पार्वतीपंचकम् एक संस्कृत स्तोत्र है जो देवी पार्वती की स्तुति करता है। यह स्तोत्र 12वीं शताब्दी के कवि और संत, श्रीपदाचार्य द्वारा लिखा गया था।
पार्वतीपंचकम् के पाँच श्लोक हैं, और प्रत्येक श्लोक में देवी पार्वती के एक अलग गुण या रूप का वर्णन किया गया है।
पार्वतीपंचकम् का पहला श्लोक इस प्रकार है:
विनोद मोद मोदिता दयो दयोज् ज्वलांतरा निशुंभ शुंभ दंभ दारणे सुदा रुणारुणा।
इस श्लोक में, श्रीपदाचार्य देवी पार्वती को नमस्कार करते हैं और उन्हें "विनोद और आनंद की देवी" कहते हैं। वे उन्हें "निशुंभ और शुंभ के दंभ को नष्ट करने वाली" भी कहते हैं।
पार्वतीपंचकम् के पाँच श्लोकों का अर्थ है:
- श्लोक 1: देवी पार्वती को विनोद और आनंद की देवी के रूप में वर्णित किया गया है।
- श्लोक 2: देवी पार्वती को निशुंभ और शुंभ के दंभ को नष्ट करने वाली के रूप में वर्णित किया गया है।
- श्लोक 3: देवी पार्वती को आध्यात्मिक ज्ञान और मार्गदर्शन की देवी के रूप में वर्णित किया गया है।
- श्लोक 4: देवी पार्वती को सुख और समृद्धि की देवी के रूप में वर्णित किया गया है।
- श्लोक 5: देवी पार्वती की पूजा और आराधना का महत्व।
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