CHALISA

Maa Maha Kali Jai Kali Kankal Malini:माँ महाकाली – जय काली कंकाल मालिनी

Maa Maha Kali:काली चालीसा: शक्ति और तांत्रिक साधना का एक महत्वपूर्ण मंत्र Maa Maha Kali:काली चालीसा हिंदू धर्म में माता काली को समर्पित एक प्रसिद्ध स्तुति है। यह चालीसा माता काली के विभिन्न रूपों और उनके महात्म्य का वर्णन करती है। इसे भक्तगण माता काली की कृपा प्राप्त करने के लिए पाठ करते हैं। Maa Maha Kali:काली चालीसा का महत्व Maa Maha Kali:काली चालीसा का पाठ कैसे करें Maa Maha Kali:काली चालीसा के लाभ माँ महाकाली – जय काली कंकाल मालिनी! (Maa Maha Kali Jai Kali Kankal Malini) ॥ दोहा ॥जय जय सीताराम के मध्यवासिनी अम्ब,देहु दर्श जगदम्ब अब करहु न मातु विलम्ब ॥जय तारा जय कालिका जय दश विद्या वृन्द,काली चालीसा रचत एक सिद्धि कवि हिन्द ॥प्रातः काल उठ जो पढ़े दुपहरिया या शाम,दुःख दरिद्रता दूर हों सिद्धि होय सब काम ॥ ॥ चौपाई ॥जय काली कंकाल मालिनी,जय मंगला महाकपालिनी ॥ रक्तबीज वधकारिणी माता,सदा भक्तन की सुखदाता ॥ शिरो मालिका भूषित अंगे,जय काली जय मद्य मतंगे ॥ हर हृदयारविन्द सुविलासिनी,जय जगदम्बा सकल दुःख नाशिनी ॥ ४ ॥ ह्रीं काली श्रीं महाकाराली,क्रीं कल्याणी दक्षिणाकाली ॥ जय कलावती जय विद्यावति,जय तारासुन्दरी महामति ॥ देहु सुबुद्धि हरहु सब संकट,होहु भक्त के आगे परगट ॥ जय ॐ कारे जय हुंकारे,महाशक्ति जय अपरम्पारे ॥ ८ ॥ कमला कलियुग दर्प विनाशिनी,सदा भक्तजन की भयनाशिनी ॥ अब जगदम्ब न देर लगावहु,दुख दरिद्रता मोर हटावहु ॥ जयति कराल कालिका माता,कालानल समान घुतिगाता ॥ जयशंकरी सुरेशि सनातनि,कोटि सिद्धि कवि मातु पुरातनी ॥ १२ ॥ कपर्दिनी कलि कल्प विमोचनि,जय विकसित नव नलिन विलोचनी ॥ आनन्दा करणी आनन्द निधाना,देहुमातु मोहि निर्मल ज्ञाना ॥ करूणामृत सागरा कृपामयी,होहु दुष्ट जन पर अब निर्दयी ॥ सकल जीव तोहि परम पियारा,सकल विश्व तोरे आधारा ॥ १६ ॥ प्रलय काल में नर्तन कारिणि,जग जननी सब जग की पालिनी ॥ महोदरी माहेश्वरी माया,हिमगिरि सुता विश्व की छाया ॥ स्वछन्द रद मारद धुनि माही,गर्जत तुम्ही और कोउ नाहि ॥ स्फुरति मणिगणाकार प्रताने,तारागण तू व्योम विताने ॥ २० ॥ श्रीधारे सन्तन हितकारिणी,अग्निपाणि अति दुष्ट विदारिणि ॥ धूम्र विलोचनि प्राण विमोचिनी,शुम्भ निशुम्भ मथनि वर लोचनि ॥ सहस भुजी सरोरूह मालिनी,चामुण्डे मरघट की वासिनी ॥ खप्पर मध्य सुशोणित साजी,मारेहु माँ महिषासुर पाजी ॥ २४ ॥ अम्ब अम्बिका चण्ड चण्डिका,सब एके तुम आदि कालिका ॥ अजा एकरूपा बहुरूपा,अकथ चरित्रा शक्ति अनूपा ॥ कलकत्ता के दक्षिण द्वारे,मूरति तोरि महेशि अपारे ॥ कादम्बरी पानरत श्यामा,जय माँतगी काम के धामा ॥ २८ ॥ कमलासन वासिनी कमलायनि,जय श्यामा जय जय श्यामायनि ॥ मातंगी जय जयति प्रकृति हे,जयति भक्ति उर कुमति सुमति हे ॥ कोटि ब्रह्म शिव विष्णु कामदा,जयति अहिंसा धर्म जन्मदा ॥ जलथल नभ मण्डल में व्यापिनी,सौदामिनी मध्य आलापिनि ॥ ३२ ॥ झननन तच्छु मरिरिन नादिनी,जय सरस्वती वीणा वादिनी ॥ ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे,कलित कण्ठ शोभित नरमुण्डा ॥ जय ब्रह्माण्ड सिद्धि कवि माता,कामाख्या और काली माता ॥ हिंगलाज विन्ध्याचल वासिनी,अटठहासिनि अरु अघन नाशिनी ॥ ३६ ॥ कितनी स्तुति करूँ अखण्डे,तू ब्रह्माण्डे शक्तिजित चण्डे ॥ करहु कृपा सब पे जगदम्बा,रहहिं निशंक तोर अवलम्बा ॥ चतुर्भुजी काली तुम श्यामा,रूप तुम्हार महा अभिरामा ॥ खड्ग और खप्पर कर सोहत,सुर नर मुनि सबको मन मोहत ॥ ४० ॥ तुम्हारी कृपा पावे जो कोई,रोग शोक नहिं ताकहँ होई ॥ जो यह पाठ करै चालीसा,तापर कृपा करहिं गौरीशा ॥ ॥ दोहा ॥जय कपालिनी जय शिवा,जय जय जय जगदम्ब,सदा भक्तजन केरि दुःख हरहु,मातु अविलम्ब ॥

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Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा

Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा: माता वैष्णो देवी की भक्ति में डूब जाइए Vaishno Chalisha:आपने वैष्णो चालीसा के बारे में पूछा है। माता वैष्णो देवी हिंदू धर्म में एक बहुत ही लोकप्रिय देवी हैं। उन्हें शक्ति की देवी माना जाता है और उनकी पूजा बहुत ही श्रद्धा और भक्ति के साथ की जाती है। वैष्णो देवी चालीसा, माता वैष्णो देवी की स्तुति में गाया जाने वाला एक भजन है। यह भजन माता के प्रति भक्तिभाव को बढ़ाता है और मान्यताओं के अनुसार, इसका जाप करने से मन शांत होता है और मनोकामनाएं पूरी होती हैं। Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा का महत्व Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा का जाप कैसे करें? वैष्णो चालीसा का जाप करना बहुत ही आसान है। आप इसे किसी भी समय और किसी भी जगह कर सकते हैं। जाप करते समय आप माता वैष्णो देवी की तस्वीर या मूर्ति के सामने बैठ सकते हैं। आप मन में या जोर से जाप कर सकते हैं। यदि आप वैष्णो चालीसा का हिंदी में पाठ करना चाहते हैं, तो आप इसे ऑनलाइन आसानी से खोज सकते हैं। क्या आप वैष्णो चालीसा का हिंदी में पाठ पढ़ना चाहते हैं या इसके बारे में और जानना चाहते हैं? मुझे यह बताने में खुशी होगी कि मैं आपकी कैसे मदद कर सकता हूँ। यहाँ कुछ अतिरिक्त जानकारी दी गई है जो आपके लिए उपयोगी हो सकती है: Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा Vaishno Chalisha:वैष्णो चालीसा एक भक्ति गीत है जो वैष्णो माता पर आधारित है। ॥ दोहा ॥गरुड़ वाहिनी वैष्णवी,त्रिकुटा पर्वत धाम।काली, लक्ष्मी, सरस्वती,शक्ति तुम्हें प्रणाम॥ ॥ चौपाई ॥नमो: नमो: वैष्णो वरदानी।कलि काल मे शुभ कल्याणी॥मणि पर्वत पर ज्योति तुम्हारी।पिंडी रूप में हो अवतारी॥ देवी देवता अंश दियो है।रत्नाकर घर जन्म लियो है॥करी तपस्या राम को पाऊँ।त्रेता की शक्ति कहलाऊँ॥ कहा राम मणि पर्वत जाओ।कलियुग की देवी कहलाओ॥विष्णु रूप से कल्की बनकर।लूंगा शक्ति रूप बदलकर॥ तब तक त्रिकुटा घाटी जाओ।गुफा अंधेरी जाकर पाओ॥काली-लक्ष्मी-सरस्वती माँ।करेंगी शोषण-पार्वती माँ॥ ब्रह्मा, विष्णु, शंकर द्वारे।हनुमत भैरों प्रहरी प्यारे॥रिद्धि, सिद्धि चंवर डुलावें।कलियुग-वासी पूजत आवें॥ पान सुपारी ध्वजा नारियल।चरणामृत चरणों का निर्मल॥दिया फलित वर माँ मुस्काई।करन तपस्या पर्वत आई॥ कलि कालकी भड़की ज्वाला।इक दिन अपना रूप निकाला॥कन्या बन नगरोटा आई।योगी भैरों दिया दिखाई॥ रूप देख सुन्दर ललचाया।पीछे-पीछे भागा आया॥कन्याओं के साथ मिली माँ।कौल-कंदौली तभी चली माँ॥ देवा माई दर्शन दीना।पवन रूप हो गई प्रवीणा॥नवरात्रों में लीला रचाई।भक्त श्रीधर के घर आई॥ योगिन को भण्डारा दीना।सबने रूचिकर भोजन कीना॥मांस, मदिरा भैरों मांगी।रूप पवन कर इच्छा त्यागी॥ बाण मारकर गंगा निकाली।पर्वत भागी हो मतवाली॥चरण रखे आ एक शिला जब।चरण-पादुका नाम पड़ा तब॥ पीछे भैरों था बलकारी।छोटी गुफा में जाय पधारी॥नौ माह तक किया निवासा।चली फोड़कर किया प्रकाशा॥ आद्या शक्ति-ब्रह्म कुमारी।कहलाई माँ आद कुंवारी॥गुफा द्वार पहुँची मुस्काई।लांगुर वीर ने आज्ञा पाई॥ भागा-भागा भैरों आया।रक्षा हित निज शस्त्र चलाया॥पड़ा शीश जा पर्वत ऊपर।किया क्षमा जा दिया उसे वर॥ अपने संग में पुजवाऊंगी।भैरों घाटी बनवाऊंगी॥पहले मेरा दर्शन होगा।पीछे तेरा सुमरन होगा॥ बैठ गई माँ पिण्डी होकर।चरणों में बहता जल झर-झर॥चौंसठ योगिनी-भैंरो बरवन।सप्तऋषि आ करते सुमरन॥ घंटा ध्वनि पर्वत पर बाजे।गुफा निराली सुन्दर लागे॥भक्त श्रीधर पूजन कीना।भक्ति सेवा का वर लीना॥ सेवक ध्यानूं तुमको ध्याया।ध्वजा व चोला आन चढ़ाया॥सिंह सदा दर पहरा देता।पंजा शेर का दु:ख हर लेता॥ जम्बू द्वीप महाराज मनाया।सर सोने का छत्र चढ़ाया॥हीरे की मूरत संग प्यारी।जगे अखंड इक जोत तुम्हारी॥ आश्विन चैत्र नवराते आऊँ।पिण्डी रानी दर्शन पाऊँ॥सेवक ‘शर्मा’ शरण तिहारी।हरो वैष्णो विपत हमारी॥ ॥ दोहा ॥कलियुग में महिमा तेरी,है माँ अपरम्पार।धर्म की हानि हो रही,प्रगट हो अवतार॥

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Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा

Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी माता को शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। वे विंध्य पर्वत की अधिष्ठात्री देवी हैं और माता पार्वती का एक स्वरूप मानी जाती हैं। विन्ध्येश्वरी माता की पूजा विशेष रूप से मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में की जाती है। Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा का महत्व विन्ध्येश्वरी चालीसा का पाठ करने से मन में शक्ति और शांति का अनुभव होता है। यह माना जाता है कि चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वे मोक्ष प्राप्त करते हैं। Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा का पाठ कैसे करें? Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा के लाभ Vindhyeshvari Chalisa:विन्ध्येश्वरी चालीसा ॥ दोहा ॥नमो नमो विन्ध्येश्वरी,नमो नमो जगदम्ब ।सन्तजनों के काज में,करती नहीं विलम्ब ॥ जय जय जय विन्ध्याचल रानी।आदिशक्ति जगविदित भवानी ॥ सिंहवाहिनी जै जगमाता ।जै जै जै त्रिभुवन सुखदाता ॥ कष्ट निवारण जै जगदेवी ।जै जै सन्त असुर सुर सेवी ॥ महिमा अमित अपार तुम्हारी ।शेष सहस मुख वर्णत हारी ॥ दीनन को दु:ख हरत भवानी ।नहिं देखो तुम सम कोउ दानी ॥ सब कर मनसा पुरवत माता ।महिमा अमित जगत विख्याता ॥ जो जन ध्यान तुम्हारो लावै ।सो तुरतहि वांछित फल पावै ॥ तुम्हीं वैष्णवी तुम्हीं रुद्रानी ।तुम्हीं शारदा अरु ब्रह्मानी ॥ रमा राधिका श्यामा काली ।तुम्हीं मातु सन्तन प्रतिपाली ॥ उमा माध्वी चण्डी ज्वाला ।वेगि मोहि पर होहु दयाला ॥ 10 तुम्हीं हिंगलाज महारानी ।तुम्हीं शीतला अरु विज्ञानी ॥ दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता ।तुम्हीं लक्ष्मी जग सुख दाता ॥ तुम्हीं जाह्नवी अरु रुद्रानी ।हे मावती अम्ब निर्वानी ॥ अष्टभुजी वाराहिनि देवा ।करत विष्णु शिव जाकर सेवा ॥ चौंसट्ठी देवी कल्यानी ।गौरि मंगला सब गुनखानी ॥ पाटन मुम्बादन्त कुमारी ।भाद्रिकालि सुनि विनय हमारी ॥ बज्रधारिणी शोक नाशिनी ।आयु रक्षिनी विन्ध्यवासिनी ॥ जया और विजया वैताली ।मातु सुगन्धा अरु विकराली ॥ नाम अनन्त तुम्हारि भवानी ।वरनै किमि मानुष अज्ञानी ॥ जापर कृपा मातु तब होई ।जो वह करै चाहे मन जोई ॥ 20 कृपा करहु मोपर महारानी ।सिद्ध करहु अम्बे मम बानी ॥ जो नर धरै मातु कर ध्याना ।ताकर सदा होय कल्याना ॥ विपति ताहि सपनेहु नाहिं आवै ।जो देवीकर जाप करावै ॥ जो नर कहँ ऋण होय अपारा ।सो नर पाठ करै शत बारा ॥ निश्चय ऋण मोचन होई जाई ।जो नर पाठ करै चित लाई ॥ अस्तुति जो नर पढ़े पढ़अवे ।या जग में सो बहु सुख पावे ॥ जाको व्याधि सतावे भाई ।जाप करत सब दूर पराई ॥ जो नर अति बन्दी महँ होई ।बार हजार पाठ करि सोई ॥ निश्चय बन्दी ते छुट जाई ।सत्य वचन मम मानहु भाई ॥ जापर जो कछु संकट होई ।निश्चय देविहिं सुमिरै सोई ॥ 30 जा कहँ पुत्र होय नहिं भाई ।सो नर या विधि करे उपाई ॥ पाँच वर्ष जो पाठ करावै ।नौरातन महँ विप्र जिमावै ॥ निश्चय होहिं प्रसन्न भवानी ।पुत्र देहिं ता कहँ गुणखानी ॥ ध्वजा नारियल आन चढ़ावै ।विधि समेत पूजन करवावै ॥ नित प्रति पाठ करै मन लाई ।प्रेम सहित नहिं आन उपाई ॥ यह श्री विन्ध्याचल चालीसा ।रंक पढ़त होवे अवनीसा ॥ यह जन अचरज मानहु भाई ।कृपा दृश्टि जापर होइ जाई ॥ जै जै जै जग मातु भवानी ।कृपा करहु मोहि निज जन जानी ॥ 40

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Kali Mata Chalisa-माँ काली चालीसा

