June 3, 2026

Parma ekadashi

Parma ekadashi 2026 Vrat Significance Rules : परमा एकादशी की सटीक तिथि, शुभ मुहूर्त, अचूक पूजा विधि और व्रत कथा….

Parma ekadashi 2026 Puja Vidhi : सनातन धर्म और वैदिक पंचांग की असीम व ज्ञानवर्धक दुनिया में भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित व्रतों का अत्यधिक महत्व है। हिंदू धर्म में मनाए जाने वाले सभी प्रमुख व्रतों में एकादशी को सर्वोपरि और सबसे अधिक पुण्यकारी माना गया है। आम तौर पर एक सामान्य वर्ष में कुल 24 एकादशियां होती हैं, लेकिन जब हिंदू पंचांग की सटीक ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार हर तीन साल के बाद एक अतिरिक्त मास (जिसे हम अधिकमास, मलमास या पुरुषोत्तम मास कहते हैं) जुड़ता है, तो एकादशियों की कुल संख्या बढ़कर 26 हो जाती है। इसी अत्यंत पवित्र अधिकमास के कृष्ण पक्ष (जब चंद्रमा का आकार घटता है) में आने वाली पावन एकादशी को शास्त्रों में परमा एकादशी या कमला एकादशी के नाम से जाना जाता है। चूंकि यह दुर्लभ और दिव्य संयोग हर तीन साल में केवल एक ही बार बनता है, इसलिए इस वर्ष Parma Ekadashi 2026 का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व अन्य सभी सामान्य व्रतों की तुलना में कई हजार गुना अधिक माना जा रहा है। भगवान विष्णु की अपार कृपा पाने और जीवन के हर बड़े कष्ट से मुक्ति के लिए यह दिन किसी महा उत्सव से कम नहीं है। Parma ekadashi 2026 Vrat Significance Rules : परमा एकादशी की सटीक तिथि….. पंचांग की सटीक गणना: तिथि और पारण का शुभ समय किसी भी वैदिक व्रत का शत-प्रतिशत और अचूक फल इंसान को तभी मिलता है, जब उसे व्रत की सही तिथि और सटीक शुभ मुहूर्त का पूर्ण ज्ञान हो। Parma ekadashi हिंदू पंचांग की एकदम सटीक गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष Parma Ekadashi 2026 का अत्यंत पावन उपवास 11 जून (गुरुवार) को पूरे भारतवर्ष में अपार श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ रखा जाएगा। व्रत की पवित्र तिथियों का एकदम विस्तृत और सटीक विवरण इस प्रकार है: एकादशी तिथि का विधिवत आरंभ: हिंदू पंचांग के अनुसार, 10 जून की रात (या 11 जून की मध्यरात्रि) को ठीक 12 बजकर 57 मिनट (कुछ पंचांगों के अनुसार 12:59 बजे) से एकादशी तिथि की शुरुआत हो जाएगी। एकादशी तिथि का पूर्ण समापन: यह पावन तिथि अगले दिन यानी 11 जून को रात के 10 बजकर 36 या 37 मिनट पर अपना पूर्ण समापन करेगी। व्रत का पारण (उपवास खोलने का पवित्र समय): सनातन धर्म शास्त्रों के कड़े नियमों के अनुसार इस महान व्रत का पारण हमेशा अगले दिन सूर्योदय के बाद किया जाता है। Parma ekadashi इसलिए 12 जून की सुबह 5 बजकर 23 मिनट से लेकर 8 बजकर 10 मिनट के बीच व्रत खोलना सबसे अधिक शुभ रहेगा। (उदया तिथि की सनातनी मान्यताओं का पूर्ण रूप से पालन करते हुए यह व्रत 11 जून को ही संपन्न होगा।) आध्यात्मिक महत्व और इसके गहरे रहस्य हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, मलमास में आने के कारण Parma Ekadashi 2026 के दिन भगवान श्री हरि विष्णु और धन की देवी माता लक्ष्मी की कृपा अपने चरम पर होती है। इस अद्भुत उपवास को इंसान को अत्यंत दुर्लभ सिद्धियां, मानसिक शांति और अपार धन-संपत्ति प्रदान करने वाला माना गया है। जो भी भक्त इस