लोग अगस्त्य मुनि को प्रसन्न करे। वे मुनि समुद्र को पी जाएंगे। तब दैत्य लोग अपने पिता के पास चले जाएंगे। आप लोग सुख पूर्वक स्वर्ग में निवास करने लगेंगे। अतः आप लोगों का कार्य अगस्त्य मुनि की सहायता से पूरा होगा। ऐसा सुनकर सब देवगण अगस्त्य मुनि के आश्रम में गये और स्तुति के द्वारा उन्हें प्रसन्न किया। मुनि ने प्रसन्न होकर कहा कि हे देवताओं! डरने की कोई बात नहीं हैं, आप लोगों को मनोरथ अवशय ही पूरा होगा। मुनि की बात से सब देवता अपने अपने लोक को चले गए। इधर मुनि को चिंता हुई कि एक लाख योजन इस विशाल समुद्र को मैं कैसे पी सकूंगा? तब गणेश जी का स्मरण करके संकट चतुर्थी के उत्तम व्रत को विधिपूर्वक संपन्न किया। तीन महीने तक व्रत करने के बाद गणेश जी उन पर प्रसन्न हुए। उसी व्रत के प्रभाव से अगस्त्य जी ने समुद्र को सहज ही पान करके सूखा डाला। गणेश जी की इस बात से पार्वती जी अत्यंत प्रसन्न हुई। कृष्ण जी कहते है कि हे महाराज युधिष्ठिर! आप भी चतुर्थी का व्रत कीजिये। इसके करने से आप शीघ्र ही सब शत्रुओं को जीतकर अपना राज्य पा जायेंगे। श्रीकृष्ण के आदेशानुसार युधिष्ठिर ने गणेश जी का व्रत किया। व्रत के प्रभाव से उन्होंने शत्रुओं को जीतकर अखंड राज्य प्राप्त कर लिया। कार्तिक संकष्टी चतुर्थी व्रत पूजन विधि प्रात: काल उठकर नित्य कर्म से निवृत हो स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। श्री गणेश जी का पूजन पंचोपचार (धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, फूल) विधि से करें। इसके बाद हाथ में जल तथा दूर्वा लेकर मन-ही-मन श्री गणेश का ध्यान करते हुये व्रत का संकल्प करें। संध्या होने पर दुबारा स्नान कर स्वच्छ हो जायें। श्री गणेश जी के सामने सभी पूजन सामग्री के साथ बैठ जायें। विधि-विधान से गणेश जी का पूजन करें। वस्त्र अर्पित करें। नैवेद्य के रूप में लड्डू अर्पित करें। चंद्रमा के उदय होने पर चंद्रमा की पूजा कर अर्घ्य अर्पण करें। उसके बाद गणेश चतुर्थी की कथा सुने अथवा सुनाये। घी और उड़द मिला कर हवन करें। तत्पश्चात् गणेश जी की आरती करें। व्रत और पूजन के बाद ब्राह्मण को भोजन करा कर खुद मौन रह कर भोजन करें। स्त्रियाँ चंद्रमा को अर्घ्य देने के पश्चात् अपने पति की आरती और पूजा करें।

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दुर्गा अष्टमी व्रत कथा और पूजन विधि 2023

नवरात्रि या दुर्गा पूजा के आठवें दिन को अष्टमी या दुर्गा अष्टमी के रूप में जाना जाता है. हिन्दू धर्म के अनुसार इस दिन को सबसे शुभ दिन माना जाता है. सबसे महत्वपूर्ण दुर्गा अष्टमी जिसे महाष्टमी भी कहा जाता है. यह अश्विनी के महीने में नौ दिनों की नवरात्री उत्सव के दौरान मनाई जाती है. साथ ही अन्य देवों की भी पूजा की जाती है. दुर्गा अष्टमी को मासिक दुर्गा अष्टमी या मास दुर्गा अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. लोग अपने मनोवांछित फल को प्राप्त करने के उदेश्य से जैसे की जीवन में चल रही किसी समस्या के समाधान के लिए या किसी भी दुःख का निवारण करने के लिए माँ दुर्गा अष्टमी का पूजन करते है. इस दिन भक्त दिव्य आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए सख्त उपवास रखते है हिन्दू धर्म के अनुयायीयों के लिए दुर्गा अष्टमी व्रत एक महत्वपूर्ण आराधना है पूजन विधि दुर्गा अष्टमी तिथि परम कल्याणकारी, पवित्र, सुख देने वाली और धर्म की वृद्धि करने वाली है। अष्टमी को मां भगवती का पूजन करने से कष्ट, दुःख मिट जाते हैं और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती। मां की शास्त्रीय पद्धति से पूजा करने वाले रोगों से मुक्त होकर धन-वैभव से संपन्न होते हैं। देव, दानव, राक्षस, गंधर्व, नाग, यक्ष, किन्नर, मनुष्य आदि सभी अष्टमी और नवमी को ही पूजते हैं। कथाओं के अनुसार इसी तिथि को मां ने चंड-मुंड राक्षसों का संहार किया था।  