Kali Mata Chalisa:माँ काली चालीसा Kali Mata Chalisa:माँ काली को शक्ति की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। Kali Mata Chalisa वे हिंदू धर्म की दस महाविद्याओं में से एक हैं। माँ काली की शक्ति को असीम माना जाता है और वे अपने भक्तों की रक्षा करने वाली देवी मानी जाती हैं। Kali Mata Chalisa:माँ काली चालीसा का महत्व माँ काली की चालीसा का पाठ करने से मन में शक्ति और शांति का अनुभव होता है। Kali Mata Chalisa यह माना जाता है कि चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और वे मोक्ष प्राप्त करते हैं। Kali Mata Chalisa:माँ काली चालीसा का पाठ कैसे करें? Kali Mata Chalisa:माँ काली चालीसा के लाभ Kali Mata Chalisa -माँ काली चालीसा ॥दोहा॥जयकाली कलिमलहरण,महिमा अगम अपार ।महिष मर्दिनी कालिका,देहु अभय अपार ॥ ॥ चौपाई ॥अरि मद मान मिटावन हारी ।मुण्डमाल गल सोहत प्यारी ॥ अष्टभुजी सुखदायक माता ।दुष्टदलन जग में विख्याता ॥ भाल विशाल मुकुट छवि छाजै ।कर में शीश शत्रु का साजै ॥ दूजे हाथ लिए मधु प्याला ।हाथ तीसरे सोहत भाला ॥4॥ चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे ।छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे ॥ सप्तम करदमकत असि प्यारी ।शोभा अद्भुत मात तुम्हारी ॥ अष्टम कर भक्तन वर दाता ।जग मनहरण रूप ये माता ॥ भक्तन में अनुरक्त भवानी ।निशदिन रटें ॠषी-मुनि ज्ञानी ॥8॥ महशक्ति अति प्रबल पुनीता ।तू ही काली तू ही सीता ॥ पतित तारिणी हे जग पालक ।कल्याणी पापी कुल घालक ॥ शेष सुरेश न पावत पारा ।गौरी रूप धर्यो इक बारा ॥ तुम समान दाता नहिं दूजा ।विधिवत करें भक्तजन पूजा ॥12॥ रूप भयंकर जब तुम धारा ।दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा ॥ नाम अनेकन मात तुम्हारे ।भक्तजनों के संकट टारे ॥ कलि के कष्ट कलेशन हरनी ।भव भय मोचन मंगल करनी ॥ महिमा अगम वेद यश गावैं ।नारद शारद पार न पावैं ॥16॥ भू पर भार बढ्यौ जब भारी ।तब तब तुम प्रकटीं महतारी ॥ आदि अनादि अभय वरदाता ।विश्वविदित भव संकट त्राता ॥ कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा ।उसको सदा अभय वर दीन्हा ॥ ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा ।काल रूप लखि तुमरो भेषा ॥20॥ कलुआ भैंरों संग तुम्हारे ।अरि हित रूप भयानक धारे ॥ सेवक लांगुर रहत अगारी ।चौसठ जोगन आज्ञाकारी ॥ त्रेता में रघुवर हित आई ।दशकंधर की सैन नसाई ॥ खेला रण का खेल निराला ।भरा मांस-मज्जा से प्याला ॥24॥ रौद्र रूप लखि दानव भागे ।कियौ गवन भवन निज त्यागे ॥ तब ऐसौ तामस चढ़ आयो ।स्वजन विजन को भेद भुलायो ॥ ये बालक लखि शंकर आए ।राह रोक चरनन में धाए ॥ तब मुख जीभ निकर जो आई ।यही रूप प्रचलित है माई ॥28॥ बाढ्यो महिषासुर मद भारी ।पीड़ित किए सकल नर-नारी ॥ करूण पुकार सुनी भक्तन की ।पीर मिटावन हित जन-जन की ॥15॥ तब प्रगटी निज सैन समेता ।नाम पड़ा मां महिष विजेता ॥ शुंभ निशुंभ हने छन माहीं ।तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं ॥32॥ मान मथनहारी खल दल के ।सदा सहायक भक्त विकल के ॥ दीन विहीन करैं नित सेवा ।पावैं मनवांछित फल मेवा ॥17॥ संकट में जो सुमिरन करहीं ।उनके कष्ट मातु तुम हरहीं ॥ प्रेम सहित जो कीरति गावैं ।भव बन्धन सों मुक्ती पावैं ॥36॥ काली चालीसा जो पढ़हीं ।स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं ॥ दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा ।केहि कारण मां कियौ विलम्बा ॥ करहु मातु भक्तन रखवाली ।जयति जयति काली कंकाली ॥ सेवक दीन अनाथ अनारी ।भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी ॥40॥ ॥दोहा॥प्रेम सहित जो करे,काली चालीसा पाठ ।तिनकी पूरन कामना,होय सकल जग ठाठ ॥

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Santoshi Mata Chalisa:संतोषी माता चालीसा

Santoshi Mata Chalisa:संतोषी माता चालीसा Santoshi Mata Chalisa:संतोषी माता की चालीसा हिंदू धर्म में एक लोकप्रिय स्तुति है, जो विशेष रूप से संतोषी माता की पूजा करने वालों द्वारा पढ़ी जाती है। संतोषी माता को संतोष की देवी माना जाता है और उन्हें सुख, समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। Santoshi Mata Chalisa:चालीसा का पाठ कैसे करें Santoshi Mata Chalisa:क्यों पढ़ें संतोषी माता की चालीसा Santoshi Mata Chalisa:ध्यान दें Santoshi Mata Chalisa:संतोषी माता चालीसा ॥ दोहा ॥बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार ।ध्यान धरत ही होत नर दुःख सागर से पार ॥ भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम ।कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम ॥ ॥ चौपाई ॥जय सन्तोषी मात अनूपम ।शान्ति दायिनी रूप मनोरम ॥ सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा ।वेश मनोहर ललित अनुपा ॥ श्‍वेताम्बर रूप मनहारी ।माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी ॥ दिव्य स्वरूपा आयत लोचन ।दर्शन से हो संकट मोचन ॥ 4 ॥ जय गणेश की सुता भवानी ।रिद्धि- सिद्धि की पुत्री ज्ञानी ॥ अगम अगोचर तुम्हरी माया ।सब पर करो कृपा की छाया ॥ नाम अनेक तुम्हारे माता ।अखिल विश्‍व है तुमको ध्याता ॥ तुमने रूप अनेकों धारे ।को कहि सके चरित्र तुम्हारे ॥ 8 ॥ धाम अनेक कहाँ तक कहिये ।सुमिरन तब करके सुख लहिये ॥ विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी ।कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी ॥ कलकत्ते में तू ही काली ।दुष्ट नाशिनी महाकराली ॥ सम्बल पुर बहुचरा कहाती ।भक्तजनों का दुःख मिटाती ॥ 12 ॥ ज्वाला जी में ज्वाला देवी ।पूजत नित्य भक्त जन सेवी ॥ नगर बम्बई की महारानी ।महा लक्ष्मी तुम कल्याणी ॥ मदुरा में मीनाक्षी तुम हो ।सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो ॥ राजनगर में तुम जगदम्बे ।बनी भद्रकाली तुम अम्बे ॥ 16 ॥ पावागढ़ में दुर्गा माता ।अखिल विश्‍व तेरा यश गाता ॥ काशी पुराधीश्‍वरी माता ।अन्नपूर्णा नाम सुहाता ॥ सर्वानन्द करो कल्याणी ।तुम्हीं शारदा अमृत वाणी ॥ तुम्हरी महिमा जल में थल में ।दुःख दारिद्र सब मेटो पल में ॥ 20 ॥ जेते ऋषि और मुनीशा ।नारद देव और देवेशा । इस जगती के नर और नारी ।ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी ॥ जापर कृपा तुम्हारी होती ।वह पाता भक्ति का मोती ॥ दुःख दारिद्र संकट मिट जाता ।ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता ॥ 24 ॥ जो जन तुम्हरी महिमा गावै ।ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै ॥ जो मन राखे शुद्ध भावना ।ताकी पूरण करो कामना ॥ कुमति निवारि सुमति की दात्री ।जयति जयति माता जगधात्री ॥ शुक्रवार का दिवस सुहावन ।जो व्रत करे तुम्हारा पावन ॥ 28 ॥ गुड़ छोले का भोग लगावै ।कथा तुम्हारी सुने सुनावै ॥ विधिवत पूजा करे तुम्हारी ।फिर प्रसाद पावे शुभकारी ॥ शक्ति-सामरथ हो जो धनको ।दान-दक्षिणा दे विप्रन को ॥ वे जगती के नर औ नारी ।मनवांछित फल पावें भारी ॥ 32 ॥ जो जन शरण तुम्हारी जावे ।सो निश्‍चय भव से तर जावे ॥ तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे ।निश्चय मनवांछित वर पावै ॥ सधवा पूजा करे तुम्हारी ।अमर सुहागिन हो वह नारी ॥ विधवा धर के ध्यान तुम्हारा ।भवसागर से उतरे पारा ॥ 36 ॥ जयति जयति जय संकट हरणी ।विघ्न विनाशन मंगल करनी ॥ हम पर संकट है अति भारी ।वेगि खबर लो मात हमारी ॥ निशिदिन ध्यान तुम्हारो ध्याता ।देह भक्ति वर हम को माता ॥ यह चालीसा जो नित गावे ।सो भवसागर से तर जावे ॥ 40 ॥ ॥ दोहा ॥संतोषी माँ के सदा बंदहूँ पग निश वास ।पूर्ण मनोरथ हो सकल मात हरौ भव त्रास ॥॥ इति श्री संतोषी माता चालीसा ॥