दिन सच्चे मन और शुद्ध अंतरात्मा से भगवान श्री हरि की विधिवत पूजा-अर्चना करता है, उसके जीवन की घोर दरिद्रता हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है। पौराणिक मान्यता तो यह भी है कि इस पावन दिन पर केवल पूरे नियम से उपवास रखने और इसकी कथा सुनने मात्र से ही मनुष्य को सैकड़ों महान यज्ञों को संपन्न करने के बराबर असीम फल प्राप्त हो जाता है और अंत में मृत्यु के पश्चात उसे सीधे वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। पौराणिक और चमत्कारी व्रत कथा कहा जाता है कि कथा के श्रवण के बिना एकादशी का उपवास बिल्कुल अधूरा रहता है। Parma Ekadashi 2026 की पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में अवंतीपुर नामक एक अत्यंत ही सुंदर और समृद्ध गाँव में एक बहुत ही ज्ञानी और विद्वान ब्राह्मण रहा करते थे। Parma ekadashi उनके पाँच पुत्र थे; जिनमें से चार तो बहुत ही संस्कारी और आज्ञाकारी थे, लेकिन उनका पाँचवाँ पुत्र, जिसका नाम जयशर्मा था, वह पूरी तरह से दुराचारों और पाप कर्मों के अंधेरे में डूबा हुआ था। उसके पापी आचरण और बुरे व्यवहार के कारण गाँव के आस-पास के सभी लोग हमेशा बहुत परेशान रहते थे। अंततः उसके दुराचरण से तंग आकर उसके सगे-संबंधियों और स्वयं उसके पिता ने भी उसे हमेशा के लिए अपने घर से निकाल दिया। अपनों के भारी तिरस्कार और सामाजिक अपमान से आहत होकर वह दुखी मन से गाँव छोड़कर एक घने जंगल की ओर चला गया। दर-दर भटकते हुए वह भूख-प्यास से बुरी तरह व्याकुल होकर प्रयाग के पवित्र तीर्थ स्थल पर जा पहुँचा। Parma ekadashi वहां उसे महर्षि हरिमित्र का शांत और आध्यात्मिक आश्रम दिखाई दिया। चूँकि वह पुरुषोत्तम मास (अधिकमास) का अत्यंत पवित्र समय था, इसलिए वहां बहुत से विद्वान ब्राह्मण और श्रद्धालु एकत्रित थे। वहां बैठकर सभी लोग भगवान विष्णु की महिमा गा रहे थे। Parma ekadashi महर्षि के मार्गदर्शन में Parma Ekadashi 2026 का यह कठिन व्रत पूरे विधि-विधान से संपन्न किया। उसके इस जाग्रत व्रत के प्रबल प्रभाव से उसी रात साक्षात देवी लक्ष्मी उसके समक्ष प्रकट हुईं और कहा, “हे ब्राह्मण पुत्र! तुमने यह व्रत पूरी श्रद्धा और नियम से किया है, इसलिए तुम्हें मेरा आशीर्वाद और महान सौभाग्य प्राप्त होगा”। माता लक्ष्मी के इस दिव्य वरदान से वह भटका हुआ युवक अपार धन और असीम समृद्धि से संपन्न होकर खुशी-खुशी अपने पिता के पास घर लौट आया। Parma ekadashi इसलिए कहा जाता है कि इस कथा को सुनने वाला हर इंसान पापों से मुक्त हो जाता है। अचूक पूजा विधि यदि आप Parma Ekadashi 2026 का पूरा, अचूक और चमत्कारी फल पाना चाहते हैं, तो शास्त्रों में बताई गई इस पूजा विधि का कड़ाई से पालन करें: व्रत के शुभ दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में जल्दी उठकर शुद्ध जल (यदि संभव हो तो गंगाजल मिलाकर) से स्नान करें और पूरी तरह साफ-सुथरे वस्त्र धारण करें। घर के स्वच्छ पूजा स्थल पर भगवान विष्णु के समक्ष हाथ जोड़कर अपने निर्जल या फलाहार व्रत का दृढ़ संकल्प लें। भगवान विष्णु और धन की देवी माता लक्ष्मी की सुंदर मूर्तियों को पंचामृत से आदरपूर्वक स्नान

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Mahatmya Stotram

Shri Radha Naam-Mahatmya Stotram : श्रीराधा नाम महात्म्य स्तोत्र….