महा अष्टमी के दिन माता महागौरी की पूजा की जाती है। महाष्टमी के दिन स्नान के बाद मां दुर्गा का षोडशोपचार पूजन करें। महाष्टमी के दिन मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है इसलिए इस दिन मिट्टी के नौ कलश रखे जाते हैं और देवी दुर्गा के नौ रूपों का ध्यान कर उनका आह्वान किया जाता है। अष्टमी के दिन कुल देवी की पूजा के साथ ही मां काली, दक्षिण काली, भद्रकाली और महाकाली की भी आराधना की जाती है। अष्टमी माता को नारियल का भोग लगा सकते हैं, लेकिन इस दिन नारियल खाना निषेध है, क्योंकि इसके खाने से बुद्धि का नाश होता है।  माता महागौरी अन्नपूर्णा का रूप हैं। इस दिन माता अन्नपूर्णा की भी पूजा होती है इसलिए अष्टमी के दिन कन्या भोज और ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। 1. खीर, 2. मालपुए, 3. मीठा हलुआ, 4. पूरणपोळी, 5. केले, 6. नारियल, 7. मिष्ठान्न, 8. घेवर, 9. घी-शहद और 10. तिल और गुड़ माता को अर्पित करें।  यदि अष्टमी को पारणा कर रहे हैं तो विविध प्रकार से महागौरी का पूजन कर भजन, कीर्तन, नृत्यादि उत्सव मनाना चाहिए। विविध प्रकार से पूजा-हवन कर 9 कन्याओं को भोजन खिलाना चाहिए। हलुआ आदि प्रसाद वितरित करना चाहिए। दुर्गा अष्टमी इतिहास और कथा प्राचीन समय में दुर्गम नामक एक दुष्ट और क्रूर दानव रहता था, वह बहुत ही शक्तिशाली था, अपनी क्रूरता से उसने तीनों लोकों में अत्याचार कर रखा था. उसकी दुष्टता से पृथ्वी, आकाश और ब्रह्माण्ड तीनों जगह लोग पीड़ित थे. उसने ऐसा आतंक फैलाया था, कि आतंक के डर से सभी देवता कैलाश में चले गए, क्योंकि देवता उसे मार नहीं सकते थे, और न ही उसे सजा दे सकते थे. सभी देवता ने भगवान शिव जी से इस बारे में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया अंत में विष्णु, ब्रह्मा और सभी देवता के साथ मिलकर भगवान शंकर ने एक मार्ग निकाला और सबने अपनी उर्जा अर्थात अपनी शक्तियों को साझा करके संयुकत रूप से शुक्ल पक्ष अष्टमी को देवी दुर्गा को जन्म दिया. उसके बाद उन्होंने उन्हें सबसे शक्तिशाली हथियार को देकर दानव के साथ एक कठोर युद्ध को छेड़ दिया, फिर देवी दुर्गा ने उसको बिना किसी समय को लगाये तुरंत दानव का संहार कर दिया. वह दानव दुर्ग सेन के नाम से भी जाना जाता था. उसके बाद तीनों लोकों में खुशियों के साथ ही जयकारे लगने लगे, और इस दिन को ही दुर्गाष्टमी की उत्पति हुई. इस दिन बुराई पर अच्छाई की जीत हुई.   दुर्गा अष्टमी के दिन का महत्व दुर्गा अष्टमी के व्रत को अध्यात्मिक लाभ प्राप्त करने के लिए और देवी दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मनाया जाता है. संस्कृत की भाषा में दुर्गा शब्द का अर्थ होता है अपराजित अर्थात जो किसी से भी कभी पराजित या हारा नहीं हो उसको अपराजित कहते है और अष्टमी का अर्थ होता है आठवा दिन. इस अष्टमी के दिन महिषासुर नामक राक्षस पर देवी दुर्गा ने जीत हासिल की थी. हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन देवी ने