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Sarva Pitru Amavasya 2024 Date: सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण के बाद करें पितृ चालीसा का पाठ, मिलेगा पूर्वजों का आशीर्वाद

Sarva Pitru Amavasya:सर्वपितृ अमावस्या 2024 एक महत्वपूर्ण तिथि है, जिसे हिंदू धर्म में पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए विशेष माना जाता है। यह अमावस्या पितृ पक्ष के समापन का दिन होता है, जब लोग अपने पितरों (पूर्वजों) की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं। Sarva Pitru Amavasya:सर्वपितृ अमावस्या 2024 की तिथि सर्वपितृ अमावस्या को “महालय अमावस्या” या “पितृविसर्जनी अमावस्या” के नाम से भी जाना जाता है। यह तिथि 2024 में पितृ पक्ष के अंतिम दिन, 2 अक्टूबर 2024 को पड़ रही है। इस दिन विशेष रूप से उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश नहीं हो पाया हो। Sarva Pitru Amavasya:सर्वपितृ अमावस्या का महत्व हिंदू मान्यताओं के अनुसार, Sarva Pitru Amavasya पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण, श्राद्ध और अन्य अनुष्ठानों की प्रतीक्षा करते हैं। पितरों की आत्मा की शांति और उन्हें आशीर्वाद के रूप में प्रसन्न करने के लिए तर्पण और श्राद्ध किया जाता है। सर्वपितृ अमावस्या उन लोगों के लिए एक अवसर होती है, जो पितृ पक्ष के किसी अन्य दिन श्राद्ध नहीं कर पाते या जिनके पितरों की मृत्यु तिथि याद नहीं होती। तर्पण और श्राद्ध कर्म तर्पण और श्राद्ध कर्म का हिंदू धर्म में गहरा धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। तर्पण का अर्थ होता है जल चढ़ाना। पवित्र जल को हाथ में लेकर पूर्वजों के नाम से उसे अर्पित किया जाता है, जिससे उनकी आत्मा को शांति मिले। Sarva Pitru Amavasya श्राद्ध में पिंडदान किया जाता है, जिसमें चावल, तिल और अन्य सामग्रियों से पिंड बनाए जाते हैं और उन्हें अर्पित किया जाता है। यह कार्य विशेष रूप से ब्राह्मणों द्वारा किया जाता है, जिन्हें भोजन भी कराया जाता है। तर्पण और श्राद्ध के बाद लोग पितृ चालीसा का पाठ करते हैं। पितृ चालीसा का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन की समस्याओं से मुक्ति मिलती है। पितृ चालीसा का पाठ पितृ चालीसा एक ऐसा स्तोत्र है, जिसमें भगवान और पितरों की स्तुति की जाती है। यह पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में शांति, समृद्धि और उन्नति आती है। पितृ चालीसा का पाठ तर्पण या श्राद्ध कर्म के बाद किया जाता है, Sarva Pitru Amavasya ताकि पितरों की आत्मा संतुष्ट हो और उनके आशीर्वाद से व्यक्ति का जीवन सफल हो। पितृ चालीसा पढ़ने से: Sarva Pitru Amavasya:सर्वपितृ अमावस्या पर विशेष नियम निष्कर्ष Sarva Pitru Amavasya सर्वपितृ अमावस्या हमारे पूर्वजों को याद करने और उनकी आत्मा की शांति के लिए किए गए कर्मों का दिन है। इस दिन का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक भी है। पितरों की कृपा से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं। Sarva Pitru Amavasya तर्पण और पितृ चालीसा का पाठ करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो हमारे जीवन को सुख, समृद्धि और शांति से भर देता है। ”पितृ चालीसा” ।।दोहा।। हे पितरेश्वर आपको दे दो आशीर्वाद, चरण शीश नवा दियो रख दो सिर पर हाथ। सबसे पहले गणपत पाछे घर का देव मनावा जी। हे पितरेश्वर दया राखियो,करियो मन की चाया जी।। ।।चौपाई।। पितरेश्वर करो मार्ग उजागर, चरण रज की मुक्ति सागर । परम उपकार पित्तरेश्वर कीन्हा, मनुष्य योणि में जन्म दीन्हा । मातृ-पितृ देव मन जो भावे, सोई अमित जीवन फल पावे । जै-जै-जै पितर जी साईं, पितृ ऋण बिन मुक्ति नाहिं । चारों ओर प्रताप तुम्हारा, संकट में तेरा ही सहारा । नारायण आधार सृष्टि का, पित्तरजी अंश उसी दृष्टि का । प्रथम पूजन प्रभु आज्ञा सुनाते, भाग्य द्वार आप ही खुलवाते । झुंझुनू में दरबार है साजे, सब देवों संग आप विराजे । प्रसन्न होय मनवांछित फल दीन्हा, कुपित होय बुद्धि हर लीन्हा । पित्तर महिमा सबसे न्यारी, जिसका गुणगावे नर नारी । तीन मण्ड में आप बिराजे, बसु रुद्र आदित्य में साजे । नाथ सकल संपदा तुम्हारी, मैं सेवक समेत सुत नारी । छप्पन भोग नहीं हैं भाते, शुद्ध जल से ही तृप्त हो जाते । तुम्हारे भजन परम हितकारी, छोटे बड़े सभी अधिकारी । भानु उदय संग आप पुजावै, पांच अँजुलि जल रिझावे । ध्वज पताका मण्ड पे है साजे, अखण्ड ज्योति में आप विराजे । सदियों पुरानी ज्योति तुम्हारी, धन्य हुई जन्म भूमि हमारी । शहीद हमारे यहाँ पुजाते, मातृ भक्ति संदेश सुनाते । जगत पित्तरो सिद्धान्त हमारा, धर्म जाति का नहीं है नारा । हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सब पूजे पित्तर भाई । हिन्दू वंश वृक्ष है हमारा, जान से ज्यादा हमको प्यारा । गंगा ये मरुप्रदेश की, पितृ तर्पण अनिवार्य परिवेश की । बन्धु छोड़ ना इनके चरणाँ, इन्हीं की कृपा से मिले प्रभु शरणा । चौदस को जागरण करवाते, अमावस को हम धोक लगाते । जात जडूला सभी मनाते, नान्दीमुख श्राद्ध सभी करवाते । धन्य जन्म भूमि का वो फूल है, जिसे पितृ मण्डल की मिली धूल है । श्री पित्तर जी भक्त हितकारी, सुन लीजे प्रभु अरज हमारी । निशिदिन ध्यान धरे जो कोई, ता सम भक्त और नहीं कोई । तुम अनाथ के नाथ सहाई, दीनन के हो तुम सदा सहाई । चारिक वेद प्रभु के साखी, तुम भक्तन की लज्जा राखी । नाम तुम्हारो लेत जो कोई, ता सम धन्य और नहीं कोई । जो तुम्हारे नित पाँव पलोटत, नवों सिद्धि चरणा में लोटत । सिद्धि तुम्हारी सब मंगलकारी, जो तुम पे जावे बलिहारी । जो तुम्हारे चरणा चित्त लावे, ताकी मुक्ति अवसी हो जावे । सत्य भजन तुम्हारो जो गावे, सो निश्चय चारों फल पावे । तुमहिं देव कुलदेव हमारे, तुम्हीं गुरुदेव प्राण से प्यारे । सत्य आस मन में जो होई, मनवांछित फल पावें सोई । तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई, शेष सहस्त्र मुख सके न गाई । मैं अतिदीन मलीन दुखारी, करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी । अब पितर जी दया दीन पर कीजै, अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै। ।।