Shri Radha Naam-Mahatmya Stotram in Hindi: श्रीराधा नाम महात्म्य स्तोत्र हिंदी पाठ रेफो हि कोटी जन्माघं कर्मभोगं शुभाशुभम् ।आकारो गर्भवासं च मृत्युं च रोगमुत्सृजेत् । धकार आयुषो हानिमाकारो भवबन्धनम् ।श्रवणस्मरणोक्तिभ्यः प्रणश्यति न संशयः ।रेफ़ो हि निश्चलां भक्तिं दास्यं कृष्णपदाम्बुजे ।। सर्वेप्सितं सदानन्दं सर्वसिद्धौघमीश्वरम् ।धकारः सहवासं च तत्तुल्यकालमेव च । ददाति सार्ष्टिसारूप्यं तत्त्वज्ञानं हरेः समम् ।आकरस्तेजसां राशिं दानशक्तिं हरौ यथा ।  योगशक्तिं योगमतिं सर्वकालं हरिस्मृतिम् ।श्रुत्युक्तिस्मरणाद्योगान्मोहजालं च किल्बिषम् ।रोगशोक मृत्युयमा वेपन्ते नात्र संशयः ।  ।। इति श्रीराधा नाम महात्म्य स्तोत्र सम्पूर्णम् ।।

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Mrityunjay Stotra

Shri Mrityunjay Stotra : श्री मृत्युंजय स्तोत्र….