अपने भयानक और रौद्र रूप को धारण किया था, इसलिए इस दिन को देवी भद्रकाली के रूप में भी जाना जाता है. इस दिन का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योकि इस दिन दुष्ट और क्रूर राक्षस को उन्होंने मार कर सारे ब्रह्माण्ड को भय मुक्त किया था. साथ ही यह माना जाता है कि इस दिन जो भी पूरी भक्ति और श्रधा से पूर्ण समर्पण के साथ दुर्गा अष्टमी का व्रत करता है उसके जीवन में खुशी और अच्छे भाग्य का आगमन होता है. दुर्गा अष्टमी का महत्त्व इसलिए ज्यादा बढ़ जाता है क्योकि इस दिन देवी भक्तो पर अपनी विशेष कृपा की बरसात करती है. इस दिन देवी का उपवास करने वाले भक्तों को जीवन में दिव्य सरंक्षण, समृधि, व्यापार में लाभ, विकास, सफलता और शांति की प्राप्ति होती है. सभी बीमारियों से शरीर को छुटकारा प्राप्त होता है अर्थात शरीर रोग मुक्त और भय मुक्त होता है.   2023 में होने वाली मासिक दुर्गा अष्टमी की तारीख और तिथि    शुक्ल पक्ष के अष्टमी तिथि के दौरान हर महीने में दुर्गा अष्टमी का त्यौहार मनाया जाता है. इस दिन भक्त शारदा दुर्गा का पूजन करके उपवास भी करते है. इस वर्ष होने वाली मासिक दुर्गा अष्टमी के दिन, तारीखों और उनके पूजन के समय को बताया गया है. जो पूजन का समय है उस समय के बीच में आप किसी भी वक्त अष्टमी पूजन कर सकते है. सभी जानकारियों को नीचे दिए गए टेबल में प्रदर्शित किया गया है, जो निम्नवत है तारीख महीना दुर्गा अष्टमी 29 जनवरी मासिक दुर्गाष्टमी 27 फरवरी मासिक दुर्गाष्टमी 29 मार्च चैत्र दुर्गाष्टमी 28 अप्रैल मासिक दुर्गाष्टमी 28 मई मासिक दुर्गाष्टमी 26 जून मासिक दुर्गाष्टमी 26 जुलाई मासिक

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रोहिणी व्रत सूची 2023

महत्वपूर्ण जानकारी रोहिणी व्रत मई में रविवार, 21 मई 2023 रोहिणी व्रत प्रारंभ : 20 मई 2023 को प्रातः 07:35 बजे रोहिणी व्रत समाप्त: 21 मई 2023 को सुबह 08:31 बजे रोहिणी व्रत जैन समुदाय के लोगों का महत्वपूर्ण व्रत है इस व्रत को जैन समुदाय के लोग करते है। यह व्रत रोहिणी नक्षत्र के दिन किया जाता हैं। इसलिए इसे व्रत को रोहिणी व्रत कहा जाता है। रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने पर रोहिणी व्रत का पारण किया जाता है। रोहिणी नक्षत्र के समाप्त होने के बाद मार्गशीर्ष नक्षत्र आता है। रोहिणी व्रत एक वर्ष में 12 होते है अर्थात् यह प्रत्येक महीनें में आता है। फलाहार सूर्यास्त से पहले किया जाता है क्योंकि रात को भोजन नहीं किया जाता है।ऐसा माना जाता है कि इस व्रत का पालन 3, 5 या 7 वर्षों तक लगातार किया जाता है। अगर उचित अवधि की बात करें तो यह 5 वर्ष और 5 महीने है। इस व्रत का समापन उद्यापन द्वारा ही किया जाता है। यह व्रत पुरुष और स्त्रियां दोनों कर सकते हैं। हालांकि, स्त्रियों के लिए यह व्रत अनिवार्य माना गया है। जैन समुदाय में यह मान्यता है कि यह व्रत विशेष फल देता है तथा कर्म बन्धन से छुटकारा दिलाने में सहायक होता हे। रोहिणी व्रत पूजा विधिः इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ जाना चाहिए और घर की साफ सफाई भी अच्छे से कर लेनी चाहिए। इसके बाद सभी नित्यकर्मों से निवृत्त होकर स्नानादि कर घर की साफ-सफाई करनी चाहिए। गंगाजल युक्त पानी से स्नान-ध्यान करें और फिर व्रत का संकल्प लें। आमचन कर अपने आप को शुद्ध करें। पहले सूर्य भगवान को जल का अर्घ्य दें। इस व्रत के दौरान जैन धर्म