दोहा।। पित्तरों को स्थान दो, तीरथ और स्वयं ग्राम । श्रद्धा सुमन चढ़ें वहां, पूरण हो सब काम । झुंझनू धाम विराजे हैं, पित्तर हमारे महान । दर्शन से जीवन सफल हो, पूजे सकल जहान।। जीवन सफल जो चाहिए, चले

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दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa)

Durga Chalisa:दुर्गा चालीसा: शक्ति की स्तुति Durga Chalisa:दुर्गा चालीसा हिंदू धर्म में माँ दुर्गा की स्तुति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह चालीसा माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों और उनकी शक्ति का वर्णन करती है। इसे भक्तों द्वारा माँ दुर्गा को प्रसन्न करने और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गाया जाता है। Durga Chalisa:दुर्गा चालीसा का महत्व Durga Chalisa ka Arth दुर्गा चालीसा का अर्थ दुर्गा चालीसा में माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों, जैसे कि महाकाली, महासरस्वती और महालक्ष्मी का वर्णन किया गया है। इसमें माँ दुर्गा के शौर्य, दया और करुणा का भी वर्णन है। यह चालीसा भक्तों को माँ दुर्गा के प्रति समर्पण और भक्ति भावना जगाती है। Durga Chalisa:दुर्गा चालीसा का पाठ कब करें? दुर्गा चालीसा का पाठ कैसे करें? दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa) नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी ॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥ शशि ललाट मुख महाविशाला ।नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ रूप मातु को अधिक सुहावे ।दरश करत जन अति सुख पावे ॥ ४ तुम संसार शक्ति लै कीना ।पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ अन्नपूर्णा हुई जग पाला ।तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥ प्रलयकाल सब नाशन हारी ।तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥ शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥ ८ रूप सरस्वती को तुम धारा ।दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥ धरयो रूप नरसिंह को अम्बा ।परगट भई फाड़कर खम्बा ॥ रक्षा करि प्रह्लाद बचायो ।हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं ।श्री नारायण अंग समाहीं ॥ १२ क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥ हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।महिमा अमित न जात बखानी ॥ मातंगी अरु धूमावति माता ।भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥ श्री भैरव तारा जग तारिणी ।छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ १६ केहरि वाहन सोह भवानी ।लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ कर में खप्पर खड्ग विराजै ।जाको देख काल डर भाजै ॥ सोहै अस्त्र और त्रिशूला ।जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ नगरकोट में तुम्हीं विराजत ।तिहुँलोक में डंका बाजत ॥ २० शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।रक्तबीज शंखन संहारे ॥ महिषासुर नृप अति अभिमानी ।जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ रूप कराल कालिका धारा ।सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ परी गाढ़ सन्तन पर जब जब ।भई सहाय मातु तुम तब तब ॥ २४ अमरपुरी अरु बासव लोका ।तब महिमा सब रहें अशोका ॥ ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।तुम्हें सदा पूजें नरनारी ॥ प्रेम भक्ति से जो यश गावें ।दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥ ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।जन्ममरण ताकौ छुटि जाई ॥ २८ जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥ शंकर आचारज तप कीनो ।काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥ निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥ शक्ति रूप का मरम न पायो ।शक्ति गई तब मन पछितायो ॥ ३२ शरणागत हुई कीर्ति बखानी ।जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥ भई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥ मोको मातु कष्ट अति घेरो ।तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ आशा तृष्णा निपट सतावें ।मोह मदादिक सब बिनशावें ॥ ३६ शत्रु नाश कीजै महारानी ।सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥ करो कृपा हे मातु दयाला ।ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला ॥ जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ ।तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥ श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै ।सब सुख भोग परमपद पावै ॥ ४० देवीदास शरण निज जानी ।कहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥ ॥दोहा॥शरणागत रक्षा करे,भक्त रहे नि:शंक ।मैं आया तेरी शरण में,मातु लिजिये अंक ॥॥ इति श्री दुर्गा चालीसा ॥