Shri Mrityunjay Stotra : श्री मृत्युंजय स्तोत्र: श्री मृत्युंजय स्तोत्र के बारे में माना जाता है कि महा मृत्युंजय मंत्र आपको गंभीर बीमारियों से छुटकारा दिलाने में मदद कर सकता है। वेदों के सबसे पुराने स्तोत्रों में से एक माने जाने वाले महामृत्युंजय जाप का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है; यह भगवान शिव के ‘रुद्र’ अवतार को समर्पित है। Mrityunjay Stotra यह आपकी आयु बढ़ाने में भी सहायक है। जब इस मंत्र का नियमित रूप से सच्ची श्रद्धा के साथ जाप किया जाता है, तो यह पारिवारिक कलह, संपत्ति के बंटवारे और वैवाहिक तनाव जैसी समस्याओं को सुलझाने में मदद कर सकता है। श्री मृत्युंजय स्तोत्र में अद्भुत रोग-निवारक शक्तियाँ निहित हैं। हिंदुओं के बीच इसे सबसे श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना माना जाता है। शिव ही परम सत्य हैं और वे ही परमेश्वर हैं। शिव के अनुयायी मानते हैं कि वे ‘स्वयंभू’ (स्वयं प्रकट होने वाले) हैं। ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करना अत्यंत सरल है और वे अक्सर अपने भक्तों को वरदान देते हैं। Mrityunjay Stotra चाहे बात धन-संपत्ति, स्वास्थ्य या सुख-समृद्धि की हो—वे आपकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करते हैं और आपको आपके कष्टों से मुक्ति दिलाते हैं। शिव पुराण में इस मंत्र के उल्लेख से जुड़ी दो कथाएँ प्रचलित हैं। पहली कथा के अनुसार: यह मंत्र केवल ऋषि मार्कण्डेय को ज्ञात था, जिन्हें स्वयं भगवान शिव ने इस मंत्र का वरदान दिया था। अब प्रश्न यह उठता है कि शिव की आराधना किस प्रकार की जाए? सत्ययुग में मूर्ति-पूजा फलदायी थी, परंतु कलियुग में केवल मूर्ति के समक्ष प्रार्थना कर लेना ही पर्याप्त नहीं है। यहाँ तक कि भविष्य पुराण में भी सुख और मानसिक शांति की प्राप्ति हेतु मंत्र-जाप के महत्व का वर्णन किया गया है। Mrityunjay Stotra इसी प्रकार, शिव के मंत्र—महामृत्युंजय मंत्र—का प्रतिदिन जाप करने से आपको उत्तम स्वास्थ्य, धन-संपत्ति, समृद्धि और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। यह मंत्र सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और आपको विपत्तियों तथा संकटों से सुरक्षित रखता है। श्री मृत्युंजय स्तोत्र के लाभ: यदि आपकी जन्मकुंडली में मास, गोचर, दशा, अंतर्दशा अथवा किसी अन्य प्रकार का दोष विद्यमान है, तो श्री मृत्युंजय स्तोत्र आपको उससे मुक्ति दिलाने में सहायक सिद्ध होगा।यदि आप किसी रोग अथवा शारीरिक व्याधि से पीड़ित हैं, Mrityunjay Stotra तो यह मंत्र आपके लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा। Mrityunjay Stotra यह आयु वृद्धि में भी सहायक है; यदि आप पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ श्री मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ करते हैं, तो यह अकाल मृत्यु को टाल सकता है अथवा मृत्यु को कुछ समय के लिए स्थगित कर सकता है। श्री मृत्युंजय स्तोत्र का जाप पारिवारिक कलह, संपत्ति के बंटवारे और किसी महामारी के कारण लोगों की मृत्यु होने जैसी स्थितियों में सहायक होता है। यदि आप किसी आर्थिक परेशानी से गुज़र रहे हैं या व्यापार में घाटा उठा रहे हैं, तो श्री मृत्युंजय स्तोत्र का जाप आपके लिए लाभकारी सिद्ध होगा।श्री मृत्युंजय स्तोत्र में रोग-निवारक शक्तियाँ निहित हैं; ऐसा माना जाता है कि Mrityunjay Stotra श्री मृत्युंजय स्तोत्र के पाठ से दिव्य तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो रोगों को दूर करती हैं और मृत्यु से जुड़े भय को समाप्त करने में सहायता करती हैं, जिससे आप जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाते हैं। इसीलिए, इसे ‘मोक्ष मंत्र’ भी कहा जाता है। इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए: जो व्यक्ति किसी असाध्य या दीर्घकालिक रोग से पीड़ित हैं, अथवा जिनका स्वास्थ्य लगातार खराब बना रहता है, Mrityunjay Stotra उन्हें वैदिक नियमों के अनुसार श्री मृत्युंजय स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। श्री मृत्युंजय स्तोत्र हिंदी पाठ : Shri Mrityunjay Stotra in Hindi रत्नसानुशरासनं रजताद्रिश्रृंगनिकेतनंशिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम् ।क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवंदितंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 1 ॥ पंचपादपपुष्पगन्धिपदाम्बुजद्वयशोभितंभाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम् ।भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशिनं भवमव्ययंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 2 ॥ मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरंपंकजासनपद्मलोचनपूजितांगघ्रिसरोरुहम् ।देवसिद्धतरंगिणी करसिक्तशीतजटाधरंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 3 ॥ कुण्डलीकृतकुण्डलीश्वरकुण्डलं वृषवाहनंनारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम् ।अंधकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 4 ॥ यक्षराजसखं भगाक्षिहरं भुजंगविभूषणंशैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम् ।क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 5 ॥ भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणंदक्षयज्ञविनाशिनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम् ।भुक्तिमुक्तिफलप्रदं निखिलाघसंघनिबर्हणंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 6 ॥ भक्तवत्सलमर्चतां निधिमक्षयं हरिदम्बरंसर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनूपमम् ।भूमिवारिनभोहुताशनसोमपालितस्वाकृतिंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 7 ॥ विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परंसंहरन्तमथ प्रपंचमशेषलोकनिवासिनम् ।क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमाव्रतंचन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ 8 ॥ रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकण्ठमुमापतिम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 9 ॥ कालकण्ठं कलामूर्तिं कालाग्निं कालनाशनम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 10 ॥ नीलकण्ठं विरुपाक्षं निर्मलं निरूपद्रवम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 11 ॥ वामदेवं महादेवं लोकनाथं जगद्गुरुम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 12 ॥ देवदेवं जगन्नाथं देवेशमृषभध्वजम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 13 ॥ अनन्तमव्ययं शान्तमक्षमालाधरं हरम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 14 ॥ आनन्दं परमं नित्यं कैवल्यपदकारणम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 15 ॥ स्वर्गापवर्गदातारं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणम् ।नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्युः करिष्यति ॥ 16 ॥ ॥ इति श्री मृत्युंजय स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

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