में रात का भोजन करने की मनाही होती है। फलाहार सूर्यास्त से पूर्व कर लेना चाहिए। रोहिणी नक्षत्र समय के साथ रोहिणी व्रत सूची 2023 जनवरी रोहिणी व्रत 2023 बुधवार, 04 जनवरी 2023प्रारंभ: 03 जनवरी 2023 अपराह्न 05:48 बजेसमाप्त: 04 जनवरी 2023 अपराह्न 07:17 बजे मंगलवार, 31 जनवरी 2023प्रारंभ : 31 जनवरी 2023 दोपहर 01:13 बजेसमाप्त: 01 फरवरी 2023 पूर्वाह्न 02:36 बजे फरवरी रोहिणी व्रत 2023 मंगलवार, 28 फरवरी 2023प्रारंभ: 27 फरवरी 2023 पूर्वाह्न 08:43 बजेसमाप्त: 28 फरवरी 2023 पूर्वाह्न 09:59 बजे मार्च रोहिणी व्रत 2023 सोमवार, 27 मार्च 2023प्रारंभ : 26 मार्च 2023 अपराह्न 04:17 बजेसमाप्त: 27 मार्च 2023 को शाम 05:26 बजे अप्रैल रोहिणी व्रत 2023 रविवार, 23 अप्रैल 2023प्रारंभ: 22 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 11:53 बजेसमाप्त: 24 अप्रैल 2023 पूर्वाह्न 12:56 बजे मई रोहिणी व्रत 2023 रविवार, 21 मई 2023प्रारंभ: 20 मई 2023 पूर्वाह्न 07:35 बजेसमाप्त: 21 मई 2023 पूर्वाह्न 08:31 बजे जून रोहिणी व्रत 2023 शनिवार, 17 जून 2023प्रारंभ: 16 जून 2023 अपराह्न 03:21 बजेसमाप्त: 17 जून 2023 अपराह्न 04:10 बजे जुलाई रोहिणी व्रत 2023 शुक्रवार, 14 जुलाई 2023प्रारंभ: 13 जुलाई 2023 पूर्वाह्न 11:07 बजेसमाप्त: 14 जुलाई 2023 पूर्वाह्न 11:50 बजे अगस्त रोहिणी व्रत 2023 शुक्रवार, 11 अगस्त 2023प्रारंभ : 10 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 06:55 बजेसमाप्त: 11 अगस्त 2023 पूर्वाह्न 07:31 बजे सितंबर रोहिणी व्रत 2023 गुरुवार, 07 सितंबर 2023प्रारंभ: 06 सितंबर 2023 अपराह्न 02:39 बजेसमाप्त: 07 सितंबर 2023 अपराह्न 03:07 बजे अक्टूबर रोहिणी व्रत 2023 बुधवार, 04 अक्टूबर 2023प्रारंभ: 03 अक्टूबर 2023 रात 10:22 बजेसमाप्त: 04 अक्टूबर 2023 रात 10:44 बजे मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023प्रारंभ : 31 अक्टूबर 2023 पूर्वाह्न 06:09 बजेसमाप्त: 01 नवंबर 2023 पूर्वाह्न 06:23 बजे नवंबर रोहिणी व्रत 2023 मंगलवार, 28 नवंबर 2023प्रारंभ: 27 नवंबर 2023 दोपहर 01:52 बजेसमाप्त : 28 नवंबर 2023 अपराह्न 01:58 बजे दिसंबर रोहिणी व्रत 2023 सोमवार, 25 दिसंबर 2023प्रारंभ: 24 दिसंबर 2023 अपराह्न 09:34 बजेसमाप्त: 25 दिसंबर 2023 अपराह्न 09:34 बजे

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 पति की लम्बी आयु प्राप्त करने के लिए रखें वट सावित्री व्रत

वट सावित्री व्रत विवाहित हिंदू महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण व्रत है जिसे पारंपरिक पंचांग के अनुसार ‘ज्येष्ठ’ के महीने में पूर्णिमा या ‘अमावस्या तिथि पर मनाया जाता है। इसका उपवास अनुष्ठान ‘त्रयोदशी’ से शुरू होता है और पूर्णिमा या अमावस्या पर समाप्त होता है। प्रायः अनेक हिंदू त्योहार पूर्णिमा या अमावस्या पर आयोजित होते हैं और केवल उसी एक दिन ही मनाए जाते हैं। केवल वट सावित्री व्रत एक ऐसा अपवाद है जो पूर्णिमा और अमावस्या दोनों दिनों में मनाया है। ज्येष्ठ अमावस्या वाले दिन इसे ‘शनि जयंती’ के रूप में भी मनाया जाता है। गुजरात, महाराष्ट्र और भारत के दक्षिणी राज्यों में विवाहित महिलाएं इसे पूर्णिमा वाले मनाती हैं और उत्तर भारत की महिलायें अमावस्या वाले दिन। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है कि इस व्रत का संबंध वट के वृक्ष और सावित्री के साथ है, इसलिए इसे वट सावित्री व्रत के नाम से संबोधित किया जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन महिलाओं को व्रत के साथ-साथ मौन भी धारण करना चाहिए। मौन धारण करने से महिलाओं को हजारों गौओं के दान जितना पुण्य एकसाथ ही मिल जाता है। कहा जाता है कि वट वृक्ष का पूजन और व्रत करके ही सावित्री ने यमराज से अपने पति को वापस पा लिया था। तभी से पति की लंबी आयु के लिए इस व्रत का विधान प्रचलित हो गया। वट सावित्री व्रत का महत्व वट सावित्री व्रत की महिमा का उल्लेख कई हिंदू पुराणों जैसे ‘भविष्योत्तर पुराण’ और ‘स्कंद पुराण’ में किया गया है। वट सावित्री व्रत पर ‘वट’ या बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, बरगद का पेड़ ‘त्रिमूर्ति’ अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है। पेड़ की जड़ें भगवान ब्रह्मा का प्रतिनिधित्व करती हैं, तना भगवान विष्णु का प्रतीक है और पेड़ का ऊपरी भाग भगवान शिव है। इसके अलावा पूरा ‘वट’ वृक्ष ‘सावित्री‘ का प्रतीक है। महिलाएं अपने पति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस दिन एक पवित्र उपवास रखती हैं और अपने अच्छे भाग्य और जीवन में सफलता के लिए प्रार्थना भी करती हैं। व्रत की विधि इस दिन सुबह स्नान आदि दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर एक बांस की टोकरी लेकर उसमें सात प्रकार के धान्य रखें और भगवान् ब्रह्मा की मूर्ति प्रतिष्ठापित करके उसके बाईं ओर एक दूसरी बांस की टोकरी रखें और इसी प्रकार उसमें सत्यवान् और सावित्री की मूर्ति प्रतिष्ठापित करके दोनों टोकरियों को वट के वृक्ष के नीचे ले जाकर रख दें। दोनों टोकरियों में प्रतिष्ठापित मूर्तियों की मौली, रोली, कच्च सूत, भीगे हुए चने और जल से पूजा आदि करके वट वृक्ष के मूल में जल का सिंचन करना चाहिये। वृक्ष का सिंचन करके वृक्ष के तने के चारों ओर सूत लपेटकर तीन बार वृक्ष की परिक्रमा और घर लौटकर अपनी सास आदि के पांव छूकर उनका आशीर्वाद ग्रहण करें। वट सावित्री व्रत की कथा पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल मे एक राजा थे अश्वपति। उनकी एक ही संतान थी सावित्री। सावित्री वनवासी राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से विवाह करना चाहती थी। नारद जी ने सावित्री को बताया कि सत्यवान की आयु बहुत कम है। फिर भी सावित्री ने अपना निर्णय नहीं बदला और सत्यवान से ही विवाह के लिए अड़ी रही। विवाह के बाद वह राज वैभव त्याग कर सत्यवान के साथ उनके परिवार की सेवा करने के लिए वन में ही रहने लगी। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु हुई, उस दिन वह लकड़ियां काटने के लिए जंगल गए हुए थे। वहां वह अचानक मूर्च्छित होकर गिर पड़े। थोड़ी ही देर में यमराज ने सत्यवान के प्राण ले लिए। 3 दिनों से उपवास में रह रही सावित्री उस बात को जानती थी। इसलिए वह बिना व्याकुल हुए यमराज से सत्यवान के प्राण लौटाने की प्रार्थना करने लगीं। लेकिन यमराज ने उसकी नहीं सुनी और सत्यवान को लेकर यमलोक की तरफ चल दिये। यह देखकर सावित्री भी यमराज के पीछे पीछे चलने लगी। यमराज ने सावित्री से बहुत बार लौटने के लिए कहा लेकिन सावित्री अपनी जिद पर अड़ी रही कि मैं बिना अपने पति के वापस नहीं जाऊंगी। अन्यथा मुझे भी अपने साथ ले चलो। सावित्री का यह साहस और त्याग देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए

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