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Shiva Chalisa:श्रावण मास में पढ़ें पवित्र श्री शिव चालीसा- जय गिरिजा पति दीन दयाला

Shiva Chalisa शिव चालीसा: भोलेनाथ की भक्ति में डूब जाइए Shiva Chalisa आपने जो शिव चालीसा का अंश दिया है, वह निश्चित रूप से भगवान शिव की भक्ति का एक अद्भुत उदाहरण है। “जय गिरिजा पति दीन दयाला” यह पंक्ति भोलेनाथ के दयालु स्वरूप का वर्णन करती है। Shiva Chalisa:शिव चालीसा का महत्व Shiva Chalisa शिव चालीसा भगवान शिव की स्तुति में गाया जाने वाला एक बहुत ही लोकप्रिय स्तोत्र है। यह स्तोत्र भक्तों को शिव भक्ति के मार्ग पर अग्रसर करता है और मन को शांत करता है। Shiva Chalisa शिव चालीसा के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं: Shiva Chalisa शिव चालीसा का पाठ कैसे करें Shiva Chalisa ।।दोहा।। श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥ जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥ भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥ अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥ वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥ मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥ कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥ नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥ कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥ देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥ किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥ तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥ आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥ त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥ किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥ दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥ वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥ प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥ कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥ पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥ सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥ एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥ कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥ जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥ दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥ त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥ लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥ मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥ स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥ धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥ अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥ शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥ योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥ नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥ जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥ ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥ पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥ पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥ त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥ धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥ जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥ कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥ ॥दोहा॥ नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥ मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥ 

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Ganesh Chalisa:श्री गणेश चालीसा

Ganesh Chalisa श्री गणेश चालीसा: भगवान गणेश की भक्ति में डूब जाइए Ganesh Chalisa श्री गणेश चालीसा हिंदू धर्म में भगवान गणेश की स्तुति में गाया जाने वाला एक बहुत ही लोकप्रिय स्तोत्र है। यह चालीसा भगवान गणेश के विभिन्न रूपों और उनके गुणों का वर्णन करता है। Ganesh Chalisa भक्त गणेश चालीसा का पाठ करते हुए भगवान गणेश से आशीर्वाद और कृपा प्राप्त करते हैं। Ganesh Chalisa गणेश चालीसा का महत्व Ganesh Chalisaगणेश चालीसा का पाठ कैसे करें Ganesh Chalisa जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल॥ जय जय जय गणपति राजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥ जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥ वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥ राजित मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥ पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥ सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥ धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विधाता॥ ऋद्धि सिद्धि तव चँवर डुलावे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥ कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगल कारी॥ एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥ भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा। अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥ अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥ मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥ गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥ अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥ बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥ सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥ शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं। सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥ लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आए शनि राजा॥ निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥ गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥ कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥ नहिं विश्वास उमा कर भयऊ। शनि सों बालक देखन कह्यऊ॥ पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक शिर उड़ि गयो आकाशा॥ गिरजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥ हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्ह्यों लखि सुत को नाशा॥ तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए। काटि चक्र सो गज शिर लाए॥ बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ शंकर डारयो॥ नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥ बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥ चले षडानन भरमि भुलाई। रची बैठ तुम बुद्धि उपाई॥ चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥ धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥ तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै न गाई॥ मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहुँ कौन बिधि विनय तुम्हारी॥ भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। लख प्रयाग ककरा दुर्वासा॥ अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥ Ganesh Chalisa दोहा श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान। नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान॥ सम्वत् अपन सहस्र दश ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश॥

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Sri Durga Chalisa:श्री दुर्गा चालीसा:नमो नमो दुर्गे सुख करनी…

Durga Chalisa यहां सभी पाठकों के लिए प्रस्तुत है पवित्र श्री दुर्गा चालीसा। नवरात्रि के दिनों के अलावा  भी दुर्गा चालीसा का नित्य पाठ करने से मां दुर्गा अपने भक्त पर प्रसन्न होती हैं और वे  हर तरह के संकट दूर करती हैं।  Durga Chalisa:दुर्गा चालीसा: शक्ति की स्तुति Durga Chalisa दुर्गा चालीसा एक प्रसिद्ध हिंदू स्तोत्र है जो देवी दुर्गा की महिमा का वर्णन करता है। देवी दुर्गा को शक्ति का प्रतीक माना जाता है और उन्हें बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी माना जाता है। इस चालीसा में देवी के विभिन्न रूपों और उनके शक्तिशाली कार्यों का वर्णन किया गया है। Durga Chalisa दुर्गा चालीसा का महत्व Sri Durga Chalisa कब पाठ करें Durga Chalisa दुर्गा चालीसा नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूं लोक फैली उजियारी॥ शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥ रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥ तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥ अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥ प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥ शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥ रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥ धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥ रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥ लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥ क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥ हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥ मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥ श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥ केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥ कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै॥ सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥ नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुंलोक में डंका बाजत॥ शुंभ निशुंभ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥ महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥ रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥ परी गाढ़ संतन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥ अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥ ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥ प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥ ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥ जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥ शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥ निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥ शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥ शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥ भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥ मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥ आशा तृष्णा निपट सतावें। रिपू मुरख मौही डरपावे॥ शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥ करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला। जब लगि जिऊं दया फल पाऊं । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥ दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥ देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥ Durga Chalisa ॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्ण ॥

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Hanuman Chalisa Hindi:श्री हनुमान चालीसा

Hanuman Chalisa श्री हनुमान चालीसा: बजरंगबली की अद्भुत स्तुति Hanuman Chalisa श्री हनुमान चालीसा हिंदू धर्म में भगवान हनुमान की स्तुति में गाया जाने वाला एक बहुत ही लोकप्रिय स्तोत्र है। यह चालीसा भगवान हनुमान के विभिन्न रूपों और उनके गुणों का वर्णन करता है। भक्त हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए भगवान हनुमान से आशीर्वाद और कृपा प्राप्त करते हैं। Hanuman Chalisa हनुमान चालीसा का महत्व Hanuman Chalisa हनुमान चालीसा का पाठ कैसे करें Hanuman Chalisa दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।  बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।। Hanuman Chalisa चौपाई : जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।। हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै। संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन।। विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।। भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे।। लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।। सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।। जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।। तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।। तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना।। जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।। दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।। सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना।। आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।। भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।। नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।। संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।। सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा। और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।। चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।। साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।। अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।। राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।। तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै।। अन्तकाल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।। और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।। संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई।। जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।। तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।  Hanuman Chalisa दोहा : पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

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hanuman ji:आधुनिक दुनिया में हनुमान चालीसा का क्या महत्व है?

🕉️हनुमानजी का प्रताप चारों युगों में रहा है और आगे भी रहेगा, क्योंकि वे अजर-अमर हैं। उन्हें अमरत्व का वरदान मिला हुआ है। वे जब तक चाहें शरीर में रहकर इस धरती पर मौजूद रह सकते हैं। सिर्फ इस बात के लिए ही हनुमान चालीसा का आधुनिक दुनिया में महत्व नहीं बढ़ जाता है बल्कि इसलिए कि पूरे ब्रह्मांड में हनुमानजी ही एकतात्र ऐसे देवता हैं जिनकी भक्ति से हर तरह के संकट तुरंत ही हल हो जाते हैं और यह एक चमत्कारिक सत्य है। हनुमान चालीसा को महान कवि तुलसीदास जी ने लिखा था हनुमान चालीसा से पहले भी हनुमानजी पर कई चालीसा लिखी गई और कई स्तुतियां भी लिखी गई थीं लेकिन हनुमान चालीसा का महत्व इसीलिए आधुनिक युग में है क्योंकि यह पढ़ने और समझने बहुत ही सरल है और यह भी कि इस चालीसा में हनुमानजी के संपूर्ण चरित्र का वर्णन हो जाता है जिससे उनकी भक्ति करने में आसानी होती है। Hanuman Chalisa:श्री हनुमान चालीसा हनुमानजी की भक्ति के लिए आप कुछ भी पढ़ें लेकिन हनुमान चालीसा सच में ही अपने आप में एक संपूर्ण रामचरि‍त मानस की तरह है। हनुमान चालीसा लिखने वाले तुलसीदासजी राम के बहुत बड़े भक्त थे। उनके इसी विश्वास के कारण औरेंगजेब ने उन्हे बंदी बना लिया था। कहते हैं कि वहीं बैठकर उन्होंने हनुमान चालीसा लिखा था। अंत में ऐसे कुछ हुआ कि औरंगजेब को उन्हें छोड़ना पड़ा था।  इसमें 40 छंद होते हैं जिसके कारण इसको चालीसा कहा जाता है। यदि कोई भी इसका पाठ करता है तो उसे चालीसा पाठ बोला जाता है। आधुनिक युग की भागमभाग में हनुमान चालीसा ही एक ऐसा पाठ है जिसे तुरंत ही आसानी से पढ़ा जा सकता है, लेकिन उसके लिए हनुमानजी की भक्ति होना जरूरी है। हिंदू धर्म में हनुमान चालीसा का बड़ा ही महत्व है। इस चालीसा को पढ़ते रहने से व्यक्ति के मन में साहस, आत्मविश्वास और पराक्रम का संचार होता है। इसके कारण ही वह संसार पर विजय प्राप्त कर लेता है।  इसके एक एक छंद का बहुत महत्व है जैसे- 1.बच्चे का पढ़ाई में मन ना लगे तो उसको इस छंद का पाठ करना चाहिए- बल बुधि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार। 2.मन में अकारण भय हो तो निम्न पंक्ति पढ़ना चाहिए- भूत पिशाच निकट नहीं आवे महावीर जब नाम सुनावे। 3.किसी भी कार्य को सिद्ध करना हो तो यह पंक्ति पढ़ें- भीम रूप धरि असुर सँहारे, रामचन्द्र के काज सँवारे। 4.बहुत समय से यदि बीमार हैं तो यह पंक्ति पढ़ें- नासै रोग हरे सब पीरा, जपत निरन्तर हनुमत बीरा। 5.प्राणों पर यदि संकट आ गया हो तो यह पंक्ति पढ़ें- संकट कटै मिटै सब पीरा, जो सुमिरै हनुमत बलबीरा। या संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै 6.यदि आप बुरी संगत में पड़े हैं और यह संत छुट नहीं रही है तो यह पढ़ें- महाबीर बिक्रम बजरंगी, कुमति निवार सुमति के संगी 7.यदि आप किसी भी प्रकार के बंधन में हैं तो- जो सत बार पाठ कर कोई, छूटहि बन्दि महा सुख होई। 8.किसी भी प्रकार का डर है तो यह पढ़ें- सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहू को डरना। 9.आपके मन में किसी भी प्रकार की मनोकामना है तो पढ़ें- और मनोरथ जो कोई लावै, सोई अमित जीवन फल पावै।

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